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375

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  • Shankar Shesh Ke Naatakon Mein Sangharsh Chetna
    Hemant Kukreti
    280 252

    Item Code: #KGP-9097

    Availability: In stock


  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Malti Joshi
    Malti Joshi
    180 162

    Item Code: #KGP-1298

    Availability: In stock


  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-480

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है।
  • Katha Samay : Srijan Aur Vimarsh
    Shashi Kala Rai
    245 221

    Item Code: #KGP-905

    Availability: In stock


  • Paarijat (Paperback)
    Nasera Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-299

    Availability: In stock


  • Rang-Saakshatkaar
    Jai Dev Taneja
    650 585

    Item Code: #KGP-817

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale (Paperback)
    Chanderkant Deotale
    90

    Item Code: #KGP-1492

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।

    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।

    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
    -चन्द्रकांत देवताले
  • The Great Horizon (Biography)
    Debabrata Dasgupta
    345 311

    Item Code: #KGP-342

    Availability: In stock

    The Great Horizon is a biographical novel on Sir Alexander Fleming, a Scottish biologist and pharmacologist. His best-known discoveries are the discovery of the enzyme lysozyme and the antibiotic substance penicillin from the mold Penicillium notatum, for which he shared the Nobel Prize in Physiology or Medicine in 1945 with Howard Florey and Ernst Chain.
    Discovery of penicillin has come naturally as a life-giver to mankind. Disease-torn distressed humans have got a means of longevity through this life-saver. It has contributed in no less measure, to the average human longevity crossing the figure of seventies. The bright rays of the antibiotics have dispersed the dark clouds of sickness and diseases, which overcast the sky of human destiny. All this has been made possible due to the physician named Alexander Fleming who discovered it in 1928 and unfolded a new horizon.
  • Aazaadi Ke Geet
    Maitreyi Pushpa
    30

    Item Code: #KGP-938

    Availability: In stock


  • Prati Shurti
    Shree Naresh Mehta
    350 315

    Item Code: #KGP-1955

    Availability: In stock

    प्रति श्रुति : श्रीनरेश मेहता की समय कहानियाँ 
    श्रीनरेश मेहता का कथा-गद्य, जैनेंद्र और अज्ञेय की परंपरा मेँ रखकर देखा जाए तो समाज और अध्यात्म, राष्ट्र और राजनीति, जीवन और दर्शन से संपृक्त वाद्य है । वे न तो जैनेंद्र का प्रतिबिंब बने और न ही अज्ञेय की छाया । उन्होंने सर्वथा स्वायत्त और स्वाधीन कथा साहित्य लिखा जिसमें काव्यात्मक रस भी है और जिसका आस्वाद हमारे सामाजिक और संस्कृतिक भाव-बौधों को प्रगल्भ भी बनाता है। श्री मेहता जी की भाव-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और जीवन-दृष्टि उनके कथा-गद्य में जिस प्रकार प्रकट हुई है उससे लगता है कि श्रीनरेश जी ने नई कथा-भाषा रचकर हिंदी को एक सांस्कृतिक शक्ति का लोक संस्करण सौंपा है। भाषा अपनी सर्जनात्मक शक्ति में जब सार्थक होती है तो वह स्वयं ही समाज और संस्कृति को अपने में समा लेती है । श्रीनरेश जी ने अपने कथा-शिल्प से भाषा की संभावनाओं को विराट बनाया, गद्य की एक नई शैली विकसित की और यह सिद्ध किया कि एक जीवंत भाषा और सजीव भाषा किस पवार अपनी सांस्कृतिकता और आंचलिक नास्टिलजिया को एक साथ एकाकार कर सकती है । श्रीनरेश जी का समूचा गद्य-साहित्य और विशेष रूप से कथा-साहित्य अपने ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों ही परिप्रेक्ष्यों में गहन शोध और विमर्श की माँग करता है । एक कवि और सर्जक को मात्र 'वैष्णव' कहकर ब्रांड नाम से सज्जित कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी वैष्णवता के पीडालोक को किसी गांधी की तरह बाहर निकाल नरसिंह मेहता के गीत 'वैष्णव जन' की तरह लोकव्यापी बनाना होगा । श्रीनरेश मेहता जैसा सर्जक अतीत की इतिहास-वस्तु बनकर, वर्तमान की संज्ञा से पृथक नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनकी सर्जन-यात्रा की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हिंदी मानस उनमें निहित समस्त संभावनाओं को समय स्मृति और अवकाश तीनो में रखकर एक ऐसे श्रीनरेश मेहता का अन्वेषण करे जो हिंदी साहित्य की चेतना का नरेश हो, सृजन की उस्कृष्टता का प्रतिमान हो और अपनी सांस्कृतिक सामाजिकता का अद्वितीय उदाहरण हो ।
  • Man Mirza Tan Sahiban
    Amrita Pritam
    90 81

    Item Code: #KGP-1967

    Availability: In stock


  • Maheep Singh Rachana-Sanchayan
    Mahip Singh
    695 626

    Item Code: #KGP-718

    Availability: In stock


  • Aurat Ek Raat Hai
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-1984

    Availability: In stock

    औरत एक रात है 
    ‘नहीं, आप गलत क्यों कहेंगे? गलत तो उन्हांने कहा है, जो दीदी के अविवाहित रहने के लिए जिम्मेदार हैं। अपनी गलती छिपाने के लिए उन्होंने यह कहानी गढ़ ली है। ...यह घर की बात थी, घर में ही रह जाती, तो अच्छा था; पर दीदी के बारे में ऐसा कुप्रचार हो और मैं चुप रह जाऊँ, यह तो नहीं हो सकता; तो सुन लीजिए, दीदी शादी नहीं कर सकीं, क्योंकि छोटे भैया की पढ़ाई बाकी थी और बड़े भाई ने साफ इंकार कर दिया था। वह अनब्याही रह गईं, क्योंकि घर में बूढ़ी बीमार माँ थी और उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। वह अविवाहित रह गईं, क्योंकि मेरी परवरिष करनी थी, और सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी शादी के लिए आज तक किसी ने पहल नहीं की और खुद अपना दूल्हा ढूँढ़ने के संस्कार हमारे परिवार में नहीं थे, इसीलिए उनकी शादी नहीं हो सकी,’ बात करते करते मेरा गला भर गया था। मैं एकदम उठ खड़ी हुई, ‘अच्छा, अब मुझे इजाजत देंगे। थैंक्स फॉर द टाइम यू गेव मी।’
    ‘अरे बिटिया, चाय तो पीती जाओ।’ जज साहब की पत्नी बोलीं। गृहिणियों को हमेषा मेहमानों को खिलाने पिलाने की ही पड़ी रहती है, और बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता, पर जज साहब मेरी बात समझ रहे थे। दोनों भाई मेरे साथ ही उठ खड़े हुए और मुझे छोड़ने बाहर तक आए।
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘अवसान एक स्वप्न का’ से)
  • Bindu-Bindu Vichar
    Atal Bihari Vajpayee
    295 266

    Item Code: #KGP-9022

    Availability: In stock

    बिन्दु-बिन्दु विचार
    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की] पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है । -इसी पुस्तक से

  • The Growing Years (Self-Help) (Paperback)
    Ann Delorme
    195

    Item Code: #KGP-340

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.
  • Kavi Ne Kaha : Arun Kamal (Paperback)
    Arun Kamal
    90

    Item Code: #KGP-1524

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: अरुण कमल
    यहाँ जो कविताएँ संकलित हैं वे मेरी सभी चार प्रकाशित कविता-पुस्तकों एवं आने वाली पुस्तक से ली गई हैं। कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो इन पुस्तकों के बाहर की हैं जो लिखी तो पहले गईं परंतु जिनका समावेश नहीं हो सका। ये कविताएँ मैंने खुद चुनी हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाकी कविताएँ जो यहाँ नहीं हैं वे इनसे हीनतर हैं या उनसे मेरा स्नेह कम है। हो सकता है कुछ लोगों को वे ही अधिक पसंद आवें। चाहिए तो यह कि किसी भी कवि की सभी रचनाओं को यानी पहली से लेकर अब तक एक साथ पढ़ा जाए। तब जाकर चित्र पूरा होता है क्योंकि कोई भी एक कविता अपने में पूरी नहीं होती, उसकी नाल किसी पिछली में होती है और मंजरी आगे बहुत दूर चलकर दिखलाई पड़ती है। इसलिए कई बार ओझल रह जाने वाली कविताएँ ध्यान देने पर बहुत महत्त्वपूर्ण लगती हैं।
  • Khaamoshi Se Pahale
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-1848

    Availability: In stock

    अज़ल का वह वीर आया था 
    और मुझे—
    एक किरण का तावीज़ दे गया 
    वह तावीज़ पहन लेती हूँ 
    तो सारे आसमान पर 
    उसकी दरगाह देखती हूँ 
    और इश्क़ की शीरनी लेकर 
    दरगाह पर जाती हूँ.... 
  • Sikh Dharma Darshan Ke Mool Tattva
    Satayendra Pal Singh
    195 176

    Item Code: #KGP-305

    Availability: In stock

    सिख धर्म दर्शन के मूल तत्त्व
    सदियों से भ्रमित समाज को परमात्मा से मिलन का एक सरल और सहज मार्ग दिखाकर सिख गुरु साहिबान ने धर्म की एक अभिनव दृष्टि प्रदान की। जीवन को विनम्रता, प्रेम, सेवा, समर्पण और संतुष्टि का पर्याय बनाने, परमात्मा के हुक्म के अधीन चलने का संदेश दिया। इससे समाज में अद्भुत चेतना जाग्रत हुई और शोषित, पीड़ित हृदयों में आशा का प्रकाश भर उठा। सिख गुरु साहिबान द्वारा बताया गया मार्ग जितना सरल है उतना ही कठिन भी है।
    उस मार्ग की सरलता और सहजता क्या है और कैसे साहस व समर्पण की आवश्यकता है, इसका उत्तर खोजने के लिए इस पुस्तक का आद्योपांत पठन अपरिहार्य है।
    सिख धर्म दर्शन पर हिंदी में मूल रूप से लिखी गई यह पहली पुस्तक है, जो धर्म के मर्म तक ले जाती है और उसे अपनाने हेतु प्रेरित करती है।
  • Ek Bhaasha Huaa Karati Hai
    Uday Prakash
    140 126

    Item Code: #KGP-293

    Availability: In stock

    हमारे भागते-दौड़ते कठिन और तेज़ समय में जब बहुत कुछ हाशिये पर जा रहा है, जिसे पहले ज़रूरी समझा जाता था, क्या कविता के लिए कोई जगह, कोई काम बचे हैं? उदय प्रकाश की कविता के केंद्र में यही चिंता है। उनके यहाँ ‘अब हर बार हारा हुआ यह माथा है/अकेला अपनी आत्मा से लाचारी के साथ क्षमा माँगता हुआ’ और यह तीखा अहसास भी कि ‘अपनी ही भाषा और अपने ही लोकतंत्र के भीतर/हम अबुगरेब के कै़दी’ हैं। इस दुनिया में ‘कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते हैं/ इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं/ ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से’। ऐसी दुनिया और समय में कविता का काम मानवीय अंतःकरण को संक्षिप्त होने से बचाना, जो हो रहा है उसे खुली आँखों देखना और इस समय पर अंतःकरण की ओर से चैकसी करना है। कविता याद दिलाती है कि ‘यह एक लुटेरा अपराधी समय है/जो जितना लुटेरा है, वह उतना ही चमक रहा है और गूँज रहा है/हमारे पास सिर्फ़ अपनी आत्मा की आँच है और थोड़ा-सा नागरिक अंधकार/कुछ शब्द हैं जो अभी तक जीवन का विश्वास दिलाते हैं’। ‘आत्मा की आँच’, ‘थोड़ा-सा नागरिक अंधकार’ और ‘कुछ शब्द’ आज कविता का यही शास्त्र संभव है।
  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    120

    Item Code: #KGP-7215

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Mahadevi Verma Ki Vishvadrishti
    Tomoko Kikuchi
    300 270

    Item Code: #KGP-647

    Availability: In stock

    महादेवी वर्मा की विश्वदृष्टि
    सामान्यतः महादेवी वर्मा की ख्याति रहस्यवादी कवयित्री के रूप में काफी समय तक स्थिर रही। उन पर लगाए जाने वाले पलायनवाद के आरोप का युक्तिसंगत खंडन करके महादेवी के साहित्य में प्रकट मानवीय दृष्टिकोण को सामने लाने के लिए इस पुस्तक में उनकी विश्वदृष्टि पर गहरा अध्ययन हुआ है।
    महादेवी के साहित्य को अधिक गहनता के साथ समझने के लिए उनके जीवन का सूक्ष्म विवेचन अनिवार्य है, अतः उनके व्यक्तिगत अनुभव के साथ उनके जीवन पर बौद्ध धर्म, संस्कृत काव्य, स्वाधीनता आंदोलन, गांधी, तत्कालीन समाज, संस्कृति, छायावाद आदि के प्रभाव के बारे में भी विचार किया गया है। इस पुस्तक में महादेवी की सभी साहित्यिक विधाओं का विश्लेषण हुआ है, जैसे कविता, गद्य, पत्रिका के साथ महादेवी द्वारा चयनित और अनूदित संस्कृत काव्य का भी विस्तार से विवेचन हुआ है। महादेवी की अब तक असंकलित ‘अबला’ और ‘विधवा’ जैसी महत्त्वपूर्ण कविताओं को हिंदी जगत् के सामने लाने का प्रयास भी हुआ है।
    महादेवी वर्मा का एक आश्चर्यजनक व्यक्तित्व है, जिन्होंने एक ही समय में अनेक भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है, जैसे साहित्यकार, संपादिका, कॉलेज की प्रधानाचार्या, समाज-सेविका इत्यादि। महादेवी के जीवन के उन विभिन्न पहलुओं से एक ही उद्देश्य और एक ही प्रेरणा पाई जाती है। उनका कहना है—"सब स्त्रियों में जागृति उत्पन्न करने, उन्हें अभाव का अनुभव कराने का भार विदूषियों पर है और बहुत समय तक रहेगा।" असल में इस पुस्तक में अभिव्यक्त सभी व्याख्याएँ यह प्रमाणित करने का प्रयास है कि महादेवी अपने साहित्य के माध्यम से एक तो स्त्रियों के मन में अन्यायपूर्ण स्थिति के प्रति प्रश्नचिह्न लगाने की प्रेरणा देती हैं और दूसरा, स्त्रियों को अपनी स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाने की शक्ति तथा साहस प्रदान करती हैं।

  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-445

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रही है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Veshya
    Ajay Kumar Singh
    395 356

    Item Code: #KGP-1979

    Availability: In stock

    वेश्या
    अच्छे समाज के निर्माण की प्रक्रिया में स्वयं समाज को अनेक अंतर्विरोधों से जूझना पड़ता है। समाज का उत्थान हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत लाभों के त्याग द्वारा ही सुगम बनता है। मनुष्य का स्वार्थी होना स्वाभाविक गुण है, जो उसे सीमित करता है। वही त्याग का आदर्श है, जिससे निर्माण एवं सृजन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। समाज जब अपने वेश्यापन को छोड़ आदर्श की ओर बढ़ेगा तभी हम सभ्य समाज का निर्माण कर सकेंगे।
    आज के समय में समाज का बहुसंख्यक वर्ग निजी लाभ को समाज के लाभ से श्रेयस्कर समझता है। यह रीति ही हमें तृतीय विश्व के देशों का हिस्सा बनाती है। हमारी सोच प्रथम विश्व एवं द्वितीय विश्व के समाज के समान नहीं है। यही हमारा दुर्भाग्य है। ऐसे में कुछेक ऊँची सोच वाले लोग अंत में अपने को ठगा हुआ-सा महसूस करते हैं।
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    220 198

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Nepathya Se
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9117

    Availability: In stock

    इस पुस्तक का प्रारंभ एक आत्मनिबंध-सी लगने वाली रचना से होता है और उपसंहार एक ऐसे पत्र-संवाद से, जो दरअसल समूची पुस्तक में अंतव्र्याप्त विषयवस्तु से ही संबद्ध विचारों का वाद्य-वृंद अथवा ‘ड्रामा’ है। इस तरह यह एक ओर मेरे विशुद्ध व्यक्ति-व्यंजक निबंध-संग्रहों ‘रचना के बदले’, ‘आडू का पेड़’ और ‘शैतान के बहाने’ से और दूसरी ओर मेरे वैचारिक निबंध-संकलनों ‘सबद निरंतर’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ तथा ‘स्वाधीन इस देश में’ से जुड़ता है; हालांकि है यह कुल मिलाकर वैचारिक निबंधों का संग्रह ही। पाठक लक्ष्य करेंगे कि विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जिसे कहा जाता है, उससे भिनन कोटि का उपक्रम होते हुए भी यह लेखन ‘आलोचना’ को हर जगह स्पर्श करता चलता है अलगपन इसमें यह, कि आलोचना का यह स्वर संस्कृति के व्यापक सरोकारों का, कहंे कि एक तरह की सभ्यता-समीक्षा का स्वर है।
    पिछले तीन-चार बरसों के दौरान लिखे गए इन निबंधों में सुधी पाठक को कुछ न कुछ तारतम्य और पूर्वापर-संबंध की प्रतीति भी अवश्य होगी जो इनके पुस्तकाकार प्रकाशन को संकलन की तरह ही नहीं, अंतग्र्रथित गं्रथ के रूप में भी यथेष्ट औचित्य प्रदान करती है। इस अवसर पर लेखक उन समस्त संस्थाओं और पत्रिकाओं के प्रति आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता है, जिन्होंने इन निबंधों को प्रेरित या प्रकाशित किया।
    —रमेशचंद्र शाह
  • Chulbuli Kavitayen
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-9042

    Availability: In stock


  • Kartavya
    Samual Smiles
    240 204

    Item Code: #KGP-280

    Availability: In stock


  • Nanhe Haath Khoj Mahan
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-109

