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  • grid
  • Basant Bayar
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-1807

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य की एक सशक्त विधा है। नवरसों को संजोए ये कहानियां पाठक के मन को हलराती-दुलराती, हंसाती, रुलाती, गुदगुदाती और स्पंदित करती हैं । आसपास की विसंगतियों को रेखांकित करती, दलदल में भी जीवन के पद और सूत्र ढ़ूंढ लेती है । विभिन्न जीवन दशाओं के उकेरती, जीने की सही दिशा देती हैं । कहानी कहना भी एक कला है ।
    हंसाना एक कला है । जो हंसा सकता है, उसमें रुलाने की भी भरपूर ताकत होती है। आँसू, भावनाओं का सिंचन करते है । रचना के लिए भावों का सिंचन आवश्यक है । इसलिए तो मनुष्य जीवन में हंसने-हंसाने के साथ रोने-रुलाने का भी महत्व है।
    निशा भार्गव को कहानियां, मानो हंसाते-हंसाते रुला देती हैं । जीवन की विसंगतियों पर हंसाती, जीवन का सत्य बखान कर जाती हैं । 'बसंत बयार' संग्रह की कहानियां निशा भार्गव के दादी बनने को उम्र में भले ही प्रकाशित हो रही हैं, लेखिका की उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उसे ही उद्वेलित, रोमांचित और सुखाश्चर्य से भरती रहीं हैं । आसपास में बिखरे, टूटते-बिखरते-जुड़ते पारिवारिक ताने-बानों की ये कहानियां हैं। संग्रह को यही विशेषता है।
    एक-एक कुटुम्ब (परिवार) को दुरुस्त करके ही पुन: "वसुधैव-कुंटुम्बकम्" का भारतीय सनातन आदर्श सार्थक होया।  ये कहानियां कुछ ऐसा ही प्रयास करती दिखती हैं। निशा भार्गव की उनकी अर्थवान कहानियां और लेखकीय ईमानदार प्रयास के लिए बधाइयाँ । पाठकों से अपेक्षा है कि वे पढे, गुने और पन्नों पर बिखरे जीवन जोड़ने वाले तत्वों को सहेज लें ।
  • Buddha Charitam
    Hari Krishna Taileng
    120 108

    Item Code: #KGP-1840

    Availability: In stock

    बुद्ध चरितम्
    संस्कृत के सात श्रेष्ठ महाकाव्यों और नाटकों पर आधारित हिंदी कथाएँ
    बुद्ध चरितम् की विशेषता यह है कि इसमें भगवान बुद्ध के जन्म से निर्वाण तक का जीवन-चरित्र तो है ही, साथ ही  महाकवि ने बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को रुचिकर कथा में पिरोकर मधुर और सहज ग्राह्य बना दिया है ।
    सौंदर नंद में बोद्ध धर्म के सिद्धांतों और साधना-रीति को कथा में गूँथकर महाकवि ने सहज और बोधगम्य बना दिया है । इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की विमाता से उत्पन्न भाई नंद और उसकी अतीव सुंदर पत्नी सुंदरी की मनोहारी कथा है ।
    नागानंद में नागों की रक्षा में प्राणोत्सर्ग कर देने वाले परोपकारी नायक जीमूतवाहन की कथा है । संयत और उदात्त प्रेम, लोकहित और प्राणीत्सर्ग की यह कथा मानवीय गुणों से परिपूर्ण और प्रभावशाली है ।
    मालती-माधवम में मालती और माधव की प्रणय गाथा है, जो अनेक बाधाओं के आते रहने के बावजूद सफलता प्राप्त करती है । कथा बडी रोचक है ।
    प्रतिमा नाटक में पुरुषोत्तम राम के वनगमन से लेकर राज्यारोहण की कथा कही गई है । कथावस्तु का प्रस्तुतीकरण अत्यंत कलापूर्ण और मनोहारी है । यह नाटक बड़ा आदर- प्राप्त और विशिष्ट है । इसमें भरत का उदात्त चरित्र और महारानी कैकेयी का मार्मिक व सहानुभूतिपूर्ण चित्रण हुआ है । कैकेयी महाकवि द्वारा निर्दोष सिद्ध की गई है ।
    रत्नावली नाटक में वत्सराज उदयन से सिंहल की राजकुमारी रत्नावली के विवाह की रोचक व सरस कथा है ।
    विक्रमोर्वशी नाटक में चंद्रवंश के इंद्र के समान प्रतापी महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेमकथा प्रस्तुत की गई है।
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 536

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Mushkil Kaam
    Asghar Wajahat
    160 144

    Item Code: #KGP-1829

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Aazaadi Mubarak
    Kamleshwar
    290 261

    Item Code: #KGP-41

    Availability: In stock

    आजादी मुबारक
    मैंने देखा है कि कमलेश्वर ने कभी भी किसी 'डॉग्मा' से चालित होकर लिखना स्वीकार नहीं किया । कमलेश्वर की हर कहानी उसके जीवनानुभवों से निकली है । कमलेश्वर ने पढ़-पढ़कर संक्रांति के नहीं झेला है, बल्कि स्वय जिया है... उसकी शायद ही कोई ऐसी कहानी हो, जिसके सूत्र जिंदगी में न हों, क्योंकि वह बहुत खूबी से अपने समय के अंतर्विरोधों को पकड़ता है...  मुझे बहुत-सी वे घटनाएँ, लोग, स्थितियाँ, विचार, संदर्भ आदि याद है, जिन्होंने उसकी सशक्त  कहानियों को जन्म दिया है । कमलेश्वर इस मामले में एक बंजारा है, क्योंकि वह अनवरत यात्रा पर रहता है उसकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की सादगी है शुरू होकर आधुनिकतम संचेतनाओँ और संश्लिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करती है...  उसका स्टैमिना परिवर्तन की तेज से तेज रफ्तार में उसका सहायक होता है, इसीलिए वह कभी पिछड़ता नहीं और न प्रयत्न-शिथिल होता है...  और मैं कहना चाहूँगा कि यह कोई साधारण बात नहीं कि एक कलाकार अपनी भावभूमियों पर परिश्रमपूर्वक तैयार की गई अपनी निर्मितियों को इतनी निर्ममता से तोड़कर अलग हो जाए और नए सफल प्रयोग करने लगे । -दुष्यंत कुमार (सन् 1 966)

    कमलेश्वर की कहानियों का यहीं सच है । तमाम क्था आंदोलन  आए और गए, उनके साथ और उनके बाद भी कमलेश्वर ने अपनी निर्मिंतियों को विलक्षण रचनात्मक निर्ममता से तोड़ा से । उसी प्रयोगधर्मिता का उदाहरण हैँ-'आजादी मुबारक' संकलन की यह कहानियां
  • Snehbandh Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    250 225

    Item Code: #KGP-1997

    Availability: In stock

    वरिष्ठ रचनाकार मालती जोशी असंख्य पाठकों की प्रिय कहानीकार हैं। आज जब अनेक तर्क देकर यह कहा जा रहा है कि साहित्य के पाठक सिमटते जा रहे हैं तब पाठकों को मालती जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों की प्रतीक्षा रहती है। ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ में उनकी ऐसी ही रचनाएं हैं। उनकी लोकप्रिय रचनाशीलता का रहस्य लेखन की सहजता में छिपा है। कथानक का चयन, भाषा, पात्रों का अंतरद्वंद्व और अभिव्यक्ति प्रणाली—सबमें एक सहजता अनुभव की जा सकती है। मालती जोशी छोटी-छोटी घटनाओं या अनुभूतियों से रचना का निर्माण करती हैं। उनका ध्यान व्यक्ति और समाज की मानसिकता पर रहता है। बाहरी हलचल से अधिक वे मन की सक्रियता अंकित करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र भावुक, विचारशील, निर्णय संपन्न और व्यावहारिक होते हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए वे कोरी भावुकता में नहीं जीते। एक अजब पारिवारिकता उनकी रचनाओं में महकती रहती है। संवाद मालती जोशी की पहचान हैं। छोटे-छोटे वाक्य, संकेतों से भरे शब्द और संवेदना की अपार ध्वनियां—इन गुणों से भरे संवाद पाठक के मन में उतर जाते हैं। किस्सागोई और विवरणशीलता का बहुत अच्छा उपयोग इन कहानियों में मिलता है। परिस्थिति और संयोग के माध्यम से प्रसंगों को गति मिलती है।
    इस संग्रह की सारी कहानियां स्त्री-मन की गहराई व सच्चाई को पूरी विश्वसनीयता के साथ व्यक्त करती हैं। यहां प्रचलित विमर्श नहीं, जीवन की समझ से उत्पन्न विवेक है। निश्चित रूप से ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ की सभी कहानियां पाठकों की प्रशंसा प्राप्त करेंगी।
  • Mohan Chopra Ki Shreshtha Kahaniyan
    Sunil Chopra
    195 176

    Item Code: #KGP-313

    Availability: In stock

    मोहन चोपड़ा की श्रेष्ठ कहानियाँ
    मोहन चोपड़ा का कथा-संसार मध्यवर्गीय सामाजिक जीवन की विडंबनाओं, अंतर्विरोधों और मूल्यों के विघटन के इस दौर में एक व्यक्ति के अंतःसंघर्ष की गाँठें खोलता है। पूँजीवादी संस्कृति और बाज़ार के दबावों के बीच मनुष्य के लगातार एक उपभोक्ता में बदलते चले जाने तथा भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरित होने की पृष्ठभूमि से उपजी हताशा, मोहभंग, अनास्था और अकेलेपन के बीच कहानीकार संबंधों के सत्त्व और मानवीय ऊष्मा की गहन खोज में प्रवृत्त है तथा वह हमें उम्मीद की टिमटिमाती रोशनियों को सहेजने के लिए प्रेरित भी करता है।
    मोहन चोपड़ा की कहानियों में मध्यवर्ग अपनी तमाम विविधताओं के साथ उपस्थित होता है। मध्यवर्ग की उस दोहरी एवं टुच्ची मानसिकता को उन्होंने अपनी कहानियों में लक्षित किया है, जहाँ आर्थिक अथवा सामाजिक स्तर पर बदलाव आते ही इस वर्ग के लोगों के आचरण में भी बदलाव आ जाता है और वे पुरानी केंचुलें उतारकर नई केंचुलें धारण कर लेते हैं। मध्यवर्गीय जीवन की विडंबनाओं को जीने का लेखक का अपना अनुभव ही अनुभूति के स्तर पर उनकी कहानियों में प्रवाहित है, और इसीलिए वे इतनी प्रामाणिक लगती हैं।
    उनकी कहानियों का यह संचयन उनकी विविधरंगी- बहुआयामी सर्जनात्मकता से परिचय कराने का एक प्रयास है।
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (1st Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1581

    Availability: In stock


  • Yahin Kahin Hoti Thi Zindagi
    Ajeet Kaur
    300 270

    Item Code: #KGP-9218

    Availability: In stock

    अजीत कौर की अपनी एक खास ‘कहन’ है, जिसके कारण उनकी कहानियां बहुत सादगी के साथ व्यक्त होती हैं और पाठकों की संवेदना में स्थान बना लेती हैं। ‘यहीं कहीं होती थी जिंदगी’ उनका नया कहानी संग्रह है। पंजाबी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां विषयवस्तु से नयापन लिए हैं और शिल्प के एतबार से पाठक को अजब सी राहत देती हैं। एक एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह है, न केवल पठनीयता से समृद्ध है बल्कि एक दार्शनिक वैचारिक संपदा से भी संपन्न है। अजीत कौर की रचनात्मक सुघड़ता तो सर्वोपरि है ही।
  • Prati Shurti
    Shree Naresh Mehta
    350 315

    Item Code: #KGP-1955

    Availability: In stock

    प्रति श्रुति : श्रीनरेश मेहता की समय कहानियाँ 
    श्रीनरेश मेहता का कथा-गद्य, जैनेंद्र और अज्ञेय की परंपरा मेँ रखकर देखा जाए तो समाज और अध्यात्म, राष्ट्र और राजनीति, जीवन और दर्शन से संपृक्त वाद्य है । वे न तो जैनेंद्र का प्रतिबिंब बने और न ही अज्ञेय की छाया । उन्होंने सर्वथा स्वायत्त और स्वाधीन कथा साहित्य लिखा जिसमें काव्यात्मक रस भी है और जिसका आस्वाद हमारे सामाजिक और संस्कृतिक भाव-बौधों को प्रगल्भ भी बनाता है। श्री मेहता जी की भाव-दृष्टि, अंतर्दृष्टि और जीवन-दृष्टि उनके कथा-गद्य में जिस प्रकार प्रकट हुई है उससे लगता है कि श्रीनरेश जी ने नई कथा-भाषा रचकर हिंदी को एक सांस्कृतिक शक्ति का लोक संस्करण सौंपा है। भाषा अपनी सर्जनात्मक शक्ति में जब सार्थक होती है तो वह स्वयं ही समाज और संस्कृति को अपने में समा लेती है । श्रीनरेश जी ने अपने कथा-शिल्प से भाषा की संभावनाओं को विराट बनाया, गद्य की एक नई शैली विकसित की और यह सिद्ध किया कि एक जीवंत भाषा और सजीव भाषा किस पवार अपनी सांस्कृतिकता और आंचलिक नास्टिलजिया को एक साथ एकाकार कर सकती है । श्रीनरेश जी का समूचा गद्य-साहित्य और विशेष रूप से कथा-साहित्य अपने ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों ही परिप्रेक्ष्यों में गहन शोध और विमर्श की माँग करता है । एक कवि और सर्जक को मात्र 'वैष्णव' कहकर ब्रांड नाम से सज्जित कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी वैष्णवता के पीडालोक को किसी गांधी की तरह बाहर निकाल नरसिंह मेहता के गीत 'वैष्णव जन' की तरह लोकव्यापी बनाना होगा । श्रीनरेश मेहता जैसा सर्जक अतीत की इतिहास-वस्तु बनकर, वर्तमान की संज्ञा से पृथक नहीं किया जा सकता और इसीलिए उनकी सर्जन-यात्रा की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हिंदी मानस उनमें निहित समस्त संभावनाओं को समय स्मृति और अवकाश तीनो में रखकर एक ऐसे श्रीनरेश मेहता का अन्वेषण करे जो हिंदी साहित्य की चेतना का नरेश हो, सृजन की उस्कृष्टता का प्रतिमान हो और अपनी सांस्कृतिक सामाजिकता का अद्वितीय उदाहरण हो ।
  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Agale Saal December Mein
    Anat Ramesh
    50 45

    Item Code: #KGP-9101

    Availability: In stock


  • Gunjan Sharma Beemar Hai
    Vivekanand
    200 180

    Item Code: #KGP-586

    Availability: In stock

    गुंजन शर्मा बीमार है
    विवेकानंद का भाषा पर अच्छा अधिकार है। पात्रों के अनुकूल भाषा का चुनाव और उसे अर्थवत्ता प्रदान करना साहित्यिक विधा के रूप में कहानी की अनिवार्य शर्त है। विवेकानंद इस अनिवार्यता के बारे में सचेत हैं, यह अच्छी बात है। इनमें बहुत कम स्थल ऐसे हैं जहां विचारों को सीधे-सीधे भाषणमाला की तरह इस्तेमाल किया गया हो जैसे कि सत्तरोत्तरी बरसों में हिंदी की ‘क्रांतिकामी’ कहानियों में देखने को मिलता था। विवेकानंद ने यदि ‘महुआ छाया’ में नत्थीराम धोबी से भोजपुरी में संवाद बुलवाए हैं तो महानगर में पली आधुनिकता कुंज से अंग्रेजी में भी। 
    गुंजन शर्मा बीमार है की भाषा में सांकेतिकता और बिंबात्मकता के प्रयोग द्वारा अर्थवत्ता प्रदान करने की कोशिश की है। उसमें ‘सांप’ की घटना और बाद में उसके बिंब का सांकेतिक प्रयोग फ्रायडीय मनोविश्लेषण के आधार पर भी व्याख्यायित होने की संभावनाएं रखता है और गुंजन शर्मा की बीमारी भी ‘लिबिडो’ की ही देन मानी जा सकती है। जिससे निम्नमध्यवर्गीय किशोरमन पीड़ित है। इस तरह की अर्थवत्ता की संभावनाओं से युक्त भाषा का इन कहानियों में प्रयोग यह दर्शाता है कि विवेकानंद में कलात्मक कहानियों की रचना क्षमता है।
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Naye Sire Se
    Govind Mishra
    195 176

    Item Code: #KGP-723

    Availability: In stock


  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Tal-Ghar
    Deepak Sharma
    175 158

    Item Code: #KGP-1835

    Availability: In stock


  • Dekhana Ek Din
    Dinesh Pathak
    240 216

    Item Code: #KGP-491

    Availability: In stock

    साहित्य में प्रचलित नारों और विमर्शों के शोर-शराबे से अलग अपने एकांत में रचनारत दिनेश पाठक की अधिकांश कहानियां मानव संबंधों व विभिन्न कारणों से उनमें  बनते-बदलते सरोकारों की पड़ताल करती हैं।  
    ‘देखना एक दिन’ संग्रह की कहानियों का मूल स्वर भी इसी भावभूमि के इर्द-गिर्द हैं। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां एक विशेष परिवेश से जुड़ी दिखने के बावजूद संपूर्ण भारतीय समाज के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत करती हैं। बहुआयामी धरातल की इन कहानियों में गांव व कस्बे का जीवन तो है ही, साथ ही उनका संघर्ष, उनका जुझारूपन, उनके सुख-दुःख, उनकी आशा-निराशा, उनके बनते- ध्वस्त होते सपने तथा मूल्य संक्रमण के कारण उत्पन्न मानसिक विचलन और इन सबसे इतर जीवन के प्रति उनकी गहन आस्था व गहरी जिजीविषा है। यही कारण है कि वे पराजित नहीं होते, पराजय के बीच से फिर-फिर उठ खड़े होते हैं। यहां ठेठ ग्रामीण जीवन से निकले पात्र भी हैं जिनके लिए जीवन सदा सोद्देश्य है, आधुनिक जीवनशैली व चकाचौंध के प्रति आसक्त चरित्र भी हैं, राजनीतिज्ञों के दुश्चक्र में फंसकर सामाजिक सरोकारों के योद्धा रूप में विकसित होते-होते अपनी संभावनाओं से भटक जाने वाले व्यक्ति भी हैं तो यहां अपनी अस्मिता को तलाशती और उसके लिए जूझती ऐसी स्त्रियां भी हैं जो अंततः विद्रोह की हद तक जा सकती हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक में कथाकार ने भाषा को किसी उलझाव में डाले बिना अत्यंत सहज-सरल भाषा-शैली में कथ्य को, परिवेश को, चरित्रों को और परिवेशगत बेचैनी व छटपटाहट को पूरी विश्वसनीयता, प्रामाणिकता तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ये कहानियां आदि से अंत तक न केवल अपने पाठकों को बांधे चलती हैं बल्कि उन्हें झकझोरने से भी नहीं चूकतीं।

