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  • Ath Nadi Katha
    Hari Krishna Devsare
    450 405

    Item Code: #KGP-219

    Availability: In stock

    अथ नदी कथा
    भारत की नदियों की पवित्रता, ऐतिहासिकता, पौराणिकता और उनके गौरवशाली वरदानों से हम सदियों से जुडे है । आम आदमी के लिए, नदी की यह कथा न केवल रोचक हो सकती है, उसके लिए प्रेरक भी हो सकती है। समय के साथ हमने कितनी ही नदियों की गाथाएँ भुला दी हैं। केवल उँगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम ही लोगों को याद हैं। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि भारत को लगभग सभी महत्वपूर्ण? नदियों के सम्मिलित किया जाए। फिर भी क्षेत्रीय महत्त्व की और छोटे यात्रा-पथ वाली नदियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है।
    इस पुस्तक में सम्मिलित नदियों का यथासंभव पौराणिक माहात्य, उनकी पौराणिक एवं लोक- प्रसिद्ध कथाएँ, उनसे संबद्ध ऋषियों, तपस्वियों की कथाएँ दी गई है । इसी के साथ उनकी उत्पत्ति, की कथाएँ, उद्गम स्थल का भौगोलिक महत्त्व और फिर आगे के यात्रा-पथ का वर्णन है। यात्रा-पथ में नदी के दोनों तटों पर बसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं औद्योगिक नगरों के साथ साथ तीर्थों, संगमों, मंदिरों आदि के लोकव्यापी महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है। ये सभी विवरण हमारी भावी पीढ़ी, युवा पीढ़ी और प्रौढ़ों-तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
  • Mahayaatra Gaatha (3 & 4) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-23

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Pracheen Bharat Ki Neetiyan
    Acharya Dina Nath Sidhantalankar
    450 405

    Item Code: #KGP-851

    Availability: In stock

    प्राचीन भारत की नीतियाँ
    हमारे आर्यावर्त्त देश में जनतंत्र और लोकतंत्र चलाने के लिए कैसी नीतियाँ थीं, उसके बाद कैसी नीतियाँ रहीं और अब कौन-सी नीतियाँ हैं, इस दिशा में इस ग्रंथ के संपादन एवं प्रकाशन में महत्त्वपूर्ण प्रयास किया गया है। विद्वान् सुधी लेखक ने युक्ति, तर्क, औचित्य और वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की दृष्टि से इस ग्रंथ में उन सब संदर्भों को अलग कर दिया है, जो भेदसूचक, ऊंच-नीच द्योतक और समाज के किसी भी वर्ग के प्रति तनिक भी घृणा, विषमता व हीनतासूचक हैं।
    इस ग्रंथ के संकलन के लिए भारतीय दर्शनशास्त्रों का गहराई से अध्ययन किया गया है और उसमें वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांतों की पृष्ठभूमि में उन ही सर्वोपयोगी नीतियों का संकलन किया है, जो समय और औचित्य की दृष्टि से आज की परिस्थितियों में भी उतनी ही तर्कसंगत और मूल्यवान हैं, जितनी प्राचीन युग में थीं। 
    देश की स्वतंत्रता के बाद अंतर्देशीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति-निर्धारण में मानवीय पक्ष को ही हमारे राष्ट्र-नायकों ने सामने रखा। किसी एक वर्ग, जाति, संप्रदाय अथवा धर्म के वर्चस्व के स्थान पर उसे समानता का प्रबल आधार प्रदान किया। इसके लिए हमने चार आदर्श अपनाए। प्रथम है–लोकतंत्र, द्वितीय है—समाजवाद, तृतीय है–धर्म-निरपेक्षता और चैथा है गुट-निरपेक्षता। इस नीति-निर्धारण में हमें सबसे बड़ी सहायता भारतीय वाङ्मय की अमूल्य निधि से मिली है। हम यदि अपने प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध जीवन-मूल्यों का आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन कर सकें तो समाज उनसे लाभ उठा सकता है।
    इस परिपेक्ष्य में यह ग्रंथ नेताओं, प्रशासकों और आज के प्रबुद्ध पाठक-वर्ग के लिए विशेष स्फूर्तिप्रद होता हुआ भारत के नव-समाज-निर्माण के लिए दिशा-निर्देश करने में अनवरत उपयोगी सिद्ध होगा।
  • Himalaya Gaatha (2) Parv-Utsav
    Sudarshan Vashishath
    300 270

