Navak Ke Teer

Sharad Joshi

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  • Year: 2017

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170163169

नावक के तीर
मैं धर्मयुग छोड़कर कलकत्ता गया । 'रविवार’ का प्रकाशन प्रारम्भ हो रहा था । वहीं पहुँचते ही मैंने पहला पत्र शरद जी को लिखा था : शरद जी, समय आ गया है । अब आप शुरू हो जाइये । आपकी यह मलाल नहीं रहना चाहिए कि आपको हिंदी वालों ने नियमित स्तंभ लिखने का मौका नहीं दिया । शाद जी ने सहमति का पत्र तो भेजा, पर साथ ही यह भी जड़ दिया कि प्यारे, अब मैं देनिक स्तंभ के बारे में सोच रहा हूँ । कोई साहसी संपादक मिल ही नहीं रहा है ।  बहरहाल, उनका स्तंभ चालू हुआ । हमारी संपादकीय टीम ने काफी बहस-मुबाहसे के बाद तय दिया कि स्तंभ का नाम 'नावक के तीर' होना चहिए । बिहारी से साभार । उनका पहला लेख था-अथ गणेशाय नम: और स्तंभ का नाम छपा था-नाविक के तीर । पहला अंक बाजार में आते ही शरद जी की घबराहट-भरी चिट्ठी आयी--"भैया, नाविक नहीं नावक । अपना अज्ञान मुझ पर क्यों थोप रहे हो ।" खैर । कॉलम चला और खूब चला । पाठक प्रमुदित थे और कई व्यंग्यकार निराश। 
मुझे गर्व की अनुभूति कभी-कभी होती रहती है कि हिन्दी व्यंग्य-लेखन की इस विजय-यात्रा में बतौर दर्शक ही, मेरी भी एक विनम्र भूमिका रही है ।
--सुरेन्द्र प्रताप सिंह

Sharad Joshi

शरद जोशी
शरद जोशी का जन्म 21 मई, 1931 को उज्जैन (म०प्र०) में हुआ ।
इन्होंने होल्कर कॉलेज, इंदौर से बी०ए० किया ।
शरद जी ने दैनिक 'मध्यदेश', भोपाल, मासिक 'नवलेखन', भोपाल तथा पाक्षिक 'हिंदी एक्सप्रेस', बंबई का संपादन किया तथा 15 वर्षों तक लगातार देश के सभी अखबारों-पत्रिकाओं में छपते रहे ।
अब तक शरद जी की 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिनसे मुख्य हैं-परिक्रमा', 'किसी बहाने', 'तिलिस्म', 'जीप पर सवार इल्लियह', 'रहा किनारे बैठ', 'मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, 'दूसरी सतह', 'हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे, 'यथा संभव', 'यत्र-तत्र-सर्वत्र, 'यथा समय' और दो चर्चित नाटक 'अंधों का हाथी' एवं 'एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ’ ।
इन्होंने सात सालों तक लगातार 'नवभारत टाइम्स' से 'प्रतिदिन' नाम का कॉलम लिखा, जिसने उस पेपर की बिकी लगभग दुगनी कर दी ।
'क्षितिज', 'छोटी-सी बात', 'साँच को आंच नहीं', 'गोधूलि', 'उत्सव', 'दिल है कि मानता नहीं', 'उडान' और 'चोरनी' फिल्मों के संवाद लिखने के साथ ही आपने 'ये जो है जिंदगी, 'बेताल पच्चीसी', 'सिंहासन बत्तीसी', 'वाह जनाब', 'देवी जी', 'प्याले से तूफान’, 'दाने अनार के', 'मालगुडी डेज़' (हिंदी डायलॉग्स-संवाद) तथा 'ये दुनिया है गजब की' नाम से टेलीविजन सीरियल भी लिखे ।
1990 से इनको राष्ट्रपति द्धारा 'पद्यश्री' की उपाधि से सम्मानित किया गया ।
इन्होंने कवि-सम्मेलनों के मंच पर लगातार 35 वर्षों तक रचना-पाठ किया और विश्व-भर में शोहरत पाई ।
इनके लोकप्रिय नाटक 'एक या गधा उर्फ जलादाद खाँ' का जापानी भाषा में अनुवाद व मंचन हुआ ।
5 सितंबर, 1991 को बंबई में महाप्रयाण ।

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