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  • grid
  • Baapu Qaid Mein
    Rajendra Tyagi
    120 108

    Item Code: #KGP-1824

    Availability: In stock

    बापू कैद में
    आवाज : ठीक, बहुत ठीक । वैसे भी तुम लोग अब मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे, क्योंकि अब मैं आजाद हूँ देहमुक्त हूँ। (विराम) तुन्हीं ने तो अपनी गोली से मुझे आजाद किया था । हाँ-हाँ, मुझे आजाद किया था और बापू को कैद !
    (कुछ देर रुकने के बाद) हाँ, मैं ठीक कह रहा हूँ बापू तुम्हारी ही कैद में है । तुन्हीं ने उन्हें कैद कर रखा है और तुम्ही बापू की समाधि पर… ! (बल देते हुए) हाँ-हाँ-हाँ! आत्मविहीन समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित का रहे हो । है ना मजाक ! "तुम नेता ही नहीं, अव्वल दर्जे के अभिनेता भी हो । जाओ, पहले बापू को आजाद करो और फिर आना उन्हें  श्रद्धांजलि अर्पित करने ।
    (क्षण-भर रुकने के बाद, अटटहास का स्थान सिसकियाँ ले लेती हैं और रुंधे गले से वही आवाज पुन: आती है) 'नहीं-नहीँ, तुम बापू को अभी आजाद नहीं करोगे, क्योकि तुममें इतना साहस ही नहीं है। तुम डरपोक हो। तुम जानते हो, बापू यदि आजाद हो गए तो देश में क्रांति आ जाएगी और तुम्हारी दुकानदारी बंद हो जाएगी ।
    (रुदन बंद और पुन: अटटहास) जाओ अपने-अपने घर लौट जाओ। नाटक बंद करो। सिंहासन तुम्हारी प्रतीक्षा में है। बापू जब तक कैद हैं, तब तक तुम्हारा सिंहासन अटल है । क्यों गृहमंत्री जी, ठीक कहा ना मैंने ? मैं भी जा रहा के तुम भी लौट जाओं ।
    बापू आज भी प्रासंगिक है । आम जन के हदय से उनके प्रति श्रद्धा है, उनके आदर्शों व सिद्धांतों के प्रति आस्था; किंतु बापू की इस लोकप्रियता का नेता अनुचित लाभ उठा रहे हैं । उनके लिए बापू एक ब्रांड हैं । ऐसा ब्रांड, मार्केट में जिसकी साख हैं । क्योकि साख है, इसलिए उसे कैश करना वे अपना धर्म समझते है । निहित स्वार्थ व दूषित राजनीति के अनुरूप वे बापू के आदर्शों व सिद्धांतों को जैसा चाहे उसी रूप में परिभाषित कर रहे हैं । केवल आम जन को सम्मोहित करने के लिए वे बापू की दुहाई देते हैं, उनके आदर्श व सिद्धांतों की दुहाई देते है । उनके लिए बापू की बस यही उपयोगिता है। यथार्थ में बापू की हत्या किसी गोड़से ने नहीं की थी । इसी दूषित राजनीति ने की थी और अब स्वार्थ-पूर्ति के लिए इसी राजनीति ने बापू की आत्मा को कैद कर रखा है ।
  • Sine Sitaron Ke Anchhuye Prasang
    Sheela Jhunjhunwala
    200 180

    Item Code: #KGP-69

    Availability: In stock


  • Navjaagran Aur Mahadevi Verma Ka Rachana-Karm Stri-Vimarsh Ke Svar
    Krishna Dutt Paliwal
    445 401

    Item Code: #KGP-624

    Availability: In stock

    नवजागरण और  महादेवी वर्मा का रचना-कर्म स्त्री-विमर्श के स्वर
    महादेवी वर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष में यह सोचकर हृदय में  पीडा होती है कि उन जैसी भारतीय स्वाधीनता-आंदोलन की लय से निमग्न कवयित्री के साथ हिंदी-आलोचना के मर्दवाद ने ऐसा सलूक क्यों किया?
    उनके सृजन के नवजागरणवादी  पक्ष को अनदेखा करते हुए 'रहस्यवाद-अध्यात्मवाद' में लपेटकर उसे पूरी तरह छिपा दिया गया । आखिरकार क्यों?
    ऐसा क्यों हुआ कि देश और समाज के लिए किया गया उनका मौन-मुखर विद्रोह पूरी तरह 'विस्मृति' के अंधकार में धकेल दिया गया ?
    आज इस स्थिति पर दूर तक स्त्री-विमर्श की अवधारणाओं से सोचने की ज़रूरत है ।
  • Zane Ajeeb : Nasera Sharma
    Prem Kumar
    275 248

    Item Code: #KGP-281

    Availability: In stock

    ज़ने अजीब : नासिरा शर्मा
    अपनी मनबसी नामी-गिरामी शख़्सियतों के बारे में बहुत कुछ—ख़ूब-ख़ूब जान लेने की चाहत सबमें होती है। पसंदीदा के प्रभाव के बढ़ते-गहराते जाने के क्रम में एक बिंदु वह भी आता है, जब यह चाहत कसकता-सा एक जुनून तक बन जाती है। उस अपने मनभावन के अंदर- बाहर-आसपास से जुड़ी हर छोटी-छिपी बात जानने-सुनने के लिए हम उत्कर्ण-उत्कंठ हो उठते हैं। अगर वह मनभावन कोई कलाकार-साहित्यकार है तो स्थिति और भी विकट एवं दिलचस्प हो जाती है। उसकी रचनाओं के पात्रों, घटनाओं, चित्रों, कथनों के आधार पर हम अपनी- अपनी तरह से उसके निज—नितांत निज की दुनिया की अजब-ग़ज़ब तस्वीरें बनाने लगते हैं—बनाते रहते हैं।
    लेकिन जब कोई बड़ी शख़्सियत—नासिरा शर्मा जैसी लेखिका—अपने स्वभाव, अनुभवों, संवेदनाओं, संबंधों, मान्यताओं, विचारों, अभावों, आघातों, संघर्षों, प्राप्तियों...उससे भी अहम यह कि अपने पात्रों, सरोकारों, इरादों एवं रचित-संभावित रचनाओं के बारे में सहज, स्पष्ट, उत्सुक भाव से रचना करने की तरह कहे-बताए...तो...तो यह पाठक, रचना और साहित्य की दृष्टि से विशिष्ट, उपयोगी और मूल्यवान हो जाता है। तब और भी अधिक—जब हम नासिरा जी के पास-साथ होने के उन क़रीबी क्षणों में यह जानें-महसूस करें कि इस लेखिका के जीने-लिखने-सोचने का अंदाज़ और सोच का आसमान एकदम अलग भी है एवं व्यापक व विराट् भी।
    किसी कलाकार की सृष्टि व कलाकारिता की वीथियों-अमराइयों में उसके साथ चल, गुज़र, देख, सुन, जान पाना अपने आप में भिन्न, सुखद, अधिकतम प्रामाणिक और बेहतरीन क़िस्म का अनुभव होता है। ऐसे इस अनुभव का अहसास-भर पाठक को कराने की मुन्नी-सी एक ख़्वाहिश और कोशिश है यह—ज़ने अजीब: नासिरा शर्मा।
  • Anaam Yatraayen
    Ashok Jairath
    300 270

    Item Code: #KGP-237

    Availability: In stock

    जीवन एक सफर और हमें निरंतर इस सफर में चलते रहना है । जो चलता रहा, वह जीता रहा और जो बैठ गया, सो बैठ गया । अकसर लोग यात्राओं से घबराते है । कई कारण हैं -आर्थिक अभाव साथ की कमी या वैसे ही मन नहीं करता, आलस्य में स्चा-बसा मन बस आराम करना चाहता है । हमारा शरीर 'हड्ड हराम' हैं, वह आराम चाहता है, पर जितना ही इसे माँजा जाए, उतना ही यह निखरता है ।
    हिमालयी श्रृंखलाएं, हिममंडित शिखर व्यक्ति को बार-बार बुलाते हैं । इनके ऊपर गूंजते संगीत के स्वर और लोककाथाएं आत्मविभोर कर देती हैं और इनके अजस्र जलस्रोत जहां नैसर्गिक परिवेश को जन्म देते है, वहीं पर थके हुए मन और शरीर को संबल देते है ।
    लेखक ने पश्चिमी हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र व अनेक हिमानियों के साथ-साथ दूसरे दुर्गम इलाकों की साहसिक यात्राएं की हैं, जिनका विशद विवरण इस पुस्तक के रूप में पाठकों को सौंपा जा रहा है । ये यात्राएं कूमाऊं-गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय एव सांस्कृतिक क्षेत्रों से ही संबंधित हैं, मात्र द्वारकापुरी की यात्रा को छोड़कर । यात्राओं का निरंतर सिलसिला लेखक के अलमोड़ा में प्रवास के दौरान शुरू हुआ, जब सारे उत्तरांचल के साथ हिमानियों को भी ट्रेक किया गया, जहाँ हिमालियाई संस्कृति को बहुत करीब से देखकर स्वयं लेखक हिमालियाई हो आया था ।
    इन ब्योरों के साथ ही उन सभी साथियों-सहयोगियों और मार्गदर्शक का सीधा-सहज और बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन भी दिया जा रहा है, जो इन संस्मरणों को और भी मनोरंजक और दिलचस्प बना देता है । आशा है, ये सभी संस्मरण/यात्राओं का वर्णन पाठकों को अच्छा लगेगा ।
  • Is Daur Mein Hamsafar
    Amar Goswami
    350 315

    Item Code: #KGP-1999

    Availability: In stock

    इस दौर में हमसफ़र
    अमर गोस्वामी उन थोड़े से कथाकारों में से है जिनकी कहानियों पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते है कि यह कहानी अमर गोस्वामी ही लिख सकते थे । आज के दौर में जबकि रचनाएँ ही नहीँ, लेखक भी एक-दूसरे की 'जेरोक्स कापियों' से तबदील हो रहे है, अमर गोस्वामी की यह पहचान और कूवत-या कहिए कि रचनात्मक सामर्थ्य काबिलेगौर है । इस सामर्थ्य के बूते ही अपनी लंबी कथा-यात्रा से कभी रचना पर उनका विश्वास डिगा नहीं और वे उन हड़बडिए लेखकों की पाँत में शामिल नहीं हुए, जो सिर्फ चर्चित होने के लिए लिखते है और अपने आसपास की हर चीज, हर संबंध को 'कैश' कर लेते के लिए उतावले दिखते है ।
    इन बातों की ओर ध्यान दिलाना इसलिए जरूरी लगा क्योंकि  अमर गोस्वामी का पहला उपन्यास ‘इस दौर में हमसफ़र' उनकी इस लंबी और धीरज-भरी यात्रा का ही स्वाभाविक फ़ल है-और  अमर जी का पहला उपन्यास होते हुए भी, गंभीर चर्चा और विश्लेषण की माँग करता है। ऊपर से देखने पर 'इस दौर में हमसफ़र' भले ही प्रेमचंदीय वर्णनात्पक शैली में लिखा उपन्यास नजर आए, पर थोडा भीतर उतरते ही समझ में आ जाता है फि यह सिर्फ एक उपन्यास ही नहीं, हमारे दौर की एक गहरी और स्तब्ध कर देने वाली 'एक्स-रे पड़ताल' भी है । यह दीगर बात है कि यह लिखा गया है इतनी जानदार भाषा और पुरलुत्फ अंदाज में कि जब तक आप इसे खत्म नहीं कर लेते, यह आपको चैन  नहीं लेने देता । बल्कि उपन्यास खत्म होने के बाद भी लंबे अरसे तक पाठकों का 'हमसफ़र' बना रहता है ।
    इसकी वजह शायद यह है कि एक उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी नई कथा-प्रविधियों के दास नहीं है और उन्हें उथले रूप से जैसे-तैसे जहाँ-तहाँ टाँक लेने को हरगिज पसंद नहीं करते । उनके यहाँ जो कुछ है, वह अपने ठेठ मौलिक अंदाज में है और अमर गोस्वामी का निहायत अपना है । इसीलिए वे बगैर दिखावटी स्त्री-विमर्श के शोर-शराबे के, अनन्या के रूप से हमें एक ऐसी विलक्षण और शक्तिशाली स्त्री से मिलवाते हैं जो अपनी बेबनाव शख्सियत से अति आधुनिक ही नहीं, 'नई पीढी की नई नारी’ लगती है, जिसकी धमक आगे आने वाले युगों में और ज्यादा साफ सुनी जा सकेगी । अनन्या के मित्र और सहयात्री के
    रूप में अनिरुद्ध बागची का 'विचलन' या हार, सिर्फ उसी की हार नहीं, आधुनिकता के उन तमाम नकली प्रत्ययों की हार भी है जो आधुनिकता को सिर्फ 'देह-भोग के सुख' तक सीमित कर देना चाहते हैं । अनन्या  के माई मधुसूदन के चेहरे में मुझे तो जगह-जगह स्वयं अमर गोस्वामी का दर्द से तिलपिलाता चेहरा नजर आया । यह दीगर बात है कि मधुसूदन की कहानी अपनी है, और वह अमर जी की नहीं, अपनी ही राह पर आगे बढ़ता दिखाई देता है ।
    ‘इस दौर में हमसफ़र' में आधुनिकता की 'विकृत' और 'रचनात्मक' दोनों ही शक्लें है और अपने पुरे विश्वसनीय रूप से है । इस लिहाज से यह एक ऐसा उपन्यास भी है जिसे कई किस्म के 'कंफ्यूज़न' और मतिभ्रम-भरे आज के समाज से सही दिशा की ओर  इशारा करने वाली एक पहल के रूप में भी देखा जा सकता है । हाँ, यह जरूर है कि अमर गोस्वामी कहीं-कहीं ज्यादा खुल गए है और जहाँ सिर्फ इशारों से काम चल सकता था, वहाँ भी 'रस' लेते नजर आते है । शायद महानगरीय समाज के 'रंगीन विकारों, की ओर ध्यानाकर्षण की यह उनकी अपनी शैली हो ।
    उपन्यास के अंत में मधुसूदन और हेमंती ही नहीं, शर्वाणी की चोट झेलकर अंतत: फिर से सागरिका की ओर मुड़ा शांतनु जिस नए समाज की नींव रखना चाहता है, उसमें मूल्यों के उपहास वाली 'मजावादी' दुष्टि नहीं, बल्कि विडंबनाओं को पहचानकर उनके  बीच से रास्ता खोजती 'मनुष्य की जय-यात्रा' का अगला पडाव नजर आ सकता है ।
    'इस दौर से हमसफ़र' में बेहद तीव्र गति और हलचल है तो विचारों का तेज संघर्ष भी । लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ये तेज बहसें दिल्ली से मीरजापुर और चुनार तक फैली उपन्यास की प्रदीर्घ कथा का एक सहज हिस्सा बनकर आती हैं । दिल्ली जैसे महानगरों की बनिस्बत छोटे शहरों, कस्बों में अब भी इंसानी संवेदना और आर्द्रता कैसे बनी हुई है, इसकी परख उपन्यासकार के रूप में अमर गोस्वामी जगह-जगह करवाते हैं । कोई हैरत की बात नहीं कि इसी कोशिश में वे डॉ० प्रशांत सिन्हा जैसे बड़े कद के इंसान से हमें रू-ब-रू होने का मौका देते हैं, जिनके आगे सारी महानगरीय भभ्भड़ और चमक-दमक फीकी लगती है ।
    अलबता अमर गोस्वामी 'इस दौर में हमसफ़र' को एक उपन्यास के साथ-साथ सहज ही बहुरंगी छवियों और गतियों वाले हमारे दौर का 'एक विशद समाजशास्त्रीय अध्ययन' भी बना सके-यह एक बडी सफलता है । अपने पहले ही उपन्यास से अमर गोस्वामी आज के महत्वपूर्ण रचनाकारों की पाँत में आ गए हैं, यह बात उनकी रचनात्मक सामर्थ्य के प्रति मन में 'आश्वस्ति' के साथ-साथ आदर भी पैदा करती है ।
  • Khushboo Udhaar Le Aye
    Upendra Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1902

    Availability: In stock

    खुशबू उधार ले आए
    उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लों का 'हिन्दीपन' एक ओर 'उर्दू' की फारसीयत से अलगाता है तो दूसरी ओर गजल के व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य को सबल बनाता है, जिसका अनुकरण पाकिस्तान के ग़ज़लकार भी करते है । डॉ० शेरजंग गर्ग ने ठीक ही कहा है कि उपेन्द्र की कहन में वैविध्य है जो उन्हें बहुत-से ग़ज़लकारों से सर्वथा अलग का देता है । 
    -डॉ० गंगाप्रसाद विमल
    हबीब जालिब की तरह उपेन्द्र कुमार भी व्यवस्था से लड़ते और कारावास में डाले गए इंसान की वेदना को शिद्दत से महसूस करते है :
    वो कैदी चुप था लेकिन गुनगुनाया
    बजी जंजीर की जब इक कड़ी थी
    उपेन्द्र के पास शे'र कहने का सलीका भी है और कल्पना को इस्तेमाल करने का फन भी । 
    -ज्ञानप्रकाश विवेक
    उपेन्द्र के पास शायद किसी चालाक अनुभवी कवि का शिल्प-कौशल नहीँ है, यह अच्छी बात है अन्यथा उनकी रचनाओं में कथ्य की प्रमुखता नहीं रह पाती । अनगढ़ यथार्थ का विशाल भंडार परोसती उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लें पाठकों को अपने आसपास को सतर्कता से देखने को मजबूर करेंगी, ऐसा विश्वास है ।
    - विजय किशोर मानव
    न तो उपेन्द्र जी उर्दू ग़ज़ल की रिवायतों की रौ में बहे है और ना ही उन्होंने अपनी ग़ज़लों पर हिन्दी का ‘कवितापन हावी होने दिया है । उनकी ग़ज़लों की बुनावट और उनकी प्रकृति गीतों से अलग है । इसीलिए उनमें गजलियत की मौजूदगी का अहसास बना रहता है । सोजो-साज़ (वेदना और संगीतात्मकता) हूँ तो कविता मात्र के आधार तत्त्व माने जाते है, मगर इनके बरौर तो ग़ज़ल का काम ही नहीं चल सकता । ग़ज़ल में रोमानिया की चाशनी भी ज़रूरी है । उपेन्द्र जी ने ग़ज़ल की इन खूबियों को न केवल समझा है, बल्कि इनसे अपनी ग़ज़लों को बखूबी सँवारा भी है ।
    - बालस्वरूप राही
  • Samgra Kahaniyan : Ab Tak
    Maitreyi Pushpa
    695 626

    Item Code: #KGP-271

    Availability: In stock

    समग्र कहानियाँ: अब तक
    आँधी की तरह अपने उपन्यासों से पाठकों को झकझोर देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के अपने फैसलों की विचारोत्तेजक कहानियाँ-उपन्यास लिखे हैं। शहरी मध्यवर्गीय कहानियों के संसार को गाँव के उभरते मेहनतकश समाज से जोड़ा है, जहाँ अपनी परंपराएँ हैं, रूढ़ियाँ हैं और सबसे ऊपर है ‘खानदान की नाक’ और सब कुछ टिका है स्त्री के कंधों पर--जमीन और स्त्री ही उलझनों के केंद्र हैं और दोनों के ‘उत्पादन’ आपस में गुँथे हैं। सब मालिक की कृपा पर साँस लेते हैं। मैत्रेयी की स्त्रियों की सारी शिकायतें इसी मालिक से हैं कि वह साथी और हमसफर क्यों नहीं हो सकता--क्यों मालिक बनकर ढोर-डंगर की तरह औरत को ही हाँके रखता है। 
    स्त्री का अपनी नियति को अस्वीकार करना ही सामाजिक मर्यादाओं का टूटना है।
    स्त्री के उत्थान और सबलीकरण की ये कहानियाँ यथास्थिति से विद्रोह ही नहीं, भविष्य की दृष्टि से समाज-परिवर्तन की ध्वजवाहिनी भी हैं। मैत्रेयी ने कहानियाँ शहरी जीवन को लेकर भी लिखी हैं, मगर जिस आत्मीयता और गहराई से उन्होंने गाँव के जीवन को देखा है वह हिंदी में प्रेमचंद और रेणु 
    के सिवा शायद ही किसी को नजर आया हो। ये बेजुबानी स्त्री की यातनाओं, उसके संघर्षों और सपनों के बेआवाज विद्रोह की दस्तावेज हैं।
  • Dwidhaa
    Bhairppa
    575 460

    Item Code: #KGP-646

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Apni Dharti Apne Log (3 Volumes)
    Ram Vilas Sharma
    1200 1080

    Item Code: #KGP-1585

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Vishvanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    150 135

    Item Code: #KGP-2032

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : विश्वनाथप्रसाद तिवारी
    इस पुस्तक में संकलित साक्षात्कार अपने समय के एक महत्त्वपूर्ण लेखक से साक्षात्कार तो हैं ही, संपूर्ण  साहित्य से भी साक्षात्कार हैं । खास तौर से समकालीन साहित्य से । स्वयं अपने बारे में दिए गए संकेतों के साथ लेखक ने रचना और आलोचना के बुनियादी सरोकारों को भी स्पष्ट किया है तथा अपने समकालीनों के बारे में भी उसने दो टूक प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की है । इन प्रतिक्रियाओं में साहस के साथ संयम भी है और कथ्य के साथ तथ्य भी । लेखक क्योंकि किसी संघ या गुट में विश्वास नहीं करता, किसी दलीय विचारधारा का वह कट्टर अनुयायी नहीं है अतः कोई उसका अपना-पराया भी नहीं है । दूसरों की रचना ही उसके लिए प्रमाण है । वह इतना आत्मलिप्त भी नहीं है कि अपनी रचना की सीमाओं की पहचान न सके । इसलिए आत्मप्रशंसा और परनिंदा के लिए इन साक्षात्कारों में कोई जगह नहीं है । पूछे गए प्रश्नों के संतुलित, तर्कसंगत, सुलझे हुए और सीधे जवाब इन साक्षात्कारों की विशेषताएं हैं । इनको पढ़ते हुए बहुत; से पाठकों के मन की बहुत-सी धुंध साफ होगी, उनकी बहुत-सी उलझनों के सही और स्पष्ट उत्तर मिलेंगे । उन्हें महसूस होगा कि इन साक्षात्कारों को पढ़कर वे समृद्ध हुए हैं और उनके सामने सृजन और चिंतन की अनेक नई दिशाएं उभरी हैं जिधर वे सोच सकते हैं और चाहें तो चल भी सकते हैं।
  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • Hashiye Ka Raag
    Sushil Sidharth
    300 270

    Item Code: #KGP-9334

    Availability: In stock


  • Kab Tak Pukarun
    Shanta Kumar
    200 180

    Item Code: #KGP-9335

    Availability: In stock

    ‘कब तक पुकारूं’ शान्ता कुमार और संतोष शैलजा की कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियों का संग्रह है। हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां पति व पत्नी दोनों लेखक के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। जैसे—धर्मवीर भारती-पुष्पा भारती, राजेन्द्र यादव-मन्नू भंडारी, रवीन्द्र कालिया-ममता कालिया। इसी क्रम में शान्ता कुमार और संतोष शैलजा का नाम भी लिया जाना चाहिए। दोनों अत्यंत संवेदनशील, विचारवान और अभिव्यक्ति-निपुण रचनाकार हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियों को पढ़कर इस बात की तसदीक की जा सकती है।
    ये कहानियां विषयवस्तु की दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध हैं। आधुनिक समाज की विसंगतियों से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-ध्रुवस्वामिनी व नेपोलियन के कथासूत्रों तक रचनाओं का विस्तार है। लेखकद्वय ने मानवता के दृष्टिकोण से कथा-स्थितियों और चरित्रों को विस्तार दिया है। उदाहरण के लिए ‘गोल दायरा’ में नेपोलियन विश्वमानवता एवं सृष्टि-सत्य को उपेक्षित करने के कारण ‘सेंट हेलना’ द्वीप में अंतिम सांस लेने के लिए विवश हुआ था। ‘समर्पण’ में ‘भामति टीकाकार’ वाचस्पति और भामति का अद्भुत दांपत्य मन को छू लेता है। ‘बेतवा की लहरें’, ‘कलाई’, ‘ज्योतिर्मयी’ और ‘जरी-पटका’ कहानियां इतिहास-रस से आप्लावित हैं। ‘कलाई’ की भाषा विशेषतः उल्लेखनीय है—‘प्रकाश की धीमी लौ में ध्रुवस्वामिनी की मानिनी आकृति दमक रही थी। इस साहस व दृढ़ता ने उसके सौंदर्य को सौ गुना बढ़ा दिया था।’
    लेखकद्वय मानव मनोविज्ञान के गहरे पारखी हैं। अपनी-अपनी कहानियों में उन्होंने यह सिद्ध भी किया है। ‘जब फूल खिल उठे’ कहानी वैसे तो एक मीठी प्रेम कहानी है, मगर इसमें घर के बच्चों का मनोविज्ञान सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। इस संग्रह की कुछ रचनाएं अतीत को वर्तमान संदर्भों में देखते हुए विकसित हुई हैं। ‘न्यू सीता’ में स्त्राी जीवन का एक नया आयाम है जो पौराणिक सीता से जुदा है। ‘रज्जो काकी’ भी स्त्राी विमर्श का एक मार्मिक पक्ष है।
    समग्रतः यह कहानी संग्रह दो उत्कृष्ट रचनाकारों की रचनाओं से समृद्ध है। इसे पढ़ते हुए संवेदना, विचार और इतिहास के अनेक पक्ष झिलमिलाने लगते हैं।
  • Mahaan Sant Raidas
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-208

