Chor Darvaazaa

Jiten Thakur

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9789380048963

जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?

Jiten Thakur

जितेन ठाकुर
जन्म: 05.10.1955
शिक्षा: एम. ए. (हिंदी)
डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (हे.न.ब.ग.वि.)
साहित्यिक प्रकाशन: ‘चंद सांचे चांदनी के’ (कविता संग्रह); ‘दहशतगर्द’, ‘अजनबी शहर में’, ‘एक झूठ एक सच’, ‘एक रात का तिलिस्म’, ‘यादगारी कहानियां’ (कहानी संग्रह);  ‘शेष अवशेष’, ‘उड़ान’, ‘नीलधरा’, ‘चैराह’ (उपन्यास)
पहली कहानी 1978 में ‘सारिका’ एवं पहली कविता 1980 में ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित
दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों द्वारा कहानियों पर ‘टेलीफिल्म’ और ‘रेडियो नाटकों’ का निर्माण जर्मन, अंग्रेजी, उर्दू सहित उड़िया, मलयालम, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़ और बंगला भाषाओं में कहानियां अनूदित और प्रकाशित

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