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  • Namaskar ! Bharat Mera Mahan ! (Paperback)
    Manohar Shyam Joshi
    90

    Item Code: #KGP-7030

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • Pattharon Per Tootata Jal
    Surendra Pant
    40 36

    Item Code: #KGP-1852

    Availability: In stock

    पत्थरों पर टूटता जल

    आरम्भिक कविताएँ कवि के आत्मसंघर्ष का,
    खुद से लड़ते हुए कहीं न पहुँचने की
    विवशता के बीच भी अपनी पहचान
    बनाने की ललक से भरी तैयारी
    का दस्तावेज होती है ।
    उनमें एक ओर प्रचलित काव्यविधान
    से टूटने की छटपटाहट होती है
    तो दूसरी और शास्त्र की चुनौतियों के सम्मुख
    कुछ नया कहने का तेवर होता है ।
    इतना कहने का प्रयोजन यह नहीं कि
    सुरेन्द्र पंत की कविताएँ अन्तिम कविताएँ हैं
    जिन पर बहस नहीं की जा सकती ।
    वास्तव में वे कविताएँ बहस की कविताएँ है ।
    कारण यह कि उनमें एक गंभीर किस्म के
    कवि की मुद्रा सहसा किसी शब्द मा शब्दार्थ
    के कोने से झलकने लगती है ।

    वे चाहे आज की भाषा में खुद को खोजने की
    कोशिशें हो पर उनमें आज और कल की
    कालगत धारणाओं से बचने की कोशिशें हों ।
    इस अर्थ में वे ऐसे वर्तमान की कविताएँ है
    जो सदैव अमानवीय परिस्थितियों में
    ऐसी ही रुपाकृ्ति देता है ।
  • Vigyan Aur Dharmik Manyataayen
    Vinod Kumar Mishra
    130 117

    Item Code: #KGP-9043

    Availability: In stock


  • Grih Daah
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    350 315

    Item Code: #KGP-753

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash (Paperback)
    Uday Prakash
    175

    Item Code: #KGP-377

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala
    Suryabala
    230 207

    Item Code: #KGP-418

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bharatratna Se Sammanit Mahaan Vyaktitva
    Dr. Rashmi
    760 684

    Item Code: #KGP-519

    Availability: In stock

    भारतरत्न देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। अति सम्माननीय एवं विशिष्ट व्यक्तियों को राष्ट्रीय सेवा हेतु प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान संपूर्ण व्यक्तित्व व देश के प्रति समग्र समर्पण भावना का आदर करते हुए समर्पित किया जाता है। इस सम्मान से अलंकृत व्यक्ति ‘भारतीय नागरिकता की वरीयता सूची’ में सातवें स्थान पर सुशोभित होते हैं। यह आवश्यक है कि 2 जनवरी, 1954 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा स्थापित ‘भारतरत्न’ सम्मान के विषय में प्रत्येक नागरिक सुपरिचित हो। कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीति, विचार, उद्योग, लेखन, सार्वजनिक सेवा एवं खेल आदि के क्षेत्रों में ‘भारतरत्न’ से सम्मानित विभूतियों के जीवन तथा कृतित्व से प्रेरणा पाकर कोई भी अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
    अनेक प्रेरक रचनाओं की लेखिका डा. रश्मि ने परिश्रम व निष्ठापूर्वक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पुस्तक का लेखन किया है। सम्मानित व्यक्तित्व के सभी आयामों का परिचय देते हुए उन्होंने महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित किया है। प्रथम बार ‘भारतरत्न’ (1954) से अलंकृत चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से लेकर 2015 में सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी एवं पं. मदन मोहन मालवीय तक सभी महान् व्यक्तित्वों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी इस पुस्तक में समाहित है।
    राष्ट्रप्रेम, जीवन मूल्य और समर्पित कृतित्व को परिभाषित करती पुस्तक ‘भारतरत्न से सम्मानित: महान् व्यक्तित्व’ पठनीय व संग्रहणीय है। सरल-सुगम भाषा तथा प्रवाहपूर्ण शैली इसे अत्यंत रोचक बना देती है।
  • Buddha Charitam
    Hari Krishna Taileng
    120 108

    Item Code: #KGP-1840

    Availability: In stock

    बुद्ध चरितम्
    संस्कृत के सात श्रेष्ठ महाकाव्यों और नाटकों पर आधारित हिंदी कथाएँ
    बुद्ध चरितम् की विशेषता यह है कि इसमें भगवान बुद्ध के जन्म से निर्वाण तक का जीवन-चरित्र तो है ही, साथ ही  महाकवि ने बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को रुचिकर कथा में पिरोकर मधुर और सहज ग्राह्य बना दिया है ।
    सौंदर नंद में बोद्ध धर्म के सिद्धांतों और साधना-रीति को कथा में गूँथकर महाकवि ने सहज और बोधगम्य बना दिया है । इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की विमाता से उत्पन्न भाई नंद और उसकी अतीव सुंदर पत्नी सुंदरी की मनोहारी कथा है ।
    नागानंद में नागों की रक्षा में प्राणोत्सर्ग कर देने वाले परोपकारी नायक जीमूतवाहन की कथा है । संयत और उदात्त प्रेम, लोकहित और प्राणीत्सर्ग की यह कथा मानवीय गुणों से परिपूर्ण और प्रभावशाली है ।
    मालती-माधवम में मालती और माधव की प्रणय गाथा है, जो अनेक बाधाओं के आते रहने के बावजूद सफलता प्राप्त करती है । कथा बडी रोचक है ।
    प्रतिमा नाटक में पुरुषोत्तम राम के वनगमन से लेकर राज्यारोहण की कथा कही गई है । कथावस्तु का प्रस्तुतीकरण अत्यंत कलापूर्ण और मनोहारी है । यह नाटक बड़ा आदर- प्राप्त और विशिष्ट है । इसमें भरत का उदात्त चरित्र और महारानी कैकेयी का मार्मिक व सहानुभूतिपूर्ण चित्रण हुआ है । कैकेयी महाकवि द्वारा निर्दोष सिद्ध की गई है ।
    रत्नावली नाटक में वत्सराज उदयन से सिंहल की राजकुमारी रत्नावली के विवाह की रोचक व सरस कथा है ।
    विक्रमोर्वशी नाटक में चंद्रवंश के इंद्र के समान प्रतापी महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेमकथा प्रस्तुत की गई है।
  • Jangal Se Shahar Tak
    Rajendra Avasthi
    260 234

    Item Code: #KGP-9099

    Availability: In stock

    जंगल से शहर तक
    अपने को मैं सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे मध्य प्रदेश और बस्तर से लेकर पूरे देश के आदिवासियों के बीच काम करने, रहने और उनके जीवन को गहराई से समझने का अवसर मिला है। मुझे बहुत ही सुखद आश्चर्य हुआ था कि आज की दुनिया से अलग इनकी अपनी जिंदगी है और उस जिंदगी के प्रति कभी उन्होंने शिकायत नहीं की। उनके लिए जो कुछ संभव था, कई तरह किया गया। बस्तर उस समय के मध्य प्रदेश का ही नहीं, दुनिया का सबसे बड़ा जिला था। जगदलपुर इसका मुख्यालय आज भी है। इतने बड़े क्षेत्र को संभालना आसान नहीं है। मैं कृतज्ञता ज्ञापन करूंगा कि जगदलपुर अब ढाई जिलों में कंट गया है। धीरे-धीरे अब वहां सुधार हो रहा है और वहां के निवासियों की उन्नति के लिए सरकार प्रयत्नशील है। यही बात नागा, गोंड़, टोडा, कोरकू, उराव, खोंड इत्यादि क्षेत्रों की है। मुझे याद है कि एक समय इनके बीच में पहुंचना बहुत कठिन था। स्थिति अब बदल गई है और वे प्रसन्नतापूर्वक इस समूचे देश के अंग हैं। यह ज्ञान उन्हें हो रहा है।
    मैंने कुछ भी चीज कल्पना से नहीं लिखी। इनके बीच में इनका बनकर, रहकर मैंने काम किया है। सारी व्यस्तताओं के बावजूद मुझे जंगलों में घूमनो हमेशा पसंद रहा है। कहा जा सकता है कि मैं जंगली भी हूं और शहरी भी।
    इतिहास, साहितय-जीवन, देश और काल का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। वह अपने अतीत के माध्यम से आज का चित्र प्रस्तुत करता है।
    —राजेन्द्र अवस्थी
  • Kama Sutra (Paperback)
    Vatsyayana
    99

    Item Code: #KGP-1100

    Availability: In stock

    It is one of the three goals of Hindu life. It is what the west called ‘erotica’. It is the one we consider sacred. It is Kama. And this is its manual—The Kama Sutra.
    A compilation of seven books, starting with the description of general principles of mortal life that Brahma laid down when he created men and women—dharma (fulfillment of duty), artha (accumulation of wealth), and kama (pleasurable experience of the five senses, to moving forward about the ‘right’ way of life where it talks about many issues including the behaviour and actions during copulation between a man and a woman. A 4th century guide to a virtuous and gracious living, still valid in the 21 century and beyond.    
    Vatsyayana unbashingly talks scientifically and spiritually about what is a taboo today, and emphasises that this book is a must for both men and women. It lays more stress on the fact that women, especially, should be knowledgeable in the arts complimentary to Kama Sutra
    The physical beauty of Khajuraho is the manifestation of the beauty trapped in this book, which the west unknowingly calls the ‘manual of sex’. 
    Discover the knowledge of the gods translated for the mortals by the mortals.
  • Unheen Mein Palata Raha Prem
    Poonam Shukla
    200 180

    Item Code: #KGP-9329

    Availability: In stock

    उन्हीं में पलता रहा प्रेम 
    पूनम शुक्ला की कविताएँ एक ओर जहाँ स्त्री-विमर्श के दायरे को मजबूत करती हैं वहीं दूसरी ओर उसे विस्तार भी देती हैं। स्त्राी के दुःख और संघर्ष को ही नहीं, उसके अधिकार और ताकत को भी पहचानती हैं और उसे तर्क की ठोस भूमि पर निरूपित करती हैं। ऐसे में कविता के बयान बन जाने का खतरा बार-बार उपस्थित होता है, लेकिन भावात्मक लगाव और संवेदनात्मक स्पर्श से वे न सिर्फ ऐसे खतरों को टालने में सफल होती हैं बल्कि कई बार कविता की नई जमीन तोड़ने का उद्यम भी करती दिखती हैं। स्त्री कविता की प्रचलित अवधारणा से अलग एक संवेदनशील और विवेकशील मनुष्य की तरह समय के बीहड़ में प्रवेश करती हैं और समाज की उन विषमताओं और विसंगतियों को देखने में भी सफल होती हैं, जिन्हें देखने के लिए एक वर्गदृष्टि चाहिए। खास बात यह है कि उनकी कविताओं में यह वर्गदृष्टि आरोपित नहीं बल्कि जीवनानुभव के विस्तार और उत्पीड़ित जनों के साथ संवेदनात्मक जुड़ाव से पैदा हुई दृष्टि है।
    पूनम शुक्ला अपने समय के विमर्शों से प्रभावित तो हैं लेकिन वे ज्ञान और सूचनाओं का उपयोग, उन्हें अपने जीवनानुभव में शामिल करने के उपरांत ही करती हैं, इसलिए वे पाठकों को चैंकाती नहीं हैं बल्कि बेचैन कर देती हैं। यह उनका दूसरा संग्रह है, लेकिन इसे एक नई शुरुआत की तरह देखा जाना चाहिए। पहले संग्रह में काव्याभ्यास वाली कविताएँ अधिक थीं। उसके साथ इस संग्रह की कविताओं को देखकर लगता है कि यह विकास नहीं बल्कि छलाँग है, एक बिलकुल अलग तरह के काव्यलोक में। जाहिर है अपना मुहावरा पाने के लिए उन्होंने कठिन रचनात्मक संघर्ष किया है जिसकी झलक इन कविताओं में मिलती है।
    —मदन कश्यप 
  • Kamzor Pyaar Ki Kahaniyan
    Bhimsen Tyagi
    100 90

    Item Code: #KGP-1948

    Availability: In stock


  • Svasthya Evam Chikitsa
    Dr. Rakesh Singh
    300 270

    Item Code: #KGP-566

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • 1857 : Samar Gatha
    Sudrashan Kumar Chetan
    100 90

    Item Code: #KGP-9010

    Availability: In stock

    1857 समर गाथा
    विद्रोह सुधार माँगता है, क्रांति परिवर्तन।  सन् 1857 का जन-आंदोलन विद्रोह नहीँ था । वह तो गत सौ वर्षों (1757-1857) के विदेशी शासन के विरुद्ध जनता की शिकायतों का परिणति था । इस जनक्रांति को सैनिकों ने प्रारंभ किया और जनता के विभिन्न वर्गों ने उसमें सहयोग दिया। इस क्रांति में हिंदू और मुसलमानों ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की । यह दूसरी बात है कि आंदोलन विफल हो गया और अंग्रेजों ने पूरी शक्ति से उसे कुचल दिया ।
    सफलता से बडी कोई उपलब्धि नहीं और विफलता से बड़ा कोई अपराध नहीं । यदि 1857 का यह सैनिक- आंदोलन सफल हो जाता तो समस्त विश्व स्वतंत्रता- आंदोलन के नाम से उसे ससम्मान पुकारता किन्तु उसके विफल हो जाने के कारण ही इतिहासकारों ने उसे विभिन्न नामों से संबोधित किया, यथा किसी ने इसे देशी राज्यों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का असफल प्रयास बताया तो किसी ने उसे सैनिक-विद्रोह का नाम दिया । किसी ने गदर की संज्ञा दी तो अन्यों ने स्वतंत्रता- आन्दोलन के नाम से अभिहित किया ।
    स्वतंत्रता-आंदोलन का यह प्रथम प्रयास असफल हो गया, उसे कुचल दिया गया और देश से ऊपरी सतह पर शांति भी स्थापित हो गई, किन्तु क्रांति के बीज मरे नहीं । देशवासी यह मानने को कदापि तैयार नहीं थे कि अंग्रेज़ अजेय हैं । तभी तो समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भीतर ही भीतर सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में जुट गया । परिणामत: देश के विभिन्न भागों में समय-समय पर अंग्रेजो की विरोधिता जारी रही । सच तो यह है कि 1857 की क्रांति के बाद से अगस्त, 1947 तक भारत से अंग्रेजी सरकार एक क्षण के लिए भी चैन से शासन नहीं का पाई ।
  • Hindi Vyakaran : Ek Navin Drishticon
    Kavita Kumar
    550 440

    Item Code: #KGP-65

    Availability: In stock

    यह पुस्तक सामान्य विद्यार्थियों की सामान्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण व्याकरण को छोटी-छोटी इकाइयों-भाषा-ढांचों-में विभाजित करके सुगम, सुबोध एवं सामान्य भाषा में प्रस्तुत करने का एक छोटा-सा प्रयास है। एक शुष्क विषय को रेखाचित्रण द्वारा सजीव व आकर्षक बनाकर, यथासंभव व्याकरणिक पारिभाषिक शब्दावली का कम से कम प्रयोग, आवश्यकतानुसार पुस्तक में स्थान-स्थान पर वर्तनी तथा विराम चिह्नों के प्रयोग संबंधी निर्देश, वाक्य-रचना पर विशेष ध्यान एवं प्रत्येक व्याकरणिक बिंदु पर प्रचुर उदाहरणों सहित प्रस्तुतीकरण इस पुस्तक की विशिष्टता है।
    -कविता कुमार
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shaani
    Shaani
    200 180

    Item Code: #KGP-29

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार शानी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दोज़खी', 'जहाँपनाह जंगल', 'जली हुई रस्सी', 'जगह दो, रहमत के फरिश्ते आएंगे', डाली नहीं फूलती', 'बिरादरी', 'बोलने वाले जानवर', 'एक नाव के यात्री', 'चहल्लुम' तथा 'युद्ध'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक शानी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Krishan Upasika Meera
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-184

    Availability: In stock

    मीरा शाश्वत हैं
    भारतीय नारी समाज की गौरव दीप है । गिरधर गोपाल के  प्रेम में आकंठ डूबी मीरा लोक-लाज और परिजन समूह की चिंता न करते हुए मंदिरों में पद-कीर्तन गाती हुई घुँघरू बांधकर नाचती थी। वे नटनागर कृष्ण मुरारी के गीत गाती हुई वृंदावन से द्वारिका तक अपने कन्हैया को रिझाती रहती थीं ।
    विश्व-साहित्य में मीरा जैसी अन्य कोई नारी नहीं  जो लोक-लाज त्यागकर छैल-छबीले बाँके सांवरिया के रंग में रँगी थी । मीरा नारी के अतिरिक्त मात्र भाव बनकर घूमती थीं । उनकी साधना गौरवमयी थी । वे अपन कन्हैया की दीवानी थीं,  उन्हें वृंदावन की कूंज गलियों में खोजती फिरती थीं ।
    परिवार में पति के निधन के बाद  नाना प्रकार के कष्ट दिए गए ।  उन्हें पीने के  लिए विष-प्याला भेजा गया, जो अमृत बन गया ।  पिटारे में जहरीला नाग भेजा गया, जो तुलसी की मोहक माला बन गया। सोने  लिए शूली की सेज भेजी गई, जो पुष्पों की शैया बन गई ।
    सैकडों पद रचकर मीरा अंततोगत्या अपने गिरधर के चरणों में बैठकर उन्हीं में समाहित दो गई ।
    मीरा आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगी । जव तक नटनागर गिरधारी रहेंगे तब तक मीरा भी रहेंगी । और नटनागर तो शाश्वत है तो फिर मीरा भी शाश्वत हैं  ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Asghar Wajahat (Paperback)
    Asghar Wajahat
    100

    Item Code: #KGP-7197

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां
    असग़र वजाहत

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों की चयनित कहानियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से  स्वयं लेखक को भी कथाकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक या संपादक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के 
    लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार असग़र वजाहत की जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘केक’, ‘दिल्ली पहुंचना है’, ‘अपनी-अपनी पत्नियों का सांस्कृतिक विकास’, ‘होज वाज पापा’, ‘तेरह सौ साल का बेबी कैमिल’, ‘शाह आलम कैंप की रूहें’, ‘शीशों का मसीहा कोई नहीं’, ‘जख्म’, ‘मुखमंत्राी और डेमोक्रेसिया’ तथा ‘सत्यमेव जयते’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार असग़र वजाहत की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Mere Saakshatkaar : Prabhakar Shrotriya
    Prabhakar Shrotiya
    175 158