    Availability: In stock


  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sanskriti Aur Hindi Pradesh-2
    Ram Vilas Sharma
    750 675

    Item Code: #KGP-842

    Availability: In stock


  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190 171

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • Mere Saakshaatkaar : Malti Joshi
    Malti Joshi
    180 162

    Item Code: #KGP-1298

    Availability: In stock


  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Subhash : Ek Khoj (Paperback)
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    295

    Item Code: #KGP-464

    Availability: In stock

    आज भी वह प्रश्न अपनी जगह पर है और प्रायः तब तक रहेगा जब तक उसका हल नहीं हो जाता कि सुभाषा द्वितीय विश्व समर के अंत हो जाने पर हवाई दुर्घटना में गोलोकवासी नहीं हुए तो कहां गए? क्यों शाहनवाज खां और खोसला आयोग की रिपोर्ट रद्द हुई? क्यों यह प्रश्न ठंडे बस्ते मं डालने की साजिश चलती रही? इसके पीछे कौन लोग थे और हैं? अब मैंने यह जानना चाहा है कि उन पर क्या हो रहा है? इस दृष्टि से मैंने भारत-भ्रमण किया। भारत के अनेक महानगरों, नगरों आदि का दौरा किया। उनमंे वे नगर विशिष्ट थे, जिनका संबंध आज भी नेताजी से है। अनेक स्थानों पर मेरे व्याख्यान हुए।
    अंत में प्रायः मुझसे यह प्रश्न किया गया कि क्या सुभाषा की मृत्यु हवाई दुर्घटना से जापान जाते समय हुई थी? कतिपय जगह यह थी पूछा गया कि क्यों अनेक बार नेताजी के जीवित होने और भारत में प्रकट होने का प्रसंग सुखर््िायों में रहा? इसमें कितना सत्य है? मैंने अपने व्याख्यानों में नेताजी की मृत्यु की चर्चा कहीं भी नहीं की थी। फिर भी श्रोताओं की रुचि इस प्रसंग में बराबर सामने आती रही। 
    आइए, अब इस जटिल प्रश्न पर हम और आप आमने-सामने बैठें और इस बहस को तब तक जारी रखें, जब तक किसी तह तक नहीं पहुंच जाएं। 
    —राजेन्द्रमोहन भटनागर
  • Aacharya Hazari Prasad Dwivedi : Kuchh Sansmaran
    Kamal Kishore Goyenka
    500 450

    Item Code: #KGP-1571

    Availability: In stock

    हजारीप्रसाद द्विवेदी वस्तुत: हिंदी भाषा और साहित्य के आचार्य थे। पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिंदी और बांग्ला आदि भाषाओँ के तलस्पर्शी ज्ञान ने उनके चिंतन व सृजन को विलक्षण आयाम प्रदान किए। शातिनिकेतन से शिवालिक के बीच विस्तृत आचार्य द्विवेदी को कीर्तिकथा हिंदी का गौरव है। आचार्य द्विवेदी के जीवन और कृतित्व पर प्रभूत मात्रा में लिखा गया है। उन्हें आकाज्ञाधर्मी गुरु और व्योमकेश दरवेश कहकर सखोंधित किया गया। 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी : कुछ संस्मरण' इस संदर्भ में एक स्थायी महत्व की पुस्तक है। आचार्य द्विवेदी पर विख्यात व्यक्तित्वों द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण संस्माणों की इस पुस्तक का संपादन सुप्रसिद्ध साहित्यकार कमलकिशोर गोयनका ने किया है। पुस्तक को भूमिका में वे लिखते हैं, 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की किसी लेखक द्वारा जीवनी लिखने या उनके जीवन को जानने को जिज्ञासा जब भी पाठकों के मन में उत्पन्न होगी तब-तब ये संस्मरण उसे आत्मीय-जीवत एवं सार्थक प्रतीत होने के साथ उनको स्मृति को अक्षुष्ण बनाने में सहायक सिद्ध होगे।'
    इस पुस्तक को विशेषता यह है कि द्विवेदी जी का संस्परणात्मक मूल्याकन प्राय: सभी पक्षों से किया गया है। इस अर्थ में इसे आलोचना की आंख से भी पढा जा सकता है। समग्रत: एक विराट व्यक्तित्व और उसके कालजयी कृतित्व का समवेत संस्मरणात्मक अनुशीलन। पठनीय व संग्रहणीय पुस्तक ।
  • Raai Or Parvat
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-63

    Availability: In stock


  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Shailesh Matyani (Paperback)
    Shailesh Matiyani
    120

    Item Code: #KGP-7213

    Availability: In stock

    अब वह सड़क पर था और उसकी आंखें रामचन्दर हलवाई के कारीगर के जलेबी बनाते हाथ के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थीं और भूख इतनी तीखी हो चुकी थी कि वह बदहवासी अनुभव कर रहा था। अपनी इस तरह की बदहवासी से रामखिलावन को डर लगता है। ऐसे में अक्सर उसे-चोरी सूझती है और इसी में वह कई बार बुरी तरह पिट भी चुका है।
    इस बार खाट पकड़ लेने से पहले तक उसकी मां कई घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने की नौकरी करती रही थी। कभी-कभार उसे भी साथ ले जाती वह। मौका ताड़कर घर के बच्चों की रंगीन किताबें पलटने लगता और अपनी पूर्व-स्मृति से काम लेता, जोर से पढ़ता-लौ-औ-ट-पौ-औ-ट-तो वह कैसे चोंककर देखती थी? खिलावन का यह अक्षरज्ञान उसमें एक आलोक उत्पन्न करता मालूम पड़ता था।
    फटे-पुराने कपड़ों के अलावा, बचा-खुचा खाना और त्योहारों पर कभी पूरी-मिठाई। लगभग डेढ़ महीने से मां काम पर नहीं जा पाई, ए.जी. आफिस वाले शुक्ला साहब के यहां। अकेले गया था वह। किसी बड़ीह चीज के लिए गुंजाइश नहीं रहती। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त शुक्लाइन उसके पूरे जिस्म पर अपनी भैंगों आंखों को उंगलियों की तरह फिराती रहती हैं। बरतन धोते में सिर्फ दो छोअी चम्मचें उसने जांघिये की जेब में डाल ली थीं, हालांकि खुद उसके दिमाग में ही कुछ तय नहीं था कि उनका वह क्या उपयोग कर पाएगा। जाने की उतावली में वह ‘बहूजी, हम जाइत हैं’, की आवाज लगाने के साथ-साथ, तेजी से दरवाजे तक पहुंच गया था। तभी शुक्लाइन का चटख लाल चूड़ियों से भरा पंजा उसके जांघिये की जेब पर पड़ा था और बदहवासी में उसके मुंह से चीख निकल गई थी।
    -इस पुस्तक की ‘चील’ कहानी से
  • Phalon Ki Baagbaani
    Darshna Nand
    595 536

    Item Code: #KGP-822

    Availability: In stock

    फलों की बागबानी
    फल हमारे दैनिक आहार के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं। यह स्वास्थ्यवर्द्धक होते है और आवश्यक विटामिन, खनिज लवण और अनेक पोषक तत्वों से भरपूर रहते है । बिना फल-सब्जियों के भोजन अपूर्ण रह जाता है । वर्तमान में जबकि अपना देश कुपोषण और प्रदूषण का शिकार बना हुआ है, फलों का महत्त्व और भी अधिक बढ जाता है। बेल, जामुन, आँवला, पपीता, नीबू, अमरूद, अंजीर, हरड़, बहेडा व अन्य कुल फलों को तो यदि सीधे औषधि ही कह दिया जाए तो अनुचित न होगा ।
    वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दशा में फलों के अंतर्गत क्षेत्रफल व फल उत्पादन बढाना नितांत आवश्यक है । आम, कटहल, केला आदि फल व आलू तथा अन्य कंद वाली सब्जियां तो भोजन के रूप में ही खाए जा सकते है । फिर भी क्षेत्रफल और उत्पादन से वृद्धि लाना केवल उसी दशा में संभव है, जबकि उद्यान-स्वामी को आम, आंवला, पपीता जैसे फलों में अफलन के कारण व समाधान का ज्ञान हो तथा फल-वृक्षों में वष्टि-व्याधियों, खाद-पानी, काट-छांट  आदि जैसी आवश्यक कर्षण क्रियाओं की वैज्ञानिक जानकारी हो ।
    इस पुस्तक की रचना लेखक द्वारा किए गए शोध-विकास कार्यों, अपने पूर्व ज्ञान, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से अध्ययनोपरांत व अन्य स्रोतों से साभार प्राप्त सामग्रियों, क्रियात्मक अनुभवों, समय-समय पर औद्यानिक राष्ट्रीय  अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों-संगोष्टियों में भाग लेकर प्राप्त ज्ञान के आधार पर की गई है ।
    प्रस्तुत पुस्तक विभिन्न विभागों के विभिन्न स्तर के अधिकारियो, कर्मचारियों तथा शिक्षण व शोध संस्थानों के पुस्तकालयों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इसके साथ ही विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों हेतु धरोहर साबित होगी ।
  • Akela Mela
    Ramesh Chandra Shah
    225 203

    Item Code: #KGP-705

    Availability: In stock

    अकेला मेला
    ‘उसी एकांत में घर दो जहाँ पर सभी आवें/मैं न आऊँ’...इस प्रसिद्ध कविता के कवि की ही तरह हर लेखक की यही आकांक्षा होती होगी कि वह अपने लेखन में एक ऐसा निर्वैयक्तिक सुर साध सके, जिसमें हर आदमी को अपने ‘हृदय की बात’ सुनाई पड़े, और, साथ ही, पृष्ठभूमि का वह कलह-कोलाहल भी, जिसके बीचोबीच वह रहता है और जिसके कारण, जिसके फलस्वरूप ही उसे वह बात अपने हृदय की बात लगती है।
    कवि-कथाकार और आलोचक रमेशचन्द्र शाह की यह पुस्तक चूँकि उनकी डायरी है--उनके लेखकीय अंतर्जीवन का अंतरंग साक्ष्य--इसलिए यहाँ ‘सब’ के साथ ‘मैं’ अनिवार्यतः गुँथा हुआ है। बगै़र इस लेखकीय ‘मैं’ की निरंतर उपस्थिति और आवाजाही के, भला इस डायरी नाम की विधा का औचित्य ही क्या ! परंतु इसके पृष्ठों से गुज़रते हुए आप देखेंगे--खुद महसूस करेंगे कि किस क़दर यह लेखक आपके अपने जीवनानुभव में घुल-मिल सकता है, किस क़दर उसके घरेलू, सामाजिक और साहित्यिक अनुभवों में आपकी पैठ सहज ही बनती चलती है; यहाँ तक कि इस लेखक के जो अनुभव या सरोकार आपकी अपनी पसंद या जानकारी के दायरे से बाहर पड़ते होंगे, वे भी अपने आप में इतने उत्तेजक हैं कि आपको पता भी नहीं चलेगा, कब कैसे उन्होंने आपको अपने घेरे के भीतर खींच लिया।  
    बेशक, इसमें ज्ञान की बातें हैं, पर कितने आपके काम की, कितना आपको रमाने वाली ?---बशर्ते आप रमना चाहें इनमें। और, भला क्यों न रमेंगे आप इनमें भी बाक़ी जगहों की ही तरह ? क्या इस ज्ञान का भी अपना, बेहद अपना रस नहीं, जो आपके भी सिर पर चढ़कर बोल सके ? देस-बिदेस, अपना- पराया सब भुलाके रख दे--ऐसी माया है इन कुछ अध्ययन-प्रसंगों की भी कि वे आपको नितांत अपने लगेंगे।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh
    Mahip Singh
    160 144

    Item Code: #KGP-2065

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aanvla Or Uski Baagbani
    Darshna Nand
    180 162

    Item Code: #KGP-7848

    Availability: In stock

    वास्तव में आंवले का ताजा फल भी सीमित मात्रा में ही खाया जा सकता है । मुरब्बे के अतिरिक्त इसके अनेक उत्पाद भी निर्माण किये जाते हैं । इसकी उपयोगिताएं अनन्य हैं । यह औषधीय गुणों का भंडार है । 
    इस विशिष्ट फल पर कोई संकलित साहित्य उपलब्ध नहीं था, जिससे इसकी वैज्ञानिक विधि से बागबानी करने और इसके उपयोग करने में सहायता मिल पाती । प्रस्तुत की पुस्तक की हिंदी में रचना करके लेखक ने इन अभावों की पूर्ति की है । 
  • Aalochana Ka Naya Paath
    Gopeshwar Singh
    425 383

    Item Code: #KGP-757

    Availability: In stock

    आलोचना का नया पाठ-नई पीढ़ी के गंभीर और दृष्टिसंपन्न आलोचक गोपेश्वर सिंह की नई आलोचना पुस्तक है। इसके जरिए लेखक हिंदी आलोचना के पुराने पाठ को न सिर्फ नए पाठ में बदलने का आलोचनात्मक संघर्ष करता है, बल्कि उसकी नई भूमिका की जमीन भी तैयार करता है। पठनीयता के गुणों से युक्त साहित्य में पाठक की दिलचस्पी पैदा करने वाली यह आलोचना पुस्तक हिंदी आलोचना में आते नए बदलाव का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
    गोपेश्वर सिंह की रुचि एकांगी नहीं। उनकी आलोचनात्मक पहुँच समग्रतावादी है। मध्य काल से लेकर आधुनिक काल तक, कथा-साहित्य से लेकर कविता तक तथा साहित्य से लेकर समाज तक सभी इनकी रुचि के क्षेत्रा हैं। ऐसे समय में जब आलोचना में गतिरोध का शोर मचाया जा रहा है और जब आलोचक किसी खास विधा या काल तक सीमित होते जा रहे हैं, तब गोपेश्वर सिंह जैसे बहुआयामी सोच वाले नए और गंभीर आलोचक की उपस्थिति आश्वस्त करती है कि आलोचना में गतिरोध का प्रश्न बेमानी है।
    हिंदी आलोचना को प्रगतिवाद और आधुनिकतावाद के शीतयुद्धकालीन दुराग्रही प्रत्ययों की छाया से बाहर निकालना गोपेश्वर सिंह के आलोचनात्मक लेखन की मूल प्रतिज्ञा है। इसलिए यथार्थवाद या रूपवाद जैसे पदों और पक्षों से वे आलोचना को मुक्त करते हैं और उसे नए विमर्शों की रोशनी में ले जाते हैं, लेकिन विमर्शों की अतिरेकी परिणति से उसे बचाते भी हैं।
    ‘आलोचना का नया पाठ’--शीर्षक यह पुस्तक सैद्धांतिकियों के आतंक से मुक्त व्यावहारिक आलोचना का ऐसा पाठ है, जो--भाषा, दृष्टि और शैली--हर तरह से नया है।
  • In Sabke Baavajood
    Manohar Bandhopadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-545

    Availability: In stock

    इन सबके बावजूद
    प्राइवेट कॉलेज के असुरक्षित कार्य को छोड़कर अजय एक संपन्न व्यापारी की ‘भानजी’ रति को ट्यूशन पढ़ाता है। यहाँ उसे प्रॉपर्टी डीलिंग का भी काम मिल जाता है। इस व्यापार के दाँव-पेच सीख वह रति को हथियाकर धनवान बनने के स्वप्न देखता है। इस कोशिश में वह बुरी तरह पिटता ही नहीं, अपनी जान भी खतरे में डाल देता है। व्यापारी को उसके शोषण की फिक्र है और लड़की उसे झटककर किसी और की हो जाती है। हताश अजय तब रेनु की ओर मुड़ता है, जिसे वह किसी समय चाहने लगा था। 
    कहानी वर्तमान युग के नवयुवकों की त्रासदी को उजागर करती है, जिसमें वे वैवाहिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर जोखिम-संघर्ष में स्वयं को झोंक देते हैं। यह मर्मस्पर्शी उपन्यास आज की अस्तित्ववादी वास्तविकता को समझने के लिए पाठकों को विवश करता है।
  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap
    Madan Kashyap
    150 135

    Item Code: #KGP-225

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Delhi
    Khushwant Singh
    400 340

    Item Code: #KGP-818

    Availability: In stock


  • Sachitra Yogasan
    Om Prakash Sharma
    495 446

    Item Code: #KGP-615

    Availability: In stock

    भारत सदा से ऋषि-मुनियों, योगियों और दार्शनिकों का देश रहा है। यहां के निवासी सदा ही ज्ञान की खोज में लगे रहे हैं। आज नाना प्रकार की नई-नई सुविधएं मौजूद हैं, फिर भी व्यक्ति अधूरा, अतृप्त और अशांत है। उसका मन आज भी दुविधा में पड़ा है। नई पीढ़ी दिशाहीन हो गई लगती है। आत्महत्या करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अनेक भारतीय असफल रहकर पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाते जा रहे हैं। वे भूल चुके हैं कि हम उन ऋषियों की संतान हैं, जिनके ज्ञान का डंका कभी पूरे विश्व में बजता था।
    इस ऋषि-परंपरा में महर्षि पतंजलि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके द्वारा प्रतिपादित योग-दर्शन के परिणामों को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी स्तब्ध रह गए हैं।
    महर्षि पतंजलि ने विश्व-भर के प्राणियों के जीवनकाल का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात् चैरासी लाख योगासनों का चुनाव किया और विकारों से बचकर सुखी एवं त्यागमयी जीवन जीने की विधि खोज निकाली।
    योगासन के धीरे-धीरे अभ्यास से आप गंभीर बीमारियों से भी बच सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक महर्षि पतंजलि द्वारा निरूपित सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।
  • Lekhak Ki Chherchhar
    Kashi Nath Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-434

    Availability: In stock

    लेखक की छेड़छाड़ 
    आलोचना की भाषा और रचना की भाषा एक नहीं हो सकती–इस मानने वाले लोग हैं लेकिन काशीनाथ सिंह ऐसे लेखक हैं जिनका प्रबल विश्वास है कि आलोचना भी रचना है । 'लेखक की छेड़छाड़' में उनके इस विश्वास के आधार देखे जा सकते हैं । काशीनाथ सिंह के मूल स्वभाव यहाँ भी देखा जा सकता है–बतकही, चुहल और मजे-मजे में जमाने भर की बात कह देना । वे अपने साथ चलने वाले समकालीनों के काम पर नजर डालते हैं तो अग्रजों को अघर्य  भी देते हैं । उनके अपने कहानी लेखन के अंतरसूत्रों को जानना हो या अभी-अभी के नए कथा परिदृश्य का सिंघावलोकन, यहाँ सब मौजूद है । 'अपना मोर्चा' और 'कशी एक अस्सी' जैसे कालजयी उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया में केवल शोधार्थियों की ही दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही लेखक की सामाजिक भूमिका पर बहस पर किन्हीं ख़ास पाठकों की। यह एक अनुपम गद्य सर्जक के ही बुते की बात है कि वह धूमिल जैसे कवि पर आलेख लिखता है तो गोदान का नए जमाने में महत्त्व भी खोज पाता है । यहां भी काशीनाथ सिंह की पहले दर्जे की गद्य सर्जन का आस्वाद लिया जा सकता  है जो आलोचना, लेख, मूल्यांकन, समीक्षा या स्मृति लेख के रूप में आए हैं । यह लेखक की छेड़छाड़ तो है लेकिन इस छेड़छाड़ की व्यंजन गहरी है और मार दूर तक जाने वाली है । 
  • Bhaasaa Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhaasaa
    Bholanath Tiwari
    230 207

    Item Code: #KGP-274

    Availability: In stock


  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Maafiya
    Girish Pankaj
    175 158

    Item Code: #KGP-2041

    Availability: In stock

    माफिया
    जानते सब हैं, पर लिखते बहुत कम है कि राजनीति के समान साहित्य में भी दल ही दल हैं, तिकड़पबाजियाँ और सौदेबाजियाँ हैं, अवसरवाद और खिलाऊ-पिलाऊवद है, अफसरों और नेताओं के 'साहित्यिक' हथकंडे हैं और संपादकों तथा सम्मानों के बिकाऊ झंडे हैं । गिरीश पंकज ने इस उपन्यास में संगोष्टियों आदि के माध्यम से बिना 'लोक-लाज' के भय के इन सबके कपडे उतार दिए हैं । अब यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इस 'नंगेपन' पर 'कैसी नजर डालते हैं! उपन्यास का प्रमुख कथ्य बहुरूपी साहित्य-माफिया है, जिसके बीच-बीच से शोध-माफिया, विज्ञापन-पुराण, छंद-हत्या, ठेका-लेखन आदि पर भी लटके-झटके सफाई किए गए है । दूसरी ओर, एक आदर्शवादी साहित्यकार की मनोव्यथा, आकांक्षाएं-अपेक्षाएं और सपने भी फूट-फूटकर निकले हैं।
    उपन्यास इस दृष्टि से अंकों का काफी ऊँचा प्रतिशत अर्जित करता है कि इसके दर्जनों अच्छे-बुरे पात्र ऐसे हैं, जिनसे हम रोज़ मिलते हैं, और इसका घटनाक्रम ऐसा है, जैसा हमारे सामने दिन-रात घटित होता रहता है। कथानक का यह सामाजिक सरोकार साहित्य पर हावी होते माफिया राज से जुड़कर आज शायद हर सही-गलत साहित्यकार के रास्ते को किसी न किसी तरह प्रभावित कर रहा है ।
    गिरीश पंकज साहित्य की धारा में काफी तैर चुके हैं, इसलिए इनकी भाषाभिव्यक्ति के प्रवाह में एक कुशल तैराक की गति है । तय समझिए कि यह उपन्यास साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े हर स्तर के पाठकों को पसंद आएगा, क्योकि वे इसके किसी न किसी पात्र से अपना तादात्म्य स्थापित किए बिना नहीं रह सकेंगे
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-766

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aalochna Ka Rahasyavaad
    Parmanand Shrivastva
    280 252

    Item Code: #KGP-709

    Availability: In stock

    ‘आलोचना का रहस्यवाद’ जाने-माने कवि आलोचक परमानंद श्रीवास्तव के इध्र के चुने हुए अट्ठाईस निबंधें का संग्रह है, जिनमें समय, साहित्य, रूप-वस्तु के तीखे सवाल उठाए गए हैं। अट्ठाइसवाँ निबंध रेणु की प्रसिद्ध कहानी ‘लाल पान की बेगम’ का घनिष्ठ पाठ है। परमानंद श्रीवास्तव के लिए नए लेखक प्रेमचंद के बाद रेणु और अमरकांत से प्रेरणा लेते हैं। वे रूप और वस्तु में एक द्वंद्वात्मक रिश्ता मानते हैं।
    परमानंद श्रीवास्तव का प्रिय शब्द है--अँधेरा समय। एक कृति का नाम ही है ‘अँधेरे समय में शब्द’। नया लेखक इसी अँधेरे समय में रास्ता खोजता है। आज लिखने का अर्थ है--तीखे सवालों से मुठभेड़। आलोचना का भी अपना लोकतंत्रा है। मार्क्सवाद है तो उत्तरमार्क्सवाद भी है, प्रतिमार्क्सवाद भी है। ‘कफन’ का पाठ हर बार नए अर्थ देता है। कोई प्रतिमान (कैनन) काफी नहीं है। प्रतिमान धूल में शब्द की तरह है।
    आज अकादमिक आलोचना गूढ़ रहस्यात्मक है। रचना की गुत्थी तो सुलझ भी जाती है, आलोचना पल्ले नहीं पड़ती। प्रतिमान तो मुक्तिबोध् के यहाँ हैं, जैसे-- ज्ञानात्मक संवेदना, संवेदनात्मक ज्ञान। पर हर रचना, अपना प्रतिमान अपने साथ लाती है। बड़े आलोचक सवाल पूछते हैं, जैसे--कविता कौन पढ़ता है (आक्तोवियो पॉज़) या एक पृष्ठ को कैसे पढ़ें (आई.ए. रिचर्ड्स) उम्मीद है यह कृति भी आपको बेचैन व्यग्र छोड़ जाएगी।
  • Kavi Ne Kaha : Anamika
    Anamika
    150 135