    Availability: In stock

    एक पुरानी कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात। विज्ञान के आविष्कारों में अनेक ऐसी कथाएं छिपी हुई हैं, जिनके बीज बचपन में ही पड़ गए थे। उन वैज्ञानिकों के बचपन में ही कुछ ऐसा हुआ था, जिसने आगे चलकर एक महान आविष्कार, अनुसंधान या खोज का रूप लिया। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विशिष्ट कथाएं दी गई हैं, जो बाल-पाठकों को प्रेरणा देंगी कि उनका हर काम महत्वपूर्ण है। कौन जाने, उनका कौन-सा काम बड़े होने पर प्रेरणा देगा और उन्हें महानता की सीढ़ियों पर चढ़ाकर विशिष्ट बना देगा। ये कहानियां रोचक हें, ज्ञानवर्धक हैं और प्रेरक हैं। आशा है, सभी आयु के पाठक इनसे प्रेरणा लेंगे।
    —हरिकृष्ण देवसरे
  • Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal
    Viren Dangwal
    190 171

    Item Code: #KGP-387

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
    वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

  • Arogyadayi Vanaspatiyan
    Ramesh Bedi
    300 270

    Item Code: #KGP-186

    Availability: In stock

    आरोग्यदायी वनस्पतियां
    हरड़, बहेडा, आंवला, नीम, पिप्पली, सर्पगंधा, भांग, मुलेठी, सौंफ, तुलसी आदि वनस्पतियों का सदियों से भारत में रोग-निवारण के लिए प्रयोग किया जाता रहा है । इस पुस्तक में विविध रोगों को नष्ट करने वाली ऐसी 54 वनस्पतियों का सचित्र परिचय दिया गया हैं ।
    प्रत्येक वनस्पति का वानस्पतिक नाम, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के नाम दिए गए हैं । निघण्टुओं में आए उनके नामों का विस्तार से परिचय दिया गया है । वनस्पति के स्वरूप की जानकारी, प्राप्ति- स्थान, खेती करने का तरीका, रासायनिक संघटन, उद्योग और व्यापार में उसके उपयोग की विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है ।
    प्रत्येक वनस्पति के आयुर्वेदिक उपयोग की सरल भाषा में जानकारी दी गई है । अपने देश में ज़डी-बूटियों की भारी खपत है । फार्मेसी उद्योग की निरंतर बढती हुई मांग को पूरा करने के लिए इनकी खेती करनी होगी । पुस्तक में वर्णित पौधों के स्वरूप की पहचान के लिए 109 फोटो (93 सादे फोटो और रेखाचित्र तथा 16 रंगीन फोटो) दिए गए है । यह पुस्तक चिकित्सकों, आयुर्वेद के छात्रों, फार्मेसियों, वन सेवा के कर्मियों व अधिकारियों और जडी-बूटियों में रुचि लेने वाले हर व्यक्ति के लिए संग्रहणीय है ।
  • Bhakt Soordas
    Chandrika Prasad Sharma
    190 171

    Item Code: #KGP-140

    Availability: In stock


  • Aids : Tathya Evam Bhrantiyan
    Shuk Deo Prasad
    100 90

    Item Code: #KGP-9144

    Availability: In stock

    एड्स कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है कि रोगी का पारिवारिक या कि सामाजिक बहिष्कार किया जाय जैसा कि पहले कुष्ठ रोगियों प्रति किया जाता था। वैसे कुष्ठ भी अब असाध्य नहीं रहा। इस सामाजिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है। एड्स रोगी को घृणा नहीं आपका स्नेह चाहिए। एक साथ रहने, उठने-बैठने, भोजन करने, सामूहिक स्नान गृह/शौचालय में जाने, वस्त्रों के संप्रयोग से एड्स नहीं फैलता और न ही एक दफ्तर में साथ काम करने से या कि भीड़ भरे स्थानों में, रेल-बस में साथ-साथ सफल करने से। अतः आप एच.आई.वी. संक्रमित/एड्स ग्रस्त व्यक्ति के साथ सहभागिता कर सकते हैं। ऐसी सामाजिकता से उसकी अपनी जिंदगी के प्रति रुझान बढ़ जाएगी।
    एड्स के अधिकांश मामले यौन संसर्ग के देखे गए हैं। फिर दूषित रक्ताधान, साझे ब्लेडों, सुइयों/सिरिंजों के इस्तेमाल से भी संक्रमण होता है अर्थात् शारीरिक द्रव, यौनिक द्रव इसके प्रसार के कारण हें। इन बातों को ध्यान में रखकर और इनसे परहेज करके आप रोगी के साथ मजे से गुजर-बसर कर सकते हैं। एड्स के बारे में बहुत सी भ्रांत धारणाएं समाज में व्याप्त हैं। उन भ्रांतियों का निवारण और तथ्यों की सटीक जानकारी देना ही पुस्तक का मंतव्य है। एड्स के प्रति आम आदमी की भाषा में जागरूकता जगाने के ही उद्देश्य से पुस्तक लिखी गई है।
  • Poster (Paperback)
    Shanker Shesh
    40

    Item Code: #KGP-943

    Availability: In stock

    शंकर शेष
    डॉ. शंकर शेष साठोत्तर नाटक और रंगमंच के सशक्त हस्ताक्षर हैं। प्रयोगधर्मी नाटककार के रूप में आपकी ख्याति रही है। आपके नाटक और एकांकी समय-समय पर खेले जाते रहे और दर्शकों ने इन प्रयोगों को काफी सराहा है। डॉ. शंकर शेष मराठी भी जानते थे। उन्होंने मराठी से कुछ नाटकों का अनुवाद भी किया है।
    ० 
    2 अक्तूबर, 1933, बिलासपुर (म.प्र.) में जन्म
    नागपुर विश्वविद्यालय से 1956 में बी.ए. ऑनर्स (प्रथम श्रेणी) 
    1960 में पी-एच.डी.
    बंबई विश्वविद्यालय से 1976 में एम.ए. लिंग्विस्टिक (प्रथम श्रेणी)
    वर्ष 1956 से जीवनपर्यंत रंगमंच से संबद्ध
    मध्य प्रदेश शासन द्वारा ‘बाढ़ का पानी: चंदन के द्वीप’ और 
    ‘बंधन अपने-अपने’ कृतियां पुरस्कृत 
    फिल्म ‘दूरियां’ के लिए ‘फिल्मफेयर पुरस्कार’ प्राप्त
    फिल्म ‘घरौंदा’ तथा ‘दूरियां’ के लिए ‘आशीर्वाद पुरस्कार’ प्राप्त
    साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा ‘कोमल गांधर’ पुरस्कृत
    28 अक्तूबर, 1981 को श्रीनगर (कश्मीर) में निधन।
  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7210

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Nashta Mantri Ka Gareeb Ke Ghar
    Prabha Shanker Upadhayaye
    90 81

    Item Code: #KGP-1863

    Availability: In stock

    नाश्ता मंत्री का गरीब के घर
    विषमताओं विसंगतियों और विद्रूपताओं  से अटी है आज के जिंदगी । ऐसे अनुभवों को अनुभूत का, प्रहारात्मक तरीके से प्रस्तुत करना, व्यंग्य कहा जाता है । साथ ही मानव को कुंठाओं एवं जीवन-मूल्यों में स्खलन के प्रति भी फिक्रमंद होता है व्यंग्यकार । उसकी सोच का पैनापन पाठक के मन को कभी कचोटता है तो कभी उसका फक्कड़ मिजाज पाठक के मन को गुदगुदा जाता है । इसीलिए व्यंग्य के साथ हास्य का जुडाव हो गया है ।
    प्रस्तुत संग्रह में नाना भाँति की महक सहेजे तीस व्यंग्य-पुष्प संकलित हैं, जिन्हें मैंने डेढ़ दशक की अवधि में लिखा है । समाज, व्यवस्था राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, अर्थशास्त्र तथा दफ्तरी जिन्दगी इत्यादि विषयों पर कलम चलाने का प्रयास किया है । मैं अपनी लेखनी का तेवर दिखा पाने में कितना कामयाब हो सका हूँ इसका निर्णय तो प्रबुद्ध पाठक एवं सुधी समीक्षक ही करेंगे  ।
    ---प्रभा शंकर उपाध्याय 'प्रभा'
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhisham Sahni (Paperback)
    Bhishm Sahni
    120

    Item Code: #KGP-10

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भीष्म साहनी
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बार', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Poster
    Shanker Shesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1897

    Availability: In stock


  • Raseedi Ticket
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-2068

    Availability: In stock


  • Us Desh Ka Yaaron Kaya Kahana
    Manohar Shyam Joshi
    345 311

    Item Code: #KGP-554

    Availability: In stock

    उस देश का यारो क्या कहना
     हिंदी की तमाम अनसुलझी बहसों में से एक यह  भी रही है की व्यंग्य को विधा माना जाय कि वस्तु ? मनोहर जोशी के यहाँ व्यंग्य एक दृष्टि या दृष्टिकोण, एक धजा या अदा की शक्ल अख्तियार  करता है। वे किसी भी स्थिति और व्यक्ति को, विधा और वस्तु को, पवित्र या अस्पृश्य  नहीं मानते । जिस तरह वे अपने को, उसी तरह और सब कुछ को धो-धाकर ठिकाने लगा देने में यकीन करते है । यही उनका कथा है यहीं उनका शिल्प ।
    कोई गुब्बारा दिखा नहीं कि मश्जो उसमें पिन चुभोने के लिए बेताब हो उठते है, गोकि वे इसे बडी तरतीब और तरकीब से करते हैं-- कुछ इस तरह कि वह भड़ाक से न फूटे, हवा धीरे-धीरे फुस्स करती निकले । गुब्बारे को अच्छी बरह पिचकाकर ही मश्जो चैन पाते हैं, जो उनकी ममता का सूचक है या निर्ममता का, यह अपने-आप में विवाद का विषय हो सकता है ।
    हिन्दी व्यंग्य-लेखन के आरंभिक उदाहरण और प्रतिमान यदि शिवशंभु के चिट्ठों में देखे जा सकते हैं तो उनके लगभग सौ वर्षों बाद लिखित 'नेताजी-कक्काजी संवाद' हमें एक बार फिर समय और समाज के आमने-सामने लाते है । तब इस विडंबना की ओर ध्यान जाए बिना नहीँ रहता कि चीजे और स्थितियां जितनी बदलती है, उतनी ही वे पहले जैसी रहती है ।
    इसलिए, लार्ड कर्जन और नैताजी और मुंगेरीलाल एक ही सिक्के के अलग-अलग पहलू जैसे नजर आएँ नो क्या आश्चर्य ।
    यह समझ चुकने के बाद केवल जीना ही समझना बाकी बचना है कि तिथियों, नामों और प्रसंगों के बासीपन के बावजूद, उनके पीछे मौजूद बहुत कुछ तरोताजा बना रहता है । मश्जो उसे कई तरह से झलकाते हैं, यहाँ तक कि छद्म गंभीरता के आवरण में छिपाकर भी ।
    हिन्दी ये एक समय अनेक तात्कालिक कारणों से जिस तरह 'एकांकी' का विस्फोट हुआ था, उसी तरह पत्रकारिता के पिछले दौर में 'व्यंग्य' की भरपूऱ खेती हुई है । कोई चाहे तो इस 'बम्पर क्राप' को 'स्वाधीनता के पचास वर्षों की देन' भी कह सकता है और उम्मीद बाँधी जा सकती है कि जश्न के इस मौके पर संसद का जो विशेष अधिवेशन हुआ था, उसके अनन्तर 'शान्तं पापम्’ नामक एक नया सीरियल शुरु होगा । वह मात्र पचास दिनों का होकर न रह जाय,
    बल्कि आगामी पचास वर्षों तक चलता हुआ, स्वाधिनता का शतक भी धूमधाम से मना सके, इस गुन्ताड़े में हमारे सुपर स्क्रिप्ट-राइटर मश्जो  इन दिनों-बाकी सभी हास्य-व्यंग्यकारों सहित- लगे हुए है ।
    यही वह वजह है कि सूचना मुझ जैसे मुहर्रमी व्यक्ति को देनी पड़ रही है कि आत्मसाक्षात्कार से लेकर आत्मधिक्कार  क्या आत्मशोधन तक की तमाम संभावित छवियों को समेटने वाली उस अखंड राष्ट्रीय गाथा के एल धमाकेदार ट्रेलर की भाँति अब आपके सामने पेश है--'उस देश का यारो क्या कहना ।'
    -अजितकुमार
  • Abhang-Gaatha
    Narendra Mohan
    140 126

    Item Code: #KGP-9138

    Availability: In stock

    ‘खोए हुए शब्द को, अभंग को, सृजनशक्ति को पुनः पाने की तुकाराम की बेचैनी अभूतपूर्व है जो उसे हर युग के कवि की बेचैनी के मिथक के रूप में खड़ा कर देती है। शब्द, सृजन और जिंदगी उनके लिए अलग-थलक नहीं, एक ही हैं। शब्द की इस कैफियत के साथ तुकाराम का मुझ तक पहुंचना एक कवि के एक नए पाठ के खुलने के बराबर है जिसके लिए एक क्या, कई नाटक लिखे जा सकते हैं।’
    ये शब्द हैं डाॅ नरेन्द्र मोहन के जिन्होंने अभंग-गाथा नाटक में तुकाराम की जिंदगी और अभंग-रचना को आज के दहकते हुए संदर्भों से जोड़ दिया है। नाटक के निर्देशक सतीश दवे ने अपने वक्तव्य में ठीक ही कहा है ‘पहली बार जब मैंने अभंग-गाथा का नाट्य आलेख उनसे सुना तो मुझे महसूस हुआ जैसे तुकाराम का मानवीय व्यक्तित्व कई दृश्यों की श्रृंखला में मेरे सामने मूर्तिमान हो गया हो और एक साथ कई रूपाकारों ने मुझे घेर लिया हो। मुझे लगा तुकाराम अपने युग से बाहर आकर मेरे सामने आ खड़े हुए हों और उस वक्त की परिस्थिति, समय और इतिहास मेरी परिस्थिति, समय और इतिहास से जुड़ने-टकराने लगा हो।’
    अभंग-गाथा में शब्द और रंग साथ-साथ हैं। एक-दूसरे को प्रकाशित-स्पंदित करते हुए। इस नाटक को खेलना, इसीलिए, रंगकर्म का एक सांझा अनुभव बनता गया है। अभंग को यहां रंग-संगीत शैली का हिस्सा ही बना दिया गया है और यह शैली नाटक के भीतरी रंग-संयोजनों से मिलकर ही मंच पर आई है। 
  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 990

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Puraskrit Bachchon Ki Gaurav Gathayen
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-319

    Availability: In stock

    जिस तरह हर इंसान के भीतर एक बच्चा छिपा होता है, उसी तरह हर बच्चे के अंदर भी एक जिम्मेदार नागरिक का भाव रहता है। परिस्थिति आने पर बच्चे की उम्र से परे यह भाव परिलक्षित भी हो उठता है। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित बच्चों के भीतर भी यही जिम्मेदारी नजर आती है। बालपन में भी दूसरों के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा देना इन बच्चों के भीतर छिपे जिम्मेदार नागरिक की पहचान ही तो है। 
    आज जबकि ‘बड़े’ अपनी जिम्मेदारियां भूलते जा रहे हैं या समय आने पर उनसे बच निकलने का प्रयास करते हैं, बच्चों में जिम्मेदारी का यह भाव न केवल सराहनीय बल्कि अनुकरणीय भी है। हमारा यह भी फर्ज बनता हे कि बच्चों के प्रयास को समाज के सामने लाएं। शायद यही वजह है कि अब तो मुझे ही साल जनवरी माह के तीसरे सप्ताह में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से मुलाकात का इंतजार रहने लगा है। 
    इस पुस्तक को तैयार करने में सक्रिय सहयोग देने के लिए मैं अपने साले साहब विनोद गुप्ता का विशेष आभार प्रकट करना चाहूंगा। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अपने स्थानांतरण के चलते उनके सहयोग कि बिना मेरे लिए यह पुस्तक तैयार कर पाना निस्संदेह मुश्किल था।
    —संजीव गुप्ता 
  • Kashmkash (Paperback)
    Manoj Singh
    240

    Item Code: #KGP-378

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar December, 2016
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #December,2016

    Availability: In stock

  • Vishaad Math
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-54

    Availability: In stock


  • Geeton Ke Indradhanush
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-1210

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal
    Bhagwan Das Morwal
    300 255

    Item Code: #KGP-706

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढ़ियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Pustak Sameeksha Ka Paridrishya
    Vishwanath Prasad Tiwari
    120 108

    Item Code: #KGP-1476

    Availability: In stock

    हिंदी पुस्तकों की समीक्षा पर एकाग्र प्रस्तुत चयन में इस विषय के अनेक आयामों के संस्पर्श और आस्वाद का गहरा अनुभव मिलता है। यह अनुभव पाठक-लेखक, समीक्षक-प्रकाशक और संपादक को समांतर रूप से इसलिए छूता है, क्योंकि पुस्तक-समीक्षा के संसार में ये सब निकटतम और घनिष्ठतम ‘पड़ोसी’ हैं। भावनात्मक और सक्रियात्मक दोनों ही रूप में अभिन्न। पुस्तक-समीक्षा का आधुनिक परिदृश्य एक सत बहस और पूछताछ से आच्छादित है और संभवतः इसीलिए यह विषय साहित्य के हाशिए पर रहने वाला विमर्श न रहकर अब केंद्र में आ गया है।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा संचालित वार्षिक ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ के वर्ष 2005 के आयोजन में पुस्तक समीक्षा की स्थिति की गहराई से पड़ताल करने के उपक्रम में अनेक गंभीर एवं कतिपय रोचक कथ्य-तथ्य सामने आए। कुल मिलाकर उक्त विषयक स्थिति को चिंतामयी ही चिन्हित किया गया। साथ ही, यह विचार भी सामने आए कि पुस्तक के प्रकाशन के उपरांत होने वाले इस सर्वप्रथम संस्कार (समीक्षा) की पवित्रता को कैसे पुनस्र्थापना मिले तथा इसके भावी रूप-स्वरूप को किस प्रकार मिल आकार और आकृति। इन आलेखों में पाठक पाएंगे कि पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय ही पाठक के मनोभाव में विश्वसनीयता जगा सकता है।
    संभवतः हिंदी की यह अकेली और पहली ऐसी पुस्तक है, जिसका विषय किताब के जीवन से सीधे जुड़ा हैं। अर्थात् किताब की चिंता में तल्लीस एवं एक किताब। मुद्रित शब्द पर आए-छाए संकटों के बीच विश्वसनीय पुस्तक-समीक्षा ही एक ऐसा अस्त्र हो सकता है, जिसके सहारे शब्दों के सार्वजनिक प्रहरी सीना तानकर, दृश्यलिप्त दुनिया को यह दिखा सकते हैं कि अंततः शब्द ही ब्रह्म है।
  • Aapad Dharm Tatha Anya Kahaniyan
    Deepak Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-1933