    Item Code: #KGP-2035

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : प्रभाकर श्रोत्रिय
    मैं एक लेखक से अधिक एक मनुष्य होना श्रेयस्कर मानता हूँ। अध्यापन तो अपने में ही एक बादशाहत है, परंतु यहीं से हटकर प्रशासन में संयोगवश मुझे दूसरे नंबर पर नहीं रहना पड़ता । फिर वह भोपाल हो, कलकत्ता हो या दिल्ली । चाहा यही कि इन सर्वोच्च पदों की गरिमा को न गिरने दूं, लेकिन अपने को ऐसा ढालूँ कि इन पदों से उतरने पर मुझे ऐसा न लगे कि किसी पद पर था, जिस पर अब नहीं हूँ। और इस 'पद' का अर्थ मेरे लिए सिर्फ पाँव हो-जो अपनी ज़मीन पर टिका है ।
    मैं अकसर उन लोगों पर लिखना चाहता रहा हूँ जो चुनौती बनते है या उपेक्षित होते हैं । शमशेर बहादुर सिह की कविता पर इसीलिए लिखा। वह हिंदी के सबसे जटिल कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त को कोई कवि नहीं मान रहा था, तब उन पर एक पुस्तक अलग ढंग की लिखी । छायावाद के मूल्यांकन में जब बेहद बीहड़ता थी, तब छायावाद पर लिखा । प्रसाद पर लिखा, नरेश मेहता पर लिख रहा हूँ ।
    ० 
    पत्रिका के स्तरीय पाठक के अलावा भी पाठकों का एक वर्ग होता है, जो साहित्य के प्रति उत्सुक होता है । इसलिए कुछ ऐसी रचनाएँ भी होनी चाहिए, जिनके जरिए ऐसे पाठक पत्रिका में प्रवेश कर सकें, उनका संस्कार हो सके । पत्रिका के महत्त्व की एक कसौटी यह भी है कि वह कितनी प्रतिभाओं को सिरजती और प्रोत्साहित करती है । कई अच्छे लेखक पत्रिकाओं के निर्माण होते है ।
    ० 
    व्यावसायिक पत्रिकाओं से जुडी हुई संपादक की संस्था भी बहुत कमजोर हो गई है। पत्रिकाएं हमेशा संपादक के बलबूते पर ही निकलती और यशस्वी होती है । 'सरस्वती' से लेकर 'सारिका' और 'धर्मयुग' का यहीं इतिहास रहा है । लोकप्रिय पत्रिकाओं को भी दोयम और दृष्टिहीन संपादक नष्ट का देते हैं । 

    [प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा प्रश्नोंत्तर के कुछ अंश]
  • Bantadhar
    Nisha Bhargva
    150 135

    Item Code: #KGP-1804

    Availability: In stock

    निशा भार्गव की कविताएँ गहरे मानवीय सरोकारों का प्रतिनिधित्व करती हैं । गम्भीरता से, सपाट भाव से किसी बात या संदेश को व्यक्त कर देना शायद हमें आसान लगे लेकिन हास्य-व्यंग्य के माध्यम से 'सर्व' को अभिव्यक्ति 'स्व' से आसान नहीं । यहीं निशा भार्गव अपनी कविताओं की भाषा-शैली और प्रवृति से भीड में अपना अलग स्थान बनाती हैं । उनकी अपनी खास शैली है जो अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ती । छंदमुक्त, इन कविताओं में एक प्रवाह होता है, गीत जैसी लयात्मकता होती है। यथा -
    "सड़क पर चक्का जाम हो गया
    ये अंजाम बहुत आम हो गया
    मीडिया भगवान हो गया
    देश का कर्णधार हो गया ।" 
    निशा भार्गव की कविताएँ सामाजिक मुददों को जीवंतता से उठाती हैं, समाधान ढूंढती हैं, व्यवस्था पर प्रहार करती हैं, लाचारी पर हँसती हैं, समाधान का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं । यथा -
    "मँहगाई ने सबका दिल तोडा
    घर-घर का बजट मरोड़ा
    फिर सबको दी सीख
    छोडो ये शिकायत ये खीझ
    समस्या का समाधान करना सीखो
    बिन बात यूँ ही मत खीझो ।"
    इसी तरह 'बंटाधार' कविता वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्थाओं पर जमकर प्रहार करती है । 'बंटाधार' ही क्यों संग्रह को अन्य कविताओं में भी अलग-अलग प्रसंग हैं, व्यंग्य की अनूठी छटा हैं । ये कविताएँ मन को लम्बे समय तक गुदगुदाने के साथ-साथ कुछ सोचने पर भी बाध्य करती हैं ।
    —डा. अमर नाथ 'अमर'
  • Vyangya Sarjak : Narendra Kohli
    Prem Janmejai
    300 270

    Item Code: #KGP-468

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध साहित्यकार नरेन्द्र कोहली का रचना-संसार बहुआयामी है। विभिन्न विधाओं में उन्होंने रेखांकित करने योग्य रचनाएं लिखी हैं। पौराणिक व जीवनीपरक उपन्यासों के क्षेत्र में तो उन्हें शीर्षस्थ लेखक स्वीकार किया जाता है।
    नरेन्द्र कोहली के लेखन का एक जरूरी पक्ष उनका व्यंग्य साहित्य है। ‘व्यंग्य सर्जक: नरेन्द्र कोहली’ पुस्तक में इस पक्ष का कई दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण किया गया है। संपादक प्रेम जनमेजय ने पूरे कौशल के साथ व्यंग्य की परंपरा में कोहली को स्थापित किया है। ‘व्यंग्य का नरेन्द्र कोहलीय दृष्टिकोण’ में यज्ञ शर्मा, प्रेम जनमेजय, हरीश नवल, मनोहर पुरी आदि लेखकों ने कोहली के व्यंग्य लेखन में उनकी रचनात्मक विशिष्टता तलाशी है। प्रेम जनमेजय के शब्दों में, "व्यंग्य में शिल्प के विभिन्न कोणों एवं रूपों की प्रस्तुति नरेन्द्र कोहली की व्यंग्य रचनाओं के महत्त्व को रेखांकित करती है। निश्चित ही व्यंग्यकार की व्यंग्य रचनाओं ने व्यंग्य साहित्य की परंपरा को जीवित रखा है, उसे दृढ़ता एवं नवीनता प्रदान की है।"
    पुस्तक के दूसरे हिस्से ‘एक व्यक्ति नरेन्द्र कोहली’ में कोहली के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर ज्ञान चतुर्वेदी, सूर्यबाला, गिरीश पंकज, मधुरिमा कोहली, कमलेश भारतीय, विवेकी राय, मीरा सीकरी आदि ने संस्मरण-शिल्प में उनसे जुड़ी बातें व्यक्त की हैं। मीरा सीकरी के अनुसार, "...नरेन्द्र कोहली का कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व भी उन्हीं मूल्यों को अपनी जिंदगी में मूर्त करता है जिनकी गरिमामय अभिव्यक्ति वह अपने साहित्य में कर रहा है। बहुत आसानी से नरेन्द्र कोहली के संपूर्ण व्यक्तित्व को उनके साहित्य में ढूंढ़ा जा सकता है।" सभी लेखों की एक समान विशेषता है कि वे लागलपेट के बिना अपनी बात सामने रखते हैं। रचनाकार को मंडित या खंडित करने की प्रवृत्ति से दूर ये लेख कोहली के व्यंग्य साहित्य व स्वभाव का समुचित परीक्षण करते हैं।
    प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित यह पुस्तक सामान्य पाठकों व शोधकर्ताओं के लिए समानरूपेण उपयोगी है।
  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan
    Narendra Mohan
    490 441

    Item Code: #KGP-1953

    Availability: In stock

    सआदत हसल मंटो उर्दू के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण, चर्चित और विवादास्पद लेखक हैं। इस एक लेखक को लेकर जितनी चर्चाएं उठी हैं, उतनी अन्य किसी लेखक को लेकर नहीं। मंटो की खासियत है कि उसने नये विषयों पर ही नहीं लिखा, नये अन्दाजेबयां और नजरिये से भी लिखा। इस एक बात ने उन्हें अपने समय का ही नहीं, आज के समय का भी एक बड़ा कहानीकार बना दिया है।
    मंटो की कहानियां पाठकों की अन्तश्चेतना को बुरी तरह झकझोरने वाली, तिलमिला देने वाले विचारों तक ले जाने वाली हैं। यह बेचैनी महज व्यक्तिगत नहीं है, मुल्क और कौम की बेचैनी से जुड़ी हुई है जो कहानियों की मार्फत पाठकों तक सीधे पहुंचती है। उनकी कहानियों में गहरी मानवीय दृष्टि के साथ-साथ तीव्र आक्रोश और प्रतिकार भी है। हरारत और रोशनी, स्वप्न और दुःस्वप्न उनकी सृजनात्मक प्रेरणा के हिस्से हैं। इन कहानियों के जरिये मंटो हमें विसंगति-भरी जिन्दगी में जीने की शर्त का गहरा एहसास कराते हैं।
    सआदत हसन मंटो की कहानियां पुस्तक में मंटो के कथा-संसार में झांकने का, उनकी कहानियों को चुनकर, एक परिप्रेक्ष्य देकर हमारे सामने पेश करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है हिन्दी के जाने-माने कवि, नाटककार और आलोचक डाॅ. नरेन्द्र मोहन ने। मंटो की सृजनात्मक प्रेरणा और संपादकीय दृष्टि में आश्चर्यजनक साम्य है-एक-दूसरी में खुलती गई हैं और उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। इससे यह पुस्तक कहानियों का संकलन-भर नहीं रही है, एक दस्तावेज बन गई है।

  • Antariksh Itihas Ki Vishal Pariyojana
    Praduman Singh
    240 216

    Item Code: #KGP-721

    Availability: In stock


  • Apni Dharti Apne Log (3 Volumes)
    Ram Vilas Sharma
    1200 1080

    Item Code: #KGP-1585

    Availability: In stock


  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • The Growing Years (Novel)
    Ann Delorme
    395 356

    Item Code: #KGP-339

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.

  • Hinsaabhas
    Deepak Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-9109

    Availability: In stock

    हिंसाभास
    सामाजिक परिवेश में रची-बसी इस संग्रह की कहानियाँ आज के संघर्षरत मानव की मर्मान्तक पीडा का चित्रण अत्यन्त मर्मस्पर्शी तथा हृदयबेधक भाषाशैली में करती हैं । हमारे दैनंदिन जीवन में विषमता, नीरसता और विरक्ति का जो जहर घुल चुका है उससे हमें आगाह भी करती हैं। मानव-मानव के बीच बढती विषमता और कटुता की खाई को यदि समय रहते पाटा न गया, और सौहार्द व सदभात्र की भावना को न रोपा गया तो हम विघटन और विनाश की जोखिम-भरी जिन्दगी जीने के लिए बाध्य होकर रह जायेगे ।

  • Spandit Pratibimb
    Amar Nath 'Amar'
    150 135

    Item Code: #KGP-1857

    Availability: In stock

    स्पन्दित प्रतिबिम्ब
    संघर्ष का चिराग
    जीवन के अंधेरे पलों में
    रोशनी के लिए
    संघर्ष
    जब बढ़ जाता है
    तब
    सन्नाटों को बुनते हुए
    खुद चिराग़ बन
    जल उठता हूँ मैं!
    हाँ
    यही परिभाषा
    बन गई है जिदंगी की !
    गंगा की धारा में
    मेरी खुशियों, उमंगों 
    और लक्ष्यों का
    प्रतिबिम्ब उभरता है
    अक्सर
    चाँदनी के बीच
    और फिर जीवन
    गीत बन जाता है
    लहरों के संग चलकर
    घुप अँधेरे के
    साए में भी !
    [इसी पुस्तक से]
  • Svasthya Evam Chikitsa (Paperback)
    Dr. Rakesh Singh
    160

    Item Code: #KGP-369

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-12

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    225 203

    Item Code: #KGP-841

    Availability: In stock


  • Jangal Ke Jeev-Jantu (Paperback)
    Ramesh Bedi
    200

    Item Code: #KGP-178

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Davendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    70 63

    Item Code: #KGP-9052

    Availability: In stock


  • Gulaha- E- Parishaan
    A.M. Nayar
    395 356

    Item Code: #KGP-76

    Availability: In stock

    गुलहा-ए-परीशाँ 
    एक जमाने में हर पढ़ा-लिखा काव्य-प्रेमी अच्छे-अच्छे और पसंदीदा अशआर को एक बयाज (संग्रह) रखता था, जिसमें दर्ज शेर जिंदगी की कशमकश, प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख और दु:ख  क्षणों में उसे याद आते थे और उनको दोहराकर वह अपना दु:ख घटाता या सुख में वृद्धि कर लेता था ।  आज का जीवन व्यस्ततर है और हर व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में ऐसा गूँथा हुआ है कि जिंदगी की लताफ़त अब उसे आकर्षित नहीं कर पाती । ऐसे में यदि काव्य-सागर के मंथन से निकले कुछ काव्य-रत्न उसे दिए जाएं तो वह अपनी जिंदगी को कटुता और वेदना में कुछ कमी महसूस कर सकता है । इसी विचार से प्रस्तुत संकलन में तीन सौ से अधिक विषयों पर कहे गए शेर एकत्रित किए गए हैं, जिनके साथ हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभव जुड़े हुए हैं और यह कोशिश की गई है कि तवज्जो शाइर के नाम पर नहीं, उसके द्वारा किसी विषय विशेष पर रचे हुए शेर पर ही दी गयी है ।  शेर के चयन में रदीफ-क्राफिया, कल्पना-शक्ति, उपमा-अलंकार पर इतना बल नहीं दिया गया है, जितना शाइर की आत्मा की व्याकुलता या उसकी मनोदशा की तीव्रता को मद्देनजर रखा गया है।
    उर्दू के सभी या अधिकतर शाइरों के प्रतिनिधि शेरों का यह संकलन अपने में एक अनूठा प्रयास है, जिसका हिंदी जगत् में निश्चय ही स्वागत किया जाएगा ।
  • Chuhiya Rajkumari Ka Svayamvar
    Vinod Sharma
    60 54

    Item Code: #KGP-931

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rangeya Raghava (Paperback)
    Rangey Raghav
    140

    Item Code: #KGP-461

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रांगेय राघव 
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रांगेय राघव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'पंच परमेश्वर', 'नारी का विक्षोभ', 'देवदासी', 'तबेले का धुँधलका', 'ऊँट की करवट', 'भय', 'जाति और पेशा, 'गदल', 'बिल और दाना' तथा 'कुत्ते की दुम और शैतान : नए टेकनीक्स'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रांगेय राघव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ek Koi Aur
    Amrik Singh 'Deep'
    250 225

    Item Code: #KGP-863

    Availability: In stock

    एक कोई और
    सुपरिचित कथाकार अमरीक सिंह दीप के अब तक पांच कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक वाक्य में कहा जाए तो दीप जी मानवीय समाज में पसरती पाशविकता और इंसानी रिश्तों में समाती संवेदनशून्यता के प्रति चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी कहानियां अधिकतर मनुष्यता के पक्ष में ही नहीं खड़ी दिखाई देतीं, बल्कि अमानवीय व्यवहार का मुखर विरोध भी करती हैं। उनके छठे कहानी-संग्रह ‘एक कोई और’ की कहानियां भी लेखक के इसी मनोभाव से उपजी हैं। भले ही इन कहानियों के कथानक, देशकाल, पात्र और कथोपकथन एक-दूसरे से भिन्न हैं, लेकिन इन सभी के मूल में आदर्श मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का स्वर सुनाई पड़ता है।
    इस संग्रह की कहानियां कुछ मायनों में दीप जी की पूर्ववर्ती कहानियों से अलग नज़र आती हैं। यानी ये कहानियां, कहानी के बने-बनाए फॉर्मेट से अलग खुद अपना आकार-प्रकार, गति और दिशा तय करती हैं। कुछ कहानियां तो अपने अंतिम सोपान तक पहुंचते-पहुंचते चौंकाती भी हैं। मिसाल के तौर पर कहानी ‘बर्फ़’ में एक मां का अपनी बेटी के प्रेमी के पास जाकर उसे मां बनाने का आग्रह करना, रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ती दिखती है। यहां पर याद आती है लेखक की एक और क्लासिक कहानी ‘देहदान’, जो पारंपरिक इंसानी रिश्तों को परिस्थितिवश नए ढंग से रचती है।
    इस संग्रह का आना इसलिए भी सुखद है, क्योंकि उम्र के सात दशक स्पर्श करने की दहलीज़ पर खड़े अमरीक सिंह पूरी ऊर्जा के साथ रचनारत हैं और धूल-धुएं और मेहनतकशों के शहर कानपुर की साहित्यिक रचनाशीलता में लगातार इज़ाफ़ा भी कर रहे हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200 180

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Ibbar Rabbi (Paperback)
    Ibaar Rabbi
    90

    Item Code: #KGP-1406

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : इब्बार रब्बी
    बचपन में महाभारत और प्रेमचंद होने का भ्रम, किशोर अवस्था में छंदों की कुंज गली में भटकने का भ्रम, फिर व्यक्तिवाद की दलदल में डुबकियां । लगातार भ्रमों और कल्पना-लोक में जीने का स्वभाव । क्या आज भी किसी स्वप्न-लोक के नए मायालोक में ही खड़ा हूं? यह मेरा नया भ्रम है या विचार और रचनात्मकता की विकास-यात्रा? क्या  पता । कितनी बार बदलूं।
    नया सपना है शमशेर और नागार्जुन दोनों  महाकवियों का महामिलन । इनकी काव्यदृष्टि और रचनात्मकता एक ही जगह संभव कर पाऊं । जटिल और सरल का समन्वय, कला और इतिवृत्तात्पकता एक साथ । ध्वनि का अभिधा के साथ पाणिग्रहण ।  नीम की छांह में उगे पीले गुलाबों की खुशबू से नाए रसायन, नए रंग और नई गंध जन्म लें । गुलाबों की शफ्फाक नभ-सी क्यारी में बीजों-सी दबी निबोलियां । इस नई मिट्टी और खाद से उगने वाले फूल, लताएं और वनस्पतियां बनें मेरी कविता ।
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 2 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7060

    Availability: In stock


  • Muhim
    Sitesh Alok
    280 252

    Item Code: #KGP-291

    Availability: In stock

    कहानियाँ किसी अन्य अनजान लोक से नहीं आतीं...हमारे बीच, हमारे आसपास ही उपजती और पनपती रहती हैं...किंतु कोई साहित्यकार ही अपनी पारखी दृष्टि से चुनकर और संवेदना से सँवारकर उन्हें शब्दों के संसार में स्थापित करता है। 
    बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. सीतेश आलोक ने गत तीन दशकों में साहित्य की अनेकानेक विधओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य, समसामयिक विषयों पर लेख आदि पर लिखी डॉ. आलोक की अनेक पुस्तकों को न केवल पाठकों ने सराहा, कई संस्थाओं ने सम्मान भी प्रदान किया। मौलिकता इनके लेखन की एक विशेषता है। इनके चरित्र एवं कथानक न तो किसी साँचे में ढलकर आते हैं और न किसी वाद से प्रभावित होकर रूपाकार ग्रहण करते हैं।
    डॉ. सीतेश आलोक उन इने-गिने लेखकों में से हैं जिनमें लीक से हटकर अनेक ऐसे विषयों पर भी लिखने का साहस है, जिन्हें अधिकांश लेखक छूने से भी कतराते हैं।
    इस संग्रह की अनेक कहानियाँ वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, साहित्य अमृत, नयी धारा आदि में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Qurratulain Hyder (Paperback)
    Qurratulain Hyder
    150

