Naajaayaz

Salam Azaad

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  • Year: 2007

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Dolphin Books

  • ISBN No: 9788188588190

नाजायज
भारतीय मुसलमानों की परवर्ती पीढ़ी, जिसकी आबादी बाँग्लादेश की कूल जनसंख्या से लगभग दुगनी है, कैसे अपना जीवन जी रही है ? खास तौर पर भारत की मुस्लिम महिलाएँ, जो शरा के क्रानून की चक्की में हर पल घिसती रहती हैं, क्योंकि 'भारत के मुस्लिम नेताओं ने शरीयत से जुड़े कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बहाने इस देश की मुस्लिम महिलाओं को मध्य युग के घुप्प अँधेरे में बंद कर रखा है ।
लगातार तीन वर्ष तक दिल्ली में निर्वासित जीवनयापन के दौरान इन मुस्लिम महिलाओं के प्रति इस घोर अमानवीय और शरा कानून की दुहाई देकर मुल्लाओं द्वारा ढाए गए इन जुल्मों को सलाम आजाद ने बहुत नज़दीक से देखा है । उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान दिल्ली ही नहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, केरल, पश्चिम बंग और कश्मीर के साथ अन्यान्य प्रदेशों में इस भयावहता को महसूस किया है। उन्होंने यह भी पाया है कि इस्लाम के नाम पर इन तमाम इलाकों की मुस्लिम महिलाएँ पुरुषशासित समाज-व्यवस्था द्वारा कितनी विषम वंचनाओं और यंत्रणाओं की शिकार है । पति के क्रोध और उत्तेज़ना के चलते स्त्री को तलाक कहने पर इस्लाम द्वारा तलाक को भले ही स्वीकृति नहीं मिली हो, लेकिन भारत का शरापसंद मुस्लिम समाज इसे तलाक के तोर पर मानने को मजबूर करता है । इस्लाम और मानवाधिकारवादी इस तलाक के समय स्त्री यदि गर्भवती हो तो जन्म-ग्रहण के बाद उस संतान को वैध नहीं माना जाता है।  उस निष्पाप, निष्कलंक मानव शिशु को 'नाजायज़' ठहराया जाता है ।
भारत के मुसलमानों को केंद्र में रखकर इस समस्या पर छिटपुट लेखादि अवश्य प्रकाशित हुए है, लेकिन अपनी अच्छी देखकर और 'फील्ड वर्क' को आधार बनाकर 'नाजायज' जैसे विषय पर एक पूरी पुस्तक लिखने की परिकल्पना पहली बार बाँग्लादेश के इस लेखक द्वारा हुई है ।

Salam Azaad

सलाम आजाद
सलाम आजाद का जन्म 10 जुलाई, 1964 को बाँग्लादेश के विक्रमपुर जिले के दामला नामक गाँव में हुआ । सर जगदीशचंद्र बसु इंस्टीट्यूट के विशिष्ट छात्र रह चुके सलाम आज़ाद की परवर्ती शिक्षा गाइबाँधा सरकारी कॉलेज और ढाका विश्वविधालय में हुई । उनके द्वारा लिखी गई किताबों की संख्या चालीस से भी अधिक है, जिनमें उपन्यास, कहानियाँ और निबंध शामिल हैं । 'कंट्रीब्यूशन ऑव इंडिया इन द वार ऑव लिबरेशन ऑव बाँग्लादेश' पुस्तक, जो बाँग्लादेश के मुक्ति संग्राम में भारत के योगदान पर लिखित है--इस विषय पर बाँग्लादेश से प्रकाशित पहली पुस्तक है । उनकी औपन्यासिक कृति 'भाँगा मठ' पर खालिदा- निजामी की गठबंधन सरकार ने वर्ष 2004 में पाबंदी लगा दी थी । इस पुस्तक में मदरसों में दी जा रही तालीम और धर्मांधों द्धारा बाँग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर ढाए जा रहे असमानतापूर्ण जुल्मों-ज़बर की तस्वीरें उकेरी गई है ।
सलाम आज़ाद आजकल दिल्ली में एक निर्वासित जीवन जीने को बाध्य हैं । वर्ष 2003 में आयोजित शांतिनिकेतन के पौष मेला के अवसर पर विश्वभारती द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक 'रवीन्द्र भुवने बाँग्लादेश' का लोकार्पण हुआ था । यह पूर्व बंग और बाँग्लादेश के किसी लेखक की पहती कृति थी, जो विश्वभारती से प्रकाशित हुई थी । अंग्रेजी, हिंदी, फ्रांसीसी के साथ उनकी कई रचनाएँ भारतीय भाषाओं में अनूदित हैं।


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