Veerendra Mishra : Geet-Samagra-(4 Vols.)

Pradeep Pant

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789380146584

वीरेन्द्र मिश्र : गीत-समग्र (4 भागों में)
नई कविता के आगमन के साथ काव्य-जगत् का पूरा परिदृश्य बदल गया । कारण कि छंदमुक्त कविता ने गीत को सबसे अधिक प्रभावित किया । यद्यपि नई कविता के अनेक कवियों ने स्वयं भी गीतो की रचना की और छंदों का सहारा लिया, किंतु नई कविता के उदय के साथ ही गीत की उपेक्षा भी आरंभ हो गई । गीत के उपेक्षित होने के अपने कारण भी थे । जैसे कि गीत के नाम पर तुकबंदी हावी होती गई, गीत प्रायः रूमानियत तक सिमट गया, उसने अपने को मंच या कवि-सम्मेलनों तक सीमित कर लिया । कालांतर में नई कविता के बाद जो कविता सामने आई, उसके चलते गीत और भी उपेक्षित हुआ, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नई कविता के बाद की छंदमुक्त कविता प्राय: नई कविता की रूढि बनकर रह गई और आज तो ऐसी अधिकांश कविताएँ कवियों के सपाट वक्तव्य सरीखी प्रतीत होती हैं । बहरहाल कविता के रूप-स्वरूप के परिवर्तन के दौर में कुछेक कवि समस्त ऊर्जा और सर्जनात्मकता के साथ गीतों की रचना करते रहे । वीरेन्द्र मिश्र ऐसे ही कवियों में है, बल्कि वे गीतों के प्रमुख और अत्यंत स्मरणीय रचनाकार हैं। इसका मुख्य कारण है उनकी गहरी सामाजिक संलग्नता और प्रगतिशील सोच, जिस वजह से वे किशोर वय से युवावस्था की ओर बढ़ने के दौर में बंगाल के भीषण अकाल पर सशक्त छांदिक रचना प्रस्तुत कर सके । उन्होंने जहाँ एक ओर मछुआरों, कामगारों, मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दु:खों और हर्ष-विषाद पर सार्थक गीत लिखे, वहीं एशिया के नव-स्ततंत्र राष्ट्रों पर मंडराते युद्ध के खतरे, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और विश्व-शांति के प्रश्नों को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया । साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में प्रदूषण आदि भी उनकी चिंत्ता के केंद्र में थे । बडे पैमाने पर उन्होंने गीतों के माध्यम से विसंगतियों पर व्यंग्य किए, जबकि गीत से व्यंग्य का इस्तेमाल अधिकांश कवियों के यहाँ बहिष्कृत-सा  ही रहा है । अदभुत शब्द-संयोजन, असंख्य छांदिक प्रयोग, संगीतात्मकता आदि ऐसे उपकरण है, जिन्होंने उनके गीतों को उजास ही । वीरेन्द्र मिश्र की गीत-यात्रा सही अर्थों से अप्रतिम हैं ।

Pradeep Pant

प्रदीप पंत
अप्रैल, 1941 में हच्द्वानी, जिला नैनीताल में जन्मे प्रदीप पंत की शिक्षा-दीक्षा लखनऊ से हुई ।
प्रदीप पंत का व्यंग्य उपन्यास 'महामहिम' अत्यंत चर्चित रहा है, जिसका मराठी से अनुवाद हुआ और कुछ अन्य भाषाओं ने हो रहा है ० नवीनतम उपन्यास है 'इन्फोकॉर्प का करिश्मा' ० उनके तीन अन्य उपन्यास भी प्रकाशित हुए है ० प्रदीप पंत के व्यंग्य-संग्रह हैँ-'मैं गुटनिरपेक्ष हूँ, 'प्राइवेट सैक्टर का व्यंग्यकारा', 'सच के बहाने', 'मीडियाकर होने के मजे', 'आँगन  से कागा बोला तथा अन्य व्यंग्य' और '101 प्रतिनिधि व्यंग्य रचनाएँ' ० कहानी-संग्रह हैं-'चर्चित कहानियां', 'कूत्ते की मौत', 'आम आदमी का शव', 'एक से दूसरी', 'राजपथ का मेनहोल तथा अन्य कहानियाँ ० कन्नड़ से अनुदित कहानियों का संकलन 'न्यायामट्टू इतहार कथेगलु' शीर्षक से प्रकाशित ० देश-विदेश के उनके यात्रा-संस्मरणों की पुस्तके हैँ-'सफर- हमसफर', 'कुछ और सफर', 'लौटने से पहले, 'महादेश की दुनिया' ० लेखों और भेंटवार्ताओं की उनकी दो पुस्तकें-'स्त्री और समाज', 'प्रश्न और प्रसंग' प्रकाशित हुई है ।
यशपाल जन्मशती वर्ष में वे हिंदी अकादमी, दिल्ली की पत्रिका 'इन्द्रप्रस्थ भारती' के वृहद्  'यशपाल विशेषांक का संपादन कर चुके है ० प्रतीप पंत ने वीरेन्द्र मिश्र के काव्य-पक्ष पर समय-समय पर अनेक लेख लिखे हैं, उन पर आयोजित संगोष्ठियों से सक्रियता से भाग लिया है और उनके साथ प्रदीप पंत के घनिष्ट संबंध रहे है ।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, अनेक साहित्यिक संस्थाओं तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली ने प्रदीप पंत को साहित्य, भाषा तथा संस्कूति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित किया है ।

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