Vyangya Samay : Sharad Joshi (Paperback)

Sharad Joshi

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  • Year: 2017

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-934394-4-9

शरद जोशी हिंदी व्यंग्य के सार्वकालिक महान् रचनाकार हैं। विसंगति के ड्डोत, विस्तार और परिणाम की जैसी अचूक परख उनको है, वह उनके समकालीन व्यंग्यकारों तक में दुर्लभ है। हास्य और व्यंग्य का सहजात संबंध उनकी रचनाओं में मौजूद है। बतरस और ललित निबंध के साथ कहावतों व लोकप्रसंगों से विकसित व्यंग्य को शरद जोशी ने हिंदी गद्य का अनिवार्य अंग बनाया। उनके लेखन में विषय-वैविध्य किसी को भी चकित करता है। वे विचार और राजनीति को लेकर बेहद स्पष्ट, पक्षधर, प्रखर और सतर्क लेखक हैं। यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में उनके स्तंभों ने एक इतिहास रचा। साहित्य के सैद्धातिक व व्यावहारिक अंतर्विरोधें पर उन्होंने अद्वितीय लिखा है। वे जीवन के अपार व अबूझ से छोटे-छोटे पल लेकर रचनाएं बुनते हैं। उनका एक वाक्य है—‘प्रेम की पीड़ा गहरी होती है, पर गरीबी की पीड़ा उससे भी गहरी होती है।’ यही विरल यथार्थबोध है जो परिहास, वक्रोक्ति, आनंद आदि से आगे बढ़कर रचना को किसी दूसरे ही स्तर पर ले जाता है। वे महत्त्वपूर्ण संदर्भों के व्यंग्य लेखक हैं। साहित्य, पत्रकारिता, टी. वी. और सिनेमा में उनके लेखन ने कीर्तिमान बनाए हैं। ‘मासूमियत में निहित मर्म और मुस्कान’ शरद जोशी के लेखन का मूल मंत्रा है। व्यंग्य समय में शरद जोशी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

Sharad Joshi

शरद जोशी
शरद जोशी का जन्म 21 मई, 1931 को उज्जैन (म०प्र०) में हुआ ।
इन्होंने होल्कर कॉलेज, इंदौर से बी०ए० किया ।
शरद जी ने दैनिक 'मध्यदेश', भोपाल, मासिक 'नवलेखन', भोपाल तथा पाक्षिक 'हिंदी एक्सप्रेस', बंबई का संपादन किया तथा 15 वर्षों तक लगातार देश के सभी अखबारों-पत्रिकाओं में छपते रहे ।
अब तक शरद जी की 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है, जिनसे मुख्य हैं-परिक्रमा', 'किसी बहाने', 'तिलिस्म', 'जीप पर सवार इल्लियह', 'रहा किनारे बैठ', 'मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, 'दूसरी सतह', 'हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे, 'यथा संभव', 'यत्र-तत्र-सर्वत्र, 'यथा समय' और दो चर्चित नाटक 'अंधों का हाथी' एवं 'एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ’ ।
इन्होंने सात सालों तक लगातार 'नवभारत टाइम्स' से 'प्रतिदिन' नाम का कॉलम लिखा, जिसने उस पेपर की बिकी लगभग दुगनी कर दी ।
'क्षितिज', 'छोटी-सी बात', 'साँच को आंच नहीं', 'गोधूलि', 'उत्सव', 'दिल है कि मानता नहीं', 'उडान' और 'चोरनी' फिल्मों के संवाद लिखने के साथ ही आपने 'ये जो है जिंदगी, 'बेताल पच्चीसी', 'सिंहासन बत्तीसी', 'वाह जनाब', 'देवी जी', 'प्याले से तूफान’, 'दाने अनार के', 'मालगुडी डेज़' (हिंदी डायलॉग्स-संवाद) तथा 'ये दुनिया है गजब की' नाम से टेलीविजन सीरियल भी लिखे ।
1990 से इनको राष्ट्रपति द्धारा 'पद्यश्री' की उपाधि से सम्मानित किया गया ।
इन्होंने कवि-सम्मेलनों के मंच पर लगातार 35 वर्षों तक रचना-पाठ किया और विश्व-भर में शोहरत पाई ।
इनके लोकप्रिय नाटक 'एक या गधा उर्फ जलादाद खाँ' का जापानी भाषा में अनुवाद व मंचन हुआ ।
5 सितंबर, 1991 को बंबई में महाप्रयाण ।

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