    Item Code: #KGP-167

    Availability: In stock


  • Himalaya Gaatha-1 (Dev Parampara)
    Sudarshan Vashishath
    450 405

    Item Code: #KGP-166

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-1 (देव परंपरा)
    महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बाद संस्कृति पर लेखन और यात्रा-वृत्तांत जैसे साहित्य की धीरे-धीरे कमी होती गई । बहुत ही कम ऐसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने आसपास की संस्कृति पर कलम चलाई । ऐसे बिरले साहित्यकारों में सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसा नाम है, जिसने सशक्त कथाकार और कवि होने के साथ-साथ संस्कृति-लेखन में भी बराबर पैठ बनाए रखी। आठवें दशक के आरंभ से लेकर इनके सांस्कृतिक लेख सामने आते रहे । 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी', 'संस्कृति', 'योजना' जैसी पत्रिकाओं तथा सभी समाचार-पत्रों के सांस्कृतिक पृष्ठों में ये बराबर लिखते रहे। कुल्लू के मलाणा गणतंत्र को यही सबसे पहले सामने लाए । 'धर्मयुग' के फागुन अंक में 'फागुन में मलाणा' लेख छपा ।
    ‘आँखिन देखी' और उसका कथात्मक शैली में वर्णन वशिष्ठ के संस्कृति-लेखन की विशिष्टता रही है । पढ़ते हुए ऐसा लगता है, आप यह उत्सव स्वयं देख रहे हैं । सरल और स्पष्ट भाषा से रोचकता के साथ संस्कृति के गंभीर पहलुओं का विश्लेषण, उनकी वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।  संस्कृति का कोई ऐसा पहलू अछूता नहीं रहा है, जिस पर वशिष्ठ ने लेखनी न चलाई हो। इतिहास और परंपरा, धर्म और संस्कृति, मंदिर और पुरातत्त्व, मेले और उत्सव, लोक-परंपरा और लोक-वार्ता कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जो अछूता रहा हो । लेखक की यायावर प्रवृत्ति ने हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राएँ की ।
    यदि इनके अभी तक प्रकाशित हजारों लेखों और दर्जनों पुस्तकों को देखा जाए तो इन्हें दूसरा राहुल कहा जा सकता है । राहुल जी ने बहुत जगह पूरे के पूरे गजेटियर उतार डाले । वशिष्ठ ने ऐसा नहीं किया । इन्होंने संस्कृति को बहुत करीब से देखा । जो देखा, वह लिखा । संस्कृति को निष्पक्ष नजरिए से देखा, परखा, समझा है और फिर लेखनीबद्ध किया है । आशा है, यह संस्कृति श्रृंखला पाठकों, शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Jhooth Nahin Bolta Itihaas
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    250 225