    Item Code: #KGP-269

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कुर्रतुलऐन हैदर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कुर्रतुलऐन हैदर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो', 'फोटोग्राफ़र', 'कारमिन', 'पतझड़ की आवाज़', 'जुगनुओं की दुनिया', 'कलंदर', 'कोहरे के पीछे', 'कुलीन', 'डालनवाला' तथा 'यह दाग-दाग उजाला' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कुर्रतुलऐन हैदर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Manch Andhere Mein (Paperback)
    Narendra Mohan
    60

    Item Code: #KGP-1335

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Topitantra Zindabad
    Sudhir Kumar Chaudhary
    50 45

    Item Code: #KGP-9103

    Availability: In stock

    टोपीतंत्र जिन्दाबाद
    व्यंग्य-लेखन के क्षेत्र में सुधीरकुमार चौधरी काफी आगे तक जाने की संभावना रखते हैं । उनका लेखन सहज है । लेखक की अपनी समझ व दृष्टि से उभरता है । उन पर किसी का असर नहीं है । हाँ, उनके लेखन में क्योंकि आक्रोश और अधीरता के बजाय तटस्थ चित्रण और मध्यममार्गी आलोचना का स्वर है, वे परसाई स्कूल से अधिक शरद स्कूल के निकट पडते हैं । पर इतनी तुलना उनके लेखन की शक्ल का अंदाज देने के लिए है । सच्चाई यह है कि सुधीर के व्यंग्य उनके अपने व्यंग्य हैं । 
    एक बात और गौर करने लायक है । वह है विषय का चुनाव । अर्थात् किन बातो पर सुधीर की नजर जाती है जिन पर व्यंग्य किया जा सके । सुधीर के विषय हल्ले-फुलके हैं । वे सद्य विकृति और हास्योत्पादक विसंगति को अपने घेरे में लेते है।  इस वजह से रचना हास्य की तरफ ज्यादा झुक गई है और 'लतियाव', 'जुतियाव' व 'ठुकाई' कम करती है जिसकी इस बेशर्म और उजड्ड जमाने को अब ज्यादा जरूरत है, लेकिन पूर्ण तो कोई लेखक नहीं होता । सुधीर की भाषा सीधी, स्पष्ट व रोचक है । हम एक परिपाक पत्रकार व उभरते साहित्यकार के सम्पर्क में हैं । 
    -अजातशत्रु 

  • Fantasia (Paperback)
    Vaughn Petterson
    245

    Item Code: #KGP-343

    Availability: In stock

    Touching on a wide range of different themes, Fantasia on a Theme of Thomas Tallis is a truly compelling read. Throughout the pages of his thought-provoking novel, the author, Vaughn Petterson, presents readers with a vivid portrait of the best and worst that humanity has to offer, inviting them to form their own conclusions about the respective moral weight of our various social folkways and mores. Written in a deeply lyrical style, Fantasia successfully incorporates the transformative media of art, music, and literature as a figurative backdrop for Joe’s personal metamorphosis—highlighting the significance of the arts in helping to change us in ways we could hardly imagine. Petterson also skillfully invokes higher levels of deeper thought in the reader, chiefly by inviting them to consider the deeper spiritual ramifications of the issues with which his characters are forced to contend—issues that rest at the core of our collective existence.
  • Buddha Ka Chakravarti Saamrajya (Paperback)
    Rajesh Chandra
    140

    Item Code: #KGP-85

    Availability: In stock

    श्री राजेश चन्द्रा की किताब बुद्ध पर हिंदी में लिखी हुई अनेक पुस्तकों के बीच एक ऐसी रचना है जो न सिर्फ पठनीय है बल्कि संग्रहणीय है। इसमें बहुत-सी सामग्री ऐसी है जो बहुतों के लिए संदर्भ सामग्री सिद्ध होगी।
    भारत में लगभग लुप्त हो चुकी बौद्ध संस्कृति डाॅ. अंबेडकर के बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद एक बार नई चेतना के रूप में दिखाई देने लगी है, पर विश्वस्तर पर बौद्ध धर्म का विस्तार आश्चर्यजनक रहा है। बृद्ध के समय से लेकर लगभग डेढ़ हजार बरसों से ज्यादा की अवधि में विश्व की लगीाग एक-तिहाई से ज्यादा जमीन बुद्धमय हुई। चीन, जापान और कोरिया जैसे बौद्ध देशों ने आर्थिक, सामाजिक और विज्ञान के क्षेत्र में आश्चर्यजनक इतिहास बनाया। आज समूचा पश्चिम एशिया अगर तकनीकी क्षेत्र में विश्वशक्ति बना तो इसलिए कि उसे बौद्ध विचारधारा ने ऊर्जस्वित किया था। भारत अगर एक पिछड़ा और प्रतिगामी देश बना रहा तो इसीलिए कि उसने बौद्ध धर्म का सम्मान करना पिछली अनेक सदियों से छोड़ दिया था।
    राजेश चन्द्रा की प्रस्तुत पुस्तक एक बार फिर नए सिरे से याद दिलाती है कि विश्व सभ्यता में बौद्ध धर्म और संस्कृति की धरोहर कितनी विराट् है। इसकी विराटता और विविधता की एक प्रामाणिक और विश्वसनीय तस्वीर सुधी पाठकों को इस किताब में मिलेगी। कई अर्थो में यह एक जरूरी किताब साबित होगी।
    —मुद्राराक्षस
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi
    Nilesh Raghuvanshi
    240 216

    Item Code: #KGP-7816

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    --मंगलेश डबराल

    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।    
    --केदारनाथ सिंह


  • Mere Saakshatkaar : Shiv Prasad Singh
    Shiv Prasad Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2024

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : शिवप्रसाद सिंह
    शिवप्रसाद सिंह स्वीकार करते हैं कि "मैं भाव और रूप को अपनी क्षमता पर बाँध सकने की कोशिश में कुछ भी उठा नहीं रखता । उनका यह भी मानना है कि सत्य तो साक्षात् देखा होने पर भी भाषा की गुंजलक में अँट नहीं पाता । अधूरे सपने पूरे मानसिक ताप में जब पिघलते हैं तो सही क्षण पहचानकर उन्हें भी में डालना, शीतल करना और फिर बाहर निकालकर चमक दे देना कलाकार की तपस्या है । उसकी डाई (साँचा) विश्व के किसी भी अन्य कथाकार-रचनाकार से मेल नहीं खाती, न तो कहीं से कोई सादृश्य ही रखती है, यहीं वैयक्तिक स्वतन्त्रता रचनाकार की निजी धरोहर और यही उसके मन की प्रतिबद्धता भी ।
    साक्षात्कारों में अक्सर प्रस्तुतकर्ता की अपनी समझ रूपायित होती है, पर जो पाठक प्रश्न के साथ जुड़े हो उन्हें उत्तर से भी जुड़ना लाजिम नही है । शिवप्रसाद सिंह कहते है कि प्रेमबंधन को चटकाकर तोड़ने पर गाँठ पड़ना अनिवार्य है । जुड़ना बिना ग्रंथि के संभव नहीं होता, पर इससे धीरे-धीरे धागा छोटा होता रहता है । उसे अगर पहली स्थिति में लाना हो तो गांठें खोलिए और तब वह धागा वस्तु-जगत को प्रेम की डोर से बाँध लेगा ।
    यह नई पुस्तक साक्षात्कारों पर केंद्रित है जिसमें उनके समवयस्क या नई पीढी, समकालीन पीढी से जुड़े रचनाकारों, पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर है । शायद इनमें से कोई प्रश्न आपका भी हो, तो उत्तर पर सोचिए--
  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Ye Galion Ke Bachche
    Rekha Rajvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9119

    Availability: In stock

    इस किताब में गलियों के बच्चों की कहानियां, कहानियां नहीं बल्कि एक कड़वा सच है । बेतरतीब बिखरे पन्नों को समेटकर इन बच्चों के जीवन की वास्तविकता को सबके समक्ष लेन का इसमें प्रयास किया गया है । छह अध्यायों के माध्यम से इन बच्चों की जीवनगाथा को सुधी पाठकजनों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है । 
    यह अध्याय गलियों के बच्चों की समस्याओं को उजागर करने के लिए किया गया छोटा-सा प्रयास है । 
  • Naath Siddhon Ki Rachnayen
    Hazari Prasad Dwivedi
    295 266

    Item Code: #KGP-209

    Availability: In stock


  • Kuchh Kahi Kuchh Ankahi
    Sheela Jhunjhunwala
    495 446

    Item Code: #KGP-1938

    Availability: In stock

    कुछ कही कुछ अनकही
    ...निहायत दिलचस्प शैली, प्रवहमान भाषा-परिवार से लेकर पूरे परिवेश तक से जुडे लोग और स्थितियां...यह किताब शुरु से अंत तक रहस्य/रोमांच/प्रेम/संघर्ष/राजनीती/ परिवार/प्रशासन/टकराव/उपलब्धि और फिर नियति के अनेकानेक खेलों से साक्षात्कार कराती है...
    झुनझुनवाला जी रेवेन्यु डिपार्टमेंट के एक आला अफसर थे । छापे डालने के तनावपूर्ण क्षणों में ये लोग किस-किस तरह के खतरे उठाते हैं…धन की दुनिया से किस तरह के प्रलोभन और हथकंडे काम में लाए जाते है और उस चक्रव्यूह को भेदने में ये लोग क्या-क्या पापड बेलते हैं, यह शायद पहली बार इस किताब से जानने को मिलेगा । समसामयिक राजनीति और शासन तंत्र के अनुभवों पर सटीक टिप्पणियों के साथ-साथ इस पुस्तक से आपातकाल संबंधी कतिपय प्रचलित धारणाओं के बारे में एक नए पहलू से सोचने का मौका भी मिलेगा।
    --कन्हैयालाल नंदन (नई दुनिया से)
    इतनी आसान, इतनी सहज।  ऐसा लगता है कि आप अपने गली-कूचे के बारे से बात कर रहे हैं । चाहे वह कानपुर हो या इलाहाबाद या बंबई, शीलाजी ने अपने समय का अत्यंत जीवंत चित्रण किया है और मुश्किल बातो को भी सरलता से, सहजता से और अपनत्व से कहा है । एक ईमानदार किताब जिसमें से हर क्षण ईमानदारी झलकती दिखाई देती है । -कमलेश्वर
    'कही-अनकही' में बनावट कहीं नहीं है । सब कुछ सहज भाव से कहा गया है । कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि हम कोई उपन्यास पढ़ रहे है, रहस्य-रो,मांच से भरा उपन्यास और कही-कही अंतरंग, आत्मिक क्षणों को दिखाता हुआ गृहस्थ जीवन।  एक क्षण को भी नहीं लगा कि यह वर्णन कृत्रिम है । -विष्णु प्रभाकर
    रूढ़ियों को भेदकर स्वतन्त्रता की चिनगारियों के साथ-साथ परिवार में तालमेल बिठाने जैसी घटनाएं सार्थक संदेश देती हैँ। -डॉ. शेरजंग गर्ग
    ...बहुत कुछ होने के साथ-साथ बेहद इनसानी रिश्तों की झलक । -नासिरा शर्मा
    'कुछ कही कुछ अनकही' एक मर्यादित प्रेम-प्रसंग के बाद जिंदगी की जद्दो-जहद से गुजरते हुए जहां पहुँचती है वहाँ आसपास के लोग भी उसका एक हिस्सा हो जाते हैं । विवरण रोचक, प्रवाहपूर्ण और तथ्यपरक हैँ। आत्मकथा होते हुए भी यह संयमित है, मर्यादित है और आत्म-श्लाया  से परे है । -पदमा सचदेव
    ...रहस्य, रोमांच, तिलिस्म, रोमांस-सब एक जगह इकट्ठा कर दिया गया है। ...मर्यादित जीवन के सिद्धांत को पकडे हुए अपने समय का जीवंत खाका ।
    -वसंत साठे
    ...महानगरों में रहने वाले मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन के दिन-प्रतिदिन की ऊहापोह और जिजीविषा की खोज में आगे बढ़ते जाने की ललक जगह-जगह आभासित होती है। -डॉ. क्षमा गोस्वामी (वागर्थ से)
    ...सभी प्रणय-चित्रों में गरिमापूर्ण और सधी हुई मानसिकता के साथ एक सतत ठहराव है, छिछोरापन या आजकल जैसा उर्च्छाखाल प्रेम नहीं है-वह जो सीमाएं लांघकर बह जाता है । -डॉ. कुसुम अंसल (संचेतना में)
    सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद, राग-विराग सबसे मिलकर बना है जीवन और इसी में उसकी संपूर्णता है । तटस्थ भाव से जो इस संपूर्णता की अनुभूति करता है, वही एक सफल संस्मरण-लेखक भी होता है । इस बात का अहसास 'कुछ कहीँ कुछ अनकही' पढ़कर और अधिक हुआ ।...यह पुस्तक अपने समय को ईमानदारी से रेखांकित करती है ।
    -राधेश्याम (दैनिक हिंदुस्तान में)
    स्त्री-विमर्श का यह आत्मवृत्त अपने निजी, वैयक्तिक अनुभवों और अनुभूतियों से गुजरता हुआ सामाजिक- सार्वजनिक दृष्टि को मुकम्मल रूप में हमारे सामने परिभाषित करता है ।
    -लक्ष्मीकांत मुकुल (समकालीन भारतीय साहित्य में)
    पुस्तक ने भारतीय महिला पत्रकार की आंखों से देखे हुए एक बेहद रोचक कालखंड को जिया है । प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक यह रोचकता, रोमांच और कहीं-कहीं रूमानी वासंतीपन लिए हुए है। मार्मिक क्षण भी हैं ।
    -पाञ्चजन्य 
    …कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, पत्र, डायरी आदि अनेक चिताओं से साक्षात्कार कराती एक अत्यंत पठनीय पुस्तक ।
    -रवीन्द्र कालिया
  • Kagaar Ki Aag Tatha Anya Radio Naatak
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1888

    Availability: In stock

    कगार की आग तथा अन्य रेडियो नाटक
    लेखक का बहुचर्चित उपन्यास है- 'कगार की आग' । उस पर आधारित नाटक का कई बार मंचन हुआ । रेडियो रूपक भी उस पर बना । इसके अतिरिक्त तेरह कडियों का रेडियो धारावाहिक भी प्रसारित हुआ ।
    आस्ट्रेलिया को केनबरा यूनिवर्सिटी में वर्षों तक वह पाठ्यक्रम में पढाया जाता रहा है । पंजाबी, डोगरी, मराठी, कोंकणी, उडिया आदि के अतिरिक्त उसका अंग्रेजी, नार्वेजियन, चीनी, बर्मी, नेपाली तथा बांग्ला में (बांग्लादेश में) भी रूपांतर हुआ ।
    ‘कगार की आग’ के अलावा 'हरा सूरज' रेडियो धारावाहिक भी चर्चा का विषय रहा । इनके साथ-साथ ‘कांछा', 'सु-राज', 'तपस्या', 'अगला यथार्थ', ‘इस बार’, 'स्वभाव' आदि अनेक रचनाएँ इस श्रृंख़ला में शामिल है । 'तरपन', 'सूरज की ओर’ तथा 'सु-राज' पर फ़िल्में बनी । 'सु-राज’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भारत की ओर से भेजा गया । 'तुम्हरे  लिए' पर तेरह किस्तों का दूरदर्शन-धारावाहिंक तैयार हुआ ।
  • Yaadon Ke Galiyaare Se
    Ramesh Chandra Diwedi
    180 162

    Item Code: #KGP-9321

    Availability: In stock

    साहित्य समाज का दर्पण है। काव्य समाज का स्वरूप है। समाज के अनुरूप ही काव्य की रचना होती है। यह धारणा अनादिकाल से चली आ रही है, जो आज भी चरितार्थ है। काव्य और साहित्य का अन्योन्याश्रय संबंध है। अद्यतन कवि की रचना संसर्ग से प्रभावित होती है। चूँकि कवि भ्रमणशील होते हैं, इसलिए संसर्ग गुणों का प्रभाव उन पर पड़ता ही है। ‘संसर्गजा दोष गुणा भवंति’ यह सूक्ति सार्थक प्रतीत होती है। साथ ही आज काव्य की रचना समाज की माँग के अनुरूप होती है। कवि जब आत्मा की आवाज को सुनकर रचना करता है, तब वह हृदयस्पर्शी हो जाता है। कवि की कवित्व शक्ति अनंत होती है। यह पूर्व संस्कारों से मिलती है। ‘नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा’।
    ब्रह्मा की सृष्टि में केवल छह रस होते हैं—कटु, अम्ल,कषाण, लवण, तिक्त तथा मधुर किंतु कवि की सृष्टि में  शृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, बीभत्स, अद्भुत, भयानक और शांत नौ रस होते हैं। कवि अपने संकल्प मात्र से ही किसी रस का आवाहन कर सकता है, पर ब्रह्मा के रस को प्राप्त करने के लिए अन्यान्य उपकरणों की आवश्यकता होती है। कवि का अपना एक काव्य लोक होता है। काव्य कल्पना पर आधरित है। कल्पना का आधर सत्य है। यह आधर कवि को समाज से प्राप्त होता है।
    कविता, कवि के हृदय की वह ध्वनि है, जो मुँह से अथवा लेखनी से निकलते समय कवि को भी अचेत कर देती है। सुनने के बाद ही कवि को भी पता चलता है कि उसने क्या कहा। ऐसी ही कविता काव्य लोक में समादृत होती है।
    आज शहरी सामाजिक जीवन तथा संस्कृति में सिमटा भारत गाँव की ओर उन्मुख हो रहा है। ग्रामीण भारत को शहर में लाने का प्रयास कर रहा है। सरकारी तंत्रा भी ग्रामीण विकास पर अधिकाधिक बल दे रहा है। महात्मा बुद्ध ने भी राजभवन छोड़कर शांति के लिए ग्राम और वन की ओर प्रस्थान किया था। इस सामाजिक परिवेश में रचित यह काव्य संग्रह समाज और परिवारों के उन अनछुए स्वरूप को सामने लाया है, जो बुध जन हृदय के किसी कोने में दम तोड़ रहा था।
    —रमेश चन्द्र द्विवेदी

  • Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap
    Madan Kashyap
    150 135

    Item Code: #KGP-225

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : मदन कश्यप
    'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
    'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
    'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
    'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'
  • Navjaagran Aur Mahadevi Verma Ka Rachana-Karm Stri-Vimarsh Ke Svar
    Krishna Dutt Paliwal
    445 401

