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  • Manch Andhere Mein
    Narendra Mohan
    120 108

    Item Code: #KGP-1915

    Availability: In stock

    मंच अँधेरे में
    मंच कलाकार की जान है और खाली मंच कलाकार की मौत। ‘खाली मंच’ से तात्पर्य उस स्थिति से है जब अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध हो। ऐसी स्थिति में अभिनेता, रंगकर्मी क्या करे? मंच अँधेरे में नाटक ऐसी ही विकट स्थिति से दर्शक/पाठक का सामना कराता है--रंग-कर्म की अपनी भाषा में। इस तरह से देखें तो मंच अँधेरे में नाटक में नाटक है।
    इस नाटक में शब्द, उनके अर्थ, उनकी ध्वनियाँ-प्रतिध्वनियाँ इस तरह से गुँथी हुई हैं कि उन्हें अलगाना संभव नहीं है। रंगकर्मी अंधकारपूर्ण स्थितियों में भी सपने देखता है और प्रकाश पाने के लिए संघर्ष करता है। अभिव्यक्ति को सघन तथा प्रभावी बनाने के लिए अँधेरा और प्रकाश और उन्हीं में से जन्म लेतीं कठपुतलियों और मुखौटों के ज़रिए लेखक ने जैसे एक रंग-फैंटेसी ही प्रस्तुत की है।
    मंच अँधेरे में नाटक भाषाहीनता के भीतर से भाषा की तलाश करते हुए बाहरी-भीतरी संतापों-तनावों को संकेतित करने वाला नाट्य प्रयोग है, जिसमें परिवेशगत विसंगति के विरोध में संघर्ष और विद्रोह-चेतना को खड़ा किया गया है। एक बड़ी त्रासदी और विडंबना के बावजूद इसके हरकत-भरे शब्द और जिजीविषा से भरे पात्र मंच अँधेरे में होने के बावजूद उम्मीद और आस्था को सहेजे हुए हैं, जिसके कारण नाटक समाप्त होकर भी भीतर कहीं जारी रहता है। यही इस नाटक की जीवंतता और सार्थकता है।
  • Himalaya Gaatha-5 (Lokvarta)
    Sudarshan Vashishath
    495 421

    Item Code: #KGP-693

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-5 (लोकवार्ता)
    अदभुत है लोक वाड्मय। यह जितना गहन है, उतना ही तर्कशील और विवेकशील है । इसके रचयिता वे अनाम रचनाकार रहे हैं, जिन्होंने कभी अपने नाम नहीं दिए । लोक की रचना जितनी मारक रही है, उतनी ही काव्यमयी । हालाँकि उन रचयिताओं ने कहीँ से छंदविधान नहीं सीखा, किसी काव्यशास्त्र की शिक्षा नहीं ली । सबसे बडी बात यह कि राजाओं के निरंकुश शासन के समय भी उन्होंने बड़ी से बडी बात अपने ढंग से निडर होकर कही । वे काल और स्थिति के अनुसार नए-नए छंद रचते रहे । लोक की रचना में अपनी परंपरा के वहन के साथ समाज- सुधार की एक धारा भी निखार बहती रही । अपनी संस्कृति का संरक्षण, अपने संस्कारों का समादर इनका अभीष्ट रहा ।
    हमारी लोकवार्ता लोकगीत, लोकसंगीत, लोकनाट्य, लोकोक्ति-मुहावरे, लोककथा और लोकगाथा के रूप में सुरक्षित रही है। यह मात्र मनोरंजन का साधन न होकर संस्कृति के संवाहक और संरक्षक के रूप में अधिक जानी गई । समाज के विश्वास, आस्थाएँ, धारणाएं और समस्त क्रियाकलाप लोकवार्ता में परोक्ष रूप से छिपे रहते हैं, जो हमारी थाती को बुढ़िया की गठडी की भाँति सिरहाने रखे रहते हैं।
    लेकिन आज हमारी यह संपदा लुप्त होने के कगार पर है । भौतिकवाद, बाजारवाद और समाज के बदलते परिवेश और मूल्यों ने पुरानी परंपराओं को धराशायी कर दिया । लोकगायकों, वादकों ने अपना कर्म छोड़ दिया । आज न किसी के पास कथा या गाथा सुनने का समय है और न सुनने का । दादी-नानी दूरदर्शन में सास-बहू की कहानी देखती हैं । हम अपनी भाषा, वेशभूषा से विमुख हुए । ऐसे अपसंस्कृति के कुसमय में इस दुर्लभ साहित्य का संग्रहण आवश्यक हो जाता है ।
    कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अमूल्य थाती का संग्रह कर एक अति महत्त्वपूर्ण काम किया है, जिसके लिए कल का इंतजार नहीं किया जा सकता था । लोकवार्ता की मात्र प्रस्तुति न देकर उसका सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण विषय को और भी गहनता प्रदान करता है । 'हिमालय गाथा' के पाँचवें खंड में दी गई दुर्लभ सामग्री हमारी परंपराओं के अध्ययन के लिए एक मील का पत्यर साबित होगी, ऐसा विश्वास है ।

