Vriksh Tha Hara-Bhara

Surendra Tiwari

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789381467978

सुश्री ममता किरण के कविता-संग्रह ‘वृक्ष था हरा-भरा’ की टंकित प्रति देख गया। उनकी कविताओं से यह मेरा पहला परिचय था। पहला प्रभाव यह पड़ा मेरे मन पर कि प्रचलित लोकप्रिय कविता और सुपरिचित समकालीन कविता के बीच से एक रास्ता निकालने की कोशिश इनके यहाँ दिखाई पड़ती है। यह कोशिश दिलचस्प है और इसलिए सहज पठनीय भी। यहाँ दो प्रकार की कविताएँ देखने को मिलीं। एक जो बाकायदे गीत की शैली में लिखी गई हैं और दूसरी वे जो मुक्त छंद को माध्यम बनाकर लिखी गई हैं।
इस संग्रह में जहाँ जाकर मैं रुका, वह ‘संबोधन’ शीर्षक कविता थी, जिसमें ये पंक्तियाँ आती हैं--
कंक्रीट के इस जंगल में
एकदम अप्रत्याशित
एक बुजुर्ग से अपने लिए
बहूरानी संबोधन सुनकर
जिस तरह मैं चौंकी
उसी तरह अनायास
श्रद्धा से झुक भी गई
बहूरानी कहने वाले के सामने
इन पंक्तियों में एक मानवीय संस्पर्श है जो अच्छा लगता है। कहीं-कहीं एक शुभाकांक्षा की प्रतिध्वनि भी सुनाई पड़ती है कुछ पंक्तियों में और शायद इस रचनकर्त्री की कविता का मूल स्वर भी यही है। अपने अस्तित्व से नदियों-पोखरों और झीलों को भर देने के आवेग के साथ-साथ ‘प्यार का पैगाम’ बन जाने और ‘बुझे चूल्हों की आँच’ बन जाने की स्त्रीसुलभ संवेदना भी यहाँ दिखाई पड़ सकती है। अपने इसी मूल स्वर के कारण यह संग्रह प्रेमी पाठकों तक पहुँचेगा, ऐसा मुझे लगता है।
---केदारनाथ सिंह

Surendra Tiwari

सुरेन्द्र तिवारी
कहानी, नाटक एवं उपन्यास विधाओं में करीब तीस वर्षों से लगातार लेखन। अनेक कहानियों के अनुवाद अंग्रेजी तथा कई भारतीय भाषाओं में हो चुके हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से रचनाएँ प्रसारित।
मौलिक लेखन के अतिरिक्त बाँग्ला से अनेक कहानियों एवं उपन्यासों के अनुवाद प्रकाशित। रंगमंच से विशेष लगाव। हिंदी एवं पंजाबी में कई नाटकों का निर्देशन किया।
हिंदी अकादमी, दिल्ली का ‘कृति पुरस्कार’ तथा ‘साहित्यकार सम्मान’, ‘सहस्राब्दी हिंदी सेवा सम्मान’, ‘सृजन सम्मान’ (रायपुर) तथा नाट्य-निर्देशन के लिए ‘कलाश्री’ सम्मान।
कुछ प्रमुख पुस्तकें: ‘दूसरा फुटपाथ, ‘इसी शहर में’, ‘आशंकित अँधेरा’, ‘अनवरत तथा अन्य कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘फिर भी कुछ’, ‘अंततः’, ‘अग्निपर्व’ (उपन्यास); ‘दीवारें’, ‘एक और राजा’, ‘शेष नहीं’, ‘चबूतरा तथा अन्य नाटक’ (नाटक); ‘कथा रंग’, ‘चंद चेहरे चंद बातें’ (साक्षात्कार); ‘शब्द से शब्द निकलते हैं’ (आलोचना); ‘मील का पहला पत्थर’, ‘काला नवंबर’, ‘कथा-धारा’, ‘श्रेष्ठ हिंदी लघु नाटक’, ‘बीसवीं सदी की सौ कहानियाँ’, ‘बीसवीं सदी की महिला कथाकारों की कहानियाँ’ आदि संपादित पुस्तकें।

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