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  • grid
  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 855

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • Paryaavaran Aur Jeev
    Premanand Chandola
    150 135

    Item Code: #KGP-9147

    Availability: In stock

    पर्यावरण व जीवों में ही सारी खुदाई पसरी हुई है और इनका चैधरी बना है आदमी, जो अपनी कारगुजारियों से सारे माहौल को बिगाड़ने में लगा है। मौजमस्ती व खुदगर्जी में उसे अपनी खैरियत की भी परवाह नहीं।
    जीवन पूर्वी पनीले माध्यम में जान फूंककर बेजान पदार्थों को जानदार बनाने वाले उस चमत्कारी मोड़ और क्रांतिकारी विकास की बदौलत ही आज हम बेशमार जीव देखते हैं। इन्हीं की लीला की बानगी है विज्ञान की यह सरल व रोचक इबारत।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu
    Ramesh Bedi
    450 405

    Item Code: #KGP-820

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Paryavarneeya Pradushan
    Vishnu Dutt Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-111

    Availability: In stock

    पर्यावरणीय प्रदूषण
    बीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही विज्ञान तथा टेक्नोलाॅजी ने मानव को प्राकृतिक स्रोतों के उपयोग के लिए अधिक संख्या में अपूर्व शक्ति के साधन उपलब्ध कराए हैं। इन साधनों के निरंतर उपयोग ने पर्यावरण में परिवर्तन कर दिया है। टेक्नोलाॅजी के बेलगाम प्रसारण तथा विकास ने परिस्थितिविज्ञान के संतुलन को खराब कर दिया। वे बड़े-बड़े उद्योग, जो हमें समृद्ध बनाते हैं, बोनस के रूप में हमें प्रदूषण देते हैं। किंतु हम अपने उद्योगधंधे तो बंद नहीं कर सकते। अतः आवश्यकता इस बात की है कि औद्योगिक व्यर्थों का समुचित उपचार करके या तो उसका पुनः उपयोग किया जाए अथवा सर्वथा अहानिकर बना दिया जाए।
    जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, मनुष्य का कार्यक्षेत्र भी बढ़ता गया और उसके साथ-साथ प्रदूषण भी बढ़ता गया। यह एक गंभीर समस्या है किंतु औद्योगिक क्रांति के बाद प्रदूषण अत्यधिक तेज हो गया। आज प्रदूषण इस सीमा तक पहुंच गया है कि सूर्य की प्रखर विकिरणों से हमारी रक्षा करने वाली ओजोन परत भी झीनी हो रही है, फलस्वरूप इस कवच में सूराख हो चुका है जो संपूर्ण प्राणी जगत् को न केवल विलुप्तिकरण की ओर ले जाएगा अपितु प्रलय का स्पष्ट संकेत देता है। अतः व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से मनुष्य अपने अस्तित्व के प्रत्येक खण के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है।
    डाॅ. विष्णुदत्त शर्मा की कृति ‘पर्यावरणीय प्रदूषण’ समय की आवश्यकता के अनुरूप है तथा एक गंभीर समस्या की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। इसमें पर्यावरणीय प्रदूषण के कारणों, कारकों तथा तत्जनित समस्याओं के विषय में प्रकाश डाला गया है। सचित्र एवं सरल भाषा में लिखी यह पुस्तक प्रदूषण की समस्या को समझने और उसके समाधान में कार्यरत वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, उत्पादकों, जनस्वास्थ्य अधिकारियों, विधायकों तथा उद्योगपतियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। 
  • Saamanya Paryavaran Gyan
    Rajendra Chandrakant Rai
    100 90