  • Saaksharta Aur Samaj
    Vinod Das
    125 113

    Item Code: #KGP-9122

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में साक्षरता की महिमा और संबंधित सामाजिक द्वंद्वों और इसके प्रसार में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, जनसंचार माध्यमों की भूमिकाओं, तत्संबंधी सांस्कृति-उपभोक्तावादी ऊहापोहों, स्त्री-साक्षरता के महत्त्व जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पहचानने का प्रयास किया गया है, वहीं उन वर्गीय पूर्वाग्रहों को भी अनोखी अंतर्दृष्टि और वयस्क विवेक से चिह्नित किया गया है, जिनके कारण साक्षरता का आलोक देश की धूसर और मटमैली झुग्गियों-झोंपड़ियों में अभी तक नहीं पहुंच पाया है। यह सही है कि लेखक के इन विमर्शों और स्थापनाओं में तीखापन और तुर्शी है। कई बार सामाजिक जड़ता और धीमी गति को लेकर यहां गुस्सा, क्षोभ और अवसाद भी मिलता है। लेकिन विनोद दास हिंदी के उन विरल साहित्यकारों में हैं, जो एक संवेदनशील बुद्धिजीवी की तरह शिक्षा से जुड़े गंभीर सवालों पर वैचारिक हस्तक्षेप करते हुए अपनी परंपरा को पहचानकर मूल्यवान की खोज करते हैं। इस संकलन में उनका एक ऐसा व्यक्तिपरक निबंध भी है, जिसमें वह जमीन से जुड़े उन दो अक्षरवंचित विभूतियों को आत्मीयता से स्मरण करते हैं, जिन्होंने मूल रूप से उन्हें साक्षरता की दिशा में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित किया है। एक तरफ इन निबंधों में साक्षरता के बारे मंे व्याप्त भ्रांतियों और धुंध को छांटने की कोशिश है, वहीं उस उम्मीद की लौ को तेज करने की कोशिश है, जो मनुष्य में समाज को बेहतर बनाने के लिए भीतर-भीतर ही सुलगती रहती है।
  • Os Ke Rang
    Rajeshwar Prasad Sharma
    40 36

    Item Code: #KGP-9033

    Availability: In stock

    डॉ० रामकुमार वर्मा की दृष्टि में 
    मुझे आपकी रचना बहुत अच्छी लगी ।
    उसमें भावना की तरंगें जीवन की
    वास्तविकता से टकराती हैं और
    हृदय में प्रभावपूर्ण ध्वनियाँ छोड़ जाती हैं। 
    आज के युग में जहाँ छंदों की
    हत्या कर कविता लिखी जाती है,
    आपकी संस्कृत वर्णवृत्तों में
    रचना की कुशलता आपके पाण्डित्य
    और भाषाधिकार का प्रमाण देती है ।
    समय आने पर आपकी रचना का
    मूल्य होगा, मुझे विश्वास है ।
  • Har Baar Musaphir Hota Hoon
    Pratap Sehgal
    280 252

