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  • grid
  • Yuva Sanchetna
    Prem Vallabh Sharma
    120 108

    Item Code: #KGP-9132

    Availability: In stock

    युवा संचेतना
    यह युग प्रगतिवादी युग है । उत्थान का युग है विज्ञान का युग है, नवीन चेतना और स्फूर्ति का युग है । अत: मानसिक शक्तियों के जगाने का समय है। इस युग की धारा विद्युत् गति से भी तेज बह रही है । मनुष्य जल, थल, नभ में स्वच्छन्द विचरण कर रहा है और प्रकृति, आकाश, पाताल पर दिन-रात अधिकार जमाता जा रहा है । वह शक्ति की खोज में आकाश-पातालको एक करता जा रहा है । अत: आप अपने को इन सबसे अलग रखकर प्रसन्न और सुखी अनुभव नहीं कर सकते।
    (इसी पुस्तक से)
  • Lok Ka Avlokan
    Suryakant Nagar
    280 252

    Item Code: #KGP-787

    Availability: In stock

    प्रस्तुत निबंध-संग्रह में कुछ निबंध सिद्धांतसम्मत, कुछ शोधपरक और कुछ मौलिक हैं । कुछ तो पत्र-पत्रिकाओं में छपे भी हैं और कुछ एकदम नए । किन्तु, सभी लोकगंगा में स्नात हैं, आकंठ डूबे भी । आंचलिकता अथवा क्षेत्रीयता के आग्रह से दूर ये निबंध अपने ढंग से लोक की बातें बयां करते हैं, फिर भी भोजपुरी वर्चस्व से नकार नहीं । लोक का ही चिंतन-मनन, लोक का ही अध्ययन-अनुशीलन और लोक के ही सुख-दुःख का निरूपण इन लोकरंगी निबंधों का वणर्य विषय है । आगे ये 'लोक का अवलोकन' पाठकों को कितना लुभा पायेगा, यह तो उनकी प्रतिक्रियाएं ही बताएंगी । 
  • Uttar Aadhuniktavaad Ki Or
    Krishna Dutt Paliwal
    400 360

    Item Code: #KGP-836

    Availability: In stock

    हिंदी में उत्तर आधुनिकतावाद की चर्चा को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। अब आप उसे मुंह बिचकाकर खारिज नहीं कर सकते। हिंदी में लगभग दो दशकों से यह चर्चा जारी है और गुजराती, बंगाली आदि में इससे भी पहले। हिंदी के माक्र्सवादियों ने शुरू-शुरू में ‘उत्तर आधुनिक’ चिंतन को लेकर कितना हाय-तौबा किया। अब हालत यह है कि ल्योतार, देरिदा, मिशेलफूको, बौद्रिया, पाल डी मान, सुसान सोंटाग, इहाव हसन, एडवर्ड सईद आदि के बिना अपनी बात पूरी नहीं कर पाते। और फ्रैंकफुर्त स्कूल तो माई-बाप बन गया है। दरअसल, उत्तर आधुनिकता ने ‘नवजागरण’ तथा ‘इनलाइटेनमेंट’ की विरुद्ध सीधा संघर्ष किया। उत्तर आधुनिकतावाद ने ‘तर्क’ की यूरापीय पद्धति को नकारते हुए अर्थहीन सिद्ध कर दिया है। उत्तर आधुनिकतवाद ने घोषणा की है कि वह सांस्कृतिक बहुलतावाद, बहुवचनवाद, हर तरह के वैविध्यवाद का समर्थन करता है और जो दबाए गए हैं उन पर (नारी-विमर्श, दलित-विमर्श पर) नए सिरे से विचार करने की तमन्ना रखता है। ज्ञान के क्षेत्रों में आए विकास-प्रगति के अंतःसूत्रों में ‘आधुनिकता’ का रुतबा कम हुआ है। फिर फूको ने इतिहास के संदर्भ में सोचकर कहा कि अन्य इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों ने ‘डिफरेन्स’, ‘डी मिस्टीफाई’ और ‘डिसकंटीन्युटी’ के कारकों की खोज पर ध्यान दिया हैं इतिहास और राजनीति में ‘अदर’ या अन्य की खोज बढ़ी है तथा ‘अदर’ को उपेक्षितों के सरोकारों के कंेद्र में रखने से नया केंद्रवाद बना है। बाजारवाद की अर्थव्यवस्था ने हर माल चालू, हर माल बिकाऊ की नई भूमि तैयार की है। आज उत्तर आधुनिकतावाद आकाश की तरह व्यापक धारणा है, जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। हां, थोड़ा-बहुत समझा भर जा सकता है। 
  • Ghane Kertarutale
    N.E. Vishwanath Iyyer
    140 126

