Aalochana Ka Naya Paath

Gopeshwar Singh

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  • Year: 2014

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789380146157

आलोचना का नया पाठ-नई पीढ़ी के गंभीर और दृष्टिसंपन्न आलोचक गोपेश्वर सिंह की नई आलोचना पुस्तक है। इसके जरिए लेखक हिंदी आलोचना के पुराने पाठ को न सिर्फ नए पाठ में बदलने का आलोचनात्मक संघर्ष करता है, बल्कि उसकी नई भूमिका की जमीन भी तैयार करता है। पठनीयता के गुणों से युक्त साहित्य में पाठक की दिलचस्पी पैदा करने वाली यह आलोचना पुस्तक हिंदी आलोचना में आते नए बदलाव का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
गोपेश्वर सिंह की रुचि एकांगी नहीं। उनकी आलोचनात्मक पहुँच समग्रतावादी है। मध्य काल से लेकर आधुनिक काल तक, कथा-साहित्य से लेकर कविता तक तथा साहित्य से लेकर समाज तक सभी इनकी रुचि के क्षेत्रा हैं। ऐसे समय में जब आलोचना में गतिरोध का शोर मचाया जा रहा है और जब आलोचक किसी खास विधा या काल तक सीमित होते जा रहे हैं, तब गोपेश्वर सिंह जैसे बहुआयामी सोच वाले नए और गंभीर आलोचक की उपस्थिति आश्वस्त करती है कि आलोचना में गतिरोध का प्रश्न बेमानी है।
हिंदी आलोचना को प्रगतिवाद और आधुनिकतावाद के शीतयुद्धकालीन दुराग्रही प्रत्ययों की छाया से बाहर निकालना गोपेश्वर सिंह के आलोचनात्मक लेखन की मूल प्रतिज्ञा है। इसलिए यथार्थवाद या रूपवाद जैसे पदों और पक्षों से वे आलोचना को मुक्त करते हैं और उसे नए विमर्शों की रोशनी में ले जाते हैं, लेकिन विमर्शों की अतिरेकी परिणति से उसे बचाते भी हैं।
‘आलोचना का नया पाठ’--शीर्षक यह पुस्तक सैद्धांतिकियों के आतंक से मुक्त व्यावहारिक आलोचना का ऐसा पाठ है, जो--भाषा, दृष्टि और शैली--हर तरह से नया है।

Gopeshwar Singh

गोपेश्वर सिंह 
जन्म: 24 नवंबर, 1955 ई., बिहार के गोपालगंज जिले के ‘बड़का गाँव पकड़ीयार’ नामक गाँव में एक किसान परिवार में।
शिक्षा: एम.ए., पी-एच. डी., 
आरंभिक शिक्षा गाँव के पास के कस्बे हथुआ में तथा उच्च शिक्षा मुजफ्फरपुर, पटना और बनारस में।
गतिविधि: 1974 ई. में बिहार के छात्र आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण पढ़ाई बाधित। उसी दौरान जयप्रकाश नारायण के समक्ष तिलक-दहेज न लेने, जनेऊ न पहनने तथा जाति-धर्मनिरपेक्ष जीवनमूल्यों के प्रति प्रतिज्ञाबद्ध। आंदोलन के दौरान अनेक बार जेल-यात्रा। आपत्काल के बाद जयप्रकाश नारायण के एक स्वयंसेवी संगठन के साथ झारखंड के गाँवों में आदिवासियों के बीच कई वर्षों तक सक्रिय। बाद में कुछ वर्षों तक वामपंथी सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। इसी दौरान ‘अलाव’ नाम से एक साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन, जिसका प्रवेशांक ही अंतिमांक बना।
जीविका: कुछ दिनों तक खेती और फ्रीलांसिंग। 1983 से अध्यापन। पटना विश्वविद्यालय, पटना एवं सेंट्रल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में करीब दो दशक तक अध्यापन के बाद सितंबर, 2004 से दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापन।
लेखन: साहित्य के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर हिंदी की प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन। ‘नलिन विलोचन शर्मा’, ‘साहित्य से संवाद’ और ‘आलोचना का नया पाठ’ के अतिरिक्त ‘भक्ति आंदोलन के सामाजिक आधार’, ‘नलिन विलोचन शर्मा: संकलित निबंध’ और ‘ ‘कल्पना’ का ‘उर्वशी’ विवाद’ (संपादित) पुस्तकें प्रकाशित।

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