Yugdrashta Shivaji

Shashi Bhushan Singhal

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Parmeshwari Prakashan

  • ISBN No: 9789380048789

राष्ट्रकवि ने खूब कहा है—
‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। 
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ 
महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे।
आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।
यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।
उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।

Shashi Bhushan Singhal

शशिभूषण सिंहल 
एम.ए., पी-एच.डी., डी. लिट्. पूर्व प्रोफेसर, हिंदी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा)। यूनिवर्सिटी पद पर रहकर, अकादमिक तथा प्रशासनिक, दोनों ही क्षेत्रों में निरंतर स्वीकृत। अब स्वतंत्र लेखन में अग्रसर
कृतियां-
आलोचनात्मक: उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा, हिंदी उपन्यास की प्रवृत्तियां, उपन्यास का स्वरूप, साहित्यिक शोध के आयाम, साहित्य के स्वर: नये-पुराने, समकालीन हिंदी उपन्यास आदि डेढ़ दर्जन ग्रंथ
उपन्यास: ‘दुनिया न माने’, ‘और, कुछ और’, ‘परतें और परछाइयां’, ‘नई दिशाएं’, ‘घर अपना-अपना’ (पुरस्कृत), ‘सार-निस्सार’, ‘बहती जीवनधारा’, ‘युगद्रष्टा शिवाजी’, ‘चाणक्य और चंद्रगुप्त’
कहानी-संग्रह: ‘जरा, खिड़की खोलो’
विनम्र उपलब्ध्यिां: यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन, नई दिल्ली से साहित्यिक सेवाओं के लिए ‘इमेरिटस फैलो’ (प्रतिष्ठित अध्येता) के रूप में अखिल भारतीय स्तर पर सम्मानवृत्ति ०  उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा ‘विद्याभूषण’ उपाधि से सम्मानित एवं पुरस्कृत ०  हरियाणा साहित्य अकादमी से ‘विशेष साहित्य सेवी सम्मान’ प्राप्त

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