    Item Code: #KGP-9146

    Availability: In stock

    पर्यावरण अब एक जाना-पहचाना और जीवन से सम्बद्ध विषय है। पर्यावरण पर गंभीर और वैज्ञानिक ग्रंथ तो उपलब्ध हैं, किंतु सहज और सरल तरीके से पर्यावरण की समग्रता का परिचय कराने वाली एक ऐसी पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी, जो सर्वसाधारण के लिए उपयोगी हो। इस पुस्तक के प्रकाशन के पीछे यही दृष्टि मुख्य रूप से मौजूद रही है।
    विद्यार्थियों, गृहिणियों, ग्रामीणों, सामाजिव कार्यकर्ताओं, पर्यावरणों-प्रेमियों तथा गैरसरकारी संगठनों के लिए यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी, यह विश्वास है।
  • Pradooshan Prithvi Ka Grahan
    Premanand Chandola
    90 81

    Item Code: #KGP-967

    Availability: In stock

    प्रदूषण और पर्यावरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्योंकि प्रदूषित पर्यावरण ही हो रहा है। हमारे चारों ओर की जमीन, हवा औश्र पानी का मैला और गैसों व रसायनों से सराबोर होना ही प्रदूषण है। बहुरुपिया प्रदूषण वसुंधरा में मंद जहर घोल रहा है। रसायनों का इस्तेमाल किया हमने उपज बढ़ाने, कीट मारने तथा अपनी खुशहाली और आरामतलबी के लिए लेकिन मार उलट गई हम पर ही। काले रसायन ‘हाइड्रोफ्लोरोकार्बन’ तो पृथ्वी की ‘रक्षाकारी ओजोन की छतरी’ को ही छलनी किए दे रहे हैं।
    सच, बीसवीं सदी में स्वर्ग से भी प्यारी पृथ्वी की क्या गत बना दी है हमने, और तुर्रा यह कि अपनी करनी का नतीजा जान पाए हम लंबे अरसे के बाद। जब खुद हम, हमारी मिट्टी, हमारा आकाश, हमारे जलाशय, हमारी फसलें, हमारे मौसम, हमारे पेड़-पौधे और जानवर पर्यावरणी असंतुलन की चपेट से तिलमिलाने लगे। धरती पर थोपे गए ये नकली रसायन नए गुल खिलाते हुए तबाही मचाने पर तुले हैं।
    देर से चेत जाना भी समझदारी है वरना रसायनों के ‘टाइम बम’ समय आने पर हमें कभी नहीं बख्शेंगे। आगाह करने के लिए रोचक कथाशौली में आदमी के अस्तित्व से जुड़ी इन्हीं बातों का लेखा-जोखा दिया गया है इस प्रदूषण के दस्तावेज में।
  • Dharati Mata, Pita Aakash
    Pushpa Sinha
    175 158

    Item Code: #KGP-228

    Availability: In stock

    धरती माता, पिता आकाश
    आज पर्यावरण प्रदूषण के कारण पर्यावरण असंतुलन हो रहा है। इससे न केवल जीवन प्रक्रिया बाधित हो रही है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रगति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इतना ही नहीं अब पर्यावरण प्रदूषण के कारण प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि हो रही है, जिसके कारण प्रचुर मात्र में जन-धन की हानि हो रही है। भूमंडलीय ताप बढ़ रहा है, जिसके कारण हिमाच्छादित क्षेत्रों की काफी बर्फ पिघलने से भविष्य में समुद्रतल में वृद्धि होगी और महत्त्वपूर्ण तटीय क्षेत्र डूब जाएँगे। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण से अब जलवायु परिवर्तन का खतरा मँडरा रहा है, जिसके कारण कई जीव विलुप्त हो जाएँगे और खाद्य संकट की आशंका भी जताई जा रही है। हो सकता है कि एक दिन भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण डाइनोसोरस की तरह पृथ्वी से मानव भी विलुप्त हो जाएँ।
    अतः इस पुस्तक में पर्यावरण को बचाने के लिए विभिन्न उपाय सुझाए गए हैं, जिनको अपनाकर हम पर्यावरण को संतुलित कर सकते हैं और भयंकर संकट से हमारा बचाव हो सकता है।
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