    Availability: In stock

    आपदधर्म क्या अन्य कहानियाँ
    'यह दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि हमरे समाज में विवाह केवल सामाजिक समाकलन का एक यंत्र योग है ? या किर विधिक विषयासक्ति का एक रचनातंत्र ? इसके अतिरिक्त क्या हमारे समाज में विवाह कोई तीसरा सत्व भी रखता है ?' रोहिणी एलबम का वह पृष्ट सामने ले आई जहाँ विवाह के पारंपरिक वस्त्रों एवं आभूषणों से सजे तथा विवाह संबंधी स्वाभाविक उमंगों एवं अचरजों से लदे अठारहवर्षीय मधु तथा चौबीसवर्षीय अशोक एक-दूसरे की ओर संपूर्ण समर्पण की दृष्टि से निहार रहे थे ।
    अशोक के हाथों में अपना भाग्य एवं अपना भविष्य सौंप चुकी मधु के हाथों से उस लोक का भाग्य एवं भविष्य छीनने वाली रोहिणी का उस लोक में प्रवेश क्या अतिक्रमण न था ? निषिद्ध न था ? विवाह तोड़ने की उसे लत लग गई थी क्या ?
    “बच्चे है तीसरा सत्व, रोहिणी ।"
    पहली बार गर्भवती हुई मधु के मन में बच्चों के प्रति ढेरों उत्माह रहा ।
    "द सीमेंट ? द शटल कॉक ? द प्लेइंग फील्ड ?” रोहिणी हँस पडी ।
    “मतलब ?"
    "स्ट्रिंडबर्ग र्ग के अनुसार बच्चों से माता-पिता सीमेंट का काम लेने है । हैनरी जेम्स सोचते है, माता-पिता की फूट में बच्चे बैडमिंटन को चिडिया की भांति इधर से उधर फहराए जाते हैं और नोरा एफ़रोन अपने उपन्यास "हार्टबर्न’ में लिखती हैं कि बच्चे के जन्म के साथ माता-पिता की बल-परीक्षा को एक नई क्रीड़ा-भूमि मिल जाती है... ।'
    -[इस संग्रह की एक कहानी 'स्त्रियाँ' से]
  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock


  • Toro Kara Toro (All 6 Vols.) (Paperback)
    Narendra Kohli
    1780 1424

    Item Code: #KGP-TKTPB1

    Availability: In stock

     All 6 Vols. in Paperback.
  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225 203

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Kama Sutra (Paperback)
    Vatsyayana
    99

    Item Code: #KGP-1100

    Availability: In stock

    It is one of the three goals of Hindu life. It is what the west called ‘erotica’. It is the one we consider sacred. It is Kama. And this is its manual—The Kama Sutra.
    A compilation of seven books, starting with the description of general principles of mortal life that Brahma laid down when he created men and women—dharma (fulfillment of duty), artha (accumulation of wealth), and kama (pleasurable experience of the five senses, to moving forward about the ‘right’ way of life where it talks about many issues including the behaviour and actions during copulation between a man and a woman. A 4th century guide to a virtuous and gracious living, still valid in the 21 century and beyond.    
    Vatsyayana unbashingly talks scientifically and spiritually about what is a taboo today, and emphasises that this book is a must for both men and women. It lays more stress on the fact that women, especially, should be knowledgeable in the arts complimentary to Kama Sutra
    The physical beauty of Khajuraho is the manifestation of the beauty trapped in this book, which the west unknowingly calls the ‘manual of sex’. 
    Discover the knowledge of the gods translated for the mortals by the mortals.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Narendra Kohli
    Narendra Kohli
    150 135

    Item Code: #KGP-2079

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नरेन्द्र कोहली ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'परिणति', 'किरचें', 'दृष्टि -देश में एकाएक', 'शटल', 'नमक का कैदी', 'निचले फ्लैट में', 'नींद आने तक', 'संचित भूख', 'संकट' तथा 'छवि' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kahanikar Kamleshwar : Punarmulyankan
    Pushp Pal Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-879

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ की प्रसिद्ध त्रयी के प्रमुख पुरोधा रूप में उभरे कमलेश्वर निश्चय ही प्रेमचंदोत्तर समय के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अत्यंत लोकप्रिय कहानीकार हैं। ‘नयी कहानी’ के समय से लेकर नयी शती के प्रथम दशक तक अपने को उन्होंने निरंतर सृजनशील रखा, एक से एक बढ़कर उम्दा और सशक्त कहानियां रचकर। ‘राजा निरबंसिया’, ‘खोई हुई दिशाएं’, ‘जार्ज पंचम की नाम’, ‘मांस का दरिया’ से लेकर ‘मानसरोवर के हंस’, ‘इतने अच्छे दिन’, ‘तुम्हारा शरीर मुझे पाप क लिए पुकारता है’, ‘सफेद सड़क’ जैसी कितनी ही कालजयी और विश्वस्तरीय श्रेण्य कहानियां उनके खाते में हैं जिन्होंने हिंदी कहानी का चेहरा पूरी तरह बदलकर रख दिया। सहास विश्वास नहीं होता कि कहानी के ललित कोमल स्वरूप में उन्होंने बौद्धिकता का ऐसा निर्मोक प्रदान कर दिया कि वह चिंतन-स्तर पर पाठक को इतना उद्वेलित कर सकने की क्षमता से युक्त हो सकी है। 
    प्रख्यात कथा-समीक्षक डाॅ. पुष्पपाल सिंह ने अपनी प्रखर और पूर्ण निष्पक्ष दृष्टि से कमलेश्वर के समग्र कहानी-साहित्य का यह अत्यंत सुचिंतित अध्ययन प्रस्तुत किया है, यदि वे कमलेश्वर की कहानियों के श्रेष्ठ पर रीझकर उनका पूर्ण निस्संग और उन्मुकत भाव से विश्लेषण करते हैं तो उनके श्याम पक्ष और न्यूनताओं का भी रेखांकन इसी बेबाकी से करते हैं।
  • Nai Chetana Ki Disha
    Rajeshwar Prasad Kaushik
    90 81

    Item Code: #KGP-9133

    Availability: In stock

    ध्यान, मनन, चिंतन
    ध्यान करने का उद्देश्य है ध्याता को खोजना । ध्याता (वह सत्ता जो ईश्वर, सत्य या निर्वाण का दर्शन करना चाहती है) को खोजे बिना ध्यान केवल भ्रम का एक यंत्र बनता है । ध्याता को खोजना उसकी परिसमाप्ति है । वह सत्य, जो यह कहे कि मुझे ईश्वर को या सत्य को खोजना है, पाना है, वह उसे कमी भी नहीं पा सकता । बुद्धि स्वयं सीमित है, वह उस असीम या शाश्वत की कभी अनुभूति नहीं कर सकती । बुद्धि की सर्वोच्च अनुभूति केवल यह हो सकती है कि वह सीमित तथा प्रतिबद्ध है और इसलिए वह सत्य का दर्शन पाने में असमर्थ है।  इस विवेक का उदय होने पर बुद्धि शांत हो जाती है । बुद्धि के पूर्ण शांत होने का अर्थ है-ध्याता की समाप्ति और ध्यान की भी समाप्ति । ध्यान की ही समाप्ति में से ही प्रेम प्रस्फुटित होता है ।
    यदि कोई व्यक्ति भावुक और गम्भीर है तो इसी क्षण इस प्रस्फुटन के अनुभूति हो सकती है । अन्यथा मनुष्य को ध्यान के अनेक भिन्न-भिन्न  उपायों और पद्धतियों के बीच से होकर गुजरना होता है और उनकी सीमाएँ देखनी होगी । ये उपाय और पद्धतियां बुद्धि की उपज है, इसलिए वे अधिक सूक्ष्म रूपों में 'मैं' और 'मेरा' को जीवित बनाये रखती है । इन पद्धतियों के द्वारा सत्य की खोज की व्यर्थता की जब अनुभूति होती है तब विवेक का आरम्भ होता है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    80

    Item Code: #KGP-1255

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : विष्णु प्रभाकर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', "क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aakash Ke Deeye
    Sharan
    30 27

    Item Code: #KGP-9148

    Availability: In stock

    हिंदी में ज्ञान-विज्ञान का विविध साहित्य उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय पुस्तक प्रस्थान की अनेक योजनाओं पर कार्य कर रहा है । इनमें से एक योजना प्रकाशकों के सहयोग से हिंदी से लोकप्रिय पुस्तको के प्रकाशन की है । सन् 1961 से कार्यान्वित की जा रही इस योजना का मुख्य उद्देश्य जनसाधारण में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार करना और साथ ही हिंदीतर भाषाओ के भी साहित्य की लोकप्रिय पुस्तकों को हिंदी में सुलभ कराना है ताकि ज्ञान-विज्ञान की जानकारी पाठकों को सुबोध शैली में मिल सके । इस योजना के अधीन प्रकाशित पुस्तकों में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार द्वारा निर्मित शब्दावली का प्रयोग किया जाता है ताकि हिंदी के विकास में ऐसी पुस्तकें उपयोगी सिद्ध हो सके । इन पुस्तकों में व्यक्त विचार लेखक के अपने होते है ।
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Vaigyanikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #KGP-921

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    150 135

    Item Code: #KGP-75

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ममता कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आपकी छोटी लड़की', 'वसंत-सिर्फ एक तारीख', 'लड़के', 'दल्ली', 'लैला-मजनू', 'जितना तुम्हारा हूँ', 'सुलेमान', 'छुटकारा', 'पीठ' तथा 'बोहनी' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ममता कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Saadat Hasan Manto Ke Natak
    Narendra Mohan
    400 360

    Item Code: #KGP-3

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • Satta Ke Aar-paar
    Vishnu Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9106

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    —इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Dinkar : Vyaktitva Aur Rachana Ke Aayam
    Gopal Rai
    425 383

    Item Code: #KGP-259

    Availability: In stock

    दिनकर: व्यक्तित्व और रचना के आयाम
    प्रस्तुत पुस्तक दिनकर को नए परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करती है। दिनकर का काव्य-संसार लगभग पाँच दशकों, 1924 से 1974 तक फैला हुआ है। बीसवीं शती के आरंभिक दशक में राष्ट्रीय आंदोलन जुझारू रुख अख्तियार करने लगा था और गांधी जी के हाथों में नेतृत्व आने के बाद तो राष्ट्रीय आंदोलन जनांदोलन के रूप में परिणत होने लगा। दिनकर की काव्य-चेतना और काव्य-चिंतन के निर्माण में राष्ट्रवादी आंदोलन के जुझारूपन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी कविताओं में भारतीय किसानों का श्रम, उनकी आशाएँ और अभिलाषाएँ लिपटी हुई हैं। 
     दिनकर साहित्य में समकालीनता और सामयिकता को वरेण्य मानते हैं। वही साहित्य दिनकर के लिए काम्य है, जो दलितों, उपेक्षितों और समाज के मान्य वर्ग की दृष्टि से असभ्य लोगों का पक्षधर बनकर खड़ा हो सके। दिनकर राजनीतिक विषयों को भी महत्त्व देते हैं और मानते हैं कि राजनीतिक कविता श्रेष्ठ कविता होती है। 
    दिनकर ने अकबर इलाहाबादी का एक शे’र उद्धृत किया है जो उनके काव्य-चिंतन का निचोड़ है:
    ‘‘मानी को छोड़कर जो हों नाजुक-बयानियाँ,
    वह शे’र नहीं, रंग है लफ़्ज़ों के ख़ून का।’’
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri (Paperback)
    Leeladhar Jaguri
    80

    Item Code: #KGP-1442

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti
    Hemant Kukreti
    240 216

    Item Code: #KGP-7814

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Shringaar Shatak
    Basant Kumar Mahapatra
    40 36

    Item Code: #KGP-9104

    Availability: In stock

    'श्रृंगार शतक' नाटक का एक संक्षिप्त अंश
    नयना : लेकिन ऐसा क्यों हुआ महाराज !!! यह युग हठात इस तरह को बदल गया ?
    सूर्यभानु : हर चीज हमेशा एक-सी नहीं रहती सुनयना! बीस साल पहले मैने तुझे जिस रूप में देखा था-क्या तुम आज वैसी ही हो ? ठीक उसी तरह समय के साथ-साथ न जाने कितना कुछ बदल जाता है । राजा सूर्यभानु आज भिखारी है और मेरा गुमाश्ता सनातन राजा । वह देखो, मेरे घर के आगे सिर उठाए खडी है उसकी तिमंजिली कोठी। बिजली की रोशनी से किस कदर झिलमिला रही है वह कोठी । जानती हो, आज उसके लड़के की शादी है । इसीलिए उसके दरवाजे पर इतनी गाड़ियां खडी है । कितनी भीड़ है । सारे ऑफिसर और मंत्री आज़ उसके यहीं आए है । पूरी रात वे जश्न मनाएँगे । आज जैसे दिन में यदि मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहूँ-सना मेरा गुमाश्ता था-मेरे गोदाम से धान चोरी करते समय पकडे जाने पर वह बर्खास्त हुआ था–मेरी बात पर कौन विश्वास करेगा ? दिन बदल गए हैं सुनयना, सब कुछ उलट-पलट गया है ।
    नयना : किंतु ऐसा कब तक चलेगा महाराज ?
    सूर्यभानु : राजा है जुल्म किया, इसलिए प्रजा ने राजतंत्र तोड़कर गणतंत्र की स्थापना की । गणतंत्र में जुल्म हुआ तो लोग फिर इसके विरुद्ध विद्रोह करेंगे । उस विद्रोह में पैदा होगी–और किसी तरह की नवीन शासन पद्धति । खैर, छोडो–यह सब सोचकर कोई लाभ नहीं । जब तक कोई परिवर्तन आएगा हम लोग नहीं होंगे ।

  • Chaanda Sethani
    Yadvendra Sharma Chandra
    125 113

    Item Code: #KGP-2042

    Availability: In stock

    'चाँदा सेठानी' के लिखने की प्रेरणा मुझे अपने इस समाज की सेठानियों से मिलने के बाद मिली । जब उन्होंने अपने जीवन के सत्यों को उजागर किया तो मेरे विचारों में जोर का कंपन हुआ । लगा कि इन सेठानियों के त्याग, तप, संयम और सच के कारण ही राजस्थानी लोगों ने देश के धन्नासेठों में अपने नाम लिखाए । पूर्वी देशों की यातनापूर्ण कठिन यात्राएँ, संकट और संस्कृति व वहाँ की भाषा को अजानकारी, सभी परिस्थितियों में राजस्थानी लोगों ने अदम्य साहस का परिचय दिया । आरंभिक पीढ़ी के त्रासदपूर्ण जीवन का शुभ फल दूसरी पीढ़ी को मिला और यह फल पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा । यहीं कारण है कि चाहे बिरला हो, चाहे गोयनका, पोद्दार हो चाहे सोमानी, दम्माणी हो, चाहे डागा, सब के सब अब समृद्धि के शिखर को छू रहे हैं ।
    पाँच से दस सालों तक की यात्राएँ की परदेश में गांव जमाने का संघर्ष । अपनी जवान पत्नियों का त्याग! क्या यह तपस्या नहीं ? और उन पत्नियों का तप तो और भी महान् लगता है, जिन्होंने सूखे प्रांतर की तपती रेत और उसके असह्य ठंडेपन का सूखी रोटियाँ और मोठ-बाजारी के खिचड़े को खाकर सहा ओर सहज जीवन जिया ।
    -लेखक
  • Prakarantar
    Roop Singh Chandel
    100 90

    Item Code: #KGP-9088

    Availability: In stock


  • Manvadhikar Ki Aseemit Sarhadein
    Pushpa Sinha
    250 225

    Item Code: #KGP-565

    Availability: In stock

    इक्कीसवीं सदी को मानवाधिकर एवं टेक्नोलोजी की सदी माना जा रहा है। मानवाधिकर प्रकृति द्वारा दी गई जीवन की जरूरी शर्तें हैं जिसमें मानव अपना जीवन स्वेच्छा से मर्यादापूर्वक जी सके। हर धर्म  एवं शास्त्रों में यह माना गया है कि प्रत्येक मानव जन्म से समान एवं स्वतंत्र है।
    लेकिन हमारी दुनिया की सामाजिक व्यवस्था ऐसी है जो एक मानव को दूसरे मानव से विभिन्न आधारों पर, जैसे—लिंग, धर्म, जाति, स्थान विशेष, भाषा आदि के द्वारा ऊंच या नीच समझता है। तब ऐसी स्थिति में मानव के जीवन एवं मर्यादा की रक्षा के लिए मानवाधिकार शब्द का आविष्कार किया गया। अतः सही मायने में मानवाधिकार एक सभ्य समाज के जीवन-शैली की रूपरेखा है जिसमें सभी अधिकार सभी को मिल सकें।
    मानव के अपने मूल-अधिकारों के हनन से ही समाज में असंतोष फैलता है, जो धीरे-धीरे उग्र होकर हिंसा का रूप लेता है, जिसके फलस्वरूप आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी भयानक सामाजिक परिस्थितियों का जन्म होता है।
    अतः मानवाधिकार का मूल-मंत्र है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। समाज में अधिकार और कर्तव्य का ताना-बाना बहुत सूक्ष्म है, यानी कि प्रत्येक मानव द्वारा हर पल सही कर्म करने की गति हो तभी ‘मानवाधिकार की असीमित सरहदें’ पार की जा सकती हैं।
  • Hindi Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    150 135

    Item Code: #KGP-61

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Dona Paavala Aur Teen Auraten
    Rohitashv
    175 158