    Item Code: #KGP-223

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।
  • Sahitya Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    100 90

    Item Code: #KGP-1266

    Availability: In stock


  • Prachin Unani Kahaniyan
    Rangey Raghav
    340 306

    Item Code: #KGP-06

    Availability: In stock

    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrawan Kumar
    Shravan Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9163

    Availability: In stock

    इस सीरीज के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार श्रवणकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं-‘मैं’, ‘चालाक’, ‘एक और मरजीवा’, ‘याद करो, याद करो’, ‘डायन’, ‘नहीं, यह कोई कहानी नहीं’, ‘सैलाब’, ‘मामूली लोग’, ‘दीमक’ तथा ‘मैं और तुम’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार श्रवरणकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Dhoop Ke Beej
    Hemant Kukreti
    225 203

    Item Code: #KGP-649

    Availability: In stock

    ‘धूप के बीज’ हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हेमंत कुकरेती का पाँचवाँ संग्रह है। किसी अच्छे कवि के पाँचवें संग्रह का आना उसके और उसकी भाषा दोनों के लिए उल्लेखनीय होता है। नब्बे के दशक में आए हिंदी कवियों में हेमंत की कविताएँ अलग से पहचानी जाती हैं। उन्होंने अपना मुहावरा पा लिया है। इधर उनकी भाषा की त्वरा ही नहीं बदली है, उसमें निहित चुभन का पारा भी चढ़ा है। ऐसा किसी चमत्कार के कारण संभव नहीं हुआ है। यह तब संभव होता है जब कवि की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि में परिपक्वता और स्पष्टता आती है; जब उसके लगभग सभी भ्रम तिरोहित हो जाते हैं; जब वह 'मनुष्य' और 'छाया मनुष्य' का अंतर करते हुए विषाद से भर जाता है। कवि को पता है कि कुछ लोगों ने कविता को खेल और मजाक बना दिया है। ऐसे कुकवियों के लिए कविता में जीवन की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण नहीं है। हेमंत के इस संग्रह की कविताएँ इस पतनशील प्रवृत्ति का प्रतिवाद करते हुए काली रात के विरुद्ध धूप के बीज रोपने की आकांक्षा रखने और देने वाली कविताएँ हैं।
    ये कविताएँ हमारे अपने समय में संबंधें की ऊष्मा और जीवन के तापमान का पता देती हैं। ये समय के कुचक्र को परिभाषित करती हैं और हर उस ‘चाल’ पर उँगली रखती हैं जो आत्मीयता के लिहाफ के भीतर अनवरत चलती रहती है। आजकल जब कविताएँ बहुत अबूझ होती जा रही हैं तब हेमंत की साफ-सुथरी कविताएँ पढ़ना सुखद अनुभव की तरह है। हेमंत बिना किसी बनावटी गंभीरता के अपनी बात कहते हैं और कविता बनी रहती है। वे कविता में बहस नहीं करते बल्कि बहसों को कविता में लाते हैं और पाठक के मन में उतार देते हैं। उनकी कविताएँ यदि बाजार के चरित्र को बारीकी से पकड़ती हैं तो जीवन के रंग को भी। कहना चाहिए, उनकी कविता दुःख का विलोम रचना जानती है। 
    एक कवि के रूप में हेमंत स्मृतियों का महत्त्व जानते हैं। वे जानते हैं कि स्मृतियाँ मनुष्य की थाती होती हैं। जो जितना जीवंत होता है, उसके पास उतनी ही अधिक स्मृतियाँ होती हैं। 
    हेमंत के पास अपने पहाड़ की, गाँव-जवार की, दिल्ली की, प्रेम की, तमाम साथियों और घटनाओं की अपार स्मृतियाँ हैं जो उनके कवि को मित्र की तरह ऊर्जस्वित करती हैं। उनकी शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो यथास्थिति के विरुद्ध उम्मीद न जगाती हो। कहा जा सकता है कि वे नाउम्मीदी के इस कठिन समय में उम्मीद के कवि हैं।
    यह संग्रह इसका प्रमाण है कि हेमंत की कविताएँ उस ओर तीक्ष्ण निगाहों से देखती हैं, जिधर ठीक से देखा नहीं गया है। वे शहर की निस्पंद हो रही देह में सिहरन जैसी कोई चीज तलाशते हैं और पाते हैं, 'कोई सिहरन पैदा नहीं होती/शहर के जिस्म में/वह थोड़ा और मर जाता है।' इस संग्रह की कविताएँ किंतु, परंतु और लेकिन को पीछे छोड़ती हुई निष्कवच सत्य के साथ खड़ी हैं।
    हेमंत की कई कविताएँ पितृसत्ता का नया मायावी चेहरा दिखाती हैं। 'घर से चली जाती हैं जो औरतें' और 'घरों में काम करने वाली औरतें' जैसी कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं। हिंदी के समकालीन काव्य परिदृश्य पर ऐसे कितने कवियों की मौजूदगी है जो हेमंत की तरह कह सकें-'साहित्य के आलोचक चुक गए/और बन गए कवियों के निंदक।' इस संग्रह की कविताएँ यथार्थ के कई चेहरे लेकर आई हैं। बुजुर्गों के बारे में उनकी सादगी से कही पंक्तियों में छुपा घाव बहुत गहरा है।
    इसी तेज नजर के कारण हेमंत शहरी जीवन को व्यक्त करने वाले बड़े कवि हैं। इस कविता में दया दिखाने की कोई अपील नहीं है क्योंकि कवि जानता है कि पूँजी के सौंदर्यशास्त्र में दया और करुणा घिनौने शब्द हैं। बुजुर्गों पर बात करते हुए जब हेमंत इस मार्मिक पंक्ति को लिखते हैं कि 'हँसी भी एक तरह का रोना है' तो समकालीन समय का नागरिक होने पर रोना आता है। इस संग्रह की अंतिम कविता हेमंत की बड़ी रेंज का पता देती है। इस संग्रह की सभी कविताएँ कविता की स्वाभाविक जमीन पर खड़ी हैं। इनमें समाई हुई लयात्मकता इनकी ताकत है। लंबे अंतराल के बाद आया हेमंत कुकरेती का यह संग्रह समकालीन हिंदी कविता में एक सार्थक और जरूरी हस्तक्षेप की तरह है।
  • Hindi Turkey Dictionary
    Sita Laxmi
    495 446

    Item Code: #KGP-2039

    Availability: In stock


  • Antyoday Purus : Shanta Kumar
    Satish Dhar
    195 176

    Item Code: #KGP-232

    Availability: In stock

    अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार
    शान्ता कुमार स्वच्छ छवि की भारतीय राजनीतिक परंपरा के राजनेता हैं। राजनीति के साथ-साथ शान्ता कुमार कई महत्त्वपूर्ण एवं चर्चित साहित्यिक पुस्तकों के रचयिता भी हैं ।
    ‘अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार' ऐसी पुस्तक है, जिसमें शान्ता कुमार के घर-परिवार से लेकर अभिन्न मित्रों के गरिमापूर्ण रिश्तों की सांद्रता है । पुस्तक शान्ता कुमार के जीवन-संघर्षों के कई अनछुए प्रसंगों को समेटे हुए है । शान्ता कुमार के ओजस्वी वक्तव्यों से परिपूर्ण साहित्यिक सभाओं अथवा अन्य कार्यक्रमों में की गई बेबाक टिप्पणियाँ इस महान् व्यक्तित्व की बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाती है ।
    हिमाचल प्रदेश के इस महान् सपूत ने अपनी प्रखर सोच से देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को नई दिशा प्रदान की है। पुस्तक में राजनीति के चलते राष्ट्रीय स्तर पर शान्ता कुमार द्वारा प्रारंभ की गई लोक-हितकारी योजनाओं की बानगी भी देखने को मिलती है। यह कृति सृजनात्मकता की छौन्क के साथ-साथ राजनीतिक इतिहास का भी दस्तावेज है ।
    पुस्तक में लेखक द्वारा लिया गया साक्षात्कार शान्ता कुमार के व्यक्तित्व के कई कोने-अंतरों को खोलने में सक्षम रहा है। पुस्तक की प्रांजल व लयात्मक भाषा पाठको को अंत तक बॉंधे रखने में सक्षम है ।
  • Qalandar
    Narendra Mohan
    25 23

    Item Code: #KGP-9102

    Availability: In stock


  • Triya Hath
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-82

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Vishwanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    190 171

    Item Code: #KGP-386

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    मेरी कविताओं में ऐसे शब्द, बिंब या प्रतीक अधिक हैं जो भोगते हुए या जूझते हुए मनुष्य से संबंधित है । मैं गरीब देहाती दुनिया से जाया हुं और मेरे शुरू के बीस वर्ष उस अनाथ साधनहीन मनुष्य के बीच गुजरे जिसे बार-बार अपमानित होते, यातनाएं सहते देखा है । मेरी कविताओं में 'हत्या' और उससे मिलती-जुलती शब्दावली में जो आतंक है, वह मेरे बालमन पर पडे प्रभावों की ही प्रतिक्रिया है । मेरी कविताओं में 'अंधकार' और 'रात' के बिंब भी अधिक हैं जो एक अनार मेरे अकेलेपन की अतृप्ति को व्यक्त करते है तो दूसरी खार उस अंधकारमय दबाव को जिसे आज का साधनहीन मनुष्य भोग रहा है । मेरी कविताओं में पहाडी परिवेश अधिक मिलेगा । पहाड़ के प्रति मेरा गहरा आकर्षण है और मृत्यु-भय से आतंकित होते हुए भी मैंने पहाडी यात्राएं बहुत की हैं । हिमालय का परिवेश मेरी प्रेम कविताओं में कहीँ-कहीं प्रेमिका के साथ एकाकार हो गया है । कुछ शब्दों के सदंर्भ से प्रयोक्ता और ग्रहीता के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है । अपनी कविताओं के प्रसंग में कहूं तो उनमें 'इतिहास', 'धारा', 'अंधकार', 'घाटी', 'जंगल', 'पहाड़' आदि अनेक शब्द अपना विशिष्ट अर्थ रखते है ।
    'बेहतर दुनिया के लिए' और 'आखर अनंत' नामक संग्रहों की बहुत-सी समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी है । इन संग्रहों के बारे में अपनी ओर से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इनमें मेरी रचनात्मक भाषा  परित्कृत हुई है और कविताओं को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मिला है । आत्मीय का भी और लोक का भी ।
  • Nepathya Se
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-9117

    Availability: In stock

    इस पुस्तक का प्रारंभ एक आत्मनिबंध-सी लगने वाली रचना से होता है और उपसंहार एक ऐसे पत्र-संवाद से, जो दरअसल समूची पुस्तक में अंतव्र्याप्त विषयवस्तु से ही संबद्ध विचारों का वाद्य-वृंद अथवा ‘ड्रामा’ है। इस तरह यह एक ओर मेरे विशुद्ध व्यक्ति-व्यंजक निबंध-संग्रहों ‘रचना के बदले’, ‘आडू का पेड़’ और ‘शैतान के बहाने’ से और दूसरी ओर मेरे वैचारिक निबंध-संकलनों ‘सबद निरंतर’, ‘पढ़ते-पढ़ते’, ‘स्वधर्म और कालगति’ तथा ‘स्वाधीन इस देश में’ से जुड़ता है; हालांकि है यह कुल मिलाकर वैचारिक निबंधों का संग्रह ही। पाठक लक्ष्य करेंगे कि विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जिसे कहा जाता है, उससे भिनन कोटि का उपक्रम होते हुए भी यह लेखन ‘आलोचना’ को हर जगह स्पर्श करता चलता है अलगपन इसमें यह, कि आलोचना का यह स्वर संस्कृति के व्यापक सरोकारों का, कहंे कि एक तरह की सभ्यता-समीक्षा का स्वर है।
    पिछले तीन-चार बरसों के दौरान लिखे गए इन निबंधों में सुधी पाठक को कुछ न कुछ तारतम्य और पूर्वापर-संबंध की प्रतीति भी अवश्य होगी जो इनके पुस्तकाकार प्रकाशन को संकलन की तरह ही नहीं, अंतग्र्रथित गं्रथ के रूप में भी यथेष्ट औचित्य प्रदान करती है। इस अवसर पर लेखक उन समस्त संस्थाओं और पत्रिकाओं के प्रति आभार व्यक्त करना अपना कर्तव्य समझता है, जिन्होंने इन निबंधों को प्रेरित या प्रकाशित किया।
    —रमेशचंद्र शाह
  • Sikhavan (Paperback)
    Jagdish Pandey
    40

    Item Code: #KGP-1445

    Availability: In stock

    प्रार्थना

    सुन लो भगवन विनय हमारी।
    हम सब आये शरण तुम्हारी।।

    सारे जग के रक्षक -पालक,
    हम हैं नाथ तुम्हारे बालक।
    तेरे दर के सभी भिखारी।।

    गुरु, पितु, मात, चरण अनुरागी, 
    बनें सभी ऐसे बड़भागी।
    आशीषों के हों अधिकारी।।

    विद्या पढ़ें विवेक बढ़ाएं,
    अपना जीवन श्रेष्ठ बनाएं।
    हरो ईश बाधाएं सारी।।

    शुभ कर्मों में ध्यान लगाएं,
    पर - सेवा कर नाम कमाएं।
    मातृ - भूमि के हों हितकारी।।

    हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
    रहें सदा बन भाई-भाई।
    शान तिरंगे की हो प्यारी।।
    -इस पुस्तक की ‘प्रार्थना’ कविता
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ai Ganga Tum Bahati Ho Kyoon
    Vivek Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-507

    Availability: In stock

    ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ युवा कथाकार विवेक मिश्र का तीसरा कहानी-संग्रह है। ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘पार उतरना धीरे से’ कहानी संग्रहों से विवेक ने पाठकों के बीच प्रियता व प्रामाणिकता अर्जित की है। उन्होंने बहुत शाइस्तगी और रचनात्मक विनम्रता के साथ यह सिद्ध किया है कि आसपास पसरा यथार्थ हर रचनाकार के लिए समान नहीं होता। यह रचनाकार पर है कि वह ‘दिखते’ के पीछे छिपे जीवन सत्य और ‘दिखते’ में वास्तविक को कितना देख-समझ पाता है। विवेक वास्तविक और प्रायोजित का अंतर समझने वाले समर्थ कहानीकार हैं। यही कारण है कि आज जब संपादकों, संगठनों, प्रायोजकों के कंधें पर बेतालवत् सवार कुछ कहानीकार ठस व ठूँठ हो रहे हैं तब विवेक मिश्र की कहानियाँ अपना महत्त्व असंदिग्ध रूप से प्रकाशित कर रही हैं।
    विवेक मिश्र सुस्पष्ट सामाजिक सरोकारों से लैस लेखक हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ साबित करती हैं कि परिवार में बद्धमूल अप्रासंगिक धारणाओं से लेकर सामाजिक परंपराओं में घुसपैठ करती अमानवीय प्रवृत्तियों तक लेखक की पैनी नजर है। परिवेश विवेक के यहाँ एक पात्र सरीखा है। मैत्रेयी पुष्पा के बाद बुंदेलखंड का जीवन-जगत् उनके यहाँ सर्जनात्मक संदर्भ प्राप्त करता है। साथ ही, वे महानगरों की संधियाँ-दुरभिसंधियाँ भी परखते हैं।
    संग्रह में शामिल ‘घड़ा’, ‘चोरजेब’, ‘निर्भया नहीं मिली’ तथा ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ सरीखी कहानियाँ रेखांकित करती हैं कि लेखक मन के अतल में व्याप्त ध्वनियों को सुनने की अद्भुत क्षमता रखता है। उसके पास अर्थ को अनेक स्तरों पर वहन करने वाली भाषा है, जैसे--‘पनरबा कस्बे के किसी कागज को माचिस की तीली से जलाकर देखिएगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रांत अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।’ यह कहानी संग्रह वर्तमान हिंदी कहानी में मूल्यवान उपस्थिति की तरह स्वागत योग्य है।
  • Mori Ki Int
    Madan Dikshit
    150 135

    Item Code: #KGP-9073

    Availability: In stock


  • Krantikari
    Roshan Premyogi
    260 234

    Item Code: #KGP-1943

    Availability: In stock

    क्रांतिकारी
    दलित परिवार में जन्म लेने के कारण सामाजिक अस्पृश्यता और उत्पीड़न का दंश मैंने भी सहा है, इसलिए ‘क्रांतिकारी’ को पढ़ते हुए यह सवाल मेरे मन में कई बार उठा कि जिस तरह इस उपन्यास में चंद्रशेखर और केवलानंद जैसे सचेत सवर्ण लड़के दलित रामकरन के साथ खड़े हैं, मेरे साथ क्यों नहीं खड़े हुए ?
    चंद्रशेखर मुख्य पात्र है, जो चाहता है कि इलाके के गाँवों में दलितों का जीवन-स्तर ऊँचा उठे, वे संगठित हों और बराबरी पर आने के लिए लड़ें। दलितों की लड़ाई में वह अपना एक हाथ गँवा बैठता है। अंत में उसके विचारों की विजय होती है। विजय इस तरह कि दो मेधावी युवा अपने-अपने गाँव यह सोचकर आए थे कि वे यहीं पर रोजगार करेंगे और अपने साथ दलित समाज का भी जीवन-स्तर ऊँचा उठाएँगे। उनकी राह में क्षेत्रीय विधायक काँटा बोते हैं, इसलिए कि यदि रामकरन जैसे हरिजन दलितों के सर्वमान्य नेता बन जाएँगे तो हम सवर्णों का वोट बैंक टूट जाएगा। उधर चंद्रशेखर और रामकरन मिलकर दलितों को यह अहसास कराते हैं कि यदि संगठित और शिक्षित बनोगे तो कोई भी तुम्हारा उत्पीड़न नहीं कर पाएगा।
    ईशावस्या, माला और संध्या जैसे स्त्री-पात्रों को उपन्यास में महत्त्व नहीं मिला है, लेकिन सबकी कमी पूरी कर देती हैं सुन्नरी देवी। उनका संघर्ष समूची दलित स्त्री जाति का संघर्ष है। वे किसी देवी की तरह समाजियों का नेतृत्व सँभालती हैं। दरअसल दलित क्रांति की मशक्कत तीन युवा मिलकर करते हैं, लेकिन जब क्रांति होती है तो वे युवा पीछे रह जाते हैं और सुन्नरी देवी विजय का परचम लहरा देती हैं।  

  • Manushkhor
    Ganga Prasad Vimal
    595 506

    Item Code: #KGP-405

    Availability: In stock


  • Yahaan Se Kahin Bhi
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2092

    Availability: In stock

    यहाँ से कहीं भी
    'सफ़री झोले में' के बाद 'यहाँ से कहीं भी' अजितकुमार की यात्राओं का दूसरा संग्रह है । उनकी कविता ही नहीं, समीक्षा-कहानी-उपन्यास संरमरणादि के भी पाठक जानते है कि अजितकुमार विधाओं की जकड़बंदी म नहीं फंसते। लेखन उनके लिए कोई समर-भूमि नहीं, जहाँ जिरह-बख्तर से लेख वे लगातार तलवार  भाँजने रहें या अंतरिक्ष-यात्री का लबादा ओढ़ लंबे सफ़र पर निकल पडे ।  वह उनके लिए संवाद का सरल माध्यम है, कभी-कभी तो अपने-आप में ही संवाद का।  एक रंग के भीतर मौजूद तमाम रंग जैसे इंद्रधनुष में बिखर उठते है, कुछ-कुछ वैसा ही दृश्य— डायरी, टीप, रेखाचित्र, आत्मकथा, रपट, वार्ता जैसे  बहुत कुछ को झलकाता यात्रावृत्तों में मिलेगा।  जटिल या सरल, वह दृश्य जैसा भी है— यदि आपके लिए भी प्रीतिकर हुआ तो इम कामना की संभावना रहेगी कि जैसे उनके यात्रा-दिन बहुरे, वैसे आपके भी बहुरें । 

  • Mataki Mataka Matkaina
    Dronvir Kohli
    100 90

    Item Code: #KGP-977

    Availability: In stock

    तुम यह जानना चाहोगे कि मैंने यह कहानी कैसे लिखी। वैसे, कुछ लेखक अपना भेद बताने से कतराते हैं। लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है सारी बात बताने में।
    मैं विदेश-भ्रमण करता रहता हूं। एक बार मैं एक देश के एक ऐसे नगर में गया जहां पतझड़ का मौसम था। सारे इलाके की शोभा देखते ही बनती थी। यह उस प्रदेश की विशेषता थी। पतझड़ के मौसम में वहां के गली-कूचे, सड़कें-पगडंडियों, घर-बाहर के लाॅन, पार्क और जंगल भांति-भांति के पेड़ों के झड़ते रंग-बिरंगे पत्तों से इस तरह ढक जाते थे कि सचमुच धरती दिखाई ही नहीं पड़ती थी। वहां के झड़ते सूखे पत्ते भी सुंदर लगते थे कि देख-देखकर हृदय बल्लियों उछलता था।
    इसके साथ ही वहां मैंने एक और अद्भुत बात देखी। वहां के रहने वाले लोग पतझड़ के पत्तों को जलाते नहीं थे क्योंकि इससे वायुमंडल दूषित होता है। वे करते यह थे कि सूखे पत्तों को बटोरकर सड़क के किनारे ढेर करते रहते थे। निश्चित दिन गाड़ी आती थी और पत्तों को समेटकर ले जाती थी।
    लेकिन इससे भी विचित्र बात वहां मैंने यह देखी कि ये सूखे पत्ते जब तक सड़क के किनारे पड़े रहते थे, तब तक बेचारी गिलहरियों की जान सांसत में आ जाती थी। सड़क के किनारे पड़े सूखे पत्तों के ऊंचे-ऊंचे अंबार फांदकर बेचारी गिहरियां आ-जा नहीं सकती थीं और गाड़ियों के नीचे आकर कुचली जाती थीं।
    संयोग से वहां मैं ऐसी बस्ती के एक घर में ठहरा था जो जंगल के सिरे पर स्थित था। मैं जब बाहर टहलने निकलता, तो सड़क पर दोनों तरफ टीलों की तरह लगे पत्तों के ढेर के साथ मरी हुई गिलहरियों को देखकर मन भारी हो जाता। बस, इन मृत गिलहरियों को देखकर ही मुझे यह कहानी लिखने की प्रेरणा मिली।
    सच पूछो तो, मैं उस शहर में न गया होता, और फिर जंगल के किनारे उस घर में न ठहरा होता, तो यह कहानी लिखी ही नहीं जा सकती थी। इसे लिखते समय मुझे अपार आनंद मिला।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Maitreyi Pushpa : Stri Hone Ki Katha
    Vijay Bahadur Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-9041

    Availability: In stock


  • Mahaan Vyaktitva Jin Par Hamain Garv Hai
    Pravesh Chaturvedi
    480 432

    Item Code: #KGP-448

    Availability: In stock


  • Anhad Naad
    Pratap Sehgal
    250 225

    Item Code: #KGP-35

    Availability: In stock


  • Encounter-E-Love Story Tatha Anya Prem Kahaniyan
    Shyam Sakha 'Shyam'
    200 180

