Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-1

Balram

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Amarsatya Prakashan

  • ISBN No: 9788188466160

बीसवीं सदी की लघुकथाएं-1
इतिहास अगर अतीत की शव-साधना हो तो ऐसे इतिहास में जाने का हमारा कोई  इरादा नहीं, लेकिन लघुकथा के इतिहास में जाना लघुकथाओं के शवों के बीच से गुजरना भर नहीं है। बेशक एक समय बहुत शक्तिशाली मानी जाने वाली अनेक रचनाएं कालांतर में रचनाओं के शव भर रह जाती हैं और बड़े रचनाकारों की ऐसी शव-रूप रचनाओं को भी साहित्य के आचार्य बहुत समय तक विक्रमादित्य की मुद्रा में ढोते रहते हैं, लेकिन कुछ रचनाएं दीर्घजीवी होती हैं, कालजयी। सदियों पुरानी ऐसी दीर्घजीवी रचनाओं के बीच से गुजरने वाला इतिहास अतीत में समकालीनता की प्रतिष्ठा-पुनर्प्रतिष्ठा का श्रम-साध्य उपक्रम होता है और दुर्भाग्य से हिंदी लघुकथा में यह जरूरी काम अभी तक नहीं हो सका है। और शायद इसीलिए इतनी रचना-बुहलता के बावजूद लघुकथा को विधा का दर्जा अभी तक हासिल नहीं हो सका है। अभी हम विधा और उपविधा के द्वंद्व से ही नहीं निकल पाए हैं। हम लेकिन इस बहस में पड़े बगैर सिर्फ निवेदन यह करना चाहते हैं कि बीसवीं सदी की आंख खुलते हिंदी लघुकथा ने भी आंख-कान खोलकर मुलुर-मुलुर इस दुनिया-जहान को देखना, सुनना और समझना शुरू कर दिया था। बीसवीं सदी के शुरू होने से 20-25 साल पहले लिखी गई भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तिका ‘परिहासिनी’ की चुटकियों को चुटकुला कहकर उड़ा दें और सन् 1900 के आसपास लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ के काल-निर्णय पर मतैक्य न हो सके, ऋषि जैमिनी कौशिक ‘बरुआ’ को बोलकर लिखाई गई माखनलाल चतुर्वेदी की इस लघुकथा की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए तो भी 1901 में लिखी गई माधव सप्रे की लघुकथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से हम हिंदी लघुकथा का आरंभ बेहिचक स्वीकार कर सकते हैं। बीसवीं सदी के खत्म होते न होते हिंदी लघुकथा ने अपनी जड़ और जमीन पर मजबूत तर्कों के साथ जो दावे ठोंक दिए हैं, उन्हें खारिज कर सकना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। हिंदी लघुकथा का अब तक का सबसे बड़ा यह संचयन दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ऐसा गुलदस्ता है, जो हिंदी के प्रांगण में मह-मह महकेगा, देर तक और दूर तक, ऐसी उम्मीद हमें है।

Balram

बलराम
उत्तर प्रदेश में बिठूर के पास स्थित गांव भाऊपुर में 15 नवंबर, 1951 को जन्मे बलराम एम.ए. अधूरा छोड़कर हिंदी दैनिक 'आज' में फीचर संपादक हो गए, जहां से 'रविवार' और 'करंट' साप्ताहिक के लिए उत्तर प्रदेश की रिपोर्टिंग भी करते रहे । फिर टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पत्रिका 'सारिका' के संपादक मंडल से संबद्ध हुए। दिल्ली आकर यहीं से हिंदी में एम.ए. किया । बाद में 'नवभारत टाइम्स' के चीफ-सब एडीटर बने । 'भूमिका', 'शिखर' और 'शब्दयोग' के बाद समाचार पाक्षिक 'लोकायत' का संपादन । कृतियां : कलम हुए हाथ, गोआ में तुम, मृगजल, अनचाहे सफ़र तथा सामना (कथा संग्रह), जननी- जन्मभूमि और आवागमन (उपन्यास), माफ करना यार (आत्मकथा), औरत की पीठ पर (रिपोर्ताज), हिंदी कहानी का सफर, आंगन खड़ा फकीर, आधे-अधूरे परिचय (आलोचना), वैष्णवों से वार्ता (इंटरव्यूज) तथा धीमी-धीमी आंच (संस्मरण) आदि प्रकाशित । कारा (उपन्यास) शीघ्र प्रकाश्य । संपादन : दुनिया की प्रमुख भाषाओँ की कथाओं के अनुवाद और संचयन 'विश्व लघुकथा कोश', 'भारतीय लघुकथा कोश' और 'हिंदी लघुकथा कोश' प्रकाशित । दर्जनाधिक अन्य पुस्तकों का भी संपादन किया ।
सम्मान : केंद्रीय हिंदी संस्थान से सृजनात्मक लेखन और पत्रकारिता के लिए 'गणेशशंकर विद्यार्थी स्रम्मान' । हिंदी अकादमी से 'साहित्यकार सम्मान' । संस्मरण के लिए बिहार से 'नई धारा रचना सम्मान' । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से रिपोर्ताज के लिए' अज्ञेय पुरस्कार' । मध्य प्रदेश से प्रेमचंद पुरस्कार । दिल्ली और उत्तर प्रदेश शासन से कुछ साहित्यिक कृति पुरस्कार भी मिले ।

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