Deshbhakt Sannyasi Swami Vivekanand (Paperback)

Shanta Kumar

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  • Year: 2016

  • Binding: Paperback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-82114-08-6

देशभक्त संन्यासी स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद मानव-ऊर्जा एवं संघर्ष-शक्ति के मूर्तिमान प्रतीक थे। उन्होंने धर्म को एक नया अर्थ दिया जो जन-जन के उद्धार के लिए था। वे इतने महान् पुरुष एवं अद्वितीय योगी थे कि मेरे पास शब्द नहीं जो उनका वर्णन कर सकें। 
विवेकानंद के बहुआयामी व्यक्तित्व का आकलन करना बहुत कठिन है। उनके विचारों ने युवा वर्ग पर जो छाप छोड़ी, वह अमिट है। वस्तुतः भारत की स्वतंत्रता के आंदोलन के संस्थापकविवेकानंद थे। उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत की रूपरेखा दी थी जिसमें विभिन्न मतावलंबी भारतीय देशभक्ति की एकता के सूत्र में बंधे होंगे। स्वामी जी ने धार्मिक एकता के संदेश को विदेश तक भी पहुंचाया। भारत के सुदृढ़ उज्ज्वल भविष्य के लिए धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय भावना से पे्ररित होना ही उनके जीवन का संदेश था। 'स्वतंत्रता...स्वतंत्रता ही आत्मा का संगीत है'---यह मंत्र रामकृष्ण एवं विवेकानंद ने अपने परतंत्र देशवासियों के प्राणों में फूंक दिया।
--सुभाषचंद्र बोस

Shanta Kumar

शान्ता कुमार
प्रबुद्ध लेखक, विचारक, राजनेता व पूर्व मुख्यमंत्री तथा निवर्तमान केंद्रीय खाद्य मंत्री शान्ता कुमार का जन्म हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के गांव गढ़जमूला में 12 सितंबर, 1934 को हुआ था। उनका जीवन आरंभ से ही काफी संघर्षपूर्ण रहा। गांव में परिवार की आर्थिक कठिनाइयां उच्च शिक्षा पाने में बाधक बनीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आकर मात्र 17 वर्ष की आयु में प्रचारक बन गए। तत्पश्चात् प्रभाकर व अध्यापक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
दिल्ली में अध्यापन-कार्य के साथ-साथ बी.ए., एल-एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् दो वर्ष तक पंजाब में संघ के  प्रचारक रहे। फिर पालमपुर में वकालत की। 1964 में अमृतसर में जन्मी संतोष कुमारी शैलजा से विवाह हुआ, जो महिला साहित्यकारों में प्रमुख हैं। 1953 में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में ‘जम्मू-कश्मीर बचाओ’ आंदोलन में कूद पड़े। इसमें उन्हें आठ मास हिसार जेल में रहना पड़ा।
शान्ता कुमार ने राजनीति के क्षेत्र में शुरुआत अपने गांव में पंच के रूप में की। उसके बाद पंचायत समिति के सदस्य, जिला परिषद् कांगड़ा के उपाध्यक्ष एवं अध्यक्ष, फिर विधायक, दो बार मुख्यमंत्री, फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री तक पहुंचे।
शान्ता कुमार में देश-प्रदेश के अन्य राजनेताओं से हटकर कुछ विशेष बात है। आज भी प्रदेशवासी उन्हें ‘अंत्योदय पुरुष’ और ‘पानी वाले मुख्यमंत्री’ के रूप में जानते हैं।
प्रकाशित पुस्तकें: मृगतृष्णा, मन के मीत, कैदी, लाजो, वृंदा (उपन्यास); ज्योतिर्मयी (कहानी-संग्रह); मैं विवश बंदी (कविता-संग्रह); हिमाचल पर लाल छाया (भारत-चीन युद्ध), धरती है बलिदान की (क्रांतिकारी इतिहास); दीवार के उस पार (जेल-संस्मरण); राजनीति की शतरंज (राजनीति के अनुभव); बदलता युग--बदलते चिंतन (वैचारिक साहित्य), विश्व-विजेता विवेकानंद (जीवनी); क्रांति अभी अधूरी है (निबंध); शान्ता कुमार: समग्र साहित्य (तीन खंड) तथा कर्तव्य (अनुवाद)

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