  • Kirti Choudhary Ki Kahaniyan
    Kirti Chaudhary
    150 135

    Item Code: #KGP-9087

    Availability: In stock


  • Guru-Dakshina
    Sanjiv Jaiswal
    300 270

    Item Code: #KGP-784

    Availability: In stock

    गुरु-दक्षिणा
    "सर, आप चाहते थे कि मैं केवल दो रातों के लिए आपके पास आ जाऊं लेकिन आपका बेटा पूरी जिंदगी के लिए मुझे यहाँ लाना चाहता है," दीपा ने एक-एक  शब्द पर जोर देते हुए कहा ।
    सड़ाक...सड़ाक...सड़ाक...जैसे नंगी पीठ पर चाबुक पड़ रहे हों। प्रो. कुमार का सर्वांग कांप उठा। उन्होंने कभी स्वप्न में भी ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की थी।  दीपा ने एक झटके में उनके चेहरे का नकाब नोच डाला था। अपने बेटे के सामने ही उन्हें नंगा कर दिया था। उनका चेहरा सफेद पड़ गया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सारा रक्त चूस लिया है।
    अवाक तो प्रकाश भी रह गया था। चंद क्षणों तक तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करें। फिर उसने दीपा की बाहों को पकड़ झिंझोड़ते हुए कहा, "दीपा, तुम होश में तो हो। तुम्हें मालूम है कि तुम क्या कह रही हो?"
    "अच्छी तरह मालूम है लेकिन शायद तुम्हें नहीं मालूम कि तुम्हारे डैडी रिसर्च पूरी कराने के लिए मुझसे क्या गुरु-दक्षिणा मांग रहे थे । यदि सत्य उजागर किए बिना मैं तुमसे शादी कर लेती तब तुम्हारे डैडी जिंदगी भर मुझसे आंखें न मिला पाते । वे भले ही गुरु का धर्म भूल गए हों लेकिन मैं शिष्या का धर्म नहीं भूली हूँ। इसलिए अपनी बहू के सामने आजीवन जलील होने की जलालत से मैं उन्हें मुक्ति देती हूँ। यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी ।"

    -इसी संग्रह से
  • Zanjeer Bol Uthi
    Jaidi Zafar Raza
    180 162

    Item Code: #KGP-1839

    Availability: In stock

    ज़ंजीर बोल उठी
    घटनाओं का कालक्रम में होना इतिहास नहीं बुनता। हाँ, घटनाएँ जब ठहरकर संवाद की स्थिति बनाती हैं और समय के भाल पर अपना निशान छोड़ जाती हैं तो इतिहास के अंकुर स्वतः फूट पड़ते हैं। डॉ जै़दी के कहानी-संग्रह ‘ज़ंजीर बोल उठी’ की चार-पाँच कहानियाँ शुद्ध ऐतिहासिक हैं। इनमें व्यथा भी है और आक्रोश भी। कारण यह है कि ये अपने समय की ज़मीनी सच्चाई और बुनियादी सवालों को उठाती हैं और तर्क एवं तथ्य की तलाश में वर्तमान से अतीत तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें बौद्धिक संवादों की टकराहटों के बजाय समय की ओट में छुपी विसंगतियों को उधेड़ने की शक्ति है जो सियासी शतरंज की बिसात को उलटने का साहस रखती है। इन कहानियों के तेवर तीखे और तल्ख़ ज़रूर हैं, मगर साथ ही इन कहानियों में संवेदनारूपी सरिता का प्रवाह बड़ी सहज गति से बहता महसूस होता है, जो शब्दों पर विश्वास को बहाल और निराशा को आशा में बदलने में ख़ासा सक्षम है। ये कहानियाँ अपने ईमानदाराना प्रयास के चलते अरसे तक पढ़ने वालों की सोच में अटकी रहेंगी।
  • Bol Ri Kathputali
    Malti Joshi
    120 108

    Item Code: #KGP-9032

    Availability: In stock


  • Kasbe Ka Aadmi
    Kamleshwar
    180 162

    Item Code: #KGP1560

    Availability: In stock

    ‘नयी कहानी’ आंदोलन ने हिंदी साहित्य को जो बड़े रचनाकार दिए उनमें कमलेश्वर का नाम प्रमुख है। इस आंदोलन ने सहसा एक नई पीढ़ी की ऊर्जावान, क्षमताशील और नवताप्रिय रचनाशीलता को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। इसके प्रमुख रचनाकार व सिद्धांत-शिल्पी के रूप में कमलेश्वर का ऐतिहासिक योगदान सर्वस्वीकार्य है। कमलेश्वर ने अपनी कहानियों में किस्सागोई और आधुनिक जीवनदृष्टि का ऐसा सहमेल किया कि एक व्यापक पाठक वर्ग में उनको आदर प्राप्त हुआ। स्थानीयता के प्रति उनमें सहज प्रीति थी। इसलिए जब उन्हें और उनके समकालीन कुछ कहानीकारों को ‘कस्बे का कहानीकार’ कहा गया तो उन्हें कुछ खास एतराज न हुआ। कमलेश्वर तो बस सामान्य जनजीवन के कुछ अनछुए सत्य अपनी कहानियों में प्रकट करना चाहते थे।
    ‘कस्बे का आदमी’ कमलेश्वर की उन कहानियों का संग्रह है जिन्होंने उनके कहानीकार के सरोकार विस्तृत किए। एक सुसंपादित शिल्प, भाषा, संवाद, विवरण आदि के साथ सामने आई रचनाओं में नए युग का तेज था। कमलेश्वर जनसमुद्र में उठने-गिरने वाली लहरों पर लिखी इच्छाओं, हताशाओं, स्वप्नावलियों और कोशिशों को बखूबी पहचानते थे। वे परंपरा भंजक भी थे और नवीन प्रस्तावों के प्रेरक भी। यही कारण है कि प्रस्तुत संग्रह में शामिल कहानियां जीवन का नया आस्वाद देती हैं। हालांकि जीवन जाना-पहचाना है लेकिन जिस कोण से लेखक ने इसे देखा-परखा वह चैंकाता है। कहानियों में जीवन संवाद करता है। एक कहानी के वाक्य हैं, ‘व्यक्ति इत्र छिड़ककर फूल सूंघता हुआ इन फटेहालों के बीच से निरपेक्ष होकर गुजर सकता है, आदमी नहीं। व्यक्ति सुरक्षा चाहता है, आदमी स्वतंत्रता चाहता है। सुरक्षा और स्वतंत्रता में बड़ा अंतर है।’ यह संग्रह ‘नयी कहानी’ की आंदोलनधर्मी सक्रियताओं से उत्पन्न चेतना से ओतप्रोत है। कमलेश्वर की जादुई भाषा जैसे इनमें बोलती है। अपने समय के तमाम उद्वेलनों को व्यक्त करता एक महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह।
  • Antarmilan Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-754

    Availability: In stock

    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।

  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Ped Khaali Nahin Hai
    Narendra Nagdev
    380 342

    Item Code: #KGP-9323

    Availability: In stock

    प्रतिष्ठित कथाकार नरेन्द्र नागदेव हर कहानी के फलक पर अपने पूरे कलामय व्यक्तित्व के साथ मौजूद होते हैं, वह भी पूरी एकाग्रता के साथ, कहानी दर कहानी बदलती हुई तस्वीरों में एक स्थायी लय की तरह। उनकी कहानियों की संरचना में तीनों स्वर साथ-साथ चलते हैं—मूल्यों के अंकन की जिद, उनके विघटन का यथार्थ और इन्हें सतत देखती अंतरात्मा की आंख, जिसे कथाकार की केंद्रीय दृष्टि भी कहा जा सकता है।
    उनकी कहानियां वर्तमान और अतीत, कल्पना और यथार्थ, सही और गलत तथा मन के अंधेरों और उजालों के बीच झूलती हुई सी चलती हैं। वे अपनी आत्मीयता, संवेदनशीलता, और स्मृति संपन्नता के प्राचुर्य के साथ अपनी सहज उपस्थिति दर्ज कराती हैं।
    रचनाओं की मोहक भाषा, शिल्प की महीन बुनावट तथा प्रस्तुतीकरण में निजता का स्पर्श उन्हें अलग पहचान देते हैं।
    इन कहानियों का फलक विस्तृत है। एक ओर वे एक अराजक समय की चपेट में आए व्यक्ति के अंतद्र्वंद्व और मनोविज्ञान को वैयक्तिक स्पर्श के साथ उकेरते हैं, तो वहीं दूसरी ओर बाह्य विडंबनाओं को भी प्रतीकात्मक तथा सृजनात्मक ऊर्जा के साथ प्रस्तुत करते हैं। मानवीय मूल्यों को खंगालते हुए वे कभी वर्तमान के परिदृश्य को पकड़ते हैं, तो कभी सदियों के आर-पार इतिहास के पन्नों तक पहुंच जाते हैं।
    ‘पेड़ खाली नहीं है’ नरेन्द्र नागदेव की विगत आठ-दस वर्षों में प्रकाशित-चर्चित कहानियों का संग्रह है, जिसमें वे तमाम विशेषताएं विद्यमान हैं, जो उन्हें समकालीन साहित्य में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती हैं।
  • Us Raat Ki Baat
    Amrendra Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9062

    Availability: In stock


  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Chaar Lambi Kahaniyan
    Aruna Sitesh
    200 180

    Item Code: #KGP-9156

    Availability: In stock

    इस संग्रह में प्रस्तुत हैं डॉ. अरुणा सीतेश की चार बहुचर्चित कहानियां, जो धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि में लंबी कहानी अथवा लघु उपन्यास के रूप में प्रकाशित एवं प्रशंसित होकर उनके विभिन्न संग्रहों में सम्मिलित हैं । 
  • Yaksha Prashn
    Shivji Shrivastva
    110 99

    Item Code: #KGP-1946

    Availability: In stock

    यक्ष-प्रश्न
    शिवजी श्रीवास्तव नवें दशक के चर्चित कथाकारों में से हैं। 'वर्तमान साहित्य' द्वारा आयोजित कृष्ण प्रताप स्मृति कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानियों 'जाल', 'माँद' एवं 'अजगर' ने क्रमश: 1988, 1989 एवं 1990 में लगातार तीन वर्षों तक पुरस्कार जीतकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया । उनके एक रेडियो नाटक 'ऐसे तो घर नहीं बनता मम्मी' को आकाशवाणी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय रेडियो नाटय-लेखन प्रतियोगिता--1992-1993 में हिंदी वर्ग में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ । यह उस वर्ष का सर्वोच्च पुरस्कार था ।
    'यक्ष-प्रश्न' में युग की विसंगतियों से जूझते ईमानदार आदमी की कहानियाँ हैं । वस्तुत: हर युग की अपनी समस्याएं होती हैं; अपने यक्ष-प्रश्न होते हैं, जो पिछले युग से भिन्न होते है । इस युग में उपभोक्तावादी संस्कृति के विस्तार, सर्वग्रासी भ्रष्टाचार, परंपराओं की जकडन, सांप्रदायिकता इत्यादि ने आदमी को नितांत अकेला कर दिया है । इस संग्रह में आदमी के इसी अकेलेपन की व्यथा-कथा की कहानियां हैं । सामाजिक सरोकारों से जुडी इन कहानियों के विषय जिंदगी के बीच से उठाए गए है इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति कहीं न कहीँ अपने को इन कहानियों में पाता है। वस्तुत: इस संग्रह की प्रत्येक कहानी अपने में एक यक्ष-प्रश्न है, जो संवेदनशील पाठक के लिए चिंतन के नए आयाम उपस्थित करती है ।
  • Jalti Chhaya
    Prabha Saxena
    50 45

    Item Code: #KGP-9068

    Availability: In stock


  • Vaya Pandepur Chauraha
    A.M. Nayar
    350 315

    Item Code: #KGP-249

    Availability: In stock

    डा. नीरजा माधव हिंदी कथा-साहित्य का एक जाना- पहचाना नाम है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तथा छोटी कक्षाओं में भी उनकी कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़ाए जा रहे हैं। नित नई और अनछुई भूमि पर अपना कथानक रचने वाली डा. नीरजा माधव ‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’ के माध्यम से ‘इम्पोटेंट इन्टेलीजेंसिया’ का एक भीतरी चेहरा बेनकाब करती हैं। किस तरह आज का बुद्धिजीवी मुखौटा लगाए सामाजिक सरोकारों की बात करता है, किस प्रकार शस्त्र बने शब्दों का मुंह स्वयं अपनी ओर घूम जाता है और हम तिलमिला उठते हैं अपना ही असली चेहरा देख। मानव मन की कृत्रिमता और विवशता को परत दर परत उधेड़ने वाली अलग ढंग की कहानियों का अनूठा संग्रह है--‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’।
  • Prernasrot Tatha Anya Kahaniyan
    Sanjeev
    70 63

    Item Code: #KGP-9081

    Availability: In stock


  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Peeth Peechhe Ki Duniya
    Neelam Chaturvedi
    200 180

    Item Code: #KGP-1833

    Availability: In stock

    पीठ पीछे की दुनिया
    कहानियां अब भावहीन हो जाना चाहती हैं। बहुत सारी आशाओं, सपनों और कसमों से जरा अलग हटकर। सांस लेना चाहती हैं। सीमाओं के परे पढ़ने वाले के अंतर्मन में पैठने वाली। नीलम की कहानियां सहजता से यह सब करती हैं। उन्होंने बातचीत की भाषा को इसके लिए चुना है। बोलने वाली भाषा। जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखें। हू ब हू।
    नीलम की कहानियां व्यंग्य का सहारा लेकर किसी चरित्र को उधेड़ती नहीं हैं। वे संबंधों को अनेक स्तरों तक ले जाने के लिए हैं। उनका ताप दफ्तरों में धीमे-धीमे सांस ले रहे लोगों को उकसाता है। बहुरंगी और मानवीय चरित्र अपने आप को कितना विचित्र बना डालने के लिए आतुर है। कहानियां यह इंगित करती हैं। पीठ पीछे की निस्संग दुनिया को देख पाना नीलम ने संभव किया है।
    संबंध जब बोझ बन जाते हैं तब नैतिकता घुलने लगती है। नीलम ने बहुत साहस से, अनेक कहानियों से इसे हम तक पहुंचाया है। यहां मध्यम संगीत की अनुगूंजें हैं। जैसे जीने का विश्वास। अदम्य। अचूक। प्रेम की टूटती डोर में, अवसाद में भी यह कला, आकर्षण की ओर ले जाती है।
    यह कहानी-संग्रह नए कथा क्षेत्र में सादगी, विस्तार और अनुपम अनुभवों से हमें संपन्न बनाता है।
  • Durg-Bhed
    Deepak Sharma
    50 45

    Item Code: #KGP-9110

    Availability: In stock

    दुर्ग-भेद
    "अजीब संयोग है, आप दोनों ही किसी एक चीज को चाहने और पाने को इतना अधिक महत्व देते है कि अपना सारा अस्तित्व ही उस एक के प्रति अर्पित कर देना चाहते है । पर क्या अपनी शक्तियों व इन्द्रियों को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर जब आप अपनी परिधि निर्धारित का लेंगे तो अपनी स्वतन्त्रता नहीं खो बैठेंगे ? जब मुक्त गीत आपको पुकारेंगे  तो क्या आप उसी संकीर्ण दुर्ग में बँधे रह पायेंगे ?" "जब उस दुर्ग को अभेद्य व अपारदर्शी बनाए रखने का उत्तरदायित्व ही हमीं पर होगा तो क्यों हम...", "हाँ तो क्यों आप सुमन व सुमन के माता-पिता की तरह उसी प्रकार के लौहगढ़ में बंद नहीं हो जाएँगे, जहाँ निजी स्वार्थी घेरों में कैद आप हर क्रन्दन , हर उत्सव से अछूते , पैसे कमाने के लिए कोरे, रूखे व कठोर चेहरे लिए दिन-रात मेहनत करते चले जाएँगे ।"
    (कहलीं-संग्रह की 'दुर्ग-भेद' काली से)

  • Piya Peer Na Jaani
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-1982

    Availability: In stock

    पिया पीर न जानी
    इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खडे होकर, स्वाधीनना की पचासवीं वर्षगाँठ मनाते हुए भी यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि भारतीय नारी पूर्णरूपेण स्वतंत्र है ।
    परम्यरा की, रूढियों की, सनातन संस्कारों को अर्गलाएँ आज भी उसके पाँवों को घेरे हुए है । आर्थिक स्वातंत्र्य का झाँसा देकर उसे अर्थार्जन में भी झोंक दिया गया है । अब वह घर और बाहर दोनों तरफ पिसती है--दो-दो हुक्मरानों के आदेशों पर नाचती है । इस मायने में वह सोलहवीं सदी की नारी से भी जादा शोषित और असहाय हो गई है ।
    पर हाँ, इधर कुछ वर्षो में छटपटाने लायक ऊर्जा उसने अपने में भर ली है । इसीलिए कभी-कभी इन बंधनों को तोड़ने में भी वह सफल हो जाती है ।


  • Ibne Mariyam
    Nasera Sharma
    240 216

    Item Code: #KGP-17

    Availability: In stock

    इब्ने मरियम 
    'इब्ने मरियम' की कहानियाँ निश्चय ही यह प्रमाणित करने में सक्षम हैं कि नासिरा शर्मा का रचनात्मक कैनवास व्यापक है । वह किसी भी तरह अपने दायरों में सिमटी-सिकुड़ी एकरसता में डूबी कहानियां नहीं लिखतीं । उनके पास वास्तव में एक ‘जहांनुमा' आईना है, जिसमें वह दुनिया-जहान को देखती है । उनकी कहानियों का भूगोल  किसी शहर, प्रान्त या देशों की सरहदों में कैद नहीं है, बल्कि उनके पास आर-पार और दूर-दूर तक देखने वाली दृष्टि है और यह दृष्टि सही मायनों में मानवीय है, भाईचारे का पैगाम देने वाली है । और भी कहें तो 'विश्व मानवता' का इतिहास रचने वाली है । वह इनके माध्यम से कहना चाहती हैं कि भाषा, प्रांत, धर्म, जाति, देश, सरहद, फौज, गोला-बारूद जैसा सबकुछ केवल अपनी कुंठाओं को बचाने और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के हथियार है, जो कभी भी सफल नहीं हो सकते । सर्वोपरि सिर्फ इंसान है और उसकी इंसानियत है, जिसे सात तालों में  भी कैद नहीं किया जा सकता । वह बहुत दूर तक देखती हैं और आत्मसात का अपने व्यापक कैनवास पर 'पेष्ट' करती है । इस रूप में उनके लिए सबसे अलग और सफल कथाकार होने का दावा किया जा सकता है ।
  • Chhotoo Ustaad
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-728

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में संकलित कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानियां आकार में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में ‘बड़ी’। ये लघुकथाएं नहीं हैं। लघुकथा अकसर एकायामी कथ्य की वाहक होती है और एक निश्चित बिंदु पर प्रहार करती है। जबकि ये कहानियां बहुपर्ती हैं और आपकी पूरी विचार प्रक्रिया को प्रभावित बल्कि परिवर्तित कर देती हैं। मसलन ‘हत्या’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो जंगल के राजा शेर को सर्कस में रिंग मास्टर के इशारे पर भीत गुलामों की तरह व्यवहार करते देख रो पड़ता है तो ‘बिछुड़ने से पहले’ सड़क और पगडंडी की बातचीत के बहाने विकास के पूंजीवादी मॉडल को प्रश्नांकित करती है। रेटोरिक का इस्तेमाल जिन बहुत ही कम कहानीकारों ने हथियार की तरह किया है उनमें स्वयं प्रकाश एक हैं। ‘सुलझा हुआ आदमी’ में बहुत बोलने वाले और व्यवहार में इससे उलट आचरण करने वाले लोगों पर ‘कहता है’ के माध्यम से बड़ी तीखी गुम चोट की गई है।
    ये कहानियां किसी बड़े कलाकार--मसलन--यामिनी रॉय या मकबूल फिदा हुसैन के रेखाचित्रों की याद दिलाती हैं जिनमें न डिटेल्स की पेशकश होती है, न रंगों का पसारा, लेकिन फिर भी जिनमें कम से कम रेखाओं के माध्यम से एक अभिभूत कर डालने वाली माया का सृजन हो जाता है! और यही इन रचनाओं की सबसे बड़ी खूबी है। पाठकों को इन कहानियों को पढ़ते समय परसाई जी की या आचार्य अत्रो की या पु. ल. देशपांडे की याद आए तो इसे अपनी परंपरा में सुरभित पारिजात के नन्हे फूलों की पावन सुगंध् ही समझना चाहिए। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये अद्भुत कहानियां पहली बार किसी संकलन में प्रकाशित हो रही हैं।
  • Maanush Gandh
    Suryabala
    200 180