    Item Code: #KGP-611

    Availability: In stock

    हर बार मुसाफिर होता हूं' के यात्रा-वृत्तांत निरे वृतांत नहीं हैं। निरे वृतांत कभी भी यात्रा-साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकते। यह यात्रा-वृतांत कभी इतिहास की गलियों से गुज़रते हुए आपको अतीत के किसी पन्ने से जोड़ देते हैं तो कभी भूगोल में प्रवेश करते हुए आपको उसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जिस जगह का जिक्र लेखक कर रहा है। कभी आप उस जगह के लोक के रीति-रिवाजों से रू-ब-रू होते हैं, कभी वहां के सांस्कृतिक घटकों का तो कभी वहीं की प्राकृतिक संपदा और सौंदर्य का हिस्सा बन जाते हैं।
    विविध विधाओं में लेखन करने वाले लेखक प्रताप सहगल एक घुमंतू जीव भी हैं, यह जानकारी इन यात्रा-वृतांतों को पढ़कर पुख्ता होती है। वन वृत्तातों में कहीं कविता, कहीं नाटक और कहीं कथा का रंग मिलने लगना कोई अजूबा नहीं बल्कि इसे लेखक का शैल्पिक वैशिष्टय ही मानना चाहिए।
    ये यात्रा-वृत्तात इसलिए भी विशिष्ट हो जाते है कि लेखक वर्णित स्थान, समय और वहीं समाहित सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का रूपांकन किनारे या किसी सिरे पर खडा होकर नहीं करता। यह सीधे-सीधे स्थान, समय और परिवेश में दाखिल होकर उसका हिस्सा बनकर जीता है और खुद की भी वहीं शामिल कर लेता है। अपने इन्हीं अनुभवों को पाठक के साथ साझा करने की इच्छा ही लेखक को शब्द का सहारा लेने के लिए विवश करती है। और इसी बहाने और तमाम सार्थक यात्रा-वृत्तांतों की तरह से यह यात्रा-वृत्तांत भी हिंदी के वृहद यात्रा-साहित्य के द्वार पर दस्तक देते हुए आपके हाथ में है।
  • Hamaaraa Lakshy : Laaney Hain Leelakamal
    Dr. Ramesh Kuntal Megh
    750 675

    Item Code: #KGP-683

    Availability: In stock

    हमारा लक्ष्य: लाने हैं लीलाकमल
    चैबीसेक लेखों-आलेखों-मोनोग्राफों वाली इस किताब में समग्र ‘संस्कृति पैटर्न’ के समावेश के संग-संग सौंदर्यबोधशास्त्र, मिथक-आलेखकारी एवं (यत्र-तत्र) देहभाषा का भी मिलयन हुआ है। इसमें दोनों सरोकार शामिल हैं–क्या (लक्ष्य) हैं तथा (कला-साहित्य, समाजविज्ञान-संस्कृति के लीलाकमल) कैसे होने चाहिए! आप भी उन्हें लें तथा स्वीकारें-परखें।
    इसीलिए इसमें विभिन्न ज्ञानानुशासनों के पारिभाषिकों तथा विविधआयामी संप्रेषणों का सहारा लिया गया है, जिससे ज्ञान तथा पद्धति की नई दिशाएँ भी परिलक्षित 
    हुई हैं।
    पढ़ते हुए हम-आप मरुतों के वाक् अक्षरों के साथ ऊँचे दूर तक उड़ें, मिथक के ‘स्वप्न समय’ से आधुनिक रिनासाँ के यात्रिक बनें, प्रसाद के ‘आँसू’ की नामलुकी प्रिया-रमणियों का साक्षात्कार करें, चंपा के ‘आकाशदीप’ के साथ कथासागर में यात्राएँ करें, वागीश्वर चित्रानुरागी आचार्य शुक्ल के कई सृजन-रहस्य पहचानें, मल्लिका साराभाई के नृत्य, त्रिलोचन के व्यक्तित्व तथा तालास्थल की अजीब प्रतिभा की शिनाख्त करें, मामल्लपुरम् से लेकर मेगासिटी चंडीगढ़ के वास्तुशिल्प और नगर-निवेश का आकल्प जाँचे तथा साहित्य की समसामयिक समाजशास्त्रीय चुनौतियों का भी आगाज करें।
    इस तरह ऐसे सही प्रश्नों के सही उत्तरों का निर्णय तो आपको ही करना है—असहमति अथवा समर्थन द्वारा।
  • Man Ki Baat
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    220 198