    Item Code: #KGP-1843

    Availability: In stock

    एनकाउंटर-ए-लव स्टोरी तथा अन्य प्रेम कहानियां
    डॉ. श्याम सखा 'श्याम' की कहानियां, देह में आती-जाती ठहरती-बिछलती सांसों की तरह हैं। इनमें आशाओं की ऊष्मा है, निराशा की ठंडक है, उत्साह और आत्मविश्वास की आंच हैं। इन कहानियों का आकार भी सांसों की ही तरह लघु-दीर्घ और मदमय है, सब कुछ अनायास और निश्चित, एक लय-ताल में बद्ध । कहीं छोटी भी ही सांस में देह में दीप्ति है तो कहीं दीर्घ श्वास ने पूरी काया को कंपित कर दिया है।
    जैसे श्यास ही जीवन का सूचक है, वैसे ही कहानी की रोचक वस्तु ही प्राणधार है। सेक्स की लंतरानी को जगह प्रेम की फुहार हैं। यहां रंगरलियां नहीं हैं, अंगरलियां हैं और उसकी स्वनिर्मित सैंद्धन्तिकी भी हैं। पठनीयता इस कदर कि हाथ से कहानी रखते न बने; गालिब की भाषा में 'बुझाए न बने ' सी हालत.. बस संग्रह की हर कहानी ऐसी ही आतिश है जिस पर कांई जोर नहीं चलता।
    इन कहानियों का कैनवास बहुत बड़ा है। सभी वर्गों की जिंदगियां यहां हाथ उठाए खडी हैं कि पहले हमारी तरफ देखो । पाठक विस्मय से इन सबकी ओर उत्सुक भाव से देखता है । वह जिसका हाथ पकड़ लेता है, वही उसे एक ऐसे अनुभव संसार में ल जाती है जो उसके लिए अपरिचित भले न हो परंतु परिचित भी नहीं था; जैसे कोई किमी मुहल्ले के मुहाने तक तो पहुंचा हो, परंतु भीतर कभी न जा सका हो।
    ये कहानियां, मन और ममाज के ऐसे ही अल्प-परिचित मुइल्लों में पाठक को खींच ले आती हैं। श्याम सखा 'श्याम' एक समर्थ कथाकार है, कहना चाहिए कि इंसानी जिंदगी के कुशल लेखा-जोखाकार हैं। इनकी नाप-जोख, ऐसी जानी पहचानी और अपनत्व वाली भाषा में है जी पल भर का भी पराई नहीं लगती।
    एक ओर किशोर प्रेम की कोमलांगी कहानी रसभरी पाठक को उसकी अपनी किशोर अवस्था के स्नेह कणों से भिगो देती है तो दूसरी ओर प्रेमिका की मजबूरी व एनकाउंटर- ए-लव स्टोरी प्रेम के भयावह यथार्थ को उकेरती सफल कहानियां हैं। एनकाउंटर शब्द प्रेम के साथ अजीब लगते हुए भी कहानी शीर्षक की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल है ।
  • Aadivasi Shourya Evam Vidroh (Jharkhand)
    Ramnika Gupta
    280 252

    Item Code: #KGP-751

    Availability: In stock

    इतिहास-लेखन को लेकर समय-समय पर सहमतियाँ व असहमतियाँ दर्ज की जाती रही हैं। कई बार वे व्यक्ति/समुदाय/संघर्ष/प्रतिवाद हाशिए पर रह जाते हैं या नेपथ्य में चले जाते हैं जिन्होंने समय के नुकीले प्रहार सहे होते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में आदिवासियों को प्रायः नेपथ्य में रखा जाता रहा है। धीरे-धीरे उनके संघर्षों के मूल्यांकन का कार्य शुरू हुआ। यह एक तरह से असंख्य मनुष्यों के प्रति सभ्यता का आभार ज्ञापन भी है। रमणिका गुप्ता ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘आदिवासी: शौर्य एवं विद्रोह (झारखंड)’ उनका इस सिलसिले में नया हस्तक्षेप है। झारखंड के आदिवासियों पर केंद्रित इस पुस्तक में अनेक भूले-बिसरे वृत्तांत समाहित हैं।
    रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित प्रस्तुत पुस्तक में वीरांगना सिनती दई, पहाड़िया वीर, तिलका माँझी, रानी शिरोमणि, सिदो व कान्हू, पृथ्वी माँझी, बिरसा मुंडा तथा जतरा भगत आदि अविस्मरणीय चरित्रों के विषय में महत्त्वपूर्ण सामग्री सँजोई गई है। अनेक लेखकों ने झारखंड के आदिवासियों का योगदान रेखांकित किया है। भूमिका में रमणिका लिखती हैं, ‘झारखंड के शौर्य और विद्रोह की यह गाथा बूढ़े बुजुर्गों की स्मृतियों, उनके गीतों, बैलेड्स, लीजेंड्रियों, लोककथाओं व किंवदंतियों और अंग्रेजों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों के ऐतिहासिक तथ्यों पर आधरित है।’ सचमुच, आदिवासियों का योगदान इतना विस्मयपूर्ण है कि वह लोककथाओं, लोकगीतों का अनिवार्य हिस्सा बन गया है। अपने देश और समाज के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली विभूतियों का जीवन चरित पीढ़ियों को प्रेरणा दे रहा है। 
    आज के संदर्भ में ऐसी पुस्तकों का महत्त्व इस कारण बढ़ जाता है क्योंकि ‘जल-जंगल-जमीन’ को लेकर कई तरह के संघर्ष छिड़े हुए हैं। एक व्यापक सामाजिक न्याय की भूमिका बनाती यह सामग्री विस्मृतप्राय इतिहास का नया आख्यान है।
  • Mere Saakshatkaar : Amrit Lal Nagar
    Amritlal Nagar
    490 417

    Item Code: #KGP-478

    Availability: In stock


  • Teen Tare
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1103

    Availability: In stock

    किशोर मन की उड़ानों के लिए सारा आकाश ही छोटा पड़ जाता है। किशारों की इस दुनिया में जड़ और जंगल, पशु और पक्षी सभी कुछ तो मनुष्यों के मित्र और सहायक होते हैं। इस मनोरंजक कहानी में गधे के दो नन्हे-मुन्ने बच्चे एक मानव किशोर के परम मित्र बनकर बड़ी ही रोमांचक और साहसपूर्ण यात्रा पर निकल पड़े हैं। पग-पग पर आपदाएं आती हैं। चोर-लुटेरे हैं, हिंसक जंतु और उनसे भी डरावने डाकू हैं। पर तीनों मित्र अपनी सूझ-बूण् और हिम्मत से सबको छकाते हुए अपना उद्धार करते हैं और दूसरे कई बालकों का उद्धार भी करते हैं। और इस बहुत बड़ी दुनिया में घूम-भटक कर घर लौट आते हैं। जिस शान से वे घर लौटे, अपनी यात्रा में जो ज्ञान और साहस उन्होंने संचित किया, आपदाओं की भट्ठी में मैत्री के सोने को उन्होंने कंचन बनाया, वह सभी किशोर पाठकों को भी प्राप्त हो।
  • Toro Kara Toro-5 (Sandesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-667

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bhasha, Sahitya Aur Jaatiyata
    Ram Vilas Sharma
    640 576

    Item Code: #KGP-884

    Availability: In stock

    भाषा, साहित्य और जातीयता
    डॉ. रामविलास शर्मा की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके लेखों और समीक्षाओं का यह संग्रह पाठकों के लिए प्रस्तुत है। डॉ.शर्मा द्वारा संपादित पत्रिका ‘समालोचक’ में प्रकाशित यह सामग्री पहली बार पुस्तक के रूप में आ रही है। सामग्री का प्रस्तुतिकरण तथा संपादन किया है डॉ. शर्मा के सुपुत्र विजय मोहन शर्मा ने।
    ज्ञात हो कि ‘समालोचक’ केवल दो वर्ष--फरवरी, 1958 से जनवरी, 1960 तक निकल पाया। कुल चैबीस अंकों में से दो विशेषांक थे--‘सौंदर्यशास्त्र विशेषांक’ और ‘यथार्थवाद विशेषांक’। जिनका उस समय बड़ा स्वागत हुआ और हिंदी साहित्य-जगत् के अनेक ‘सितारों’ ने उनकी सराहना की। ये विशेषांक साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए आज भी महत्त्व रखते हैं।
    ‘समालोचक’ में पुराने लेखकों के अलावा नए लेखक भी लिखते थे। इन लेखकों में हिंदी प्रदेश से बाहर के लेखक भी थे। इसका संपादकीय क्षितिज उदार था। संपादक डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, ”हमारा ध्येय हिंदी आलोचना के विकास में योग देना है, उसमें आमूल परिवर्तन करना अथवा युगांतर उपस्थित करना नहीं। हम विभिन्न विचारधाराओं और मतों के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करके परस्पर विचार-विनिमय द्वारा आलोचना-साहित्य के उत्तरोत्तर विकास का प्रयत्न करेंगे।“
    बीसवीं शताब्दी के हिंदी के सर्वमान्य महान् आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा की साहित्यिक समझ और प्रतिबद्धता का विस्तार इस ग्रंथ की संकलित सामग्री में आद्यंत दिखाई पड़ते हैं। शोध और समीक्षा के प्रतिमान स्थापित करता यह ग्रंथ प्रत्येक बुकशेल्फ की अनिवार्यता है।
  • Angaaron Main Phool
    Santosh Shelja
    140 126

    Item Code: #KGP-1981

    Availability: In stock

    अंगारों में फूल
    माँ का अडिग साहस देख तिलक विस्मित थे । आज पहली बार मां व बाबा को अपने दु:ख का संवेदनशील श्रोता मिला था । इस लंबी वार्ता में तीनों की आँखें कईं बार गीली हुई और कई बार गर्व से छाती फूल उठी । जाने से पहले लोकमान्य ने झुककर माँ व बाबा के चरण स्पर्श किए और रुँधे कंठ से कहने लगे,  गौरवशाली बलिदान का श्रेय न मुझे है न उन्हें है-बल्कि सचमुच में इसका श्रेय आपको और आपकी बहुओं को है । गीता पढ़ना सरल है मां, पर उसे वास्तविक जीवन में उतारना बहुत ही कठिन है । एक बार मरना संभव है, किन्तु इस प्रकार मरण  को हृदय से लगाए हुए जिंदा रहना बहुत असंभव है । पर अपने वही कर दिखाया... धन्य है आप!'
    [इसी पुस्तक से]
  • Videshi Mahilaon Ka Bharatprem
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-7809

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘विदेशी महिलाओं का भारतप्रेम’ उन महिलाओं के विषय में लिखी गई है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतभूमि की तथा भारत के लोगों की तन मन धन से सेवा एवं सहायता की। चाहे वे कोक्को सोमा हों या उनकी बेटी तोशिको, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सेवा की। इसी क्रम में आगे श्रीमती एनीबेसेंट, मारग्रेट कजिंस और एमिली शैंकल के नाम भी उल्लेखनीय हैं। इन महिलाओं ने जन्म भले ही भारतभूमि पर न लिया हो, लेकिन उनके भारतप्रेम को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनका भारत से घनिष्ठ संबंध है। उनके द्वारा दिए गए अविस्मरणीय योगदान को इस पुस्तक में सरल, सरस और रोचक शैली में उल्लिखित किया गया है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajee Seth
    Raji Seth
    230 207

    Item Code: #KGP-798

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजी सेठ ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'उसका आकाश', 'तीसरी हथेली', 'अंधे मोड़ से आगे', 'पुल' , 'अमूर्त कुछ', 'तुम भी...?', 'अपने दायरे', 'ठहरो, इन्तजार हुसैन', 'उतनी दूर' तथा 'यह कहानी नहीं'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजी सेठ की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Svadharma Aur Kaalgati
    Ramesh Chandra Shah
    75 68

    Item Code: #KGP-9123

    Availability: In stock

    स्वधर्म और कालगति
    ‘मनुष्य सत्य को नहीं जान सकता किंतु उसे जीवन में अवतरित अवश्य कर सकता है’
    आधुनिक कवि येट्स ने लिखा था, अपनी मृतयु से एकाध दिन पहले ही। जैसे उसके कुल जीवानानुभव और कवि-कर्म का निचोड़ इस वाक्य में आ गया हो। प्रकारांतर से क्या यह ‘सब होकर सबको देखने’ वाले दर्शन से ही जुड़ी हुई बात नहीं लगती? रचना भी ज्ञान का ही एक प्रकार है; पर रचना का ‘जानना’ ज्ञान के अन्य अनुशासनों के ‘जानने’ की प्रक्रिया से मूलतः भिन्न है। इसलिए कि वह स्वयं जीकर के, स्वयं होकर के जानना है। ‘जानना’ यहां ‘होने’ पर अवलंबित है। रचना का सच अस्तित्वात्मक और रागदीप्त सच है। किंतु क्या इसीलिए वह सत्य के दूसरे किस्म के खोजियों और दावेदारों को उनकी तथाकथित वस्तुपरक कसौटी के चलते संदिग्ध नहीं लगता होगा? आयोनेस्को से पूछा गया कि तुम क्यों लिखते हो? उसने उत्तर का प्रारंभ ही इस वाक्य से किया कि ‘मैं क्यों लिखता हूं-यदि मैं सचमुच यह जानता होता तो मुझे लिखने की कोई प्रेरणा ही नहीं होती, यही जानने के लिए तो मैं लिखता हूं कि मैं क्यांे लिखता हूं?’ जाहिर है कि इस तरह का लगातार जानना भी लेखक होने से छुटकारा नहीं दिलाता। यदि लेखन-कर्म को व्यापक जीवन और सृष्टि के प्रति एक तरह के ऋणशोध या आत्मदान की प्रक्रिया के रूप में देखें तो भी इससे यह कहां निकलता है कि इस जीवनव्यापी प्रयिा की परिणति आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि में होगी ही। हो भी तो वह आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि-सब होकर सबको जानने का अनुभव-सचमुच ‘ज्ञान’ की है और दूसरे वस्तुपरक ज्ञान की तरह ही उपयोगी और समर्थ ज्ञान है, इसका भरोसा दूसरे को कैसे हो?
    (पुस्तक के एक निबंध से)
  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti
    Hemant Kukreti
    240 216

    Item Code: #KGP-7814

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Manohar Shyam Joshi Ke Teen Upanyas
    Manohar Shyam Joshi
    300 270

    Item Code: #KGP-819

    Availability: In stock

    मनोहर श्याम जोशी के तीन उपन्यास

    हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी: ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ और ‘कसप’ उपन्यासों से मनोहर श्याम जोशी ने उत्तर आधुनिक शिल्प और चिंतन की प्रतिष्ठा करने का जो सिलसिला शुरू किया था उसी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस उपन्यास में कथा को ही कथानक बनाते हुए सत्य और गल्प की सीमा-रेखा को संशय के रंग में रँग दिया है।
    ० 
    ट-टा प्रोफेसर: इस उपन्यास में मनोहर श्याम जोशी ने एक साधारण पात्र को महानायक और महामूढ़ के मिथकीय फ्रेम में मढ़ दिखाने वाले अपने कथा-कौशल का प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। विशिष्ट बनने के प्रयास में मामूली लोगों की दुनिया में गैर-मामूली ढंग से हास्यास्पद प्रतीत होने वाले मामूली प्रोफेसर ट-टा की हास्यास्पद लगने वाली मामूली प्रेम-कहानी में भी लेखक अमर प्रेम-कहानी के तत्त्व देखता और दिखाता है।
    ० 
    हमज़ाद: मनोहर श्याम जोशी की पिछली कथाकृतियों की ही तरह यह उपन्यास भी कथ्य और शिल्प की दृष्टि से हिंदी कथा-संसार में एक नयी सड़क बनाता है। भाषा की बहुरंगी नोक-पलक पर अपने सर्वविदित अधिकार को भी फिर प्रमाणित करते हुए उन्होंने इस बार घटिया शाइर तख़तराम का भेस बनाकर ऐसा गद्य लिखा है जो निश्चय ही उर्दू को हिंदी की ही शैली मानने वाले हिंदी-प्रेमियों को और देवनागरी में फ़ारसी सही लिखने का आग्रह करने वाले उर्दूपरस्तों को समान रूप से सुखी-दुखी करेगा।
  • Ek Jala Huaa Ghar
    Iqbal Mazeed
    140 126

    Item Code: #KGP-1837

    Availability: In stock

    एक जला हुआ घर
    आज के पाठक को जिन चीज़ों को दुनिया में, अपने आसपास या अपने भीतर भी देखकर जो हैरत-सी होती है, यह उन्हीं हैरतों की कहानियाँ हैं।
    साहित्य को इनसान से, समाज से, जीवन से, संस्कृति और राजनीति से नए संबंध स्थापित करने पर प्रगतिशील आंदोलन ने जो ज़ोर दिया था यह उन्हीं संबंधों द्वारा जीवन के सौंदर्य, उसकी उठान और उभार को समझने का एक प्रयास है।
    कहानी का यथार्थ समाचार-पत्रों और अदालतों में प्रस्तुत किए गए यथार्थ से कैसे अलग होता है उसके लिए यह अंतर जानना, जो फिक्शन से जुड़ाव नहीं रखता, मुश्किल है। इसके अतिरिक्त कोई दावा करना या कहानियों से यह उम्मीद करना कि वह गलत होने वाली चीजों को ठीक कर देंगी, मूर्खता है; क्योंकि हर चीज़ साहित्य से ठीक नहीं की जा सकती। देखना यह होगा कि साहित्य, जिसका आधार Joy of understanding होता है, ये कहानियाँ अपने पाठक को वह आनंद कितना दे पाने में समर्थ हैं और इस काम में लेखक की ओर से डंडी तो नहीं मारी गई है। अगर इन कहानियों में उस सुंदरता और शक्ति की खोज मिल जाए, जिनको नए सांस्कृतिक मूल्यों में स्थान मिल सके तो यह लेखन सफल है।
  • Thank You! Saddaam Husain
    Kshma Sharma
    75 68

    Item Code: #KGP-9076

    Availability: In stock


  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Sapt Aadarsh Mahilayen
    Chandrika Prasad Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-9298

    Availability: In stock

    भारत वर्ष की महिलाएं विश्व में अपने त्याग, तपस्या और औदार्य के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका गौरवशाली व्यक्तित्व प्रत्येक क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ता रहा है। अपने अद्ीाुत त्याग, तपस्या और सेवा-भाव के कारण उन्हें ‘देवी’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। यहां यह उक्ति प्रसिद्ध है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।’
    सीता ने वन-वन अपने प्राणनथ राम के साथ कष्ट झेलकर भारतीय नारी के गोरवपूर्ण चरित्र को विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया। सावित्री के तपोबल ने यमराज से अपने पति को वापस ले लिया। गार्गी ने शास्त्रज्ञान को प्रस्तुत करके याज्ञवल्क्य को दुविधा में डाल दिया था। अपाला ने तपोवन से अपने शरीर को स्वर्ण जेसा सुंदर बना लिया था। अनसूया ने सतीत्व की महिमा के बल पर त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु, महेश को शिशु रूप देकर पालने में झुलाया था। भारती देवी ने अपने अद्भुत ज्ञान के बल पर शंकराचार्य को असमंजस की स्थिति में डाल दिया था और राम को जूठे-मीठे बेर खिलाकर शबरी ने नवधा शक्ति का ज्ञान प्राप्त किया था।
    इस पोथी में इन उपर्युक्त महिमापूर्ण महिलाओं का आदर्श चरित्र प्रस्तुत कर लेखक ने भारतीय नारी के श्रद्धा रूप को प्रस्तुत किया है।
    —चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा
  • Hamare Jeevan Moolya-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1157

    Availability: In stock


  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Sikha Acharshastra
    Satayendra Pal Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-453

    Availability: In stock

    सिख गुरु साहिबान ने मानवता पर सबसे बड़ा परोपकार किया धर्म को धीर-गंभीर शब्दों के इंद्रजाल और कर्मकांडों के भंवर से मुक्त करके। उन्होंने कहा कि ऐसा पांडित्य और विद्वत्ता व्यर्थ है, खच्चर पर लदे भार व कुंचर स्नान की तरह, यदि इंद्रियां वश में नहीं और आचरण शुद्ध-पवित्र नहीं। इसका एक मात्र उपाय है परमात्मा की शरण में उसकी कृपा प्राप्ति जिससे मन ज्ञान के सूर्य से उद्दीप्त हो उठे। धर्मानुकूल आचार के लिए मन पर सतिगुरु ज्ञान का अंकुश आवश्यक है। सार्थक-सफल जीवन योग्य ज्ञान-चक्षु प्राप्त करने की जो राह सिख गुरु साहिबान ने दिखाई उस ओर ले चलने का संपुष्ट प्रयास है यह पुस्तक जिससे सभी वैयक्तिक व सामाजिक प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं।
  • Bhartiya Thal Sena : Badhate Kadam
    A. K. Gandhi
    380 342

    Item Code: #KGP-9308

    Availability: In stock

    अनुशासन, देशप्रेम, स्वाभिमान, सेवा, उत्सर्ग और शौर्य का प्रतीक भारतीय सेना पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। धरती, आकाश और जल मार्गों पर किसी तपस्वी की भाँति एकाग्र भारतीय सेना की गौरवगाथा जितनी लिखी जाए उतनी कम है।
    प्रस्तुत पुस्तक भारतीय थल सेना: बढ़ते कदम में ए. के. गाँधी ने इस अनूठे व अप्रतिम सैन्य संगठन के विविध पक्षों पर प्रामाणिक व रोचक ढंग से लिखा है। गाँधी स्वयं भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं, इसलिए उनके विवरण में तथ्यात्मकता और सूक्ष्मता है।
    लेखक ने भारतीय थल सेना के महत्त्व को कई कोणों से विवेचित किया है। भारतीय थल सेना के गौरवपूर्ण इतिहास और उसकी उपलब्धियों  को पढ़ते हुए किसी भी भारतीय का मन गर्व से भर जाएगा। सरहद पर देश की रक्षा करने के साथ आवश्यकता होने पर देश के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा या सहायता के लिए सेना तत्पर रहती है। राष्ट्रीय पर्वों और विभिन्न खेलों में इसका हुनर और हौसला रोमांचित कर देता है। असंभव को संभव बनाने की कला भारतीय सेना को आती है।
    प्रस्तुत पुस्तक के अध्ययन से पाठक भारतीय थल सेना के प्रति अधिक आत्मीयता का अनुभव करेगा। भारत के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक होने के कारण इसमें आजीविका के अवसर भी तलाशे जाते हैं। इस प्रयोजन से भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि पुस्तक एक गौरवशाली संगठन में चयन की विधियों पर भी सम्यव्फ प्रकाश डालती है। 
  • Bhasha Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhasha
    Bholanath Tiwari
    500 450

    Item Code: #KGP-636

    Availability: In stock

    भाषा विज्ञान प्रवेश एवं हिंदी भाषा
    डॉ.  भोलानाथ तिवारी लब्धप्रतिष्ठ भाषाविज्ञानी हैं। प्रस्तुत पुस्तक में उन्होंने भाषा विज्ञान को सरल और सहज रूप में प्रस्तुत किया है। भाषा विज्ञान के पारंपरिक विषयों के साथ-साथ नए विषयों व भाषा विज्ञान के नए आयामों को शामिल करते हुए उन्होंने पुस्तक की उपादेयता बढ़ा दी है।
    यह पुस्तक भाषा विज्ञान हेतु भारत के सभी विश्वविद्यालयों के लिए तो उपयोगी होगी ही, साथ ही केंद्र सरकार, सार्वजनिक उपक्रमों व बैंकों के राजभाषा अनुभागों तथा उनमें कार्यरत हिंदी से जुड़े अधिकारियों, सहायकों, अनुवादकों व भाषा से जुड़े प्रौद्योगिकीविदों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध होगी, क्योंकि इसमें भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा से जुड़े अद्यतन ज्ञान को सरल और संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया गया है। 
    यह पुस्तक भाषा से सरोकार रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए भी उपयोगी होगी, यह हमारा विश्वास है।
    इस पुस्तक में अद्यतन जानकारियाँ तथा जटिल संकल्पनाओं को भी इतने सरल ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि भाषा विज्ञान में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक के लिए भी यह उपादेय सिद्ध होगी।
  • Sun Mutiyare
    Santosh Shelja
    450 405