    Item Code: #KGP-1836

    Availability: In stock

    गोवा का समुद्री तट। लहरों में लहराता एकांत। फैनी की मादक गिरफ्त। ऑन्जना बीच पर निर्वस्त्र विदेशी नर-नारी देखकर व्हिस्की पीने को मचलता मन। पीने के बाद इस स्वर्ग में गोते खाता नायक ! हाँ, यही तो होटल, बार और क्रूज के साथ तस्वीर है गोवा की। धनाढ्य पर्यटकों की मौज-मस्ती का अपना निजी रंगस्थल, देश-विदेशों में मशहूर ! प्रचलित यह भी है कि गोवा की औरतें स्वच्छंद जीवन की अभ्यस्त होती हैं। वे पैसे कमाती हैं और ऐश करती हैं।
    मगर रोहिताश्व की लिखी कहानियाँ, ये किस गोवा की कथाएँ हैं, जिनमें गोवा का स्वर्ग अपने ही बाशिंदों को आजाद रहन-सहन के बावजूद गरीबी, धोखे, जालसाजी और भावात्मक शोषण की चक्की में पीसकर रख देता है। अत्याचार और शोषण चक्र को खोलता हुआ लेखक सागर-किनारे के चप्पे-चप्पे को खँगालता है। संवेदना की बुनावट में गोवा की तस्वीर बदल जाती है। समुद्र की लहरों पर बल खाती चाँदनी के नीचे कितनी-कितनी काली रातें बिछी हुई हैं। उजाला होने की उम्मीद यहाँ स्त्री-पुरुषों के त्याग और बलिदानों से बने सूरज के हाथ है।
    दोना पावला और तीन औरतें’ संसार की उन तमाम औरतों का प्रतिनिधित्व करती है, जिनका जीवन अकेलेपन की त्रसदी के लिए है। पढ़ते हुए भयानक बेचैनी जकड़ती चली जाती है। कहीं आशा जागती है कि संघर्ष ही उनका मकसद है। स्त्रियाँ टूटती हैं, डगमगाती फिर भी नहीं...
    लेखक कहानियों में विभिन्न नामों से उपस्थित है और अपनी परिचय-भूमियों (गोवा और हैदराबाद) पर घटित होते इतिहास तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को बराबर दर्ज करता जाता है। कहन का प्रस्तुतीकरण ऐसा जैसे समूह में बैठकर हम लोककथाएँ सुन रहे हों। यहाँ कथाओं के प्रति वही अटूट आकर्षण जागता है, जिसके गायब हो जाने से कथा-कहानी के प्रति पाठक उदासीन हुआ है। संवेदी लगाव की यह धारदार प्रस्तुति रोमानी हालात में भी संघर्ष की पराकाष्ठा तक अनायास ही पहुँच जाती है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Kaur
    Ajeet Kaur
    350 315

    Item Code: #KGP-442

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरो वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिड़िया’ , 'चीख एक उकाब की है' तथा 'नया साल'।

    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Namvar Hone Ka Arth (Paperback)
    Bharat Yayavar
    225

    Item Code: #KGP-392

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    160

    Item Code: #KGP-490

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla (Paperback)
    Rita Shukla
    180

    Item Code: #KGP-510

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ऋता शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rang De Basanti Chola
    Bhishm Sahni
    2014 1813

    Item Code: #KGP-19

    Availability: In stock

    रंग दे बसन्ती चोला
    [जलियाँवाला बाघ रतनदेवी आती है । हाथ में पानी का लोटा है ।]
    रतनदेवी : ले मेरे लाल । मैं तेरे लिए पानी लाई हूँ। (किश्ना के होंठों से पानी डालती है ।) तू बोलता क्यों नहीं किश्ना बेटे । (माथे को छुकर) चला गया, यह भी चला गया । इसकी भी प्यास बुझ गई । मैं कर्मजली तेरे होंठों में दो बूँट पानी भी नहीं डाल पाई । तू भगवान् को प्यारा हो गया है। (रो पड़ती है, फिर धीरे से उठकर अपने पति के शव के पास पहुंचती है। ) तू भी भगवान् के पास जा रहा है । मैं रोऊँगी नहीं । मैं तेरा सफर खराब नहीं करूँगी । हँसता-हँसता जा। भगवन् तुझे गले लगाएंगे ।
    तेरे सैकडों संगी-साथी मौत की नींद सोए पडे हैं । वे भी तेरे साथ भगवान् के दरबार में जाएँगे। उनके घरवाले अभी भी उनकी राह देख रहे हैं। 
    तूने अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा । तू अपनी जान निछावर कर गया । मैं पापिन तुझे सारा वक्त उलाहने देती रही । तेरे साथ झगड़ती रही, पर मुझे क्या मालूम था, तू सचमुच चला जाएगा । (उसका माथा सहलाती हुई) मैं कहाँ लुट-पुट गई ? मैं तो चिर सुहागिन हूँ । जिसका घरवाला ऐसा शूरवीर हो । तू तो मेरा सूरमा पति है । तू तो नाचता-गाता हुआ घर आया करता था : मेरा रंग दे, मेरा रंग दे बसन्ती चोला ।
    -(इस पुस्तक से)
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Om Prakash Valmiki (Paperback)
    Om Prakash Valmiki
    80

    Item Code: #KGP-1539

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : ओमप्रकाश वाल्मीकि
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘बैल की खाल’, ‘अम्मा’, ‘बंधुआ लोकतंत्रा’, ‘पीटर मिश्रा’, ‘शवयात्रा’, ‘छतरी’, ‘घुसपैठिए’, ‘प्रमोशन’, ‘बपतिस्मा’ तथा ‘पच्चीस चैका डेढ़ सौ’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sahitya-Darshan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    400 360

    Item Code: #KGP-756

    Availability: In stock


  • Antariksh Itihas Ki Vishal Pariyojana
    Praduman Singh
    240 216

    Item Code: #KGP-721

    Availability: In stock


  • Ajit Kumar : Rachna-Sanchayan
    Ganga Prasad Vimal
    450 405

    Item Code: #KGP-9005

    Availability: In stock

    अजितकुमार: रचना-संचयन
    अजितकुमार अपने समय के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में अग्रणी हैं। उनके लेखन का वैविध्य साबित करता है कि वे अपनी पीढ़ी की सभी विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवियों के बीच कविता के साथ-साथ वे श्रेष्ठ कथाकार हैं। कथाकारों के बीच वे श्रेष्ठ कवि हैं। कवि और कथाकार होने के साथ-साथ वे गंभीर गद्य लेखक हैं। चिंतक, विवेचक और अद्भुत अनुवादक के रूप में उनकी ख्याति सर्वत्र व्याप्त है।
    प्रस्तुत संचयन उनके 80 वर्ष के होने के उपलक्ष्य में तैयार किया गया है। चिर शिशु, चिर किशोर, चिर युवा अजित- कुमार के सृजन में एक साथ कई गुण मिलते हैं। उनमें एक नैसर्गिक विनोदप्रियता है। इस अनोखी आदत के कारण वे सभी वर्गों में लोकप्रिय हैं। उनसे ईषर्या रखने वाले लोग तो उन्हें महिलाओं में ही लोकप्रिय मानते हैं। उनके शत्रुओं का कथन यहाँ ज़्यादा विश्वसनीय लगता है कि उन्होंने स्त्री-रिझावु साहित्य का प्रणयन किया है तथापि स्त्री और पुरुष समान रूप से उनकी रचनाओं के पाठक हैं। कल्पनाशीलता उनकी रचनाओं का आद्य गुण है, किंतु यथार्थ के वे उतने ही बड़े संस्थापक हैं, जितने बड़े वे भाषा के द्वारा वास्तविकता की सजीवता स्थापित करते हैं।
    अजितकुमार के लेखन में समता, असांप्रदायिकता, सौंदर्यवादिता और जनपक्षधरता मौलिक रूप से विद्यमान है। उनका इतिहास-बोध भारतीय उपमहाद्वीप को भौगोलिक और राजनीतिक परिसीमाओं से ज़्यादा उदार घोषित करता है। वे भारत की बहुलता के समर्थक हैं। उनकी रचनाएँ उनकी वैचारिक ऊष्मा की प्रतीक हैं। सृजन के सभी गुणधर्मों का स्पर्श करने वाला अजितकुमार का लेखन परंपरा और आधुनिकता व उत्तर-आधुनिकता के आदर्शों को संकेतित करते हुए सनातनता की अवधारणा को पुष्ट करता है।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 2 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    270

    Item Code: #KGP-304

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Do Dhurva
    Anton Chekhov
    225 191

    Item Code: #KGP-614

    Availability: In stock

    दो ध्रुव 
    अन्तोन चेखोव (1860-1904) रूस के ही नहीं, वरन विश्व के सुविख्यात कथाकार और नाटककार हैं। अपनी कहानियों में उन्होंने बहुत ही सीधे-सरल शब्दों में मनुष्य के असत्य, आडंबर, चापलूसी और  असहाय व्यक्ति के शोषण के विरुद्ध संकेत कर यह संदेश दिया है कि हम अधिक से अधिक मानवीय शोर संवेदनशील बनकर बेहतर इंसान बनें। साथ ही हम संसार को भी बेहतर बनाने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि यह सब लोगों के जीने  के योग्य बन सके ।
    इन कहानियों के मंच के लिए किए गए नाटय-रूपांतर, कॉन्स्टेंट गारनेट द्वारा रूसी से अंग्रेजी में किए उनके अनुवादों के आधार पर हिंदी  में किए गए है ।
    ऐसे ही आठ नाटय-रूपांतर इस पुस्तक में संकलित किए गए । आशा है, ये पाठकों को भी, और इन छोटे-बड़े नाटकों को मंच पर खेलने वाले अभिनेताओं-निर्देशकों को भी पसंद आएंगे, दर्शकों  को भी ।
    ये नाटक थोड़े बहुत आवश्यक परिवर्तन के साथ मंच पर आसानी से खेले जा सकते है ।
  • Gandhivaad Aur Hindi Kavya
    Bhakt Ram Sharma
    225 203

    Item Code: #KGP-890

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी इस शताब्दी के महत्तम व्यक्तियों में गिने जाते हें। उनका चरित और चिंतन तपःपूत है। भारतीय इतिहास में महात्मा बुद्ध के अतिरिक्त ऐसा शक्तिशाली लोकनायक नहीं हुआ। उनके व्यक्तित्व का स्पर्श पाकर ‘कोई कवि बन जाए संभाव्य है’। मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी और भवानीप्रसाद मिश्र जैसी प्रतिभाएं उनके संपर्क में आकर उद्दीप्त हुई हैं। गांधीवादी काव्य की सबसे बड़ी शक्ति उज्जवल भारतीय परंपराओं का स्वीकार है। इन कवियों ने जीवन और काव्य के माध्यम से स्वातंत्र्य-आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। वस्तुतः हिंदी काव्य के इतिहास में गांधी-विचारधारण से प्रभावित रचनाओं के अनुशीलन के बिना तत्कालीन हिंदी साहित्य के विकास-क्रम को सम्यक् परिप्रेक्ष्य में समझना कठिन होगा। गांधी-विचारधारा के फलस्वरूप ही तत्कालीन कवियों ने शुद्ध, सात्त्विक, सुरुचिपूर्ण एवं स्वस्थ दृष्टिकोण संपन्न कृतियों की सृष्टि की। हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखक ऐसे स्वस्थ साहित्य का सम्यक् मूल्यांकन नहीं कर पाए थे। सर्वप्रथम तो गांधी-विचारधारा को आत्मसात करना ही बड़ा दुष्कर कार्य हैं फिर दूसरा उस विचारधारा को काव्य में अनुम्यूत करना और भी कठिन कार्य है। ऐसे गांधीवादी साहित्य का पूर्वाग्रह से मुक्त मूल्यांकन ही इस ग्रंथ की महत्ता एवं मौलिकता है। गांधीवाद काव्य को कहां, कितना, किस रूप में प्रभावित, मुखरित करता है, लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में यही सब जांचा-परखा है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya (Paperback)
    Ravindra Kalia
    120

    Item Code: #KGP-430

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रवीन्द्र कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Aahang (Paperback)
    Majaz Lakhanawi
    150 135

    Item Code: #KGP-253

    Availability: In stock

    आहंग 
    फैज़, जज़्बी, अली सरदार जाफरी और मख़दूम मुहीउद्दीन जैसे जाने-माने शायरों में मजाज़ की गिनती की जाती है। साज़ो जाम का आशिक़ मजाज़ इनक़िलाब और शमशीर ज़नी की बातें भी करता है। मजाज़ के कलाम में न तो मौलवी के नतक़  की कड़क है, न बाग़ी के दिल की आग बल्कि इसके बरख़िलाफ़ नग़मा सुख़नी की वह अधिकता है जो सुनने वाले को उस दुनिया में ले जाता है जहां शबाब व जमाल की रंगीनियां हैं।
    मजाज़ सिर्फ़ शराब और शबनम की बातें ही नहीं करता वह आज के दौर की ज़रूरतों को पूरा करता हुआ इनक़िलाबी नौजवान भी बन जाता है जिसके सामने रहबरी और सुल्तानी मजबूर और बेकस नज़र आती है। मजाज़ वह शायर है जो सिर्फ़ इनलाब की बात ही नहीं करता, वह इनक़िलाब के तराने भी गाता है।
    मजाज़ ने नौजवानों के दिलों की धड़कन की आवाज़ को सुना भी और उस आवाज़ को अपने सीने में सिमोया और उसके हसीन अल्फ़ाज़ के पैकर में ढाला और फिर शायरी के आहंग में रचाकर यूँ पेश कर दिया कि नौजवानों के दिलों के तार झनझना उठे और वह इसकी लय पर अपने जज़्बात की परवरिश करने लगे।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : S.R. Harnot (Paperback)
    S. R. Harnot
    180

    Item Code: #KGP-7214

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Vaigyanikon Ki Batein (Paperback)
    Shuk Deo Prasad
    50

    Item Code: #KGP-7085

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Katha Aur Samay Ka Sach
    Nirmla Jain
    325 293

    Item Code: #KGP-776

    Availability: In stock

    हिंदी कथा साहित्य में ऐसी अनेक रचनाएं हैं जिन्होंने रचनात्मक उत्कर्ष के कीर्तिमान निर्मित किए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में यह विचित्र लग सकता है कि आज तक कथा आलोचना के सर्वमान्य प्रतिमान निर्मित नहीं हो सके। अनेक वाचिक वैभव संपन्न और विमर्श निष्णात आचार्यों ने असहमति व्यक्त करते हुए भी कविता के प्रचलित प्रतिमानों से ही प्रायः कथा साहित्य का मूल्यांकन किया। इस दिशा में मौलिक कार्य करने का श्रेय जिन आलोचकों को दिया जा सकता है उनमें डा. निर्मला जैन का नाम अग्रणी है। निर्मला जैन ने साहित्य का अनुशासित अध्ययन करते हुए कथा रचना के चित्त व चरित्र को परखने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। आज उनकी प्रतिष्ठा गंभीर, तर्कसंपन्न, आधुनिक व प्रखर आलोचक के रूप में है। ‘कथा और समय का सच’ पुस्तक इस संदर्भ में रेखांकित करने योग्य है।
    यह गौरतलब है कि रचनाकार पर बेजा प्रश्न उठाने के स्थान पर डा. जैन आलोचना के संकट पर बात करते हुए ‘आलोचक का दुःख: बतौर भूमिका’ में लिखती हैं, ‘जाहिर है संकट आलोचक के सामने भी है–विज्ञापनधर्मी भाषिक छल और पैंतरेबाजी से बचते हुए–सही-गलत, अच्छे-बुरे, वास्तविक छद्म, महत्त्वपूर्ण-महत्त्वहीन, जरूरी-गैरजरूरी के बीच अंतर करने का विवेक, और चाहिए मूल्यपरक निर्णय की अभिव्यक्ति का साहस। ऐसे निर्णय से बचने की कोशिश आलोचकीय पाखंड के अलावा कुछ नहीं हो सकती।’
    पुस्तक में प्रेमचंद, निराला, जैनेन्द्र की कहानियों के अतिरिक्त अनेक चर्चित उपन्यासों पर डा. निर्मला जैन ने विस्तृत विचार किया है। महिला कथाकारों के बहाने उत्तरशती के उपन्यासों पर भी चर्चा है। यह पुस्तक कृति का अंतरंग खोलने के साथ पाठक में आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करती है। महत्त्वपूर्ण व मूल्यवान पुस्तक।
  • Pratap Narayan Mishra Rachanavali (4 Volumes)
    Chandrika Prasad Sharma
    1050 945

    Item Code: #KGP-9057

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Krishan Baldev Vaid
    Krishna Baldev Vaid
    70 63

    Item Code: #KGP-9056

    Availability: In stock


  • Parvatiye Lokkathayen
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1935

    Availability: In stock


  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Aakhyaan Mahila Vivashata Ka
    Harish Chandra Vyas
    140 126

    Item Code: #KGP-112

    Availability: In stock

    विगत हजारों वर्षों के इतिहास में किसी भी काल में पुरुष ने नारी की आर्थिक अवस्था की ओर कभी भी ध्यान नहीं दिया और इसी अर्थ-विवशता के कारण नारी की दशा समाज में सदैव हीन बनी रही।
    पाषाण काल से लेकर वर्तमान काल तक नारी की सामाजिक यात्रा अत्यंत दुर्गम, सामाजिक बंधनों, बर्बर अत्याचारों, मर्यादाओं और समाजशास्त्रियों द्वारा खोदी गई विशाल गहरी खाई व बिछाए गए कंटीले झाड़-झंखाड़ों में से होकर 21वीं सदी तक पहुंची है। आज उसी नारी-देह का विज्ञापन और व्यवसायीकरण धड़लले से हो रहा है। नाचने, अंग-अंग की भंगिमाएं दिखाने, मुद्राओं से, स्पर्श से, यौवन से उभार से, जरूरी हो तो सहवास से समाज में कई भयंकर विकृतियां दु्रतगति से उभरकर सामने आ रही है।
    प्रस्तुत पुस्तक के सृजन के पीछे प्रमुख उद्देश्य यह रहा है कि इस विषय पर उत्कंठा रखने वाले नागरिक तथा सामान्य जन वस्तुस्थिति का अवलोकन करें और समाज में फैल रही व्यभिचार की विभीषिका से निजात दिलवाने में अभिरुचि एवं अभिवृत्ति का विकास करें।
    —हरिश्चन्द्र व्यास
  • Saryu Didi
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-1956