    Item Code: #KGP-724

    Availability: In stock

    मन की बात आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के निबंधों का संग्रह है, जिसे उन्होंने सहज भाव से ‘ललित निबंध’ कहा है। यद्यपि आलोचनात्मक एवं वैयक्तिक निबंधों के इस संग्रह में कई भाव-भूमियाँ हैं। शास्त्री जी अपने निबंधों में विधा की बंदिशों को स्वीकार नहीं करते, जिसकी अपेक्षा पेशेवर निबंध लेखकों से की जाती है। वैदुष्य और लालित्य के  रचनात्मक बिंदु पर खड़े उनके निबंधों का अपना रंग है। यह एक कवि का गद्य तो है ही, एक ऐसे साहित्य मनीषी की मनोभूमि का ललित विस्तार भी है, जो अपना उदाहरण स्वयं है।
    –गोपेश्वर सिंह
  • In Sabke Baavajood
    Manohar Bandhopadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-545

    Availability: In stock

    इन सबके बावजूद
    प्राइवेट कॉलेज के असुरक्षित कार्य को छोड़कर अजय एक संपन्न व्यापारी की ‘भानजी’ रति को ट्यूशन पढ़ाता है। यहाँ उसे प्रॉपर्टी डीलिंग का भी काम मिल जाता है। इस व्यापार के दाँव-पेच सीख वह रति को हथियाकर धनवान बनने के स्वप्न देखता है। इस कोशिश में वह बुरी तरह पिटता ही नहीं, अपनी जान भी खतरे में डाल देता है। व्यापारी को उसके शोषण की फिक्र है और लड़की उसे झटककर किसी और की हो जाती है। हताश अजय तब रेनु की ओर मुड़ता है, जिसे वह किसी समय चाहने लगा था। 
    कहानी वर्तमान युग के नवयुवकों की त्रासदी को उजागर करती है, जिसमें वे वैवाहिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर जोखिम-संघर्ष में स्वयं को झोंक देते हैं। यह मर्मस्पर्शी उपन्यास आज की अस्तित्ववादी वास्तविकता को समझने के लिए पाठकों को विवश करता है।
  • Do Naatak
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-862

    Availability: In stock


  • Kashmir : Raat Ke Baad
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-843

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से बहुत गहरा लगाव था । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कश्मीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कश्मीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Mere Saakshaatkaar : Swayam Prakash
    Swayam Prakash
    380 304

    Item Code: #KGP-643

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Nasera Sharma
    Nasera Sharma
    350 315

    Item Code: #KGP-664

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma
    Tajendra Sharma
    270 243

    Item Code: #KGP-827

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vichaar Bindu
    Atal Bihari Vajpayee
    245 221

    Item Code: #KGP-9019

    Availability: In stock

    विचार-बिन्दु
    हमने अपने दैनिक जीवन में स्वतंत्रता, समानता और सहिष्णुता के सिद्धांतों क्रो संजोकर रखा है । यदि 21वीं शताब्दी में विश्व को अब तक के विश्व से अच्छा बनाना है तो इन मूल्यों को अपनाना जरूरी  है । इतिहास भी साक्षी है कि इन मूल्यों को अपनाने का उपदेश देना तो आसान है, परंतु इन पर अमल करना मुश्किल है । लेकिन अब, जबकि हमारी परस्पर निर्भरता बढ़ रही है, इसका कोई विकल्प नहीं है । विश्व और इसके नेताओं को पूरी इच्छाशक्ति के साथ समय की मांग को देखते हुए नए युग में एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रवेश करना चाहिए । हमारी सामने यही कार्य है और मैं घोषणा करता हूँ कि भारत आने वाली परीक्षा की घडी में अपना पूरा  योगदान देने के लिए तैयार है ।