    Item Code: #KGP-133

    Availability: In stock

    सुन मुटियारे
    ‘सुन मुटियारे’ उपन्यास उस तरुणी (मुटियार) की कहानी है, जो जन्मी-पली पंजाब के गाँव में और पढ़ी-गुनी देश की राजधानी में। पंजाब भी ‘बंटवारे’ से पहले का पंजाब-जब अनबँटी जमीन थी और अनबँटे ही दिल थे...जब खेतों में भरपूर अनाज था और दिलों में भरपूर प्यार था...जब ‘पंज दरिया’ की धरती गाती-नाचती रहती थी।
    कथानक की धुरी तो है ‘मुटियार’, लेकिन उसके इर्द-गिर्द एक भरा-पूरा परिवार है, समाज है, जिसमें विविध पात्र हैं—गाँव के भी, शहर के भी। उनकी हँसी और आँसू, समस्याएँ और समाधन, सुख और दुःख—सब कुछ ऐसे साथ जुड़ा चला आता है, जैसे कवि के शब्दों में—‘जस केले के पात में छुपे पात दर पात।’ इस प्रकार कथानक का मुख्य पात्र एक नहीं रहता, बल्कि अनके पात्रों के रूप में प्रकट होता हैं अतएव यह कहानी जीवन के विराट् पट पर रंग-बिरंगे धगों से बुनी रंगीन चादर ‘फुलकारी’ की तरह उभरती है। इसका एक सिरा पंजाब के गाँव से जुड़ा है तो दूसरा राजधानी के महानगर से। इसीलिए कहानी में गाँव के लोकगीत और पंजाबी भाषा के शब्द स्वयमेव ही आ गए हैं, जैसे सावन की घटाओं के साथ मोर का नृत्य और कोयल की कुहुक आ जाती है।
  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • Ghanchakkar
    Nisha Bhargva
    225 203

    Item Code: #KGP-1805

    Availability: In stock

    व्यंग्य-लेखन की प्रवृत्ति आधुनिक युग की देन है। पिछले चंद दशकों में समाज में विषमताओं, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं, विसंगतियों, स्वार्थपरता का जो सैलाब आया है वह अभूतपूर्व है। ऐसी परिस्थितियों में स्वाभाविक है कि जागरूक लेखक व्यंग्य की ओर उन्मुख हो । यहाँ इस ओर संकेत करना भी आवश्यक है कि व्यंग्य-साहिंत्य के क्षेत्र में लेखिकाओं की उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज नहीं हो पाईं। गिनी-चुनी हास्य-व्यंग्य को बहुचर्चित कवयित्रियों में निशा भार्गव का नाम विशेष रूप से उभरकर आया है।
    निशा भार्गव की कविताओं में हास्य-व्यंग्य के साथ ही एक अतिरिक्त तत्त्व भी विद्यमान है। उनकी कविता में तीखे प्रहार के साथ ही अच्छे संस्कार की पैरवी भी मौजूद है । उनकी कविताओं में सामाजिक, परिवारिक, राजनीतिक आडम्बरों को तो निपुणता के साथ बेनकाब किया ही गया है, स्वस्थ समाज के निर्माण का आह्वान भी किया गया है। उनकी रचनाएं ठोस सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत हैं।
  • Samrat Chandragupta Mourya
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-257

    Availability: In stock


  • Khabar
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    1150 1035

    Item Code: #KGP-584

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Alamshah Khan
    Aalam Shah Khan
    270 243

    Item Code: #KGP-744

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार आलमशाह खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पराई प्यास का सफर', 'आवाज की अरथी', 'मुरादों भरा दिन है', 'दंड-जीवी', 'मेहंदी रचा ताजमहल', 'लोहे का खून', 'तिनके का तूफान', 'पग-बाधा', 'किराए की कोख' तथा 'पंछी करे काम' । संपादक द्वारा लिखी गई पुस्तक की भूमिका के माध्यम से आलमशाह खान की समग्र कथा-यात्रा और उसके महत्त्व से भी सहज ही परिचित हुआ जा सकता है।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक आलमशाह खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Anandmay Jeevan Kaise Payen
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-282

    Availability: In stock


  • Idannamam
    Maitreyi Pushpa
    500 450

    Item Code: #kgp-2003

    Availability: In stock

    इदन्नमम
    समकालीन कथा-लेखन में सक्रिय एक सशक्त हस्ताक्षर मैत्रेयी  पुष्पा की कलम से निकली औपन्यासिक कृति इदन्नमम से बुनी गई है तीन पीढियों की बेहद सहज और संवेदनशील कहानी । कहानी जो बऊ (दादी), प्रेम (माँ) और सदा (उपन्यास की नायिका)--तीनों को समानांतर रखने के साथ-साथ, एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा भी करती है । विरोधाभास की इस प्रतीति को लेखिका ने सक्षमता, सूक्ष्मता और पारदर्शी भाषाजाल से बुना है, जो अत्यंत पठनीय है और अपने स्वर में मौलिक भी।
    इदन्नमम के आँचल से छिपा है विंध्य का अंचल । विंध्य की पहाडियों से घिरे वर्णित गांव श्यामली और सोनपुरा के जन-जीवन की जीवंत धड़कनों को यह उपन्यास सांस-दर-सांस कहना है और पाठक को लगता है मानो यह पूरे अंचल में कदम-कदम चल रहा है । इन गाँवों में-अंचल से धूल है, नदी है, पर्व  है, गीत है, आहें-कराहें हैं, सत-असत है और है रूढियों और परंपराओं की भरी-पूरी दुनिया । उपन्यास के अंचल की इस दुनिया से आकांक्षा है, ईषर्या है और उन पर झपटते भेड़िये हैं, उन्हें त्यागते 'साधु' हैं तथा हैं हाढ़-मांस के सौ फीसदी पात्र ! शोषित होने से इंकार करते ये पात्र इस उपन्यास की अतिरिक्त विशेषता हैं ।
    वरिष्ट कथाकार राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहें तो इदन्नमम में "मिट्ठी-पत्थर के ढोकों या उसी डालियों और खुरदुरी छाल के आसपास की सावधान छटाई करके सजीव आकृतियाँ उकेर लेने की अद्भुत निगाह हैं लगभग "रेणु" की याद दिलाती हुई ।"
    वास्तव में घनीभूत संवेदना और भावनात्मक लगाव से लिखी गई इदन्नमम की कहानी समकालीन हिंदी उपन्यास जगत् में एक घटना है, जिसका स्वागत किया जाना अभीष्ट है ।
  • Ye Galion Ke Bachche
    Rekha Rajvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9119

    Availability: In stock

    इस किताब में गलियों के बच्चों की कहानियां, कहानियां नहीं बल्कि एक कड़वा सच है । बेतरतीब बिखरे पन्नों को समेटकर इन बच्चों के जीवन की वास्तविकता को सबके समक्ष लेन का इसमें प्रयास किया गया है । छह अध्यायों के माध्यम से इन बच्चों की जीवनगाथा को सुधी पाठकजनों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है । 
    यह अध्याय गलियों के बच्चों की समस्याओं को उजागर करने के लिए किया गया छोटा-सा प्रयास है । 
  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Das Pratinidhi Kahaniyan : S.R. Harnot (Paperback)
    S. R. Harnot
    180

    Item Code: #KGP-7214

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Bistar Aur Aakaash
    Ramakant
    50 45

    Item Code: #KGP-2094

    Availability: In stock

    बिस्तर और आकाश
    रमाकांत को निम्नमध्यवर्ग के जीवन का चितेरा कहा जाता रहा है । उनकी रचनाओं में शहरी निम्नमध्यवर्ग को जितना स्थान मिला, उतना और किसी के साहित्य में दुर्लभ है ।
    समस्या नई बस्तियों में बसने आये कमजोर आय वर्ग के लोगों की हो या कस्बों से नौकरी के सिलसिले में आये लोगों की-रमाकांत ने अपनी रचनाओं में उनकी आर्थिक, मानसिक, सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों का बारीकी से चित्रण किया है ।
    आकस्मिक मृत्यु से पूर्व के कई वर्ष रमाकांत ने स्वतंत्र लेखन में गुजारे, और इस दौर में साम्यवाद के पतन और असफलता के कारणों की पड़ताल कर एक बृहद उपन्यास लिखा ।
    संभवत: उस बडे प्रयोजन में जुट जाने के चलते इन तीन लघु उपन्यासों को पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं किया जा सका । बहरहाल, बिस्तर और आकाश, मैं, अकेले में, और एक विपरीत कथा शीर्षक ये आकार से छोटे लेकिन कथा में बडे तीन उपन्यास पाठको को अपने जाने-माने रचनाकार की मकम्मल मौजूदगी का अहसास करवाएँगे ।
  • Vriksh Tha Hara-Bhara
    Surendra Tiwari
    150 135

    Item Code: #KGP-1886

    Availability: In stock

    सुश्री ममता किरण के कविता-संग्रह ‘वृक्ष था हरा-भरा’ की टंकित प्रति देख गया। उनकी कविताओं से यह मेरा पहला परिचय था। पहला प्रभाव यह पड़ा मेरे मन पर कि प्रचलित लोकप्रिय कविता और सुपरिचित समकालीन कविता के बीच से एक रास्ता निकालने की कोशिश इनके यहाँ दिखाई पड़ती है। यह कोशिश दिलचस्प है और इसलिए सहज पठनीय भी। यहाँ दो प्रकार की कविताएँ देखने को मिलीं। एक जो बाकायदे गीत की शैली में लिखी गई हैं और दूसरी वे जो मुक्त छंद को माध्यम बनाकर लिखी गई हैं।
    इस संग्रह में जहाँ जाकर मैं रुका, वह ‘संबोधन’ शीर्षक कविता थी, जिसमें ये पंक्तियाँ आती हैं--
    कंक्रीट के इस जंगल में
    एकदम अप्रत्याशित
    एक बुजुर्ग से अपने लिए
    बहूरानी संबोधन सुनकर
    जिस तरह मैं चौंकी
    उसी तरह अनायास
    श्रद्धा से झुक भी गई
    बहूरानी कहने वाले के सामने
    इन पंक्तियों में एक मानवीय संस्पर्श है जो अच्छा लगता है। कहीं-कहीं एक शुभाकांक्षा की प्रतिध्वनि भी सुनाई पड़ती है कुछ पंक्तियों में और शायद इस रचनकर्त्री की कविता का मूल स्वर भी यही है। अपने अस्तित्व से नदियों-पोखरों और झीलों को भर देने के आवेग के साथ-साथ ‘प्यार का पैगाम’ बन जाने और ‘बुझे चूल्हों की आँच’ बन जाने की स्त्रीसुलभ संवेदना भी यहाँ दिखाई पड़ सकती है। अपने इसी मूल स्वर के कारण यह संग्रह प्रेमी पाठकों तक पहुँचेगा, ऐसा मुझे लगता है।
    ---केदारनाथ सिंह
  • Idhar Ki Hindi Kavita
    Ajit Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9130

    Availability: In stock

    ‘कविता का जीवित संसार’ (1972) के बाद ‘इधर की हिंदी कविता’ (1999) अजित कुमार के लेखों का दूसरा संग्रह है। कविता की अपनी व्याख्या को उन्होंने पहले संग्रह में ‘स्नेहमयी व्याख्या’ नाम दिया था, जिसका मतलब कुछ लोगों ने यह निकाला कि कविता उनके लिए एक घरेलू मामला है।
    अब यदि वे ‘इधर की हिंदी कविता’ प्रकाशित कर रहे हैं तो पहला प्रश्न यही उठेगा कि ‘इधर’ की व्याप्ति किधर तक है? इसका एक उत्तर यह होगा कि ‘इधर’ वहां तक है, जहां से ‘उधर’ शुरू होता है। उत्तर और भी हो सकते हैं, वैसे ही जैसे कि प्रश्न अनेक होंगे।
    उनमें से किन्हीं को समझने और अपने तईं सुलझाने की कोशिश इन लेखों में हुई है। संभव है, वह आधी-अधूरी कोशिश हो, जिसका कुछ कारण इस स्थिति में देखा जा सकता है कि अजित कुमार अपने को समीक्षकों के बीच कवि और कवियों के बीच समीक्षक पाते रहे हैं। संभव तो यह भी है कि इसी नाते उन्हें निराला प्रिय हों, जिनका खयाल था-
    ‘बाहर मैं कर दिया गया हूं।
    भीतर, पर, भी दिया गया हूं।’
    कौन जाने, अपठनीयता की मारा-मारी में पठनीयता का यह हस्तक्षेप दमघोंटू माहौल में ताजी हवा के एक झोंके-सा मालूम हो।
  • Na Dainyam Na Palaynam
    Atal Bihari Vajpayee
    120 108

    Item Code: #KGP-33

    Availability: In stock

    सचाई यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकती । ऐसी राजनीति, जिसमें प्राय: प्रतिदिन भाषण देना जरूरी है और भाषण भी ऐसा जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके, तो फिर कविता की एकान्त साधना के लिए समय और वातावरण ही कहीं मिल पाता है । मैंने जो थोडी-सी कविताएँ लिखी है, वे परिस्थिति-सापेक्ष हैं  और आसपास की दुनिया को प्रतिबिम्बित करती हैं ।
    अपने कवि के प्रति ईमानदार रहने के लिए मुझे काफी कीमत चुकानी पडी है, किन्तु कवि और राजनीतिक कार्यकर्ता के बीच मेल बिठाने का मैं निरन्तर प्रयास करता रहा हूँ । कभी-कभी इच्छा होती है कि सब कुछ छोड़-छाड़कर वहीँ एकान्त में पढ़ने, लिखने और चिन्तन करने में अपने को खो दूँ, किन्तु ऐसा नहीं कर पाता ।
    मैं यह भी जानता हूँ कि मेरे पाठक मेरी कविता के प्रेमी इसलिए हैं कि वे इस बात से खुश है कि मैं राजनीति के रेगिस्तान में रोते हुए भी, अपने हृदय में छोटी-सी स्नेह-सलिला बहाए रखता हूँ ।
    --अटल बिहारी वाजपेयी
  • Is Khirki Se
    Ramesh Chandra Shah
    425 383

    Item Code: #KGP-711

    Availability: In stock

    इस खिड़की से
    ‘इस खिड़की से’...यानी ‘अकेला मेला’ के ही नैरंतर्य में एक और मेला, एक और समय-संवादी आलाप...जो एकालाप भी है, संलाप भी, मंच भी, नेपथ्य भी...
    ‘अकेला मेला’ देखते-सुनते-गुनते...कुछ प्रतिध्वनियाँ ...कतिपय पाठक-समीक्षक मंचों से...अब इस खिड़की से जो दिखाई-सुनाई देने वाला है--मानो उसी की अगवानी में।
    ०० 
    डायरी-लेखन को साहित्य का गोपन कक्ष कहना अतिशयोक्ति न होगी।...काफ्का, वाल्टर बेन्यामिन जैसे कई लेखकों ने डायरी विधा के अंतर्गत श्रेष्ठ लेखन किया। मलयज या निर्मल वर्मा की डायरी उनके समस्त लेखन को समझने का उचित परिप्रेक्ष्य देती है। डायरी- लेखन की इसी परंपरा में नई प्रविष्टि है रमेशचन्द्र शाह की डायरी ‘अकेला मेला’। इस डायरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखक में कहीं भी दूसरों को बिदका देने वाली आत्मलिप्तता नहीं। 
    --हिंदुस्तान 
    शाह केवल डायरी नहीं लिखते, वे अपने समय से संवाद करते दिखाई देते हैं। उनकी डायरी की इबारतें ऐसी हैं कि एक उज्ज्वल, संस्कारी अंतरंगता मन को छूती हुई महसूस होती है।...यह डायरी एक ऐसा ‘ग्लोब’ भी बनकर सामने आती है, जो मनुष्य की बनाई सरहदों को तोड़ती हुई शब्द-सत्ता का संसार रचती है, जिसमें दुनिया के महान् रचनाकारों की मौजूदगी को भी परखा जा सकता है। डायरी में शाह ने अपने विषय में अपेक्षाकृत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है, वह एक विनम्र लेखक की शाइस्ता जीवन-शैली की ही अभिव्यक्ति है।
    --कादम्बिनी
    एक अकेला लेखक कितनी तरह के लोगों के मेले में एक साथ! कितनी विधाओं और कृतियों में एक साथ!...और कितनी आत्म-यंत्रणाओं और मंत्रणाओं में एक साथ!
    --जनसत्ता
  • Divangat Vriksh Ka Geet
    Jagmohan Singh Rajput
    125 113

    Item Code: #KGP-1568

    Availability: In stock

    दिवंगत वृक्ष का गीत
    जीवन के कई धु्रवांतों पर अपनी बौद्धिक उपस्थिति और प्रशासनिक दक्षता रेखांकित कर चुकने के बाद अकस्मात् एक अजनबी की तरह कविता के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति जताना, प्रत्येक उस भावाकुल मन की लाचारी होगी जो मानता हो कि जीवन न तो बुद्धि-व्यवसाय है, न ही कोरा भाव-विलास ही। कविता की कला को भी काव्य-विवेक की जरूरत पड़ती है जैसे कि भावावेगों के विस्फोट को जीवन-विवेक की। इन कविताओं में यह ‘विवेक’ साफ-साफ अनुभव किया जा सकता है।
    यथार्थ, शास्त्रीय यथार्थ, पंजीकृत और सूचीबद्ध यथार्थ के पार के यथार्थ का सीधा-सच्चा बयान करती ये कविताएँ उस संवेदनशील चित्त की देन हैं जो प्रत्येक पल सचेत और भाव- प्रखर रहा है। कविता अंततः भाव-प्रखरता ही तो है। व्यक्ति, समाज, समय और राजनीति का प्रति-अक्स रचती ये रचनाएँ उस कवि की कृतियाँ हैं, जो मूलतः सर्जक होकर भी अपने इस दावे की घोषणा नहीं ही करता रहा है। हिंदी कविता के पाठक ही तय करेंगे कि दावे का यह हक उसका बनता है या नहीं।
    मेरे भरोसे की ये कविताएँ उन जीवन-सत्यों और अनुभवों से लदी-फँदी हैं, जिन्हें तमाम जाने-पहचाने समकालीन कवियों ने औसत और मामूली समझकर दरकिनार कर दिया था। या फिर उनके देखने लायक अनुभव नहीं थे ये। जगमोहन सिंह राजपूत ने ज्यादातर मनमौज में आकर कहते-कहते कुछ ऐसा कह डाला है, जिसे कविता के सिवाय और कुछ भी कहना मुश्किल है। कहने में अपनी बेइंतहा सादगी, कथ्यों में असंदिग्ध भरोसेमंदी और रूपाकार में जानी-पहचानी नैसर्गिकता के चलते ये कविताएँ न तो वाम हैं, न दक्षिण। फिर भी, अगर कहना ही पड़े तो यही कि लोकपरकता ही इनका असली चरित्र है। भाषा, उसके मुहावरे और अभिव्यक्ति में भी ये उसी लोक की हैं जो किसी को भी अपने स्पर्श से कवि बना डालता है।
  • Basant Bayar
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-1807

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य की एक सशक्त विधा है। नवरसों को संजोए ये कहानियां पाठक के मन को हलराती-दुलराती, हंसाती, रुलाती, गुदगुदाती और स्पंदित करती हैं । आसपास की विसंगतियों को रेखांकित करती, दलदल में भी जीवन के पद और सूत्र ढ़ूंढ लेती है । विभिन्न जीवन दशाओं के उकेरती, जीने की सही दिशा देती हैं । कहानी कहना भी एक कला है ।
    हंसाना एक कला है । जो हंसा सकता है, उसमें रुलाने की भी भरपूर ताकत होती है। आँसू, भावनाओं का सिंचन करते है । रचना के लिए भावों का सिंचन आवश्यक है । इसलिए तो मनुष्य जीवन में हंसने-हंसाने के साथ रोने-रुलाने का भी महत्व है।
    निशा भार्गव को कहानियां, मानो हंसाते-हंसाते रुला देती हैं । जीवन की विसंगतियों पर हंसाती, जीवन का सत्य बखान कर जाती हैं । 'बसंत बयार' संग्रह की कहानियां निशा भार्गव के दादी बनने को उम्र में भले ही प्रकाशित हो रही हैं, लेखिका की उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उसे ही उद्वेलित, रोमांचित और सुखाश्चर्य से भरती रहीं हैं । आसपास में बिखरे, टूटते-बिखरते-जुड़ते पारिवारिक ताने-बानों की ये कहानियां हैं। संग्रह को यही विशेषता है।
    एक-एक कुटुम्ब (परिवार) को दुरुस्त करके ही पुन: "वसुधैव-कुंटुम्बकम्" का भारतीय सनातन आदर्श सार्थक होया।  ये कहानियां कुछ ऐसा ही प्रयास करती दिखती हैं। निशा भार्गव की उनकी अर्थवान कहानियां और लेखकीय ईमानदार प्रयास के लिए बधाइयाँ । पाठकों से अपेक्षा है कि वे पढे, गुने और पन्नों पर बिखरे जीवन जोड़ने वाले तत्वों को सहेज लें ।
  • Shakti Kanon Ki Leela
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-1993

    Availability: In stock

    शक्ति कणों की लीला
    सोच की इकाई के तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी... 
    बात चाहे जिस्म की किसी काबलियत की हो, या मस्तक की किसी काबलियत की पर दोनों तरह की काबलिया के एक दूसरी की मुखालिफ़ करार देकर, एक को 'जीत गई' और एक को 'हार गई' कहने वाली यह भयानक साजिश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई... 
    और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुकाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुकाबले तक ग्रहणित है... 
    पर इस समय मैं जहनी काबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से 'शास्त्रार्थ' का नाम दिया जा रहा है ।
    अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने  के लिए नहीं होते । वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरो मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं ताकि हमारी प्राप्तियां बड़ी हो जाएँ ... 
    अदबी मुलाकातें दो नदियों के संगम हो सकते है पर एक भयानक साजिश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए... 
    ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियां सूखने लगीं...  नदियों की आत्मा सूखने लगी... 
    जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई... 
    अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है... 
  • Vaigyanikon Ki Batein (Paperback)
    Shuk Deo Prasad
    50

    Item Code: #KGP-7085

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Deshraag
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-9306

    Availability: In stock

    ‘देशराग’ सुविज्ञ और सुप्रतिष्ठित कवि-आलोचक-संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अध्ययन व मनन को रेखांकित करती एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। रचना के अपूर्व आयाम विकसित करने के साथ-साथ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘दस्तावेज़’ जैसी उल्लेखनीय साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते हुए शब्द की संस्कृति को शिखर तक पहुंचाया है। यह पत्रिका संतुलित, सकारात्मक व संपन्न सामग्री के लिए तो प्रशंसित है ही, इसके संपादकीय प्रत्येक पाठक की अमूल्य धरोहर हैं। ‘देशराग’ में कुछ ऐसे ही विचारोत्तेजक संपादकीय संगृहीत हैं।
    राजनीति, समाज और साहित्य के विविध पक्षों पर ‘दस्तावेज़’ के इन संपादकीयों में विचार किया गया है। लेखक के शब्दों में, इन टिप्पणियों में साहित्य, संस्कृति, भाषा, समाज और व्यक्तियों के प्रति जो कुछ भी व्यक्त हुआ है, वह गहरे देशराग के ही कारण। भारत का साधरण आदमी और उच्चतर मूल्य ही इन टिप्पणियों का पक्ष रहा है और उसे संकट में डालने वाला सब कुछ विपक्ष। भाव का जो अंश रचना में ढलने से रह गया, वही इस सीधे कथन के रूप में व्यक्त हुआ।
    विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने इन लेखों के माध्यम से स्वस्थ विमर्श का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे ‘निर्णयात्मक’ होकर विचार नहीं करते। एक चिंतन प्रक्रिया चलती है, तर्क मुखर होते हैं, पक्ष-विपक्ष प्रकट होते हैं, व्यापक सामाजिक निहितार्थ खुलते हैं–तब कोई निर्णय उपलब्ध होता है। भाषा में वे सारे तत्त्व हैं जिनसे मिलकर ‘हिंदी जाति का तेजस्वी गद्य’ बनता है। 
    देश और उसमें गूंजने वाली प्रशस्त सामाजिकता के राग को चीन्हने के लिए ‘देशराग’ बहुमूल्य पुस्तक है।
  • Gehoon Ghar Aaya Hai
    Divik Ramesh
    175 158