    Item Code: #KGP-53

    Availability: In stock

    मानुष-गंध
    अपने इस कथा-संग्रह में सूर्यबाला फिर से कथ्य और शिल्प के अपने पुराने प्रतिमानों को तोड़ती नजर आती हैं।
    एक तरफ ‘क्रासिंग’ और ‘क्या मालूम’ जैसी कहानियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों के कुछ अनूठे और अबोध रहस्यों को थहाती हैं तो दूसरी तरफ ‘जश्न’ और ‘तिलिस्म’ भावुकता को थिराते हुए एक विरल कथा-रस की सृष्टि करती हैं।
    कुछ ऐसा लगता है जैसे लेखन में चलने वाले ट्रेंड, फैशन से सूर्यबाला को परहेज-सा है। लेकिन इसका अर्थ, समय की तल्ख सच्चाइयों से मुकरना या उन्हें नकारना हर्गिज नहीं है। इसी तरह अपनी कहानियों के कैनवस पर, ‘लाउड’ और अतिमुखर रंग-रेखाओं के प्रयोग से भी बचती हैं वे। उनके पात्रों के विरोध और संघर्ष मात्र विध्वंसक न होकर विश्वसनीय और विवेकसम्मत होने पर ज्यादा जोर देते हैं।
    सिद्धांतों, वादों और आंदोलनों के ऊपरी घटाटोपों से बचती हुई जिजीविषा की भरपूर मानुष-गंध लेकर चलती हैं इस संग्रह की कहानियाँ।
  • Encounter-E-Love Story Tatha Anya Prem Kahaniyan
    Shyam Sakha 'Shyam'
    200 180

    Item Code: #KGP-1843

    Availability: In stock

    एनकाउंटर-ए-लव स्टोरी तथा अन्य प्रेम कहानियां
    डॉ. श्याम सखा 'श्याम' की कहानियां, देह में आती-जाती ठहरती-बिछलती सांसों की तरह हैं। इनमें आशाओं की ऊष्मा है, निराशा की ठंडक है, उत्साह और आत्मविश्वास की आंच हैं। इन कहानियों का आकार भी सांसों की ही तरह लघु-दीर्घ और मदमय है, सब कुछ अनायास और निश्चित, एक लय-ताल में बद्ध । कहीं छोटी भी ही सांस में देह में दीप्ति है तो कहीं दीर्घ श्वास ने पूरी काया को कंपित कर दिया है।
    जैसे श्यास ही जीवन का सूचक है, वैसे ही कहानी की रोचक वस्तु ही प्राणधार है। सेक्स की लंतरानी को जगह प्रेम की फुहार हैं। यहां रंगरलियां नहीं हैं, अंगरलियां हैं और उसकी स्वनिर्मित सैंद्धन्तिकी भी हैं। पठनीयता इस कदर कि हाथ से कहानी रखते न बने; गालिब की भाषा में 'बुझाए न बने ' सी हालत.. बस संग्रह की हर कहानी ऐसी ही आतिश है जिस पर कांई जोर नहीं चलता।
    इन कहानियों का कैनवास बहुत बड़ा है। सभी वर्गों की जिंदगियां यहां हाथ उठाए खडी हैं कि पहले हमारी तरफ देखो । पाठक विस्मय से इन सबकी ओर उत्सुक भाव से देखता है । वह जिसका हाथ पकड़ लेता है, वही उसे एक ऐसे अनुभव संसार में ल जाती है जो उसके लिए अपरिचित भले न हो परंतु परिचित भी नहीं था; जैसे कोई किमी मुहल्ले के मुहाने तक तो पहुंचा हो, परंतु भीतर कभी न जा सका हो।
    ये कहानियां, मन और ममाज के ऐसे ही अल्प-परिचित मुइल्लों में पाठक को खींच ले आती हैं। श्याम सखा 'श्याम' एक समर्थ कथाकार है, कहना चाहिए कि इंसानी जिंदगी के कुशल लेखा-जोखाकार हैं। इनकी नाप-जोख, ऐसी जानी पहचानी और अपनत्व वाली भाषा में है जी पल भर का भी पराई नहीं लगती।
    एक ओर किशोर प्रेम की कोमलांगी कहानी रसभरी पाठक को उसकी अपनी किशोर अवस्था के स्नेह कणों से भिगो देती है तो दूसरी ओर प्रेमिका की मजबूरी व एनकाउंटर- ए-लव स्टोरी प्रेम के भयावह यथार्थ को उकेरती सफल कहानियां हैं। एनकाउंटर शब्द प्रेम के साथ अजीब लगते हुए भी कहानी शीर्षक की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल है ।
  • Bhartiya Bhaashaaon Ki Shreshtha Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    260 234

    Item Code: #KGP-73

    Availability: In stock

    भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियां 
    प्रस्तुत संकलन में भारत की सोलह प्रमुख भाषाओं की सोलह प्रतिनिधि कहानियां समाविष्ट की गई हैं । कश्मीर से कन्याकुमारी तक का परिवेश किसी हद तक इनमें प्रतिबिंबित हुआ है । ये कहानियां हमें मात्र छूती-छेड़ती ही नहीं, बल्कि हँसाती, गुदगुदाती और कहीं-कहीं रुलाती भी हैं । साथ ही बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करती हैं ।
    इनमें भारत के स्थूल स्वरूप का प्रतिबिंबन ही नहीँ, भारत की अंतश्वेतना का स्पंदन भी मिलेगा और भारत की माटी की गंध भी ।
    क्या है भारत ? क्या है उसकी अस्मिता की पहचान ? क्या हैं उसकी खूबियाँ ? खूबियों के साथ-साथ खामियां भी। यथार्थ के धरातल पर अंकित ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर इन जीती-जागती, बोलती-बतियाती कालजयी कृतियों में अनायास उपलब्ध हुए बिना नहीं रहेंगे ।
    इनमें अतीत या वर्तमान ही नहीं, भविष्य का अंधकार से उबरता उजास भी है । अपने समग्र रूप में एक बृहुत् समाज, जो कहीं एक देश का ही नहीं, महादेश की पर्याय  भी बन जाता है। ये साधारण-सी कहानियां अपने में  अनेक असाधारण संसार सहेजे हैं ।
  • Khoyi Huyi Thati
    Ganga Prasad Vimal
    50 45

    Item Code: #KGP-9064

    Availability: In stock


  • Devinder Ki Kahaniyan
    Devindra
    125 113

    Item Code: #KGP-1828

    Availability: In stock


  • Qabra Tatha Anya Kahaniyan
    Raj Kumar Gautam
    150 135

    Item Code: #KGP-1845

    Availability: In stock


  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225 203

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-3)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1578

    Availability: In stock


  • Badalte Rang
    Ram Swaroop Arora
    150 135

    Item Code: #KGP-1826

    Availability: In stock

    बदलते रंग
    समय परिवर्तनशील है। समयानुसार सभी प्राणियों में श्रेष्ठ मनुष्य जाति की जीवन शैली एवं संस्कृति भी इस बदलाव से अछूती नहीं रही है। जो जीवन पद्धति, सभ्यता-संस्कृति आज से कुछ ही वर्ष पूर्व तक थी, वह आज परिवर्तित होकर कहाँ की कहाँ पहुँच गई है। हमारा राष्ट्र कालचक्र के प्रवाह से एक नए युग की ओर बढ़ रहा है। कहा नहीं जा सकता कि परिवर्तन का यह रंग उसे किस प्रकार के विकास की ओर ले जाएगा अथवा पतन के गर्त में पहुँचा देगा। इक्कीसवीं शताब्दी का कालक्रम इसका साक्षी होगा।
    प्रस्तुत संग्रह में कुछ कहानियाँ भारतीय स्वतंत्रता के भूले-बिसरे क्रांतिकारियों के जीवन-वृत्त से, कुछ सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन, निजी अनुभव एवं राजस्थान के ग्रामीण कृषि संबंधी कार्यकलापों से तथा कतिपय कथागल्पों से संबंधित हैं, जो हमारे आसपास के जनजीवन पर गहन प्रभाव डालती हैं।
    विद्वान् पाठक इन्हें पढ़कर विचार करें कि हम, हमारा राष्ट्र व समाज तब कहाँ थे और आज कहाँ आ पहुँचे हैं ? क्या हमारा वास्तविक विकास हुआ है ? या अब तक विकास के नाम पर किया गया समस्त कार्य एक छलावा मात्र है तथा अनैतिक, भ्रष्ट एवं पतन की ओर ले जाने वाले कार्यों का एक पुलिंदा है ? मैं अपनी बुद्धि-कल्पना एवं भावनाओं के अनुरूप जो कुछ लिख सका, वह सब आपकी सेवा में समर्पित है।               
    --रामस्वरूप अरोड़ा
  • Kachche Resham Si Larki
    Amrita Pritam
    250 225

    Item Code: #KGP-9079

    Availability: In stock


  • Jalte Huye Daine Tatha Anya Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    225 203

    Item Code: #KGP-25

    Availability: In stock

    जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियाँ
    'जलते हुए डैने' से 'इस बार' तक की कथा-यात्रा के ये अनेक पड़ाव है । अनुभव एवं अनुभूतियों के कई अक्स ! जीवन और जगत में जो हो रहा है, उसके कुछ धुँधले, कुछ उजले रेखा-चित्र ! पर रेखा-चित्रों में यथार्थ की मात्र रेखाएँ ही नहीं, कहीं-कहीं कुछ रंग भी है, जो मिट कर मिटते नहीं । घुलने के बावजूद भी घुलते नहीं । स्मृति-पटल पर ऐसे अंक्ति हो जाते है, जैसे पाषाण पर उकेरी गहरी रेखाएँ । रेखाओं की भी अपनी भाषा होती है । रेखाओं के भी अपने सुख-दु:ख, अपनी व्यथा-वेदना होती है ।  इस निखिल सृष्टि में ऐसा कुछ भी तो नहीं, जो अर्थपूर्ण न हो ! जिसकी अपनी कोई सार्थकता न हो !
    अनेक सत्यों को परिभाषित करती ये सरल, सहज, सपाट-सी कहानियाँ, कहीं कुछ न कह कर भी कितना कुछ नहीं कह जाती । असत्य का यथार्थ, सत्य के यथार्थ से सम्भवत: आज़ अधिक गहरा होता है । अधिक विस्तृत, अधिक प्रामाणिक । प्रासंगिक ही नहीं, अधिक आकर्षक भी । शायद इसलिए हर दौड़ में सत्य के पाँव, झूठ से पीछे रह जाते हैं ।  पर असत्य जीत कर भी हार क्यों जाता है ? जल में पड़ी परछाई पकड़ने की तरह आदमी कुछ चाहता है । परन्तु जो है, और जो होना चाहिए के बीच की संधि-रेखा इतनी धुँधली क्यों है ?

  • Tinke-Tinke
    Nisha Bhargva
    165 149

    Item Code: #KGP-1806

    Availability: In stock

    निशा भार्गव के लघु कथा संग्रह, 'तिनके-तिनके' में परिवर्तित जीवन मूल्यों के छोटे-छोटे सच हैं, स्त्री प्रश्न, परिवारिक-सामाजिक वैषम्य और संबंधों की आइरनी दर्शाती छोटी-छोटी घटनायें हैं, जिन्हें अर्थकेंद्रित जीवन की आपाधापी में रोज़मर्रा की बाते समझकर, 'यह सब तो होता ही रहता है', वाले खाने में डालकर अदेखा किया जाता है ।
    हमारी आसपास की दुनिया में आए दिन काफी कुछ घटता रहता है। चौतरफ हेर फेर, अनाचार, स्कैम्स, आतंकी हमलों से लेकर, स्त्रियों से दुराचार, वृद्धों की अवमानना एवं आत्महत्याओं से टीवी और समाचार पत्र भरे रहते है । ऐसे में देखने सुनते में साधारण और औसत, पर चीन्हने में अर्थगर्भित ये बातें महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि गुट्ठिल होते जीवन में हमारा दिलोदिमाग, जो अशुभ और अनाचार सुनने का आदी हो गया है उसे हुन रोज़मर्रा के सुख-दु:ख, राग-विराग, प्रेम, ईषर्या और ईमानदारी की छोटी-छोटी घटनाओं से रू-ब-रू करा कर, उसकी संवेदनशीलता को टहोका जाय । शायद नज़र अंदाज होती ये छोटी-छोटी घटनाएं उन्हें अपने भीतर झांकने को प्रेरित करें । इनमें उन्हें खुशहाल जिन्दगी के कुछ छोटे-बड़े नुस्खे मिल जाये, जिनसे आए दिन के तनावों और घरेलू कलहों से कुछ तो मुक्ति मिले ।
    निशा नाउम्मीदी में भी संस्कारशील व्यक्ति और स्वस्थ समाज की उम्मीद नहीं छोड़ती । उसे अच्छाई पर भरोसा है यह भरोसा वह अपने पाठकों को सौंपना चाहती है । सीधी-सादी बोलचाल की भाषा में निशा बडे प्रश्न उठाती है । कैंसर की मरीज चारु, मौत के  इंतजार में सजना-संवरना क्यों छोडे? पचपन की उम्र में अकेली पडी शशि का पुनर्विवाह उसका गुनाह क्यों साबित किया जाय ? इस छोटे से जीवन को बयों भरपूर न जिया जाय ?
    बिना किसी भाषायी करिश्मे और दावे के निशा इस तिनके-तिनके  संग्रह में, स्मृतियों में अटके , यादों-स्थितियों के कुछ तिनके संजोकर बतकहियों और किस्सों के माध्यम से पाठकों से संवाद करती है, देखे जिए क्षणों को, छोटे-छोटे अनुभवों को सहज संवेदना से रेखांकित कर संधि पाठक तक पहुंचती है । इनकी सादगी ही इनकी खूबी हैं ।
  • Ek Thi Sara
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1978

    Availability: In stock

    एक थी सारा

    मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है
    लेकिन मैं उनका जायका नहीं बन सकती
    मैं टूटी दस्तकें झोली में भर रही हूँ
    ऐसा लगता है पानी में कील ठोक रही हूँ
    हर चीज़ बह जाएगी—मेरे लफ्ज, मेरी औरत
    यह मशकरी गोली किसने चलाई है अमृता !
    जुबान एक निवाला क्यूँ कुबूल करती है ?
    भूख एक और पकवान अलग-अलग
    देखने के लिए सिर्फ 'चाँद सितारा' क्यूँ देखूँ ?
    समुंदर के लिए लहर ज़रूरी है
    औरत के लिए जमीन जरूरी है
    अमृता ! यह ब्याहने वाले लोग कहाँ गए ?
    यह कोई घर है ?
    कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा... 
    मैंने बगावत की है, अकेली ने,
    अब अकेली आंगण में रहती हूँ
    कि आजादी से बड़ा कोई पेशा नहीं
    देख ! मेरी मज़दूरी, चुन रही हूँ लूँचे मास
    लिख रहीं हूँ
    कभी मैं दीवारों में चिनी गई,
    कभी बिस्तर से चिनी जाती हूँ... 
    [इसी पुस्तक से]

  • Gyarah Shreshtha Kahaniyan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-804

    Availability: In stock

    ग्यारह श्रेष्ठ कहानियां
    हिंदी कहानी ने अपनी यात्रा में अनेक सुगम और दुर्गम मार्ग तय किए हैं । वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आए अनेक आख्यान हमारी कहानी-परंपरा के आदि स्रोत रहे हैं । सर्जना की सर्वथा लोकप्रिय विधा रहने के कारण कहानी, लेखकों की लेखनी की लाडली विधा भी बनी रही और संभवत: इसीलिए कहानी के अलंकरण और उपयोग निरंतर विकासमान रहे । प्रेमचंद और प्रसाद ने हिंदी कहानी को जिस श्रेष्ठ लोकहित में मर्यादित और निर्धारित किया, उसकी अनुगूँजें आज भी हिंदी के युवा कथाकारों की रचनाओं में प्रवहमान है ।
    जनप्रियता के कारण हिंदी कहानी की गति को खूब-खूब  उतार-चढाव भी देखने पड़े तथा कथा-आंदोलनों के शोर में विशिष्ट कहानियों के प्रभामंडल का पहचान पाना तक एक मुश्किल कार्य हो गया । कहीं अनुभूत यथार्थ के चित्रण  का शोर, तो यहीं कल्पनावृत्ति को तिलांजलि देने की जिद । ऐसे में कहानी की रचनाशीलता को समग्रता में हानि पहुंची। मगर इस गुलगपाड़े के बीच जो अच्छी कहानियाँ लिखी गई, वे ही अंतत: हमारी कथा-धरोहर भी बनती गई हैं।
    प्रस्तुत संकलन से संपादकद्वय ने हिंदी की ऐसी श्रेष्ठ कहानियों को प्रस्तुत किया है जो अपने पाठ के माध्यम से हमें लौकिक बनाती हैं तथा हमारे सामाजिक संज्ञान और सरोकारों को, समय की कसौटी पर कुशलता से स्थापित और उद्वेलित करती हैं। व्यक्ति भले ही न रहे, मगर पात्र का चित्रण उस व्यक्ति का शाश्चता सौंप सके-ऐसी क्षमता जिन कहानियों में समाहित है-उन्हें ही प्रस्तुत संग्रह में संकलित किया गया है । प्रेमचंद, जयशंकर पसार तथा विष्णु प्रभाकर आदि वरिष्ट कथाकारों की कालजयी कहानियों के साथ-साथ, अन्य सुप्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ भी पाठक एवं साहित्य के छात्र इस एक ही जिल्द से पढ़कर लाभान्वित होंगे, इसी आशमा और अपेक्षा के साथ यह संग्रह आपको सौंपा जा रहा है ।
  • Ek Jala Huaa Ghar
    Iqbal Mazeed
    140 126

    Item Code: #KGP-1837

    Availability: In stock

    एक जला हुआ घर
    आज के पाठक को जिन चीज़ों को दुनिया में, अपने आसपास या अपने भीतर भी देखकर जो हैरत-सी होती है, यह उन्हीं हैरतों की कहानियाँ हैं।
    साहित्य को इनसान से, समाज से, जीवन से, संस्कृति और राजनीति से नए संबंध स्थापित करने पर प्रगतिशील आंदोलन ने जो ज़ोर दिया था यह उन्हीं संबंधों द्वारा जीवन के सौंदर्य, उसकी उठान और उभार को समझने का एक प्रयास है।
    कहानी का यथार्थ समाचार-पत्रों और अदालतों में प्रस्तुत किए गए यथार्थ से कैसे अलग होता है उसके लिए यह अंतर जानना, जो फिक्शन से जुड़ाव नहीं रखता, मुश्किल है। इसके अतिरिक्त कोई दावा करना या कहानियों से यह उम्मीद करना कि वह गलत होने वाली चीजों को ठीक कर देंगी, मूर्खता है; क्योंकि हर चीज़ साहित्य से ठीक नहीं की जा सकती। देखना यह होगा कि साहित्य, जिसका आधार Joy of understanding होता है, ये कहानियाँ अपने पाठक को वह आनंद कितना दे पाने में समर्थ हैं और इस काम में लेखक की ओर से डंडी तो नहीं मारी गई है। अगर इन कहानियों में उस सुंदरता और शक्ति की खोज मिल जाए, जिनको नए सांस्कृतिक मूल्यों में स्थान मिल सके तो यह लेखन सफल है।
  • Moh-Bandh
    Indu Rashmi
    50 45