    राष्ट्रीय जीवन में एक असहिष्णुता जाग रही है, दूसरे को सहन न करने की प्रवृत्ति । लोकतंत्र में यह प्रवृत्ति नहीं चल सकती । हमने हमेशा चारों तरफ से आने वाली हवाओं का स्वागत किया । इस देश के द्वार सबके लिए खुले रहे है । जब और जगह आतंक था, शोषण था, भय था, मजहब के नाम पर उत्पीड़न था, तो लोग अपनी पवित्र अग्नि को जलाए हुए भारत में आए । और यहाँ भारतमाता के आँचल में उन्होंने विश्राम पाया । किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि यहाँ कैसे आए, क्यों आए, पराए हो । यह इस देश की मिट्टी का रंग है, यह इस देश की संस्कृति का गुण है ।
    -अटल  बिहारी वाजपेयी
  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 2 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7060

    Availability: In stock


  • Premchand Ki Shresth Kahaniyan
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-7801

    Availability: In stock

    यद्यपि प्रेमचंद ने नाटक, जीवनी, अनुवाद, निबंध तथा बाल-साहित्य की रचना भी की किंतु उनकी अक्षय कीर्ति का आधर उनके उपन्यास और कहानियां ही हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूति, काया-कल्प, गबन, कर्मभूमि तथा गोदान जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों एवं प्रायः तीन सौ कहानियों की रचना कर अपने को अमर करने वाले प्रेमचंद की गुल्ली-डंडा, नमक का दारोगा, प्रेरणा, दो बैलों की कथा, मंदिर, ईश्वरीय न्याय, सवा सेर गेहूं, रामलीला, पूस की रात, महातीर्थ, जुलूस, पशु से मनुष्य, दुस्साहस, आत्माराम, नशा, गृह-दाह आदि लोकप्रिय कहानियां हैं। प्रेमचंद ने अपने समय और समाज के ज्वलंन प्रश्नों को अपनी कहानियों के माध्यम से चित्रित किया है। ग्रामीण जीवन-परिवेश और पात्रों का इतना जीवंत चित्रण करने वाला कथाकार हिंदी में तो क्या अन्य भारतीय भाषाओं में भी कदाचित् ही कोई हुआ हो। यही कारण है कि वे उस समय के सर्वप्रमुख भारतीय कथाकार हैं। विद्वानों ने बीसवीं शती के विश्व-साहितय के तीन बड़े शीर्ष कथाकारों में प्रेमचंद की गणना की है।
  • KUCH SAMAY BAAD
    Devendra Chaubey
    180 162

    Item Code: #KGP-1563

    Availability: In stock

    कुछ समय बाद
    पहले कहानी-संग्रह से ही देवेन्द्र चौबे इस रूप में आश्वस्त करते नजर आते है कि वह मूलतः मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं । 'कुछ समय बाद’ की अधिकांश रचनाएं पाठक को विभ्रम से निकालकर यथार्थ से जोड़ने का काम करती हैं। 'उत्तर-कथा' के नेपाली के हों या 'छोटे-छोटे सपने' के करीमना के, कहानीकार पात्रों के जीवनानुभवों को समझते हुए उनके मन में उतर जाने की सामर्थ्य रखता है । कहीं वह मन की शांति की सच्ची खोज करता है तो कहीं व्यक्ति के सपनों के दरकने के कारणों की खोज करता नजर आता है ।
    शहर और गाँव के बीच प्रभावित होते जीवन को तो देवेन्द्र अपनी कहानियों में  लाते ही हैं, सामूहिक राजनीतिक चेतना का विवेकशील स्फुरण भी यहीं मौजूद है, जो स्थानीय हितों को अदेखा नहीं करता । चरित्रों, स्थितियों और जीवन के विविध ऐसे प्रसंगों से कहानी की जमीन अपनी ही भाषा से तलाशना देवेन्द्र को भाता है, जो व्यक्ति के अनुभव को समृद्ध करते हुए उसे और अधिक संवेदनशील बनाते हैं । उनकी रचनाओं की यह सहज विशेषता है कि वे समाज के कोनों-अंतरों में चल रहे छोटे-छोटे महायुद्धों की टोह लेती नजर आती हैं । जीवन की सहजता यहाँ उसकी विसंगतियों के साथ मौजूद है ।
    अव्यवस्थित और मनुष्य-विरोधी व्यवस्था पर कहानियों के जरिए कमेंट करना देवेन्द्र चौबे के कथाकार को अच्छा लगता है । अपनी पहली कहानी से ही जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था लिए यह कथाकार जब 'सजा' जैसी बड़ी कहानी पर पहुंचता है तो यह संकेत भी दे जाता है कि यथार्थ को पकड़ने के लिए दूरी भी कभी-कभी सहायक साबित होती है । सोवियत संघ के विघटन के बहाने लिखी गई यह कहानी गौरतलब तो है ही, गंभीर बहस भी आमंत्रित करती है ।
  • Kuchh Lekh Kuchh Bhaashan
    Atal Bihari Vajpayee
    400 360