    Item Code: #KGP-1893

    Availability: In stock

    गेहूँ घर आया है
    ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित हिंदी कवि दिविक रमेश बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। 38 वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच’ और ‘खुली आँखों में आकाश’ कविता-संग्रहों पर सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलना उनकी कविताओं की महत्ता को रेखांकित करता है। उनकी अब तक की कविता-यात्रा को इस संग्रह में हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने अपनी रुचि के अनुसार चुनिंदा ढंग से प्रस्तुत किया है। निःसंदेह इससे पाठकों का एक बड़ा हित सधेगा।
    युवा कवि हेमंत कुकरेती की धारणा है कि दिविक रमेश की "कविताओं में हम जिंदगी से प्यार करने वाले मन को महसूस कर सकते हैं। वह सुख-दुःख से रची ज़िंदगी में डूबकर ही जीवन का वास्तविक अर्थ हासिल करता है। इसीलिए उसका संबोधन सीधे पृथ्वी, काल, हवा, रात, धूप और अंततः जीवन से है। आसानी से समझ में आने वाली ये कविताएँ किताबी अनुभववाद का भाषानुवाद नहीं हैं। सरलीकरण से बचते हुए दिविक रमेश जीवन की जटिलताओं को आसानी से कह देते हैं और उनका इतना सहज और स्वाभाविक होकर कहने में सफल होना कई बार हैरत में डालता है...।" (‘इंडिया टुडे’, 10 जनवरी, 2001)
    और ‘छोटा-सा हस्तक्षेप’ की कविताओं पर बोलते हुए प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा--इस संग्रह को पढ़कर उन्हें प्रीतिकर आश्चर्य हुआ। कवि दिविक रमेश ने बहुत लंबी छलाँग लगा दी है। कविताओं में कई तरह की आवाजें हैं। जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, ये कविताएँ उनसे हटकर हैं। दिविक रमेश ने कविता की एक नई आवाज़ विकसित कर दी है। अशोक वाजपेयी और विष्णु खरे जैसे रचनाकारों ने इन कविताओं को सराहा है। ‘यात्रांत’ एक अद्भुत कविता है। रूस पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन रूस के अनुभव पर लिखी गई कविता बहुत ही बारीक है। हिंदी में पहली बार ऐसी कविता संभव हुई है। हिंदी में ‘भूत’ जैसी कविता नहीं है। फैंटेसी की बहुत बात की जाती है, लेकिन फैंटेसी यहाँ देखिए। यह एकमात्रा ऐसा संग्रह है, जिसमें एक साथ दर्जन से ऊपर उत्कृष्ट कविताएँ हैं।   
  • Namaskar Bharat Mera Mahan
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-314

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh
    Sushil Sidharth
    500 450

    Item Code: #KGP-9217

    Availability: In stock

    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 
  • Maharishi Dayanand Saraswati
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-536

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती उन महान विभूतियों में थे, जिन्होंने राष्ट्रोत्थान के कार्य में महती भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में स्वामी दयानंद का कार्य स्तुत्य रहा । उन्होंने वैदिक धर्म की ज्योति को भारत के कोने कोने में प्रकाशित किया । महर्षि दयानंद ने जिस आंदोलन का सूत्रपात किया उसकी ओर देश की जनता  उत्साह के साथ बढ़ी। वास्तव में स्वामी दयानंद ने उस कार्य को अपने हाथ में लिया जिसकी काफी समय से उपेक्षा होती चली आ रही थी ।
    आर्यसमाज की स्थापना द्वारा स्वामी दयानंद ने सोती हुई हिंदू जाति को जगाया, उनको आगे बढने की दिशा दिखाई और उसकी रुचि सुधार की ओर ले गए । स्वामी दयानंद सरस्वती वर्तमान भारत के एक प्रमुख विचारक और चिंतक थे । धर्म, नीति, दर्शन, सामाजिक संगठन और राज्य-व्यवस्था आदि पर उन्होंने जो विचार समाज के सम्मुख प्रस्तुत किए, वे सर्वथा नूतन ओर क्रांतिकारी थे । वे धार्मिक सुधारों द्धारा समाज और राष्ट्र का सुधार करना चाहते थे । आर्यसमाज को स्वामी जी ने एक ऐसा स्वरूप दिया कि उसने जन-आंदोलन का सक्रिय रूप धारण कर लिया । वे वैदिक धर्म को अभिनव स्वरूप देने में सफल हुए । उनके विचारों ने पूरे समाज को जगा दिया ।
  • Mahamana Pandit Madan Mohan Malviya
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-9326

    Availability: In stock

    महामना पं. मदनमोहन मालवीय एक प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक थे। वे राष्ट्रवाद को सर्वोच्च स्थान देते थे। हिंदू धर्म का गहन अध्ययन करने वाले पं. मालवीय देश की जनता को राष्ट्रवाद का परम हितैषी एवं शुभेच्छु मानते थे।
    वे संस्कृत और हिंदी के प्रकांड पंडित थे। उनका ज्ञान अपरिमित था। वे हिंदू संस्कारों के परम विद्वान् थे। उनको वाणी का अद्भुत वरदान प्राप्त था। उनकी भाषणकला पर सभी मुग्ध हो जाते थे।
    पूज्य मालवीय जी को वेदों, शास्त्रों तथा अन्य महान् ग्रंथों का ज्ञान था। वे हिंदू समाज को संसार में नामवर बनाना चाहते थे। काशी हिंदू समाज को संसार में नामवर बनाना चाहते थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण कराके उन्होंने एशिया में सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय की स्थापना की। देश की स्वतंत्रता के लिए वे गांव-गांव घूमे थे। चैरी-चैरा के मुकदमे पर विजय पाकर उन्होंने ब्रिटिश शासन का मुंह काला कर दिया था। वे इतने लोकप्रिय थे कि जनता उन्हें बहुत अधिक मान-सम्मान देती थी।
    —चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा
  • Mere Saakshatkaar : Ashok Vajpeyi
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-2037

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अशोक वाजपेयी
    देश के सर्वाधिक विवादास्पद संस्कृतिकर्मी, कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी गत तीन दशकों से हिन्दी साहित्य और संस्कृति के परिदृश्य पर छाए हुए हैं। कविता और आलोचना के साथ-साथ समय साहित्य और कलाओं के प्रति बहुलतावाद के पक्षधर श्री वाजपेयी पर अब तक जितने वैचारिक हमले हुए हैं, वे यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि उनको भूलकर स्वातंत्र्योत्तर साहित्य की बहस अधुरी रहेगी ।
    'मेरे साक्षात्कार' श्रृंखला की यह पुस्तक उन तमाम आरोपों और बहसों का एक दस्तावेज है जो गत तीस वर्षों में होती रहीं है । इनमें अशोक वाजपेयी ने बहुत सफाई से अपने पर लगाए जाते रहे आरोपों का खंडन किया है और साहित्य की सार्थक भूमिका को रेखांक्ति किया है । बातचीत में शामिल मुद्दे वहीं है जो वर्षो से साहित्यिक परिदृश्य पर उठते रहे है । इन मुद्दों में कला और साहित्य की स्वायत्तता तथा उसकी प्रजातांत्रिकता, कलादृष्टियों की लोकतांत्रिकता का सम्मान, साहित्य की समाज-सापेक्षता, कलावाद की जरूरत, कविता और विचार का द्वंद्व , उत्तर-आधुनिकता की उपादेयता और जीवन में साहित्य के सरोकार जैसे मुद्दे इस पुस्तक में बसी मुस्तैदी से उठाये गए है जिनका सटीक, सार्थक और दोटूक ज़वाब देते हुए अशोक वाजपेयी ने अपनी संघर्ष-यात्रा की सार्थकता प्रमाणित की है । पशिचमी अवधारणओं पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने वाले कथित आलोचकों को भी वे करारा झटका देते है जब कहते है कि 'उत्तर- आधुनिकता भरत में प्राक आधुनिकता है ।'
    अशोक बाजपेयी हिन्दी ही नहीं देश के दो-तीन ऐसे आलोचकों- भावकों में हैं जिनके लिए कलाओं का भी उतना ही मूल्य है जितना कि साहित्य का । पुस्तक में कई स्थलों पर संगीत, नृत्य, रूपंकर आदि कलाओँ पर बात करते हुए श्री वाजपेयी ने कलाओं की पारस्परिक्ता और मित्रता के कई ऐसे सूत्रों का भी खुलासा किया है जिनकी चर्चा हाल में अधिक मुखर हुई है । कहना चाहिए कि यह पुस्तक अपनी बेबाकी और उपादेयता के कारण उन सबको पसंद आएगी जो साहित्य को महज़ हथियार नहीं, संख्या भी मानते हैं ।
  • Rashtra Kavi Ka Stri Vimrash
    Prabhakar Shrotiya
    150 135

    Item Code: #KGP-1543

    Availability: In stock

    स्त्री-जागरण और स्त्री-गरिमा को लेकर गुप्त जी ने जो रचनाएं लिखी, वे आज की जरूरत भी हैं, भले ही भिन्न रूप रंग-तेवर में। उन्हांने तभी महसूस कर लिया था कि स्त्री की समस्या सबसे पुरानी, सबसे जटिल लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है। गुप्त जी ने बड़े घर की नारियों से लगाकर साधारण घर-संसार की ऐसी नारियों का सृजन और पुनर्सृजन किया जो समाज के बहुकोणीय स्वरूप को प्रकट करती हैं। उनके माध्यम से गुप्त जी ने समाज, संस्कृति और मानवीय गुणावगुण रेखांकित किए हैं। उनके स्त्री-चरित्रों की विविधता, उनके अभिप्राय और मर्मस्पर्शिता समाज को शील और आचरण का आईना दिखाती है।
    स्त्री-विमर्श और नारी-सशक्तीकरण के युग में आज यदि हम गुप्त जी के नारी-पात्रों पर विचार करते तो हमें उनके माध्यम से उस संघर्ष और विमर्श का पता चलेगा जो बीसवीं शती के दूसरे-तीसरे दशक में कवि कर रहे थे। उनकी संवेदना, उदारता, प्रगतिशीलता और समय को भरोसे में लेकर समयातीत पहल की क्षमता रेखांकित की जानी चाहिए। इससे यह भी प्रकट होता है कि खड़ीबोली हिंदी के जन्मकाल से ही सामाजिक विकास और उन्नयन का वह आंदोलन प्रारंभ हो गया था जिसे हम 70-89 साल बाद उत्तर-आधुनिक विमर्श बना रहे हैं। हमारी भाषा, हमारे संघर्ष की प्रणाली और अभिव्यक्ति-शिल्प भले बदल गया हो, परंतु चिंता के बीज लगभग वे ही हैं। इस तरह देखने पर हिंदी की जीवट और अग्रगामिता का पता चलता है।
    गुप्त जी के स्त्री-चरित्रों और स्त्री-चिंतन पर यह छोटी-सी पुस्तक दरअसल नई उपजाऊं पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
  • Shankar Shesh : Samagra Naatak (3 Vols.)
    Shanker Shesh
    1600 1440

    Item Code: #KGP-725

    Availability: In stock

    शंकर शेष: समग्र नाटक (3 खण्डों में)
    डॉ. शंकर शेष हिंदी नाट्य साहित्य के अत्यंत प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। पार्थिव शरीर से हमारे साथ न होते हुए भी अपनी रचनाओं के माध्यम से वे निरंतर अपने पाठकों के मन में रहते हुए एक संवाद में लीन अनुभूत होते हैं। 
    डॉ. शेष ने लगभग बीस पूर्ण अंकी नाटक, एकांकी, उपन्यास और कुछ लेख आदि लिखकर साहित्यिक जगत् में जितनी प्रतिष्ठा अर्जित की, चलचित्र जगत् में पटकथा लेखक के रूप में वे उससे कम चर्चित नहीं रहे, बल्कि उनकी विशेषता रही कि उन्होंने सिनेमा जगत् में कम काम किया, किंतु उसके लिए कोई समझौता नहीं किया।
    प्रस्तुत ‘शंकर शेष: समग्र नाटक’ (तीन खंड) में उनके प्रकाशित-अप्रकाशित सभी नाटक-एकांकी संकलित हैं। केवल शेष वही रहा है, जिसका रूप इतना अधूरा था कि उसे पूरा करते तो फिर वह डॉ.  शेष का न रहकर संशोधक या पूरा करने वाले का हो जाता।
    डॉ.  शेष के जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ उनकी रचनाधर्मिता में भी वह उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है और वह व्यक्ति जितना सहज था, इसका प्रमाण भी उनकी रचनाओं में बिखरा पड़ा है। प्रस्तुत तीन खंडों में उनका नाटककार रूप संश्लिष्ट होकर पाठक के सामने आता है। 
    हमें आशा ही नहीं, विश्वास है कि इन खंडों में पाठकों को शंकर शेष की रचनात्मकता के कई स्तर और आयाम मिलेंगे।
  • Naaz
    Inaytullah
    80 72

    Item Code: #KGP-2098

    Availability: In stock


  • Rajendra Yadav Ne Jyoti Kumari Ko Bataye Swastha Vyakti Ke Beemar Vichar
    Rajendra Yadav
    290 261

    Item Code: #KGP-838

    Availability: In stock

    राजेन्द्र यादव ने ज्योति कुमारी को बताए स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार 
    लेखक के अनुसार यह पुस्तक इस अर्थ में विलक्षण है कि न तो यह आत्मकथा है, न आत्मवृत्त और न ही संस्मरणों का संकलन । तीन महीने बिस्तर पर निष्क्रिय पड़े रहने के दौरान जो कुछ उल-जलूल असंबद्ध तरीके से दिमाग में आता गया उसे ही कागज पर उतारने की कोशिश है । कोई भूला हुआ क्षण, गूंजता हुआ अनुभव या संपर्क में आए किसी का व्यक्तित्व । अंग्रेजी में ऐसे लेखन को रैम्बलिंग कहते हैं । हिंदी में शायद इसे भटकाव कहेंगे । बिना किसी सूत्र का सहारा लिए जहाँ मन हुआ वहां टहल आना । इस तरह की किसी और किताब का ध्यान सहसा नहीं आता । सब कुछ जो लिखा गया है बहुत तार्किक, सुसंबद्ध और विचारपक्व है ।
  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Raakshas
    Shanker Shesh
    75 68

    Item Code: #KGP-9107

    Availability: In stock

    राक्षस
    राक्षस एक जातिवाचक शब्द ही नहीं, मानसिकता द्योतक शब्द भी है। राक्षस वह है, जो सामान्य मानवीय स्वरूप के विरोध में रहता है ।
    इस नाटक में शंकर शेष ने मनुष्य की इसी वृत्ति को उभारा है । यहाँ रणछोड़दास, सुकालू और दुकालू ऐसे चरित्र हैं जो मनुष्य के भीतर छिपे प्रेम और द्वेष के संघर्ष को तीव्र करते है और फिर इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि–
    अब नहीं रुकेगा कमल फूल
    अब नहीं गिरेगी
    आने वाले कल की आँखों में धूल
    अब गाँव हमारा नहीं रहेगा
    जड़ पत्थर की नाँव 
    राक्षस अपनी पूरी अमानवीय स्थिति के साथ हमें इस आशा की स्थिति तक एहुंचाता है ।
    शकर शेष द्वारा लिखा गया एक सशक्त नाटक ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar
    Jainendra Kumar
    300 270

    Item Code: #KGP-2070

    Availability: In stock

    जैनेन्द्र कुमार

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना-अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Pratiraksha Aur Saamrik Neeti
    Narendra Mohan
    495 446

    Item Code: #KGP-899

    Availability: In stock

    प्रतिरक्षा व सामरिक नीति
    भारत आज एक परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है । भारत की मंशा अपनी परमाणु शक्ति  उपयोग शांतिपूर्ण कार्यों व आत्मरक्षा के लिए है । किसी भी देश की प्रतिरक्षा व सामरिक नीति वर्तमान और भावी खतरों के आयामों के निरंतर विश्लेषण पर आधारित होती है और भारत को भी इन्हीं आधारों को दृष्टिगत रखते हुए अपने को तैयार रखना होगा । निश्चित रूप से भारत के समक्ष पग-पग पर चुनौतियाँ हैं, लेकिन अपनी संकल्पशक्ति से विद्यमान  सभी चुनौतियों का सामना दृढ़ता व आत्मविश्वास से करेंगे । 
    –अटल बिहारी वाजपेयी 

  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Keet, Kitnay Rangeelay : Kitnay Niralay
    Premanand Chandola
    40 36

    Item Code: #KGP-9145

    Availability: In stock

    कीट : कितने रंगीले : कितने निराले
    जमीन, हवा, पानी-हर जगह रंगीले और निराले भाँति-भाँति के कीट अवश्य मौजूद मिलेंगे । छोटे-बड़े, नन्हे-मोटे, रेंगते-उडते हजारों प्रकार के कीट इस सृष्टि में भरे पड़े हैं। सचमुच ही बडे विचित्र हैं ये । हर प्रकार के वातावरण में रह लेते हैं और अपने आपको प्रकृति के अनुकूल ढाल लिया करते है । बड़े अजीबोगरीब प्राणी है ये कीट । सांस लेते हैं, लेकिन फेफडे नहीं । सुरीली तान छेड़ते हैं, लेकिन मुँह का कतई इस्तेमाल नहीं । सूँघते हैं, लेकिन नाक नदारद । सुनते हैं, लेकिन कान कहाँ । ये कोट मानव प्राणी के शत्रु भी हैं और मित्र भी । शत्रु वे, जो रोगकारी हैं और फसलों, पौधों, जानवरों-मवेशियों आदि को हानि पहुँचाते हैं । मित्र वे, जो हमारे लिए शहद, रेशम, लाख का उत्पादन करने, फूलों में परागण करने तथा हानिकारक कीटों को खाने, नष्ट करने का मोर्चा सँभालते है । मित्र कीटों का लालन-पालन मनुष्य अपने लाभ के लिए बड़े चाव से करता है और शत्रु कीटों के विनाश के लिए वह अनेक उपाय किया करता है ।
    प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ने शत्रु और मित्र कीटों का बहुत रोचक वर्णन किया है और उनके बारे में वैज्ञानिक तथा खोजपूर्ण जानकारी दी है ।
  • Theekare Ki Mangani
    Nasera Sharma
    245 221

    Item Code: #KGP-24

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Leeladhar Mandloyi
    Leeladhar Mandloi
    150 135

    Item Code: #KGP-227

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : लीलाधर मंडलोई
    लीलाधर मंडलोई अपनी पीढ़ी के उन थोड़े-से कवियों से अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने समय के वैचारिक दिभ्रमों से जूझते हुए, कविता के वृहत्तर सरोकार को बचाए रखने का उपक्रम किया है । पिछले तीस-बत्तीस वर्षों की काव्ययात्रा में उनका एक अलग स्वर उभरकर आया है ।
    हिंदी कविता में किसान चेतना की व्यापकता तो देखी जा सकती है, मगर मज़दूरों, खासकर औद्योगिक मज़दूरों की उपस्थिति सांकेतिक ही रही है । मंडलोई शायद पहली बार उसके जीवन-संघर्ष को, उसकी 'सफ़रिंग' को, उसकी करुणा को अपनी कविता में दर्ज करने में सफल हुए हैं । वे अपने बचपन को याद करते हुए मध्यप्रदेश की कोयला खदानों के उस यथार्थ को सामने लाते हैं जो श्रमिक संगठनों के दस्तावेजो तक में शामिल नहीं है । अपने जीवन के सच को समय के सच से जोड़ देने की कला की व्याप्ति उनकी अन्य कविताओं में भी देखी जा सकती है । अंदमान की जनजातियों के जीवन संघर्ष को पहली बार कविता में लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है ।
    लीलाधर मंडलोई की कविताओं में प्रकृति और स्त्री की अपनी खास जगह है । वे केवल नैसर्गिक सौंदर्य का ही उदघाटन नहीं करते हैं, बल्कि उन कठोर सच्चाइयों को भी सामने लाते है जिनसे उनके समकालीन कवि प्राय: बचना चाहते हैं । उन्होंने कुछ ऐसी मार्मिक कविताएं भी लिखी हैं  जो हमारी संवेदना का विस्तार करती हैं । प्रसंग चाहे अपने कुत्ते के खो जाने का हो अथवा पत्नी द्वारा मोहल्ले की उस कुतिया को रोटी खिलाने का, जो मां बनने वाली है-वे छीजती हुई संवेदना के इस कठिन दोर से भी मनुष्यता के बचे होने की गाथा ही नहीं रचते, अपनी कलात्मकता से पाठको को भी उसमें शामिल कर लेते हैं
    ध्यान देने की बात है कि उनकी मार्मिक कविताएं भी हमें हताश नहीं करती, बल्कि जीवन की जद्दोजहद से और डूबने की प्रेरणा देती हैं । वे निराशा और मृत्यु के कवि नहीं हैं । उनकी कविता जीने और जीतने की हमारी इच्छा को मज़बूत करती है, दुखों से लड़ते हुए जीवन की सुंदरता को पहचानने की दृष्टि देती है 
  • Devdas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    180 162

    Item Code: #KGP-79

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    200 180

    Item Code: #KGP-558

    Availability: In stock


  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • Swami Punitachari
    Chandrika Prasad Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-1868

    Availability: In stock

    अचानक, सदगुरु भगवान दत्त के शरीर से एक तेजस्वी प्रकाश पुंज निकलकर पुनीताचारी जी के शरीर में समा गया । भगवान दत्तात्रेय ने अपना तेज, अपना ओज, अपनी आभा पुनीताचारी जी में प्रविष्ट कराकर पुनीताचारी जी को अपने समान ओजस्वी बना लिया । आज एक गुरु ने अपने शिष्य को सम आसन पर बैठा लिया । बारंबार नमनीय हैं ऐसे सदगुरु भगवान दतात्रेय महाराज और धन्य हैं ऐसे शिष्य पुनीताचारी जी महाराज ।
    ---
    बापूश्री इतना कहकर दो पल रुके और पुन: बोले, "फिर सत्य क्या है? स्वरुप तो कोई भी सत्य नहीं है, चाहे वह मानव का हो, दानव का हो, या कि ब्रह्मराक्षस का ही क्यों न हो। यह सभी स्वरूप जीवन का प्रतीक हैं । और यदि जीवन है तो मरण भी है । मरण का अर्थ किसी भी स्वरूप के अस्थायित्व से है, उसके मिट जाने से है । अमरत्व तो किसी भी स्वरूप में नहीं है । मिट जाना ही उसकी नियति है । यानी दृष्टि की परिधि में बँधे सभी स्वरूप अस्थायी हैं । अजरता और अमरता तो किसी में भी नहीं है ।"
  • Mahabharat Ka Abhiyukti
    Rajendra Tyagi
    195 176

    Item Code: #KGP-1951

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma
    Tajendra Sharma
    270 243

    Item Code: #KGP-827

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-2
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-832

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-2
    जैसी लघुकथाओं की कल्पनाएं और कामनाएं हम आठवें-नवें दशक में करते रहे, वैसी लघुकथाएं लिखते रहे हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ, मध्य प्रदेश के पवन शर्मा और उन्नी, उत्तर प्रदेश के असग़र वजाहत, गंभीरसिंह पालनी, पंजाब के तरसेम गुजराल और कमलेश भारतीय, बिहार के चंद्रमोहन प्रधान, जम्मू के ओम गोस्वामी, राजस्थान के मोहरसिंह यादव, हसन जमाल और महाराष्ट्र के दामोदर खड़से, लेकिन कितना क्रूर मजाक हुआ हिंदी लघुकथा के साथ कि लघुकथा के स्वयंभू मसीहाओं ने इन तेजस्वी कथाकारों की लघुकथाओं पर प्रायः नजर ही नहीं डाली, डाली भी तो उन पर चर्चा नहीं की और चर्चा की भी तो निगेटिव। कई कथाकारों को ‘बाहरी’ कहकर उनके लघुकथा-लेखन को खारिज करने की कोशिश की। इन सशक्त लेखकों की लघुकथाओं के सामने उनकी लघुकथाएं रखते ही उनकी अल्पप्राणता उजागर हो गई, लेकिन अब अच्छे और सच्चे रचनाकारों की लघु- कथाओं के इस संकलन में आ जाने से उन पर चर्चा और समीक्षा के क्रम को रोका नहीं जा सकेगा। अब प्रेमचंद, प्रसाद एवं राजेंद्र यादव जैसे कहानीकारों की भी लघुकथाएं हमारे सामने हैं। उन अल्पप्राण प्रतिभाओं के कारण ही शायद कोई भला आदमी इधर आने और काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, लेकिन बीसवीं सदी के बीतते न बीतते प्रमुख कथाकारों की लघुकथाओं के प्रस्तुत संचयन को देखकर पाठक कह सकते हैं : कौन कहां कितने पानी में, सबकी है पहचान मुझे। ऐसी बातें कहने के लिए बाध्य कर देने वाले कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ की यादगार लघुकथा ‘पहाड़ पर कटहल’ पढ़कर एक पुरानी बात सही जान पड़ने लगी है कि महान् रचनाएं ही आलोचक को लुभाती हैं और वही उसे प्रेरित करती हैं कि वह उनका विश्लेषण करे, रचनात्मकता की हर संभव ऊंचाई के संदर्भ में उन्हें देखे-परखे और पाठकों को बताए कि कौन लेखक कितना बड़ा है, दूसरे उससे छोटे, और कितने छोटे, बल्कि नगण्य क्यों हैं? प्रस्तुत संचयन हिंदी लघुकथा की आलोचना के मान-प्रतिमान गढ़ने लायक बहुत-सी उत्तम रचनाओं का ऐसा दुर्लभ खजाना है, जो हिंदी में इससे पहले कभी भी और कहीं भी उपलब्ध नहीं था। उम्मीद है कि पाठक इसे संजोकर रखेंगे अपने पास, अपने साथ।
  • Laajo
    Shanta Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-1968

