Shabdon Mein Rahti Hai Vah

Pushpita Awasthi

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789383233298

वेद ने प्रकृति को देवता का काव्य कहा है--पश्य देवस्य काव्यम्। इस काव्य के प्रति सबसे ज्यादा लगाव कवियों में होता है। पुष्पिता के इस काव्य-परिसर में अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति है जिसमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमो झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर तथा जाने क्या-क्या एक साथ उपस्थित है। विविध् देशों के प्राकृतिक परिवेश और कलात्मक उत्कर्ष के साथ कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व भी हैं जैसे कवि वालकट या अलेक्सजेंडर महेंद्र आदि। पुष्पिता के मन में भारत की याद भी साथ-साथ चलती है जैसे नाउदर की गायों को देखकर मथुरा, वृंदावन, गोप, गोपी और श्रीकृष्ण की याद या लांगडाईक की नहरों को देखकर बनारस की गलियों की या भारतीय पर्वों, त्योहारों और तिथियों की याद। उसकी व्यापक संवेदनशीलता उसे अनंतरूपात्मक जगत से जोड़े हुए है। इसीलिए वह विश्वव्यापी हिंसा के विरुद्ध  है।
स्त्रिायां और बच्चे पुष्पिता के खास सरोकार हैं। कवयित्री होने के नाते स्वाभाविक भी है कि वह सैनिकों की गर्भस्थ स्त्रियों की व्यथा तथा अजन्मे शिशुओं के प्रति मां के विछोह और वात्सल्य के मर्म को अधिक तीव्रता से महसूस कर सके। एक ओर स्त्री को नाखून की तरह कुतरते और जोंक की तरह चूसते पुरुष का क्रूर बिंब उसके मन में है तो दूसरी ओर देह ढलने के बाद स्वयं ही अपना ताबूत बनती स्त्री का मार्मिक चित्रा भी। लेकिन इसके साथ ही उसकी प्रेम संबंधी कविताओं में देह का सुगंधित स्वाद और उसका बखान भी है। समय की अपराजेयता में विश्वास करते हुए भी पुष्पिता शब्द की अमरता में भरोसा रखती हैं, जो कभी मरते नहीं, जो मनुष्य की अस्मिता को बचाए रखते हैं। कहना न होगा कि यही कवि में कविता को भी जिंदा रखते हैं। मुझे विश्वास है, काव्यप्रेमी इस संग्रह की कविताओं का स्वागत करेंगे।

Pushpita Awasthi

हिंदी की सुपरिचित लेखिका पुष्पिता अवस्थी का जन्म गुरगांव, कानपुर में हुआ। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पीएच.डी. उपाधिहासिल करने वाली पुष्पिता कृष्णमूर्ति फाउंडेशन के बसंत कालेज फार वीमेन (का.हि.वि.से संबद्ध) में हिंदी की विभागाध्यक्ष रही हैं। 2001 में वे सूरीनाम राजदूतावास में प्रथम सचिव व प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहीं। 2003 में सूरीनाम में हुए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इस अवसर पर उन्होंने सूरीनाम के सर्जनात्मक योगदान को रेखांकित करते हुए कथा सूरीनाम, कविता सूरीनाम के संपादन के अलावा सूरीनाम पर विनिबंध एवं भारतवंशी कवि लक्ष्मणदत्त श्रीनिवासी व जीत नराइन की कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया।
प्रकृति से ही कवयित्री पुष्पिता अवस्थी की रुचि लेखन और यायावरी में रही है! ‘शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएं’ और ‘अक्षत’ से उन्होंने कविता के क्षेत्र में मजबूती से कदम रखा। ‘गोखरू’ कहानी संग्रह से वे कथाकार के रूप में भी जानी-पहचानी गईं। बाद में सूरीनाम व अब नीदरलैंड में रहते हुए उनके हिंदी, अंग्रेजी, डच व अन्य भाषाओं में दशाधिक कविता-संग्रह छप चुके हैं। ‘जन्म’ कहानी-संग्रह की कहानियों की जमीन कहने भर को विदेशी है पर उसकी संवेदना में एक मुकम्मल भारतीय मन रचा-बसा है। ‘आधुनिक काव्यालोचना के सौ वर्ष’ उनका मानक कोटि का शोधकार्य है। ‘कैरेबियाई देशों में हिंदी शिक्षण’ के अलावा ‘दि नागरी स्क्रिप्ट फार बिगनर्स’ से विदेश में हिंदी के प्रसार को लेकर उनकी सतत सक्रियता का पता चलता है।
पुष्पिता विश्व के अनेक देशों के कला, साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थानों की मानद सदस्य हैं। वे विश्व भर के भारतवंशियों व अमर इंडियन जनजातियों पर अपने अध्ययन व विशेषज्ञता के लिए जानी जाती हैं। संप्रति नीदरलैंड में हिंदी युनिवर्स हिंदी फाउंडेशन की निदेशक एवं शमशेर सम्मान सहित देश-विदेश के अनेक सम्मानों से विभूषित पुष्पिता भारत ही नहीं, विश्व के साहित्यिक फलक पर हिंदी कविता-आलोचना व निबंध की सुरभि बिखेर रही हैं।

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