Sampurna Baal Kavitayen : Sherjung Garg

Sher Jung Garg

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  • Year: 2018

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789383233830

हिंदी में सबसे चटख, चुटीली और नटखटपन से भरपूर बाल कविताएँ लिखने वाले डॉ. शेरजंग गर्ग उन उस्ताद बाल कवियों में से हैं, जो उचित ही आज बाल कविता के पर्याय बन चुके हैं। समूची हिंदी बाल कविता के ग्राफ को बदलकर उसके मिजाज में बड़ी तबदीली लाने वाले बाल कवियों की छोटी से छोटी सूची बनाएँ, तो भी उसमें डॉ. शेरजंग गर्ग का नाम जरूर होगा। वे हिंदी बाल कविता में पहली बार वह नटखटपन, चुस्ती और शरारती अंदाज लेकर आए, जिसने हजारों बाल पाठकों को रिझा लिया। उनके ‘गाय’, ‘दादी अम्माँ’, ‘गुड़िया’, ‘ईंट’, ‘चिड़िया’, ‘पवनचक्की’, ‘चूहा-बिल्ली’, ‘उल्लू मियाँ’ और ‘टीचर गुड़िया’ सरीखे खिलंदड़े और चुस्त-दुरुस्त शिशुगीत इस कदर चर्चित हुए कि बच्चों के साथ-साथ बड़े भी उनकी नटखटपन से भरी कोमल भावनाओं के साथ बहे और उनके जरिए फिर से अपने बचपन को जिया। खासकर गाय पर भी ऐसा नटखटपन से भरपूर शिशुगीत लिखा जा सकता है, यह डॉ. शेरजंग गर्ग को पढ़ने के बाद ही समझ में आ सकता है। 
हिंदी में डॉ. गर्ग के अलबेले शिशुगीतों ने ही पहले-पहल यह करिश्मा किया कि वे बदलते समय और बच्चे के मन, सपने और इच्छाओं से जुड़े और वे हर बच्चे के होंठों पर थिरकते नजर आए। और यही बात उनकी गूँजदार लय वाली अपेक्षाकृत लंबी बाल कविताओं के बारे में कही जा सकती है। ‘खिड़की’, ‘नए साल का गीत’, ‘शरारत का मौसम’, ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’ तथा ‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ डॉ. गर्ग की बिलकुल नए शिल्प में ढली अद्भुत कविताएँ हैं, जिनका कोई जोड़ नहीं है। उनके यहाँ बात कहने का जो उस्तादाना अंदाज और सफाई है, वह देखते ही बनती है। 
सच तो यह है कि हिंदी में भी विश्वस्तरीय बाल साहित्य मौजूद है, यह डॉ. गर्ग की कविताओं से गुजरते हुए ही पहले-पहल समझ में आता है, और यह भी कि हिंदी में मानक शिशुगीत और बाल कविताएँ कौन सी हैं, जिन्हें सामने रखकर बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। 
डॉ. शेरजंग गर्ग की बेहद तराशी हुई बाल कविताओं की जादुई लय ही नहीं, उनकी कविताओं में हास्य और व्यंग्य की मीठी गुदगुदी भी बाल पाठकों को रिझाती है और वे एक बार पढ़ने के बाद, कभी उन्हें भूल नहीं पाते। उनके गीतों में जैसी पूर्णता है, वैसी कम-बहुत कम नजर आती है। इस लिहाज से वे अपनी नजीर खुद हैं और उन थोड़े से बाल कवियों में से हैं जिनका कविता पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते हैं कि यह कविता इन्हीं की है।
डॉ. गर्ग की कविताओं का यह जादुई असर ही है कि एक पूरी पीढ़ी उन्हें गाते-गुनगुनाते हुए बड़ी हुई, तो उनके बच्चे---यानी अगली पीढ़ी भी उनकी जादुई कविताओं की उसी तरह मुरीद है। देश के किसी भी हिस्से में हम जाएँ, डॉ. शेरजंग गर्ग की कविताएँ सबसे ज्यादा बच्चों के होंठों पर नाचती नजर आती हैं। बच्चों के वे सर्वाधिक चहेते और दोस्त कवि हैं।
डॉ. शेरजंग गर्ग सिर्फ एक बालकवि नहीं, वे बाल कविता का इतिहास रचने वाले दिग्गजों में से हैं। लिहाजा उनकी समूची बाल कविताएँ एक जिल्द में सामने आएँ, यह बरसों से बच्चों की ही नहीं, बाल साहित्य के गंभीर अध्येताओं और शोधार्थियों की भी इच्छा थी। इस पुस्तक के जरिए यह सपना पूरा हो रहा है, यह बाल साहित्य के लिए एक यादगार और ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। आशा है, बच्चे और बाल साहित्यकार ही नहीं, हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक और सहृदय पाठक भी बाल कविता की शिखर उपलब्धियों और कलात्मक लाघव से पूर्ण इस संचयन को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और खूब सराहेंगे।

Sher Jung Garg

शेरजंग गर्ग
जन्म: 29 मई, 1937, देहरादून (उत्तराखंड)
शिक्षा: एम० ए०, पी-एच० डी० । पिछले लगभग पैंतालीस वर्षों से पत्रकारिता, साहित्यिक लेखन, प्रसारण, प्रबंधन एवं प्रशासन के विविध क्षेत्रों में कार्य । 
प्रकाशित कृतियाँ: ‘चंद ताज़ा गुलाब तेरे नाम’, ‘क्या हो गया कबीरों को’ (कविताएँ), ‘स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कविता में व्यंग्य’, ‘व्यंग्य के मूलभूत प्रश्न’ (आलोचना), ‘बाज़ार से गुज़रा हूँ’, ‘दौरा अंतर्यामी का’ (व्यंग्य), ‘सुमन बाल गीत’, ‘अक्षर गीत’, ‘नटखट गीत’, ‘गुलाबों की बस्ती’, ‘शरारत का मौसम’, ‘पक्षी उड़ते फुर-फुर’, ‘पशु चलते हैं धरती पर’, ‘गीतों के इंद्रधनुष’, ‘गीतों के रसगुल्ले’, ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’, ‘गीतों की आँखमिचैली’, ‘नटखट पप्पू का संसार’ (श्री ब्रह्मदेव के साथ), ‘भालू की हड़ताल’, ‘सिंग बर्ड सिंग’ (बाल-साहित्य), ‘चहक भी ज़रूरी: महक भी ज़रूरी’ (सुश्री प्रभाकिरण जैन के साथ), ‘ग़ज़लें ही ग़ज़लें’, ‘नया ज़माना नई ग़ज़लें’, ‘मुक्तक एवं रुबाइयाँ’, ‘ग़ज़लें रंगारंग’, ‘कवियों की शायरी’, ‘बीरबल ही बीरबल’ (संपादित), ‘हिंदी कार्यकुशलता’, गोपाल कृष्ण कौल द्वारा संपादित ‘ग़ज़ल सप्तक’ में एक कवि। लोकप्रिय गीतकारों, यथा दुष्यंत कुमार, गोपालदास नीरज, वीरेंद्र मिश्र, गिरिजा कुमार माथुर आदि के संकलनों एवं ‘हिंदी ग़ज़ल शतक’ शृंखला का संपादन।
 हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान एवं श्रेष्ठ बाल-साहित्य के लिए दो बार पुरस्क्रित। प्रथम 'गोपालप्रसाद व्यास व्यंग्यश्री पुरस्कार' से सम्मानित । 
'काका हाथरसी हास्य रत्न सम्मान' से अलनक्रित। 
पूर्व निदेशक, हिंदी भवन, नई दिल्ली ।

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