    Item Code: #KGP-624

    Availability: In stock

    नवजागरण और  महादेवी वर्मा का रचना-कर्म स्त्री-विमर्श के स्वर
    महादेवी वर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष में यह सोचकर हृदय में  पीडा होती है कि उन जैसी भारतीय स्वाधीनता-आंदोलन की लय से निमग्न कवयित्री के साथ हिंदी-आलोचना के मर्दवाद ने ऐसा सलूक क्यों किया?
    उनके सृजन के नवजागरणवादी  पक्ष को अनदेखा करते हुए 'रहस्यवाद-अध्यात्मवाद' में लपेटकर उसे पूरी तरह छिपा दिया गया । आखिरकार क्यों?
    ऐसा क्यों हुआ कि देश और समाज के लिए किया गया उनका मौन-मुखर विद्रोह पूरी तरह 'विस्मृति' के अंधकार में धकेल दिया गया ?
    आज इस स्थिति पर दूर तक स्त्री-विमर्श की अवधारणाओं से सोचने की ज़रूरत है ।
  • Sarla : Ek Vidhva Ki Aatmjeevani
    Pragya Pathak
    100 90

    Item Code: #KGP-2062

    Availability: In stock


  • Bhakt Soordas
    Chandrika Prasad Sharma
    190 171

    Item Code: #KGP-140

    Availability: In stock


  • Tantu (Paperback)
    Bhairppa
    345

    Item Code: #KGP-7084

    Availability: In stock


  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen Kuchh Purush
    Khushwant Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-1881

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Shankhnaad
    Raj Budhiraja
    140 126

    Item Code: #KGP-118

    Availability: In stock

    शंखनाद
    "गांधी जी अगर राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे । महर्षि जी हमारी राष्ट्रीय  प्रवृत्ति और स्वाधीनता आंदोलन के आद्य-प्रवर्तक थे। गांधी जी उन्हीं के पदचिन्हों  पर चले । यदि महर्षि हमें मार्ग न दिखाते तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान हो जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता।" —अनंतशायनम् आयंगर
    "महर्षि दयानंद भारतमाता के उन प्रसिद्ध और उच्च आत्माओं में से थे, जिनका नाम संसार के इतिहास से सदैव चमकते हुए सितारों की तरह प्रकाशित रहेगा । वे भारतमाता के उन सपूतों में से हैं, जिनके व्यक्तित्व पर जितना भी अभिमान किया जाए थोड़ा है ।  नेपोलियन और सिकंदर जैसे अनेक सम्राट एवं विजेता संसार में हो चूके है, परंतु स्वामी जी उन सबसे बढ़कर थे ।" —खदीजा बेगम
    “बहुत-से लोग महर्षि दयानंद को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं, परंतु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेश प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान और स्वराज्य की घोषणा—यह सब बहुत पहले से देश को दिया है ।" —विट्ठलभाई पटेल
  • Vishaad Math
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-54

    Availability: In stock


  • Computer Yaani Masheeni Dimaag
    Shuk Deo Prasad
    125

    Item Code: #KGP-1159

    Availability: In stock

    कम्प्यूटर यानी एक मशीन —'मशीनी दिमाग' (Electronic brain) , जिसके अंदर बिछा होता है अनगिनत तारों का मायाजाल। 
  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Shuk Deo Prasad
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Kavi Ne Kaha : Arun Kamal
    Arun Kamal
    190 171

    Item Code: #KGP-380

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: अरुण कमल
    यहाँ जो कविताएँ संकलित हैं वे मेरी सभी चार प्रकाशित कविता-पुस्तकों एवं आने वाली पुस्तक से ली गई हैं। कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो इन पुस्तकों के बाहर की हैं जो लिखी तो पहले गईं परंतु जिनका समावेश नहीं हो सका। ये कविताएँ मैंने खुद चुनी हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाकी कविताएँ जो यहाँ नहीं हैं वे इनसे हीनतर हैं या उनसे मेरा स्नेह कम है। हो सकता है कुछ लोगों को वे ही अधिक पसंद आवें। चाहिए तो यह कि किसी भी कवि की सभी रचनाओं को यानी पहली से लेकर अब तक एक साथ पढ़ा जाए। तब जाकर चित्र पूरा होता है क्योंकि कोई भी एक कविता अपने में पूरी नहीं होती, उसकी नाल किसी पिछली में होती है और मंजरी आगे बहुत दूर चलकर दिखलाई पड़ती है। इसलिए कई बार ओझल रह जाने वाली कविताएँ ध्यान देने पर बहुत महत्त्वपूर्ण लगती हैं।
  • Raseedi Ticket
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-2068

    Availability: In stock


  • Bol Ri Kathputali
    Malti Joshi
    120 108

    Item Code: #KGP-9032

    Availability: In stock


  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-479

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Pakistan Mein Waqt Se Mulaqat
    Shyam Vimal
    300 270

    Item Code: #KGP-255

    Availability: In stock

    लेकिन पैसा हर जगह वह काम नहीं करता जो काम मीठी हमबोली कर जाती है। यही तो हुआ मेरे साथ मैं मुलतानी बोली में उन सज्जनों से परिचय व बातचीत कर रहा था, बदले में जहां उन्होंने मुझे कोल्ड ड्रिंक पेश किया, वहां उन्होंने मोची के तयशुदा पॉलिश के दस रुपए नहीं लिए। मोची तक ने मना कर दिया लेने सै। मैं हिंदू पकिस्तान के इस नगर में पराया नहीं माना गया-हमवतनी माना। उनके इस प्रेम ने मुझे अभिभूत कर दिया। जूती पहनकर लौट लिया पैदल अपने डेरे पर। 
    इस पैदल चलने में मुझे फायदा यह था कि मैं पहले के देखे हुए इलाके में अपनी उन जगहों को, गलियों को पहचान सकूं जिनसे मैं कई दफा गुजरा होऊंगा। मुझे ऐसा लगता रहा, मैं वक्त के खोल में कैद हूँ और पारदर्शी बुलबुले समान उस खौल का सुरक्षाकवच पहने हूँ और वर्तमान में उस पार के अतीत को निहारने में कामयाब हो रहा हूं। चलते-देखते एक जगह कामयाबी मिल गई। भीड़ से भरे उस गली के मुहाने को अंदाज से पहचान लिया कि हां, यह वही गली है जहाँ मेरी भरजाई का ननिहाल है-होता था ।
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati
    Gyanendrapati
    150 135

    Item Code: #KGP-163

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर!
  • Hindi Sahitya : Sarokaar Aur Saakshaatkaar
    Dr. Arsu
    300 240

    Item Code: #KGP-9031

    Availability: In stock

    हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार
    हिंदी मात्र हिंदीभाषी क्षेत्र की ही नहीं, बल्कि इस विशाल समूचे देश की भाषा बन चुकी है और उसे यह स्थान दिलाने में अनुवाद के आदान-प्रदान के साथ हिंदीतर क्षेत्र के साहित्यकारों द्वारा हिंदी को अपनाए जाने से संभव हुआ है। हिंदीतर क्षेत्र के अनेक साहित्यकार अपने क्षेत्र के भाषायी साहित्य के साथ हिंदी साहित्य और उसके सरोकारों से गंभीरतापूर्वक जुड़े हुए हैं। डॉ. आरसु हिंदीतर भाषी क्षेत्र के मूर्धन्य साहित्यकार है । वह कालिकट विश्वविद्यालय से हिंदी विभाग के प्राध्यापक है, साथ ही सृजनशील साहित्यकार तथा मर्मग्राही समीक्षक हैं।

    केरल के मलयालमभाषी डॉ० आरसु की यह पुस्तक 'हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार' इस तथ्य को भली भाँति प्रमाणित करती है कि हिंदी साहित्य की प्रवृतियों और प्रणेताओं पर उनकी निरीक्षण और विश्लेषणपरक वृष्टि कितनी गहरी है । आठवें दशक के हिंदी साहित्य की धाराओं के बारे में सृजन संवाद इस कृति की अनूठी विशेषता है । विदेशो से रहकर निष्ठापूर्वक हिंदी की श्रीवृद्धि करने वाले लेखकों व अनुवादकों के साथ डॉ० आरसु के आंतरिक संवाद, जो वैश्चिक स्तर पर हिंदी के विकास का द्योतक है, को भी इससे कुशालता के साथ रेखांकित किया गया है ।

  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Teen Laghu Upanyas : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    150

    Item Code: #KGP-211

    Availability: In stock


  • Abhang-Gaatha
    Narendra Mohan
    140 126

    Item Code: #KGP-9138

    Availability: In stock

    ‘खोए हुए शब्द को, अभंग को, सृजनशक्ति को पुनः पाने की तुकाराम की बेचैनी अभूतपूर्व है जो उसे हर युग के कवि की बेचैनी के मिथक के रूप में खड़ा कर देती है। शब्द, सृजन और जिंदगी उनके लिए अलग-थलक नहीं, एक ही हैं। शब्द की इस कैफियत के साथ तुकाराम का मुझ तक पहुंचना एक कवि के एक नए पाठ के खुलने के बराबर है जिसके लिए एक क्या, कई नाटक लिखे जा सकते हैं।’
    ये शब्द हैं डाॅ नरेन्द्र मोहन के जिन्होंने अभंग-गाथा नाटक में तुकाराम की जिंदगी और अभंग-रचना को आज के दहकते हुए संदर्भों से जोड़ दिया है। नाटक के निर्देशक सतीश दवे ने अपने वक्तव्य में ठीक ही कहा है ‘पहली बार जब मैंने अभंग-गाथा का नाट्य आलेख उनसे सुना तो मुझे महसूस हुआ जैसे तुकाराम का मानवीय व्यक्तित्व कई दृश्यों की श्रृंखला में मेरे सामने मूर्तिमान हो गया हो और एक साथ कई रूपाकारों ने मुझे घेर लिया हो। मुझे लगा तुकाराम अपने युग से बाहर आकर मेरे सामने आ खड़े हुए हों और उस वक्त की परिस्थिति, समय और इतिहास मेरी परिस्थिति, समय और इतिहास से जुड़ने-टकराने लगा हो।’
    अभंग-गाथा में शब्द और रंग साथ-साथ हैं। एक-दूसरे को प्रकाशित-स्पंदित करते हुए। इस नाटक को खेलना, इसीलिए, रंगकर्म का एक सांझा अनुभव बनता गया है। अभंग को यहां रंग-संगीत शैली का हिस्सा ही बना दिया गया है और यह शैली नाटक के भीतरी रंग-संयोजनों से मिलकर ही मंच पर आई है। 
  • Charitra-Nirmaan : Kya? Kyon? Kaise?
    Dhram Pal Shastri
    100 0

    Item Code: #KGP-142

    Availability: In stock

    चरित्र-निर्माण : क्या ? क्यों ? कैसे ?
    लोगों का यह वहम है कि संत-महात्माओं को ही चरित्र  को आवश्यकता है, गृहस्थियों और दुनियादारी को नहीं । सब जानते है कि संत लोग जंगल के एकांत में रहते हैं। न उन्हें ऊधो का लेना, न माधो का देना । न किसी से मिलना-मिलना, न किसी प्रकार का व्यापार- व्यवहार करना । इस प्रकार जो रहता ही अकेला है, भला वह किसी को सतायेगा क्या ? झूठ बोले तो किससे ? धोखा दे तो किसे ? अत:, उनके जीवन में शान्ति-संतोष और भगवदभजन के अतिरिक्त अन्य चारित्रिक गुणों का व्यवहार करने के अवसर ही बहुत कम आते हैं।
    इसके विपरीत हम दुनियादारों का तो लोगों से दिन-रात का संबंध है । बच्चे से लेकर बूढे तक हर एक को दिन में बीसियों, पचासों और सैकड़ों लोगों से निपटना पड़ता है, जिनमें कुछ अच्छे लोग भी होने है, कुछ बुरे भी; नरम भी, गरम भी; पढे-लिखे भी, अनपढ़ भी; भोले-भाले भी, चतुर-चालाक भी, सच्चे भी, झूठे भी, मीठे भी, कड़वे भी । इस प्रकार अनगिनत प्रकार के और रंग-बिरंगे स्वभाव के लोगों के साथ व्यवहार करना कोई खालाजी का घर नहीं । यहीं मनुष्य के चरित्र की असली परख होती हैं । यहीं उसके चारित्रिक गुण प्रकट करने के पर्याप्त स्थान और अवसर आते हैं। ऐसे अवसरों पर कदम-कदम  पर उसे चरित्र की अनावश्यकता पड़ती है । हम तो कहते हैं कि चरित्र के बिना दुनिया में किसी भी आदमी का कोई भी काम नहीं चल सकता । 

  • Poster (Paperback)
    Shanker Shesh
    40

    Item Code: #KGP-943

    Availability: In stock

    शंकर शेष
    डॉ. शंकर शेष साठोत्तर नाटक और रंगमंच के सशक्त हस्ताक्षर हैं। प्रयोगधर्मी नाटककार के रूप में आपकी ख्याति रही है। आपके नाटक और एकांकी समय-समय पर खेले जाते रहे और दर्शकों ने इन प्रयोगों को काफी सराहा है। डॉ. शंकर शेष मराठी भी जानते थे। उन्होंने मराठी से कुछ नाटकों का अनुवाद भी किया है।
    ० 
    2 अक्तूबर, 1933, बिलासपुर (म.प्र.) में जन्म
    नागपुर विश्वविद्यालय से 1956 में बी.ए. ऑनर्स (प्रथम श्रेणी) 
    1960 में पी-एच.डी.
    बंबई विश्वविद्यालय से 1976 में एम.ए. लिंग्विस्टिक (प्रथम श्रेणी)
    वर्ष 1956 से जीवनपर्यंत रंगमंच से संबद्ध
    मध्य प्रदेश शासन द्वारा ‘बाढ़ का पानी: चंदन के द्वीप’ और 
    ‘बंधन अपने-अपने’ कृतियां पुरस्कृत 
    फिल्म ‘दूरियां’ के लिए ‘फिल्मफेयर पुरस्कार’ प्राप्त
    फिल्म ‘घरौंदा’ तथा ‘दूरियां’ के लिए ‘आशीर्वाद पुरस्कार’ प्राप्त
    साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा ‘कोमल गांधर’ पुरस्कृत
    28 अक्तूबर, 1981 को श्रीनगर (कश्मीर) में निधन।
  • Mere Saakshaatkaar : Shrilal Shukla
    Shree Lal Shukla
    190 171

    Item Code: #KGP-173

    Availability: In stock


  • Baldev Vanshi Kavita-Samagra ( 3 Vols.)
    Baldev Vanshi
    1750 1575

    Item Code: #KGP-690

    Availability: In stock

    Complete set of 3 Books.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha (Paperback)
    Vijaydan Detha
    90

    Item Code: #KGP-7012

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : विजयदान देथा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार विजयदान देथा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'लजवन्ती', 'दूजौ कबीर', 'फितरती चोर', 'बडा कौन', 'दूरि, 'सिकन्दर और कौआ', 'राजीनामा', रैनादे का रूसना', 'अनेकों हिटलर' तथा 'हाथी-कांड' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक विजयदान देथा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Charitraheen (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    280

    Item Code: #KGP-727

    Availability: In stock


  • Kailash Par Chandni
    Sudarshan Vashishath
    75 68

    Item Code: #KGP-1921

    Availability: In stock

    कैलास पर चांदनी
    यात्रा एक सेतु है । जोड़ती है एक को दूसरे से । पहाड को सागर से । शंख को भोज-पत्र से । यात्रा नाम है अन्वेषण का। यात्रा जहाँ नये-नये दृश्य उपस्थित करती है, वहाँ नई खोज की एक दिशा भी निर्धारित करती है ।
    ...वास्तव में संस्कृति पर लेखन एक बहुत कठिन और दुरूह काम है । संस्कृति एक कांचघर है जिसके भीतर साफ दिखाई देने वाला कई बार वह नहीं होता जो दिख रहा है । संस्कृति को बाहर से देखना भ्रामक है ।
    'व्यास की धरा' के बाद सुदर्शन वशिष्ठ की यह दूसरी पुस्तक संस्कृति पर लेखन में एक नया अध्याय जोड़ेगी, ऐसा हमारा विश्वास है ।

  • Kavi Ne Kaha : Kedar Nath Singh (Paperback)
    Kedarnath Singh
    90

    Item Code: #KGP-1307

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के अब तक प्रकाशित संपूर्ण कृतित्व से उनकी प्रतिनिधि कविताओं को छाँट निकालना एक कठिन काम है और चुनौती भरा भी। इस संकलन को तैयार करने में पहली कसौटी मेरी अपनी पसंद ही रही है। पचास वर्षों में फैले कृतित्व में से श्रेष्ठतर को छाँटकर यहाँ प्रस्तुत कर दिया है, ऐसा दावा मेरा बिलकुल नहीं है। हाँ, इतनी कोशिश अवश्य की है कि केदार जी की कविता के जितने रंग है, जितनी भगिमाएँ है उनकी थोडी-बहुत झलक और आस्वाद पाठक को मिल सके...यूँ चयन-दृष्टि का पता तो कविताएँ खुद देंगी ही।
    कविताओं को चुनने और उन्हें अनुक्रम देने में यह कोशिश जरूर रहीं है कि पाठकों को ऐसा न लगे कि कविताओं को यहाँ किसी विशिष्ट श्रेणीबद्ध क्रम में बाँटकर सजाया गया है। भिन्न भाव बोध, रंग और मूड्स की कविताओं को एक साथ रखकर बस घंघोल भर दिया है-एक निरायासज़न्य सहजता के साथ पाठकों को पढ़ते समय जिससे किसी क्रम विशेष में आबद्ध होकर पढने जैसी प्रतीति न हो, बल्कि तरतीब में बनावटी साज-सज्जा से दूर एक मुक्त विचरण जैसा प्रकृत आस्वाद मिल सके ।
  • Baba Shekh Fareed
    Kedarnath Singh
    120 108