    Item Code: #KGP-9066

    Availability: In stock


  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Inqilaab Zindabad
    Manohar Kajal
    175 158

    Item Code: #KGP-9074

    Availability: In stock


  • Katha Ek Naami Gharaane Ki
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-769

    Availability: In stock

    हृदयेश की कहानियां जिंदगी से, खासकर उस जिंदगी से, जिसमें मुक्तिबोध के मुहावरे के अनुसार आदमी जमीन में धंसकर भी जीने की कोशिश करता है, पैदा हुई हैं। कुछ लेखक सीधे जमीन फोड़कर निकलते हैं। उसी में अपनी जड़ों का विस्तार करते हैं और नम्र भाव से अपने रेशे-रेशे से उस जमीन से ही अपनी शक्ति खाद-पानी लेकर बढ़ते हैं और अपने तथा जमीन के बीच आसमान को नहीं आने देते हैं। वे इस सत्य को बखूबी समझते हैं कि आसमान जितना भी ऊंचा हो, उस पर किसी के पांव नहीं टिकते। औंध लटका हुआ बिरवा तो किसी को छाया तक नहीं दे सकता। हृदयेश् कलम से लिखते हैं तो भी लगता है जैसे कोई जमीन पर धूल बिछाकर उसपर अपनी उंगली घुमाता हुआ कोई तस्वीर बना रहा है। उनकी उंगलियों के स्पर्श में ही कुछ होगा कि आंघियां तक वहां आकर विराम करने लगती हैं और उनकी लिखत, जिसने भाड लेख होने तक का भ्रम नहीं पाला था, शिलालेख बनने के करीब आ जाती है।
    हृदयेश ने बीच-बीच में आने वाले तमाम साहित्यिक आंदोलनों व फैशनों को गुजर जाने दिया बिना अपने लेखकीय तेवर या प्रकृति में बदलाव लाए हुए। वह चुनाव पूर्वक अपनी जमीन पर टिके रहे–न दैन्यं न पलायनम्। वह एक साथ कई परंपराओं से जुड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक रचनाकार अपने वरिष्ठों, समवयस्कों, यहां तक कि अल्पवयस्कों की कृतियों के प्रभाव को अपनी अनवधनता में सोख लेता है, जैसे पौधें की जड़ें खाद के रस को सोख लेती हैं।
  • KUCH SAMAY BAAD
    Devendra Chaubey
    180 162

    Item Code: #KGP-1563

    Availability: In stock

    कुछ समय बाद
    पहले कहानी-संग्रह से ही देवेन्द्र चौबे इस रूप में आश्वस्त करते नजर आते है कि वह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं । 'कुछ समय बाद’ की अधिकांश रचनाएं पाठक को विभ्रम से निकालकर यथार्थ से जोड़ने का काम करती हैं। 'उत्तर-कथा' के नेपाली के हों या 'छोटे-छोटे सपने' के करीमना के, कहानीकार पात्रों के जीवनानुभवों को समझते हुए उनके मन में उतर जाने की सामर्थ्य रखता है । कहीं वह मन की शांति की सच्ची खोज करता है तो कहीं व्यक्ति के सपनों के दरकने के कारणों की खोज करता नजर आता है ।
    शहर और गाँव के बीच प्रभावित होते जीवन को तो देवेन्द्र अपनी कहानियों में  लाते ही हैं, सामूहिक राजनीतिक चेतना का विवेकशील स्फुरण भी यहीं मौजूद है, जो स्थानीय हितों को अदेखा नहीं करता । चरित्रों, स्थितियों और जीवन के विविध ऐसे प्रसंगों से कहानी की जमीन अपनी ही भाषा से तलाशना देवेन्द्र को भाता है, जो व्यक्ति के अनुभव को समृद्ध करते हुए उसे और अधिक संवेदनशील बनाते हैं । उनकी रचनाओं की यह सहज विशेषता है कि वे समाज के कोनों-अंतरों में चल रहे छोटे-छोटे महायुद्धों की टोह लेती नजर आती हैं । जीवन की सहजता यहाँ उसकी विसंगतियों के साथ मौजूद है ।
    अव्यवस्थित और मनुष्य-विरोधी व्यवस्था पर कहानियों के जरिए कमेंट करना देवेन्द्र चौबे के कथाकार को अच्छा लगता है । अपनी पहली कहानी से ही जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था लिए यह कथाकार जब 'सजा' जैसी बड़ी कहानी पर पहुंचता है तो यह संकेत भी दे जाता है कि यथार्थ को पकड़ने के लिए दूरी भी कभी-कभी सहायक साबित होती है । सोवियत संघ के विघटन के बहाने लिखी गई यह कहानी गौरतलब तो है ही, गंभीर बहस भी आमंत्रित करती है ।
  • Sansaar Ki Shreshtha Kahaniyan
    Gyanchand Jain
    300 270

    Item Code: #KGP-813

    Availability: In stock

    संसार की श्रेष्ठ कहानियां
    कहानी-लेखन विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में प्रचुर परिमाण में होता आया है । उसने विश्व-साहित्य के इतिहास से अपनी एक खास जगह बनाई है। कहानी चाहे राजा-रानी के ऐश्वर्य और विलासितापूर्ण जीवन पर रची गई हो या शासन-सत्ता की बनती-बिगड़ती छवि को अंकित करती हो, वह घोर अराजकता और  असामाजिकता का चित्रण करती हो या भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के गर्त में दूबे हुए राजनीतिज्ञों का नग्न चित्र उतारती हो; देश-काल की व्यथा-कथा कहती हो या उसकी खुशहाली बयान करती हो-अंतत: होती वह आईने की तरह निर्दोष है । एकदम यथार्थ और कटु सत्य ।
    कहानियां चाहे मार्क टूवेन, जेम्स ज्वाएस, मैन्सफील्ड ने लिखी हों या बालज़क, मोपासां ने; लियो टाल्सटाय, चेखव, गोर्की ने लिखी हों या लुई जी पिरानडेलो, मारिसन, ए०ई० कोपर्ड ने; अनातोले फ्रांस, रोमानोफ  ने लिखी हों या एडवर्ड डेक्कर, हरमैन हेजरमैन्स ने, जेसिंन्टो पिकोन, कारेल कापेक, वानगी पामर ने लिखी हो या जेकब वासरमैन, मिक्सजथ, इमानोव ने; बजार्न्सन, आइजक पेरेज, लू शुन ने लिखी हो या प्रेमचंद, गुलेरी और मंटो ने-सबने अपने इर्द-गिर्द के समाज का और स्वयं भोगे हुए यथार्थ का अंकन किया है ।
    प्रस्तुत संकलन में ऊपर चर्चित अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्व-भर के लेखकों की तीस चुनिंदा कहानियां सम्मितित हैं। ये कहानियां अपने-जपने देश-काल की सामाजि- कार्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों की अंतरंग झाँकियाँ प्रस्तुत करती हैं । ये विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में पढी गई और इन्होंने लोकप्रियता के उच्चतम शिखरों को छुआ । संकलन की अंतिम चार कहानियों (एक चीनी, दो हिंदी, एक उर्दू) के अतिरिक्त शेष सभी का रूपांतरण हिंदी के वरिष्ट साहित्यकार श्री ज्ञानचंद जैन ने अत्यंत सरल और सहज ग्राह्य भाषा- शैली में किया है।
  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Surakshit Pankhon Ki Uraan
    Alka Sinha
    100 90

    Item Code: #KGP-9294

    Availability: In stock

    बारूदी गंध और धुएं से स्याह आज के आकाश पर हवाई आतंक के मनहूस बादल निरंतर मंडरा रहे हैं। हर पिछली भयावह घटना को छोअी बनाती अगली घटना अपने को बड़ा सिद्ध कर रही है। 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय ससंद पर हुए आतंकवादी हमले से देश की संप्रभुता को तो आघात पहुंचा ही है, सुरक्षा का मनोविज्ञान भी घायल हुआ है। आतंवाद की भयावहता शांति और सुरक्षा के प्रति राष्ट्र को आशंकित कर रही है, तो 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ हवाई हमला आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दे रहा है और हवाई आतंक के प्रति समूची धरती और आकाश के माथे पर चिंता और विषाद की लकीरें गहरा गई हैं। आज का समय बच्चे-बच्चे से सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की मांग करता है दरवाजे खुले छोड़कर सोने का समय बहुत पीछे छूट गया। अब तो बंद दरवाजों में भी व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस करता है। सुबह घर से निकला आदमी शाम को सकुशल लौट भी आएगा, कह पाना कठिन है। फिर भी जिंदगी चलती रहती है और चलते रहते हैं जिंदगी के कामकाज। सर्दी-खांदी की तरह भय और आतंक भी जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। ऐसी सूरत में कहानी का उद्देश्य किस्सागोई अथवा मनोरंजन कतई नहीं है। वे जमाने लद गए जब दादी-नानी के पेट से सटकर राजा-रानी की कहानियां सुनते-सुनते नींद आ जाती थी और सपनों में उड़ने वाला घोड़ा लेकर उतर आता था कोई राजकुमार।
    —अलका सिन्हा 
  • Brunch Tatha Anya Kahaniyan
    Shailendra Sagar
    225 203

    Item Code: #KGP-452

    Availability: In stock

    सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार शैलेन्द्र सागर के इस संग्रह में आज की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते उभरती सामाजिक-सांस्कृतिक टूट-फूट के तहत जटिल विसंगतियों के दुष्चक्र में फंसे पात्रों की कहानियां दर्ज हैं। अधिकांश कहानियों में स्त्री-पुरुष की परंपरागत छवियों के बरक्स उपभोक्तावादी दौर में बुनते-घुनते संबंधें में दिनोदिन पसरते तनावों, अलगावों और नए पनपते रिश्तों की ऐसी अलक्षित सच्चाइयां पूरी प्रामाणिकता के साथ नजर आती हैं जहां पुराने समय की रूढ़ भूमिकाएं धूमिल हैं और बाजारवाद के बदलते दौर में रिश्ते पहले से ज्यादा जटिल, यथार्थपरक और अवसरवादी होते जा रहे हैं। घर-परिवार से लेकर बाहर की दुनिया में संघर्षरत पात्रों की उद्विग्नता, बेचैनी और संवेदना के क्षरित होने की दास्तां यहां पूरी बेबाकी से उकेरी गई है। सच तो यह है कि संक्रमण के इस संवेदनहीन समय में निष्प्रभ पड़ते संबंधें की बारीकी से पड़ताल करती ये कहानियां आश्वस्त करती हैं कि अचूक अवसरवाद की अंदरूनी चालों को समझने के लिए हमें संवेदना संसार में लौटना पड़ेगा जहां आपको दरारों के बीच दिखेगी मुस्कराहट, अनकही टकराहटों के बीच दिखेगी मनुष्यता और हताशा के बीच कहीं से खिल उठेंगी आशा-उल्लास की कोंपलें भी...।
    विडंबनापूर्ण स्थितियों से उबरने के लिए रिश्तों की कोमलता को बचाए रखने की मुहिम छेड़ती हैं ये कहानियां...
  • Hinsaabhas
    Deepak Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-9109

    Availability: In stock

    हिंसाभास
    सामाजिक परिवेश में रची-बसी इस संग्रह की कहानियाँ आज के संघर्षरत मानव की मर्मान्तक पीडा का चित्रण अत्यन्त मर्मस्पर्शी तथा हृदयबेधक भाषाशैली में करती हैं । हमारे दैनंदिन जीवन में विषमता, नीरसता और विरक्ति का जो जहर घुल चुका है उससे हमें आगाह भी करती हैं। मानव-मानव के बीच बढती विषमता और कटुता की खाई को यदि समय रहते पाटा न गया, और सौहार्द व सदभात्र की भावना को न रोपा गया तो हम विघटन और विनाश की जोखिम-भरी जिन्दगी जीने के लिए बाध्य होकर रह जायेगे ।

  • Bevatna & Other Stories
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-9077

    Availability: In stock


  • Chinhaar
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-110

    Availability: In stock

    चिन्हार 
    "माँ, लगाओ अँगूठा !" मँझले ने अँगूठे पर स्याही लगाने की तैयारी कर ली, लेकिन उन्होंने चीकू से पैन माँगकर टेढ़े-मेढे अक्षरों में बडे मनोयोग से लिख दिया-'कैलाशो  देवी"।  उन्हें क्या पता था कि यह लिखावट उनके नाम चढ़ी दस बीघे जमीन को भी छीन ले जाएगी और आज से उनका बुढापा रेहन चढ जाएगा ।
    रेहन में चढा बुढापा, बिकी हुई आस्थाएँ, कुचले हुए सपने, धुंधलाता भविष्य-इन्हीं दुख-दर्द की घटनाओं के ताने-बाने ने चुनी ये कहानियाँ इक्कीसवीं शताब्दी की देहरी पर दस्तक देते भारत के ग्रामीण समाज का आईना हैं । एक ओर आर्थिक प्रगति, दूसरी ओर शोषण का यह सनातन स्वरुप! चाहे 'अपना-अपना आकाश' की अम्मा हो, 'चिन्हार' की सरजू या 'आक्षेप' की रमिया, या 'भंवर' की विरमा-सबकी अपनी-अपनी व्यथाएँ हैं, अपनी-अपनी सीमाएँ ।
    इन्हीं सीमाओं से बँधी, इन मरणोन्मुखी मानव-प्रतिमाओं का स्पंदन सहज ही सर्वत्र अनुभव होता है--प्राय: हर कहानी में ।
    लेखिका ने अपने जिए हुए परिवेश को जिस सहजता से प्रस्तुत किया है, जिस स्वाभाविकता से, उससे अनेक रचनाएँ, मात्र रचनाएं न बनकर, अपने समय का, अपने समाज का एक दस्तावेज बन गई हैं।
  • Naari Hirdaya Tatha Anya Kahaniyan
    Subhadra Kumari Chauhan
    300 270

    Item Code: #KGP-9001

    Availability: In stock

    नारी हृदय तथा अन्य कहानियाँ 
    'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी' कविता की धार पंक्तियों से पूरा देश आजादी की लड़ाई के लिए उद्वेलित हो गया था। ऐसे कई रचनाकार हुए हैं जिनकी एक ही रचना इतनी ज्यादा लोकप्रिय हुई कि उसकी आगे की दूसरी रचनाएँ गौण हो गई, जिनमें सुभद्राकुमारी भी एक है ।
    इस एक कविता के अलावा बच्चों के लिए लिखी उनकी कविताएं भी हिंदी में बाल कविता का नया अध्याय लिखती है । उनकी कहानियाँ भी नारी स्वातंत्र्य का नया उदूघोष करती है । उनके जैसी उपेक्षित कवयित्री के समग्र मूल्यग्रेकन के लिए नया इतिहास लिखने की जरूरत है । सुभद्राकुमारी चौहान सिर्फ एक कवयित्री ही नहीं थीं, देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उनका अमूल्य योगदान रहा है । उत्तर भारत के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन में सुभद्रा जी के व्यक्तित्व की गाजी छाप रही है ।
    समाज की अनीतियों से उत्पन्न जिस पीड़ा को वे व्यक्त करना चाहती थीं उसकी अभिव्यक्ति का उचित माध्यम गद्य ही हो सकता था, अत: सुभद्रा जी ने कहानियाँ लिखी । उनकी कहानियों में देश-पेस के  साथ-साथ समाज को, अपने व्यक्तित्व को प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्षरत नारी की पीड़ा और विद्रोह का स्वर मिलता है ।
  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Sabeena Ke Chaalees Chor
    Nasera Sharma
    295 266

    Item Code: #KGP-31

    Availability: In stock

    सबीना के चालीस चोर
    'सबीना के चालीस चोर' इस संग्रह की बाकी कहानियों के कथा-सूत्रों का बुनियादी विचार है । सबीना एक छोटी लड़की है, जो बडों जैसी दृष्टि और समझ रखती है । उसका मानना है कि फसाद कराने वाले, दूसरों का हक मारने वाले ही चालीस चोर है, जो हमेशा कमजोर वर्ग को दबाते हैं । इसी सबके बीच बार-बार अपने होने का अहसास दिलाती छोटी-छोटी मगर समझदार लड़कियां समूचे संघर्ष का हिस्सा है, अलग-अलग कहानियों से अलग-अलग किरदार निभाती सबीना से लेकर गुल्लो, सायरा, चम्पा, मुन्नी जैसी लड़कियों में नासिरा शर्मा खुद को ही 'प्लांट' करती हैं।
    दर्द की बस्तियों की ये कहानियाँ जिस भारतीय आबादी का प्रतिनिधित्व करती है वही इस देश की बुनियाद हैं ।  दरअसल ये ही कहानियां हिंदुस्तान की सच्ची तस्वीर हैं, जिनका अंतर्संगीत  इनके कथानकों के तारों में छिपा है, जिन्हें जरा-सा छेड़ो तो मानवीय करुणा का अधाह सागर ठाठें मारने लगता है । कहानियों का कैनवास और लेखक के सरोकार में जहाँ विस्तार एव गहराई है वहाँ घनीभूत और चौतरफा व्यथा है ।
    इन कहानियों की भाषा जिंदा भाषा है, जिसमें निजता और लोक-गंध की मिठास है। एक वरिष्ट कथाकार की ये कहानियां सचमुच उसके संपूर्ण कथा-संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं ।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-2)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1577

    Availability: In stock


  • Ai Ganga Tum Bahati Ho Kyoon
    Vivek Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-507

    Availability: In stock

    ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ युवा कथाकार विवेक मिश्र का तीसरा कहानी-संग्रह है। ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘पार उतरना धीरे से’ कहानी संग्रहों से विवेक ने पाठकों के बीच प्रियता व प्रामाणिकता अर्जित की है। उन्होंने बहुत शाइस्तगी और रचनात्मक विनम्रता के साथ यह सिद्ध किया है कि आसपास पसरा यथार्थ हर रचनाकार के लिए समान नहीं होता। यह रचनाकार पर है कि वह ‘दिखते’ के पीछे छिपे जीवन सत्य और ‘दिखते’ में वास्तविक को कितना देख-समझ पाता है। विवेक वास्तविक और प्रायोजित का अंतर समझने वाले समर्थ कहानीकार हैं। यही कारण है कि आज जब संपादकों, संगठनों, प्रायोजकों के कंधें पर बेतालवत् सवार कुछ कहानीकार ठस व ठूँठ हो रहे हैं तब विवेक मिश्र की कहानियाँ अपना महत्त्व असंदिग्ध रूप से प्रकाशित कर रही हैं।
    विवेक मिश्र सुस्पष्ट सामाजिक सरोकारों से लैस लेखक हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ साबित करती हैं कि परिवार में बद्धमूल अप्रासंगिक धारणाओं से लेकर सामाजिक परंपराओं में घुसपैठ करती अमानवीय प्रवृत्तियों तक लेखक की पैनी नजर है। परिवेश विवेक के यहाँ एक पात्र सरीखा है। मैत्रेयी पुष्पा के बाद बुंदेलखंड का जीवन-जगत् उनके यहाँ सर्जनात्मक संदर्भ प्राप्त करता है। साथ ही, वे महानगरों की संधियाँ-दुरभिसंधियाँ भी परखते हैं।
    संग्रह में शामिल ‘घड़ा’, ‘चोरजेब’, ‘निर्भया नहीं मिली’ तथा ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ सरीखी कहानियाँ रेखांकित करती हैं कि लेखक मन के अतल में व्याप्त ध्वनियों को सुनने की अद्भुत क्षमता रखता है। उसके पास अर्थ को अनेक स्तरों पर वहन करने वाली भाषा है, जैसे--‘पनरबा कस्बे के किसी कागज को माचिस की तीली से जलाकर देखिएगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रांत अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।’ यह कहानी संग्रह वर्तमान हिंदी कहानी में मूल्यवान उपस्थिति की तरह स्वागत योग्य है।
  • Zalzala
    Gulshan Rai Monga
    60 54

