Namvar Hone Ka Arth (Paperback)

Bharat Yayavar

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  • Year: 2012

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-81467-40-4

नामवर होने का अर्थ
प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।

Bharat Yayavar

भारत यायावर
जन्म: 29 नवंबर, 1954, हजारीबाग।
शैक्षणिक अनुभव: 1983 से चास महाविद्यालय में हिंदी के व्याख्याता। 1994 में पाँच महीने संत कोलंबा महाविद्यालय, हजारीबाग में अध्यापन। फरवरी, 2004 से विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में अध्यापन।
लेखकीय अनुभव: 1974 में पहली रचना का प्रकाशन। 1978 से अखिल भारतीय स्तर की पत्रा-पत्रिकाओं में अनेक विधा 
की रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं, जिसका सिलसिला अब तक जारी है।
कविता-पुस्तकें: ‘झेलते हुए’ (1980), ‘मैं हूँ यहाँ हूँ’ (1983), ‘बेचैनी’ (1990) तथा ‘हाल-बेहाल’ (2004) प्रकाशित और चर्चित।
1979 ई. में ‘जिजीविषा के स्वर’ एवं ‘एक ही परिवेश’ नामक कविता-पुस्तकों का संपादन-प्रकाशन, जिसमें प्रारंभिक कविताएँ संकलित हुईं।
जीवनी: नामवर होने का अर्थ।
आलोचना: अमर कथाशिल्पी रेणु, दस्तावेज, नामवर का आलोचना-कर्म
पत्रिकाएँ: 1978 से 1980 तक ‘नवतारा’, 1981 से 1985 तक ‘प्रगतिशील समाज’ एवं 1985 से 1997 तक ‘विपक्ष’ नामक साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन।
खोज-कार्य: हिंदी के महान् लेखक महावीरप्रसाद द्विवेदी एवं फणीश्वरनाथ रेणु की दुर्लभ रचनाओं का खोज-कार्य। इन दोनों लेखकों की लगभग पच्चीस पुस्तकों का संकलन- संपादन। ‘रेणु-रचनावली’ (1994) एवं ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली’ (1996) का संपादन।
अन्य संपादित पुस्तकें: ‘कवि केदारनाथ सिंह’ (1990), ‘आलोचना के रचना-पुरुष: नामवर सिंह’ (2003) एवं ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी का महत्त्व’ (2004)।
पुरस्कार: नागार्जुन पुरस्कार (1988), बेनीपुरी पुरस्कार (1993), राधाकृष्ण पुरस्कार (1996), पुश्किन पुरस्कार (1997) मास्को, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी सम्मान (2009) रायबरेली।

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