Aashankit Andhera

Surendra Tiwari

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  • Year: 1992

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 111-11-1111-111-1

आशंकित अंधेरा
जिंदगी के विविध अनुभवों से गुजरती इस संग्रह की कहानियां मात्र मनोरंजन ही नहीं करतीं बल्कि पाठक को सोच की एक बिंदु पर ला खड़ा करती हैं। आज जीवन में, समाज में, देश में हर तरफ जो अंधेरा ही अंधेरा नजर आ रहा है, उस अंधेरे के  भीतर आस्था की, विश्वास की, मानवीयता की, सहयोगिता की, मित्रता की जो एक हल्की लौ है, टिमटिमाती रोशनी है, उसी रोशनी की खोज और पहचान ये कहानियां कराती हैं।
‘आशंकित अंधेरा’ की कहानियों की दूसरी विशिष्टता है इनमें विद्यमान ‘कथारस’। आज ‘कहानी’ में ‘कहानीपन’ के अभाव की जो बात की जाती है उस अभाव को ये कहानियां निस्संदेह कम करती हैं। साथ ही यह भी कि इन कहानियों में न तो एकरूपता है न दुहराव ही। हर कहानी जीवन के अलग-अलग रंग को बिखेरती है, एक अलग तरह के अनुभव की दुनिया में पाठक को पहुंचाती हैं।
सुरेंद्र तिवारी की एक विशिष्ट कथाकृति!

Surendra Tiwari

सुरेन्द्र तिवारी
कहानी, नाटक एवं उपन्यास विधाओं में करीब तीस वर्षों से लगातार लेखन। अनेक कहानियों के अनुवाद अंग्रेजी तथा कई भारतीय भाषाओं में हो चुके हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से रचनाएँ प्रसारित।
मौलिक लेखन के अतिरिक्त बाँग्ला से अनेक कहानियों एवं उपन्यासों के अनुवाद प्रकाशित। रंगमंच से विशेष लगाव। हिंदी एवं पंजाबी में कई नाटकों का निर्देशन किया।
हिंदी अकादमी, दिल्ली का ‘कृति पुरस्कार’ तथा ‘साहित्यकार सम्मान’, ‘सहस्राब्दी हिंदी सेवा सम्मान’, ‘सृजन सम्मान’ (रायपुर) तथा नाट्य-निर्देशन के लिए ‘कलाश्री’ सम्मान।
कुछ प्रमुख पुस्तकें: ‘दूसरा फुटपाथ, ‘इसी शहर में’, ‘आशंकित अँधेरा’, ‘अनवरत तथा अन्य कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘फिर भी कुछ’, ‘अंततः’, ‘अग्निपर्व’ (उपन्यास); ‘दीवारें’, ‘एक और राजा’, ‘शेष नहीं’, ‘चबूतरा तथा अन्य नाटक’ (नाटक); ‘कथा रंग’, ‘चंद चेहरे चंद बातें’ (साक्षात्कार); ‘शब्द से शब्द निकलते हैं’ (आलोचना); ‘मील का पहला पत्थर’, ‘काला नवंबर’, ‘कथा-धारा’, ‘श्रेष्ठ हिंदी लघु नाटक’, ‘बीसवीं सदी की सौ कहानियाँ’, ‘बीसवीं सदी की महिला कथाकारों की कहानियाँ’ आदि संपादित पुस्तकें।

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