Ullanghan (Paperback)

Bhairav Prasad Gupt

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  • Year: 2013

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-89859-74-9

डॉ. एस.एल. भैरप्पा
(जन्म: 1934)
पेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। आपका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कालेज  में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके आपने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन.सी.ई.आर.टी. तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कालेज में सेवा की है। अवकाश ग्रहण करने के बाद आप मैसूर में रहते हैं।
‘धर्मश्री’ (1960) से लेकर ‘मंद्र’ (2002) तक आपके द्वारा रचे गए उपन्यासों की संख्या 19 है। उपन्यास से उपन्यास तक रचनारत रहने वाले भैरप्पा ने भारतीय उपन्यासकारों में अपना एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। 
केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार--ऐसे कई पुरस्कारों से आप सम्मानित हुए हैं। अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता का, मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन करने का, अमेरिका में आयोजित कन्नड़ साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने आदि का गौरव भी आपने अर्जित किया है।
देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।

Bhairav Prasad Gupt

भैरवप्रसाद गुप्त
भैरवप्रसाद गुप्त का जन्म 7 जुलाई, 1918 को सिवानकला गाँव (बलिया उ०प्र०) से हुआ । स्कूली शिक्षा के दौरान उनका रुझान लेखन की और हुआ । अपने शिक्षक रघुनाथ राय की प्रेरणा से गुप्त जी कहानी-लेखन की ओर प्रवृत्त हुए । उच्च शिक्षा के लिए जब वे इर्विंग कॉलेज, इलाहाबाद आए तो यहीं जगदीशचन्द्र माथुर, शिवदान सिंह चौहान जैसे लेखकों एवं आलोचकों के संपर्क और साहित्यिक-राजनीतिक परिवेश में उनके रचनात्मक संस्कारों को दिशा मिली । सन् 1940 में वे गांधीजी की प्रेरणा से राजगोपालाचारी के साथ मद्रास पहुंचे और यहीं हिंदी प्रचारक महाविद्यालय में अध्यापन करने लगे । बाद में कानपुर के मज़दूर नेता अर्जुन अरोड़ा से उनका संपर्क हुआ और सन् 1944 में वे माया प्रेस, इलाहाबाद से जुड़ गए । गुप्त जी अपने अन्य समकालीनों की तरह आर्य समाज और गांधीवादी राजनीति की राह से वामपंथी राजनीति की ओर आए थे । सन् 1948 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और तमाम विघटन एवं विभाजन के बावजूद इससे संबद्ध रहे ।
'शोले' उपन्यास (1946) से अपनी रचना-यात्रा शुरू  करने वाले भैरवप्रसाद गुप्त ने प्रगतिवादी आंदोलन की अंतिम कड़ी के बतौर प्रेमचंद की तरह शहर और गाँव दोनों को अपनी रचना का केंद्र बनाया और मानवीय शोषण के छदम रूपों को उधेड़कर वर्गहीन समाज के निर्माण की राह तैयार की । नई कहानी के लिए उन्होंने अपने संपादन में निकलने वाली पत्रिकाओं-'कहानी' और ‘नई कहानियाँ' द्वारा नई प्रतिभाओं को मंच दिया । गुप्त जी ने समाज के बुनयादी वर्गों-किसान और मजदुर-को केंद्र में रखकर 'मशाल',  'गंगा मैया' (1952), 'सत्ती मैया का चौरा' (1959) और 'धरती' (1962) जैसी महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक कृतियों की रचना की। गुप्त जी के कूल चौदह उपन्यास, बारह कहानी-संग्रह और दो अन्य कृतियां प्रकाशित हैं । उनकी अन्य प्रभुख कृतियाँ हैं-'अंतिम अध्याय' (1970), 'नौजवान' (1974), 'भाग्य देवता' (1992) और 'छोटी-सी शुरुआत’ (1977) ।
स्मृषि-शेष : 5 अप्रैल, 1995 को अलीगढ़ में ।

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