    Item Code: #KGP-367

    Availability: In stock


  • Ek Vyakti Narendra Kohli (Paperback)
    Narendra Kohli
    80

    Item Code: #KGP-7100

    Availability: In stock


  • Media Aur Hindi Sahitya
    Raj Kishore
    250 225

    Item Code: #KGP-303

    Availability: In stock

    मीडिया और हिंदी साहित्य
    मीडिया और साहित्य का रिश्ता बिगड़ चुका है। इसमें संदेह नहीं कि आदर्श या लक्ष्य की दृष्टि से दोनों की मूल संवेदना एक है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को शिक्षित करना और सभ्यता के स्तर को ऊँचा उठाना है। दोनों भाषा में ही काम करते हैं, जो एक सामाजिक घटना है। इसके बावजूद आज मीडिया और साहित्य के बीच गहरी होती हुई खाई दिखाई देती है। यह खाई चिंताजनक इसलिए है कि मीडिया की पैठ और लोकप्रियता अधिक होने के कारण जनसाधारण के संस्कारों और रुचियों का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। दूसरी तरफ, साहित्य की दुनिया संकुचित होती जाती है और उसकी संवेदना का सामाजिक विस्तार नहीं हो पाता। इस तरह, संस्कृति की दुहरी क्षति होती है।...
    जहाँ तक साहित्य और मीडिया के रिश्ते का सवाल है, हिंदी का मामला न केवल कुछ ज्यादा निराशाजनक है, बल्कि ज्यादा पेचीदा भी है। साधारण जनता से सीधे जुडे़ होने के कारण हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की सामाजिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। संस्कृति की दृष्टि से हिंदी का संसार एक विकासमान संसार है। हिंदी प्रदेशों में साक्षरता का स्तर हाल ही में बढ़ा है और पढ़ने तथा जानने की भूख जगी है। मीडिया का काम इस भूख को सुरुचि-संपन्नता के साथ तृप्त करना है और व्यक्ति के सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकारों को मजबूत करना है। कुछ समय पहले तक स्थिति जैसी भी थी, बहुत अधिक असंतोषजनक नहीं थी। मीडिया में लेखकों का मान था और साहित्य के लिए कुछ सम्मानजनक स्थान हमेशा सुरक्षित रहता था, लेकिन आज नौबत यह है कि दोनों के बीच अलंघ्य दूरी पैदा हो चुकी है। ऐसे में सामाजिक दबाव का रास्ता ही असरदार हो सकता है। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    200 180

    Item Code: #KGP-0001

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बाबू', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan (Paperback)
    Mannu Bhandari
    150

    Item Code: #KGP-1426

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है। 
  • Vastunishth Hindi (Paperback)
    Pooran Chand Tandon
    180

    Item Code: #KGP-7028

    Availability: In stock

    आज वर्तमान समय दौड़ का समय है जहाँ स्पर्धा है, प्रतियोगिता है जिनके चलते सभी विषयों के रूप-उपरूप उनके ही अनुरूप गढ़ा जाने लगा है । यदि आज की प्रतियोगी परीक्षाओं पर दृष्टपात करे तो हम पाते हैं कि विभिन्न परीक्षा-संस्थाओं द्वारा परीक्षार्थी के ज्ञान को मापने के लिए कुछ नए सूत्र ईजाद किये गए है, जिसके अंतर्गत वे कम से कम समय में प्रतिभागी के सकल ज्ञान की परीक्षा ले लेना चाहते हैं । 'कर्मचारी चयन आयोग' हो अथवा 'संघ लोक सेवा आयोग' सभी आज आधुनिक रीति से ज्ञान की परीक्षा ले रहे हैं जिसमें वस्तुनिष्ठ प्रश्नों द्वारा परीक्षा लेना रामबाण सिद्ध हुआ भी है । इसके माध्यम से परीक्षार्थी के समग्र ज्ञान की परीक्षा कुछ ही समय में हो जाती है । वस्तुनिष्ठ प्रश्न व्यवस्था वास्तव में है क्या ? इस पद्धति के अंतर्गत जो भी प्रश्न पूछा जाता है उस प्रश्न के चार वैकल्पिक उत्तर होते हैं । उन चारों उत्तरों में से एक ही उत्तर सही होता है । परीक्षार्थी को उस सही उत्तर का चयन करना पड़ता है । 
    स्तर की गरिमा तथा विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए संपूर्ण हिंदी साहित्य, काव्यशास्त्र तथा भाषा-विज्ञान से ऐसे प्रश्नों को चुना है जो की परीक्षा एवं ज्ञान दोनों की दृष्टि से सहायक हों । वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के अतिरिक्त अंत में तथ्यात्मक पक्ष के अंतर्गत विद्यार्थियों की सुविधा हेतु प्रश्नों एवं उत्तर को भी आमने-सामने रख गया है । इससे विद्यार्थी वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का ज्ञानार्जन तो कर ही सकेंगे, साथ  ही कुछ अन्य तथ्यात्मक पहलुओं से भी अभिज्ञ हो सकेंगे ।
  • Bhrashta Samaaj (Paperback)
    Chandan Mitra
    90

    Item Code: #KGP-7048

    Availability: In stock


  • Pratidin (3 Vols.) (Paperback)
    Sharad Joshi
    750

    Item Code: #KGP-7107

    Availability: In stock

    प्रतिदिन (तीन खंड)
    शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।
    सबसे पहले मेरे मन से वे दिन आ रहे हैं, जब ‘नवभारत टाइम्स' के आखिरी पन्ने के कोने में, शरद जोशी की फोटो के साथ बमुश्किल तमाम दस-पंद्रह पंक्तियों से लेकर पच्चीस- तिस पंक्तियों तक का छोटा-सा व्यंग्य कॉलम लगभग रोज आता था । इस छोटे-से कोने ने तब देश में अखबार पढ़ने के तरीके बदल दिए थे । हम जैसे तमाम लोग पिछले पन्ने से अखबार शुरू करने लगे थे । उत्सुकता रहती थी कि शरद जोशी ने आज किस विषय पर कैसा, क्या लिखा होगा? किस कोण से ? क्या उठाया ? तुमने पढा ? वाह यार !
    शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।
    आज सालों के अंतराल के बाद 'प्रतिदिन' में लिखी ये अद्भुत व्यंग्य रचनाएं जब एक साथ इस संकलन से जा रही हैं-तब इनका पुनर्पाठ आपको शरद जोशी की ऐसी विलक्षण प्रतिभा से साक्षात्कार कराता है, जिसकी याद उसके जाने के बाद व्यंग्य में उत्पन्न और व्याप्त बियाबान में और भी शिद्दत से आ रही है। -ज्ञानचतुर्वेदी 
  • 20-Best Stories From Russia (Classics)
    GLOBAL VISION PRESS
    495 446

    Item Code: #KGP-571

    Availability: In stock

    Aleksandr Pushkin undoubtedly heads the list of the Russian writers, and is credited with making Russian literature world famous. His reputation rests on his poetry, and in the field of the long novels. 
    While Leo Tolstoy was called the ‘greatest writer of Russia’ by Turgenev, and ‘second Shakespeare’ by Flaubert, Mikhail Saltykov, wrote under the pseudonym ‘Shchedrin’ and achieved the great success and popularity. 
    Aleksandr Kuprin was called the Russian Kipling by Vladimir Nabokov for his stories about pathetic adventure-seekers, and Ivan Turgenev’s A Sportsman's Sketches was a milestone of Russian Realism.
    While Fyodor Sologub gave us the namesake of a favourite snack today—Hide and Seek, Anton Pavlovich Chekhov’s famous line is still quote-worthy: “Medicine is my lawful wife and literature is my mistress.”
    All these writers and many more in this classic anthology of the 20-BEST Stories from Russia.
  • Bharat Ke Pramukh Sahityakaron Se Antrang Baatcheet
    Ranvir Rangra
    450 405

    Item Code: #KGP-234

    Availability: In stock

    भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अन्तरंग बातचीत
    किताबघर प्रकाशन श्रेष्ठ भारतीय साहित्य के आदान-प्रदान से भी सक्रिय रहा है । भारतीयता और भारतीय साहित्य की अंतर्धारा को समझने के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी भाषा की सीमारेखाओं से बाहर भी झाँकें । प्रमुख भारतीय साहित्यकारों को एक मंच पर लाने की दिशा में हमारा पहला अभिनव प्रयोग था 'भारतीय लेखिकाओं से साक्षात्कार' । प्रस्तुत प्रकाशन उसी की अगली कड़ी है जिससे भारत के पच्चीस साहित्यकारों से इस विधा के विशेषज्ञ डॉ० रणवीर रांग्रा की अन्तरंग बातचीत सम्मितित है, जिसके माध्यम से अनेक ऐसे रचना-रहस्य प्रकाश में आए हैं जिनसे अब तक हिंदी-जगत ही नहीं, भारतीय साहित्य-समाज भी अनभिज्ञ था ।
    इस प्रकार, यह पुस्तक मात्र एक और प्रकाशन नहीं, बल्कि एक दस्तावेज से जिसका उपयोग भारतीय साहित्य के संदर्भ-ग्रंथ के रूप में भी किया जा सकता है । आशा हैं, इससे प्रबुद्ध पाठको की अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सकेगा और उन्हें एक ऐसी अंतर्दूष्टि प्राप्त होगी जिससे समकालीन भारतीय साहित्य की आत्मा तक पहुंचने में सहायता मिलेगी ।
  • Tiger Tantra (Novel)
    Ganga Prasad Vimal
    425 383

    Item Code: #KGP-872

    Availability: In stock

    A first ever Novel on an Untouched Subject
    The Tantra, its cults and practices have always attracted attention worldwide due to its strange disciplines and various hidden secrets. Chiefly because of its use of esoteric practices— in acquiring siddhis (supernatural powers), spiritual perfection and other material gains—Tantra came to be regarded as anti-social and unethical, forcing it to go underground.
    The present novel explores an unusual aspect of the tantric discipline, which makes it quite interesting. The author has taken up a subject inherent to the sub-culture of the Himalayan regions to which he belongs, and tried to weave it into a quite probable story, realistic as well as readable.
    ‘Tiger Tantra’ or the Tantra which changes the practitioner into a tiger or Bokshu and makes him immortal, lies buried under the ruins of a temple in the village of Jaled, the centre of an isolated Tantric Peeth in the Himalayan region.
    A scholar in search of the Tiger Tantra visits the village, to uncover the secret and to find the hidden mantra, finds a swami engaged in some strange practices . . . and the story unfolds in its fantastic dimensions . . . till the virgin offers herself to the scholar to corrupt the swami’s sadhana.
  • Mahayaatra Gaatha (3 & 4) (Paperback)
    Rangey Raghav
    500

    Item Code: #KGP-23

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)

    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Swasthya Gyan
    Dr. Rakesh Singh
    190 171

    Item Code: #KGP-722

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य-ज्ञान
    पुस्तक में स्वास्थ्य से सम्बंधित विभिन्न विषयों पर लगभग  35 लेख संकलित हैं । जो लोग यह कहते  हैं की चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम में ही पढाया जा सकता हैं, उनके लिए वे लेख चुनौती है और सिद्ध करते है कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा कै। उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को  माध्यम से पढाया जा सकता है । 
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है । इन लेखों में अधिकांशतः इस बात को ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग  दवाओं का नाय याद कर लेते है और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते है । उससे कितनी हानि हो सकती है, यह 'दवाओ के उपयोग में सावधानियाँ' शीर्षक से स्पष्ट हैं । इसी प्रक्रार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारना से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है । 'ह्रदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हदय- रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है । इसमें अधुनातन  चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है । अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-सम्पन्न है । कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्य एवं उनके सफल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतिक है ।
  • The Hanuman Factor (Paperback)
    Anand Krishna
    195

    Item Code: #KGP-336

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
    Let us explore together…..
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ratana Aur Chetana
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-9051

    Availability: In stock


  • Veerendra Mishra : Geet-Samagra-(4 Vols.)
    Pradeep Pant
    2500 2250

    Item Code: #KGP-816

    Availability: In stock

    वीरेन्द्र मिश्र : गीत-समग्र (4 भागों में)
    नई कविता के आगमन के साथ काव्य-जगत् का पूरा परिदृश्य बदल गया । कारण कि छंदमुक्त कविता ने गीत को सबसे अधिक प्रभावित किया । यद्यपि नई कविता के अनेक कवियों ने स्वयं भी गीतो की रचना की और छंदों का सहारा लिया, किंतु नई कविता के उदय के साथ ही गीत की उपेक्षा भी आरंभ हो गई । गीत के उपेक्षित होने के अपने कारण भी थे । जैसे कि गीत के नाम पर तुकबंदी हावी होती गई, गीत प्रायः रूमानियत तक सिमट गया, उसने अपने को मंच या कवि-सम्मेलनों तक सीमित कर लिया । कालांतर में नई कविता के बाद जो कविता सामने आई, उसके चलते गीत और भी उपेक्षित हुआ, लेकिन यह भी सच्चाई है कि नई कविता के बाद की छंदमुक्त कविता प्राय: नई कविता की रूढि बनकर रह गई और आज तो ऐसी अधिकांश कविताएँ कवियों के सपाट वक्तव्य सरीखी प्रतीत होती हैं । बहरहाल कविता के रूप-स्वरूप के परिवर्तन के दौर में कुछेक कवि समस्त ऊर्जा और सर्जनात्मकता के साथ गीतों की रचना करते रहे । वीरेन्द्र मिश्र ऐसे ही कवियों में है, बल्कि वे गीतों के प्रमुख और अत्यंत स्मरणीय रचनाकार हैं। इसका मुख्य कारण है उनकी गहरी सामाजिक संलग्नता और प्रगतिशील सोच, जिस वजह से वे किशोर वय से युवावस्था की ओर बढ़ने के दौर में बंगाल के भीषण अकाल पर सशक्त छांदिक रचना प्रस्तुत कर सके । उन्होंने जहाँ एक ओर मछुआरों, कामगारों, मध्यवर्गीय जीवन के सुख-दु:खों और हर्ष-विषाद पर सार्थक गीत लिखे, वहीं एशिया के नव-स्ततंत्र राष्ट्रों पर मंडराते युद्ध के खतरे, साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं और विश्व-शांति के प्रश्नों को भी गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया । साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में प्रदूषण आदि भी उनकी चिंत्ता के केंद्र में थे । बडे पैमाने पर उन्होंने गीतों के माध्यम से विसंगतियों पर व्यंग्य किए, जबकि गीत से व्यंग्य का इस्तेमाल अधिकांश कवियों के यहाँ बहिष्कृत-सा  ही रहा है । अदभुत शब्द-संयोजन, असंख्य छांदिक प्रयोग, संगीतात्मकता आदि ऐसे उपकरण है, जिन्होंने उनके गीतों को उजास ही । वीरेन्द्र मिश्र की गीत-यात्रा सही अर्थों से अप्रतिम हैं ।
  • Vansh Vriksha
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-103

    Availability: In stock


  • Chintan Karen Chintan Mukt Rahen
    Swed Marten
    150 128

    Item Code: #KGP-279

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं ।
  • Manzil Abhi Door Hai
    Shanta Kumar
    225 203

    Item Code: #KGP-9030

    Availability: In stock

    मंजिल अभी दूर है
    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमने एक मंजिल तय की, एक संकल्प लिया उस मंजिल तक पहुँचने का, परंतु आधी सदी बीत जाने के बाद भी हम उस मंजिल तक पहुँचे नहीं है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि या तो हम चले ही नहीं या फिर मंजिल के लिए जो रास्ता चुना, वह ठीक नहीं था ।
    लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली और उस प्रणाली को चलाने वाले नेता-दोनो ही आज की इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। आधी सदी पूरी हो चुकी है। एक प्रणाली का परीक्षण हो चुका है । अब इस बात की आवश्यकता है कि उस संसदीय प्रणाली पर पुनर्विचार किया जाए और भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित संशोधन किया जाए ।
    जब भारत का संविधान बनाया गया तो संविधान निर्माताओं ने विश्व की अन्य प्रणालियों की सार्थकता तथा उपयोगिता पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । उन सबके मन में ऐतिहासिक कारणों से एक बात घर कर गई थी कि भारत के लिए ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली ही उपयोगी है क्योंकि पिछले लगभग 200 वर्षों से भारत किसी न किसी प्रकार से इस प्रणाली से जुडा रहा ।
  • Sikhon Ka Itihaas (2 Vol.)
    Khushwant Singh
    1295 1166

    Item Code: #KGP-9302

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Roshni Mein Chhipe Andhere
    Gurudeep Khurana
    250 225

    Item Code: #KGP-485

    Availability: In stock

    शुभ्रा उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, "नहीं दीप, ऐसी बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगती। अगर हालात ऐसे बने हैं तो इसमें शहर का क्या दोष। ऐसे दया भाई तो कहीं भी हो सकते हैं। कब, कहां ऐसा जहर भर दें, कुछ नहीं कह सकते। बहुत दिन नहीं ठहरेगा यह जहर। देखना, जल्दी सब नार्मल हो जाएगा।"
    "मुझे तो लगता है इस दौरान नफरत के जो बीज बो दिए गए हैं उनका असर पुश्तों तक चलेगा।"
    "यह तो है। नफरत फैलाने में घड़ियां लगती हैं और मिटाने में सदियां।"
    "बिलकुल ठीक।"
    "वैसे मैं एक बात और भी कहना चाहती हूं...कह दूं?"
    "जरूर!"
    "देखो दीप, घृणा केवल वही नहीं जो दया भाई जैसे लोग फैला रहे हैं...घृणा वो भी है जो तुम्हारे मन में पल रही है दया भाई के प्रति।"
    "कहना क्या चाह रही हो?"
    "यही कि वह घृणा भी कम घातक नहीं। मैं तो सोचती हूं...उन लोगों के बारे में भी घृणा से नहीं, प्यार से भरकर सोचो। आखिर वे कोई अपराधी तत्त्व नहीं। अपनी तरफ से वे जो भी कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। बस, दिशा भटक गए हैं। बहके हुए लोग हैं वे।..."
    —इसी पुस्तक से

  • Aur Aagey Badhatey Raho (Paperback)
    Dr. Rashmi
    135

    Item Code: #KGP-467

    Availability: In stock

    जीवन व साहित्य में सदुपदेश, सत्संग और सुभाषित का विशेष महत्त्व है। इनमें अनुभवों का ऐसा खजाना होता है जो किसी को भी समृद्ध कर सकता है। यही कारण है कि साहित्य में प्रारंभ से ही नीति-कथाओं का प्रचलन है। ये कथाएं प्रेरणा देती हैं, संघर्ष करना सिखाती हैं, असमंजस में उलझे मन को उचित निर्णय लेने की शक्ति देती हैं और समग्रतः जीना सिखाती हैं। ‘...और आगेबढ़ते रहो’ प्रेरक प्रसंगों की एक ऐसी ही रोचक पुस्तक है। लेखिका डॉ. रश्मि ने बड़ी कुशलता से उपयोगी जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करते हुए उनमें निहित संदेश भी रेखांकित कर दिया है।
    इन प्रेरक प्रसंगों में मूलतः नैतिक शिक्षा छिपी है। वह नैतिकता जिसके बिना सार्थक, संतुलित और स्वस्थ मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसी प्रेरक कथाएं वर्षों से समाज में सत्य, प्रेम, अहिंसा, त्याग और सहनशीलता के बीज बोती रही हैं। पहले घर-परिवार में बड़े बुजुर्ग, जैसे--दादी-दादा, नानी-नाना ऐसी बहुत सारी कहानियां सुनाते थे। बहाने-बहाने से बच्चे उनसे बहुत कुछ ऐसी बातें सीखते थे जो जीवनपर्यंत याद रहती थीं। आज समय बदल गया है। क्या बड़े, क्या बच्चे--सब अपनी-अपनी जगह व्यस्त हैं। प्रेरक प्रसंगों से भरी कहानियां सुनाने का जिम्मा पुस्तकों ने ले लिया है। इस बात का अनुभव पाठक यह पुस्तक पढ़ते हुए करेंगे। सीधी सुगम भाषा और प्रवाहपूर्ण शैली में लिखी ये रचनाएं पाठकों को प्रभावित व प्रेरित करेंगी--ऐसा हमारा विश्वास है।
  • Aarsa Sahitya Mein Moolbhoot Vigyan
    Vishnu Dutt Sharma
    220 198

