Rashtriya Ekta Aur Hindi

Vishnu Prabhakar

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Jagat Ram & Sons

  • ISBN No: 978-81-88125-04-3

विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक रूपक द्वारा प्रांतीय और राष्ट्रभाषा के संबंध को स्पष्ट करते हुए लिखा था, ‘आधुनिक भारत की संस्कृति एक विकसित शतदल के समान है, जिसका एक-एक दल, एक-एक प्रांतीय भाषा और उसका साहित्य संस्कृति है। किसी एक को मिटा देने से उस कमल की शोभा नष्ट हो जाएगी। हम चाहते हैं कि भारत की सब प्रांतीय बोलियां, जिनमें सुंदर साहित्य की सृष्टि हुई है, अपने-अपने घर में रानी बनकर रहें। प्रांत के जनगण की हार्दिक चिंता की प्रकाश भूमि स्वरूप कविता की भाषा होकर रहे और आधुनिक भाषाओं के हार के मध्य मणि हिंदी भारत-भारती होकर विराजती रहे।’
इसी बात का प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने इस प्रकार कहा था, ‘हिंदी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में जो लोक ऐक्य बंधन स्थापित कर सकेंगेे, वे ही सच्चे भारत बंधु की संज्ञा पाने योग्य होंगे। अतः हमें हिंदी भाषा में पुस्तकें लिखकर भारत के अधिकांश स्थानों का मंगल साधन करना चाहिए।’
—इसी पुस्तक से

Vishnu Prabhakar

विष्णु प्रभाकर विष्णु जी का जन्म 21 जून, 1912, को जिला मुजफ्फरनगर (उ०प्र०) के एक गॉव में हुआ था । विष्णु प्रभाकर हिन्दी में नाटक के क्षेत्र में विशिष्ट प्रतिभासंपन्न रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं । बांग्ला उपन्यासकार शरतचन्द्र के जीवन पर 'आवारा मसीहा' के कृतित्व ने विष्णु जी को भारत के महान जीवनीकार के रूप में भी प्रस्तुत किया है । बचपन हिसार (हरियाणा) में गुजरा। वहीं शिक्षा प्राप्त की और सरकारी नौकरी से जिन्दगी की शुरुआत की । कुछ दिन आकाशवाणी में अधिकारी भी रहे । कुछ समय पश्चात नौकरी छोड़ स्वतन्त्र लेखन अपनाया । मौलिक लेखन के अतिरिक्त उन्होंने साठ से अधिक पुस्तकों का संपादन किया । उनकी अनेक पुस्तके पुरस्कृत हैं । पुरस्कार तथा सम्मान : इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट अवार्ड (1975); सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1976), राष्ट्रीय एकता पुरस्कार (1980), मूर्तिदेवी पुरस्कार, भारतीय ज्ञानपीठ (1988); शलाका सम्मान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली (1988), केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार (1993); पाब्लो नेरूदा सम्मानम्, इण्डियन राइटर्स एसोसिंएशन; विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, उ० प्र० हिन्दी संस्थान; शरत् पुरस्कार, बंग साहित्य परिषद्, भागलपुर; सूर पुरस्कार, साहित्य कला परिषद्, तुलसी पुरस्कार, हरियाणा साहित्य अकादमी और संस्थान सम्मान, नागरी प्रचारिणी सभा, प्रयाग एवं अन्य कई पुरस्कार।
 स्मृति-शेष : 11 अप्रैल, 2009

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