    Item Code: #KGP-9118

    Availability: In stock

    निबंधकार के रूप में लेखक का राष्ट्रीय व्यक्तित्व हर रचना में अपनी छाप छोड़ता है। यह उस सृजनधर्मी राष्ट्रीय व्यकिततव के अनुरंजक छाप की गुणवता होती है कि मोटे रूप में शुष्क समझा जाने वाला यात्रा-वर्णन सरल ललित निबंध की कलाभंगिमा में प्रस्तुत मिलता हैं
    यात्रा-वर्णन के अतिरिक्त इन निबंधों में संस्करण, स्मृति-तर्पण, वर्णन, पत्र, रिपोर्ताज और संवाद-शिल्प प्रयुक्त हुआ है। विधा कोई भी हो, लेखक का लक्षित विधेयक मूलतः एक है और वह है राष्ट्रीय समन्वयात्मक विशालता। इसके लिए व्यष्टि के छोर से समष्टि की खोज-खबर ली जाती है और साहित्य चिंतन अथवा आत्म-चिंतन से राष्ट्रीय चिंतन को संपृक्त करते हुए लेखक प्रादेशिक छवियों, रंगारंग सभ्यताओं और नए अभ्युत्थान के प्रतिष्ठानी आकर्षणों को संवेदनीय शिल्प में विस्तार के साथ रेखांकित-चित्रित करता है।
    —डाॅ. विवेकीराय
  • Nepathya Se
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9117

    Availability: In stock

    इस पुस्तक का प्रारंभ एक आत्मनिबंध-सी लगने वाली रचना से होता है और उपसंहार एक ऐसे पत्र-संवाद से, जो दरअसल समूची पुस्तक में अंतव्र्याप्त विषयवस्तु से ही संबद्ध विचारों का वाद्य-वृंद अथवा ‘ड्रामा’ है। इस तरह यह एक ओर मेरे विशुद्ध व्यक्ति-व्यंजक निबंध-संग्रहों ‘रचना के बदले’, ‘आडू का पेड़’ और ‘शैतान के बहाने’ से और दूसरी ओर मेरे वैचारिक निबंध-संकलनों ‘सबद निरंतर’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ तथा ‘स्वाधीन इस देश में’ से जुड़ता है; हालांकि है यह कुल मिलाकर वैचारिक निबंधों का संग्रह ही। पाठक लक्ष्य करेंगे कि विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जिसे कहा जाता है, उससे भिनन कोटि का उपक्रम होते हुए भी यह लेखन ‘आलोचना’ को हर जगह स्पर्श करता चलता है अलगपन इसमें यह, कि आलोचना का यह स्वर संस्कृति के व्यापक सरोकारों का, कहंे कि एक तरह की सभ्यता-समीक्षा का स्वर है।
    पिछले तीन-चार बरसों के दौरान लिखे गए इन निबंधों में सुधी पाठक को कुछ न कुछ तारतम्य और पूर्वापर-संबंध की प्रतीति भी अवश्य होगी जो इनके पुस्तकाकार प्रकाशन को संकलन की तरह ही नहीं, अंतग्र्रथित गं्रथ के रूप में भी यथेष्ट औचित्य प्रदान करती है। इस अवसर पर लेखक उन समस्त संस्थाओं और पत्रिकाओं के प्रति आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता है, जिन्होंने इन निबंधों को प्रेरित या प्रकाशित किया।
    —रमेशचंद्र शाह
  • Sarjana Ka Agni-path
    Prabhakar Shrotiya
    125 113

