Divangat Vriksh Ka Geet

Jagmohan Singh Rajput

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
125.00 113 + Free Shipping


  • Year: 2009

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Surabhi Prakashan

  • ISBN No: 9788190554732

दिवंगत वृक्ष का गीत
जीवन के कई धु्रवांतों पर अपनी बौद्धिक उपस्थिति और प्रशासनिक दक्षता रेखांकित कर चुकने के बाद अकस्मात् एक अजनबी की तरह कविता के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति जताना, प्रत्येक उस भावाकुल मन की लाचारी होगी जो मानता हो कि जीवन न तो बुद्धि-व्यवसाय है, न ही कोरा भाव-विलास ही। कविता की कला को भी काव्य-विवेक की जरूरत पड़ती है जैसे कि भावावेगों के विस्फोट को जीवन-विवेक की। इन कविताओं में यह ‘विवेक’ साफ-साफ अनुभव किया जा सकता है।
यथार्थ, शास्त्रीय यथार्थ, पंजीकृत और सूचीबद्ध यथार्थ के पार के यथार्थ का सीधा-सच्चा बयान करती ये कविताएँ उस संवेदनशील चित्त की देन हैं जो प्रत्येक पल सचेत और भाव- प्रखर रहा है। कविता अंततः भाव-प्रखरता ही तो है। व्यक्ति, समाज, समय और राजनीति का प्रति-अक्स रचती ये रचनाएँ उस कवि की कृतियाँ हैं, जो मूलतः सर्जक होकर भी अपने इस दावे की घोषणा नहीं ही करता रहा है। हिंदी कविता के पाठक ही तय करेंगे कि दावे का यह हक उसका बनता है या नहीं।
मेरे भरोसे की ये कविताएँ उन जीवन-सत्यों और अनुभवों से लदी-फँदी हैं, जिन्हें तमाम जाने-पहचाने समकालीन कवियों ने औसत और मामूली समझकर दरकिनार कर दिया था। या फिर उनके देखने लायक अनुभव नहीं थे ये। जगमोहन सिंह राजपूत ने ज्यादातर मनमौज में आकर कहते-कहते कुछ ऐसा कह डाला है, जिसे कविता के सिवाय और कुछ भी कहना मुश्किल है। कहने में अपनी बेइंतहा सादगी, कथ्यों में असंदिग्ध भरोसेमंदी और रूपाकार में जानी-पहचानी नैसर्गिकता के चलते ये कविताएँ न तो वाम हैं, न दक्षिण। फिर भी, अगर कहना ही पड़े तो यही कि लोकपरकता ही इनका असली चरित्र है। भाषा, उसके मुहावरे और अभिव्यक्ति में भी ये उसी लोक की हैं जो किसी को भी अपने स्पर्श से कवि बना डालता है।

Jagmohan Singh Rajput

जगमोहन सिंह राजपूत
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में सन् 1943 में जन्मे 
प्रो०  जगमोहन सिंह राजपूत ने प्रयाग विश्वविद्यालय से भौतिकी में शोध-उपाधि अर्जित कर सन् 2002 में शिक्षा 
में डी० लिट्०  की मानद उपाधि प्राप्त की। उनके भौतिकी के शोधपत्रों ने उन्हें सन् 1974 में प्रोफेसर-पद पर नियुक्ति दिलाई। भारत सरकार में संयुक्त शिक्षा सलाहकार (1989-94), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्, एन० सी०  टी० ई०  के अध्यक्ष (1994-99) व एन० सी० ई० आर० टी०  के निदेशक (1999-2004) पदों पर रहे प्रो०  राजपूत अपने कार्यों के लिए सराहे गए तथा आलोचनाओं से कभी दूर नहीं रहे। बी० एड०  पत्राचार के पाठ्यक्रमों को नियंत्रित करने तथा दो वर्षीय बी० एड०  पाठ्यक्रमों को प्रारंभ कर उन्होंने अध्यापक शिक्षा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम परिवर्तन के लिए जो दृढ़ता तथा आत्मविश्वास उन्होंने पाँच वर्षों में अपने विरोधियों को निरुत्तर करने में दिखाया उसकी सराहना विरोधियों ने भी की। अनुशासन, समयपालन तथा कार्य में गुणवत्ता लाने के सजग पक्षधर प्रो०  राजपूत ने अनेक विषयों पर शोध कराए और पुस्तकें लिखी हैं। इनमें कविताओं की पुस्तक भी शामिल है। इधर के वर्षों में उन्होंने हिंदी तथा अंग्रेजी में सैकड़ों लेख लिखने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोधपत्र लिखे तथा अतिथि संपादक रहे। श्रेष्ठ शोध तथा नवाचार के लिए यूनेस्को ने उन्हें सन् 2004 में जॉन एमोस कोमेनियस पदक के लिए चुना। वे मूल्यों की शिक्षा, सामाजिक सद्भाव तथा शिक्षा में सभी धर्मों के मूलभूत तत्त्वों की जानकारी के पक्षधर हैं।

Scroll