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diary

  • grid
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Is Khirki Se
    Ramesh Chandra Shah
    425 383

    Item Code: #KGP-711

    Availability: In stock

    इस खिड़की से
    ‘इस खिड़की से’...यानी ‘अकेला मेला’ के ही नैरंतर्य में एक और मेला, एक और समय-संवादी आलाप...जो एकालाप भी है, संलाप भी, मंच भी, नेपथ्य भी...
    ‘अकेला मेला’ देखते-सुनते-गुनते...कुछ प्रतिध्वनियाँ ...कतिपय पाठक-समीक्षक मंचों से...अब इस खिड़की से जो दिखाई-सुनाई देने वाला है--मानो उसी की अगवानी में।
    ०० 
    डायरी-लेखन को साहित्य का गोपन कक्ष कहना अतिशयोक्ति न होगी।...काफ्का, वाल्टर बेन्यामिन जैसे कई लेखकों ने डायरी विधा के अंतर्गत श्रेष्ठ लेखन किया। मलयज या निर्मल वर्मा की डायरी उनके समस्त लेखन को समझने का उचित परिप्रेक्ष्य देती है। डायरी- लेखन की इसी परंपरा में नई प्रविष्टि है रमेशचन्द्र शाह की डायरी ‘अकेला मेला’। इस डायरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखक में कहीं भी दूसरों को बिदका देने वाली आत्मलिप्तता नहीं। 
    --हिंदुस्तान 
    शाह केवल डायरी नहीं लिखते, वे अपने समय से संवाद करते दिखाई देते हैं। उनकी डायरी की इबारतें ऐसी हैं कि एक उज्ज्वल, संस्कारी अंतरंगता मन को छूती हुई महसूस होती है।...यह डायरी एक ऐसा ‘ग्लोब’ भी बनकर सामने आती है, जो मनुष्य की बनाई सरहदों को तोड़ती हुई शब्द-सत्ता का संसार रचती है, जिसमें दुनिया के महान् रचनाकारों की मौजूदगी को भी परखा जा सकता है। डायरी में शाह ने अपने विषय में अपेक्षाकृत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है, वह एक विनम्र लेखक की शाइस्ता जीवन-शैली की ही अभिव्यक्ति है।
    --कादम्बिनी
    एक अकेला लेखक कितनी तरह के लोगों के मेले में एक साथ! कितनी विधाओं और कृतियों में एक साथ!...और कितनी आत्म-यंत्रणाओं और मंत्रणाओं में एक साथ!
    --जनसत्ता
  • Jangal Juhi
    Ramesh Chandra Shah
    320 288

    Item Code: #KGP-443

    Availability: In stock

    रमेशचन्द्र शाह के डायरी-लेखन की पहली कृति 'अकेला मेला' में सन् 1981 से 1985 तक की प्रविष्टियाँ शामिल थी तो दूसरी कृति 'इस खिड़की से' 1986 से 2004 तक की डायरी को समाहित किए हुए थी। तीसरी 'आज और अभी' का फलक 2004 से 2009 तक पाँच वर्षों को अंतः प्रक्रियाओं को समेटे हुए है और, अब यह चौथी डायरी 'जंगल जुही' अद्यावधि और 'अद्यतन' को। इस डायरी में लेखक ने अपने प्राग और हैदराबाद प्रवास के अत्यंत रोचक और मूल्यवान् यात्रानुभवों को भी सहज ही स्वत:स्फूर्त ढंग से पिरो दिया है, जिनसे-पाठक पाएँगे कि-उनके अपने ही जिये और भोगे हुए में एक नया और अप्रत्याशित आयाम आ जुड़ा है।
    जैसा कि एक सुधी समालोचक का मंतव्य है-"एक ही विधा में अनेक विधाओं का कायंतरण और अर्थांतस्या कैसे होता है, यह रमेशचन्द्र शाह की डायरियों को पढ़कर जाना जा सकता हैं।" यह भी कि-"एक सर्जक अपनी निर्विकार चेतना में कितना बहुविध हो जाता हैं। शाह की डायरी केवल तिथिक्रम में घटित जीवन-लीलाओं का बयान नहीं है, बल्कि भाव-विपुल सौंदर्य और अनुभूतियों में निहित मर्म का उदघाटन है। यहाँ दर्शन है-साहित्य की तरह; साहित्य है संस्मरणों की समृद्धि की तरह; संस्मरण है-जीवन के धड़कते हर पल की तरह डायरियाँ अनुभवों की जीवंत गाथाओं के समान होती हैँ।
    वे कल्पना-प्रसूत कविता-कहानी न होकर भी अगर उन्हीं की तरह आंदोलित और आनंदित करती है तो मानना पड़ेगा कि डायरी-लेखक एक कल्पनाशील-विचारशील व्यक्ति के साथ भाषा- शिल्पज्ञ भी है।" शाह की डायरियाँ अर्थान्वेषण की गंभीरता के साथ-साथ आलोचनात्मक अंतर्दूष्टि, 'विट' और 'ह्यूमर' से भी परिपूर्ण होती हैं। पाठक देख सकते हैं कि उनकी काल-चेतना कितनी प्रखर, प्रबुद्ध और संवेदनशील है।
    रमेशचन्द्र शाह की डायरी एक और रसिक मर्मज्ञ के शब्दों मे-"महज डायरी नहीं है; इसमें सही  में साहित्य का वैश्वीकरण हो गया है, जिसने मनुष्य की बनाई सारी सरहदों को तोड़कर सारी धरती को अपना घर-कूटुंब मान लिया है।' कुल मिलाकर शाह का डायरी-लेखन देश-काल की हदों को लाँघ  हमें उस लेकि में ले जाता है जहाँ हम खुद को सच के आईने के सामने खड़ा पाते है, जहाँ अपने से बचना मुरिकल ही नहीं, नामुमकिन होता है।
  • Manali Mein Ganga Urfa Roznamacha
    Dronvir Kohli
    150 135

