Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan

Sudha Arora

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Vandana Book Agency

  • ISBN No: 9788189424343

मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है।

Sudha Arora

सुधा अरोड़ा
जन्म : 4 अक्तूबर, 1946, लाहौर (अब पश्चिमी पाकिस्तान) ।
1967 में उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. और शिक्षायतन कॉलेज से बी.ए. ऑनर्स किया । दोनों  बार प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान । 1968 से 1971 तक कलकत्ता के डिग्री कॉलेज से अध्यापन ।
करीब 11 कहानी-संग्रहों में पैंसठ कहानियां प्रकाशित । 1965-2012 तक में अब तक की लिखी गई संपूर्ण कहानियां दो खंडों में संकलित । एकांकी ऑड मैन आउट उर्फ बिरादरी बाहर' और साझा कविता-संग्रह 'रचेंगे हम साझा इतिहास' सन् 2012 में प्रकाशित । 'रहोगी तुम वही' संकलन का अनुवाद उर्दू में, उपन्यास 'यहीं कहीं था घर' का अनुवाद पंजाबी में, 'आम औरत : जिंदा सवाल' का अनुवाद मराठी में 'उंबरठ्याच्या अल्याड पल्याड' नाम से प्रकाशित । कहानियां  लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी, फ्रेंच, पोलिश, चेक, जापानी, डच, जर्मन, इतालवी तथा ताजिकी भाषाओं में अनूदित और इन भाषाओं के सकलनों नें प्रकाशित । पहली कहानी 'मरी हुई चीज' ज्ञानोदय सितंबर, 1965 से प्रकाशित । 'महानगर की मैथिली, 'काला बाजार' और 'रहोगी तुम वही' उनके चर्चित कथा-संग्रह ।
सन 1993 से सुधा अरोड़ा प्रताडित महिलाओं की सहायता के लिए गठित संस्था 'हेल्प' से जुडी और तब से अब तक लगातार महिलाओं के लिए कार्यरत । स्त्री-विमर्श पर दो पुस्तकें- 'आम औरत : जिंदा सवाल' और 'एक औरत की नोटबुक' चर्चित । उनके स्त्री-विषयक आलेख कई भाषाओं में अनुदीत । 
सुधा अरोड़ा कई बार नियमित स्तंभ-लेखन तथा 1995 के बाद  फिल्म और टेलीविजन से भी जुडों । टी. वी. धारावाहिक और कर्ड रेडियो नाटकों के अलावा 'बवंडर' फिल्म की पटकथा ।
1978 में 'युद्धविराम' को उ.प्र. हिंदी संस्थान का विशेष सम्मान । 2008 से साहित्य क्षेत्र का भारत निर्माण सम्मान।  2010 का प्रियदर्शिनी सम्मान । 2011 से वीमेंस अचीवर अवार्ड तथा 2012 में महाराष्ट्र साहित्य अकादमी सम्मान ।

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