    Item Code: #KGP-579

    Availability: In stock

    झूठ नहीं बोलता इतिहास 
    इतिहास झूठ नहीं बोलता, यह सच है; लेकिन प्रायः इतिहासकार झूठ बोल जाते हैं, क्योंकि इतिहास लिखने वाले पहले भी दरबारी होते थे चारण, भाट और राजकवि, और आज भी दरबारी होते हैं कुछ प्रत्यक्ष तो कुछ परोक्ष । सत्ता-प्रतिष्ठान का वरदहस्त तो उन्हें मिला ही होता है । इसलिए इतिहास में वही सब कुछ लिखा जाता है, जो सत्ता चाहती है । हां, इतना अवश्य है कि किसी-किसी इतिहास लेखक का जमीर कभी-कभी उसे इस बात की गवाही नहीं देता था कि वह झूठ की मक्खी को जानते-बुझते निगल ले । इसलिए वह घटनाओं के बीच 'गैप' या 'संकेत' छोड़ देता है, जो घटना के दूसरे पक्ष को उजागर कर सके । इन्हीं 'गैप' या 'संकेतों' को पढ़ने को अंग्रेजी में 'बिटवीनस दी लाइंस' पढ़ना कहा गया है । इसी तरह 'बिटवीनस न लाइंस' पढ़ने की कोशिश से जन्मी हैं प्रस्तुत संकलन की रचनाएं । 
    प्रस्तुत संकलन को  रचनाओ में इतिहास की ज्ञात, अज्ञात और अल्पज्ञात रोचक घटनाओं  आलेख  हैं जो प्रमाणित हैं, जिनके स्रोत और संदर्भ यथास्थान दिए गए हैं ।
    हालांकि सभी रचनाएँ इतिहास से जुड़ी हैं फिर भी कुछ रचनाएं चमत्कारों से संबंधिन हैं जो यह बताती हैं कि प्रकृति के नियमों के बारे में जितना इम समझे हुए हैं, शायद उतना पर्याप्त नहीं हैं, । कुछ रचनाएँ गुप्तचरी को किंवदंतियां बनी गुप्तचर युवतियो माताहारी, नूर इनायत और तेनिया पर हैं, जो अद्यतन जानकारी लिए हुए हैं, जैसे माताहारी तो जासूस थी ही नहीं ।
    एक आलेख टावर ऑव लंदन की लेकर, जिसमें ब्रिटेन के छह सौ साल के इतिहास का क्रूरतम चेहरा दफन है । एक आलेख नेपोलियन के उस चेहरे का बेनकाब करता है, जो उनसे  प्रजातंत्र के नाम पर ओढ़ रखा था । चर्च के अंधे धर्माधिकरण  न सत्य की खोज करने वाले वैज्ञानिकों को किस तरह जिंदा  जलवा दिया, यह भी जानना रोमांचक है ।
    आलेखों की वस्तुगत विविधना लेखक के बहुपठित और  बहुविज्ञ होने को प्रमाणित ना करती ही है, साथ ही भाषा पर उसकी पकड़ और शैली की प्रवाहमय सहज सरलता पाठक को अभिभूत किए बिना नहीं रहती।
  • Mahayaatra Gaatha (1 & 2) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-22

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Himalaya Gaatha-5 (Lokvarta)
    Sudarshan Vashishath
    495 421

    Item Code: #KGP-693

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-5 (लोकवार्ता)
    अदभुत है लोक वाड्मय। यह जितना गहन है, उतना ही तर्कशील और विवेकशील है । इसके रचयिता वे अनाम रचनाकार रहे हैं, जिन्होंने कभी अपने नाम नहीं दिए । लोक की रचना जितनी मारक रही है, उतनी ही काव्यमयी । हालाँकि उन रचयिताओं ने कहीँ से छंदविधान नहीं सीखा, किसी काव्यशास्त्र की शिक्षा नहीं ली । सबसे बडी बात यह कि राजाओं के निरंकुश शासन के समय भी उन्होंने बड़ी से बडी बात अपने ढंग से निडर होकर कही । वे काल और स्थिति के अनुसार नए-नए छंद रचते रहे । लोक की रचना में अपनी परंपरा के वहन के साथ समाज- सुधार की एक धारा भी निखार बहती रही । अपनी संस्कृति का संरक्षण, अपने संस्कारों का समादर इनका अभीष्ट रहा ।
    हमारी लोकवार्ता लोकगीत, लोकसंगीत, लोकनाट्य, लोकोक्ति-मुहावरे, लोककथा और लोकगाथा के रूप में सुरक्षित रही है। यह मात्र मनोरंजन का साधन न होकर संस्कृति के संवाहक और संरक्षक के रूप में अधिक जानी गई । समाज के विश्वास, आस्थाएँ, धारणाएं और समस्त क्रियाकलाप लोकवार्ता में परोक्ष रूप से छिपे रहते हैं, जो हमारी थाती को बुढ़िया की गठडी की भाँति सिरहाने रखे रहते हैं।
    लेकिन आज हमारी यह संपदा लुप्त होने के कगार पर है । भौतिकवाद, बाजारवाद और समाज के बदलते परिवेश और मूल्यों ने पुरानी परंपराओं को धराशायी कर दिया । लोकगायकों, वादकों ने अपना कर्म छोड़ दिया । आज न किसी के पास कथा या गाथा सुनने का समय है और न सुनने का । दादी-नानी दूरदर्शन में सास-बहू की कहानी देखती हैं । हम अपनी भाषा, वेशभूषा से विमुख हुए । ऐसे अपसंस्कृति के कुसमय में इस दुर्लभ साहित्य का संग्रहण आवश्यक हो जाता है ।
    कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अमूल्य थाती का संग्रह कर एक अति महत्त्वपूर्ण काम किया है, जिसके लिए कल का इंतजार नहीं किया जा सकता था । लोकवार्ता की मात्र प्रस्तुति न देकर उसका सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण विषय को और भी गहनता प्रदान करता है । 'हिमालय गाथा' के पाँचवें खंड में दी गई दुर्लभ सामग्री हमारी परंपराओं के अध्ययन के लिए एक मील का पत्यर साबित होगी, ऐसा विश्वास है ।

