Rajbhasha Hindi Aur Uska Vikas

Hiralal Bachhotia

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 978-81-88118-93-9

राजभाषा हिंदी और उसका विकास
हिंदी भाषा की बात करते हुए आम तौर पर हिंदी साहित्य का अर्थ लिया जाता है, किंतु आज हिंदी के क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है। उसके सरोकारों में भी विस्तार हुआ है। हिंदी के निर्माण में साधु-संतों के साथ-साथ सूफी फकीरों का भी योगदान रहा है। खड़ी बोली, दकिनी किस प्रकार साहित्यिक हिंदी बनी यह भी इसके विकास-आयाम हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में हिंदी को राष्ट्रभाषा का गौरवपूर्ण स्थान मिला। हिंदी-प्रचार राष्ट्रीय कार्यक्रम माना गया। उसकी विविध भूमिकाएं राजभाषा, संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा के रूप मंे विकसित हुईं। संविधान में हिंदी को राजभाषा की गरिमा प्रदान की गई।
संविधान में राजभाषा हिंदी के प्रावधानों के संदर्भ में विस्तार में जाएं तो कार्य करने की इच्छा, क्रियान्वयन के लिए हिंदी में कार्य करने का ज्ञान अवश्यंभावी है। इस दृष्टि से व्यावहारिक व्याकरण, वर्तनी, शब्द-प्रयोग और सबसे बढ़कर कार्यालयीन पत्र-व्यवहार आदि की सोदाहरण प्रस्तुति और भाषा संबंधी जागरूकता निर्माण इस पुस्तक की अपनी विशेषता है। 

Hiralal Bachhotia

हीरालाल बाछोतिया
प्रकाशित कृतियाँ :- अभी भी, जनहित और अन्य कविताएं, (कविता); विद्रोहिणी शबरी (मिथक काव्य); एक और मीनाक्षी, कस्तूरी गंध, नेकी की राह, आँगन का पेड़, फल हमारा है (उपन्यास); नहीं रुकती है नदी, भारत से बाहर भारत (यात्रा-यायावरी); हिंदी शिक्षण : संकल्पना और प्रयोग, राजभाषा हिंदी और उसका विकास, प्रौढ शिक्षा : संकल्पना और प्रयोग, हिदीं भाषा : प्रकृति, प्रयोग और शिक्षण (भाषा; भाषिकी); निराला साहित्य का अनुशीलन, आकाशधर्मी आचार्य : पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी (प्र. हिंदी अकादमी, दिल्ली); हिंदी की अन्य गद्य विधाएँ (प्र. हिंदी अकादमी, दिल्ली), सतपुडा के स्वर, अस्मिता (काव्य-संकलन), अनुस्वा (साहित्यिक त्रैमासिकी) (संपादन) ।

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