Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla (Paperback)

Shree Lal Shukla

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  • Year: 2014

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-81-7016-547-7

दस प्रतिनिधि कहानियाँ : श्रीलाल शुक्ल
'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "सँपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

Shree Lal Shukla

श्रीलाल शुक्ल

जन्म : 31 दिसंबर, 1925 में लखनऊ जिले के अतरौली गांव में ।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक । भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश पाकर अब न्यायी रूप से लखनऊ में रह रहे हैं।
अनेक उपन्यासों, कहानियों, व्यंग्य-रचनाओं, निबंधों आदि के ख्यातिप्राप्त लेखक । उपन्यास 'राग दरबारी' के लिए 1969 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार समेत अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित ।
प्रमुख कृतियाँ  :- उपन्यास : सूनी घाटी का सूरज, अज्ञातवास, राग दरबारी, आदमी का ज़हर, सीमाएं टूटती हैं, मकान, पहला पड़ाव, बिस्रामपुर का संत ० कहानी-संग्रह : सुरक्षा तथा अन्य कहानियां ० निबंध और टिप्पणियाँ : अगली शताब्दी का शहर, यह घर मेरा नहीं ० भेंटवार्ता : मेरे साक्षात्कार० हास्य-व्यंग्य : अंगद का गांव, यहाँ से यहीं, कुछ जमीन पर, कुछ क्या से, उमराव नगर में कुछ दिन, आओ बैठ लें कुछ देर ० बाल-उपन्यास : बब्बरसिंह और उसके साथी

स्मृति-शेष : 28 अक्टूबर, 2011

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