  • Itihaas Ka Vartamaan : Aaj Ke Bouddhik Sarokar-2
    Bhagwan Singh
    500 450

    Item Code: #KGP-9157

    Availability: In stock

    ‘इतिहास का वर्तमान: आज के बौद्धिक सरोकार’ इस विमर्श-व्याकुल समय में तर्क, विवेक, परंपरा, निहितार्थ और रचनात्मक साहस सहेजकर लिखी गई एक अद्भुत पुस्तक है। इसके लेखक भगवान सिंह विभिन्न विधाओं में सक्रिय किंतु इतिहास-विवेचन में सर्वाधिक  ख्यातिप्राप्त सजग मनीषी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि स्पष्ट, प्रमाण पुष्ट और चिंतन संपन्न है। यही कारण है कि जब भगवान सिंह ‘तुमुल कोलाहल समय’ व ‘स्वार्थसिद्ध वाग्युद्ध’ को परखने के लिए विचारों में प्रवेश करते हैं तो चिंतन की एक अलग रूपरेखा तैयार होने लगती है। स्वयं लेखक ने कहा है–
    "मैंने चर्चाओं को शीर्षक तो दिए हैं, परंतु उन विषयों का सम्यव्फ निर्वाह नहीं हुआ है। बातचीत करते हुए आप किसी विषय से बँधकर नहीं रह पाते। बात आरंभ जहाँ से भी हुई हो बीच में कोई संदर्भ, दृष्टांत, प्रसंग आते ही विषय बदल जाता है और आप भूल जाते हैं बात कहाँ से आरंभ हुई थी। याद भी आई तो आप कई बार स्वयं पूछते हैं, ‘हाँ तो मैं क्या कह रहा था?’ गरज कि सुनने वाले को आप क्या कह रहे हैं इसका हिसाब भी रखना चाहिए! परंतु सबसे मार्मिक प्रसंग तो उन विचलनों में ही आते हैं, तभी तो अपना दबाव डालकर वे धरा को ही बदल देते हैं ।"

    आज सच और झूठ के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है। भगवान सिंह इसमें अपना पाठ और पक्ष रखते हैं। वे वर्तमान राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि परिस्थितियों से उठ रहे सवालों से मुठभेड़ करते हैं। तात्कालिक घटनाओं को खँगालकर वे कोई जीवन-मूल्य या ऐतिहासिक सत्य सामने रख देते हैं। असहिष्णुता, आजादी, देशभक्ति, भारतमाता की संकल्पना, राजनीति का सांप्रदायिक कारोबार जैसे आयोजित-प्रायोजित प्रश्नों के बीच यह पुस्तक एक प्रकाश स्तंभ है। संवाद की अत्यंत पठनीय शैली में लिखे गए इसके आलेख आमने-सामने बैठकर की जाने वाली बातचीत का सुख भी देते हैं। उस हरेक पाठक के लिए एक अपरिहार्य पुस्तक जो वर्तमान की विशेषताओं और विरूपताओं दोनों को समझना चाहता है। 
  • Parvat-Gatha
    Hari Krishna Devsare
    425 383