    Item Code: #KGP-703

    Availability: In stock

    कुछ लेख, कुछ भाषण
    समूचा भारत हमारी निष्ठाओं का केंद्र और हमारा कार्यक्षेत्र है। भारत की जनता हमारा आराध्य है। हमें अपनी स्वाधीनता को अमर बनाना है, राष्ट्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखना है और विश्व में स्वाभिमान और सम्मान के साथ जीवित रहना है। इसके लिए हमें भारत को सुदृढ़, शक्तिशाली और समृद्ध राष्ट्र बनाना है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जो साधन आवश्यक होगा, हम अपनाएंगे, जो नीति उपयोगी होगी, उसका अवलंबन लेंगे, जो कार्यक्रम हितावह होगा, उसका निर्धारण तथा कार्यान्वयन करेंगे।
    कंधे से कंधा लगाकर, कदम से कदम मिलाकर हमें अपनी जययात्रा को ध्येय-सिद्धि के शिखर तक ले जाना है। भावी भारत हमारे प्रयत्नों और परिश्रम पर निर्भर करता है। हम अपना कर्तव्य पालन करें, हमारी सफलता सुनिश्चित हैं।
    -इसी पुस्तक से
  • Vigyan Navneet
    Dr. Ramesh Dutt Sharma
    290 261

    Item Code: #KGP-563

    Availability: In stock

    विज्ञान नवनीत
    लगभग आधी सदी पहले डा. रमेश दत्त शर्मा ने विज्ञान संबंधी विषयों पर लिखना शुरू किया था और जल्द ही वे विज्ञान से जुड़े हर महत्त्वपूर्ण विषय पर लिखने लगे। अब तक हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में हजार से अधिक श्रेष्ठ रचनाएं उनकी छप चुकी हैं, लेकिन रचनाओं के छपने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उन रचनाओं का पढ़ा जाना है। विज्ञान को अकसर नीरस विषय कहा जाता है, लेकिन डा. रमेश दत्त शर्मा का लेखन किसी भी दृष्टि से नीरस नहीं कहा जा सकता। छात्रा भले ही वे विज्ञान के थे, पर साहित्य से हमेशा जुड़े रहे। स्वभाव से कवि तो थे ही, इसलिए उनके लेखन में एक ऐसी रंजकता है, जिसमें पाठकों को भीतर तक छूने और उनका मन जीत लेने की अद्भुत विशेषता रही है। गंभीर वैज्ञानिक विषयों को रोचक कहानी की तरह परोसना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन रमेश जी ने यह काम प्रस्तुत पुस्तक में बड़ी आसानी से किया है। 
    ‘विज्ञान नवनीत’ ढंगदार लेखों का संकलन है, जो देश की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे। यह संयोग भी है कि पुस्तक के बहुत से लेख ‘नवनीत’ में छपे थे। अपनी इस पुस्तक के शीर्षक के साथ लेखक ने लिखा है—‘विज्ञान को मथकर निकाली गई लुभावनी लोनी। बड़ी स्वादिष्ट होती है लोनी। देर तक जीभ पर स्वाद बना रहता है। ऐसा ही स्वाद इन लेखों का भी है।’ 
    प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेखों से यह बात सहज ही समझ आ जाती है कि लेखक सिर्फ लिखना ही नहीं चाहता, कुछ सार्थक रचना चाहता है। सार्थकता की गंध इस पुस्तक के हर पन्ने पर अनुभव की जा सकती है। 
    —विश्वनाथ सचदेव
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria (Paperback)
    Madhu Kankria
    180