    Item Code: #KGP-2057

    Availability: In stock

    एक अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए आदमी को जिन चीजों की तवक्को रहती है मसलन महानगर में अपना निजी फ्लैट, गाड़ी, चलता हुआ व्यवसाय, वह सब उसे हासिल था । संतुष्टि के लिए पर्याप्त प्राप्य। 
    भीतर यह जो आत्मा है इतने पर संतोष कर ले यह आवश्यक नहीं है । उसकी अपनी इच्छाएं, वृत्तियां, संस्कार और जरूरतें हैं जिन्हें 'सप्रैस' करने में कोई औचित्य नहीं है । ऐसा प्रयास किसी ओर से भी किया जाए तो आत्मा विद्रोह कर देती है और इस विद्रोह की परिणति होती है एक गहरी सोच में । इस जीव-जगत में अपने होने की अर्थवत्ता अर्थात इस संसार में  के मकसद की तलाश। 
    इस दिशा में गजानन की सफलता-असफलता का लेख-जोखा करने की जुर्रत की गयी है । यह चरित्र अपनी तमाम कमियों, कमजोरियों  और कुछ अच्छाइयों के साथ आपके (पाठकों के) निर्णय का मोहताज है जिसे उसके आंतरिक और बाह्य परिवेश में रखते हुए उसके साथ सहानुभूति, नफरत अथवा प्यार करना आप पर निर्भर करता है । 
  • Insaani Nasl
    Nasera Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-800

    Availability: In stock

    इनसानी नस्ल
    इस संग्रह की सभी कहानियाँ बड़ी सादगी से जीवन के यथार्थ को सामने रखती हैं। अंतर्धारा में एक आग्रह अवश्य महसूस होता है कि इनसान ने अपने ‘स्वयं’ को जीना छोड़ दिया है। वह अपने अंदर यात्रा करने की जगह बाहर की भौतिक दुनिया के कोलाहल में भटकता जा रहा है, जो उसकी सारी सहजता को ख़त्म कर उससे सुख के सारे क्षण छीनता जा रहा है। कभी-कभी ऐसा भी संकेत मिलता है कि वह पाषाण युग की प्रवृत्तियों की तरफ़ अकारण बढ़ रहा है, जो सारी उपलब्धियों के बावजूद उसको वह ‘चैन’ नहीं दे पा रही हैं, जिसका वह सही हक़दार है। आखि़र यह इनसानी नस्ल, जो एक-दूसरे की उत्पत्ति की सिलसिलेवार कड़ी है, वह वास्तव में चाहती क्या है ? एक-दूसरे से हाथ मिला मानव-शृंखला को मज़बूत बनाना या फिर एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर अलगाव की भूमिका निभाना ? यह अलगाव हमें सभ्यता के किस मोड़ पर ले जाएगा ? अलगाव की इस मानसिकता से मुक्त होकर इनसान एक नए युग का सूत्रपात क्यों नहीं कर सकता ? क्या वह आने वाली नस्ल की ख़ातिर जीवन से निरंतर ग़ायब होते जा रहे ‘चैन’ को पाने के लिए कुछ नहीं करेगा ? क्या वह अपने अंदर की यात्रा कर इनसानियत के आलोकित क्षितिजों को छूना नहीं चाहेगा ? इन्हीं सवालों से जूझती ये कहानियाँ आज के इनसान के दिल व दिमाग़ की टकराहट की साक्षी हैं, जो अनेक बुनियादी सवालों से साक्षात्कार करती नज़र आती हैं।
  • Meri Pratinidhi Kahaniyan
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1949

    Availability: In stock

    मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ
    राकेश के घर पर जैसे आँसुओं का समंदर ही उमड़ आया था। सुदर्शना को उस समुद्र में डूबते जहाज-सा वह ताबूत दिखाई दिया, जिसमें उसका ‘सब कुछ’ था। आज उसे न माँ-बाप की ममता बाँध सकी, न ही सास-ससुर की लाज रोक सकी। आँधी की तरह वह आगे बढ़ी और ससुर के साथ खड़ी हो गई, "मैं भी कंधा दूँगी।"
    दुल्हन-सी सजी सुदर्शना को देख सैनिक भी हक्के-बक्के रह गए। सब चौंक उठे, "क्या कहती है लाड़ी ? पगला गई है ? ऐसा भी कभी हुआ है आज तक ?"
    जवाब में सुदर्शना ने और कसकर अरथी को पकड़ लिया। उसकी चुप्पी जैसे बोल उठी, ‘आज तक ऐसा शहीद भी न हुआ था कभी। मैंने बचपन से हर पल जिसका साथ दिया, आज उसकी अंतिम यात्रा में साथ कैसे छोड़ दूँ ?’
    अरथी उठाकर लोग चल पडे़। ‘कारगिल का शहीद राकेश अमर रहे!’ के घोष से गूँज उठा धरती-आकाश।
    तभी वह रुक गई, "ठहरो, जरा...स्वेटर...स्वेटर..."
    उसने माँ की ओर देखते हुए पुकारा। माँ तीर की तरह आगे आई और एक नया बुना स्वेटर लाकर उसे दे दिया। उसने उसे खोला और बड़े प्यार से अपने पति की छाती पर सजा दिया। बोली, "तुमने चिट्ठी में लिखा था। मैंने तैयार कर रखा है। इसे पहनकर जाओ। अब ठंड न लगेगी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी ‘स्वेटर’ से]
  • Shyamlal Ka Akelapan
    Sanjay Kundan
    300 270

    Item Code: #KGP-686

    Availability: In stock

    संजय कुंदन ने अपनी कथारचनाओं से पाठकों और आलोचकों का ध्यान समान रूप से आकृष्ट किया है। ‘श्यामलाल का अकेलापन’ उनकी कहानियों का नवीनतम संग्रह है। संग्रह में मौजूद कहानियों से कुछ बातें उभरकर सामने आती हैं। संजय सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को बिना किसी ‘सीमित पक्षधरता’ के विश्लेषित करते हैं। इस विश्लेषण में वे उस मनुष्य को केंद्र में रखते हैं जिससे समाज बनता है और कहानी भी।
    यह कहना मुनासिब होगा कि संजय  कुंदन एक अद्भुत किस्सागो हैं। ‘कहन’ की परंपरागत विशेषताओं से वे लाभ उठाते हैं और उसे नवीनतम उत्सुकताओं से जोड़ते हैं। वे कस्बों, छोटे शहरों और महानगरों से विषयवस्तु जुटाते हैं। फिर भी, एक अदद ‘देसी मन’ हमेशा सक्रिय रहता है।
    इस संग्रह की 11 कहानियों में लेखक ने उन प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष बंदिशों, साजिशों, ख्वाहिशों को उद्घाटित किया है जिनसे वर्तमान समाज संचालित है। यह कहना अधिक उचित होता कि समाज जिनकी गिरफ्त में है। साधारण आदमी जहां असहज हो जाता है, अपना मूल स्वभाव बिसार बैठता है और जड़ों से कटने लगता है। ‘श्यामलाल का अकेलापन’ कहानी का प्रारंभ इस प्रकार होता है, ‘क्या इनसान और होर्डिंग में कोई समानता हो सकती है? भले ही यह एक बेतुका सवाल लगे पर श्यामलाल का मानना था कि आज हर आदमी होर्डिंग में बदलता जा रहा है, एक ऐसी विशाल होर्डिंग जिस पर किसी प्रोडक्ट का विज्ञापन चमक रहा हो। आदमी ज्यों ही मुंह खोलता है कोई उत्पाद उसके मुंह से चीखने-चिल्लाने लगता है।’ यह दरअसल मायावी बाजार की विचित्र प्रतिक्रियाओं का असर है, जिसे लेखक स्पष्ट करता है।
    इन कहानियों में एक नैतिक संशय है तो परिवर्तन की सकारात्मक पहल भी है। पीढ़ियों के बीच द्वंद्व है तो विश्वास के नए इलाके भी हैं। इन्हें पढ़कर पाठक अपने परिवेश में एक नई तैयारी के साथ प्रवेश करता है। संजय  कुंदन अतिरेकी प्रयोगों में भरोसा नहीं करते। वे विचार, संवेदना, भाषा और शैली में नई चमक पैदा करने वाले कहानीकार हैं।
  • Parakh
    Malti Joshi
    180 162

    Item Code: #KGP-1983

    Availability: In stock

    परख
    "तुमने अपने बचपन में मुझे एक सपना दिखाया था कि तुम पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनोगे, तुम्हारा एक बड़ा-सा बँगला होगा, बँगले में मेरा भी एक कमरा होगा, कमरे से लगी बालकनी में एक झूला पड़ा होगा, उस झूले पर बैठकर मैं तुम्हारे बच्चों को कहानियाँ सुनाऊँगी, उनके लिए स्वेटर बुनूँगी।
    "अब तुम बड़े आदमी बन गए हो। तुम्हारे पास बड़ा-सा बँगला भी है, घर में बाल-गोपाल भी हैं, पर मेरा सपना तो अधूरा ही रह गया न ! अभी तुमने मेरे लिए इतने ठिकाने गिनाए, पर एक बार भी नहीं पूछा कि जिया, मेरे घर रह सकोगी ? देखो, मुझसे जैसा बना, मैंने तुम्हारा बचपन सँवारा था। अब तुम मेरा बुढ़ापा सुधार रहे हो। हिसाब बराबर हो गया।"
    "कैसी बात कर रही हो जिया !" वीरेश आवेश में एकदम उठकर खड़ा हो गया, "कसम ले लो जो आज तक मैंने कभी तुम्हें आया समझा हो।" उसका स्वर एकदम तरल हो आया, "अपनी जन्मदायिनी माँ को तो मैंने बस तस्वीर में ही देखा है। उनकी कोई याद मेरे मन में नहीं है। पर सच कहता हूँ, बाहर रहते हुए जब भी घर की याद आई है, माँ के रूप में तुम्हारी छवि मन में उभरी है। मुझे दुःख है तो इसी बात का कि इस रिश्ते को कोई वैधानिक दर्जा नहीं मिल सका, नहीं तो मैं वृद्धाश्रमों की खाक क्यों छानता ! तुम्हें साधिकार, ससम्मान सीधे अपने घर ले जाता।"
    "यह तुम्हारा वहम है बेटे ! इसे अपने मन से निकाल दो। वैधानिकता रिश्तों को गारंटी नहीं देती, नहीं तो तुम्हारे उस पाँचसितारा वृद्धाश्रम में इतने लोग आकर क्यों बसते !"           
    [इसी संग्रह की कहानी ‘अनिकेत’ से]
  • Isliye
    Ashok Gupta
    175 158

    Item Code: #KGP-1831

    Availability: In stock


  • Akbar-Beerbal Ki Praamaanik Kahaniyan
    Hari Krishna Devsare
    175 158

    Item Code: #KGP-194

    Availability: In stock

    अकबर-बीरबल की प्रामाणिक कहानियां 
    अकबर-बीरबल की इन कहानियों में केवल मनोरंजक, हाजिरजवाबी और चतुराई की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनमें भारतीय इतिहास की दो महान् विभूतियों के व्यक्तित्व के विविध गुणों और विशेषताओं के भी दर्शन होते हैं । इन कहानियों में विद्वानों-गुणी  ज़नों का आदर है, कुशल प्रशासन है, न्याय की तराजू पर किए गए फैसले और सामान्य जनता के कल्याण हेतु कार्यों जैसे पहलू भी उजागर होते हैं ।
    यों तो अकबर-बीरबल के किस्सों में काफी मिलावट हुई है, फिर भी उससे बचकर कुछ ऐसी चुनिंदा कहानियां ही यहाँ प्रस्तुत हैं, जो इतिहास की इन दोनों महान् विभूतियों की गरिमामयी छवि प्रस्तुत कर  सकें । आशा है, पाठक इन्हें रुचिकर पाएंगे ।
  • Kannu
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-294

    Availability: In stock

    अजीत कौर का लेखन, जीवन की ऊहापोह को समझने और उसके यथार्थ को उकेरने की एक ईमानदार कोशिश है। उनकी रचनाओं में न केवल नारी का संघर्ष और उसके प्रति समाज का असंगत दृष्टिकोण रेखांकित होता है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विकृतियों और सत्ता के गलियारों में व्याप्त बेहया भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ज़ोरदार मुहिम भी नज़र आती है।
    अजीत कौर ने विभाजन की त्रासदी को झेला है। लोगों को घर से बेघर होकर, आँधी में उड़ते सूखे पत्तों की तरह भटकते देखा है, जिनमें वह खुद भी शामिल थीं। 1984 में बेगुनाह सिखों का क़त्लेआम होते देखा है। गुजरात में निरंकुश हिंसा का तांडव देखा है। अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, रवांडा, यूगोस्लाविया, फ़िलिस्तीन में लोगों की तबाही का दर्द महसूस  किया है। साठ लाख यहूदियों के क़त्ल की दास्तानें सुनते उनका बचपन गुज़रा है। फ़िलिस्तीनियों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी बेघर होकर रहने, उनकी तबाही और बौखलाए गुस्से से उनकी आत्मा में ख़रोंचें आई हैं। उन्हें तीखा अहसास है व्यापक भूख का-भारत में, एशिया में, सूडान में, अफ्रीका में।
    उनकी कहानियों में न केवल बेक़सूर, निहत्थे लोगों के क़त्ल का दर्द है, बल्कि पेड़ों के कटने का, पंछियों के मरने का, चींटियों के बेघर होने का, नदियों के सूखने का और जंगलों की आखि़री पुकार का भी शिद्दत से अहसास है। 
    अजीत कौर के लेखन में यह संघर्ष और ये समस्याएँ पूरी संवेदन- शीलता, सजगता और आक्रोश के साथ प्रतिबिंबित हैं। इन सरोकारों के लिए वे सुप्रीम कोर्ट तक लड़ती भी हैं, ख़ासकर पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए।
    इन सरोकारों के लिए ही उन्होंने अपनी समूची पैतृक संपत्ति बेचकर और बेटी अर्पणा की पेंटिंग्ज़ बेच-बेचकर एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक संस्था एकेडेमी ऑफ  फ़ाइन आर्ट्स एंड लिट्रेचर की स्थापना की, जो संस्कृति और कला का एक बहुआयामी केंद्र है।
    एकेडेमी का एक विशेष कार्यक्रम है समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर तथा पिछड़े वर्ग की बालिकाओं को शिक्षा देना और व्यावसायिक प्रशिक्षण द्वारा उनका आर्थिक सशक्तीकरण करना।
    अजीत कौर का लक्ष्य है सार्क देशों के सही सोच वाले लोगों को एकजुट करना। इसी इरादे से उन्होंने 1987 में फ़ाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिट्रेचर की स्थापना की और सार्क देशों के साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों को एक मंच पर इकट्ठा किया है। उद्देश्य: आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर, सार्क देशों में भाईचारे और सहयोग की भावना का विकास करना।
  • Aur Ant Mein Ishu
    Madhu Kankria
    120 108

    Item Code: #KGP-160

    Availability: In stock

    ...और अंत में ईशु
    मधु कांकरिया के प्रस्तुत नव्य कथा-संग्रह की कहानियाँ समसामयिक भारतीय जीवन के ऐसे व्यक्तिव के कथामयी रेखाचित्र हैं, जो समाज के मरणासन्न और पुनरुज्जीवित होने की समांतर कथा कहते हैं । इनमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के वैसे विरोधाभास और वैपरीत्य के दर्शन-दिग्दर्शन होते हैं, जिनसे उत्पन्न विसंगतियों के ही चलते 'दीये तले अँधेरे' वाला मुहावरा प्रामाणिक बना हुआ है।
    आज का जागरुक पाठक सर्जनात्मक कथा-साहित्य में वर्ण और नारी आदि के विमर्शों की अनंत बाढ़ की चपेट में है और ऐसे 'हवा महलों' के संभवत: खिलाफ भी, जो कि उसे ज्ञान जोर संज्ञान के स्तर पर कहीं शून्य में ले जाकर छोड़ देते है । इसके उलट प्रस्तुत कहानियों में जीवन की कालिमा और लालिमा, रति और यति, दीप्ति और दमन एवं प्रचार और संदेश को उनके सही-सही पदासन पर बैठाकर तोला, खोला और परखा गया है । अभिव्यक्ति के स्तर पर विचारों का कोरा रूखापन तारों न रहे, इसलिए लेखिका ने प्रकृति और मनोभावों की शब्दाकृतियों को भी लुभावने ढंग और दुश्यांकन से इन कहानियों में पिरोया है । धर्मांतरण  का विषय हो या कैरियर की सफलता के नाम पर पैसा कमाने की 'मशीन' बनते बच्चों के जीवन की प्रयोजनहीनता ...या फिर स्त्री के नए अवतार में उसके लक्ष्मी भाव और उर्वशीय वांछनाओं की दोहरी पौरुषिक लोलुपताएँ-कथाकार की भाषागत जुलाहागीरी एकदम टिच्च मिलती है। इसे इन कहानियों का महायोग भी कहा जा सकता है ।
    सृजन को जो कथाकार अपने कार्यस्थल के रूप में कायांतरित का देता है, वह अपने शीर्ष की ओर जा रहा सर्जक होता है । विश्वास है कि पाठक को भी यह कृति पढ़कर वेसा ही महसूस होगा। ऐसा अनुभव इसलिए अर्जित हो सका है, क्योंकि ये कहानियाँ जीवन के अभिनंदन पत्र नहीं, बल्कि माननीय अपमान और सम्मान की श्री श्री 1008 भी हैं।
  • Million Dollar Note Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    125 113

    Item Code: #KGP-283

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात हैं ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Samgra Kahaniyan : Ab Tak
    Maitreyi Pushpa
    695 626