    Item Code: #KGP-617

    Availability: In stock

    पर्वत गाथा
    पर्वतों और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। पर्वतों पर उगने वाले वन, उनसे प्राप्त होने वाले खनिज, वनोपज आदि मनुष्य के उपयोग की वस्तुएँ रही हैं। आज भी आदिवासी और गाँवों के लोग वनोपजों से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। पर्वतों के जंगलों से लकड़ी मिलती है। पर्वतों से देश की जलवायु अत्यधिक प्रभावित होती है। यदि भारत के उत्तर में हिमालय न होता तो मानसूनी हवाएँ सीधे मध्य तथा उत्तरी एशिया में पहुँचकर पानी बरसातीं और भारत एक रेगिस्तान बन जाता। हिमालय पर्वत सर्दियों में उत्तरी एशिया से आने वाली बेहद ठंडी हवाओं से भी भारत की रक्षा करता है।
    पर्वत मनुष्य के जीवन में विभिन्न रूपों में जुड़े रहे हैं और उनका महत्त्व आज भी है। ‘महानता’ के अर्थ में ‘पर्वत’ के अलावा कोई दूसरी उपमा नहीं दी जाती। आज मनुष्य ने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाने में सफलता पा ली है।
    जीवन में सफलता की ऊँचाइयों की तुलना पर्वत शिखरों से की गई है। हमारे देश में अनेक गौरवशाली पर्वत हैं और उनके प्रति लोगों में अटूट आस्था है। उन पर्वतों पर लोग पूजा करते हैं, मेले लगते हैं और मन की मुराद पूरी करते हैं। भारत के ऐसे ही पूज्य, गौरवशाली, इतिहास- प्रसिद्ध और धार्मिक आस्था के प्रतीक पर्वतों की गाथा है यह पुस्तक।

  • Bharat Ke Ateet Ki Khoj
    Om Prakash Kejariwal
    550 468

    Item Code: #KGP-592

    Availability: In stock

    भारत के अतीत की खोज
    आज का करीब-करीब हर शिक्षित भारतवासी सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, कनिष्क तथा बुद्ध जैसे ऐतिहासिक चरित्रों से परिचित है, परंतु जो बात अधिकतर शिक्षाविद् तथा विद्वान् अभी भी नहीं जानते, वह यह है कि करीब 200 वर्ष पहले ये सभी नाम या तो अपरिचित थे या इनके बारे में बहुत कम जानकारी थी। वस्तुतः 18वीं शताब्दी के आते-आते भारत अपने इतिहास को विस्मृति के गर्भ में खो चुका था। एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि 18वीं शताब्दी में हमारे पास एक समृद्ध अतीत तो था, परंतु इतिहास नहीं। यह अतीत किस प्रकार हमारे इतिहास में परिवर्तित हुआ, यही इस पुस्तक का मूल विषय है।
    इस काम को करने वाले महत्त्वपूर्ण अंग्रेज विद्वान् थे--सर विलियम जोन्स, जिन्होंने 1784 में कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की, जो इन सारे अध्ययनों का केंद्र बनी। इसी के अंतर्गत आधी शताब्दी के दौरान जो काम हुआ, उसके परिणाम-स्वरूप ही हमारा अधिकांश प्राचीन इतिहास प्रकाश में आया।
    प्रस्तुत पुस्तक में इसी आधी शताब्दी की कहानी है। साथ ही इसमें इस विषय की भी विवेचना है कि ये सभी विद्वान् अपने अध्ययन-कार्यों में मात्रा साम्राज्यवाद की भावना से प्रेरित थे अथवा नहीं।
  • Swatantarata Sangharsh Ka Itihaas_100
    Hazari Prasad Dwivedi
    100 90