    Availability: In stock


  • Us Raat Ki Baat
    Amrendra Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9062

    Availability: In stock


  • Bhitti
    Bhairppa
    500 450

    Item Code: #KGP-9054

    Availability: In stock


  • Vrihat Hindi Lokokti Kosh
    Bholanath Tiwari
    795 716

    Item Code: #KGP-2107

    Availability: In stock

    वृहत् हिन्दी लोकोक्ति कोश
    हमारी प्रभावी, पूर्ण और आकर्षक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन लोकोक्तियाँ होती हैं। वे वह गागर होती हैं, जिनमें अर्थ के सागर भरे होते हैं। अभी तक हिन्दी लोकोक्तियों का कोई ऐसा बड़ा कोश प्रकाशित नहीं हुआ है, जिसमें अधिकाधिक लोकोक्तियों को लिया गया हो। प्रस्तुत कोश इसी दिशा में एक महत् प्रयास है।
    इस प्रसंग में यह ध्यान देने की बात है कि ‘लोकोक्ति’ लोक की उक्ति होती है, इसलिए मानक भाषा की तुलना में लोकभाषा में लोकोक्तियों का प्रयोग कहीं अधिक होता है और मानक भाषा में भी काफी लोकोक्तियाँ लोकभाषा से ही छनकर आती हैं, जिन्हें संक्षेप में यहाँ देखा जा सकता है।
    प्रस्तुत ‘लोकोक्ति कोश’ में उपर्युक्त दृष्टि से कई विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं। एक तो यह कि इसमें हिन्दी में प्रचलित और प्रयुक्त काफी लोकोक्तियाँ ले ली गई हैं। निश्चय ही इस दृष्टि से अब तक प्रकाशित हिन्दी लोकोक्ति कोशों में यह सबसे बड़ा लोकोक्ति कोश है।
    दूसरे, इसमें हिन्दी की अधिकांश बोलियों की अनेक लोकोक्तियाँ भी ली गई हैं, जैसे—अवधी, कन्नौजी, कौरवी, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी, निमाड़ी, मालवी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, हाड़ौती आदि।
    तीसरे, मानक हिन्दी की अधिकाधिक तथा हिन्दी की प्रायः सभी लोकोक्तियों तथा हिन्दी की बोलियों की अधिकाधिक लोकोक्तियों को लेने के अतिरिक्त अपने देश की असमिया, उर्दू, कश्मीरी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, सिंधी, संस्कृत आदि से भी काफी लोकोक्तियाँ तुलनात्मक रूप में यथास्थान दी गई हैं।
    चौथी विशेषता यह है कि उपर्युक्त लोकोक्तियों के अतिरिक्त इसमें देश के बाहर की अंग्रेज़ी, अरबी, उज़बेक, तुर्की, फारसी, रूसी आदि की भी जो तुलनात्मक लोकोक्तियाँ मिल सकी हैं, शामिल कर ली गई हैं।
    इस तरह यह कोश अपने आयाम में अब तक के लोकोक्ति कोशों से काफी अलग भी है और बड़ा भी।
    डॉ. तिवारी के लगभग 32-33 वर्षों के परिश्रम का परिणाम यह कोश निश्चय ही हिन्दी में अद्वितीय है। 

  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock


  • Malik Muhammad JaaysI
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-139

    Availability: In stock

    मलिक मुहम्मद जायसी एक कवि होने के साथ-साथ सिद्ध फकीर भी थे । उनकी काव्य-प्रतिभा अद्वितीय थी । उन्होंने आंचलिक भाषा अवधी में जितना सुंदर महाकाव्य रचा है, उतना हिंदी साहित्य के किसी दूसरे कवि ने नहीँ रचा । जायसी ने ठेठ अवधी की उच्चकोटि की शब्दावली का प्रयोग किया है ।
    अवध के रायबरेली जनपद के कस्बे 'जायस' का नाम उन्होंने अमर कर दिया । उनका महाकाव्य 'पदमावत' उच्च कक्षाओं के पाठयक्रम से पढाया जाता है । अनेक विद्वानों ने इस ग्रंथ पर शोध करके पी-एच०डी० और डी० लिट्० की उपाधियां प्राप्त की हैं ।
    देश के अतिरिक्त विदेशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों में भी यह ग्रंथ पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जाता है । लोकभाषा का जितना मनोहारी रूप इस ग्रंथ में प्राप्त होता है, उतना अन्यत्र दुर्लभ है ।

  • Mere Saakshatkaar : Ramnika Gupta
    Ramnika Gupta
    240 216

    Item Code: #KGP-623

    Availability: In stock


  • Betava Bahati Rahee
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-2004

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria
    Madhu Kankria
    280 238

    Item Code: #KGP-719

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ghanta
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    160 144

    Item Code: #KGP-425

    Availability: In stock


  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

    Availability: In stock


  • Nikka Nimana
    Sushil Kalra
    400 360

    Item Code: #KGP-550

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhairav Prasad Gupt
    Bhairav Prasad Gupt
    200 180

    Item Code: #KGP-2066

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भैरवप्रसाद गुप्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'घुरहुआ', 'धनिया की साड़ी', 'कदन के नीचे', 'चाय का प्याला', 'चरम बिंदु' , 'पियानो और सोने का पिंजड़ा', 'अपरिचय का घेरा','चुपचाप', 'मंगली की टिकुली' तथा 'श्रम' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भैरवप्रसाद गुप्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Maitreyi Pushpa
    Maitreyi Pushpa
    275 248

    Item Code: #KGP-312

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    190 171

    Item Code: #KGP-173

    Availability: In stock


  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Jaiv Praudyogiki Ke Vividh Aayaam
    Shuk Deo Prasad
    120 108

    Item Code: #KGP-9143

    Availability: In stock

    1953 में जब वाटसन, क्रिक और विलकिंस ने डी.एन.ए. अणु की दुहरी कुंडली वाला अपना सुप्रसिद्ध माॅडल डबल हेलिक्स प्रस्तुत किया तो विज्ञों ने कहा था ‘मानव ने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है’ और अब जबकि मानव या किसी भी प्रजाति के गुणों के संवाहक डी.एन.ए. अणु की अंतर्निहित संरचना ‘जीन’ के अंतस्थल का मनुष्य ने चित्रण कर लिया है और मानव कोशिकाओं में पाई जाने वाली अनुमानतः समस्त जीनों का नक्शा तैयार कर लिया है तो सहज ही ईश्वर की भूमिका के समक्ष चुनौती देने वाले प्रथम सोपान की निर्मिति आधुनिक विश्वामित्रों ने कर ली है। निस्संदेह अनेकानेक नैतिक-अनैतिक यक्ष प्रश्नों के अंबार भी उठ खड़े होंगे लेकिन यह निर्विवाद है कि यदि मानवीय विवेक का समुचित संप्रयोग किया गया तो इस नीजी नक्शे की बदौलत समग्र मानव जाति के सुखद और कल्याणकारी भविष्य हेतु एक नया गवाक्ष खुल जाएगा जो समस्त वसुधा को सुख-शांति, आमोद-प्रामदे-रंजन और रोमांच से लबरेज कर देगा।
  • Pradooshan Prithvi Ka Grahan
    Premanand Chandola
    90 81

    Item Code: #KGP-967

    Availability: In stock

    प्रदूषण और पर्यावरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्योंकि प्रदूषित पर्यावरण ही हो रहा है। हमारे चारों ओर की जमीन, हवा औश्र पानी का मैला और गैसों व रसायनों से सराबोर होना ही प्रदूषण है। बहुरुपिया प्रदूषण वसुंधरा में मंद जहर घोल रहा है। रसायनों का इस्तेमाल किया हमने उपज बढ़ाने, कीट मारने तथा अपनी खुशहाली और आरामतलबी के लिए लेकिन मार उलट गई हम पर ही। काले रसायन ‘हाइड्रोफ्लोरोकार्बन’ तो पृथ्वी की ‘रक्षाकारी ओजोन की छतरी’ को ही छलनी किए दे रहे हैं।
    सच, बीसवीं सदी में स्वर्ग से भी प्यारी पृथ्वी की क्या गत बना दी है हमने, और तुर्रा यह कि अपनी करनी का नतीजा जान पाए हम लंबे अरसे के बाद। जब खुद हम, हमारी मिट्टी, हमारा आकाश, हमारे जलाशय, हमारी फसलें, हमारे मौसम, हमारे पेड़-पौधे और जानवर पर्यावरणी असंतुलन की चपेट से तिलमिलाने लगे। धरती पर थोपे गए ये नकली रसायन नए गुल खिलाते हुए तबाही मचाने पर तुले हैं।
    देर से चेत जाना भी समझदारी है वरना रसायनों के ‘टाइम बम’ समय आने पर हमें कभी नहीं बख्शेंगे। आगाह करने के लिए रोचक कथाशौली में आदमी के अस्तित्व से जुड़ी इन्हीं बातों का लेखा-जोखा दिया गया है इस प्रदूषण के दस्तावेज में।
  • Huzoor Darbar
    Govind Mishra
    375 338

    Item Code: #KGP-315

    Availability: In stock


  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Megha Megha Pani De
    Madhukar Singh
    60

    Item Code: #KGP-1155

    Availability: In stock

    मेघा-मेघा पानी दे
    (एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक)

    गांव की एक डगर। सामने बड़ा-सा चरागाह है। कृष्ण एक ऊंचे टीेले पर बैठा है। तीन-चार लड़के कुछ दूरी पर एक-दूसरे से कटे हुए बैठे हैं। कृष्ण की बंसी के स्वर धीरे-धीरे तेज होते जा रहे हैं।
  • Shiksha : Lakshya Aur Siddhant
    Jagat Ram Arya
    60 54

    Item Code: #KGP-9128

    Availability: In stock

    भारत की आजादी के लिए लाखों लोग शहीद हुए। उनके मन में यही तमन्ना थी कि अपना राज्य आएगा और हम अपने ढंग से देश में शिक्षा-नीति का निर्धारण करेंगे, बाल एवं युवा शक्ति में चरित्र-निर्माण द्वारा नई जागृति पैदा करेंगे, राष्ट्रभाषा हिंदी को पूरा प्रोत्साहन देंगे और वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्रों में हिंदी भाषा को लागू किया जाएगा ताकि हम अपनी ही राष्ट्रभाषा में इसे तैयार कर सकें। आजादी के लिए शहीद हुए लोगों के दिलों में तड़प भी कि हम अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाकर समान विद्यालय पद्धति को अपनाएंगे। सभी वर्गों के लोगों के लिए शिक्षा के समान अवसर दिए जाएंगे। हम अपनी धरोहर संपत्ति ‘वेदों’ से नए-नए आविष्कार करेंगे जैसाकि विदेशों में जर्मनी, इटली, फ्रांस इत्यादि देशों ने संस्कृत में लिखे वेदों में से कई खोजें कीं। जर्मनी, फ्रांस, चीन और जापान ने अपनी ही भाषा में विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रा में उन्नति की है तो हम भी अपनी भाषा हिंदी में ही इस शिक्षा को अनिवार्य बनाएंगे और अपनी ही भाषा में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार करके प्रत्येक क्षेत्र में अपनी ही भाषा द्वारा उन्नति करेंगे। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में भविष्य के लिए हमारे पास न कोई ठोस लक्ष्य है और न कोई सिद्धांत है।
    प्रस्तुत पुस्तक में सरल व रुचिकर शैली में इन्हीं समकालीन समस्याओं का खुलासा तथा विश्लेषण किया गया है।
  • Main Or Mera Man
    Dr. Sharad Nagar
    480 432

    Item Code: #KGP-7851

    Availability: In stock

    मैं और मेरा मन जीवन के एक विलक्षण साधक और रसिक की कलम से निकली हुई यादों, बातों, दास्तानों और दस्तावेज़ों का अनूठा सम्मिश्रण है। इस पुस्तक में हम मिलते हैं एक ऐसे सर्जक से जो अपनी गहरी से गहरी तकलीफें भूलने की कोशिश करता तथा तमाम जगहों और लोगों को दिए हुए अपने वायदों को निभाता हुआ उनके इतिहास और भूगोल को, उनकी बातों और वि़फस्सों को जिलाए रखने के काम में पूरे यव़फीन और मोहब्बत से जुटकर अपने जीने की ख़ुराक ढूँढ़ता है।
    डॉ. शरद नागर के मन में समाए इन लोगों और लोकों के किस्सों में हमें मिलते हैं घने पारिवारिक रिश्ते, गली-मोहल्लों के यादगार चित्रा और चरित्रा तथा अनदेखे पूर्वज। साथ ही हमें मिलती हैं बीसवीं सदी के सामाजिक इतिहास की कुछ ऐसी बारीकियाँ जिनके आज की पाठ्यपुस्तकों में पहुँचने की नौबत ही नहीं आती-जैसे, 1918 के इन्फ्ऱलूएन्ज़ा के प्रकोप की दिल को दहला देने वाली यादें; आगरा में बसे गुजराती नागरों के मोहल्लों-टोलों की भूली-बिसरी आवाज़ें; आज़ादी की जंग के दौर में मिले सृजन और सौहार्द के संस्कार; मैकॉले की नीति का शिक्षा और सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव; समाज के बदलते उसूलों और खुलती-कसती बेड़ियों के बीच औरतों की स्थिति ही नहीं, बल्कि उनका श्रम, उनकी रचनात्मकता, उनकी जंग; तथा भारतीय रंगमंच के इतिहास से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
    शरद जी एक साहित्यकार और ज़िंदगी तथा समाज की तहों में गहरे उतरकर रमने वाले आराधक और कलाकार के रूप में अमृतलाल नागर के बहुत बड़े उपासक थे। इस पुस्तक में प्रस्तुत उनका लेखन अमृतलाल नागर जी को लेखक और पिता के रूप में बड़े निराले ढंग से जिलाता है। हम न केवल लेखक बनने से जुड़ी अमृतलाल नागर जी की निजी और उनके परिवार की अनेक संघर्ष यात्राओं को पहचान पाते हैं बल्कि आज़ादी के पहले के तीन दशकों में और आज़ादी के बाद के चार दशकों में साहित्य और रंगमंच समाज से किस व़फदर गुँथकर अपनी दिशाएँ खोज रहे थे, उसका अहसास भी हमें ख़ूब होता है।
  • Polywood Ki Apsara
    Girish Pankaj
    225 203

    Item Code: #KGP-2049

    Availability: In stock

    पॉलिवुड की अप्सरा
    "पॉलीवुड की अप्सरा' उत्तर-आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की तथा-कथा है, जिसमें गिरीश पंकज विशुद्ध व्यंग्यकार सिद्ध होते है । (जहाँ हास्य का हाशिए पर भी जगह नहीं है) तात्पर्य यह है कि इस उपन्यास में व्यंग्यकार ने  यथार्थ का पल्ला कहीं भी नहीं छोडा है, जिससे यह समझने में आसानी होती है कि व्यंग्य-लेखन ही सच्चा लेखन हो सकता है। जिस प्रकार 'हॉलीवुड' के सादृश्य पर 'बॉलीबुड' रखा गया, उसी प्रकार 'बॉलीबुड' कै सादृश्य पर 'पॉलीवुड' बना । 'पॉलीवुड की अप्सरा' भी बॉलीवुड की समांतर भूमि में अपने रूप, रस, गंध और स्पर्श के साथ प्रतिष्ठित है  ।
    शेक्सपियर ने कभी कहा था कि नास में क्या रखा है, परंतु इस उपन्यास में सार नाम इसीलिए सोद्देश्य एवं सार्थक हैं कि नाम सुनते या पढ़ते ही उनका 'चरित्तर' मूर्त हो उठता  है ।
    'अप्सरा' अपने जन्म से ही अभिशप्त रही है, जिस ‘स्वर्वेश्या' भी कहा गया है । बॉलीबुड की अप्सरा बनने का पावती का सपना अंत तक पूरा सच नहीं हो पाता । यह त्रासदी 'अप्सरा' में व्यंजित तथाकथित आभिजात्य की निस्सास्ता से और भी सटीक हो गई है, जो परी में नहीं है । 'पार्वती' का 'पैरी' में  रूपांतरण एक ऐसी चेतावनी है, जिससे वर्त्तमान एवं भावी पीढ़ी झूठी महत्वाकांक्षा की आग में न कूदे । दार्शनिक शब्दावली में कहें तो जो कुछ दिख रहा है, यह सब माया है, छलावा  है । लगता है, समकालीन परिस्थितियों ने ही कबीर जैसे युगचेता का 'आखिन देखी ' कहने के लिए विवश किया ।
    इस कृति में उत्तर-आधुनिक मनुष्य और उसकी क्रीत-कुँठा सफल व्यंग्यकार गिरीश पंकज की सारग्रही सूक्ष्म-दूष्टि से उजागर होकर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचती है कि मनुष्य की सफलता मनुष्यता का पाने में है, खोने में नहीं ।
  • 101 Amar Kathayen
    Prem Kishore Patakha
    200 180

    Item Code: #KGP-278

    Availability: In stock

    हाँ, शब्द भी महकते हैं और महकते शब्दों की आयु भी अनंत काल तक रहती है । शब्द और फूलों में बस एक ही अंतर नज़र आता है — शब्द महकते हैं तो महकते रहते हैं और फूल कुछ समय के बाद कुम्हला जाते हैं और अपनी महक खो देते हैं । 
    कुछ ऐसे ही महापुरुषों, संतों के विचार-संस्मरण महकती फुलवारी के समान यहाँ संजोकर आपके लिए लाये हैं । शायद किसी शब्द की महक आपका जीवन महका दे । सुगंध बनकर आपके मन और प्राण की वंशी के स्वर फूट पड़ें । 

  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    190 171

    Item Code: #KGP-444

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।
  • Himalaya Gaatha-1 (Dev Parampara)
    Sudarshan Vashishath
    450 405

    Item Code: #KGP-166

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-1 (देव परंपरा)
    महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बाद संस्कृति पर लेखन और यात्रा-वृत्तांत जैसे साहित्य की धीरे-धीरे कमी होती गई । बहुत ही कम ऐसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने आसपास की संस्कृति पर कलम चलाई । ऐसे बिरले साहित्यकारों में सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसा नाम है, जिसने सशक्त कथाकार और कवि होने के साथ-साथ संस्कृति-लेखन में भी बराबर पैठ बनाए रखी। आठवें दशक के आरंभ से लेकर इनके सांस्कृतिक लेख सामने आते रहे । 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी', 'संस्कृति', 'योजना' जैसी पत्रिकाओं तथा सभी समाचार-पत्रों के सांस्कृतिक पृष्ठों में ये बराबर लिखते रहे। कुल्लू के मलाणा गणतंत्र को यही सबसे पहले सामने लाए । 'धर्मयुग' के फागुन अंक में 'फागुन में मलाणा' लेख छपा ।
    ‘आँखिन देखी' और उसका कथात्मक शैली में वर्णन वशिष्ठ के संस्कृति-लेखन की विशिष्टता रही है । पढ़ते हुए ऐसा लगता है, आप यह उत्सव स्वयं देख रहे हैं । सरल और स्पष्ट भाषा से रोचकता के साथ संस्कृति के गंभीर पहलुओं का विश्लेषण, उनकी वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।  संस्कृति का कोई ऐसा पहलू अछूता नहीं रहा है, जिस पर वशिष्ठ ने लेखनी न चलाई हो। इतिहास और परंपरा, धर्म और संस्कृति, मंदिर और पुरातत्त्व, मेले और उत्सव, लोक-परंपरा और लोक-वार्ता कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जो अछूता रहा हो । लेखक की यायावर प्रवृत्ति ने हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राएँ की ।
    यदि इनके अभी तक प्रकाशित हजारों लेखों और दर्जनों पुस्तकों को देखा जाए तो इन्हें दूसरा राहुल कहा जा सकता है । राहुल जी ने बहुत जगह पूरे के पूरे गजेटियर उतार डाले । वशिष्ठ ने ऐसा नहीं किया । इन्होंने संस्कृति को बहुत करीब से देखा । जो देखा, वह लिखा । संस्कृति को निष्पक्ष नजरिए से देखा, परखा, समझा है और फिर लेखनीबद्ध किया है । आशा है, यह संस्कृति श्रृंखला पाठकों, शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Kartavya
    Samual Smiles
    240 216

    Item Code: #KGP-280

    Availability: In stock

    कर्तव्य
    चौबीस वर्ष पूर्व मैंने ‘आत्मनिर्भरता’ (Self Help)  पुस्तक लिखी थी। तीन वर्ष उपरांत सन् 1853 में वह प्रकाशित हुई। वह पुस्तक संयोग से ही लिखी गई थी। मैंने ‘लीडस’ स्थान पर नवयुवकों के सम्मुख कुछ भाषण दिए थे। उन भाषणों में मैंने इस बात पर जोर दिया था कि उनके जीवन की प्रसन्नता व सफलता मुख्यतः उनके निरंतर आत्मसंस्कार, अनुशासन, संयम और सबसे अधिक ईमानदारी व साहस से कर्तव्यपालन करने पर निर्भर करती है। मेरे इन भाषणों का आशा से अधिक प्रभाव हुआ।
    अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने के बाद सायंकाल का समय मैं अपनी पुस्तक के लेखन में लगाता था। पुस्तक जब पूरी हो गई, तो मैंने उसे लंदन के एक प्रकाशक के पास भेजा। क्रीमिया के युद्ध के कारण उन दिनों पुस्तकें प्रायः बहुत कम बिकती थीं। इसलिए प्रकाशक ने धन्यवाद सहित मेरी पुस्तक लौटा दी। ‘जार्ज स्टीफेंसन का जीवन-चरित्र’ छपने के बाद ही श्री मूरे की कृपा से ‘आत्मनिर्भरता’ प्रकाशित हो सकी। 
    इसके तेरह वर्ष पश्चात् मेरी पुस्तक ‘चरित्र’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में मैंने महापुरुषों के चरित्रों को चित्रित करने का प्रयत्न किया, क्योंकि नवयुवकों को संस्कार देने का यह सर्वोत्तम ढंग है। इसके पाँच वर्ष बाद मेरी पुस्तक ‘बचत’ (Thrift) प्रकाशित हुई। इसमें मैंने श्रम के महत्त्व और बचत के लाभों पर जोर दिया था। 
    इनके पाँच वर्ष उपरांत इसी क्रम की अंतिम पुस्तक ‘कर्तव्य’ प्रकाशित हो रही है। मुझे आशा है कि पिछली पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी। इस पुस्तक में मैंने सर्वोत्तम और साहसी स्त्री-पुरुषों के उदाहरण दिए हैं। महापुरुषों के जीवन हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह कार्य कर सकते हैं। जो व्यक्ति कर्तव्य की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह महान् बन जाता है।  
    —सैमुअल स्माइल्स
  • 1128 Mein Crime 27
    C. J. Thomas
    100