    Availability: In stock

    सरयू दीदी
    मैंने फोन मिलाया। गोपाल जोशी सुनाकर सदके में आ गए, 'यह नहीं हो सकता। मैं अभी पता लगाता हूँ।' उन्होंने फोन रख दिया।
    'क्या करूं मनु?' दीदी की आवाज में बेबसी थी। वही तो सदा समझदार रहीं। वही तो हर प्रश्न का उत्तर और हर समस्या का हल ढूंढ़ लेती थीं। पर यहां वह किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी थीं ।  वह उठकर कमरे में टहलने लगीं । 'अभी तो जीवन शुरू ही हुआ था मनु।' दीदी ने हाथ जोड़े ऊपर देखा, आंखें बंद कीं और जोर से बोली, 'हे ईश्वर आप ही माता है आप ही पिता हैं। हे ईश्वर आप ही सबकी रक्षा करने वाले हैं। हे ईश्वर मुझे ठीक सोचने-समझने की शक्ति दीजिए। मुझे बल दीजिए। हे ईश्वर मुझे बल दीजिए।' दो क्षण बाद दीदी की आंखें झरने लगीं। थोडी देर बाद दीदी में शक्ति लौटकर आ गई, 'मनु मैं यब कुछ सह लूंगी। भगवान महान हैं, दयालु हैं।' मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, 'मनु। पापा से पूछो अजीत को लेकर प्लेन कब आ रहा है?' वह उठकर दराज़ में से कूछ खोजने लगीं।
    तभी फोन की घंटी बजी मैंने फ़ोन उठा लिया। उधर फोन पर मां थी, 'मनु अजीत को यहां अपने घर ले आते हैं। वही ठीक होगा। वहीं सरयूजी क्या करेंगी? '
    मैं दीदी से पूछती हूँ। हिम्मत करके मैंने दीदी से पूछा। दीदी ने कहा, 'मनु! अजीत का घर यहीं है, वह यहीं आयेंगे ।'
    मैंने जाकर मां को बता दिया।
    -(इसी उपन्यास से)
  • Chaar Lambi Kahaniyan
    Aruna Sitesh
    200 180

    Item Code: #KGP-9156

    Availability: In stock

    इस संग्रह में प्रस्तुत हैं डॉ. अरुणा सीतेश की चार बहुचर्चित कहानियां, जो धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि में लंबी कहानी अथवा लघु उपन्यास के रूप में प्रकाशित एवं प्रशंसित होकर उनके विभिन्न संग्रहों में सम्मिलित हैं । 
  • Saanch Kahoon To…
    Prabhakar Shrotiya
    35 32

    Item Code: #KGP-9105

    Availability: In stock

    'साँच कहूँ तो' राजस्थानी रासो-कथा पर आधारित स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक नया लीला-नाटक है । इसमें धारा-नरेश भोज परमार की पुत्री राजमती और अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव के विवाह, वियोग एवं पुनर्मिलन की मार्मिक कथा को मारवाड़ और मालवा की लोक-रंग-परम्परा की रंगत के कल्पनाशील प्रयोग से एक दिलचस्प मौलिक नाटक का रूप प्रदान किया गया है ।
    यह नाटक आधुनिक भारतीय रंग मुहावरे की रचनात्मक खोज में लगे प्रतिभावान साहसी रंगकर्मियों को न केवल अपनी ओर आकृष्ट कोमा बल्कि समकालीन हिन्दी नाटय-लेखन एवं रंगकर्म के लिए एक महत्वपूर्ण रचना भी सिद्ध होगा । 
    -जयदेव तनेजा

  • Yada-Kada
    Ramesh Chandra Diwedi
    195 176

    Item Code: #KGP-638

    Availability: In stock

    यदा-कदा
    धर्म, परंपरा और सामाजिक मूल्य-बोधों का मिश्रण पुस्तक की विशेषता है। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और मानवीय मूल्यों के क्षरण की ओर ध्यान आकृष्ट करके लेखक ने अपने दायित्व का निर्वहन किया है। रोचक शैली में लिखी पुस्तक सामान्य पाठक और विद्वत्त समाज दोनों के लिए पठनीय है।                
    -अशोक कुमार नायक (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    एक सहृदय लेखक की संवेदनशीलता, एक सैनिक का अगाध देशाभिमान और भ्रमणशील परिव्राजक के अनुभवों की समधुर अनुगूँज है-‘यदा-कदा’ (निमेष जी की डायरी)। आशा है, पुस्तक विद्वानों और सामान्य वर्ग के पाठकों में समुचित समादृत होगी।
    -प्रो० गिरजाप्रसाद दुबे (म० गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी  )

    सरल और स्पष्ट भाषा में पुस्तक की प्रस्तुति वास्तविकता का सुखद अनुभव है। मनुष्य की प्रकृति की विभिन्नताएँ इस रचना से रूबरू कराने में सफल हैं। शहरी और ग्रामीण जीवन का तुलनात्मक अध्ययन सुंदर है। हमारे पूर्वजों, संतों, धर्मात्माओं द्वारा प्रदत्त शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और भौतिकवादी समाज को आईना दिखाती हैं। विद्वान् लेखक से हम ऐसी ही और रचनाओं की प्रस्तुति की कामना 
    करते हैं। 
    -प्रो० पी० डी० सहारे, डॉ० गीता सहारे (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    डायरी-लेखन की विधा पं० रमेशचन्द्र द्विवेदी (स्वामी श्रद्धानंद) द्वारा हिंदी साहित्य हेतु एक नूतन श्लाघनीय प्रयास है। यायावरी एवं जीवन के गूढ़ तत्त्वों की मीमांसा सहसा सांकृत्यायन जी की स्मृतियों को जीवंत कर देती है। सुधी जन निश्चित रूप से यदा-कदा इस ‘यदा-कदा’ का पारायण करके अपने व्यक्तित्व और राष्ट्र-निर्माण में योगदान देंगे। लेखक निश्चयतः साधुवाद के पात्र हैं। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
    -राकेशकुमार सिंह (वरिष्ठ आचार्य, (अंग्रेजी) इलाहाबाद वि० वि०)
  • Gyarah Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    300 270

    Item Code: #KGP-9322

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्व साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखने वाले कालजयी रचनाकार हैं। अभिव्यक्ति की अनेक विधओं में उन्होंने नवीन प्रस्थान निर्मित किए। भाषा, शैली, विचार और दर्शन को मानवता के विराट प्रांगण में अभिमंत्रित आमंत्रित किया। प्रस्तुत पुस्तक ग्यारह लघु नाटक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की अपूर्व प्रतिभा का प्रकाश एक नए शिल्प में देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध नाट्य लेखक और रंगमनीषी प्रताप सहगल ने ठाकुर की ग्यारह कहानियों को चुनकर उन्हें नाट्य रूप प्रदान किया है। उनके शब्दों में, ‘‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियों में 1940 से पहले के बंगाल का जीवन धडकता है। ...जब इन ग्यारह कहानियों को मैंने चुना तो स्पष्ट रूप से यह बात मन में काम कर रही थी कि मैं इन्हें नाट्य रूप में ऐसे प्रस्तुत करूं कि इनका मूल भाव एवं मूल परिवेश क्षरित हुए बिना ये हमारे समय में भी प्रासंगिक बनी रहें।’’
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये सभी कहानियां बहुत प्रसिद्ध  हैं। कहना तो यह भी उचित होगा कि अनेक रचनाकारों ने इनके छाया-अर्थ से स्वयं को समृद्ध किया है। एक रात, काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, क्षुधित पाषाण और समाप्ति आदि कहानियों के नाट्य रूपांतर से पाठकों और रंगकर्मियों को कुछ सार्थक विकल्प मिलेंगे। प्रताप सहगल ने कहानियों में निहित नाट्य स्थितियों और रंग- संभावनाओं को समझते हुए रूपांतर को समृद्ध किया है।
    पाठकों के लिए तो इन रूपांतरित रचनाओं से गुज़रना एक विलक्षण अनुभव है ही, उन लोगों को भी आनंद की अनुभूति होगी जो मंचन के लिए सुरुचिपूर्ण नाट्यालेखों की खोज में रहते हैं। एक तरह से प्रताप सहगल ने सार्थक नाट्यालेखों की संख्या में वृद्धि की है। यह करते समय उन्होंने मूल संवेदना को अक्षत रखा है। ‘ग्यारह लघु नाटक’ एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Rath-Kshobh
    Deepak Sharma
    80 72

    Item Code: #KGP-1834

    Availability: In stock

    रथ-क्षोम 
    "मरते समय मां ने मुझे बताया, वे मुझे जन्म नहीं देना चाहती था ।"
    "तू अभी बहुत छोटा है । उस बेचारी का दुख नहीं समझ सकेगा ।"
    "मेरा दु:ख कोई दुख नहीं ?" मैं फट पड़ता हूँ "माँ ने मुझे नफ़रत में जन्म दिया, नफरत में बडा किया और फिर कह गईं-मैं एक वहशी की संतान हूँ-बिना यह बताए कि किस वहशी की ।"
    "अपने ताऊ की"
    मैं सन्न रह गया ।
    "मैं तुम्हें बताती हूँ।" काँपती, भर्राई आवाज में ताई ने बताया, "सब बताती हूँ। उस रात इसी तरह मैं उधर लुधियाणे में  भरती थी । मेरा भाई उन दिनों अपनी एल०आई०सी० की नौकरी से लुधियाणे में तैनात था । जब मैं एकाएक उधर बीमार पडी और अस्पताल में दाखिल करवा दी गई, तेरे ताऊजी उसी शाम इधर अपने गाँव से मुझे देखने के लिए पहुँच लिए थे । उन्हीं की जिद थी कि उस रात मेरी देखभाल वहीँ करेंगे । और उसी रात स्नेहंप्रभा की भी ड्यूटी वहीँ थी । बेहोशी और कष्ट की हालत में अचानक अपने प्राइवेट कमरे के बाथरूम के आधे दरवाजे के पीछे से एक सनसनी अपने तक पहुंचती हुई मेरी बेहोशी टूटी तो पशुवत् तेरे ताऊ की बर्बरता की गंध से-सुकुमार स्नेहप्रभा के आतंक की दहल से । पार उधर स्नेहप्रभा निस्सहाय रहने पर मजबूर रहीँ और इधर मैं निश्चल पडी रहने पर बाध्य..."
    "पापा से माँ की शादी इसीलिए आपने करवाईं ?" मैंने थूक निब्बाला ।
    "अस्पताल में मेरी भरती लंबी चली थी और जब स्नेहप्रभा ने अपने गर्भवती हो जाने की बात मुझसे कहीँ थी तो मैँने ही उसे अपनी बीमारो का वास्ता दिया था, अपने स्वार्थ का वास्ता दिया था और लुधियाणे से उसे अपने साथ इधर ले आई थी । सोचा था, जब वह अपने दूसरे बच्चे को जन्म देगी तो मैं इस पहले बच्चे को गोद ले लूँगी । लेकिन तुम्हारी प्रसूति के समय उसे ऐसा आँपेरेशन करवाना पडा, जिसके बाद उसका दोबारा माँ बनना मुश्किल हो गया"
    "पापा को सब मालूम है ?"
    “नहीं । बिलकुल नहीँ । और उसे कभी मालूम होना भी नहीं चाहिए । मेरी खातिर । स्नेहप्रभा की खातिर । "
    -इसी संग्रह की कहानी 'मुडा हुआ कोना' से
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-1
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-847

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-1
    इतिहास अगर अतीत की शव-साधना हो तो ऐसे इतिहास में जाने का हमारा कोई  इरादा नहीं, लेकिन लघुकथा के इतिहास में जाना लघुकथाओं के शवों के बीच से गुजरना भर नहीं है। बेशक एक समय बहुत शक्तिशाली मानी जाने वाली अनेक रचनाएं कालांतर में रचनाओं के शव भर रह जाती हैं और बड़े रचनाकारों की ऐसी शव-रूप रचनाओं को भी साहित्य के आचार्य बहुत समय तक विक्रमादित्य की मुद्रा में ढोते रहते हैं, लेकिन कुछ रचनाएं दीर्घजीवी होती हैं, कालजयी। सदियों पुरानी ऐसी दीर्घजीवी रचनाओं के बीच से गुजरने वाला इतिहास अतीत में समकालीनता की प्रतिष्ठा-पुनर्प्रतिष्ठा का श्रम-साध्य उपक्रम होता है और दुर्भाग्य से हिंदी लघुकथा में यह जरूरी काम अभी तक नहीं हो सका है। और शायद इसीलिए इतनी रचना-बुहलता के बावजूद लघुकथा को विधा का दर्जा अभी तक हासिल नहीं हो सका है। अभी हम विधा और उपविधा के द्वंद्व से ही नहीं निकल पाए हैं। हम लेकिन इस बहस में पड़े बगैर सिर्फ निवेदन यह करना चाहते हैं कि बीसवीं सदी की आंख खुलते हिंदी लघुकथा ने भी आंख-कान खोलकर मुलुर-मुलुर इस दुनिया-जहान को देखना, सुनना और समझना शुरू कर दिया था। बीसवीं सदी के शुरू होने से 20-25 साल पहले लिखी गई भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तिका ‘परिहासिनी’ की चुटकियों को चुटकुला कहकर उड़ा दें और सन् 1900 के आसपास लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ के काल-निर्णय पर मतैक्य न हो सके, ऋषि जैमिनी कौशिक ‘बरुआ’ को बोलकर लिखाई गई माखनलाल चतुर्वेदी की इस लघुकथा की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए तो भी 1901 में लिखी गई माधव सप्रे की लघुकथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से हम हिंदी लघुकथा का आरंभ बेहिचक स्वीकार कर सकते हैं। बीसवीं सदी के खत्म होते न होते हिंदी लघुकथा ने अपनी जड़ और जमीन पर मजबूत तर्कों के साथ जो दावे ठोंक दिए हैं, उन्हें खारिज कर सकना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। हिंदी लघुकथा का अब तक का सबसे बड़ा यह संचयन दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ऐसा गुलदस्ता है, जो हिंदी के प्रांगण में मह-मह महकेगा, देर तक और दूर तक, ऐसी उम्मीद हमें है।
  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Ullanghan (Paperback)
    Bhairav Prasad Gupt
    190

    Item Code: #KGP-1544

    Availability: In stock

    डॉ. एस.एल. भैरप्पा
    (जन्म: 1934)
    पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
    ‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। 
    केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
    देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।
  • Samarpan
    Bhanu Pratap Shukla
    80 72

    Item Code: #KGP-1959

    Availability: In stock

    समर्पण 
    शताब्दियों से साथ-साथ रहने के बावजूद मुस्लिम मानसिकता भारतीय जीवन-दृष्टि से रच-बस क्यों नहीं सकी ? राष्ट्रीय मूल धारा के प्रवाह को और व्यापक न बनाकर उसे संकीर्ण या उससे हटकर अपनी एक अलग धारा बनाने का प्रयास क्यों चलता रहता है ? भारत में इस्लाम के मतानुयायी यहाँ की विविधता में एकता की अवधारणा के अधिष्ठान का अंग क्यों नहीं बन पाते ? हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा जितना गगनभेदी होता है, दिल की दूरियाँ और दरारें उतनी ही गहरी क्यों होती जाती है ? कैसा स्वर्णिम होगा वह दिन जब भारत के सभी नागरिक मुक्तकण्ठ से 'भारतमाता की जय' के उदघोष में ही सर्वाधिक गौरव और प्रेरणा का अनुभव करेंगे । यहीं लालसा इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है । इस पुस्तक में उठाए गए ऐसे तमाम सवालों का बेबाक जवाब मिल जाए और खुले मन से हम उन्हें मान लें तो निश्चित ही उस दिन भारतीय जीवन का सौदर्य अपने पूरे निखार पर होगा । शताब्दियों के संताप से संत्रस्त देश के लिए सहीं, सामयिक और स्थायी विकल्प की तलाश का ही एक नाम है-समर्पण ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Davendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    70 63

    Item Code: #KGP-9052

    Availability: In stock


  • Aranyakaand
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-2012

    Availability: In stock

    अरण्यकाण्ड
    रामकथा के एक अंश पर आधारित आख्यान है अरण्यकाण्ड । आज के संदर्भ में । आज के समय की पूष्ट्रभूमि में जीवन की घटनाओं को जिस आदिकथा के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, वह मनुष्य को
    निरंतर कुरेदती रहती । है यह यात्रा का एक पड़ाव मात्र । छोटा-सा । इस पड़ाव  में कई बार विराम तो आता है किंतु अंतत: यह अंत नहीं है ।
    प्रणव कुमार वंद्योपाध्याय की यह कथाकृति बारंबार पाठक को उद्वेलित करती है । यह कृति प्रस्तुत करती है मनुष्य की तात्कालिक पराजय और मनुष्य की ही जिजीविषा । लेखक की यह कथाकृति समय का एक असमाप्य संबोधन है ।
  • Satta Ke Aar-Paar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    35

    Item Code: #KGP-932

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    -इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Aur Ant Mein Ishu
    Madhu Kankria
    120 108

