Tumhare Pyar Ki Paati

Shanta Kumar

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  • Year: 2007

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9788188121809

तुम्हारे प्यार की पाती
कविता लिखने की सोचकर मैंने कभी भी कविता नहीं लिखी। शायद सोचकर कविता लिखी भी नहीं जाती। कविता तो भावनाओं की धारा बनकर स्वयं ही प्रवाहित होती है। स्वयं ही लिखी जाती है।
मैं 1953 में कश्मीर आंदोलन में सत्याग्रह करके हिसार की जेल में गया। हिसार की तपती गर्मी व जेल की यातनाओं से बाल-मन में कुछ भावनाएँ कविता बनकर उतरती रहीं। उसके बाद लंबे 22 वर्ष बीत गए। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तता और संघर्ष में मुझसे मेरे कवि का कोई संपर्क न हुआ। फिर 1975 में आपातकाल के समय नाहन जेल में मुझे मेरा कवि मिला। कुछ कविताएँ लिखी गईं।
श्री जयप्रकाश नारायण मुंबई में अपने जीवन के अंतिम पहर में थे। कुछ दिन बाद उनका स्वर्गवास हो गया। उनके अंतिम संस्कार में पटना गया। पटना से दिल्ली लौटा। एक कविता ‘फूल लेकर आए थे’ लिखी गई। ‘धर्मयुग’ के संपादक श्री धर्मवीर भारती जी ने मुझे फोन करके उस कविता पर बधाई भेजी थी।
मैं दो बार हिमाचल प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा और एक बार केंद्र में मंत्री रहा। विकास की सारी प्रक्रिया में ‘अंत्योदय’ का मंत्र मेरी प्रेरणा रहा। उसी संबंध में मेरी कविता ‘अंत्योदय’ को भी श्री धर्मवीर भारती और अन्य मित्रों ने बहुत सराहा था।
इन कविताओं के माध्यम से जो कुछ मन में उमड़ा वही इन शब्दों में उतर आया और अब पाठकों को समर्पित है।
—शान्ता कुमार

Shanta Kumar

शान्ता कुमार
प्रबुद्ध लेखक, विचारक, राजनेता व पूर्व मुख्यमंत्री तथा निवर्तमान केंद्रीय खाद्य मंत्री शान्ता कुमार का जन्म हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गांव गढ़जमूला में 12 सितंबर, 1934 को हुआ था। उनका जीवन आरंभ से ही काफी संघर्षपूर्ण रहा। गांव में परिवार की आर्थिक कठिनाइयां उच्च शिक्षा पाने में बाधक बनीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आकर मात्र 17 वर्ष की आयु में प्रचारक बन गए। तत्पश्चात् प्रभाकर व अध्यापक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
दिल्ली में अध्यापन-कार्य के साथ-साथ बी.ए., एल-एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् दो वर्ष तक पंजाब में संघ के  प्रचारक रहे। फिर पालमपुर में वकालत की। 1964 में अमृतसर में जन्मी संतोष कुमारी शैलजा से विवाह हुआ, जो महिला साहित्यकारों में प्रमुख हैं। 1953 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में ‘जम्मू-कश्मीर बचाओ’ आंदोलन में कूद पड़े। इसमें उन्हें आठ मास हिसार जेल में रहना पड़ा।
शान्ता कुमार ने राजनीति के क्षेत्र में शुरुआत अपने गांव में पंच के रूप में की। उसके बाद पंचायत समिति के सदस्य, जिला परिषद् कांगड़ा के उपाध्यक्ष एवं अध्यक्ष, फिर विधायक, दो बार मुख्यमंत्री, फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री तक पहुंचे।
शान्ता कुमार में देश-प्रदेश के अन्य राजनेताओं से हटकर कुछ विशेष बात है। आज भी प्रदेशवासी उन्हें ‘अंत्योदय पुरुष’ और ‘पानी वाले मुख्यमंत्री’ के रूप में जानते हैं।
प्रकाशित पुस्तकें: मृगतृष्णा, मन के मीत, कैदी, लाजो, वृंदा (उपन्यास); ज्योतिर्मयी (कहानी-संग्रह); मैं विवश बंदी (कविता-संग्रह); हिमाचल पर लाल छाया (भारत-चीन युद्ध), धरती है बलिदान की (क्रांतिकारी इतिहास); दीवार के उस पार (जेल-संस्मरण); राजनीति की शतरंज (राजनीति के अनुभव); बदलता युग--बदलते चिंतन (वैचारिक साहित्य), विश्व-विजेता विवेकानंद (जीवनी); क्रांति अभी अधूरी है (निबंध); शान्ता कुमार: समग्र साहित्य (तीन खंड) तथा कर्तव्य (अनुवाद)

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