    Item Code: #KGP-271

    Availability: In stock

    समग्र कहानियाँ: अब तक
    आँधी की तरह अपने उपन्यासों से पाठकों को झकझोर देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के अपने फैसलों की विचारोत्तेजक कहानियाँ-उपन्यास लिखे हैं। शहरी मध्यवर्गीय कहानियों के संसार को गाँव के उभरते मेहनतकश समाज से जोड़ा है, जहाँ अपनी परंपराएँ हैं, रूढ़ियाँ हैं और सबसे ऊपर है ‘खानदान की नाक’ और सब कुछ टिका है स्त्री के कंधों पर--जमीन और स्त्री ही उलझनों के केंद्र हैं और दोनों के ‘उत्पादन’ आपस में गुँथे हैं। सब मालिक की कृपा पर साँस लेते हैं। मैत्रेयी की स्त्रियों की सारी शिकायतें इसी मालिक से हैं कि वह साथी और हमसफर क्यों नहीं हो सकता--क्यों मालिक बनकर ढोर-डंगर की तरह औरत को ही हाँके रखता है। 
    स्त्री का अपनी नियति को अस्वीकार करना ही सामाजिक मर्यादाओं का टूटना है।
    स्त्री के उत्थान और सबलीकरण की ये कहानियाँ यथास्थिति से विद्रोह ही नहीं, भविष्य की दृष्टि से समाज-परिवर्तन की ध्वजवाहिनी भी हैं। मैत्रेयी ने कहानियाँ शहरी जीवन को लेकर भी लिखी हैं, मगर जिस आत्मीयता और गहराई से उन्होंने गाँव के जीवन को देखा है वह हिंदी में प्रेमचंद और रेणु 
    के सिवा शायद ही किसी को नजर आया हो। ये बेजुबानी स्त्री की यातनाओं, उसके संघर्षों और सपनों के बेआवाज विद्रोह की दस्तावेज हैं।
  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Begam Bin Baadshaah
    Rajendra Chandrakant Rai
    90

    Item Code: #KGP-1846

    Availability: In stock

    बेगम बिन बादशाह
    राजेन्द्र चन्द्रकांत राय तीन दशक से कहानियाँ  लिख रहे हैं । विभिन्न समयों में उनकी कहानियाँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में  प्रकाशित भी हुई हैं। उन पर चर्चा, विवाद भी हुए हैं, पर वास्तविकता यह है कि उनकी कोई भी संगृहीत किताब इसके पूर्व नहीं आ सकी है । यानी 'बेगम बिन बादशाह' उनका पहला कहानी-संग्रह होगा । राजेन्द्र चन्द्रकांत राय ने पिछली अवधि में कई कहानियों को रद्द किया, कई का पुनर्लेखन किया और संग्रह से समाविष्ट कहानियों के अलावा इस बीच कई लंबी कहानियाँ लिखीं, जो दूसरे संग्रह में आएंगी और एक भिन्न एवं बदली हुई दुनिया से पाठको को ले जा सकेंगी । चन्द्रकांत राय की रुचियाँ, आग्रह और विशेषज्ञता में वनस्पतियाँ, पशु-पक्षियों, पर्यावरण और उसके बीच लुटते हुए मनुष्य तथा सभ्यता का दर्द और विस्थापन है । उनके पास एक शैलीकार का आवेग और वैज्ञानिकता की पृष्ठभूमि है-इसी से उनके गद्य की बुनावट हुई है। यह कहानी-संग्रह उनकी गुमनामी और परिस्थिति को किंचित् तोड़ सकेगा अन्यथा आठवें दशक के कहानीकारों की सूची में अब तक वे प्रमुखता से हो सकते थे ।
    'बेगम बिन बादशाह' की कहानियों से मामूली, अदने, वंचित इंसानों का प्रवेश और चयन है, लेकिन एक बड़े फर्क के साथ । ये नाचीज पात्र मनहूस, दब्बू और पराजित नहीं हैं, वे बिना किसी अतिरेक के स्वाभाविक रूप से संघर्षशील है, जीवनमय हैं और भरोसे को खंडित नहीं करते । उनकी कहानियों में ऐसे पात्रों का वातावरण हमेशा बना रहता है, जो समाज से बहिष्कृत हैं, समाज के सीमांतों पर ठेल दिए गए हैं, पर इसके बावजूद वे हाहाकार नहीं करते, मुठभेड़ करते हैं। वे भटककर विलीन नहीं हो जाते । चरित्र की जगह पात्र शब्द का इस्तेमाल मैं इसलिए कर रहा हूँ कि चन्द्रकांत राय के चरित्र जीवन-संग्राम में अभिनय कर रहे हैं। इसी को मैं कहानी मानता हूँ । उनकी कहानियों में असंतुलित उम्मीद या रोशनी भी नहीं है । तर्क और विश्वास है । केवल व्यंग्य और वीरता का सहारा उन्होंने नहीं लिया है । स्वतंत्रता के बाद जो अवसाद हिंदी कहानी में पनपा था, यहाँ उससे आपकी मुक्ति मिलेगी । चन्द्रकांत राय की कहानियां इस प्रकार वैयक्तिक कला की उपज नहीं हैं, वे विचार के साथ आते हैं, विचार स्थूल रूप से प्रकट नहीं हैं, किस्से-कहानी-जीवन में विलीन रहते हैं। इस तरह पाठक उनके बारे में अपनी राय तय कर सकते हैं ।
  • Naajaayaz
    Salam Azaad
    100 90

    Item Code: #KGP-1827

    Availability: In stock

    नाजायज
    भारतीय मुसलमानों की परवर्ती पीढ़ी, जिसकी आबादी बाँग्लादेश की कूल जनसंख्या से लगभग दुगनी है, कैसे अपना जीवन जी रही है ? खास तौर पर भारत की मुस्लिम महिलाएँ, जो शरा के क्रानून की चक्की में हर पल घिसती रहती हैं, क्योंकि 'भारत के मुस्लिम नेताओं ने शरीयत से जुड़े कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बहाने इस देश की मुस्लिम महिलाओं को मध्य युग के घुप्प अँधेरे में बंद कर रखा है ।
    लगातार तीन वर्ष तक दिल्ली में निर्वासित जीवनयापन के दौरान इन मुस्लिम महिलाओं के प्रति इस घोर अमानवीय और शरा कानून की दुहाई देकर मुल्लाओं द्वारा ढाए गए इन जुल्मों को सलाम आजाद ने बहुत नज़दीक से देखा है । उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान दिल्ली ही नहीं, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, केरल, पश्चिम बंग और कश्मीर के साथ अन्यान्य प्रदेशों में इस भयावहता को महसूस किया है। उन्होंने यह भी पाया है कि इस्लाम के नाम पर इन तमाम इलाकों की मुस्लिम महिलाएँ पुरुषशासित समाज-व्यवस्था द्वारा कितनी विषम वंचनाओं और यंत्रणाओं की शिकार है । पति के क्रोध और उत्तेज़ना के चलते स्त्री को तलाक कहने पर इस्लाम द्वारा तलाक को भले ही स्वीकृति नहीं मिली हो, लेकिन भारत का शरापसंद मुस्लिम समाज इसे तलाक के तोर पर मानने को मजबूर करता है । इस्लाम और मानवाधिकारवादी इस तलाक के समय स्त्री यदि गर्भवती हो तो जन्म-ग्रहण के बाद उस संतान को वैध नहीं माना जाता है।  उस निष्पाप, निष्कलंक मानव शिशु को 'नाजायज़' ठहराया जाता है ।
    भारत के मुसलमानों को केंद्र में रखकर इस समस्या पर छिटपुट लेखादि अवश्य प्रकाशित हुए है, लेकिन अपनी अच्छी देखकर और 'फील्ड वर्क' को आधार बनाकर 'नाजायज' जैसे विषय पर एक पूरी पुस्तक लिखने की परिकल्पना पहली बार बाँग्लादेश के इस लेखक द्वारा हुई है ।

  • Mans Ka Dariya
    Kamleshwar
    80 72

    Item Code: #KGP-9061

    Availability: In stock


  • Rath-Kshobh
    Deepak Sharma
    80 72

    Item Code: #KGP-1834

    Availability: In stock

    रथ-क्षोम 
    "मरते समय मां ने मुझे बताया, वे मुझे जन्म नहीं देना चाहती था ।"
    "तू अभी बहुत छोटा है । उस बेचारी का दुख नहीं समझ सकेगा ।"
    "मेरा दु:ख कोई दुख नहीं ?" मैं फट पड़ता हूँ "माँ ने मुझे नफ़रत में जन्म दिया, नफरत में बडा किया और फिर कह गईं-मैं एक वहशी की संतान हूँ-बिना यह बताए कि किस वहशी की ।"
    "अपने ताऊ की"
    मैं सन्न रह गया ।
    "मैं तुम्हें बताती हूँ।" काँपती, भर्राई आवाज में ताई ने बताया, "सब बताती हूँ। उस रात इसी तरह मैं उधर लुधियाणे में  भरती थी । मेरा भाई उन दिनों अपनी एल०आई०सी० की नौकरी से लुधियाणे में तैनात था । जब मैं एकाएक उधर बीमार पडी और अस्पताल में दाखिल करवा दी गई, तेरे ताऊजी उसी शाम इधर अपने गाँव से मुझे देखने के लिए पहुँच लिए थे । उन्हीं की जिद थी कि उस रात मेरी देखभाल वहीँ करेंगे । और उसी रात स्नेहंप्रभा की भी ड्यूटी वहीँ थी । बेहोशी और कष्ट की हालत में अचानक अपने प्राइवेट कमरे के बाथरूम के आधे दरवाजे के पीछे से एक सनसनी अपने तक पहुंचती हुई मेरी बेहोशी टूटी तो पशुवत् तेरे ताऊ की बर्बरता की गंध से-सुकुमार स्नेहप्रभा के आतंक की दहल से । पार उधर स्नेहप्रभा निस्सहाय रहने पर मजबूर रहीँ और इधर मैं निश्चल पडी रहने पर बाध्य..."
    "पापा से माँ की शादी इसीलिए आपने करवाईं ?" मैंने थूक निब्बाला ।
    "अस्पताल में मेरी भरती लंबी चली थी और जब स्नेहप्रभा ने अपने गर्भवती हो जाने की बात मुझसे कहीँ थी तो मैँने ही उसे अपनी बीमारो का वास्ता दिया था, अपने स्वार्थ का वास्ता दिया था और लुधियाणे से उसे अपने साथ इधर ले आई थी । सोचा था, जब वह अपने दूसरे बच्चे को जन्म देगी तो मैं इस पहले बच्चे को गोद ले लूँगी । लेकिन तुम्हारी प्रसूति के समय उसे ऐसा आँपेरेशन करवाना पडा, जिसके बाद उसका दोबारा माँ बनना मुश्किल हो गया"
    "पापा को सब मालूम है ?"
    “नहीं । बिलकुल नहीँ । और उसे कभी मालूम होना भी नहीं चाहिए । मेरी खातिर । स्नेहप्रभा की खातिर । "
    -इसी संग्रह की कहानी 'मुडा हुआ कोना' से
  • Prachin Unani Kahaniyan
    Rangey Raghav
    340 306

    Item Code: #KGP-06

    Availability: In stock

    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (2nd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1582

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan
    Narendra Mohan
    490 441

    Item Code: #KGP-1953

    Availability: In stock


  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Safar Baavajood
    Sidhesh
    140 126

    Item Code: #KGP-1947

    Availability: In stock

    सफर बावजूद
    सिद्धेश की कहानियाँ कहानी-आंदोलन के उस दौर की उपज  हैं, जब कहानी में कलावाद की यथार्थवाद का संघर्ष चल रहा था । गुटबाजी, शिबिरबद्धता चरम पर थी । सिद्धेश  को यह शोर-शराबा पसंद न था । वे मौन भाव से सृजनरत थे । तटस्थ बने रहने का खामियाजा यद्यपि उन्हें भुगतना पडा । उनकी कहानियां फॉर्मूलाबद्ध लेखन तथा किताबी नुस्खों से मुक्त हैं । सिद्धेश ने कहानियों में शिल्पगत चमत्कार, भाषा की पच्चीकारी की जगह सहजता को महत्त्व दिया है । वे मुख्यत: नागर-मानसिकता के कहानीकार हैं, पर उनकी कहानियां सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध हैं।
    संग्रह की इन कहानियों से विषयवस्तु की विविधता के साथ ही मानवीय दृष्टि और संवेदना का विस्तार है । ये कहानियाँ अपने समय और परिवेश के स्पंदनों को पहचानने की कोशिश करती हैं । मानव-मन की सूक्ष्म परख की कला  में माहिर हैं सिद्धेश । वे विचारधारा से अधिक मनुष्य और उसकी संवेदनाओं को महत्व देते हैं। उनके अनुसार, "संवेदना के स्रोत में बहने के लिए अपने चारों तरफ के परिवेश, चरित्रों और घटनाओं के प्रति सजग दृष्टि रखनी पडती है ।" सृजन को सिद्धेश 'जीने के मकसद' से जोड़कर देखते  । संघर्षों, अभावों से जूझते हुए ही उन्होंने अपनी रचना-दृष्टि अजित की है।
    सहजता और सार्वज़निकता इन कहानियों का वैशिष्ट्य है। कहानी का रूप-गठन और रचना-विधान कुछ इस तरह है कि आधुनिक नागरिक जीवन के अनेक अनछुए तथा मार्मिक प्रसंगों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बिना किसी अतिरंजना के यहाँ चित्रित हुआ है ।
  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Kaale Kuyen
    Ajeet Kaur
    225 203

    Item Code: #KGP-18

    Availability: In stock

    काले कुएँ
    इस संग्रह की कहानी 'बाजीगरनी' से-
    वह औरत जो तमाम उम्र एक कसी हुई रस्सी पर बाजीगरनी की तरह अपने बोझ का संतुलन कायम रखने की कोशिश में सारी ताकत और समूची एकाग्रता खर्च करती हुई चलती रही थी, आज ज़मीन पर खडी थी । रस्सी के दोनों सिरे कभी उनके सास-ससुर और खाविंद के दरम्यान तने रहे थे, कभी उनके खाविंद और बच्चों के दरम्यान । बहुत बरसों से एक सिरा भाइया जी के वजूद से बँधा था और दूसरा सिरा बड़े मामा जी के साथ । भाइया जी नहीं रहे तो रस्सी कड़क करके टूट गई । भाभी जी चक्कर खाकर ज़मीन पर आ गिरी । ज़मीन पर खडे होना तो वह भूल ही गई थीं ।  लडखड़ाती, काँपती, चकराती, हिचकोले खाती वह नए सिरे से छोटे बच्चे की तरह ज़मीन पर खडी होना सीखेंगी । शायद छोटे मामा जी का हाथ पकड़कर यह पैर बढाना सीखेंगी । पर फिलहाल तो वह चारों खाने चित गिरी पडी थीं ।
    भाइया जी नहीं रहे, तो बड़े मामा जी भी चले जाएँ-चले जाएँ..
    और उन्होंने दो-दो पुरानी सोने की चूडियों अपने हाथों से उतारी । उठीं और वे चारों चूडियाँ मामा जी के कोट की जेब में डाल दी, "बस, यही है मेरे पास । इसे ले ले और चला जा । पैंशनों वाले चले गए । रोटी खत्म । चूल्हा बुझ गया । तोड़ दिया है मैंने चूल्हा । तोड़ दिया है । तूने सुना ? चूल्हा तोड़ दिया है मैंने । चला जा । ”
    हिंदी और पंजाबी में समान रूप से रचनारत, साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कथाकार की मानव-मन के सच को उकेरती कहानियों का नया संग्रह ।

  • Muhim
    Sitesh Alok
    280 252

    Item Code: #KGP-291

    Availability: In stock

    कहानियाँ किसी अन्य अनजान लोक से नहीं आतीं...हमारे बीच, हमारे आसपास ही उपजती और पनपती रहती हैं...किंतु कोई साहित्यकार ही अपनी पारखी दृष्टि से चुनकर और संवेदना से सँवारकर उन्हें शब्दों के संसार में स्थापित करता है। 
    बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. सीतेश आलोक ने गत तीन दशकों में साहित्य की अनेकानेक विधओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य, समसामयिक विषयों पर लेख आदि पर लिखी डॉ. आलोक की अनेक पुस्तकों को न केवल पाठकों ने सराहा, कई संस्थाओं ने सम्मान भी प्रदान किया। मौलिकता इनके लेखन की एक विशेषता है। इनके चरित्र एवं कथानक न तो किसी साँचे में ढलकर आते हैं और न किसी वाद से प्रभावित होकर रूपाकार ग्रहण करते हैं।
    डॉ. सीतेश आलोक उन इने-गिने लेखकों में से हैं जिनमें लीक से हटकर अनेक ऐसे विषयों पर भी लिखने का साहस है, जिन्हें अधिकांश लेखक छूने से भी कतराते हैं।
    इस संग्रह की अनेक कहानियाँ वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, साहित्य अमृत, नयी धारा आदि में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Bayaan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-684

    Availability: In stock


  • Kahani Samagra : Nasera Sharma(3Vols.)
    Nasera Sharma
    2100 1890

    Item Code: #KGP-375

    Availability: In stock

    प्रख्यात कथा-लेखिका नासिरा शर्मा की कहानियाँ  समकालीन स्त्री रचनाकारों की कहानियों से कई मायनों में अलग और सर्वथा नई परिभाषा गढ़ती हुई नजर आती हैं । उनके यहाँ इनसानी रिश्ते केवल खून से ही नहीं, संवेदनाओं के उन तंतुओं से निर्मित होते हैं, जो इनसानियत के वजूद को बचाए रखने के लिए जारी हैं ।
    पहले खंड की कहानियाँ परिवार, देश-समाज की सीमा को लाँघते हुए ईरान तक की यात्रा कराती हैं । ईरान के अपने प्रवास काल के दौरान लेखिका ने जिस शिद्दत से वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति को आत्मसात् किया, उसको बहुत प्रभावी ढंग से उन्होंने इन कहानियों में अभिव्यक्त भी किया है ।  इस बहाने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों की भी लेखिका शिनाख्त करती हैँ। इस खंड की कई कहानियों में लेखिका अपने अतीत के पन्ने उलटते हुए उन क्षणों को वर्तमान संदर्भों से पुन: जीवंत करने का प्रयत्न करती है, जिन पर समय की बेशुमार परतें चढ़ चुकी हैं । दरअसल इन कहानियों के जरिए लेखिका अपने अतीत में घटित उन सामाजिक-राजनीतिक घटनाओँ की पड़ताल बदले हुए समय में करती हैं, जिनका संबंध वर्तमान से विच्छेद नहीं हुआ है ।
    दूसरे खंड की कहानियाँ इनसान के भीतर मौजूद शैतान को बाहर खींच निकालती हैं। सत्तालोलुपता की हवस में इनसान के हैवान में रूपांतरण की ये कहानियाँ अनेक सवालों को उठाती हैं। धर्म-स्थापना के नाम पर किसी भी प्रकार के अधार्मिक और अमानवीय क्रियाकलापों को जायज़ ठहराने वाली बीमार मानसिकता को भी ये कहानियाँ अनावृत करती हैं। इन कहानियों में समाज के निचले तबके के उन लोगों के दारुण यथार्थ की तस्वीर भी मौजूद है, जो अपना सब कुछ न्योछावर करके किसी भी देश-समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार करते हैं। बावजूद इसके शक्तिसंपन्न और सामंती मानसिकता के लोग उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।
    तीसरे खंड में लेखिका द्वारा पिछले तीन दशक में लिखी गई कहानियाँ सम्मिलित हैं । इनमें कुछ लंबी और कुछ लघु कथाएँ भी हैं । कथानक और घटनाक्रम के आधार पर इस खंड की कहानियाँ पूर्ववर्ती दो खंडों की कहानियों से कूछ अलग नजर आती हैं । इसका कारण यह है कि इस खंड की कहानियों में लेखिका ने अपनी दृष्टि के  विस्तार को थोड़ा संघनित किया है । यही वजह है कि इनमें देश-समाज-राजनीति-इतिहास से जुड़ी कहानियों के स्थान पर इनसानी नस्ल की प्रवृतियों पर आधारित कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं । बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जिनकी आँखें बारीक़ से बारीक रेशे को पकड़ती हैं, जिनके कान महीन से महीन आवाज को सुनते हैं और नाक हलकी से हलकी गंध ग्रहण करती है । ऐसे लेखकों को हम सहस्राक्षी लेखक भी कह सकते हैं । नासिरा शर्मा भी ऐसी ही लेखिका ।
    इनसानी मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण करती ये कहानियाँ लेखिका के भाषा-प्रवाह और ट्रीटमेंट के प्रति सजगता को भी प्रमाणित करती हैं ।
  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Sharat Ka Katha Sahitya
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    595 536

