Aavahayami

Ramesh Chandra Shah

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  • Year: 2016

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789383233748

'आवाहयामि' पुस्तक में श्री जे. एल. मेहता पर लिखे गए संस्मरण में एक उद्धरण है-'कल्पना क्योंकि मूलत: भाषिक होती है इसलिए हाइडेगर का कहना है कि स्वयं भाषा ही बीजरूप में कविता है, पूर्वप्रक्षिप्त अर्थों का ऐसा आकार, जो हमारे वस्तुजगत को प्रकाशित और निर्मित करता है। इसी आधारभूमि पर चिंतक और कवि चिंतन और सृजन के नए रास्ते बनाते हैं।' यानी बड़ी से बड़ी प्रतिमा के भीतर से उपजे विचार या कविता का विस्फोट भी मात्र उसकी प्रतिभा की करामात नहीं होते बल्कि उसके पूर्वजों व तमाम पूर्ववर्ती कवि-चिंतकों द्वारा रची और बार-बार आविष्कृत की गई भाषा की देन भी होते हैं। इसीलिए नई पीढी के लिए यह जरूरी है कि वह न सिर्फ अपनी भाषा को बनाने वाली कविता व चिंतन के पास बार-बार जाए बल्कि उस समय के सरोकारों को भी भली-भांति जाने-बूझे क्योकिं तभी वह अपनी पीढ़ी व अपने समय के तनावों को भी ठीक-ठीक समझ पाएगी ।
संस्मरणों की यह पुस्तक दरअसल ऐसा ही एक आवाहन है-एक आधुनिक, भारतीय कवि का अपने भाषिक परिवेश के पूर्ववर्ती और समवर्ती कवियों-चिंतकों से सतत संवाद करने, उन्हें और उनके माध्यम से खुद को बेहतर समझने की अदम्य इच्छा का दस्तावेज । वहीं दूसरी और यह संस्मरण एक प्रखर आलोचक को पैनी दृष्टि से देखे गए जीवन-प्रसंगों और हिंदी साहित्य में स्था-समय पर प्रकट हुई गहन चिंताओं, अनुरागों और ऊहापोहों का लेखा-जोखा भी है। इसीलिए यह पुस्तक संस्मरण के सामान्य अर्थों में उन व्यक्तित्वों, जिन पर ये लिखे गए हैं, उनके जीवन के रोचक या प्रेरणादायी घटनाओं का संपुंजन मात्र न होकर हिंदी साहित्य के एक पूरे युगबोध का सिंहावलोकन है ।
संस्मरण-विधा की साहित्य में अहमियत 'रिक्त स्थानों की पूर्ति' करने वाली हो सकती है जो न केवल उन कवि-चिंतकों बल्कि उस घूरे समय की सर्जना एवं विचार-प्रवाहों को समझने में मदद करें, ऐसा इस पुस्तक के पाठकों को अनुभव होगा।
ये संस्मरण जिनके बारे में लिखे गए हैं, उनके व्यक्तित्व को उजागर करने के साथ-साथ लिखने वाले की जिज्ञासाओं, अभिरुचियों, खुलेपन और संवाद करने की ललक को भी अनायास ही उजागर करते चलते हैं।
हिंदी का जैसा लबालब, हिलोरें लेता, चौडा पाट इस पुस्तक में उजागर होता है-उसमें जैसी और जितनी सार्थक बहसें लेखक अपने समय और आपस में एक- दूसरे के लेखन-चिंतन और स्वयं अपने अंतर्द्वंद्वों से कर रहे थे यह देखना आज की पीढ़ी के लिए चकित करने वाला अनुभव हो सकता है। युवा पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने तो हिन्दी के  इस चौडे और जीवंत पाट को जाना ही नहीं है, और एक दुबली, सतही धार जो अब सूखी, तब सूखी- भला किसी को कितना-क्या और कब तक है सकती है ?

Ramesh Chandra Shah

रमेशचन्द्र शाह
जन्म: वैशाखी त्रयोदशी, 1937, अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
शिक्षा: बी.एस-सी., एम.ए., पी-एच.डी.। 1997 में भोपाल के शासकीय हमीदिया कॉलेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त। तत्पश्चात् सन् 2000 तक भोपाल में निराला सृजनपीठ के निदेशक रहे। फिलहाल केंद्रीय हैदराबाद विश्वविद्यालय में एस. राधाकृष्णन् चेयर प्रोफेसर।
प्रकाशित कृतियाँ: नदी भागती आई, हरिश्चन्द्र आओ, प्यारे मुचकुंद को, देखते हैं शब्द भी अपना समय, अनागरिक तथा समग्र काव्य-संकलन (2009), कछुए की पीठ पर (पहचान सीरीज-3, 1974) इनका पहला संग्रह था। हिंदी साहित्य सम्मेलन की ‘आधुनिक कवि-माला’ के 24वें पुष्प के रूप में संकलन प्रकाशित (2008) (कविता-संग्रह) ०  गोबरगणेश, किस्सा गुलाम, पूर्वापर, पुनर्वास, आखिरी दिन, आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू (उपन्यास) ०  जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, थियेटर, मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ, मेरी प्रिय कहानियाँ तथा गेटकीपर (कहानी-संग्रह) ०  सबद निरंतर, स्वधर्म और कालगति, नेपथ्य से, देहरी की बात (2009) तथा अगुन  सगुन बिच (2010) (वैचारिक निबंध-संग्रह) ०  रचना के बदले, आड़ू का पेड़, पढ़ते-पढ़ते, शैतान के बहाने (ललित निबंध-संग्रह) ०  छायावाद की प्रासंगिकता, समानांतर, वागर्थ, आलोचना का पक्ष, समय-संवादी, वागर्थ का वैभव, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय (साहित्य अकादेमी मोनोग्राफ़) (साहित्यालोचन) ०  मारा जाई खुसरो, मटियाबुर्ज (राशोमन का अनुवाद) (नाटक) ०  अज्ञेय काव्य स्तबक, प्रसाद रचना-संचयन (साहित्य अकादेमी, दिल्ली) जड़ की बात (जैनेन्द्र के निबंध) (संपादन) ०  Ancestral Voices, Yeats & Eliot : Perspectives On India : Jaishankar Prasad: Thus Spoke Bhartrihari (भर्तृहरि का अंग्रेजी में पद्यानुवाद) (अंग्रेजी) ०  एक लंबी छाँह (यात्रावृत्त) ०  अकेला मेला (2009), इस खिड़की से (2010) (डायरी)।
सम्मान: म.प्र. शासन का शिखर सम्मान (1987-88), के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान (2001), पद्मश्री अलंकरण (2004), म.प्र. साहित्य परिषद का भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार तथा भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार ‘पूर्वापर’ उपन्यास के लिए, केंद्रीय भाषा संस्थान, आगरा का महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार यात्रावृत्त ‘एक लंबी छाँह’ के लिए, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान (2009) इत्यादि।

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