    Item Code: #KGP-160

    Availability: In stock

    ...और अंत में ईशु
    मधु कांकरिया के प्रस्तुत नव्य कथा-संग्रह की कहानियाँ समसामयिक भारतीय जीवन के ऐसे व्यक्तिव के कथामयी रेखाचित्र हैं, जो समाज के मरणासन्न और पुनरुज्जीवित होने की समांतर कथा कहते हैं । इनमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के वैसे विरोधाभास और वैपरीत्य के दर्शन-दिग्दर्शन होते हैं, जिनसे उत्पन्न विसंगतियों के ही चलते 'दीये तले अँधेरे' वाला मुहावरा प्रामाणिक बना हुआ है।
    आज का जागरुक पाठक सर्जनात्मक कथा-साहित्य में वर्ण और नारी आदि के विमर्शों की अनंत बाढ़ की चपेट में है और ऐसे 'हवा महलों' के संभवत: खिलाफ भी, जो कि उसे ज्ञान जोर संज्ञान के स्तर पर कहीं शून्य में ले जाकर छोड़ देते है । इसके उलट प्रस्तुत कहानियों में जीवन की कालिमा और लालिमा, रति और यति, दीप्ति और दमन एवं प्रचार और संदेश को उनके सही-सही पदासन पर बैठाकर तोला, खोला और परखा गया है । अभिव्यक्ति के स्तर पर विचारों का कोरा रूखापन तारों न रहे, इसलिए लेखिका ने प्रकृति और मनोभावों की शब्दाकृतियों को भी लुभावने ढंग और दुश्यांकन से इन कहानियों में पिरोया है । धर्मांतरण  का विषय हो या कैरियर की सफलता के नाम पर पैसा कमाने की 'मशीन' बनते बच्चों के जीवन की प्रयोजनहीनता ...या फिर स्त्री के नए अवतार में उसके लक्ष्मी भाव और उर्वशीय वांछनाओं की दोहरी पौरुषिक लोलुपताएँ-कथाकार की भाषागत जुलाहागीरी एकदम टिच्च मिलती है। इसे इन कहानियों का महायोग भी कहा जा सकता है ।
    सृजन को जो कथाकार अपने कार्यस्थल के रूप में कायांतरित का देता है, वह अपने शीर्ष की ओर जा रहा सर्जक होता है । विश्वास है कि पाठक को भी यह कृति पढ़कर वेसा ही महसूस होगा। ऐसा अनुभव इसलिए अर्जित हो सका है, क्योंकि ये कहानियाँ जीवन के अभिनंदन पत्र नहीं, बल्कि माननीय अपमान और सम्मान की श्री श्री 1008 भी हैं।
  • Ek Aur Lal Tikon (Paperback)
    Narendra Kohli
    50

    Item Code: #KGP-7099

    Availability: In stock


  • Sahitya Vimarsh
    Jayanti Prasad Nautiyal
    195 176

    Item Code: #KGP-9098

    Availability: In stock


  • Kambakht Nindar
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-793

    Availability: In stock


  • Rachna Ka Jeevdravya
    Jitendra Shrivastva
    600 510

    Item Code: #KGP-9222

    Availability: In stock

    ‘रचना का जीवद्रव्य’ इस दौर के महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव की नई आलोचना पुस्तक है। इस पुस्तक की परिधि में आपातकाल के बाद की हिंदी कहानी का इतिहास है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन की अद्वितीय आत्मकथा का गहन विश्लेषण भी। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब हैं तो विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर भी। जितेन्द्र जिस बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कविता पर विचार करते हैं, उसी बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कथा साहित्य पर भी। वे आलोचना के औजारों को गड्डमड्ड नहीं करते। उनकी आलोचना में गहरी विचारशीलता है। जितेन्द्र श्रीवास्तव जब भी किसी विषय को उठाते हैं, उसे संपूर्णता में समझने-समझाने का उद्यम करते हुए उसे एक सर्वथा नई ऊंचाई भी देते हैं। यह अकारण नहीं है कि उनकी छवि एक विश्वसनीय आलोचक की है। वे भाषा की ताकत को जानते हैं इसलिए भाषिक पारदर्शिता के घनघोर आग्रही हैं। इस पुस्तक में संकलित आलेख भाषिक ताज़गी के अप्रतिम उदाहरण हैं। यह देखना सुखद है कि जितेन्द्र अपने पाठकों को उलझाते नहीं हैं। वे उन्हें वह मार्ग दिखाते हैं जो बिना किसी भटकाव के रचना के जीवद्रव्य तक ले जाता है। कहना न होगा कि जितेन्द्र श्रीवास्तव के बहुप्रशंसित और बहुउद्धृत आलोचनात्मक आलेखों की यह पुस्तक आलोचना के वर्तमान परिदृश्य को निश्चित रूप से संपन्न बनाएगी। 
  • Fantasia (Novel)
    Vaughn Petterson
    495 446

    Item Code: #KGP-605

    Availability: In stock

    Touching on a wide range of different themes, Fantasia on a Theme of Thomas Tallis is a truly compelling read. Throughout the pages of his thought-provoking novel, the author, Vaughn Petterson, presents readers with a vivid portrait of the best and worst that humanity has to offer, inviting them to form their own conclusions about the respective moral weight of our various social folkways and mores. Written in a deeply lyrical style, Fantasia successfully incorporates the transformative media of art, music, and literature as a figurative backdrop for Joe’s personal metamorphosis—highlighting the significance of the arts in helping to change us in ways we could hardly imagine. Petterson also skillfully invokes higher levels of deeper thought in the reader, chiefly by inviting them to consider the deeper spiritual ramifications of the issues with which his characters are forced to contend—issues that rest at the core of our collective existence.
  • Krantikaariyon Ke Geet (Paperback)
    Chandrika Prasad Sharma
    120

    Item Code: #KGP-113

    Availability: In stock


  • Desh-Desh Mein, Gaon-Gaon Mein
    Urmila Jain
    180 162

    Item Code: #KGP-9185

    Availability: In stock

    ब्रिटेन, फ्रांस, लैटिन अमेरिकी तथा विश्व के अन्य अनेक देशों के भूगोल और इतिहास की खाक छानते हुए लेखिका ने अपनी जानकारियों, सूचनाओं के परिचय को तो यहां बढ़ाया ही है, साथ ही वह रवानगीपूर्ण भाषा-शैली में पाठक को भी उस स्थल विशेष की सैर करा पाने में सफल हुई है। विश्व के नक्शे पर चहलकदमी करने का जिस सहजता से मौका लेखिका निकाल लेती है-वह एक ओर तो विश्व-ग्राम की परिकल्पना को संभव बनाता प्रतीत होता है तथा दूसरी ओर ये वृत्तांत आम पाठक को वैसा ही करने को अधीर बनाते हें। किसी भी साहित्यिक रचना का यही सर्जनात्मक अवदान होता है, जो इस पुस्तक में पर्याप्त रूप से मयस्सर हुआ है। 
    डाॅ. उर्मिला जैन की इन यात्राओं में एक और बात उल्लेखनीय है कि वह नारी-मन के साथ, भारतीय मानसिकता की सांस्कृतिक-सामाजिक ऊंचाइयों को लेकर यात्रा करती हैं और इसीलिए पाठक को वह उन चुनिंदा पर्यटक-स्थलों या भूगोल के जाने-अनजाने कोने-अंतरों में ले जा पाई हैं, जहां आधुनिक विश्व के मनुष्य का (और खास तौर से नई नारी का) निर्माण हो रहा है। कृति में यात्रा के रोमांचक क्षण भी जहां-तहां आते हें और उनकी लोकमहर्षक प्रतिध्वनियां पाठक के मस्तिष्क में देर तक गूंजती रहती हैं।
    यह किताब उन यात्रापसंद पर्यटकों के लिए भी प्रेरणादायिनी सिद्ध होगी, जो किन्हीं संकोचवश अपने यात्रानुभवों को शब्दांकित करने से स्वयं को बाधित किए हुए हैं।
  • Shankar Shesh : Samagra Naatak (3 Vols.)
    Shanker Shesh
    1600 1440

    Item Code: #KGP-725

    Availability: In stock

    शंकर शेष: समग्र नाटक (3 खण्डों में)
    डॉ. शंकर शेष हिंदी नाट्य साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। पार्थिव शरीर से हमारे साथ न होते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से वे निरंतर अपने पाठकों के मन में रहते हुए एक संवाद में लीन अनुभूत होते हैं। 
    डॉ. शेष ने लगभग बीस पूर्ण अंकी नाटक, एकांकी, उपन्यास और कुछ लेख आदि लिखकर साहित्यिक जगत् में जितनी प्रतिष्ठा अर्जित की, चलचित्र जगत् में पटकथा लेखक के रूप में वे उससे कम चर्चित नहीं रहे, बल्कि उनकी विशेषता रही कि उन्होंने सिनेमा जगत् में कम काम किया, किंतु उसके लिए कोई समझौता नहीं किया।
    प्रस्तुत ‘शंकर शेष: समग्र नाटक’ (तीन खंड) में उनके प्रकाशित-अप्रकाशित सभी नाटक-एकांकी संकलित हैं। केवल शेष वही रहा है, जिसका रूप इतना अधूरा था कि उसे पूरा करते तो फिर वह डॉ.  शेष का न रहकर संशोधक या पूरा करने वाले का हो जाता।
    डॉ.  शेष के जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ उनकी रचनाधर्मिता में भी वह उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है और वह व्यक्ति जितना सहज था, इसका प्रमाण भी उनकी रचनाओं में बिखरा पड़ा है। प्रस्तुत तीन खंडों में उनका नाटककार रूप संश्लिष्ट होकर पाठक के सामने आता है। 
    हमें आशा ही नहीं, विश्वास है कि इन खंडों में पाठकों को शंकर शेष की रचनात्मकता के कई स्तर और आयाम मिलेंगे।
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Rameshchandra Shah
    Krishna Dutt Paliwal
    240 216

    Item Code: #KGP-698

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    250 225

    Item Code: #KGP-16

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अमृता प्रीतम
    पंजाबी और भारत के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में से एक, अमृता प्रीतम के साक्षात्कारों की यह किताब हमें उस अमृता से मिलाती है, जिसकी जात उसके ज़माने के हर दु:ख का आईना है । यह दु:ख चाहे निजी हो या दुनिया के किसी भी समाज में किसी भी इंसान का । यह भी ज़रूरी नहीं कि इसका संबंध उसके समय से हो । अत्याचार दूर कहीं अतीत में भी किसी के साथ हुआ हो, तो वह युगों और सदियों के फासले पर भी उसकी पीड़ा अपने भीतर महसूस करती है । इसी तरह अपने गम में उन्हें अपना साथी मानकर उनसे अपना दर्द बाँटती है । समकालीन साहित्यकारों के साथ, इतिहास के साथ, सूफियों के साथ अमृता ने जो बातचीत की है, उसमें समय या सोच का कोई फासला कहीं प्रतीत नहीं होता । यह किताब अमृता के जीवन के समस्त पहलुओं को अपने में समेटे हुए है । और आगाज़ से अंजाम तक अमृता के जीवन और सृजन का आईना बनकर अब आपके हाथों में है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha
    Vijaydan Detha
    200 180

    Item Code: #KGP-94

    Availability: In stock


  • Gujrat : Sahakarita, Samaj Seva
    Neelam Kulshreshtha
    420 357

    Item Code: #KGP-599

    Availability: In stock

    गुजरात गांधी जी, सरदार पटेल, विक्रम साराभाई परिवार, अमूल डेरी, अपनी सहकारिता व औद्योगिक प्रगति के कारण जाना जाता है लेकिन ये बड़े-बड़े नाम हैं । समाज के उत्थान के लिए अनेक लोग अपनी आत्मा में नन्हे-नन्हे दीप संजोए बैठे हैं, गांधी जी के व साहित्यिक मूल्यों को अपने जीवन में जीते हुए । यदि अन्य प्रदेश प्रगति करना चाहते हैं तो इस समृद्धतम प्रदेश गुजरात से संबंधित निम्न बिंदुओं का विश्लेषण करें जिनसे समाज के भौतिक ही नहीं ,मानवता के विकास के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
    ० वडोदरा के महाराजा सयाजीराव तृतीय के शासनकाल की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की जा सकती है। उनकी दी हुई परंपरा के कारण ये शहर 'कलाकारों का मक्का' कहलाता है। लेखिका इसे 'सिटी ऑफ इंटरनेशनल 'सोल्स' कहती हैं ।
    ० गांधी जी की प्रेरणा से भारत  द्वितीय महिला संगठन  'ज्योति संग' की स्थापना हुई व सन् 1920 में एक स्त्री अनुसूइया साराभाई ने टेक्सटाइल मिल की भारत की सर्वप्रथम सबसे वृहद ट्रेड यूनियन संगठित की ।
    ० विश्व भर में लोकप्रिय होती जा रही लोक अदालत को  श्री हरिवल्लभ पारिख ने रंगपुर (क्वांट) स्थित आनंद  निकेतन आश्रम में जन्म दिया  ।
    ० मैग्सेसे पुरस्कार विजेता इला भट्ट की 'सेवा' संस्था सेल्फ एम्प्लॉयड वीमन एसोसिएशन आज़ भी अपनी तरह की विश्व की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है । 
    ० विश्व में संभवतः एकमात्र उदाहरण है यहाँ के शहरों व गांवों में फैला पुस्तकालयों के नेटवर्क का संगठन 'गुजरात पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल' ।
    ० एशिया में सहकारी बैंक अन्योन्य बैंक, महिला सहकारी बैंक व उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करने वाली जागृत ग्राहक संस्था सर्वप्रथम यहीं संगठित हुई ।
    ० डॉ. जी. एम. ओझा ने भारत ही नहीं, एशिया में भी पर्यावरण संरक्षण की संस्था 'इनसोना' सन् 1975 में यहीं स्थापित की ।
    ० श्री सूर्यकांत पटेल का चालीस एकड़ जमीन में बनाया विश्वविख्यात फार्महाउस वडोदरा में है। 
    ० भारत में महाराष्ट्र में दो, सिर्फ गुजरात में ही तीन स्टॉक एक्सचेंज हैं जहाँ सभी राज्यों से अधिक पैसे का निवेश होता है ।
    ० विकलांगों द्वारा संस्था बनाकर विकलांगों की सहायता के उदाहरण अन्य प्रदेशों में दुर्लभ हैं । 
    ०  'गुजराती नी गजी नो तडियो भा तो नथी' इस कहावत का अर्थ जानिए इस पुस्तक से ।
    ० अस्मिता : गुजरात से एक साहित्यिक आंदोलन' इस पुस्तक से जानिए क्यों 'एक्सेल गुप्त इंडस्ट्रीज' में  प्रबंधन व मज़दूरों का कभी झगड़ा नहीं हुआ ।
    ० विश्यविख्वात आर्कीटेक्ट कर्ण ग्रोवर, जिनके हैदराबाद में बनाए सोहराबजी ग्रीन बिजनेस सेंटर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ग्रीन बिल्डिंग घोषित किया गया है, व उनके साथियों द्वारा स्थापित हेरिटेज ट्रस्ट के प्रयासों से चांपानेर को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है । ग्रोवर जी की नई उपलब्धि है कि उनकी बनाई बी एन एमरो बैंक को भी विश्व की पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ इमारत घोषित किया गया है । 
    ० यदि किसी शहर का उत्थान करना है तो वडोदरा की स्वयंसेवी  संस्थाओं ‘बड़ौदा सिटिजंस काउंसिल' व 'यूनाइटेड वे ऑफ बड़ौदा' को समझना होगा ।
  • Dushyant Kumar Rachanavali (Four Vols.)
    Vijay Bahadur Singh
    2250 2025

    Item Code: #KGP-834

    Availability: In stock

    Complete Set of 4 Volumes.
  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

    Availability: In stock


  • Shake-Up India (Paperback)
    Jayant V. Narlikar
    245 221

    Item Code: #KGP-331

    Availability: In stock

    The need of The Times 
    India has lived over sixty years of its independence, but it still seems to be floating rudderless. It does not know what to accept and what to discard.
    The well known Astrophysicist and science writer Jayant V. Narlikar provides in this significant work well thought out ideas in various life and work-areas for us to take up in right earnest and do the needful to build up the nation as well as our own lives.
    He is a rare Indian who writes science fiction which is closer to the truth. A few of his ideas have already come true. Like the social problems created by the possibility of knowing the sex of the child while in the womb which he wrote up in a story in the 1970s.
    The shake-up and change are caused by The likes of These meteors:
    • ‘India that is Bharat…..’ – Why two names?
    • Get rid of the scientifically rejected superstitions.
    • No more Ramans, Boses, Sahas – Why?
    • Ignoring higher education–Why?
    • Science is significant, develop its temper.
    • Come out of the population trap.
    • Don’t litter, clean up your surroundings, it’s easy.
    • Technology is for the 21 st century.
    • Teach astronomy in schools; it will develop students’ minds.
    • Be professional in achieving your goal.
    • Media must come forward in presenting science to the masses.
    • Take a leaf out of the life of Michael Faraday.
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Mere Saakshatkaar : Mridula Garg
    Mridula Garg
    225 203

    Item Code: #KGP-870

    Availability: In stock


  • Yugdrashta Shivaji
    Shashi Bhushan Singhal
    280 252

    Item Code: #KGP-288

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि ने खूब कहा है—
    ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। 
    कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ 
    महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे।
    आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।
    यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।
    उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।
  • The Story Of My Experiments With Truth (Autobiography)
    Mahtma Gandhi
    695 626

    Item Code: #KGP-576

    Availability: In stock

    A face we see all around us… everyday, even if we do not visit government offices. Teachings people swear by and entertained to in films. We still see his style being imitated in the political circles—that is Mohandas Karamchand Gandhi. One of the influencers of the millennium, the ‘half naked’ Indian man who shook the mightiest empire of the modern world, has a story to tell—his story. 
    An autobiography of Gandhi, the book starts with his birth, and ends with his experiences till 1921. The original manuscript was written in weekly installments in Gujarati by Gandhi, and was published weekly in his journal Navjivan from 1925 to 1929. It was later translated by Mahadev Desai in English, which too was published in installments in his other journal Young India.
    Unlike most autobiographies or biographies, Gandhi’s autobiography speaks about his fears, regrets, failures, struggles, and all that went through his mind while initiating and going through the experiments he conducted, in his and his immediate family’s lives. Gandhi hides nothing from his readers; he wants his experiences and experiments to reach out to people so that their life becomes worth living.
    Gandhi, through his lucid and simple style of writing, honest opinions, and candid narrations, takes us to the man who was ‘mahatma’ in his thoughts and actions.   
  • Pratidin (3 Vols.) (Paperback)
    Sharad Joshi
    750

    Item Code: #KGP-7107

    Availability: In stock

    प्रतिदिन (तीन खंड)
    शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
    सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
    शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
    आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी 
  • Naav Doobne Se Nahin Darati
    Leena Malhotra
    200 180

