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  • Tv Samaachaar Ki Duniyaa
    Kumar Kaustubh
    500 450

    Item Code: #KGP-604

    Availability: In stock

    ‘टीवी समाचार की दुनिया’ में समाचार के स्वरूप और उसके कुशल निर्माण व प्रसारण पर लगभग सभी दृष्टिकोणों से विशद चर्चा की गई है। सरल और मनोरंजक शैली में जहां खबर के उत्कृष्ट लेखन-संपादन को समझाया गया है, वहीं उन तमाम टेलीविजन-इतर प्रभावों का चित्रण भी है जिनसे बचा जाना चाहिए। इसके अध्ययन से खबर के निर्माणक डेस्क से लेकर माइक के सामने या परोक्ष में खबरों की सफल और प्रभावी प्रस्तुति तक का सफर सहज और ग्राह्य होकर सामने आ जाता है। इसी तरह ‘न्यूज़ रूम से पैनल तक’ शीर्षक से लेख में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि आज का प्रसारण पूरी तरह कंप्यूटर-आधारित प्रक्रिया कैसे है। कुमार कौस्तुभ ने पुस्तक में उद्धारण के रूप में ‘खबर: एक कहानी’ का नाम देकर आत्मानुभव को कौशल से लेखनीबद्ध किया है। मैं मानता हूं कि खबरों के उत्पादन-विधान को पढ़ाने वाले अध्यापकगणों को इस पुस्तक से रोचक अनुभव-सामग्री मिलेगी और चैनलों के दर्शकों का भी इसमें किए गए विश्लेषणों से और अधिक जुड़ाव होगा। अध्येता के लिए भी कुमार कौस्तुभ की लिखी यह अनुभवजन्य पुस्तक नई संभावनाओं के द्वार खोलेगी।
    प्रस्तुत पुस्तक में टीवी खबर और उसके परिवेश की समग्रता दिशा-निर्देशों के साथ खुलकर उजागर हुई है।
    —राजनारायण बिसारिया
  • Media Aur Hindi Sahitya
    Raj Kishore
    250 225

    Item Code: #KGP-303

    Availability: In stock

    मीडिया और हिंदी साहित्य
    मीडिया और साहित्य का रिश्ता बिगड़ चुका है। इसमें संदेह नहीं कि आदर्श या लक्ष्य की दृष्टि से दोनों की मूल संवेदना एक है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को शिक्षित करना और सभ्यता के स्तर को ऊँचा उठाना है। दोनों भाषा में ही काम करते हैं, जो एक सामाजिक घटना है। इसके बावजूद आज मीडिया और साहित्य के बीच गहरी होती हुई खाई दिखाई देती है। यह खाई चिंताजनक इसलिए है कि मीडिया की पैठ और लोकप्रियता अधिक होने के कारण जनसाधारण के संस्कारों और रुचियों का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। दूसरी तरफ, साहित्य की दुनिया संकुचित होती जाती है और उसकी संवेदना का सामाजिक विस्तार नहीं हो पाता। इस तरह, संस्कृति की दुहरी क्षति होती है।...
    जहाँ तक साहित्य और मीडिया के रिश्ते का सवाल है, हिंदी का मामला न केवल कुछ ज्यादा निराशाजनक है, बल्कि ज्यादा पेचीदा भी है। साधारण जनता से सीधे जुडे़ होने के कारण हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की सामाजिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। संस्कृति की दृष्टि से हिंदी का संसार एक विकासमान संसार है। हिंदी प्रदेशों में साक्षरता का स्तर हाल ही में बढ़ा है और पढ़ने तथा जानने की भूख जगी है। मीडिया का काम इस भूख को सुरुचि-संपन्नता के साथ तृप्त करना है और व्यक्ति के सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकारों को मजबूत करना है। कुछ समय पहले तक स्थिति जैसी भी थी, बहुत अधिक असंतोषजनक नहीं थी। मीडिया में लेखकों का मान था और साहित्य के लिए कुछ सम्मानजनक स्थान हमेशा सुरक्षित रहता था, लेकिन आज नौबत यह है कि दोनों के बीच अलंघ्य दूरी पैदा हो चुकी है। ऐसे में सामाजिक दबाव का रास्ता ही असरदार हो सकता है। 
  • Doordarshan Evam Media Vividh Aayam
    Amar Nath 'Amar'
    260 234

    Item Code: #KGP-190

    Availability: In stock

    क्या टेलीविजन माध्यम आज अपनी राह से भटक चुका है? क्या यह अपना बुनियादी स्वरूप खोने लगा है? क्या साहित्य, कला, संगीत, नृत्य और लोकपरंपराओं की सांस्कृतिक धरोहर धुंधली होने लगी है? नहीं, ऐसा भी नहीं है। आज आम जनता इस सशक्त इलेक्ट्राॅनिक माध्यम को पब्लिक ब्राॅडकास्टर के रूप में ही देखना पसंद करती है। उनके मन में आज भी उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर दूरदर्शन पर ऐसे कौन-कौन से कार्यक्रम हैं, जिन्हें देखकर हम मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानवर्द्धन भी करना पसंद करेंगे।
    इस पुस्तक में विविध पक्षों पर लेख के रूप में विद्वानों के विचार हैं जो दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों और अन्य माध्यमों की न केवल चर्चा करते हैं बल्कि उनकी समीक्षा भी करते हैं। ये लेख कई वर्षों से धीरे-धीरे एकत्र हुए और आज एक किताब के रूप में आपके समक्ष हैं।

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