    Item Code: #KGP-774

    Availability: In stock

    प्राचीन भारत में वैज्ञानिकों की कोई कमी नहीं थी। इनका विवरण अनेक आर्ष साहित्य में उपलब्ध है। वास्तव में भारतीय वैज्ञानिकों के धार्मिक एवं दार्शनिक पक्षों को देखकर ही उन्हें ऋषियों की श्रेणी में रखा तथा उनके वैज्ञानिक योगदान के महत्त्व को कम कर दिया गया और उसका समुचित रूप से मूल्यांकन भी नहीं किया गया। वैदिक काल से गुप्तकाल (400 ई. पूर्व) तक विज्ञान के सिद्धांत एवं वैज्ञानिक पद्धति के विषय में महत्त्वपूर्ण कार्य हुए किंतु दुर्भाग्य से प्राचीन भारतीय विज्ञान के विकास का समुचित विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं हो पाया है।
    प्रस्तुत शोध-ग्रंथ ‘आर्ष साहितय में मूलभूत विज्ञान’ के लेखक डाॅ. विष्णुदत्त शर्मा द्वारा प्राचीन भारतीय विद्वानों के सिद्धांतों की परिपुष्टि को प्रकाश में लाया गया है। आशा है, प्रबुद्ध पाठक प्रस्तुत ग्रंथ में वर्णित भारतीय परिव्राजकों द्वारा किए गए अनुसंधानों तथा कालांतर में ये ही शोध-कार्य पश्चिमी देशों की मोहर लगकर भारत मं आयातित विज्ञान के तथ्य को जानने का प्रयास करेंगे। आशा ही नहीं अपितु विश्वास है कि यह पुस्तक शोधकत्र्ताओं और विज्ञान एवं अध्यात्म में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए समान रूप से रोचक होगी।
  • Hamara Kshitij
    Sudhakar Adib
    180 162

    Item Code: #KGP-7841

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria
    Madhu Kankria
    280 238

    Item Code: #KGP-719

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mera Paigaam Muhabbat Hai Jahan Tak Pahunche
    Jigar Muradabadi
    250 225

    Item Code: #KGP-98

    Availability: In stock

    मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
    'जिगर' साहब इंसानियत और शेरियत दोनों का पैकर थे । उनकी शायराना अजमत का बडा राज उनकी मखसूस सज-धज, तर्जेअदा और तरन्नुम था । उनकी मासूम जोर दिलकश शखसियत ने उन्हें अपने दौर का महबूब-तरीन शायर बना दिया था । उनकी बड़ाई को इस पैमाने से भी नापा जा सकता है कि दौरे जदीद में कितनों ने जिगर बनने की कोशिश की, इसलिए कि शेर की दुनिया के वह एक तर्ज थे। असलूब थे, एक स्टाइल थे ।
    'जिगर' ने गजल को एक नई जिंदगी बख्शी । उनकी गजले मदहोशी व रंगीनी के छलकते हुए सागर  हैं, जिससे तरह-तरह के रंग मौजूद है और किस्म-किस्म के जजबात जलवागर हैं,
    जिनका मुताअला जिंदगी के नशे को गहरा कर देता है, कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और हयात नये रूप में जलवागर होकर दिल की धड़कन में जज्ब हो जाती है । खून की रवानी तेज हो जाती है और शायरी के तारों से आहंग हो जाती है। ये इंतेखाबे गजल के अशआर ऐसे है जिनमें नई जिंदगी और वक्त की धड़कनों की आवाजें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख 'जिगर' को कभी भुला नहीं सकेंगी ।
  • Toro Kara Toro-4 (Nirdesh)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-740

    Availability: In stock


  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 2 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    270

    Item Code: #KGP-304

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Teen Taal
    Sanjay Kundan
    335 302

    Item Code: #KGP-9340

    Availability: In stock

    सुप्रसिद्ध कथाकार संजय कुंदन का नवीनतम उपन्यास तीन ताल समकालीन यथार्थ को उसके समुचित कद में चित्रित करती रचना है। संजय अपने लेखन में जनप्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं। व्यवस्था और सत्ता के अंतर्विरोध वे कलात्मक कुशलता के साथ अभिव्यक्त करते हैं।
    ‘तीन ताल’ के केंद्र में तीन चरित्रा हैं—सुमित, पारुल और अभिषेक। उनमें मित्राता की अद्भुत लय है। सुमित पत्रकारिता के संकटों का सामना कर रहा है, पारुल अपनी सार्थकता हासिल करने के लिए छटपटा रही है और अभिषेक एक बड़ी कंपनी में काम करते हुए पाखंड का नग्न रूप देख रहा है। इन व्यक्तियों, संघर्षों के साथ देश-समाज की ज्वलंत समस्याएं गुंथी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या है भ्रष्टाचार। इसने राष्ट्र की समृद्धि और उन्नति को पंगु-सा कर दिया है। संजय एक स्थान पर लिखते हैं—‘लड़ाइयां चल रही थीं। छोटी-बड़ी कितनी लड़ाइयां। हो सकता है ये सब मिलकर एक दिन बड़ी लड़ाई का रूप ले लें। इसलिए संघर्ष रुकना नहीं चाहिए।’ क्योंकि तभी ‘नीला निरभ्र आकाश’ और ‘एक महीन चंपई-सी रेखा’ दिखने की संभावना निर्मित हो सकती है।
    यह उपन्यास रोचक कथानक के साथ कई जरूरी सवालों से भी गुजरता है। ध्वस्त होती पत्रकारिता, इंटेलेक्चुअल दलाल, भीषण बेरोजगारी, एनजीओ की लूटपाट, जनजागरूकता और काॅमर्स के बीच मारक संघर्ष, स्त्राी-पुरुष संबंधों का तनाव, योग्यता की उपेक्षा...आदि-इत्यादि। सवालों के साथ समाधन के लिए उठ खड़ा एक जन आंदोलन भी है, जिसकी अगुआई ‘छोटे गांधी’ ने की। एक हालिया इतिहास भी इस रचना में दर्ज है।
    संजय कुंदन सच को सूक्तियों में बयान करते हैं। जैसे—‘अब नौकरी का अर्थ है व्यक्ति का अनुकूलन बाजार के प्रति।’ ऐसे ही यथार्थ का मुकाबला करने के लिए ‘तीन ताल’ नाट्यदल का गठन होता है। उद्देश्य है जनजागरण। क्योंकि भविष्य संकटों से घिरा है। उपन्यासकार लिखता है—‘मुझे तो डर है कि एक दिन सब कुछ काॅरपोरेट के हाथ में हो जाएगा।’ इसलिए चेतना में ‘नवगति नवलय ताल छंद नव’ की आवश्यकता है। यानी, एक नया स्वप्न!
    ‘तीन ताल’ एक नए स्वप्न की शुरुआत है।
  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Aacharya Ram Chandra Shukla Ka Chintan Jagat
    Krishna Dutt Paliwal
    695 626

    Item Code: #KGP-9007

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya (Paperback)
    Ravindra Kalia
    120

    Item Code: #KGP-430

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रवीन्द्र कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Satta Ke Aar-Paar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    35

    Item Code: #KGP-932

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    -इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sanskriti Aur Hindi-Pradesh-1
    Ram Vilas Sharma
    750 675

    Item Code: #KGP-9024

    Availability: In stock

    भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश : 1
    महाभारत और रामायण में सभागारों और बड़े-बड़े भवनों का वर्णन है । वे हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में प्रत्यक्ष है । पाटलिपुत्र एक बड़े साम्राज्य की राजधानी बना । वहां के भवन चीनी यात्री फाहियान ने देखे तो उसने सीधा, ये मनुष्यों के नहीं, देवों के बनाए हुए होंगे । पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा और उज्जयिनी, ये भारत के प्राचीन नगर थे । आज भी ये संसार के ऐसे प्राचीनतम नगर हैं, जिनका इतिहास अब तक अटूट चला आ रहा है । भारतीय संस्कृति का बहुत गहरा संबंध इन चार महानगरों से है । इन नगरों पर ध्यान देते ही यह प्रचलित धारणा खंडित हो जाती है कि भारत ग्राम समाजों का देश है, यहाँ के लोग कला-कौशल में पिछडे हुए थे और हमें उन्हें ग्राम समाजों की ओर लौट जाना चाहिए । ये चारों महानगर विभिन्न युगों में व्यापारिक संबंधों से परस्पर जुड़े रहे हैं । इन्होंने दक्षिण जनपदों के मदुरै आदि नगरों से भी संबंध कायम किया था । मगध से मालवा तक अब जातीय भाषा के रूप में हिन्दी का व्यवहार होता है । नगरों के बिना हिन्दी का यह प्रसार भारत के सबसे बडे जातीय क्षेत्र में असंभव था । इन नगरों के द्वारा हिन्दी प्रदेश के जनपद प्राचीन काल से परस्पर संबद्ध हुए और दक्षिण भारत से उन्होंने अपना संबंध जोड़ा । इसलिए भारत राष्ट्र के निर्माण में और भारतीय संस्कृति के विकास में हिन्दी प्रदेश की निर्णायक भूमिका स्वीकार करनी चाहिए । दक्षिण में तमिलनाडु, उत्तर में कश्मीर, पूर्व में असम और पश्चिम में गुजरात, दूर-दूर के इन प्रदेशों को जोड़ने वाला, इनके बीच स्थित विशाल हिन्दी प्रदेश है । ऋग्वेद, अथर्ववेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, अर्थशास्त्र की रचना यहीं हुई । यहीं कालिदास और भवभूति ने अपने ग्रंथ रचे और मौर्य तथा गुप्त साम्राज्यों की आधारभूमि यही प्रदेश था । उत्तरकाल से दिल्ली, आगरा इस प्रदेश के बहुत बड़े नगर बने । ये व्यापार के बहुत बड़े केंद्र थे और सांस्कृतिक केंद्र भी थे । तुर्कवंशी राजाओं ने यहीं रहकर शताब्दियों तक एक बहुत बड़े राज्य का संचालन किया था । विद्यापति, कबीर, सूरदास, तुलसीदास जैसे कवि इसी क्षेत्र में हुए । इसी प्रदेश में प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन का जन्म हुआ । अपने स्थापत्य सौन्दर्य से संसार को चकित कर देने वाला ताजमहल इसी प्रदेश के आगरा नगर में है । इसलिए इस पुस्तक का नाम भारतीय संस्कृति और हिन्दी-प्रदेश है ।
  • Vish-Beej
    Suryakant Nagar
    75 68

    Item Code: #KGP-1936

    Availability: In stock


  • Megha Megha Pani De
    Madhukar Singh
    60

    Item Code: #KGP-1155

    Availability: In stock

    मेघा-मेघा पानी दे
    (एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक)

    गांव की एक डगर। सामने बड़ा-सा चरागाह है। कृष्ण एक ऊंचे टीेले पर बैठा है। तीन-चार लड़के कुछ दूरी पर एक-दूसरे से कटे हुए बैठे हैं। कृष्ण की बंसी के स्वर धीरे-धीरे तेज होते जा रहे हैं।
  • Sahitya Ka Naya Soundaryashastra
    Devendra Chaubey
    600 540

    Item Code: #KGP-527

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi (Paperback)
    Malti Joshi
    100

    Item Code: #KGP-1346

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ: मालती जोशी
    हिंदी की प्रख्यात लेखिका मालती जोशी के प्रतिनिधि कथा-संसार में नारी-विमर्श और उसकी अस्मिता के नाम पर लिखी जा रही तथाकथित आधुनिक नायिकाओं के चटपटे नारी-पात्र नहीं हैं, वरंच वहाँ निरूपण है ऐसी नारियों का, जो सचमुच हमारे परिवार, समाज और देश की स्त्री की रूपरेखाओं का चित्रण और निर्धारण करती है । दैनंदिन स्तर पर आज मध्यवर्गीय नारी सुबह-दोपहर-शाम जिन भभूकों में फंसी है, वहाँ अनिवार्यतः मानसिक उद्वेलन तथा वैचारिक उत्तेजन के दृश्य-परिदृश्य निर्मित होते हैं और इन्हीं की संतुलित सृजन-विसर्जन की प्रक्रिया मालती जोशी की कहानियों का प्रमुख बढ़ा-तत्त्व है ।
    इक्लीसवीं सदी के इस सदिच्छा काल में जब पारिवारिक भारतीय नारी अपनी इच्छा, क्रिया और ज्ञान-शक्ति के माध्यम से अपने स्वभाव की प्रवृत्ति को अक्षुण्ण रखते हुए, एक विकासशील परिपक्वता की ओर अग्रसर है, ऐसे में आवश्यक है कि जीवन की मनोहरता को बचाने से परिवार की यह प्रमुखतम इकाई सुदृढ़ रहे । पर रहे तो कैसे? इसी आधार को बुनती ये कहानियां पाठक-समाज की आश्वस्ति हैं  और संदेश भी ।
    मालती जोशी द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियां' हैँ-'बेटे की मां', 'सांस-सांस पर पहरा बैठा', 'प्रतिदान', 'कोख का दर्प', 'मोह-भंग', 'आउट साइडर', 'प्रॉब्लम चाइल्ड', 'उसने नहीं कहा', 'आस्था के आयाम’ तथा 'प्यार के दो पल बहुत है'।
  • Ek Svich Tha Bhopal Mein
    Narendra Nagdev
    215 194

    Item Code: #KGP-379

    Availability: In stock


  • Naaz
    Inaytullah
    80 72

    Item Code: #KGP-2098

    Availability: In stock


  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Kavi Ne Kaha : Vishwanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    190 171

    Item Code: #KGP-386

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    मेरी कविताओं में ऐसे शब्द, बिंब या प्रतीक अधिक हैं जो भोगते हुए या जूझते हुए मनुष्य से संबंधित है । मैं गरीब देहाती दुनिया से जाया हुं और मेरे शुरू के बीस वर्ष उस अनाथ साधनहीन मनुष्य के बीच गुजरे जिसे बार-बार अपमानित होते, यातनाएं सहते देखा है । मेरी कविताओं में 'हत्या' और उससे मिलती-जुलती शब्दावली में जो आतंक है, वह मेरे बालमन पर पडे प्रभावों की ही प्रतिक्रिया है । मेरी कविताओं में 'अंधकार' और 'रात' के बिंब भी अधिक हैं जो एक अनार मेरे अकेलेपन की अतृप्ति को व्यक्त करते है तो दूसरी खार उस अंधकारमय दबाव को जिसे आज का साधनहीन मनुष्य भोग रहा है । मेरी कविताओं में पहाडी परिवेश अधिक मिलेगा । पहाड़ के प्रति मेरा गहरा आकर्षण है और मृत्यु-भय से आतंकित होते हुए भी मैंने पहाडी यात्राएं बहुत की हैं । हिमालय का परिवेश मेरी प्रेम कविताओं में कहीँ-कहीं प्रेमिका के साथ एकाकार हो गया है । कुछ शब्दों के सदंर्भ से प्रयोक्ता और ग्रहीता के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है । अपनी कविताओं के प्रसंग में कहूं तो उनमें 'इतिहास', 'धारा', 'अंधकार', 'घाटी', 'जंगल', 'पहाड़' आदि अनेक शब्द अपना विशिष्ट अर्थ रखते है ।
    'बेहतर दुनिया के लिए' और 'आखर अनंत' नामक संग्रहों की बहुत-सी समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी है । इन संग्रहों के बारे में अपनी ओर से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि इनमें मेरी रचनात्मक भाषा  परित्कृत हुई है और कविताओं को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य मिला है । आत्मीय का भी और लोक का भी ।
  • Hirni Ke Liye
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1906

    Availability: In stock

    हिरनी के लिए
    अजितकुमार का यह पांचवां कविता-संग्रह 'हिरनी के लिए' इस अर्थ में पिछले संग्रहों से भिन्न है कि जहाँ उनमें किसिम-किसिम की कविताएँ थीं, यहाँ केवल प्रेम- कविताएँ है । पर जितने अंशों में प्रेम 'विशुद्ध' से कुछ कम या अधिक एक 'मिश्रित' अनुभव है, ये कविताएँ दुख-तकलीफ, आशा-आकांक्षा-उदासी-मजबूरी आदि के भी अनुभव से जुडी नजर आएँगी ।
    वैसे तो, मैकबेथ की भाँति, कइयों के लिए, समूचा जीवन ही 'सन्निपातग्रस्त ज्वर' होता है; यहाँ, इस संग्रह की संक्षिप्त भूमिका में कवि ने जिसे अपनी 'कांजेनिटल' अर्थात 'जन्मजात' मुसीबत बताया है, उससे छुटकारा जब मिलेगा, तब मिलेगा' ...  'कड़ुवे घूंट से कि मीठी गोली से, ज्वर, देर या सबेर, कभी-न-कभी टूटेगा । रहा सन्निपात, उसके थमने या बढने का ग्राफ सामने रहे, इस लिहाज से, कवि ने पिछले संग्रहों की भी एक-एक कविता पुस्तक के अंत में नत्थी कर दी है ।
    हमें आशा है कि जिन्हें उपचार या पथ्य की आवश्यकता न हो, ऐसे पाठक भी इन कविताओं में निहित सजीवता से प्रमाणित होंगे और स्फूर्ति पाएँगे ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chitra Mudgal
    Chitra Mudgal
    240 216

    Item Code: #KGP-619

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चित्रा मुद्गल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'गेंद', 'लेन', 'जिनावर', 'जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं', 'भूख', 'प्रेतयोनि', 'बलि', 'दशरथ का वनवास', 'केंचुल' तथा 'बाघ'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चित्रा मुद्गल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda (Paperback)
    Vinod Verma
    240

    Item Code: #KGP-26

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Robin Shaw Pushp
    Robin Shaw Pushp
    150 135