    Item Code: #KGP-423

    Availability: In stock

    कभी-कभी तो ऐसा लगता है, प्रगतिशील कवियों ने बात-बात पर तन जाने वाली जो बेटियाँ साहित्य को दीं, बड़ी होकर वे सब लीना-जैसी (मीठी फटकार लगाने और सात्त्विक आक्रोश दिखाने में निपुण) स्त्री-कवि बन गईं। 
    लीना और फटकार? एक झलक में बात बनती नहीं जान पड़ती! इतनी संजीदा लड़की और फटकार? ये तो भरमुँह किसी से बोलतीं भी नहीं। ये नहीं बोलतीं पर इनकी कविताएँ तो बोलती हैं न-आपके मन पर पड़ी सब चट्टानों की आखिरी परत तक से इनका दो-टूक संवाद हो जाता है, और उनकी फॉसिलों में दबके पड़े स्नेह के सोते एकदम से फूट जाते हैं। 
    एक महीन अर्थ में प्रायः सारी कविताएँ राजनीतिक हैं-हर अन्याय को तमाशे की तरह देखते, आपके ही भीतर छुपे उस टुच्चे आदमी को धता बतातीं कविताएँ जिसे एक प्रगतिसिद्ध कवि बरजता रहा था: कभी अभिधा, कभी व्यंजना, कभी लक्षणा में! लीना में व्यंजना का स्वर अधिक प्रबल है और सबसे बड़ी बात ये है कि शायद ही कहीं वे इकहरी होती हैं! लीना-जैसी सांद्र ऐंद्रिकता की प्रेम- कविताएँ भी कम ही स्त्री-कवियों ने लिखी हैं। स्त्री-नागरिकता और स्त्री-फैंटेसी के अनेक रंग आपको इस संग्रह में एक साथ मिलेंगे।  
    -अनामिका
  • Kavi Ne Kaha : Arun Kamal
    Arun Kamal
    190 171

    Item Code: #KGP-380

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: अरुण कमल
    यहाँ जो कविताएँ संकलित हैं वे मेरी सभी चार प्रकाशित कविता-पुस्तकों एवं आने वाली पुस्तक से ली गई हैं। कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो इन पुस्तकों के बाहर की हैं जो लिखी तो पहले गईं परंतु जिनका समावेश नहीं हो सका। ये कविताएँ मैंने खुद चुनी हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाकी कविताएँ जो यहाँ नहीं हैं वे इनसे हीनतर हैं या उनसे मेरा स्नेह कम है। हो सकता है कुछ लोगों को वे ही अधिक पसंद आवें। चाहिए तो यह कि किसी भी कवि की सभी रचनाओं को यानी पहली से लेकर अब तक एक साथ पढ़ा जाए। तब जाकर चित्र पूरा होता है क्योंकि कोई भी एक कविता अपने में पूरी नहीं होती, उसकी नाल किसी पिछली में होती है और मंजरी आगे बहुत दूर चलकर दिखलाई पड़ती है। इसलिए कई बार ओझल रह जाने वाली कविताएँ ध्यान देने पर बहुत महत्त्वपूर्ण लगती हैं।
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Bhartiya Vangmay Per Divyadrishti
    Kashiram Sharma
    400 360

    Item Code: #KGP-9137

    Availability: In stock

    भारतीय वाड्मय का एक बहुत बड़ा भाग चार महास्तंभों पर आरित है। वे हैं: रामायण, पुराण और बड्ढकहा (बुहत्कथा)। सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकारों ने आदिकाव्य रामायण, जयकाव्य महाभारत और पुराणों को अपना उपजीव्य बनाया है। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पर्याप्त वाड्मय ‘बड्ढ कहा’ पर भी आश्रित है। अतः इन चार महास्तंभों का सम्यक् परिचय प्राप्त किए बिना भारतीय वाड्मय का सुचारु अध्ययन संभव नहीं है। इस बात को तो लोग प्रायः स्वीकृत कर लेते हैं कि भारतीय वाड्मय भवन का बहुत बड़ा भाग इन चार स्तंभों पर टिका है पर ये महास्तंभ किस ‘घातु’ के बने हैं, यह जानारी बहुत ही कम लोगों को है। इस पुस्तका में उस धातु का परिचय कराने का विनम्र प्रयास है। वह धातु क्या है और उसका उद्गम स्थान कहा हैं, यह भी बताने का प्रयास किया गया है।
  • Ek Nirvasit Maharaja
    Navtej Sarna
    425 383

    Item Code: #KGP-642

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    160 144

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Namvar Hone Ka Arth
    Bharat Yayavar
    500 450

    Item Code: #KGP-9012

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
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    भारत यायावर
  • Shrikant (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300

    Item Code: #KGP-201

    Availability: In stock


  • Pashchatya Kavya Shastra Ka Itihas
    Dr. Tarak Nath Bali
    395 356

    Item Code: #KGP-864

    Availability: In stock


  • Saakshi
    Bhairppa
    295 266

    Item Code: #KGP-875

    Availability: In stock

    यह उपन्यास 1986 की सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ कृति के रूप में स्वीकृत होकर 'ग्रंथलोक' पुरस्कार से सम्मानित।
  • Keral Ka Krantikari
    Vishnu Prabhakar
    120 108

    Item Code: #KGP-1195

    Availability: In stock


  • Andher Nagari : Srijan-Vishleshan Aur Paath
    Ramesh Gautam
    80 72

    Item Code: #KGP-9131

    Availability: In stock


  • Aagaami Ateet (Paperback)
    Kamleshwar
    70

    Item Code: #KGP-7068

    Availability: In stock


  • Sant Naamdev
    Hari Krishna Devsare
    120 108

    Item Code: #KGP-9324

    Availability: In stock

    नामदेव महाराष्ट्र के संतों में सबसे वरिष्ठ थे। मराठी भाषा में ‘अभंग’ नामक छंद में रचना करने वाले प्रथम संत कवि नामदेव ही थे। उनका कार्यक्षेत्र केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपनी भक्ति-रचनाओं ‘अभंगों’ के द्वारा उत्तर भारत में पंजाब तक भक्ति-मार्ग का प्रचार किया। माधव गोपाल देशमुख लिखते हैं ‘‘नामदेव एक सामासिक शब्द है और उसका अर्थ है नाम ही देव है।’’ संत नामदेव ने अपनी संपूर्ण रचना में नाम ही महिमा जितने ढंग से और जैसे वर्णन की है, वह शायद ही किसी और संत ने की हो-
    नाम में ही नारायण है। वह भक्तों के अधीन है।
    भक्ति न मांगकर। नाम में ही चारों मक्ति हैं।
    नाम न भूलो। वही स्वर्ग में निशान है।
    नामा कहते हैं ऐसे प्राणी। नारायण में जाकर समान हो जाते हैं।

    जो वाणी से नाम लेता है, उसे यमदेव वंदन करते हैं।
    कालादिक उसे समान रूप से वंदन करते हैं।
    ऐसा नाम श्रेष्ठ है सबमें वरिष्ठ है।
    (नाम के) अच्छे उच्चारण से स्वर्ग गूंजता है।
    उस नाम-महिमा का वर्णन ब्रह्मा करने गए।
    उन्हें आदि-अंत की उपमा ही नहीं सूझी
    नामा कहता है कि पाठ से, नामा की ही राह से 
    प्रत्यय प्रकट होता है विट्ठल हरि।।

    —इसी पुस्तक से
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan (Paperback)
    Surendra Tiwari
    295

    Item Code: #KGP-252

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे। (भूमिका से)
  • Shrikant
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    600 540

    Item Code: #KGP-764

    Availability: In stock


  • Kahani Samgra : Govind Mishra (1st Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1581

    Availability: In stock


  • Ye Galion Ke Bachche
    Rekha Rajvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9119

    Availability: In stock

    इस किताब में गलियों के बच्चों की कहानियां, कहानियां नहीं बल्कि एक कड़वा सच है । बेतरतीब बिखरे पन्नों को समेटकर इन बच्चों के जीवन की वास्तविकता को सबके समक्ष लेन का इसमें प्रयास किया गया है । छह अध्यायों के माध्यम से इन बच्चों की जीवनगाथा को सुधी पाठकजनों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है । 
    यह अध्याय गलियों के बच्चों की समस्याओं को उजागर करने के लिए किया गया छोटा-सा प्रयास है । 
  • Bazmey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    200 180

    Item Code: #KGP-165

    Availability: In stock

    बज्मे-ग़ज़ल
    उर्दू अदब में ग़ज़ल का क्षेत्र जितना व्यापक है, उतनी ही बडी तादाद उन शाइरों की भी  जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाया ।
    गजल शब्द के अर्थ से आज लगभग सभी परिचित है, लेकिन आज के परिवेश में ग़ज़ल की परिभाषा बदली हुई दिखाई दे रही है । इस संकलन को तैयार करते हुए यह प्रयास रहा है कि ग़ज़ल के शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त, इसके बदले हुए रूप को भी पाठकों के सन्मुख रखा जाये। इसीलिए 'बज्मे-गजल' में संगृहीत ग़ज़लें कभी परम्पराओं में बंधी नज़र आयेंगी, तो कभी इनका रूप आज़ के ज़माने को छूता हुआ दिखाई देगा ।
    उर्दू गजल आज जिस बुलन्दी पर पहुंच चुकी है, साहित्य की किसी दूसरी विधा का यहा तक पहुंच पाना शायद सम्भव नहीं; क्योंकि  गजल कहीं नहीँ जाती, बल्कि खुद-ब-खुद हो जाती है । ग़ज़ल सिर्फ इल्तिजा ही नहीं करती, ऐलान भी करती है, समझोता करना ही नहीं सिखाती, अधिकार प्राप्त करने के लिए लड़ना भी सिखाती है तथा सिर्फ फूल ही नहीं, अंगारे बरसाने का हौंसला भी देती है ।
    इस संकलन से जहां अनेक पुराने शाइरों की गज़लें दी जा रही हैं, वहीं कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी मौजूद हैं, जो आज लोगों के दिलों में घर कर रहे हैं।
  • Vigyan Ka Itihaas
    Dyanand Pant
    300 270

    Item Code: #KGP-748

    Availability: In stock

    विज्ञान का इतिहास
    विज्ञान की अद्भुत प्रगति विश्व-भर के चिंतकों और कर्मठों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफलन है। धर्म, देश, जाति, भाषा आदि की सीमाएँ विज्ञान को बाँध न सकीं। प्रस्तुत पुस्तक में इसी सार्वभौम विज्ञान की समग्र गाथा का रोचक वर्णन है। आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव की विलक्षण उपलब्धियों वाली इस विश्वव्यापी बौद्धिक यात्रा का लेखा-जोखा बिना पूर्वग्रहों के प्रस्तुत करने और पाश्चात्य लेखकों के पक्षपातपूर्ण प्रतिपादन का पर्दाफाश करने का लेखक का प्रयत्न सराहनीय है।
    जनसाधारण सुलभ भाषा और रोचक शैली में लिखी अपने विषय की हिंदी की यह प्रथम मौलिक पुस्तक ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ पाठक में चिंतन और तर्क की वैज्ञानिक विधि के विकास में भी सहायक होगी।
  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan (Paperback)
    Mukesh Parmar
    90

    Item Code: #KGP-1306

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधरस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Mere Saakshatkaar : Manager Pandey
    Manager Pandey
    125 113

    Item Code: #KGP-541

    Availability: In stock


  • Raashtra Aur Musalman
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-172

    Availability: In stock

    समय की छाती पर खड़ा मुसलमान आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। ‘मुसलमानों’ को लेकर इतना कुछ कहा जा रहा है कि स्वयं मुसलमान भी इस चर्चित मुसलमान के बारे में नई-नई सूचनाएं सुनने की जिज्ञासा रोक नहीं पाता है।
    वह क्या है? वह कौन था? उसका भविष्य क्या होगा? इस विषय पर वार्तालाप के द्वारा अनेक नए-नए नजरिए, खबरें और ऐतिहासिक पृष्ठीाूमि की पर्तें रोज सामने लाई जा रही हैं। बहुत कुछ छप रहा है।
    इस किताब में मुसलमान एक आम आदमी की तरह अपनी खूबी और कमजोरी के साथ मौजूद है। वह स्वयं अपनी बात कहने में सक्षम हे, इसलिए वह किसी बड़े नाम के सहारे या धार्मिक नेताओं के बल पर आगे नहीं बढ़ता है। 
    जो सच है, वह सामने है। उसको स्वीकार करना या न करना पढ़ने वालों की अपनी दृष्टि एवं सामाजिक अवलोकन पर निर्भर है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Cour (Paperback)
    Ajeet Kaur
    175

    Item Code: #KGP-7010

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजीत कौर
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरों वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिडिया’ , 'चीख एक उकाब की हैं' तथा 'नया साल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kosh Vigyan (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    150

    Item Code: #KGP-7076

    Availability: In stock


  • Ritusamhaar (Paperback)
    Kaalidas
    195

    Item Code: #KGP-7035

    Availability: In stock

    ऋतुसंहार
    प्रेम, सौंदर्य, भक्ति, मर्यादा, कला व संस्कृति के सम्मिश्रण का दूसरा नाम है—कालिदास। स्थान व काल के संदर्भ में अपने को अपरिचित रखकर जिसने अपनी कृतियों के माध्यम से, विषयवस्तु के साथ-साथ भारतवर्ष की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक गरिमा और भौगोलिक सौंदर्य से हमें सुपरिचित कराया, वह आज किसी एक काल व एक स्थान का कवि न होकर, सार्वकालिक विश्वकवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है।
    उसी महाकवि की एक छोटी-सी काव्यकृति है—‘ऋतुसंहार’। इसमें सचित्रा षड् ऋतु वर्णन के परिपार्श्व में तदनुरूप स्त्री-पुरुष के प्रेम और सौंदर्य-भोग का श्रृंगारिक चित्रण हुआ है।
    इस त्रैभाषिक पुस्तक की विशेषता एक तो यह है कि सामान्य हिंदी पाठक हिंदी रूपांतर द्वारा कालिदास के काव्य-सौंदर्य एवं प्रेम की अनुभूति प्राप्त करेंगे, दूसरी यह कि संस्कृत जानने वाले संस्कृत मूल का भी रसास्वादन कर सकेंगे। तीसरी विशेषता यह कि अंग्रेजी अनुवाद से आधुनिक पाश्चात्य प्रेमी भी भारत की संस्कृति की सरसता से परिचय पा लेंगे।
    इस चित्रात्मक कृति की सर्वोपरि विशेषता भी है। वह यह कि यह पुस्तक गृहस्थाश्रम में कदम रखने वाले युवक-युवतियों के लिए पठनीय है और मित्रों एवं सखियों को विवाहोत्सव पर भेंट करने के लिए इसे खास तौर से तैयार कराया गया है।

  • Nirakaran (Paperback)
    Bhairppa
    70

    Item Code: #KGP-7094

    Availability: In stock


  • Jigyaasa
    Bhairppa
    250 225

    Item Code: #KGP-214

    Availability: In stock


  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Sabha Parv
    Badiuzamma
    300 270

    Item Code: #KGP-2040

    Availability: In stock

    सभापर्व 
    जो कहानी महाभारत के 'सभापर्व' से शुरू हुई वह आज भी पूरी नहीं हुई । छोटे-से शहर गया के एक मोहल्ले से शुरू होकर ये उपन्यास इतिहास का सैकडों साल का सफर तय करता है-वह इतिहास जो न चाहते हुए भी हममें जिदा है और हमारे दिले-दिमाग पर हावी है ; वह इतिहास जो बजाहिर तो बदलता है लेकिन दरअसल सिर्फ अपने-आप को दोहराता है । सतह के नीचे सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि था । धर्म बदले, सिद्धान्त बदले, सत्ता के लिए जद्दोजहद के तरीके बदले लेकिन सत्ता का बुनियादी स्वरूप नही बदला । बनी हाशिम-बनी उमय्या; शीया-सुन्नी, हिन्दू-मुस्लिम, बौद्धधर्म-ब्राह्यणवाद…संघर्ष के मुखोटे बदलते रहते हैं, इंसानी प्रवृत्ति नहीं बदलती । सैकडों साल के सफ़र के दौरान ये उपन्यास समाज के विभिन्न वर्गों का एक जायजा लेता है । घर, कबीले और मुल्क के नक़्शे, और इंसानी ताल्लुकात का बनना- बिगडना न बदलने वाली मानसिकता की पहचान है । यह ऐसी मानसिकता है जिससे हजार साल की नफ़रत, लगाव, तजूर्बात परत-दर-परत जिन्दा हैं ।  इसमें श्रीकृष्ण के कालिय दमन, महात्मा बुद्ध की धर्म विजय और सूफियों के चमत्कार-सब की याद बाकी है । 'सभापर्व' इसी मानसिकता की खोज और पहचान है ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra (Paperback)
    Govind Mishra
    90

    Item Code: #KGP-7229

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गोविन्द मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'जनतंत्र', 'फांस', 'सिर्फ इतनी रोशनी', 'सुनंदो की खोली', 'खुद के खिलाफ', 'युद्ध', 'खाक इतिहास', 'पगला बाबा', 'वरणांजलि' तथा 'मायकल लोबो' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shakti Se Shanti
    Atal Bihari Vajpayee
    300 270

    Item Code: #KGP-9021

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति

    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।

    जाइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।

    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है । [इसी पुस्तक से]
  • Saptam Abhiyaan
    Sunil Gangopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-2009

    Availability: In stock

    सप्तम अभियान
    अपनी की आकांक्षाएँ, लिप्साएँ उसे कहाँ से कहाँ तक पहुँचा देती हैं इसका जीवंत चित्रण 'सप्तम अभियान' में सुनील गंगोपाध्याय ने किया है । आपसी द्वंद्व, घृणा, कुंठा, अतृप्ति आदि से भागकर आदमी प्रेम और सहयोग की तलाश करता है, दर-दर भटकता है, परन्तु अन्तत: पाता है कि हर जगह एक-सी ही स्थितियाँ व्यक्ति और समाज को घेरे हुए है । छोटे-छोटे स्वार्थ से लेकर बड़ी-बड़ी महत्त्वकांक्षाओं की पूर्ति तक मनुष्य को क्या-क्या नहीं करना पडता, कैसे-कैसे रूप नहीं धारण करने पडते ? व्यक्ति के अन्तरमन की इन्हीं उलझनों को दर्शाता है यह उपन्यास ।  साथ ही यह भी कि मनुष्य जीवन में असफलताओं का दौर चलता ही रहता है किन्तु व्यक्ति अगर साहस न छोडे, प्रयास-विमुख न हो तो सफलता उसको मिलती ही है, वह अपने अभियान में सफल होता ही है ।
    साहित्य अकादमी से पुरस्कृत बंगला लेखक सुनील गंगोपाध्याय का एक ऐसा रहस्यात्मक और रोमांचक स्थितियों से भरपूर उपन्यास जिसे बीच में छोड पाना किसी भी पाठक के लिए असंभव है ।
  • Sense And Sensibility (Paperback)
    Jane Austen
    125