    Item Code: #KGP-1061

    Availability: In stock

    स्व. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक गं्रथों द्वारा हिंदी साहित्य की अभूतपूर्व सेवा की है। उन्होंने जहां एक तरफ अत्यंत श्रेष्ठ उपन्यासों की रचना की वहीं दूसरी तरफ शोधपरक ग्रंथों की। निबंध-लेखन के क्षेत्रा में भी उन्होंने ललित निबंधों के सृजन द्वारा हिंदी को अत्यंत सुंदर निबंध दिए। प्रस्तुत पुस्तक स्व. आचार्य द्विवेदी के चिंतन को समझने में एक महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करती है। सैकड़ों साल की गुलामी से सन् 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ था। भारत के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। जागरूक एवं संवेदनशील साहित्यकार इस घटना की उपेक्षा नहीं कर सकता था। स्व. आचार्य जी ने स्वतंत्रता-संघर्ष के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। इसमें नामांे की भरमार नहीं है। यह उनकी अपनी दृष्टि थी। इस पुस्तक का रचनाकाल सन् 1948 के बरी है। इसमें हमने किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया है। नई पीढ़ी को हमारी यह एक विनम्र भेंट है।
    —मुकुंद द्विवेदी
  • Sikhon Ka Itihaas (2 Vol.)
    Khushwant Singh
    1295 1166

    Item Code: #KGP-9302

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Himalaya Gaatha-6 (Itihaas)
    Sudarshan Vashishath
    995 896

    Item Code: #KGP-788

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-6 (इतिहास)
    इधर इतिहास, परंपरा और संस्कृति में लेखन कम हो रहा है । सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसे साहित्यकार हैं जो सशक्त कहानीकार और कवि होने के साथ संस्कृति, इतिहास एवं पुरातत्त्व में भी बराबर की पैठ रखते हैं । सरकारी सेवा में रहने के कारण संस्कृति और पुरातत्त्व से वर्षों तक इनका जुड़ाव रहा जिसने इन्हें इस क्षेत्र में  कुछ करने के  लिए प्रेरित किया ।
    इतिहास, परंपरा और संस्कृति पर लिखने वाले बिरले लेखकों में हैं वशिष्ठ, जो अपनी यायावर प्रवृत्ति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते हैं । जहाँ इतिहास की बात आई है, वशिष्ठ ने निरपेक्ष होकर तथ्यों के आधार पर केवल ऐसी बात की है जो प्रामाणिक हो । यूरोपियन इतिहासकारों की टिप्पणियां ज्यों की त्यों न उतारकर उन पर तर्कसंगत विवेचन के साथ साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालना  है ।
    बहुत बार तथाकथित किंवदंतियां या लोकवार्ता भी इतिहास बनती हैं । अत: पौराणिक आख्यान, स्थान विशेष के माहात्म्य, वीरगाथाओं तथा कथाओं को भी यर्थाचित स्थान देकर प्रस्तुत किया गया है ताकि आसानी शोधकर्ता कार्य कर सकें ।
    इस क्षेत्र के उपलब्ध इतिहास में आज तक मात्र यूरोपियन इतिहासकारों की पुस्तकों के ज्यों के त्यों उतारे रूपांतर मिलते हैं । प्रस्तुत इतिहास लेखन में वशिष्ठ न कई ऐसी पुरातन दुर्लभ पुस्तकों और 'पांडुलिपियों के संदर्भ दिए हैं जो आज तक किसी ने नहीं दिए । भारतीय विद्वानों द्धारा लिखी गई  वंशावलियां, ऐतिहासिक पुस्तकें, पांडुलिपियां इस इतिहास लेखन का आधार रही हैं जिस कारण इसमें नए-नए तथ्यों का उदघाटन हुआ।  यूरोपियन विद्वानों के अलावा मियां अक्षर सिंह, मियां रघुनाथ सिंह, दीवान सर्वदयाल, उगर सिंह, बिहारी लाल, मियां रणजोर सिंह, बालकराम शाद आदि भारतीय इतिहासकारों को समाविष्ट कर नए निष्कर्ष निकाले गए हैं । इस दृष्टि से यह इतिहास एक नई खोज हमारे सामने प्रस्तुत करता है । 
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत छठे खंड में पर्वतीय क्षेत्र के इतिहास पर ऐसी दुर्लभ सामग्री दी जा रही है, जो पहले कहीं उदघाटित नहीं हुई । 


  • Pashchatya Kavya Shastra Ka Itihas
    Dr. Tarak Nath Bali
    395 356

    Item Code: #KGP-864

    Availability: In stock


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