    Item Code: #KGP-8004

    Availability: In stock

    मनाली में गंगा उर्फ़ रोजनामचा
    चौंकिए नहीं (मनाली में गंगा) क्योंकि मनाली में तो व्यास है फिर यह गंगा यहां कैसे? पर यह गंगा नदी नहीं, जीती-जागती हाड़-मांस की गंगा है जो सब कुछ चुपचाप सहते हुए भी किसी से कोई शिकायत नहीं करती। अपने पति और बच्चों के लिए बड़े से बड़ा जोखिम भी उठाती है। पति का प्यार और अनुकंपा पाने के लिए, उसकी वासनापूर्ति के लिए अपने आप को समर्पित करने के लिए हमेशा प्रस्तुत रहती है। उसकी व्यथा, वेदना, दर्द, पीड़ा को कोई नहीं समझता। हंसते-हंसते सब झेलती है और उफ भी नहीं करती।
    गंगा अध्यापन करती है। और उन दिनों जब घरों में गैस नहीं बल्कि पत्थरी कोयलों से अंगीठी सुलगानी पड़ती थी, कपड़े धोने के लिए भी वाशिंग मशीन नहीं थी, फ्रिज भी आम प्रचलन में नहीं थे क्योंकि  फ्रिज के लिए पांच-छह माह का इंतजार करना पड़ता था। टेलीफोन के लिए तो प्रायः दस वर्षों तक का लंबा इंतजार करना पड़ता था। उस समय भी वह प्रातः पांच बजे उठकर सबका नाश्ता बनाकर बच्चों का व पति का टिफिन तैयार करती थी। कपडे़ भी सुबह-सवेरे धोकर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करके साढ़े छह बजे घर से निकलती थी। पर बदले में उसे क्या मिलता था-पति की उपेक्षा और ताने। इसके बावजूद वह बहुत ही हंसमुख और जिंदादिल थी। उसी गंगा की एक झलक इस डायरी में है।
    -द्रोणवीर कोहली
  • Aaj Aur Abhee
    Ramesh Chandra Shah
    220 198