    Item Code: #KGP-363

    Availability: In stock

    Sense and Sensibility, published in 1811, was Jane Austen's first published novel, which she wrote under the pseudonym "A Lady".
    The story is about Elinor and Marianne, two daughters of Mr Dashwood by his second wife. They have a younger sister, Margaret, and an older half-brother named John. When their father dies, the family estate passes to John, and the Dashwood women are left in reduced circumstances. The novel follows the Dashwood sisters to their new home, a cottage on a distant relative's property, where they experience both romance and heartbreak. The contrast between the sisters' characters is eventually resolved as they each find love and lasting happiness. Through the events in the novel, Elinor and Marianne encounter the sense and sensibility of life and  love.
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Nand Kishore Aacharya
    Krishna Dutt Paliwal
    175 158

    Item Code: #KGP-2018

    Availability: In stock

    पत्र-संवाद  : अज्ञेय और नंदकिशोर आचार्य
    अज्ञेय जी ने पुराने-नए लेखकों को अनगिनत पत्र लिखे हैं। यहीं मैंने नंदकिशोर आचार्य और अज्ञेय के पत्रों को एक साथ दिया है। इन पत्रों का मूल स्वर आत्मीयता से भरा-पूरा है। सार संक्षेप यह कि एक-दूसरे के प्रति स्नेह, आदर का इन पत्रों में एक संसार है। आचार-विचार में मतांतर रहते हुए भी आत्मीय संबंधों की मिठास में कोई कमी नहीं है।
    अज्ञेय जी की अंतरंगता तो बहुतों से रही लेकिन नंदकिशोर आचार्य से उनकी अंतरंगता की कोई सीमा नहीं रही। कभी यात्रा के बहाने, कभी शिविर के बहाने, कभी कार्यक्रमों की योजना के बहाने, कभी व्याख्यान माला के बहाने, कभी कार्यक्रमों में प्रतिभाशाली युवकों को आमंत्रित करने के बहाने अज्ञेय का अकेलापन नंदकिशोर आचार्य से भराव पाता रहा। इस दृष्टि से आचार्य उनके जीवन के 'कीमती' सखा रहे हैं।
    इन पत्रों की कथ्य-कला का सौंदर्य निजता के परम क्षणों का विस्तार है। इस विस्तार ने ही अज्ञेय जी और आचार्य जी के बीच एक अटूट संवाद-सेतु निर्मित किया है । -संपादक
  • Kavi Ne Kaha : Malay
    Malay
    190 171

    Item Code: #KGP-730

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी  ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...। (‘हरी दूब पर क्षण भर’ से)
    - नंदकिशोर नवल
  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Mahaan Vyaktitva Jin Par Hamain Garv Hai
    Pravesh Chaturvedi
    480 432

    Item Code: #KGP-448

    Availability: In stock


  • Ibne Mariyam
    Nasera Sharma
    240 216

    Item Code: #KGP-17

    Availability: In stock

    इब्ने मरियम 
    'इब्ने मरियम' की कहानियाँ निश्चय ही यह प्रमाणित करने में सक्षम हैं कि नासिरा शर्मा का रचनात्मक कैनवास व्यापक है । वह किसी भी तरह अपने दायरों में सिमटी-सिकुड़ी एकरसता में डूबी कहानियां नहीं लिखतीं । उनके पास वास्तव में एक ‘जहांनुमा' आईना है, जिसमें वह दुनिया-जहान को देखती है । उनकी कहानियों का भूगोल  किसी शहर, प्रान्त या देशों की सरहदों में कैद नहीं है, बल्कि उनके पास आर-पार और दूर-दूर तक देखने वाली दृष्टि है और यह दृष्टि सही मायनों में मानवीय है, भाईचारे का पैगाम देने वाली है । और भी कहें तो 'विश्व मानवता' का इतिहास रचने वाली है । वह इनके माध्यम से कहना चाहती हैं कि भाषा, प्रांत, धर्म, जाति, देश, सरहद, फौज, गोला-बारूद जैसा सबकुछ केवल अपनी कुंठाओं को बचाने और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के हथियार है, जो कभी भी सफल नहीं हो सकते । सर्वोपरि सिर्फ इंसान है और उसकी इंसानियत है, जिसे सात तालों में  भी कैद नहीं किया जा सकता । वह बहुत दूर तक देखती हैं और आत्मसात का अपने व्यापक कैनवास पर 'पेष्ट' करती है । इस रूप में उनके लिए सबसे अलग और सफल कथाकार होने का दावा किया जा सकता है ।
  • Doosara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    200 160

    Item Code: #KGP-775

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Vyangya Samay : Sharad Joshi (Paperback)
    Sharad Joshi
    225

    Item Code: #KGP-7225

    Availability: In stock

    शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
  • Jeevan Hamara (Paperback)
    Bebi Kambley
    60

    Item Code: #KGP-1509

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।
  • Fantasia (Paperback)
    Vaughn Petterson
    245

    Item Code: #KGP-343

    Availability: In stock

    Touching on a wide range of different themes, Fantasia on a Theme of Thomas Tallis is a truly compelling read. Throughout the pages of his thought-provoking novel, the author, Vaughn Petterson, presents readers with a vivid portrait of the best and worst that humanity has to offer, inviting them to form their own conclusions about the respective moral weight of our various social folkways and mores. Written in a deeply lyrical style, Fantasia successfully incorporates the transformative media of art, music, and literature as a figurative backdrop for Joe’s personal metamorphosis—highlighting the significance of the arts in helping to change us in ways we could hardly imagine. Petterson also skillfully invokes higher levels of deeper thought in the reader, chiefly by inviting them to consider the deeper spiritual ramifications of the issues with which his characters are forced to contend—issues that rest at the core of our collective existence.
  • Bharat : Tab Se Ab Tak
    Bhagwan Singh
    325 293

    Item Code: #KGP-9124

    Availability: In stock

    भगवान सिंह ने कविता, कहानी, व्यंग्य, आलोचना, उपन्यास, भाषा-समस्या जिस भी विषय पर लिखा है, उसमें उनका एक नया तेवर रहा है। उनका एक उपन्यास तो हिंदी के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में आता है। परंतु इतिहास पर उनका लेखन जितना विचारोत्तेजक और क्रांतिकारी माना गया है, उसकी तुलना उनके अन्य किसी विधा में किए गए लेखन से नहीं की जा सकती। व्यावसायिक इतिहासकार न होते हुए भी उन्होंने प्राचीन इतिहास की जड़ीभूत मान्यताओं को खंडित करते हुए इसकी गहनता, व्याप्ति और दिशा सभी को बदला है और इतिहासकारों, पुरातत्त्वविदों और मनस्वी पाठकों के बीच उसका स्वागत हुआ है।
    प्रस्तुत संग्रह में भी इतिहास पर लिखे गए उनके कुछ ऐसे लेख हैं, जिन्होंने पाठकों और श्रोताओं को उद्वेलित और प्रेरित किया है और उनको पुनर्विचार के लिए बाध्य किया है। साथ ही कुछ ऐसे नए लेख भी हैं, जो इससे पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं। इनके कारण निबंधों का समग्र फलक बहुत व्यापक हो गया है। जहां कुछ लेखक एक ऐसे अतीत में ले जाते हैं, जहां प्रकाश की कोई अन्य किरण आज तक पहुंच नहीं पाई थी और जिससे आज के दस-बीस हजार या इससे भी पहले की मानसिक ऊहापोह पर हलका और कुछ रंगीनी-भरा प्रकाश पड़ता है, वहीं ऐसे लेख भी हैं, जो ठीक आज की समस्याओं या वर्तमान के अतीत और वर्तमान दोनों की, तीखी पड़ताल करते हैं।
  • Dharmik Kathayen
    Jagat Ram Arya
    150 135

    Item Code: #KGP-108

    Availability: In stock

    धार्मिक कथाएं

    एक दन ब्राह्मण ने मार्ग पर चलते हुए एक हीरा, जिसकी कीमत एक लाख थी, पड़ा आया। वह साधारण रूप से ही हरे को लिए हुए जा रहा था कि उधर आगे की ओर से एक जौहरी जगह-जगह भूमि को देखता हुआ आ रहा था और विशेष व्याकुल था। इतने में ब्राह्मण ने उसे व्याकुल देखकर कहा कि जौहरी भाई, तू व्याकुल क्यों है? देख, एक हीरा हमने पाया है। तेरा हो तो तू ले ले। यह कहकर जौहरी को हीरा दे दिया। अब जौहरी कहने लगा कि मेरे तो दो हीरे थे, इसलिए एक तो तूने दे दिया, दूसरा भी दे दे, तब मैं तुझे छोड़ूंगा। उस जौहरी ने ब्राह्मण को पुलिस के हवाले कर अपना मुकदमा अदालत में दे दिया। वहां अफसर ने उस ब्राह्मण से पूछा कि कहो भाई, क्या मामला है? उसने कहा कि मैं मार्ग में आ रहा था कि मुझे एक हीरा पड़ा मिला। मैं साधारण रूप से जा रहा था तभी उधर से यह कुछ ढूंढ़ता हुआ व्याकुल सा आ रहा था। मैंने इससे पूछा, क्या हे? तब इसने कहा कि मेरा एक हीरा खो गया है। मैंने वह हीरा इसे देकर कहा कि देखो, यह एक हीरा मैंने पाया है। यदि तुम्हारा हो तो ले लो। तब इसने ले लिया और अब यह कहता है कि मेरे तो दो हीरे थे। पुनः अफसर ने सेठ जी से पूछा। तब सेठ जी बोले कि मेरे तो दो हीरे थे जो मार्ग में गिर पड़े थे। उनमें से एक तो इसने दे दिया, पर एक नहीं देता है। अफसर ने समझाया कि यह ब्राह्मण यदि अपने ईमान का पक्का न होता, तो इतना दीन होते हुए एक भी क्यांे देता? अतः यह फैसला किया कि वह हीरा ब्राह्मण को दे दिया जाए। वह जौहरी का नहीं, क्योंकि इसके तो दो हीरे एक साथ गिरे थे, सो इसके कहीं और होंगे। तब तो सेठ बोले कि सरकार, तो मुझे एक ही दिला दिया जाए। तब अफसर ने कहा कि अब तुमहो नहीं मिल सकता।
    —इस संग्रह की ‘सत्यमेव जयते’ कथा
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-869

    Availability: In stock

    कहानियां कहानियां होते हुए भी कहीं सच भी होती हैं । बल्कि सच से भी अधिक सच । हिमांशु जोशी की ये कहानियां उसी सच को रेखांकित करती अनाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती हुई कई प्रश्न जगाती हैं ।
    इन रचनाओं की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, इनकी सरलता, सहजता एवं मार्मिकता। सरल शब्दों में बड़ी बात कह देना बड़ा कठिन कार्य है। परंतु हिमांशु जोशी की इस महारत ने आज के अनेक कथाकारों के बीच उनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हैं । शायद इसीलिए ये कहानियां कहानियां  होते हुए भी जिए हुए जीवन के जीवंत अंश-सी लगती हैं । इनमें स्पदित होता यथार्थ, इन्हें सच के इतने निकट ले जाता है कि ये सच का ही पर्याय बन जाती हैं । किसी की अपनी ही जीवन-गाथा के सजीव दृश्य !
    इनमें धुँधलाए गाँव हैं मैले कस्बे, भीड़-भरे महानगर ! दिन-रात हांफते-कांपते, यंत्रवत जीते लोग ! उनके दुःख-सुख । उनकी समस्याएं ! एक नन्हे-से संसार में समाए कई-कई संसार !
    गहन अनुभव एवं अनुभूतियों के ताने-बाने से बुनी  इन रचनाओं के कुछ अलग रंग हैं। अलग राग ।
  • Kanak Chadi
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1980

    Availability: In stock

    कनक छड़ी
    'धन्नो के कान उसकी तरफ़ लगे थे,
    किन्तु मन ? 
    मन तो आज जैसे हजार  आँखों से 
    उन तसवीरों को देख रहा था,
    जो उसके स्मृति-पट पर
    उभर रही थीं ।
    उनमें तारा ही तारा थी…
    कभी बेरियों से बेर तोड़ते हुए
    कभी शटापू खेलते हुए
    कभी को खेतों में कोयल संग
    कूककर भागते हुए 
    कभी ढोलक की थाप पर गाते हुए
    कभी 'तीयों' के गोल में
    थिरकती तारा नजर आती
    कभी ब्याह के सुर्ख जोड़े में सजी हुई
    लजाती-मुस्कराती दिखती
    उसकी आँसुओं में डूबी छवि के साथ
    यह सिनेमा रील टूट जाती । 
    [इसी उपन्यास से]
  • Mahamana Pandit Madan Mohan Malviya
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-9326

    Availability: In stock

    महामना पं. मदनमोहन मालवीय एक प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक थे। वे राष्ट्रवाद को सर्वोच्च स्थान देते थे। हिंदू धर्म का गहन अध्ययन करने वाले पं. मालवीय देश की जनता को राष्ट्रवाद का परम हितैषी एवं शुभेच्छु मानते थे।
    वे संस्कृत और हिंदी के प्रकांड पंडित थे। उनका ज्ञान अपरिमित था। वे हिंदू संस्कारों के परम विद्वान् थे। उनको वाणी का अद्भुत वरदान प्राप्त था। उनकी भाषणकला पर सभी मुग्ध हो जाते थे।
    पूज्य मालवीय जी को वेदों, शास्त्रों तथा अन्य महान् ग्रंथों का ज्ञान था। वे हिंदू समाज को संसार में नामवर बनाना चाहते थे। काशी हिंदू समाज को संसार में नामवर बनाना चाहते थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण कराके उन्होंने एशिया में सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय की स्थापना की। देश की स्वतंत्रता के लिए वे गांव-गांव घूमे थे। चैरी-चैरा के मुकदमे पर विजय पाकर उन्होंने ब्रिटिश शासन का मुंह काला कर दिया था। वे इतने लोकप्रिय थे कि जनता उन्हें बहुत अधिक मान-सम्मान देती थी।
    —चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा
  • Aawara
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    175 158

    Item Code: #KGP-436

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    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का समाज-अध्ययन बड़ा प्रखर था। उन्होंने गरीबी में उसकी संपूर्ण भयावहता को बाल्यावस्था में ही भोगा था, अतः उग्र जी ‘आवारा’ नाटक में पूरी तरह सपफल सामाजिक नाटककार प्रतीत होते हैं। ‘उग्र’ का यह नाटक उस अभिनंदनीय योजना का पावन-प्रेरक स्मृति-चिन्ह बन आज भी विजयपताका की तरह यशगान करता पफहरा रहा है। सभ्य, समृद्ध समाज और उसमें कलाकार की दयनीय स्थिति, जमींदार की क्रूरता व जालसाजी का बिलकुल नग्न चित्रण है। 
    लाली-दयाराम की निश्छल प्लेटोनिक मनोवैज्ञानिक प्रेमगाथा को भी ‘उग्र’ ने जीवन के घिनौने पाशविक प्रेम-व्यवहारों से अलग-थलग चित्रित कर मर्मस्पर्शी और हृदयद्रावक बना दिया है।
    आलोचकों ने इस नाटक को स्वाभाविक माना था किंतु समसामयिक प्रगतिशील नाट्य रचनाओं में नई धारा और नूतन अभिव्यक्ति के अभाव का अनुभव कर उग्र ने सामाजिक जीवन में कला का स्वरूप निखारने के लिए नाटक में प्रचलित और रुचिकर शैली का अनुगमन किया है।
    ‘उग्र’ ने अपने लेखन-जीवन का आरंभ ही नाटकों से किया था। उनका पहला ही नाटक ‘महात्मा ईसा’ हिंदी का अत्यंत सफल और चर्चित नाटक रहा था।
    ‘चुंबन’, ‘गंगा का बेटा’, ‘अन्नदाता’, ‘माधव महाराज महान’ उनकी अन्य लोकप्रिय नाट्य कृतियां रही हैं। उपन्यास और भारी-भरकम संपादकीय से समय निकालकर ‘उग्र’ ने एकांकी और प्रहसन की भी रचना की है।
    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ रचित नाटक ‘आवारा’ में सामान्य सहायक पात्रों के अलावा छह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्र हैं, नाटक तैंतीस दृश्यों तथा तीन अंकों 
    में समायोजित है। पहले अंक में आठ, दूसरे में अठारह व तीसरे अंक में सात दृश्य हैं। ‘नाटक’ में ‘उग्र’ द्वारा प्रणीत गीत भी समायोजित हैं जो कथानक व वातावरण को सजीव बनाते हैं। गीत-नाट्य की यह पद्धति लोक-नाट्य परंपरा की-सी है। कथानक में प्रायः जो घटनाएं मंच पर नहीं दिखाई जातीं उनकी सूचना व वातावरण की मार्मिकता को और गहन बनाए रखने के लिए या कभी-कभी उसके प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करने के लिए गायन पद्धति उपयोगी सिद्ध होती है।
    प्रस्तुत नाटक ‘आवारा’ में बूढ़े भिखारी बुद्धूराम की बेटी लाली और क्रूर जमींदार के छोटे भाई दयाराम को प्रमुख पात्र के रूप में चित्रित कर हमारी सामाजिक मान्यताओं और परिस्थितियों पर सामयिक, तीखा और तीव्र व्यंग्य किया गया है। आज हिंदी में ‘उग्र’ नहीं रहे, न वैसे गुण-ग्राहक पाठक, मगर ‘उग्र’ का अकल्पनीय नाटक ‘आवारा’ आज भी उग्र की अपनी