    Item Code: #KGP-1817

    Availability: In stock

    1128 में क्राइम 27
    '1128 में क्राइम 27' थॉमस का दूसरा नाटक है । उसकी समस्या सार्वदेशीय है । उन्होंने मौत को एक विशेष प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । नाटक में जिंदगी और मृत्यु के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सिनिक है, क्योंकि उनका यह नाटक सिनिसिज्म की सृष्टि है।... 
    तत्कालीन रंगमंच पर जमी हुई हास्य रूढियों के प्रति विद्रोह, प्रबोधन की शक्ति पर विश्वास रखकर संसार का उद्धार करने की मूर्खता आदि पर भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। असली जिंदगी और जीवन की व्याख्या करने वाले नाटक टेकनीक के वैभवों क द्वारा उनकी असली भिन्नताओं को उसी तरह रहने देकर रंगमंच पर प्रस्तुत करने का उनका कौशल आश्चर्यजनक ही है। जिंदगी मिथ्या है, यह दार्शनिक आशय दर्द-भरी हँसी के साथ वे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। नाटक चलाने वाला और नाटक की व्याख्या करने वाला गुरु एक तरफ़, नाटक खेलने वाले, नेपथ्य, प्रोप्टर, स्टेज मैनेजर आदि का एक ढेर दूसरी तरफ, अखबार का दफ्तर, संपादक, चक्की आदि का एक ढेर तीसरी तरफ।  इन सबके सम्मुख गुरु के लिए जब चाहे तब इशारा कर सकने वाला एक प्रेक्षक समूह । इस प्रकार नाटक और जिंदगी को उनके असली रूप में अपने-अपने व्यक्तित्व से युक्त एक ही स्टेज पर एक साथ इस नाटक में प्रस्तुत करता है । नाटकीय प्रभाव एवं आंतरिक संघर्षों की दृष्टि से यह नाटक अत्यंत सफल है।
  • Bindu-Bindu Vichar
    Atal Bihari Vajpayee
    295 266

    Item Code: #KGP-9022

    Availability: In stock

    बिन्दु-बिन्दु विचार
    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की] पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है । -इसी पुस्तक से

  • Urgent Meeting
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1822

    Availability: In stock


  • Kayantran
    Jitendra Shrivastva
    180 162

    Item Code: #KGP-1912

    Availability: In stock

    जितेन्द्र श्रीवास्तव का नया संग्रह ‘कायांतरण’ इस मायने में भी नया है कि यह उनके और वृहत्तर अर्थों में हिंदी के काव्य परिसर का सार्थक विस्तार करता है। इस संग्रह में जितेन्द्र की काव्य-संवेदना की मूल भूमि नए संदर्भों से आबाद होकर अर्थ-बहुल होती गई है। जीवन के छोटे-बड़े संदर्भों के प्रति एक जैसी गहरी आसक्ति इन कविताओं की ताकत है। स्मृति और विस्मृति के दबावों के बीच हमारी आंतरिकता के निरंतर क्षरण पर व्याकुल-सी दिखती इन कविताओं का रहस्य यह है कि इनकी आलोचकीय अथवा आक्रोशी वैचारिकताएँ इन्हीं व्याकुलताओं के नीचे सक्रिय रहती हैं।
    मनुष्य जीवन के सामान्य संवेदनों के माध्यम से कवि हर बार एक ऐसे अनदेखे और अबूझ अनुभव को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है कि वे सामान्य अनुभव मनुष्य जीवन की व्यापक विडंबनाओं को प्रतीकित करने लगते हैं। कवि सहज ही मानवीय भावनाओं को सभ्यता समीक्षा का मानक बना लेता है। मनुष्य समाज को इन्हीं आधारों पर जाँचते हुए जितेन्द्र के यहाँ प्रेम जैसी भावना महज मनुष्य के आंतरिक संवेदनों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि कठोर राजनीतिक आशयों में परिवर्तित हो जाती है। यहाँ विशृंखलित और विघटित समाज की वर्तमान त्रासदी ही नहीं रेखांकित होती बल्कि ‘चाहिए’ की अंतर्ध्वनि  के साथ मनुष्यता के वैकल्पिक रूपों की जरूरत को भी कवि अपनी अटूट निष्ठा से व्यक्त करता है। वैश्वीकरण की मायावी शब्दावली के घटाटोप में जब इतिहास और आख्यान के अंत की घोषणा कर दी गई है, तब कवि उस यूटोपिया का सृजन करता है, राजनीतिक दृष्टि से जिसकी मौजूदगी प्लेटो तक सहन नहीं कर पाते थे। कहने की जरूरत नहीं कि यह यूटोपिया एक बेहतर मनुष्य समाज के निर्माण का प्रेरक है। इन मायनों में जितेन्द्र का कवि-कर्म मौजूदा समय में स्रष्टा-द्रष्टा की हैसियत प्राप्त कर लेता है, जिसमें अधिक मानवीय समाज को अर्जित करने की नैतिक विकलता विद्यमान है।   
  • Kanak Chadi
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1980

    Availability: In stock

    कनक छड़ी
    'धन्नो के कान उसकी तरफ़ लगे थे,
    किन्तु मन ? 
    मन तो आज जैसे हजार  आँखों से 
    उन तसवीरों को देख रहा था,
    जो उसके स्मृति-पट पर
    उभर रही थीं ।
    उनमें तारा ही तारा थी…
    कभी बेरियों से बेर तोड़ते हुए
    कभी शटापू खेलते हुए
    कभी को खेतों में कोयल संग
    कूककर भागते हुए 
    कभी ढोलक की थाप पर गाते हुए
    कभी 'तीयों' के गोल में
    थिरकती तारा नजर आती
    कभी ब्याह के सुर्ख जोड़े में सजी हुई
    लजाती-मुस्कराती दिखती
    उसकी आँसुओं में डूबी छवि के साथ
    यह सिनेमा रील टूट जाती । 
    [इसी उपन्यास से]
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Parda Baari
    Kusum Kumar
    190 171

    Item Code: #KGP-39

    Availability: In stock


  • Vikalang Vibhutiyon Ki Jeevan Gaathayen
    Vinod Kumar Mishra
    600 540

    Item Code: #KGP-38

    Availability: In stock

    विकलांग विभूतियों को जीवनगाथाएँ 
    विकलता महापुरुषों ने समाज के हर क्षेत्र, जैसे वैदिक रचना, साहित्य, कला, विज्ञान, आविष्कार, वीरता, राजनीति, खेल आदि में उत्कृष्ट प्रदर्शन करके दिखा दिया है कि वे समाज में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं । विकलांगों के संबंध में नीतियाँ और कार्यक्रम बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ये व्यक्ति अंतत: समाज में अपना बराबर का योगदान करने लायक बन सके ।
    ---जे०बी० सिंह, सदस्य सचिव, भारतीय पुनर्वास परिषद
    किसी भी सामाजिक समस्या के हल के लिए उपयोगी साहित्य को आवश्यकता होती है । ऐसा साहित्य समस्या के प्रति जनचेतना तो जगाता ही है, समाज को इसके हल के नजदीक ले जाने में भी सहायक होता है । पुस्तक में विकलांग विभूतियों के व्यक्तित्व की विवेचना के अलावा विकलांगता का इतिहास, विकलांगता के बारे में समय-समय पर बदलती धारणा, विकलांग विभूतियों की सफलता का राज भी वर्णित है ।
    ---डॉ० वीरेंद्र शर्मा, भारतीय विदेश सेवा ( अव०), पूर्व राजदूत
    पुस्तक में वर्णित अनेक महापुरुषों के बारे में हम काफी जानते रहे हैं, पर उनकी चर्चा करते समय हमें कभी ध्यान नहीं रहता है कि वे विकलांग थे । पुस्तक में दिखाया गया है कि किस प्रकार इन विभूतियों ने अपने जीवन में तमाम बाधाओं का सामना किया तथा पीड़ाएँ सहीं और अंतत: इन पीड़ाओं को ही पूँजी बनाकर सफलता हासिल की । इनमें से अनेक को समाज से कुछ नहीं मिला, पर उन्होंने समाज को जो दिया, वह अमूल्य था ।
    ---ए० वेंकट नारायण, कापी एडीटर, 'स्पान' अमेरिकन सेंटर
    नेत्र हीनों का कृतित्व इतना सुंदर क्यों होता है, विकलांग वैज्ञानिकों द्वारा किए गए आविष्कार इतने उपयोगी क्यों होते हैं, निरंतर ये प्रश्न उठते हैं और उत्तर मिलता है कि शिक्षा असंभव नहीं हो सकती, चाहे विकलांगता कितनी भी गंभीर क्यों न हो । इस पुस्तक में उपरोक्त निष्कर्ष लम्बे और गहन शोथ के बाद निकाले गए हैं ।
    ---के ० कानन, पत्रकार, 'हिन्दू'
  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Ab Bhi Ashesh
    Om Bharti
    175 158

    Item Code: #KGP-390

    Availability: In stock

    अब भी अशेष
    जाने-माने वरिष्ट कवि ओम भारती का यह पाँचवाँ कविता-संग्रह है । आठवें दशक से ही या कवि अपनी पृथक पहचान के लिए सजग रहा है । इस किताब में उसकी रचनात्मकता का बढ़ा हुआ क्षेतिज़ फलक ही नहीं, ऊर्ध्व विस्तार भी सुस्पष्ट है । यह संग्रह दर संग्रह उत्कृर्ष का कवि हैं, हर नयी प्रस्तुति से 'परफेक्शन' की और दृढ़ता से बढ़ता हुआ कवि ।
    ओम भारती जितना हिंदी की जातीय काव्यसरणी में हैं, उतना ही उससे बाहर भी । आधुनिकता एवं विखंडन को नयी अर्थवत्ता देने में वे भावुकता का निषेध करते हैं । यह उस तरह की कविता है, जो अपने अंतिम निष्कर्ष में सारे जीवन को ही कविता के रूप से लेती हैं । इसमें कवि स्वयं ही अपना अन्यीकरण करता चलता है ।
    आज देशकाल में जो अनर्गल, अवांछनीय और अनय चल रहा है, यहाँ उसका सक्षम संयमित प्रतिरोध है । चीजों की एक भली-सी अनायासता है । यूँ भी ओम भारती अपनी कविता के लिए समकालीनों से भिन्न तथा नवीन वस्तु चुनते रहे हैं । 'द्वार घंटी का बटन’, 'थाली', 'रहचूँ झूला', "झाड़फानूस थे वे', 'जूते' इत्यादि कविताएं, जो इस जिल्द में बंधी हैं, पाठकों को इधर की कविता के एक उत्सुक और उत्तरदायी रकबे में ले जाएंगी ।
    'अब भी अशेष' संकलन जीवन-द्रव्य से पुष्ट कविताई लिए है । जीवन-जगत् की छोटी-बड़ी चीजों में, उनकी साधारणता से भी ओम भारती अतिरिक्त एवं बड़ा अर्थ भरते रहे हैं । यह काम वे निजी और नये भाषायी रजिस्टर में करते हैं । हर अगली लिखत में वे जैसे स्वयं को भी नया करते चलते है । पुस्तक की शीर्षक-कविता काव्य-पाठ पर एक दिलचस्प वृष्टि है, जो कविता के संप्रेषित होने पर एक ईमानदार संदेह करती है ।
    पाठक इन रचनाओं से एक गीताभा लक्षित करेंगे, छंदाभास  देखेंगे, जो आज की कविता को शिष्ट प्राण और विशिष्ट रंग से भर देता है । कवि रूमानिया को झटक देता है, एक 'लिरिकल’ धोखे को झटका देता है । 'सांसत घर' छोटी-सी कविता है, जिसमें एक 'सिम्फनी' तत्सम शब्दों की है, एक तदभव पदों की, एक उदात्त विचारों की, ना एक लहुलुहान शब्दों के होने की सिम्फनी भी है । मानों चार तारों पर लरजता स्वर-संगम है । 'बारिश' में जैसे एक 'सिंनेमैटिक ग्लो’ है  ।
  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (1st Part)
    Govind Rajnish
    1000 900

    Item Code: #KGP-689

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • Dharmik Kathayen
    Jagat Ram Arya
    150 135

    Item Code: #KGP-108

    Availability: In stock

    धार्मिक कथाएं

    एक दन ब्राह्मण ने मार्ग पर चलते हुए एक हीरा, जिसकी कीमत एक लाख थी, पड़ा आया। वह साधारण रूप से ही हरे को लिए हुए जा रहा था कि उधर आगे की ओर से एक जौहरी जगह-जगह भूमि को देखता हुआ आ रहा था और विशेष व्याकुल था। इतने में ब्राह्मण ने उसे व्याकुल देखकर कहा कि जौहरी भाई, तू व्याकुल क्यों है? देख, एक हीरा हमने पाया है। तेरा हो तो तू ले ले। यह कहकर जौहरी को हीरा दे दिया। अब जौहरी कहने लगा कि मेरे तो दो हीरे थे, इसलिए एक तो तूने दे दिया, दूसरा भी दे दे, तब मैं तुझे छोड़ूंगा। उस जौहरी ने ब्राह्मण को पुलिस के हवाले कर अपना मुकदमा अदालत में दे दिया। वहां अफसर ने उस ब्राह्मण से पूछा कि कहो भाई, क्या मामला है? उसने कहा कि मैं मार्ग में आ रहा था कि मुझे एक हीरा पड़ा मिला। मैं साधारण रूप से जा रहा था तभी उधर से यह कुछ ढूंढ़ता हुआ व्याकुल सा आ रहा था। मैंने इससे पूछा, क्या हे? तब इसने कहा कि मेरा एक हीरा खो गया है। मैंने वह हीरा इसे देकर कहा कि देखो, यह एक हीरा मैंने पाया है। यदि तुम्हारा हो तो ले लो। तब इसने ले लिया और अब यह कहता है कि मेरे तो दो हीरे थे। पुनः अफसर ने सेठ जी से पूछा। तब सेठ जी बोले कि मेरे तो दो हीरे थे जो मार्ग में गिर पड़े थे। उनमें से एक तो इसने दे दिया, पर एक नहीं देता है। अफसर ने समझाया कि यह ब्राह्मण यदि अपने ईमान का पक्का न होता, तो इतना दीन होते हुए एक भी क्यांे देता? अतः यह फैसला किया कि वह हीरा ब्राह्मण को दे दिया जाए। वह जौहरी का नहीं, क्योंकि इसके तो दो हीरे एक साथ गिरे थे, सो इसके कहीं और होंगे। तब तो सेठ बोले कि सरकार, तो मुझे एक ही दिला दिया जाए। तब अफसर ने कहा कि अब तुमहो नहीं मिल सकता।
    —इस संग्रह की ‘सत्यमेव जयते’ कथा
  • Aavahayami
    Ramesh Chandra Shah
    400 360

    Item Code: #KGP-9011

    Availability: In stock

    'आवाहयामि' पुस्तक में श्री जे. एल. मेहता पर लिखे गए संस्मरण में एक उद्धरण है-'कल्पना क्योंकि मूलत: भाषिक होती है इसलिए हाइडेगर का कहना है कि स्वयं भाषा ही बीजरूप में कविता है, पूर्वप्रक्षिप्त अर्थों का ऐसा आकार, जो हमारे वस्तुजगत को प्रकाशित और निर्मित करता है। इसी आधारभूमि पर चिंतक और कवि चिंतन और सृजन के नए रास्ते बनाते हैं।' यानी बड़ी से बड़ी प्रतिमा के भीतर से उपजे विचार या कविता का विस्फोट भी मात्र उसकी प्रतिभा की करामात नहीं होते बल्कि उसके पूर्वजों व तमाम पूर्ववर्ती कवि-चिंतकों द्वारा रची और बार-बार आविष्कृत की गई भाषा की देन भी होते हैं। इसीलिए नई पीढी के लिए यह जरूरी है कि वह न सिर्फ अपनी भाषा को बनाने वाली कविता व चिंतन के पास बार-बार जाए बल्कि उस समय के सरोकारों को भी भली-भांति जाने-बूझे क्योकिं तभी वह अपनी पीढ़ी व अपने समय के तनावों को भी ठीक-ठीक समझ पाएगी ।
    संस्मरणों की यह पुस्तक दरअसल ऐसा ही एक आवाहन है-एक आधुनिक, भारतीय कवि का अपने भाषिक परिवेश के पूर्ववर्ती और समवर्ती कवियों-चिंतकों से सतत संवाद करने, उन्हें और उनके माध्यम से खुद को बेहतर समझने की अदम्य इच्छा का दस्तावेज । वहीं दूसरी और यह संस्मरण एक प्रखर आलोचक को पैनी दृष्टि से देखे गए जीवन-प्रसंगों और हिंदी साहित्य में स्था-समय पर प्रकट हुई गहन चिंताओं, अनुरागों और ऊहापोहों का लेखा-जोखा भी है। इसीलिए यह पुस्तक संस्मरण के सामान्य अर्थों में उन व्यक्तित्वों, जिन पर ये लिखे गए हैं, उनके जीवन के रोचक या प्रेरणादायी घटनाओं का संपुंजन मात्र न होकर हिंदी साहित्य के एक पूरे युगबोध का सिंहावलोकन है ।
    संस्मरण-विधा की साहित्य में अहमियत 'रिक्त स्थानों की पूर्ति' करने वाली हो सकती है जो न केवल उन कवि-चिंतकों बल्कि उस घूरे समय की सर्जना एवं विचार-प्रवाहों को समझने में मदद करें, ऐसा इस पुस्तक के पाठकों को अनुभव होगा।
    ये संस्मरण जिनके बारे में लिखे गए हैं, उनके व्यक्तित्व को उजागर करने के साथ-साथ लिखने वाले की जिज्ञासाओं, अभिरुचियों, खुलेपन और संवाद करने की ललक को भी अनायास ही उजागर करते चलते हैं।
    हिंदी का जैसा लबालब, हिलोरें लेता, चौडा पाट इस पुस्तक में उजागर होता है-उसमें जैसी और जितनी सार्थक बहसें लेखक अपने समय और आपस में एक- दूसरे के लेखन-चिंतन और स्वयं अपने अंतर्द्वंद्वों से कर रहे थे यह देखना आज की पीढ़ी के लिए चकित करने वाला अनुभव हो सकता है। युवा पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने तो हिन्दी के  इस चौडे और जीवंत पाट को जाना ही नहीं है, और एक दुबली, सतही धार जो अब सूखी, तब सूखी- भला किसी को कितना-क्या और कब तक है सकती है ?
  • Shrikant
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    600 540

    Item Code: #KGP-764

    Availability: In stock


  • Buddha Charitam
    Hari Krishna Taileng
    120 108

    Item Code: #KGP-1840

    Availability: In stock

    बुद्ध चरितम्
    संस्कृत के सात श्रेष्ठ महाकाव्यों और नाटकों पर आधारित हिंदी कथाएँ
    बुद्ध चरितम् की विशेषता यह है कि इसमें भगवान बुद्ध के जन्म से निर्वाण तक का जीवन-चरित्र तो है ही, साथ ही  महाकवि ने बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को रुचिकर कथा में पिरोकर मधुर और सहज ग्राह्य बना दिया है ।
    सौंदर नंद में बोद्ध धर्म के सिद्धांतों और साधना-रीति को कथा में गूँथकर महाकवि ने सहज और बोधगम्य बना दिया है । इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की विमाता से उत्पन्न भाई नंद और उसकी अतीव सुंदर पत्नी सुंदरी की मनोहारी कथा है ।
    नागानंद में नागों की रक्षा में प्राणोत्सर्ग कर देने वाले परोपकारी नायक जीमूतवाहन की कथा है । संयत और उदात्त प्रेम, लोकहित और प्राणीत्सर्ग की यह कथा मानवीय गुणों से परिपूर्ण और प्रभावशाली है ।
    मालती-माधवम में मालती और माधव की प्रणय गाथा है, जो अनेक बाधाओं के आते रहने के बावजूद सफलता प्राप्त करती है । कथा बडी रोचक है ।
    प्रतिमा नाटक में पुरुषोत्तम राम के वनगमन से लेकर राज्यारोहण की कथा कही गई है । कथावस्तु का प्रस्तुतीकरण अत्यंत कलापूर्ण और मनोहारी है । यह नाटक बड़ा आदर- प्राप्त और विशिष्ट है । इसमें भरत का उदात्त चरित्र और महारानी कैकेयी का मार्मिक व सहानुभूतिपूर्ण चित्रण हुआ है । कैकेयी महाकवि द्वारा निर्दोष सिद्ध की गई है ।
    रत्नावली नाटक में वत्सराज उदयन से सिंहल की राजकुमारी रत्नावली के विवाह की रोचक व सरस कथा है ।
    विक्रमोर्वशी नाटक में चंद्रवंश के इंद्र के समान प्रतापी महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेमकथा प्रस्तुत की गई है।
  • Interview (Hindi Interviews)
    Majda Asad
    60 54

    Item Code: #KGP-2022

    Availability: In stock

    इंटरव्यू
    इस किताब में इंटरव्यू विधा, उसके विकास और विभिन्न व्यक्तियों से वार्तालाप को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।
    लेखिका ने बातचीत के माध्यम से विभिन्न वर्गों के विशिष्ट व्यक्तियों से साक्षात्कार कराया है । प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ-साथ समाज-सेवा से लगे सामान्य व्यक्तियों की विशेषताओं का निरूपण किया गया है । राजनीति, साहित्य, कला और समाज-सेवा से संबंधित व्यक्तियों के इंटरव्यू लिये गये हैं । उपराष्ट्रपति, केन्दीय मंत्री, साहित्यकार, संगीताचार्य, गाइड और रसोइया एक साथ नजर आते हैं । इन सबसे बडे आत्मीय ढंग से बातचीत कर इनके व्यक्तित्व को बहुत सहज ढंग से उजागर किया गया है । यह भी स्पष्ट रूप से बताया है कि अपनी-अपनी जगह पर हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और समाज में अपना विशेष स्थान रखता है । यह पुस्तक दो हिस्सों में विभाजित है । पहले खंड में व्यक्तिगत इंटरव्यू है । दूसरे में विषयगत, जिसके अन्तर्गत किसी एक विषय पर अनेक व्यक्तियों से बातचीत कर उनके विचार प्रस्तुत किये गये हैं । सन् 1971 से लेकर 1991 तक लिये गये इंटरव्यू यहाँ संकलित है । इनमें से अधिकांश समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । बातचीत के दौरान व्यक्तित्व तो उभरा ही, साथ ही बहुत-से रोचक प्रसंग भी उभरकर सामने आये हैं जो पाठको के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध होंगे ।  यह पुस्तक अपने ढंग का अनूठा प्रयास है । इंटरव्यू विधा में अपना विशेष स्थान रखती है । पाठको द्वारा इसका स्वागत होगा ।
  • Ramcharitmanas Sandarbha Samagra
    Lalit Shukla
    325 293

    Item Code: #KGP-238

    Availability: In stock

    रामचरितमानस संदर्भ समग्र
    ‘रामचरितमानस’ गोस्वामी तुलसीदास की अमर एवं अद्वितीय कृति है। प्रबंध-काव्य के गुणों से ओतप्रोत यह प्रस्तुति भारतीय संस्कृति और मानवोचित लोकानुभव की संदेशवाहिका बनी हुई है। यह अनेक प्रचलित और गूढ़ संदर्भों से युक्त है। इस रचना से उन्हीं संदर्भों को व्याख्यायित और सरलीकृत करने का प्रयत्न किया गया है। 
    हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि इस प्रस्तुति से ‘रामचरितमानस’ के अनुरागियों और अध्येताओं  को कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। लोकभाषा अवधी और देवभाषा संस्कृत के अनेक मार्मिक संदर्भों का सरल रूप यहाँ दिया गया है। 
    यह कृति न तो टीका है और न कोश है। यह अपनी पृथक् शैली की प्रस्तुति है, जो हिंदी और ‘मानस के पाठकों के सामने पहली बार आ रही है। सचमुच महाकवि की यह साहित्यिक यात्रा पाठकों का पाथेय है।’ मानस उसका अमिट स्मारक है।
  • Jal Jo Jeevan Hai
    Harish Chandra Vyas
    300 270

    Item Code: #KGP-520

    Availability: In stock

    जल, जो जीवन है 
    विश्व-स्टार पर गहराते जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्षा 2003 को 'अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ जल वर्ष' घोषित किया है । यही भारत सहित दुनिया के देशों ने अपना रवैया नहीं बदला तो जल विभिन्न देशों में तनाव और जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता का विषय बने बगैर