Apajas Apne Naam

Ram Kumar Krishak

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9789380048390

कवि केदारनाथ अग्रवाल ने एक बार मुझसे कहा था—'जब लोग पैसे कमा रहे थे, तब मैं बदनामी कमा रहा था। ' ठीक यहीं भावार्थ देता है कृषक का यह नया ग़ज़ल-संग्रह—'अपजस अपने नाम' । केदार जी की 'बदनामी' और कृषक जी का 'अपजस' क्या है? रचना की खेती करनेवालों और रचना-कर्म में जीवन होमनेवालों को 'दुनियादार लोग' बेकार ही तो समझते है । कबीर और उनके समकालीनों के प्रति भी धन्नासेठों और श्रीमती का यही रवैया था।
कृषक जी का साहित्य और उनका जीवन एक-दूजे से अलग नहीं है, इसीलिए उनकी ग़ज़लें विश्वसनीय हैं । उनमें वर्णित सच किसी भी तरह की पॉलिमिक्स नहीं है । तरह-तरह के अभावों में जीते, धारा के विरुद्ध संघर्ष करते उन्होंने एक लंबी और बहुस्तरीय रचना-यात्रा की है, जिसमें हमेशा ही उनके कथ्य ने नई और माकूल भाषा बरती है ।
वर्तमान सामाजिक जीवन में व्यवस्थाजन्य अनेक जहरीली गुत्थियाँ हैं,  जिन्हें खोलते-खोलते रचनाकार बार-बार हँसा जाता है, लेकिन मरता नहीं और आत्यंतिक सच सामने रख देता है । सच कहने के एवज में हर युग, हर समय में कवियों-कलाकारों-विचारकों-जननायकों को अपार कष्ट झेलना पडा, लेकिन वे न झुके, न टूटे । यही कारण है कि कृषक जी की ग़ज़लें हमारे समय के रोज पैदा होनेवाले यक्ष प्रश्नों से गुत्थमगुत्था हैं। वे कहीं संकेतों में अपनी बात कहते है, कहीं सीधे-सीधे ।
दरअसल कृषक उन कवियों में नहीं है, जो रचना और आलोचना के बने-बनाए खाँचों और ठप्पो में फिट बैठते हों। जन-प्रतिबद्ध कोई कवि ऐसा हो भी नहीं सकता। वे एक सजग और निडर सामाजिक कवि है । कवियों की उस जमात से कत्तई अलग, जहाँ सब कुछ ज़गमग-ज़गमग होता है। इसीलिए उनके यहीं अनुपयोगी सजावट, पच्चीकारी या कला-कोविदी नहीं है। इसीलिए वे 'अदबी नसीहतों' पर कुर्बान नहीं होते, बल्कि न्याय और इंसानियत के लिए लड़ रही जनता पर कुर्बान होते हैं ।
उम्मीद है, 'नीम की पतियां' के बाद कृषक जी का यह ग़ज़ल-संग्रह पाठकों को ज़रूर कुछ नया देगा ।
-कुबेरदत्त

Ram Kumar Krishak


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