    Item Code: #KGP-414

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मधु कांकरिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Snehbandh Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    130

    Item Code: #KGP-7038

    Availability: In stock

    वरिष्ठ रचनाकार मालती जोशी असंख्य पाठकों की प्रिय कहानीकार हैं। आज जब अनेक तर्क देकर यह कहा जा रहा है कि साहित्य के पाठक सिमटते जा रहे हैं तब पाठकों को मालती जोशी की हृदयस्पर्शी कहानियों की प्रतीक्षा रहती है। ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ में उनकी ऐसी ही रचनाएं हैं। उनकी लोकप्रिय रचनाशीलता का रहस्य लेखन की सहजता में छिपा है। कथानक का चयन, भाषा, पात्रों का अंतरद्वंद्व और अभिव्यक्ति प्रणाली—सबमें एक सहजता अनुभव की जा सकती है। मालती जोशी छोटी-छोटी घटनाओं या अनुभूतियों से रचना का निर्माण करती हैं। उनका ध्यान व्यक्ति और समाज की मानसिकता पर रहता है। बाहरी हलचल से अधिक वे मन की सक्रियता अंकित करती हैं। उनकी कहानियों के पात्र भावुक, विचारशील, निर्णय संपन्न और व्यावहारिक होते हैं। आदर्श के मार्ग पर चलते हुए वे कोरी भावुकता में नहीं जीते। एक अजब पारिवारिकता उनकी रचनाओं में महकती रहती है। संवाद मालती जोशी की पहचान हैं। छोटे-छोटे वाक्य, संकेतों से भरे शब्द औरसंवेदना की अपार ध्वनियां—इन गुणों से भरे संवाद पाठक के मन में उतर जाते हैं। किस्सागोई और विवरणशीलता का बहुत अच्छा उपयोग इन कहानियों में मिलता है। परिस्थिति और संयोग के माध्यम से प्रसंगों को गति मिलती है।
    इस संग्रह की सारी कहानियां स्त्री-मन की गहराई व सच्चाई को पूरी विश्वसनीयता के साथ व्यक्त करती हैं। यहां प्रचलित विमर्श नहीं, जीवन की समझ से उत्पन्न विवेक है। निश्चित रूप से ‘स्नेहबंध तथा अन्य कहानियां’ की सभी कहानियां पाठकों की प्रशंसा प्राप्त करेंगी।
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Kedar Nath Singh
    Kedarnath Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-2027

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : केदारनाथ सिंह
    कवि केदारनाथ सिंह के साक्षात्कारों की यह किताब कविता के ज़रिए समकालीन जीवन में झाँकने की एक कोशिश है । इनसे गुज़रना अपने समय की बदलती हुई सौंदर्य-चेतना के खुले-अधखुले गलियारों से गुज़रना है । विगत पच्चीस वर्षों के लंबे अंतराल में लिए गए ये इंटरव्यू कवि की विकास-यात्रा को समझने की कुंजी भी देते हैं और उन मोड़ों-घुमावों की प्रामाणिक जानकारी भी, जिनसे होकर उसकी सृजन-यात्रा अविराम चलती रही है । यह एक रचनाकार की विश्व-दुष्टि के बनने और आकार ग्रहण करने की लंबी प्रक्रिया का दस्तावेज़ है-एक ऐसा कच्चा माल, जिसमें समकालीन कविता के इतिहास के रंग-रेशे तलाशे जा सकते हैं ।
    कवि केदारनाथ सिंह की कविताएँ समय के साथ संवाद करती हुई कविताएं हैं। यही वजह है कि उनकी कविताओं में एक तरह की प्रश्नाकुलता दिखाई देती है। ऐसी प्रश्नाकुलता, जो कहीं गहरे पैठकर पाठक को बेचैन करती है। यह देखना भी एक दिलचस्प अनुभव होगा कि अपनी कविताओं में निरंतर प्रश्न उपस्थित करने वाला कवि स्वयं प्रश्नों का सामना कैसे करता है ।
    समकालीन सर्जन-परिवेश में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए एक संग्रहणीय दस्तावेज़ है यह किताब ।
  • Us Raat Ki Baat
    Amrendra Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9062