    Item Code: #KGP-2081

    Availability: In stock


  • Bhartiya Thal Sena : Badhate Kadam
    A. K. Gandhi
    380 342

    Item Code: #KGP-9308

    Availability: In stock

    अनुशासन, देशप्रेम, स्वाभिमान, सेवा, उत्सर्ग और शौर्य का प्रतीक भारतीय सेना पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। धरती, आकाश और जल मार्गों पर किसी तपस्वी की भाँति एकाग्र भारतीय सेना की गौरवगाथा जितनी लिखी जाए उतनी कम है।
    प्रस्तुत पुस्तक भारतीय थल सेना: बढ़ते कदम में ए. के. गाँधी ने इस अनूठे व अप्रतिम सैन्य संगठन के विविध पक्षों पर प्रामाणिक व रोचक ढंग से लिखा है। गाँधी स्वयं भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं, इसलिए उनके विवरण में तथ्यात्मकता और सूक्ष्मता है।
    लेखक ने भारतीय थल सेना के महत्त्व को कई कोणों से विवेचित किया है। भारतीय थल सेना के गौरवपूर्ण इतिहास और उसकी उपलब्धियों  को पढ़ते हुए किसी भी भारतीय का मन गर्व से भर जाएगा। सरहद पर देश की रक्षा करने के साथ आवश्यकता होने पर देश के भीतर किसी भी प्रकार की सेवा या सहायता के लिए सेना तत्पर रहती है। राष्ट्रीय पर्वों और विभिन्न खेलों में इसका हुनर और हौसला रोमांचित कर देता है। असंभव को संभव बनाने की कला भारतीय सेना को आती है।
    प्रस्तुत पुस्तक के अध्ययन से पाठक भारतीय थल सेना के प्रति अधिक आत्मीयता का अनुभव करेगा। भारत के सबसे बड़े रोजगार प्रदाताओं में से एक होने के कारण इसमें आजीविका के अवसर भी तलाशे जाते हैं। इस प्रयोजन से भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि पुस्तक एक गौरवशाली संगठन में चयन की विधियों पर भी सम्यव्फ प्रकाश डालती है। 
  • Sushila
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-7810

    Availability: In stock

    सुशीला
    लंदन में बफाँली हवा चल रहीं श्री। सुशीला को इसका अनुमान नहीं था। उनको लन्दन के घर में ले जाने के लिए कुछ सांग उनके स्वागत के लिए खड़े थे। लंदन में चारों तरफ गोरे-गोरे लोग थे और सबके हाथों में छाता था ।
    लंदन की हबा सुशीला को बडी मनभावनी लगी। भविष्य में विलायत की सब यादें उनके साथ सदा बनी रहें इसलिए वह बाजार गई और उन्होंने सबसे पहले एक कैमरा और कैमरे की रील खरीदी। उसी दुकानदार ने उन्हें कैमरे के बारे में भी विस्तार से बताया, साथ ही साथ कैमरे में फोटो खौब्वेनै की रील भी लया दो। बच्चे सुशीला के पथ थे, वह उसी समय लंदन के ट्रफात्नार स्ववायर में गई। ट्रफग्लार स्वचायर के मैदान में अनगिनत कबूतर जाना चुग रहैं थे। सुहावना मौसम था । सुशीला ने अपनी बेटी को उनके बीच में बैठा दिया। सब सामान बेटे को पकड़। दिया और सबसे पहले कबूतरों के बीच में जैसी हूई बिटिया की तस्वीर खंचि ली।
    अगले दिन वह बच्चों को लेकर लंदन के अजायबघर जू) में गई। तरह-तरह के जानवर देखकर बच्चे बडे खुश हुए ।
  • Papa, Muskuraiye Na! (Paperback)
    Prahlad Shree Mali
    100

    Item Code: #KGP-1486

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    -इसी पुस्तक से
  • Shubhada
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    270 243

    Item Code: #KGP-574

    Availability: In stock


  • Qissa Maujpur Ka (Paperback)
    Jaivardhan
    80

    Item Code: #KGP-1378

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, काम से काम मैं नहीं सोच सकता । 
  • Phir Palash Dahke Hain
    Kanhiya Lal Vajpayee
    150 135

    Item Code: #KGP-164

    Availability: In stock

    फिर पलाश दहके हैं
    गीतकार कन्हैया लाल वाजपेयी आपको गली, नगर, क़स्बा, चौबारों, किसी नदी के पास अथवा सूखे तट पर, कहीं भी सहज और सामान्य रूप से गाता-गुनगुनाता घूमता मिल सकता है । मिलने को तो बाजार में भी मिल जाएगा, लेकिन बाजार में बेच सकने के लिए इसके पास कुछ है नहीं-
    हम खाली जेबों में 
    बाजार लिए घूमे... । 
    का यह गायक बाजार में मिल जाने पर भी-
    नयनों की चितवन 
    अधरों की लाली
    फूलों की मुस्कानों' का गाहक हूँ । 
    जैसे ग्राहक के ही रूप में अपना परिचय देता महसूस होगा ।
    इन कन्हैया लाल वाजपेयी ने अपनी अब तक की भिन्न-भिन्न 'मूड' (मानसिकताओं) को गीत-  यात्राओं में अपने जो चरण-चिह्न छोडे हैं वे राजमहल से लेकर गलियों, चौबारों, घाटियों और नदी तटों तक बिलकुल साफ, गहरे और स्पष्ट हैं ।

  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Betava Bahati Rahee
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-2004

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Geeton Ke Indradhanush
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-1210

    Availability: In stock


  • Dushyant Ke Jaane Par Doston Ki Yadein (Paperback)
    Kamleshwar
    90

    Item Code: #KGP-1381

    Availability: In stock


  • Khule Gagan Ke Lal Sitare (Paperback)
    Madhu Kankria
    120

    Item Code: #KGP-222

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ke Natak (Paperback)
    Saadat Hasan Manto
    280 252

    Item Code: #KGP-913

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • Kavi Ne Kaha : Shri Prakash Shukla
    Shri Prakash Shukla
    240 216

    Item Code: #KGP-7815

    Availability: In stock

    श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता के प्रतिष्ठित कवि हैं। इनके पहले कविता संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ (1999) से लेकर पाँचवें कविता संग्रह ‘ओरहन और अन्य कविताएँ’ (2014) तक की कविताओं से गुजरकर कविता प्रेमियों को काव्य स्वाद का सुखद अहसास होता है। अपनी कविताओं में ये बिना किसी नारेबाजी व आयातित विमर्श का हौवा खड़ा किए सधे हुए स्वर में सामाजिक  विसंगतियों, क्रूरताओं, धार्मिक ढकोसलों, आर्थिक पराभवों और सांस्कृतिक क्षरण पर सीधे वार करते हैं। इनकी कविता की दुनिया में राजनीति व विचारधारा की एक पक्षधर दुनिया गुँथी हुई होती है जिसमें गरीब, पीड़ित व उपेक्षित वर्ग के प्रति गहरी रागात्मक चेतना मौजूद है।
    लेकिन उपर्युक्त बातों के साथ-साथ जिस वैशिष्ट्य के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल हिंदी कविता में ज्यादा चर्चित हैं वह हैं इनकी विषयगत वैविध्यता और गहरी लोकोन्मुखता। अपनी कविताओं में वे महज लोक का चित्रण नहीं करते बल्कि लोक के क्षरण के कारणों की शिनाख्त भी करते हैं। नवउदारवाद और पूँजीवादी शक्तियों के आक्रमण, दमन, शोषण और चालाकियों का प्रतिरोध करने वाली इनकी कविता जनोन्मुखी व लोकोन्मुखी तो है ही, इसमें स्थानीयता के साथ वैश्विकता के तत्त्व भी समाहित हैं जहाँ पुराने के साथ परंपरा से रिश्ते रखने वाला नया समाज तो है ही, एक आधुनिक चेतना भी मौजूद है।
    इसी के साथ गौरतलब है कि प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के चित्रों से भरपूर कवि का कविता संसार विविध वर्णों से युक्त है जहाँ कविता की धार अपनी भाषिक व्यंजना के रेडिकल भावभूमि पर विकसित होती है। यहाँ कहते हुए ख़ुशी होती है कि इस कवि ने अपने को कहीं रिपीट नहीं किया है और इसी कारण इनकी कविता बहुवस्तुस्पर्शी उध्र्वमुखी चेतना से संपन्न है जो एक समर्थ कवि का लक्षण है। भाषा की सादगी और बिंबों की निजता इनके कवि- स्वभाव की विलक्षण विशेषता है। कह सकते हैं कि भाषा के लोक स्वीकृत विन्यास को चुनौती देती इनकी कविताओं में व्यंग्य व वक्रता का एक सघन संसार उपस्थित होता है जहाँ भाषायी मुखरता के साथ एक आत्मसंवादी स्वर का औदात्य भी मिलता है जो इनकी कविताओं को रेडिकल बनाता है।
    उम्मीद की जानी चाहिए कि कविता का यह संचयन कवि की काव्य संपदा और उनकी सामर्थ्य से अपने पाठकों को परिचित कराने में समर्थ होगा।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • The Luck Of The Jews (Paperback)
    Michael Benanav
    395

    Item Code: #KGP-323

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Aavahayami
    Ramesh Chandra Shah
    400 360

    Item Code: #KGP-9011

    Availability: In stock

    'आवाहयामि' पुस्तक में श्री जे. एल. मेहता पर लिखे गए संस्मरण में एक उद्धरण है-'कल्पना क्योंकि मूलत: भाषिक होती है इसलिए हाइडेगर का कहना है कि स्वयं भाषा ही बीजरूप में कविता है, पूर्वप्रक्षिप्त अर्थों का ऐसा आकार, जो हमारे वस्तुजगत को प्रकाशित और निर्मित करता है। इसी आधारभूमि पर चिंतक और कवि चिंतन और सृजन के नए रास्ते बनाते हैं।' यानी बड़ी से बड़ी प्रतिमा के भीतर से उपजे विचार या कविता का विस्फोट भी मात्र उसकी प्रतिभा की करामात नहीं होते बल्कि उसके पूर्वजों व तमाम पूर्ववर्ती कवि-चिंतकों द्वारा रची और बार-बार आविष्कृत की गई भाषा की देन भी होते हैं। इसीलिए नई पीढी के लिए यह जरूरी है कि वह न सिर्फ अपनी भाषा को बनाने वाली कविता व चिंतन के पास बार-बार जाए बल्कि उस समय के सरोकारों को भी भली-भांति जाने-बूझे क्योकिं तभी वह अपनी पीढ़ी व अपने समय के तनावों को भी ठीक-ठीक समझ पाएगी ।
    संस्मरणों की यह पुस्तक दरअसल ऐसा ही एक आवाहन है-एक आधुनिक, भारतीय कवि का अपने भाषिक परिवेश के पूर्ववर्ती और समवर्ती कवियों-चिंतकों से सतत संवाद करने, उन्हें और उनके माध्यम से खुद को बेहतर समझने की अदम्य इच्छा का दस्तावेज । वहीं दूसरी और यह संस्मरण एक प्रखर आलोचक को पैनी दृष्टि से देखे गए जीवन-प्रसंगों और हिंदी साहित्य में स्था-समय पर प्रकट हुई गहन चिंताओं, अनुरागों और ऊहापोहों का लेखा-जोखा भी है। इसीलिए यह पुस्तक संस्मरण के सामान्य अर्थों में उन व्यक्तित्वों, जिन पर ये लिखे गए हैं, उनके जीवन के रोचक या प्रेरणादायी घटनाओं का संपुंजन मात्र न होकर हिंदी साहित्य के एक पूरे युगबोध का सिंहावलोकन है ।
    संस्मरण-विधा की साहित्य में अहमियत 'रिक्त स्थानों की पूर्ति' करने वाली हो सकती है जो न केवल उन कवि-चिंतकों बल्कि उस घूरे समय की सर्जना एवं विचार-प्रवाहों को समझने में मदद करें, ऐसा इस पुस्तक के पाठकों को अनुभव होगा।
    ये संस्मरण जिनके बारे में लिखे गए हैं, उनके व्यक्तित्व को उजागर करने के साथ-साथ लिखने वाले की जिज्ञासाओं, अभिरुचियों, खुलेपन और संवाद करने की ललक को भी अनायास ही उजागर करते चलते हैं।
    हिंदी का जैसा लबालब, हिलोरें लेता, चौडा पाट इस पुस्तक में उजागर होता है-उसमें जैसी और जितनी सार्थक बहसें लेखक अपने समय और आपस में एक- दूसरे के लेखन-चिंतन और स्वयं अपने अंतर्द्वंद्वों से कर रहे थे यह देखना आज की पीढ़ी के लिए चकित करने वाला अनुभव हो सकता है। युवा पीढ़ी के अधिकांश लोगों ने तो हिन्दी के  इस चौडे और जीवंत पाट को जाना ही नहीं है, और एक दुबली, सतही धार जो अब सूखी, तब सूखी- भला किसी को कितना-क्या और कब तक है सकती है ?
  • Bhartiya Vangmay Per Divyadrishti
    Kashiram Sharma
    400 360

    Item Code: #KGP-9137

    Availability: In stock

    भारतीय वाड्मय का एक बहुत बड़ा भाग चार महास्तंभों पर आरित है। वे हैं: रामायण, पुराण और बड्ढकहा (बुहत्कथा)। सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकारों ने आदिकाव्य रामायण, जयकाव्य महाभारत और पुराणों को अपना उपजीव्य बनाया है। संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पर्याप्त वाड्मय ‘बड्ढ कहा’ पर भी आश्रित है। अतः इन चार महास्तंभों का सम्यक् परिचय प्राप्त किए बिना भारतीय वाड्मय का सुचारु अध्ययन संभव नहीं है। इस बात को तो लोग प्रायः स्वीकृत कर लेते हैं कि भारतीय वाड्मय भवन का बहुत बड़ा भाग इन चार स्तंभों पर टिका है पर ये महास्तंभ किस ‘घातु’ के बने हैं, यह जानारी बहुत ही कम लोगों को है। इस पुस्तका में उस धातु का परिचय कराने का विनम्र प्रयास है। वह धातु क्या है और उसका उद्गम स्थान कहा हैं, यह भी बताने का प्रयास किया गया है।
  • KUCH SAMAY BAAD
    Devendra Chaubey
    180 162

    Item Code: #KGP-1563

    Availability: In stock

    कुछ समय बाद
    पहले कहानी-संग्रह से ही देवेन्द्र चौबे इस रूप में आश्वस्त करते नजर आते है कि वह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं । 'कुछ समय बाद’ की अधिकांश रचनाएं पाठक को विभ्रम से निकालकर यथार्थ से जोड़ने का काम करती हैं। 'उत्तर-कथा' के नेपाली के हों या 'छोटे-छोटे सपने' के करीमना के, कहानीकार पात्रों के जीवनानुभवों को समझते हुए उनके मन में उतर जाने की सामर्थ्य रखता है । कहीं वह मन की शांति की सच्ची खोज करता है तो कहीं व्यक्ति के सपनों के दरकने के कारणों की खोज करता नजर आता है ।
    शहर और गाँव के बीच प्रभावित होते जीवन को तो देवेन्द्र अपनी कहानियों में  लाते ही हैं, सामूहिक राजनीतिक चेतना का विवेकशील स्फुरण भी यहीं मौजूद है, जो स्थानीय हितों को अदेखा नहीं करता । चरित्रों, स्थितियों और जीवन के विविध ऐसे प्रसंगों से कहानी की जमीन अपनी ही भाषा से तलाशना देवेन्द्र को भाता है, जो व्यक्ति के अनुभव को समृद्ध करते हुए उसे और अधिक संवेदनशील बनाते हैं । उनकी रचनाओं की यह सहज विशेषता है कि वे समाज के कोनों-अंतरों में चल रहे छोटे-छोटे महायुद्धों की टोह लेती नजर आती हैं । जीवन की सहजता यहाँ उसकी विसंगतियों के साथ मौजूद है ।
    अव्यवस्थित और मनुष्य-विरोधी व्यवस्था पर कहानियों के जरिए कमेंट करना देवेन्द्र चौबे के कथाकार को अच्छा लगता है । अपनी पहली कहानी से ही जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था लिए यह कथाकार जब 'सजा' जैसी बड़ी कहानी पर पहुंचता है तो यह संकेत भी दे जाता है कि यथार्थ को पकड़ने के लिए दूरी भी कभी-कभी सहायक साबित होती है । सोवियत संघ के विघटन के बहाने लिखी गई यह कहानी गौरतलब तो है ही, गंभीर बहस भी आमंत्रित करती है ।
  • Samarpan
    Bhanu Pratap Shukla
    80 72

    Item Code: #KGP-1959

    Availability: In stock

    समर्पण 
    शताब्दियों से साथ-साथ रहने के बावजूद मुस्लिम मानसिकता भारतीय जीवन-दृष्टि से रच-बस क्यों नहीं सकी ? राष्ट्रीय मूल धारा के प्रवाह को और व्यापक न बनाकर उसे संकीर्ण या उससे हटकर अपनी एक अलग धारा बनाने का प्रयास क्यों चलता रहता है ? भारत में इस्लाम के मतानुयायी यहाँ की विविधता में एकता की अवधारणा के अधिष्ठान का अंग क्यों नहीं बन पाते ? हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा जितना गगनभेदी होता है, दिल की दूरियाँ और दरारें उतनी ही गहरी क्यों होती जाती है ? कैसा स्वर्णिम होगा वह दिन जब भारत के सभी नागरिक मुक्तकण्ठ से 'भारतमाता की जय' के उदघोष में ही सर्वाधिक गौरव और प्रेरणा का अनुभव करेंगे । यहीं लालसा इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है । इस पुस्तक में उठाए गए ऐसे तमाम सवालों का बेबाक जवाब मिल जाए और खुले मन से हम उन्हें मान लें तो निश्चित ही उस दिन भारतीय जीवन का सौदर्य अपने पूरे निखार पर होगा । शताब्दियों के संताप से संत्रस्त देश के लिए सहीं, सामयिक और स्थायी विकल्प की तलाश का ही एक नाम है-समर्पण ।
  • 20-Best Stories From Spain & Portugal
    Prashant Kaushik
    395 356

    Item Code: #KGP-9311

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Spanish & Portuguese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories 
    open up a new world on each page.