    Item Code: #KGP-9135

    Availability: In stock

    सर्जना का अग्नि-पथ
    "तुमसे अच्छा ऐसा साहित्य का संयोजन कोई कर सका है या कर सकता है, मेरी कल्पना में नहीं है ।" यह लिखा था प्रख्यात वरिष्ठ विचारक, आलोचक और लेखक डॉ० रघुवंश ने 'ज्ञानोदय' से प्रकाशित पत्र में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादन के बारे में । डॉ० श्रोत्रिय के संपादन की प्रशंसा बडे विचारकों, लेखको, विद्वानों से लेकर सामान्य पाठको ने भी अकसर की है । परंतु 'वागर्थ' और 'नया ज्ञानोदय' में विविध विषयों पर लिखे उनके अग्रलेखों ने एक विशाल पाठक समाज को प्रभावित और उद्वेलित करने के साथ ही समय के प्रश्नों पर गहराई से सोचने को प्रेरित किया है । झालावाड़ के विवेक मिश्र अपने पत्र में लिखते हैं—"आपके संपादकीय विवेक से हमारे समय का सांस्कृतिक विमर्श बन रहा है।" 'बिन पानी सब सून' अक पर साइप्रस से ममता जैन लिखती हैं—"यूरोप के भूमध्य सागर के मनोरम तट पर बैठ विशाल जलराशि की लहरों की बूँदें मुझे स्पर्श कर रहीं हैं और मैं ‘बिन पानी सब सून' के प्रवाह से बह रही हूँ...आपके संपादकीय के चार पृष्ठ इस विशद 300 पृष्ठ के विशेषांक की आत्मा हैं ।"
    "शक्ति का केन्द्रीकरण' लेख पर बहादुरगढ़ से श्री ज्ञानप्रकाश विवेक लिखते हैं—"संपादकीय अमेरिकी नीतियों और इराक युद्ध की जिस ईमानदार लहजे में और आक्रामक भाषा में निंदा करता है, वह नायाब है।" एक अन्य पाठक की राय में— "अग्रलेख में आपने अमेरिकी साम्राज्यवाद की राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक निरंकुश रूप की निर्भीक समीक्षा की है।" इस आलेख को दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने पाट्यक्रम में शामिल किया है । 'दुर्जेय पर विजय' आलेख पर प्रसिद्ध कवि देवव्रत जोशी की राय थी–"इस संपादकीय को 'जनसत्ता', 'नवभारत टाइम्स’ में और हो सके तो अनुवाद कर अंग्रेजी पत्र में भी छपवा दें। यह राष्ट्रीय अस्मिता, चिकित्सकीय जीवन और लाखों के मरने के विरुद्ध एक सशक्त आलेख है ।"
  • Svadharma Aur Kaalgati
    Ramesh Chandra Shah
    75 68

    Item Code: #KGP-9123

    Availability: In stock

    स्वधर्म और कालगति
    ‘मनुष्य सत्य को नहीं जान सकता किंतु उसे जीवन में अवतरित अवश्य कर सकता है’
    आधुनिक कवि येट्स ने लिखा था, अपनी मृतयु से एकाध दिन पहले ही। जैसे उसके कुल जीवानानुभव और कवि-कर्म का निचोड़ इस वाक्य में आ गया हो। प्रकारांतर से क्या यह ‘सब होकर सबको देखने’ वाले दर्शन से ही जुड़ी हुई बात नहीं लगती? रचना भी ज्ञान का ही एक प्रकार है; पर रचना का ‘जानना’ ज्ञान के अन्य अनुशासनों के ‘जानने’ की प्रक्रिया से मूलतः भिन्न है। इसलिए कि वह स्वयं जीकर के, स्वयं होकर के जानना है। ‘जानना’ यहां ‘होने’ पर अवलंबित है। रचना का सच अस्तित्वात्मक और रागदीप्त सच है। किंतु क्या इसीलिए वह सत्य के दूसरे किस्म के खोजियों और दावेदारों को उनकी तथाकथित वस्तुपरक कसौटी के चलते संदिग्ध नहीं लगता होगा? आयोनेस्को से पूछा गया कि तुम क्यों लिखते हो? उसने उत्तर का प्रारंभ ही इस वाक्य से किया कि ‘मैं क्यों लिखता हूं-यदि मैं सचमुच यह जानता होता तो मुझे लिखने की कोई प्रेरणा ही नहीं होती, यही जानने के लिए तो मैं लिखता हूं कि मैं क्यांे लिखता हूं?’ जाहिर है कि इस तरह का लगातार जानना भी लेखक होने से छुटकारा नहीं दिलाता। यदि लेखन-कर्म को व्यापक जीवन और सृष्टि के प्रति एक तरह के ऋणशोध या आत्मदान की प्रक्रिया के रूप में देखें तो भी इससे यह कहां निकलता है कि इस जीवनव्यापी प्रयिा की परिणति आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि में होगी ही। हो भी तो वह आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि-सब होकर सबको जानने का अनुभव-सचमुच ‘ज्ञान’ की है और दूसरे वस्तुपरक ज्ञान की तरह ही उपयोगी और समर्थ ज्ञान है, इसका भरोसा दूसरे को कैसे हो?
    (पुस्तक के एक निबंध से)
  • Lalit Nibandh : Swaroop Evam Parampara
    Dr. Shri Ram Parihar
    750 675

