Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare (Paperback)

Vishnu Khare

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  • Year: 2009

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-89859-85-5

मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
-नंदकिशोर नवल

Vishnu Khare

विष्णु खरे
9 फ़रवरी 1940 को मध्य प्रदेश के एक ज़िला मुख्यालय छिंदवाड़ा में जन्म। 1963 में क्रिश्चियन कॉलेज, इंदौर से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.। पहली गद्य-रचना ‘घूरे की दौलत’ तथा पहली कविता ‘मौत और उसके बाद’ साप्ताहिक ‘सारथी’ (नागपुर) में शायद गजानन माधव मुक्तिबोध के साहित्य संपादन में क्रमशः 15 जुलाई 1956 और 3 फ़रवरी 1957 के अंकों में प्रकाशित। प्रारंभिक कविताएँ 1957-68 के बीच ‘वसुधा’, ‘प्रहरी’, ‘कृति’, ‘नई कविता’, ‘माध्यम’, ‘ज्ञानोदय’, ‘धर्मयुग’ आदि में आईं। 1956-62 के बीच क़रीब 12 कहानियाँ भी लिखीं जो ‘सारथी’, ‘कहानी’, ‘आधुनिक कहानियाँ’, ‘विनोद’, ‘मनोरमा’ आदि में छपीं। पहली पुस्तक--टी.एस. एलिअट की ‘द वेस्ट लैंड एंड अदर पोएम्स’ का अनुवाद ‘मरु-प्रदेश और अन्य कविताएँ’--1960 में प्रकाशित। 1966 में लघु पत्रिका ‘वयम्’ का संपादन और तभी से समीक्षा-लेखन भी। मध्य प्रदेश और दिल्ली में कॉलेज-स्तरीय अध्यापन। केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा ‘नवभारत टाइम्स’ दिल्ली, लखनऊ, जयपुर में काम। साहित्य अकादेमी से 1983 में निकलना पड़ा और बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद 1993 में ‘नवभारत टाइम्स’ से, जिसके बाद से सड़क पर, किंतु बीच-बीच में नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय, दैनिक ‘भास्कर’ तथा राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से संबद्ध रहे, वरना स्वतंत्र लेखन और मुख्यतः विदेशी साहित्य के अनुवाद पर निर्भर। पिछले 25 वर्षों से फ़िल्मों पर भी लिखा है और अंग्रेज़ी में भी। अब तक हिंदी, अंग्रेज़ी, जर्मन में कोई दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें से कविताएँ इस संकलन के अलावा ‘पहचान’ सीरीज, ‘खुद अपनी आँख से’, ‘सबकी आवाज़ के पर्दे में’, ‘पिछली बाक़ी’, ‘काल और अवधि के दरमियान’, ‘लालटेन जलाना’ तथा ‘पाठांतर’ में संगृहीत। कई भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनूदित।

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