    With stories like Vain Queen, Maid and the Negress, Three Citrons of Love, Daughter of the Witch, Pedro and the Prince, Tower of ill Luck, this book is a compilation of 20 famous Spanish & Portuguese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Spain & Portugal.
  • Chasing Maya (Novel)
    Rohan Gagoi
    295 266

    Item Code: #KGP-606

    Availability: In stock

    Better jobs, bigger salaries, expensive cars, exclusive homes, exotic vacations, shopping abroad, admiration and jealousy of peers... What more can you expect from life! Or, may be, you can…! Come; explore your truth with ‘Chasing Maya’!
    ‘Chasing Maya’ is about thirty-two-year old Siddhartha Kumar, who in spite of his evident material success finds himself trapped in the grip of mediocrity – the distress and despair of being no different from millions of others in this world. Bemused, he sets on a quest to rediscover the zeal that once fuelled his dreams and passion and comes across with situations and people that lead him to astounding revelations.
    Share the anxiety, live the excitement and experience the magical transcendence as ‘Chasing Maya’ takes you on an incredible journey that every human soul instinctively seeks to undertake but only a negligible few truly succeed to accomplish!
  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220 198

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-2)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-632

    Availability: In stock


  • Taaki Desh Mein Namak Rahe
    Asghar Wajahat
    390 351

    Item Code: #KGP-475

    Availability: In stock

    ताकि देश में नमक रहे पुस्तक में कुल 42 लेख संकलित हैं, जिन्हें दो खंडों में विभाजित किया गया है। पहले खंड के अंतर्गत साहित्यिक लेख हैं, जब कि दूसरे खंड में सामाजिक-सांस्कृतिक लेख संकलित हैं। साहित्यिक लेखों में सिर्फ साहित्यिक विधाओं या सरोकारों की ही बात नहीं की गई है बल्कि कई ऐसी साहित्यिक विभूतियों पर भी लेखक ने पूरी आत्मीयता से लिखा है, जिन्होंने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। मुज़फ्फर अली के साथ बिताए ख़ूबसूरत दिन हों या बेगम अख़्तर, शैलेन्द्र और शहरयार के लिए मन में मौजूद दीवानगी का अहसास, प्रमोद जोशी और ब्रजेश्वर मदान जैसे अपनी तरह की विशिष्ट-सामान्य शख़्सियतों की बातें हों या कुर्रतुलऐन हैदर और मंटो जैसे अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों के प्रति आदर-भाव प्रकट करना हो, हर लेख में असग़र वजाहत कुछ न कुछ ऐसा ज़रूर दे जाते हैं जिसे पाठक अपने मन से कभी विस्मृत नहीं कर सकता। 
    पुस्तक के दूसरे खंड में संकलित लेख हालांकि सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े हैं लेकिन उनका वैचारिक धरातल अत्यंत विस्तृत है। इनमें भाषा से जुडे़ सवाल, सिनेमा और साहित्य के अंतर्संबंध, आने वाले समय में हिंदी सिनेमा की दशा-दिशा का आकलन, भारतीय गणतंत्र से जुड़े दशकों पुराने अनुत्तरित सवाल और लगातार छीजते जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति गहन चिंताएं मौजूद हैं। असग़र वजाहत इन लेखों के जरिए वर्तमान समय के जटिल सवालों को न केवल उभारते हैं बल्कि उनसे मुठभेड़ कर उनकी तहों में जाकर कारण भी तलाशते हैं। 
    इन विविध लेखों को क्रमिक रूप से पढ़ने पर हम अतीत से शुरू कर वर्तमान को पार करते हुए भविष्य के संभावित सवालों से भी रूबरू हो सकते हैं। यह असग़र वजाहत के लेखन की कलात्मकता ही है कि वह छोटे तथा मामूली से दिखने वाले मुद्दे या सवाल से अपनी बात शुरू कर उसे पूरे समाज और व्यवस्था के लिए एक ज़रूरी सवाल का स्वरूप प्रदान कर देते हैं।
    भूमिका से 
  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar
    Laxman Prasad
    595 536

    Item Code: #KGP-726

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Prourh Shiksharthion Ki Shiksha-Prapti Ke Vaataavaran Ke Ghatak Tatva
    Naseem Ahmed
    140 126

    Item Code: #KGP-9129

    Availability: In stock

    यह पुस्तक ‘दिल्ली में एक शहरी स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण को निर्धारित करने वाले तत्त्वों के अध्ययन’ विषय पर लेख के पी-एच.डी. के सोध-प्रबंध का परिणाम है। इस प्रयास पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने डाॅक्टर आॅफ फिलाॅसफी (पी-एच.डी.) की उपाधि प्रदान की है।
    पुस्तक ‘प्रौढ़ शिक्षार्थियों’ की ‘शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण’ तथा विशिष्टताओं की अवधारणा को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित करती है। भारत के संदर्भ में शहरी स्लम बस्तियों में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण की रूपरेखा को पुस्तक में दर्शाया गया है। एक स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की विशिष्टताआं तथा शिक्षा-प्राप्ति के आसपास के वातावरण के संदर्भ में उन्हें विस्तार से समझने के लिए पुस्तक उपयोगी है। इस प्रकार की समझ प्रौढ़ों में साक्षरता को बढ़ावा देने के प्रयासों का सफल बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई संभावनाओं को उत्पन्न करने में सहायक होगी।
    साथ ही शहरी क्षेत्रों में सामान्य रूप से तथा शहरी स्लम बस्तियों के वातावरण में विशेष रूप से साक्षरता तथा प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों की योजना बनाने और उसका प्रबंध करने की प्रक्रिया के लिए यह उपयोगी सूचनाओं की एक स्रोत-पुस्तिका भी हो सकती है।
  • Safar Baavajood
    Sidhesh
    140 126

    Item Code: #KGP-1947

    Availability: In stock

    सफर बावजूद
    सिद्धेश की कहानियाँ कहानी-आंदोलन के उस दौर की उपज  हैं, जब कहानी में कलावाद की यथार्थवाद का संघर्ष चल रहा था । गुटबाजी, शिबिरबद्धता चरम पर थी । सिद्धेश  को यह शोर-शराबा पसंद न था । वे मौन भाव से सृजनरत थे । तटस्थ बने रहने का खामियाजा यद्यपि उन्हें भुगतना पडा । उनकी कहानियां फॉर्मूलाबद्ध लेखन तथा किताबी नुस्खों से मुक्त हैं । सिद्धेश ने कहानियों में शिल्पगत चमत्कार, भाषा की पच्चीकारी की जगह सहजता को महत्त्व दिया है । वे मुख्यत: नागर-मानसिकता के कहानीकार हैं, पर उनकी कहानियां सामाजिक सरोकारों से प्रतिबद्ध हैं।
    संग्रह की इन कहानियों से विषयवस्तु की विविधता के साथ ही मानवीय दृष्टि और संवेदना का विस्तार है । ये कहानियाँ अपने समय और परिवेश के स्पंदनों को पहचानने की कोशिश करती हैं । मानव-मन की सूक्ष्म परख की कला  में माहिर हैं सिद्धेश । वे विचारधारा से अधिक मनुष्य और उसकी संवेदनाओं को महत्व देते हैं। उनके अनुसार, "संवेदना के स्रोत में बहने के लिए अपने चारों तरफ के परिवेश, चरित्रों और घटनाओं के प्रति सजग दृष्टि रखनी पडती है ।" सृजन को सिद्धेश 'जीने के मकसद' से जोड़कर देखते  । संघर्षों, अभावों से जूझते हुए ही उन्होंने अपनी रचना-दृष्टि अजित की है।
    सहजता और सार्वज़निकता इन कहानियों का वैशिष्ट्य है। कहानी का रूप-गठन और रचना-विधान कुछ इस तरह है कि आधुनिक नागरिक जीवन के अनेक अनछुए तथा मार्मिक प्रसंगों का मनोवैज्ञानिक चित्रण बिना किसी अतिरंजना के यहाँ चित्रित हुआ है ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Premchand
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-9154

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है।  
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं प्रेमचंद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘पंच परमेश्वर’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘रामलीला’, ‘मंत्र’, ‘जुलूस’, ‘पूस की रात’, ‘सवा सेर गेहूं’, ‘ईदगाह’, ‘नशा’ तथा ‘कफन’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Gharaunda (Paperback)
    Shanker Shesh
    20

    Item Code: #KGP-7096

    Availability: In stock


  • Pahiye Ki Vikaas Katha
    Chetan Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-959

    Availability: In stock


  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7210

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Sahitya : Vividh Vidhayen
    Shashi Sahgal
    240 216

    Item Code: #KGP-755

    Availability: In stock

    साहित्य: विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Meri Pratinidhi Kahaniyan
    Santosh Shelja
    100 90

    Item Code: #KGP-1949

    Availability: In stock

    मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ
    राकेश के घर पर जैसे आँसुओं का समंदर ही उमड़ आया था। सुदर्शना को उस समुद्र में डूबते जहाज-सा वह ताबूत दिखाई दिया, जिसमें उसका ‘सब कुछ’ था। आज उसे न माँ-बाप की ममता बाँध सकी, न ही सास-ससुर की लाज रोक सकी। आँधी की तरह वह आगे बढ़ी और ससुर के साथ खड़ी हो गई, "मैं भी कंधा दूँगी।"
    दुल्हन-सी सजी सुदर्शना को देख सैनिक भी हक्के-बक्के रह गए। सब चौंक उठे, "क्या कहती है लाड़ी ? पगला गई है ? ऐसा भी कभी हुआ है आज तक ?"
    जवाब में सुदर्शना ने और कसकर अरथी को पकड़ लिया। उसकी चुप्पी जैसे बोल उठी, ‘आज तक ऐसा शहीद भी न हुआ था कभी। मैंने बचपन से हर पल जिसका साथ दिया, आज उसकी अंतिम यात्रा में साथ कैसे छोड़ दूँ ?’
    अरथी उठाकर लोग चल पडे़। ‘कारगिल का शहीद राकेश अमर रहे!’ के घोष से गूँज उठा धरती-आकाश।
    तभी वह रुक गई, "ठहरो, जरा...स्वेटर...स्वेटर..."
    उसने माँ की ओर देखते हुए पुकारा। माँ तीर की तरह आगे आई और एक नया बुना स्वेटर लाकर उसे दे दिया। उसने उसे खोला और बड़े प्यार से अपने पति की छाती पर सजा दिया। बोली, "तुमने चिट्ठी में लिखा था। मैंने तैयार कर रखा है। इसे पहनकर जाओ। अब ठंड न लगेगी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी ‘स्वेटर’ से]
  • Qaidi
    Shanta Kumar
    120 108

    Item Code: #KGP-1996

    Availability: In stock

    कैदी
    "राजीव ! इस देश में हर आदमी के
    माथे पर उसकी कीमत लिखी रहती है ।
    वह कीमत चुकाओ और उसे खरीद लो ।
    यहां बाज़ार में सरेआम इंसान
    नीलामी पर चढते है और जाहिर
    में भगवान बेचे जाते है ।
    बड़ा अनुभव है मुझे जिंदगी का ।
    जेल में वार्डर पैसे लेकर क्या नहीं
    ले आते ? बस, इतनी बात है कि
    दुगुना-तिगुना मूल्य चुकाना पड़ता है ।
    जब उन्हें पता चल गया कि मेरे पास
    धन है तब मेरो इज्जत होने लगी ।

    'मैंने कैद पूरी की । छूटकर बाहर आया,
    पर जाता कहाँ? फिर से वही धंधा,
    पुलिस और जेल । इसी प्रकार अब
    सातवीं बार यहाँ आया हूँ ।
    अब यह कैद समाप्त हो रही है
    तो फिर मेरे सामने सवाल
    खडा हो गया है कि बाहर जाकर
    कहाँ जाऊंगा व क्या  करूँगा ?
    जानता हूँ कि कुछ भी और
    नहीं कर सकता । यह जिंदगी अब
    जेल की ही हो गई है ।”
    [इसी उपन्यास से]
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh (Paperback)
    Shravan Kumar
    240

    Item Code: #KGP-136

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Govind Mishra
    Govind Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-760

    Availability: In stock


  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Antyoday Purus : Shanta Kumar
    Satish Dhar
    195 176

    Item Code: #KGP-232

    Availability: In stock

    अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार
    शान्ता कुमार स्वच्छ छवि की भारतीय राजनीतिक परंपरा के राजनेता हैं। राजनीति के साथ-साथ शान्ता कुमार कई महत्त्वपूर्ण एवं चर्चित साहित्यिक पुस्तकों के रचयिता भी हैं ।
    ‘अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार' ऐसी पुस्तक है, जिसमें शान्ता कुमार के घर-परिवार से लेकर अभिन्न मित्रों के गरिमापूर्ण रिश्तों की सांद्रता है । पुस्तक शान्ता कुमार के जीवन-संघर्षों के कई अनछुए प्रसंगों को समेटे हुए है । शान्ता कुमार के ओजस्वी वक्तव्यों से परिपूर्ण साहित्यिक सभाओं अथवा अन्य कार्यक्रमों में की गई बेबाक टिप्पणियाँ इस महान् व्यक्तित्व की बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाती है ।
    हिमाचल प्रदेश के इस महान् सपूत ने अपनी प्रखर सोच से देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को नई दिशा प्रदान की है। पुस्तक में राजनीति के चलते राष्ट्रीय स्तर पर शान्ता कुमार द्वारा प्रारंभ की गई लोक-हितकारी योजनाओं की बानगी भी देखने को मिलती है। यह कृति सृजनात्मकता की छौन्क के साथ-साथ राजनीतिक इतिहास का भी दस्तावेज है ।
    पुस्तक में लेखक द्वारा लिया गया साक्षात्कार शान्ता कुमार के व्यक्तित्व के कई कोने-अंतरों को खोलने में सक्षम रहा है। पुस्तक की प्रांजल व लयात्मक भाषा पाठको को अंत तक बॉंधे रखने में सक्षम है ।
  • Madhumeh Evam Chikitsa
    Maitreyi Pushpa
    120 108

    Item Code: #KGP-9319

    Availability: In stock

    सन् 1967 की बात है। उन दिनों मैं अखिल भारतीय संस्थान, नई दिल्ली के मेडीसन विभाग में कार्य कर रहा था। फारमकाॅलाॅजी में एम. डी. करने के पश्चात् मेडीसन में भी एम. डी. करने की योजना थी। उन दिनों रोगियों से बातचीत करने पर लगता था कि दिल्ली के नागरिकों को स्वास्थ्य संबंधी विशेष जानकारी नहीं थी। कारण भी स्पष्ट था। उन दिनों न तो हिंदी में स्वास्थ्य संबंधी पुस्तकें उपलब्ध थीं और न पत्र-पत्रिकाओं से इस प्रकार की जानकारी मिल पाती थी। हां, अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में यदा-कदा लेख छप जाया करते थे। 
    अतः मन में निरंतर यह बात खटकती रहती थी कि इस कमी को कैसे दूर किया जाय। संयोगवश उन्हीं दिनों श्री रतनलाल जी जोशी से परिचय हुआ। वे उन दिनों ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र के प्रधान संपादक थे। बस, उन्हीं से प्रेरणा प्राप्त कर मैंने ‘दैनिक हिंदुस्तान’ समाचार-पत्र में स्वास्थ्य संबंधी लेखन प्रारंभ किया जो आगे चलकर ‘रोगियों के प्रश्नोत्तर’ नाम से स्थायी स्तंभ के रूप में लगभग बीस साल तक चलता रहा।
    मेरी ऐसी मान्यता है कि आयुर्विज्ञान संबंधी साहित्य का जब तक हिंदी में मौलिक सृजन नहीं होगा, तब तक इस विज्ञान को जन-मानस से नहीं जोड़ा जा सकता। अनुवादित ग्रंथों से जानकारी तो मिल जाती है, परंतु मौलिकता नहीं आ पाती।
    स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संगठित हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में मैंने सदैव अनुभव किया है कि स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान हिंदी के माध्यम से ही जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।
    इसी परिवेश में प्रस्तुत पुस्तक ‘मधुमेह एवं चिकित्सा’ की रचना की गई हे, जिससे लोगों को लाभ होगा, ऐसा विश्वास है।
  • Saryu Didi
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-1956

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    सरयू दीदी
    मैंने फोन मिलाया। गोपाल जोशी सुनाकर सदके में आ गए, 'यह नहीं हो सकता। मैं अभी पता लगाता हूँ।' उन्होंने फोन रख दिया।
    'क्या करूं मनु?' दीदी की आवाज में बेबसी थी। वही तो सदा समझदार रहीं। वही तो हर प्रश्न का उत्तर और हर समस्या का हल ढूंढ़ लेती थीं। पर यहां वह किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी थीं ।  वह उठकर कमरे में टहलने लगीं । 'अभी तो जीवन शुरू ही हुआ था मनु।' दीदी ने हाथ जोड़े ऊपर देखा, आंखें बंद कीं और जोर से बोली, 'हे ईश्वर आप ही माता है आप ही पिता हैं। हे ईश्वर आप ही सबकी रक्षा करने वाले हैं। हे ईश्वर मुझे ठीक सोचने-समझने की शक्ति दीजिए। मुझे बल दीजिए। हे ईश्वर मुझे बल दीजिए।' दो क्षण बाद दीदी की आंखें झरने लगीं। थोडी देर बाद दीदी में शक्ति लौटकर आ गई, 'मनु मैं यब कुछ सह लूंगी। भगवान महान हैं, दयालु हैं।' मेरी तरफ़ मुड़कर बोलीं, 'मनु। पापा से पूछो अजीत को लेकर प्लेन कब आ रहा है?' वह उठकर दराज़ में से कूछ खोजने लगीं।
    तभी फोन की घंटी बजी मैंने फ़ोन उठा लिया। उधर फोन पर मां थी, 'मनु अजीत को यहां अपने घर ले आते हैं। वही ठीक होगा। वहीं सरयूजी क्या करेंगी? '
    मैं दीदी से पूछती हूँ। हिम्मत करके मैंने दीदी से पूछा। दीदी ने कहा, 'मनु! अजीत का घर यहीं है, वह यहीं आयेंगे ।'
    मैंने जाकर मां को बता दिया।
    -(इसी उपन्यास से)
  • Janmanmayi Subhadra Kumari Chauhan
    Rajendra Upadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-180

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    160 144

    Item Code: #KGP-13

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', 'क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sant Ravidas Ki Ramkahani
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-732

    Availability: In stock

    'संत रविदास की रामकहानी' कवि देवेन्द्र दीपक की संत  रविदास के जीवन-दर्शन पर अपने किस्म की प्रथम औपन्यासिक रचना है । इसमें सृजन और अध्यात्प चेतना के आस्थाशील आयाम उदघाटित हुए हैं । लेखक ने रविदास के अंतत् से उतरने, उसके चिंतन के मर्म को उकेरने का सफल प्रयास किया है । इसमें संत के मन-आत्म की पारदर्शी निर्मलता तथा हाथ के श्रम के प्रति गहरी आस्था भी व्यक्त  हुई है । अपने समाज के श्रमशील उज्जवल समुदाय को दलित बना दिए जाने की पीडा के साथ भारतीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए सामाजिक न्याय, समता, संवेदना की हितैषी स्थापनाएँ भी हुई है ।
    संत रविदास की वाणी से पौराणिक आख्यानों, भक्ति-ज्ञान-कर्म के योग विषयक विचारों, लोक में व्याप्त पारंपरिक इनके रंरा-रूपों को यथावश्यक प्रयुक्त करके देवेन्द्र दीपक ने एक बड़े अभाव की पूर्ति कर बड़ा काम किया है । भारतभूमि पर बहने वाली पुण्य-सलिला नदियों-गंगा, यमुना, सरस्वती को मानव शरीर से कार्यशील-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से जोड़कर योग-अध्यात्म को तथा राष्ट्रीयता के चिंतन-दर्शन को पुष्ट किया है ।
    वसुधैव कुटुंबकम के वैश्विक विचार को रविदास की समूची वाणी में लक्षित-रेखांकित कर भारतीय अस्मिता एवं