    Item Code: #KGP-781

    Availability: In stock


  • Man Ki Baat
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    220 198

    Item Code: #KGP-724

    Availability: In stock

    मन की बात आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के निबंधों का संग्रह है, जिसे उन्होंने सहज भाव से ‘ललित निबंध’ कहा है। यद्यपि आलोचनात्मक एवं वैयक्तिक निबंधों के इस संग्रह में कई भाव-भूमियाँ हैं। शास्त्री जी अपने निबंधों में विधा की बंदिशों को स्वीकार नहीं करते, जिसकी अपेक्षा पेशेवर निबंध लेखकों से की जाती है। वैदुष्य और लालित्य के  रचनात्मक बिंदु पर खड़े उनके निबंधों का अपना रंग है। यह एक कवि का गद्य तो है ही, एक ऐसे साहित्य मनीषी की मनोभूमि का ललित विस्तार भी है, जो अपना उदाहरण स्वयं है।
    –गोपेश्वर सिंह
  • Chune Huye Nibandh
    Hazari Prasad Dwivedi
    195 176

    Item Code: #KGP-850

    Availability: In stock


  • Aadhunik Nibandh
    Shyam Chandra Kapoor
    350 315

    Item Code: #KGP-741

    Availability: In stock


  • Saaksharta Aur Samaj
    Vinod Das
    125 113

    Item Code: #KGP-9122

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में साक्षरता की महिमा और संबंधित सामाजिक द्वंद्वों और इसके प्रसार में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, जनसंचार माध्यमों की भूमिकाओं, तत्संबंधी सांस्कृति-उपभोक्तावादी ऊहापोहों, स्त्री-साक्षरता के महत्त्व जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पहचानने का प्रयास किया गया है, वहीं उन वर्गीय पूर्वाग्रहों को भी अनोखी अंतर्दृष्टि और वयस्क विवेक से चिह्नित किया गया है, जिनके कारण साक्षरता का आलोक देश की धूसर और मटमैली झुग्गियों-झोंपड़ियों में अभी तक नहीं पहुंच पाया है। यह सही है कि लेखक के इन विमर्शों और स्थापनाओं में तीखापन और तुर्शी है। कई बार सामाजिक जड़ता और धीमी गति को लेकर यहां गुस्सा, क्षोभ और अवसाद भी मिलता है। लेकिन विनोद दास हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जो एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की तरह शिक्षा से जुड़े गंभीर सवालों पर वैचारिक हस्तक्षेप करते हुए अपनी परंपरा को पहचानकर मूल्यवान की खोज करते हैं। इस संकलन में उनका एक ऐसा व्यक्तिपरक निबंध भी है, जिसमें वह जमीन से जुड़े उन दो अक्षरवंचित विभूतियों को आत्मीयता से स्मरण करते हैं, जिन्होंने मूल रूप से उन्हें साक्षरता की दिशा में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित किया है। एक तरफ इन निबंधों में साक्षरता के बारे मंे व्याप्त भ्रांतियों और धुंध को छांटने की कोशिश है, वहीं उस उम्मीद की लौ को तेज करने की कोशिश है, जो मनुष्य में समाज को बेहतर बनाने के लिए भीतर-भीतर ही सुलगती रहती है।
  • Malviya Ji Ke Sapnon Ka Bharat
    Ishwar Prasad Verma
    395 356

    Item Code: #KGP-612

    Availability: In stock

    मैं मनुष्यता का पुजारी हूं। मनष्यत्व के आगे मैं जात-पांत नहीं जानता। कानपुर में जो दंगा हुआ, उसके लिए हिंदू या मुसलमान इनमें से एक ही जाति जवाबदेह नहीं है। जवाबदेही दोनोंजातियों पर समान है। मेरा आपसे आग्रहपूर्वक कहना है कि ऐसी प्रतिज्ञा कीजिए, अब भविष्य में अपने भाइयों से ऐसा युद्ध नहीं करेंगे, वृद्ध, बालक और स्त्रियों पर हाथ नहीं छोड़ेंगे। मंदिर अथवा मस्जिद नष्ट करने से धर्म की श्रेष्ठता नहीं बढ़ती। ऐसे दुष्कर्मों से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। आज आप लोगों ने आपस में लड़कर जो अत्याचार किए हैं, उसका जवाब आपको ईश्वर के सामने देना होगा। हिंदू और मुसलमान इन दोनों में जब तक प्रेम-भाव नहीं उत्पन्न होगा, तब तक किसी का भी कल्याण नहीं होगा। एक-दूसरे के अपराध भूल जाइए और एक-दूसरे को क्षमा कीजिए। एक-दूसरे के प्रति सद्भाव और विश्वास बढ़ाइए। गरीबों की सेवा कीजिए, उनको प्रेम से आलिंगन कीजिए और अपने कृत्यों का पश्चात्ताप कीजिए। 
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