Chhajju Ram Dinmani Tatha Anya Kahaniyan

Mohan Thapliyal

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  • Year: 2000

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 8800550088331

छज्जूराम दिनमणि तथा अन्य कहानियाँ
मोहन थपलियाल ऐसे कहानीकार हैं, जिनके लिखने की रफ्तार बहुत धीमी है, फिर भी कम छपने के बावजूद वह उल्लेखनीय कथाकार बने रहे है । इनकी कहानियों में ग्रामीण और शहरी परिवेश का अदभुत संयोजन दिखाई देता है । निम्न-मध्य और गरीब तबके के लोग इन कहानियों के मुख्य पात्र हैं, जिनके साथ समकालीन समाज की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों की ऐतिहासिकता भी बराबर मौजूद है । जहाँ तक कथ्य और शिल्प का ताल्लुक है, ये कहानियाँ अवसर पारंपरिक ढांचे का निषेध करती हैं। कहीं-कहीं एक नए डिक्शन की तलाश भी इनमें है- 'शवासन' इसी तरह का मंजर पैदा करती है । यथार्थ और फंतासी का ताना-बाना मोहन थपलियाल की कहानियों में एक अलग जादूगरी पैदा करता है, लेकिन यह जादूगरी किसी चकमे या चमत्कार को दिखाने के लिए न होकर पात्रों व परिस्थितियों की हकीका जानने में मददगार सिद्ध होती है । द्वंहात्पक दर्शन को पहचान देने वाली ये कहानियाँ व्यक्ति की निजी लडाई को समाज की व्यापक लडाई से जोडना अपना फर्ज समझती है । यह अलग बात है कि यह मकसद पाने के लिए ऊँचे-ऊँचे आदर्शों, जोशीले नारों और बड़बोले भाषणों का इस्तेमाल प्रत्यक्षत: लेखक ने कहीं नहीं किया है । शायद इस संदर्भ में लेखक बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की इस उक्ति --'हमने उनके दुख के नहीं, दुख के कारणों के बारे में बात की' --का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहता है । दुख के कारण और सामाजिक विसंगतियों की गहरी पड़ताल इस संग्रह की तमाम कहानियों में मौजूद है । बतौर बानगी ‘एक वक्त की रोटी' और 'छज्जूराम दिनमणि' देखी जा सकती है । दुख की घडी की टिक-टिक दोनों जगह समान है भले ही सामाजिक परिवेश बिलकुल भिन्न । लेकिन इस संग्रह को वहानियों का अंतिम लक्ष्य दुख और नैराश्य न होकर पाठक के मन में बेहतर भविष्य के लिए एक जीती-जागती उम्मीद भरना है ।

Mohan Thapliyal

मोहन थपलियाल
जन्म : अगस्त, 1942 में दयाराबाग (टिहरी)
मूल निवास : पौडी गढ़वाल जिले का श्रीकोट खातस्यूँ गाँव ।
दसवीं तक पढाई के बाद स्कूल छोड़ दिया, फिर इंटर तक पढाई और नौकरी एक साथ । चार-पाँच नौकरियाँ करने के बाद 1973 में सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर 1974 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में दाखिला लेकर जर्मन भाषा में बी०ए० ऑनर्स तक पढाई । अगस्त, 1979 से लखनऊ के लिटरेसी हाउम में अतिथि लेखक के रूप में कुछ माह तक काम करने के बाद नवंबर, 1979 से दैनिक 'अमृत प्रभात' लखनऊ के संपादकीय विभाग में काम संभाला । जून. 1990 में 'अमृत प्रभात' बिक जाने के बाद स्वतंत्र लेखन और छिटपुट नौकरियों का दौर शुरू, जो अभी तक जारी है ।
1983 में पहला कहानी-संग्रह 'सालोमन ग्रुंडे और अन्य कहानियाँ' प्रकाशित । 1995 में 'अलबर्ट आइंस्टाइन की जीवनी' तथा 1998 में जर्मन कवि एवं नाटककार बेर्टोल्ट ब्रष्ट की 71 कविताओं और 30 छोटी कहानियों के मूल जर्मन से हिंदी अनुवाद प्रकाशित ।

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