    Item Code: #KGP-889

    Availability: In stock

    बाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्रहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। 
    अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्रण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। 
    हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्र आप जैसे सुधी
  • Lalmaniyan
    Maitreyi Pushpa
    220 198

    Item Code: #KGP-20

    Availability: In stock

    ललमनियाँ
    अपने पहले कहानी-संग्रह के प्रकाशन के साथ ही न केवल चर्चित बल्कि वरिष्ठ रचनाकारों में शामिल होने का गौरव मैत्रयी पुष्पा से पहले संभवतः किसी रचनाकार को हासिल नहीं हुआ होगा।
    मैत्रयी पुष्पा का किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित पहला कहानी-संग्रह ‘चिन्हार’ न केवल चर्चित रहा, हिंदी अकादमी ने पुरस्कृत भी किया। इसके बाद आए दो उपन्यास ‘बेतवा बहती रही’ और ‘इदन्नमम’ भी चर्चित और पुरस्कृत हुए।
    आज कोई भी कथा-पत्रिका, कथा-संकलन बिना मैत्रयी पुष्पा के रचनात्मक योगदान के अधूरा माना जाता है और आज की कहानी का कोई भी सर्वेक्षण इनके जिक्र के बिना अपूर्ण। अपनी हर कथा-रचना के साथ विषय-वैविध्य और परिपक्वता का परिचय देता कथाकार का यह दूसरा कहानी-संग्रह पाठकों तक पहुँचाते हुए किताबघर प्रकाशन उम्मीद करता है कि इस संग्रह को भी वही चर्चा और प्रशंसा हासिल होगी जो इन कहानियों के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के दौरान हुई थी।
  • Sanetary Pad
    Sayed Javed Hasan
    250 225

    Item Code: #KGP-1885

    Availability: In stock

    बस्ती का खुदा उठा । मैदान की ओर देखकर मुस्कुराया और धीरे-धीरे चबूतरे की सीढी चढ़ने लगा ।
    दो चढ़ता रहा । तालियां बजनी रहीं।
    अचानक तालियां रुक गई ।
    लोगों ने बस्ती के खुदा को एकाएक बीच सीढी पर रुकते हुए देखा । '
    सबकी धडकने तेज हो गई । उसे अपने इस खुदा पर पूरा  विश्वास था । ताली बजाने वालों में अब मैदान के एक- आध हिस्से को छोडकर बाकी लोग भी शामिल हो गए थे । वे पहले के तीन खुदाओं की छवि से बुरी तरह निराश थे और चाहते थे कि कम से कम इस खुदा की छवि दुरुस्त रहे ।  बस्ती का यह खुदा औरों के मुकाबले अधिक सौम्य, संजींदा और भरोसेमंद था ।
    बस्ती के खुदा ने बस्ती के लोगों को मुड़ के देखा । मुस्कुराया । हाथ हिलाया और फिर सीढी चढने लगा ।
    तालियां फिर बजनी शुरू हुई ।
    तालियां बजती रहीं . . . . बजती रहीं ।
    और फिर . . . . पूरे मैदान में मरघट-सा सन्नाटा छा गया ।
    आईने के सामने बस्ती का खुदा खडा था और उसमें मुखौटों का अक्स उभर आया था ।
    बस्ती के लोग पागलों की तरह अपना सिर धुन रहे थे । उसे अपने जिस खुदा पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वो  बहरूपिया बना उनके सामने खड़ा था ।
    - इसी पुस्तक से
  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Pracheen Brahman Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-169

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Chhajju Ram Dinmani Tatha Anya Kahaniyan
    Mohan Thapliyal
    60 54

    Item Code: #KGP-1929

    Availability: In stock

    छज्जूराम दिनमणि तथा अन्य कहानियाँ
    मोहन थपलियाल ऐसे कहानीकार हैं, जिनके लिखने की रफ्तार बहुत धीमी है, फिर भी कम छपने के बावजूद वह उल्लेखनीय कथाकार बने रहे है । इनकी कहानियों में ग्रामीण और शहरी परिवेश का अदभुत संयोजन दिखाई देता है । निम्न-मध्य और गरीब तबके के लोग इन कहानियों के मुख्य पात्र हैं, जिनके साथ समकालीन समाज की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों की ऐतिहासिकता भी बराबर मौजूद है । जहाँ तक कथ्य और शिल्प का ताल्लुक है, ये कहानियाँ अवसर पारंपरिक ढांचे का निषेध करती हैं। कहीं-कहीं एक नए डिक्शन की तलाश भी इनमें है- 'शवासन' इसी तरह का मंजर पैदा करती है । यथार्थ और फंतासी का ताना-बाना मोहन थपलियाल की कहानियों में एक अलग जादूगरी पैदा करता है, लेकिन यह जादूगरी किसी चकमे या चमत्कार को दिखाने के लिए न होकर पात्रों व परिस्थितियों की हकीका जानने में मददगार सिद्ध होती है । द्वंहात्पक दर्शन को पहचान देने वाली ये कहानियाँ व्यक्ति की निजी लडाई को समाज की व्यापक लडाई से जोडना अपना फर्ज समझती है । यह अलग बात है कि यह मकसद पाने के लिए ऊँचे-ऊँचे आदर्शों, जोशीले नारों और बड़बोले भाषणों का इस्तेमाल प्रत्यक्षत: लेखक ने कहीं नहीं किया है । शायद इस संदर्भ में लेखक बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की इस उक्ति --'हमने उनके दुख के नहीं, दुख के कारणों के बारे में बात की' --का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहता है । दुख के कारण और सामाजिक विसंगतियों की गहरी पड़ताल इस संग्रह की तमाम कहानियों में मौजूद है । बतौर बानगी ‘एक वक्त की रोटी' और 'छज्जूराम दिनमणि' देखी जा सकती है । दुख की घडी की टिक-टिक दोनों जगह समान है भले ही सामाजिक परिवेश बिलकुल भिन्न । लेकिन इस संग्रह को वहानियों का अंतिम लक्ष्य दुख और नैराश्य न होकर पाठक के मन में बेहतर भविष्य के लिए एक जीती-जागती उम्मीद भरना है ।
  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Vo Tera Ghar Ye Mera Ghar
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-181

    Availability: In stock

    वो तेरा घर, ये मेरा घर
    इस बंगले के गृह-प्रवेश पर मां-पिताजी दोनो आए थे । बंगले की भव्यता देखकर खुश भी बहुत हुए थे, पर माँ ने उसांस भरकर कहा था, 'सोचा था, कभी-कभार छुट्टियों में तुम लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तुम उस कुटिया में तो आने से रहे।'
    उन्होने कहा था, 'हम यहाँ भी कहाँ रह पाते है मां । नौकरी के चक्कर में रोज तो यहाँ से वहाँ भागते रहते हैं। यहाँ तो शायद पेंशन के बाद ही रह पाएंगे । मैं तो कहता हूँ आप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिक्स डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठ से यहाँ आकर रहो ।'
    'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृढ़ता के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहुत सपने संजोए थे । अब वे सारे सपने हवा हो गए, यह बात और है।'
    'ऐसा क्यों कह रहे है पिताजी । इस घर ने आपको क्या नहीं दिया ! हम सब इसी घर से पलकर बड़े हुए हैं। हम चारों की शादियां इसी घर से हुई हैं। बच्चों की शिक्षा- दीक्षा और शादियां—मां-बाप के यही तो सपने होते हैं ।'
    'हाँ, यह भी तुम ठीक ही कह रहे हो । मैं ही पागलों की तरह सोच बैठा था कि यह घर हमेशा इसी तरह गुलजार रहेगा। भूल ही गया था कि लडकियों को एक दिन ससुराल जाना है । लड़कों को रोजगार के लिए बाहर निकलना है । और एक बार उड़ना सीख जाते है तो पखेरू घोंसले में कहाँ लौटते हैं। अब मुझें अम्मा-बाबूजी की पीड़ा समझ में आ रही है ।'
    "कैसी पीडा?'
    ‘पाँच-पाँच बेटों के होते हुए अंत में अकेले ही रह गए थे दोनों । अम्मा तो हमेशा कहती थी, अगर मैं जानती कि पढ-लिखकर तुम लोग बेगाने हो जाओगे तो किसी को स्कूल नहीं भेजती । अपने आँचल से छुपाकर रखती ।'
    और अपने अम्मा-बाबूजी की याद में पिताजी की आँखें छलछला आई थी ।
    -[इसी संग्रह की कहानी 'साँझ की बेला, पंछी अकेला' से]

  • Michal Jackson Ki Topi
    Madhukar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-1931

    Availability: In stock

    माइकल जैक्सन की टोपी
    स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद प्रेमचंद की ग्राम्य चेतना की साहित्यिक विरासत को अपने लेखन के बल पर जिन लेखकों ने जीवित रखा है तथा इमे विकसित किया है उनमें मधुकर सिंह का नाम उल्लेखनीय है । यह कहानीकार न केवल अपनी सामाजिक-राजनितिक  चेतना को अपनी कथाओं में अनुगुंफित करता है बल्कि जीवन की सम्यक् प्रगतिशीलता का आलोक भी उसे गंभीरता से आकर्षित क्रग्या है । इसीलिए उसकी कहानियाँ वंचितों के जीवन की केवल लपट की नहीं, लौ की भी कहानियाँ हैं ।
    अपने कथाकर्म के बारे में मधुकर सिंह का कहना है कि उनकी 'दर्जनो कहानियाँ समाज और इतिहास- विरोधी उन ताकतों से लड़ती हुई मामूली और कमजोर आदमी को चेतना के स्तर पर जागृत करने की कोशिश करती हैं-यानी, इतिहास-विरोधी ताकतों द्वारा सताए जा रहे आदमी को अपनी पहचान कराने की क्षमता भी ये कहानियां रखती है ।'
    मधुकर सिंह के प्रस्तुत कहानी-संग्रह में शामिल दस कहानियां हैं- 'माइकल जैक्सन की टोपी’, 'युग' . ‘नस्ल-दंश', ‘बेली रोड के पत्ते' , 'कउड़ा' , 'कमीना', 'जालिम मिह उसका बाप था', 'कविता भी आदमी', 'सनहा' तथा पोखर नया गाँव' । प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपी ये कहानियाँ इस  बात की प्रमाण है कि यह कथाकार नये भारत के निर्माण के लिए, चेतना-सम्पन्न विचार-पुरुष की तलाश में तन्मय है ।
  • Jauhar Ke Akshar
    Santosh Shelja
    160 144

    Item Code: #KGP-9075

    Availability: In stock


  • Meri Priya Kahaniyan
    Jwahar Singh
    50 45

    Item Code: #KGP-9065

    Availability: In stock


  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    150 135

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Mohabbat Ka Per
    Priya Anand
    100 90

    Item Code: #KGP-1841

    Availability: In stock

    मोहब्बत का पेड़
    वैसे तो संग्रह की सभी कहानियां प्रेम-कथाएँ ही है, मगर 'मोहब्बत का पेड़' कहानी कई प्रेम-कथाओँ को जीवित कर देती है । इस कहानी में स्त्री का विद्रोही स्वर है, जो मोहब्बत की वकालत करता है और सामंती व्यवस्था को कटघरे में खडा करने की कोशिश करता है । यहाँ गौर करने वाली बात सिर्फ यह है कि जहाँ इस कहानी का अंत होता है, वहीं से एक नई कहानी की शुरुआत होती है । नारी के संघर्ष और यातना की कहानी । यह कहानी प्रिया आनंद की कहानियों का प्रस्थान बिंदु हो सकती है ।...
  • Kamzor Pyaar Ki Kahaniyan
    Bhimsen Tyagi
    100 90

    Item Code: #KGP-1948

    Availability: In stock


  • Kahani Samgra : Govind Mishra (3rd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1583

    Availability: In stock


  • Jama Poonji
    Dronvir Kohli
    160 144

    Item Code: #KGP-1830

    Availability: In stock

    जसा-पूँजी
    हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली के इस-प्रथम एवं एकमात्र कहानी-संग्रह 'जमा-पूँजी' की कहानियों को पढ़ते हुए लेखक की कथा-वर्णनात्मकता, भाषा-अनुशासन, संयम तथा इनमें पिरोई गई मार्मिक अनुभूतियों से सहज ही प्रभावित हुआ जा सकता है । अपने सामान्य मगर ठोस कथानकों के चलते पाठक इनकी प्रथम पंक्ति से ही बंध एवं बिंध जाता है तथा लेखक धीरे-धीरे कथा की परवरिश करते हुए उसे ऐसा विश्वसनीय बना देता है मानो यह अपने पाठक से एकमेक होकर विचार-विनिमय का रहा हो। पठनीयता को ऐंठकर, रोचक बनाने की चाह या पाठक को कथा के माध्यम से 'पट्टी पढाने' की अपेक्षा इस लेखक में नहीं पाई जाती है ।
    यद्यपि विभिन्न परिवेशों, पात्रों एवं परिस्थितियों के रंगों से कहानी की तस्वीर उकेरना इस कथाकार को आता है तथापि उनके अधिकांश पात्र उस वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है जो अपनी अत्यंत सीमित दुनिया में अभावों-तले बिजबिजा रहे हैं, जहाँ दाना-पानी का जुगाड़ किसी मन्नत मांगने से कम नहीं, और जहाँ आर्थिक विषमताएं-विपदाएँ रक्त-संबंधों को भी प्रदूषित कर देती है । शोक, हास-विनोद और विषाद की अनबोली स्थितियों को ज़बान देना भी इस कहानीकार को खूब आता है ।
    विगत कुछ दशकों में ज़ब-तब लिखी गई ये कहानियों हमें निम्न-मध्यवर्गिय समाज के जिजीविषारत उस समय में भी ले जाती हैं जब अँगीठियों का धुआँ हमारे महानगरीय जीवन की कड़वाहट को तिक्त कर देता था और चिंताएँ अठन्नी-चवन्नी की हुआ करती थीं । इस प्रकार ये कहानियाँ अपने समय का कोरस हैं तथा हमारे विगत का स्वाभाविक सामाजिक चित्रण भी ।
    अपने समय, समाज और मनुष्य की संपूर्ण संघर्षमयी  जिजीविषा से सन्नद्ध ये कहानियाँ हमारा अपना भूत, वर्तमान और निश्चित ही भावी भी है । हिंदी कहानी की परिपाटी को जानने का अवसर भी इन कहानियों से मौजूद है ।
  • In Dinon Ve Udhas Hain
    Dinesh Pathak
    75 68

    Item Code: #KGP-1930

    Availability: In stock

    इम दिनों वे उदास हैं
    'इन दिनों वे उदास हैं ' दिनेश पाठक की नौ बहुचर्चित कहानियों का संकलन है । इस संकलन की कहानियों में जीवन के कई रंग, कईं अनुभव है । लेखक की विशेषता जीवनानुभवों को वस्तुगत रूप में प्रस्तुत करना नहीं, वरन उन्हें रचना के दायरे में लाकर उनका सामाजिक अर्थ पाने की स्पष्ट एवं सार्थक कोशिश करना है । कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ अनुभव-संबद्धता से पैदा हुई आत्मीय संस्पर्श की ऊष्मा से  परिपूर्ण कहानियाँ है । प्रस्तुति के स्तर पर इनमें न कोई बौद्धिक आडंबर है, न चमचमाता वाग्जाल । जो कुछ है, वह अनुभव के स्वायत्त वेग से उत्पन्न शिल्प है, भाषा है । एकदम सहज-सरल और स्वत स्फूर्त ।
  • Gulmohar Phir Khilega
    Kamleshwar
    300 270

    Item Code: #KGP-46

    Availability: In stock


  • Ek Koi Aur
    Amrik Singh 'Deep'
    250 225

    Item Code: #KGP-863

    Availability: In stock

    एक कोई और
    सुपरिचित कथाकार अमरीक सिंह दीप के अब तक पांच कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक वाक्य में कहा जाए तो दीप जी मानवीय समाज में पसरती पाशविकता और इंसानी रिश्तों में समाती संवेदनशून्यता के प्रति चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियां अधिकतर मनुष्यता के पक्ष में ही नहीं खड़ी दिखाई देतीं, बल्कि अमानवीय व्यवहार का मुखर विरोध भी करती हैं। उनके छठे कहानी-संग्रह ‘एक कोई और’ की कहानियां भी लेखक के इसी मनोभाव से उपजी हैं। भले ही इन कहानियों के कथानक, देशकाल, पात्र और कथोपकथन एक-दूसरे से भिन्न हैं, लेकिन इन सभी के मूल में आदर्श मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का स्वर सुनाई पड़ता है।
    इस संग्रह की कहानियां कुछ मायनों में दीप जी की पूर्ववर्ती कहानियों से अलग नज़र आती हैं। यानी ये कहानियां, कहानी के बने-बनाए फॉर्मेट से अलग खुद अपना आकार-प्रकार, गति और दिशा तय करती हैं। कुछ कहानियां तो अपने अंतिम सोपान तक पहुंचते-पहुंचते चौंकाती भी हैं। मिसाल के तौर पर कहानी ‘बर्फ़’ में एक मां का अपनी बेटी के प्रेमी के पास जाकर उसे मां बनाने का आग्रह करना, रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ती दिखती है। यहां पर याद आती है लेखक की एक और क्लासिक कहानी ‘देहदान’, जो पारंपरिक इंसानी रिश्तों को परिस्थितिवश नए ढंग से रचती है।
    इस संग्रह का आना इसलिए भी सुखद है, क्योंकि उम्र के सात दशक स्पर्श करने की दहलीज़ पर खड़े अमरीक सिंह पूरी ऊर्जा के साथ रचनारत हैं और धूल-धुएं और मेहनतकशों के शहर कानपुर की साहित्यिक रचनाशीलता में लगातार इज़ाफ़ा भी कर रहे हैं।
  • Nanhe Haath Khoj Mahan
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-109

    Availability: In stock

    एक पुरानी कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात। विज्ञान के आविष्कारों में अनेक ऐसी कथाएं छिपी हुई हैं, जिनके बीज बचपन में ही पड़ गए थे। उन वैज्ञानिकों के बचपन में ही कुछ ऐसा हुआ था, जिसने आगे चलकर एक महान आविष्कार, अनुसंधान या खोज का रूप लिया। इस पुस्तक में कुछ ऐसी ही विशिष्ट कथाएं दी गई हैं, जो बाल-पाठकों को प्रेरणा देंगी कि उनका हर काम महत्वपूर्ण है। कौन जाने, उनका कौन-सा काम बड़े होने पर प्रेरणा देगा और उन्हें महानता की सीढ़ियों पर चढ़ाकर विशिष्ट बना देगा। ये कहानियां रोचक हें, ज्ञानवर्धक हैं और प्रेरक हैं। आशा है, सभी आयु के पाठक इनसे प्रेरणा लेंगे।
    —हरिकृष्ण देवसरे
  • Haadase Aur Hausle
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-8001