    Item Code: #KGP-406

    Availability: In stock

    ...डायरी इतनी अंतरंग होती है कि आप खुद जैसे अपनी आत्मा से बात कर रहे हों। तो इसे छपने के लिए क्यों दे देते हैं। आखिर क्या बात है कि हमें जरूरी लगता है कि यह छपना चाहिए। ...रमेशचन्द्र शाह जी की डायरी के कुछ अंश पढ़ लेने के बाद मुझे लगा कि जो मैं आगे लिखने वाला था, वह अब नहीं लिखूँगा। कारण, कि इतना अंतरंग है यह। सुनिए 5 मार्च, 1982 की डायरी का एक अंश: 
    आड़ू के फूलों की गंध..., नीबू की पत्तियों की गंध,...कालिका मंदिर के पिछवाड़े नारंगी की गंध, लकड़ियों के पूले बाँधते हुए, चिरे हुए रामबाँस की गंध,...किलेखाई के निंगाले की गंध,...हनुमान मंदिर में साधुओं के चिलम की गंध,...चमेली और चरणामृत की गंध,...बाबू की जेब से तंबाकूमिले प्रसाद की गंध,...जाने कितनी और तरह-तरह की गंध...
    मुझे लगता है कि हमारी पूरी जिंदगी और आसपास की जिंदगी की सारी जितनी महकें हो सकती हैं,...उन महकों को...डायरी की अंतरंगता के साथ जब वे आती हैं तो मुझे लगता है कि जैसे हमारा अपना भारत, हमारी अपनी धरती, हमारा अपना घर, हमारा अपना खेत, हमारा अपना मंदिर और हमारे अपने फल एकाएक महकने लगते हैं। कुल दस पंक्तियाँ इतनी गहरी बात कह जाती हैं कि लगता है कि समूची पूरी पहचान ये छोटी-छोटी सी पंक्तियाँ ही दे देती हैं। ...डायरी कभी-कभी वह बात कह जाती है जो बात और कोई नहीं सह सकता। लेकिन डायरी का कागज कहीं न कहीं वह बात सह लेता है और सहने के साथ-साथ आपको बर्दाश्त करने का धीरज भी दे देता है। मुझे लगता है कि यह भी डायरी का एक बहुत बड़ा सार्थक पक्ष है। 
    -कमलेश्वर (समकालीन साहित्य समाचार, जनवरी, 2007)
  • Yada-Kada
    Ramesh Chandra Diwedi
    195 176

    Item Code: #KGP-638

    Availability: In stock

    यदा-कदा
    धर्म, परंपरा और सामाजिक मूल्य-बोधों का मिश्रण पुस्तक की विशेषता है। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और मानवीय मूल्यों के क्षरण की ओर ध्यान आकृष्ट करके लेखक ने अपने दायित्व का निर्वहन किया है। रोचक शैली में लिखी पुस्तक सामान्य पाठक और विद्वत्त समाज दोनों के लिए पठनीय है।                
    -अशोक कुमार नायक (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    एक सहृदय लेखक की संवेदनशीलता, एक सैनिक का अगाध देशाभिमान और भ्रमणशील परिव्राजक के अनुभवों की समधुर अनुगूँज है-‘यदा-कदा’ (निमेष जी की डायरी)। आशा है, पुस्तक विद्वानों और सामान्य वर्ग के पाठकों में समुचित समादृत होगी।
    -प्रो० गिरजाप्रसाद दुबे (म० गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी  )

    सरल और स्पष्ट भाषा में पुस्तक की प्रस्तुति वास्तविकता का सुखद अनुभव है। मनुष्य की प्रकृति की विभिन्नताएँ इस रचना से रूबरू कराने में सफल हैं। शहरी और ग्रामीण जीवन का तुलनात्मक अध्ययन सुंदर है। हमारे पूर्वजों, संतों, धर्मात्माओं द्वारा प्रदत्त शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और भौतिकवादी समाज को आईना दिखाती हैं। विद्वान् लेखक से हम ऐसी ही और रचनाओं की प्रस्तुति की कामना 
    करते हैं। 
    -प्रो० पी० डी० सहारे, डॉ० गीता सहारे (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    डायरी-लेखन की विधा पं० रमेशचन्द्र द्विवेदी (स्वामी श्रद्धानंद) द्वारा हिंदी साहित्य हेतु एक नूतन श्लाघनीय प्रयास है। यायावरी एवं जीवन के गूढ़ तत्त्वों की मीमांसा सहसा सांकृत्यायन जी की स्मृतियों को जीवंत कर देती है। सुधी जन निश्चित रूप से यदा-कदा इस ‘यदा-कदा’ का पारायण करके अपने व्यक्तित्व और राष्ट्र-निर्माण में योगदान देंगे। लेखक निश्चयतः साधुवाद के पात्र हैं। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
    -राकेशकुमार सिंह (वरिष्ठ आचार्य, (अंग्रेजी) इलाहाबाद वि० वि०)
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