    Availability: In stock

    मालती जोशी पाठकों के बीच अत्यंत सम्मानित कहानीकार हैं । संभवत: वे इस बात पर भरोसा करती हैं कि कहानी पाठक को आईने के सामने ला खड़ा करती है। कहानी आखिरकार जीवन से ही उपजती है और अस्तित्व के ही किसी अंश को आलोकित कर जाती है। मालती जोशी परम रहस्यमय जीवन का मर्म बूझते हुए अपनी कहानियों को आकार देती हैं।
    'हादसे और हौसले' मालती जोशी का नवीनतम कहानी संग्रह है। इसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन केंद्र में है। इसकी रचनाएं समाज की लक्षित-अलक्षित सच्चाइयों को शिददत से व्यक्त करती हैं। विशेषकर स्त्री चरित्रों का वर्णन जिस तरह लेखिका ने किया है वह मुग्ध कर देता है। बहुतेरे लेखक विचार को कथानक में सम्मिलित करते हुए उसे अति बौद्धिक बना डालते हैं। मालती जोशी सहज कथारस को अपनाती हैं। विचार कथा के भीतर से विकसित करती हैं। वे शिल्प और भाषा के अतिरिक्त मोह में नहीं उलझतीं ।
    प्रस्तुत कहानी संग्रह मालती जोशी की कथा कुशलता को रेखांकित करते हुए यह बताता है कि जीवन में कहां-कहां और कैसी-कैसी कहानियां छिपी हुई हैं। पठनीयता का प्रमाण देती महत्वपूर्ण कहानियां ।

  • Aurat Ek Raat Hai
    Malti Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-1984

    Availability: In stock

    औरत एक रात है 
    ‘नहीं, आप गलत क्यों कहेंगे? गलत तो उन्हांने कहा है, जो दीदी के अविवाहित रहने के लिए जिम्मेदार हैं। अपनी गलती छिपाने के लिए उन्होंने यह कहानी गढ़ ली है। ...यह घर की बात थी, घर में ही रह जाती, तो अच्छा था; पर दीदी के बारे में ऐसा कुप्रचार हो और मैं चुप रह जाऊँ, यह तो नहीं हो सकता; तो सुन लीजिए, दीदी शादी नहीं कर सकीं, क्योंकि छोटे भैया की पढ़ाई बाकी थी और बड़े भाई ने साफ इंकार कर दिया था। वह अनब्याही रह गईं, क्योंकि घर में बूढ़ी बीमार माँ थी और उन्हें देखने वाला कोई नहीं था। वह अविवाहित रह गईं, क्योंकि मेरी परवरिष करनी थी, और सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी शादी के लिए आज तक किसी ने पहल नहीं की और खुद अपना दूल्हा ढूँढ़ने के संस्कार हमारे परिवार में नहीं थे, इसीलिए उनकी शादी नहीं हो सकी,’ बात करते करते मेरा गला भर गया था। मैं एकदम उठ खड़ी हुई, ‘अच्छा, अब मुझे इजाजत देंगे। थैंक्स फॉर द टाइम यू गेव मी।’
    ‘अरे बिटिया, चाय तो पीती जाओ।’ जज साहब की पत्नी बोलीं। गृहिणियों को हमेषा मेहमानों को खिलाने पिलाने की ही पड़ी रहती है, और बातों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता, पर जज साहब मेरी बात समझ रहे थे। दोनों भाई मेरे साथ ही उठ खड़े हुए और मुझे छोड़ने बाहर तक आए।
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘अवसान एक स्वप्न का’ से)
  • Khoyi Huyi Dishaayen
    Kamleshwar
    120 108

    Item Code: #KGP-9060

    Availability: In stock


  • Rahiman Dhaaga Prem Ka
    Malti Joshi
    150 143

    Item Code: #KGP-1992

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]
  • Aapad Dharm Tatha Anya Kahaniyan
    Deepak Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-1933

    Availability: In stock

    आपदधर्म क्या अन्य कहानियाँ
    'यह दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि हमरे समाज में विवाह केवल सामाजिक समाकलन का एक यंत्र योग है ? या किर विधिक विषयासक्ति का एक रचनातंत्र ? इसके अतिरिक्त क्या हमारे समाज में विवाह कोई तीसरा सत्व भी रखता है ?' रोहिणी एलबम का वह पृष्ट सामने ले आई जहाँ विवाह के पारंपरिक वस्त्रों एवं आभूषणों से सजे तथा विवाह संबंधी स्वाभाविक उमंगों एवं अचरजों से लदे अठारहवर्षीय मधु तथा चौबीसवर्षीय अशोक एक-दूसरे की ओर संपूर्ण समर्पण की दृष्टि से निहार रहे थे ।
    अशोक के हाथों में अपना भाग्य एवं अपना भविष्य सौंप चुकी मधु के हाथों से उस लोक का भाग्य एवं भविष्य छीनने वाली रोहिणी का उस लोक में प्रवेश क्या अतिक्रमण न था ? निषिद्ध न था ? विवाह तोड़ने की उसे लत लग गई थी क्या ?
    “बच्चे है तीसरा सत्व, रोहिणी ।"
    पहली बार गर्भवती हुई मधु के मन में बच्चों के प्रति ढेरों उत्माह रहा ।
    "द सीमेंट ? द शटल कॉक ? द प्लेइंग फील्ड ?” रोहिणी हँस पडी ।
    “मतलब ?"
    "स्ट्रिंडबर्ग र्ग के अनुसार बच्चों से माता-पिता सीमेंट का काम लेने है । हैनरी जेम्स सोचते है, माता-पिता की फूट में बच्चे बैडमिंटन को चिडिया की भांति इधर से उधर फहराए जाते हैं और नोरा एफ़रोन अपने उपन्यास "हार्टबर्न’ में लिखती हैं कि बच्चे के जन्म के साथ माता-पिता की बल-परीक्षा को एक नई क्रीड़ा-भूमि मिल जाती है... ।'
    -[इस संग्रह की एक कहानी 'स्त्रियाँ' से]
  • Sulagati Inton Ka Dhuaan
    Poonam Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-9196

    Availability: In stock

    सुलगती ईंटों का धुआं कहानीकार पूनम सिंह का नया संग्रह है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मंे प्रकाशित इन कहानियों को पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हो चुकी है। पूनम सिंह नए बनते समाज को आलोचनात्मक दृष्टि के साथ कहानियों के कंेद्र में रखती हैं, यह एक सामान्य कथन है। यह उपयुक्त कथन है कि वे भाषा और शैली से पाठक के मन में भी खुशी और खलिश पैदा कर देती हैं। विकास के नाम पर लुटती जमीन, परंपरा और अस्मिता विमर्श से जूझती स्त्री, जिम्मेदारियों से घिरा ‘नैतिक बेरोजगार’, ग्रहों के अंधविश्वास में उलझे आधुनिक, उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़ी हुईं स्त्रियां, अकेलेपन से आक्रांत व आत्मीयता को तलाशती वृद्धवस्था और व्यवस्था के खिलाफ एकजुट जनता-इन कहानियों के यही सूत्र-संदर्भ हैं। देखा जाए तो रचनाशीलता को चारों तरफ से घेरे इन सूत्र-संदर्भों को पूनम सिंह ने अपने रचाव से विशेष बना दिया है। उनमें स्थानीयता का एक मोहक अंदाज है। यह अंदाज केवल भाषा में ही नहीं, कहानी कहने के मिजाज में भी समाया है। इन कहानियों के कई चरित्र मन में कहानी समाप्त हो जाने के बाद भी उद्विग्न रहते हैं। कहानी पाठक के मन में दुबारा-तिबारा लिखी जाती है शायद।
  • Honour Killing Tatha Anya Kahaniyan
    Malti Joshi
    170 153

    Item Code: #KGP-404

    Availability: In stock


  • Qalandar
    Narendra Mohan
    25 23

    Item Code: #KGP-9102

    Availability: In stock


  • Premchand Ki Shresth Kahaniyan
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-7801

    Availability: In stock

    यद्यपि प्रेमचंद ने नाटक, जीवनी, अनुवाद, निबंध तथा बाल-साहित्य की रचना भी की किंतु उनकी अक्षय कीर्ति का आधर उनके उपन्यास और कहानियां ही हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूति, काया-कल्प, गबन, कर्मभूमि तथा गोदान जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों एवं प्रायः तीन सौ कहानियों की रचना कर अपने को अमर करने वाले प्रेमचंद की गुल्ली-डंडा, नमक का दारोगा, प्रेरणा, दो बैलों की कथा, मंदिर, ईश्वरीय न्याय, सवा सेर गेहूं, रामलीला, पूस की रात, महातीर्थ, जुलूस, पशु से मनुष्य, दुस्साहस, आत्माराम, नशा, गृह-दाह आदि लोकप्रिय कहानियां हैं। प्रेमचंद ने अपने समय और समाज के ज्वलंन प्रश्नों को अपनी कहानियों के माध्यम से चित्रित किया है। ग्रामीण जीवन-परिवेश और पात्रों का इतना जीवंत चित्रण करने वाला कथाकार हिंदी में तो क्या अन्य भारतीय भाषाओं में भी कदाचित् ही कोई हुआ हो। यही कारण है कि वे उस समय के सर्वप्रमुख भारतीय कथाकार हैं। विद्वानों ने बीसवीं शती के विश्व-साहितय के तीन बड़े शीर्ष कथाकारों में प्रेमचंद की गणना की है।
  • Man Mirza Tan Sahiban
    Amrita Pritam
    90 81

    Item Code: #KGP-1967

    Availability: In stock


  • Dona Paavala Aur Teen Auraten
    Rohitashv
    175 158

    Item Code: #KGP-1836

    Availability: In stock

    गोवा का समुद्री तट। लहरों में लहराता एकांत। फैनी की मादक गिरफ्त। ऑन्जना बीच पर निर्वस्त्र विदेशी नर-नारी देखकर व्हिस्की पीने को मचलता मन। पीने के बाद इस स्वर्ग में गोते खाता नायक ! हाँ, यही तो होटल, बार और क्रूज के साथ तस्वीर है गोवा की। धनाढ्य पर्यटकों की मौज-मस्ती का अपना निजी रंगस्थल, देश-विदेशों में मशहूर ! प्रचलित यह भी है कि गोवा की औरतें स्वच्छंद जीवन की अभ्यस्त होती हैं। वे पैसे कमाती हैं और ऐश करती हैं।
    मगर रोहिताश्व की लिखी कहानियाँ, ये किस गोवा की कथाएँ हैं, जिनमें गोवा का स्वर्ग अपने ही बाशिंदों को आजाद रहन-सहन के बावजूद गरीबी, धोखे, जालसाजी और भावात्मक शोषण की चक्की में पीसकर रख देता है। अत्याचार और शोषण चक्र को खोलता हुआ लेखक सागर-किनारे के चप्पे-चप्पे को खँगालता है। संवेदना की बुनावट में गोवा की तस्वीर बदल जाती है। समुद्र की लहरों पर बल खाती चाँदनी के नीचे कितनी-कितनी काली रातें बिछी हुई हैं। उजाला होने की उम्मीद यहाँ स्त्री-पुरुषों के त्याग और बलिदानों से बने सूरज के हाथ है।
    दोना पावला और तीन औरतें’ संसार की उन तमाम औरतों का प्रतिनिधित्व करती है, जिनका जीवन अकेलेपन की त्रसदी के लिए है। पढ़ते हुए भयानक बेचैनी जकड़ती चली जाती है। कहीं आशा जागती है कि संघर्ष ही उनका मकसद है। स्त्रियाँ टूटती हैं, डगमगाती फिर भी नहीं...
    लेखक कहानियों में विभिन्न नामों से उपस्थित है और अपनी परिचय-भूमियों (गोवा और हैदराबाद) पर घटित होते इतिहास तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को बराबर दर्ज करता जाता है। कहन का प्रस्तुतीकरण ऐसा जैसे समूह में बैठकर हम लोककथाएँ सुन रहे हों। यहाँ कथाओं के प्रति वही अटूट आकर्षण जागता है, जिसके गायब हो जाने से कथा-कहानी के प्रति पाठक उदासीन हुआ है। संवेदी लगाव की यह धारदार प्रस्तुति रोमानी हालात में भी संघर्ष की पराकाष्ठा तक अनायास ही पहुँच जाती है।
  • Manjul Bhagat : Samagra Katha Sahitya-2
    Kamal Kishore Goyenka
    800 720

    Item Code: #KGP-58

    Availability: In stock


  • Lakeer Tatha Anya Kahaniyan
    Urmila Shirish
    250 225

    Item Code: #KGP-242

    Availability: In stock

    लकीर तथा अन्य कहानियाँ
    उर्मिला शिरीष की कथाभूमि उनका परिवेश, समाज और वह पर्यावरण है, जिनमें वे एक साथ तीन तत्त्वों का समावेश करती हैं। एक है पात्र या मनुष्य, जो उनकी संवेदना का अस्तित्व है; दूसरा है उनकी विषयवस्तु, जो एक कथा में कथा की उपस्थिति की तरह है और तीसरा है उनका शिल्प, जो उनकी भाषा-चेतना और शब्द-सत्ता से निर्मित होकर जीवन-संबोधी बनता है।
    उर्मिला की ये दस कहानियाँ मृत्यु-पर्व से शुरू होती हैं तो पाठक को एक प्रकार के सदमे में ले जाती हैं, लेकिन मृत्यु का पर्व या जश्न संवेदना के कितने धरातल एक साथ हिला देता है, यह कहानी की आंतरिक काया से प्रकट होता है। एक बहुत ही ध्यातव्य तथ्य इन कहानियों के बारे में यह है कि कथाकार के आग्रह, पूर्वग्रह या दुराग्रह कहीं नहीं हैं--न यथार्थ के स्तर पर, न शिल्प और भाषा के स्तर पर। जीवन के सारे सामान्य, सामान्य की तरह ही हर कहानी में मौजूद हैं, लेकिन जब उनके मर्म की मृदुलता में उतरते हैं तो कहानी हमें अंदर तक भिगो देती है।
    ‘अग्निरेखा’ से ‘लकीर’ तक की ये कहानियाँ घटनाओं की न होकर घटित होते जीवन की कहानियाँ हैं। यह भी दावा नहीं है कि कथाकार कथा की कोई कारीगरी कर रही हो। कहानियाँ कहीं विडंबना में बोलती हैं, कहीं व्यथा में, कहीं व्यंग्य में तो कहीं विषमतागत व्यग्रता में। इसलिए कहा जा सकता है कि इन कहानियों के अंदर एक ऐसी अनुभूति है, जो एक तरफ पाठक को कहानी से जोड़ती है, तो दूसरी ओर अपने ऐसे जीवन-क्षणों, स्पंदनों और संवेदनों से, जो पराये भी नहीं लगते और निजी बनाने की कोशिश में निजत्व से भी पृथक् हो जाते हैं।
    कहानियों में रचा गया जो संसार है, वह एक कथाकार की व्याकुलता से भरा-भरा है, इसलिए ये कहानियाँ पाठक के मन को अपनी ओर खींचने और अपने अंदर टिकाए रहने की कोशिशभरी कोशिश की तरह हैं।

  • Kohare Se Lipe Chahre
    Suryakant Nagar
    130 117

    Item Code: #KGP-1802

    Availability: In stock

    कोहरे से लिपे चेहरे
    सूर्यकांत नागर उन कथाकारों से हैं जो आधुनिक संवेदना की जटिलता और उसकी सहज अभिव्यक्ति के बीच पुल बनाते हैं। उनके रचनाकार की मार्मिकता मनुष्य के विशिष्ट स्वभाव र्ताक्वे स्थितियों में उतरकर उन्हें पहचानने के गुणों में निहित है । वे अपनी कहानियों में इनके अन्तर्सम्बंधों के प्रति व्यग्र दिखाई देने हैं ।
    उनको चिंता के केंद्र में मनुष्यता है । मानवीय मूल्यों में उनकी गहरी आस्था है । अपनी कहानियों में मनुष्य के दोहरे और दोगलेपन का उजागर करने का वे कोई अवसर नहीं छोडते । दूसरों  द्वारा अपमानित होने के बजाय जब  मनुष्य स्वयं की नजरों में लज्जित होता है तो अधिक ग्लानि का अनुभव करता है । संग्रह की 'तमाचा', 'अँधेरे से उजास', 'एक और विभाजन' तथा 'अब अब और नहीं' कहानियाँ इसी श्रेणी की हैं । नागर जी के पास एक सहज, प्रवाहमयी भाषा है, जिनमें कहीँ-कहीँ व्यंग्य का मार्मिक और अनायास स्पर्श है-वर्णन, संवाद और चरित्रांकन तीनों में ।
    सूर्यकांत नागर किसी विचारधारा से ज़कड़े लेखक नहीं है कि विचारधारा का सहारा लेकर वैतरणी पार कर लें । वे स्वाधीनता का मार्ग चुनते हुए अपनी राह स्वयं बनाते है । उनकी हर कहानी सौद्देश्य और उत्तरदायी है । कथा-कथन में वे सिद्ध हैं । कहानियों की नोकें भले उतनी उभरी दिखाई न दें, परंतु भीतरी चुभन प्राय: हर कहानी में मौजूद है । सादा तबियत र्वश्च अंतर्मुखी नागर जी ने विविध विषयों में खूब लिखा है, लेकिन वे अभी भी अपने विशिष्ट होने का मान नहीं होने देते ।
  • Thank You! Saddaam Husain
    Kshma Sharma
    75 68

    Item Code: #KGP-9076

    Availability: In stock


  • Paap-Punya Se Pare
    Rajendra Rao
    225 203

    Item Code: #KGP-1832

    Availability: In stock


  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    995 896

    Item Code: #KGP-580

    Availability: In stock


  • Munna Ro Raha Hai
    Prahlad Shree Mali
    280 252

    Item Code: #KGP-590

    Availability: In stock

    "सच कहूं तो इन नेता-अफसरों के चरित्र और आचरण ने मेरा मनोबल बढ़ाया है। जैसे औलाद नालायक निकल जाए तो समझदार मां-बाप खुद में नई ताकत पैदा कर लेते हैं अपनी सार-संभाल की। वैसे ही जब मैंने यह देखा कि इन नेता-मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों से देश-समाज और नागरिक का भला होना मुश्किल है, तो बस अपना मनोबल ऊंचा कर लिया। रही बात आशा-चिंता की तो यदि आप आशा-अपेक्षा रखेंगे तो चिंता होगी ही। साथ ही दुःख भी मिलेगा। मेरे खयाल से पति-पत्नी या संतान से हमेशा किसी को मनचाहा सुख नहीं मिलता। इसके लिए तो मन को मनाकर संतोष रखना पड़ता है। मेरे दादा की छह संतानें थीं। चार लड़के, दो लड़कियां। बेचारे उनके पीछे अपना पूरा जीवन घिसते रहे। न बेटों ने सुख दिया, न बेटियों ने चैन। पर इसमें उनका भी क्या दोष! वे सब भी तो अपनी-अपनी गृहस्थी की गाड़ी चलाने की खींचतान में लगे हुए थे। यही हाल मेरे पिताजी का रहा। उन्हें न तो मैं कोई सुख दे पाया, न मेरा भाई। और यह अकेले मेरी नहीं, लगभग हर घर की कहानी है। फिर भला मैं अपने बेटे से कोई सुख पाने की अपेक्षा रखने की नादानी क्यों करूं!"
    -इसी पुस्तक से  
  • Nihatthi Raat Mein
    Indira Mishra
    150 135

    Item Code: #KGP-9134

    Availability: In stock


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