    Availability: In stock


  • Sarak Durghatnon Se Kaise Bachen
    E.W. Saxbi
    40

    Item Code: #KGP-920

    Availability: In stock


  • Yada-Kada
    Ramesh Chandra Diwedi
    195 176

    Item Code: #KGP-638

    Availability: In stock

    यदा-कदा
    धर्म, परंपरा और सामाजिक मूल्य-बोधों का मिश्रण पुस्तक की विशेषता है। समाज में बढ़ती संवेदनहीनता और मानवीय मूल्यों के क्षरण की ओर ध्यान आकृष्ट करके लेखक ने अपने दायित्व का निर्वहन किया है। रोचक शैली में लिखी पुस्तक सामान्य पाठक और विद्वत्त समाज दोनों के लिए पठनीय है।                
    -अशोक कुमार नायक (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    एक सहृदय लेखक की संवेदनशीलता, एक सैनिक का अगाध देशाभिमान और भ्रमणशील परिव्राजक के अनुभवों की समधुर अनुगूँज है-‘यदा-कदा’ (निमेष जी की डायरी)। आशा है, पुस्तक विद्वानों और सामान्य वर्ग के पाठकों में समुचित समादृत होगी।
    -प्रो० गिरजाप्रसाद दुबे (म० गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी  )

    सरल और स्पष्ट भाषा में पुस्तक की प्रस्तुति वास्तविकता का सुखद अनुभव है। मनुष्य की प्रकृति की विभिन्नताएँ इस रचना से रूबरू कराने में सफल हैं। शहरी और ग्रामीण जीवन का तुलनात्मक अध्ययन सुंदर है। हमारे पूर्वजों, संतों, धर्मात्माओं द्वारा प्रदत्त शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और भौतिकवादी समाज को आईना दिखाती हैं। विद्वान् लेखक से हम ऐसी ही और रचनाओं की प्रस्तुति की कामना 
    करते हैं। 
    -प्रो० पी० डी० सहारे, डॉ० गीता सहारे (दिल्ली विश्वविद्यालय)

    डायरी-लेखन की विधा पं० रमेशचन्द्र द्विवेदी (स्वामी श्रद्धानंद) द्वारा हिंदी साहित्य हेतु एक नूतन श्लाघनीय प्रयास है। यायावरी एवं जीवन के गूढ़ तत्त्वों की मीमांसा सहसा सांकृत्यायन जी की स्मृतियों को जीवंत कर देती है। सुधी जन निश्चित रूप से यदा-कदा इस ‘यदा-कदा’ का पारायण करके अपने व्यक्तित्व और राष्ट्र-निर्माण में योगदान देंगे। लेखक निश्चयतः साधुवाद के पात्र हैं। मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।
    -राकेशकुमार सिंह (वरिष्ठ आचार्य, (अंग्रेजी) इलाहाबाद वि० वि०)
  • Idhar Ki Hindi Kavita
    Ajit Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9130

    Availability: In stock

    ‘कविता का जीवित संसार’ (1972) के बाद ‘इधर की हिंदी कविता’ (1999) अजित कुमार के लेखों का दूसरा संग्रह है। कविता की अपनी व्याख्या को उन्होंने पहले संग्रह में ‘स्नेहमयी व्याख्या’ नाम दिया था, जिसका मतलब कुछ लोगों ने यह निकाला कि कविता उनके लिए एक घरेलू मामला है।
    अब यदि वे ‘इधर की हिंदी कविता’ प्रकाशित कर रहे हैं तो पहला प्रश्न यही उठेगा कि ‘इधर’ की व्याप्ति किधर तक है? इसका एक उत्तर यह होगा कि ‘इधर’ वहां तक है, जहां से ‘उधर’ शुरू होता है। उत्तर और भी हो सकते हैं, वैसे ही जैसे कि प्रश्न अनेक होंगे।
    उनमें से किन्हीं को समझने और अपने तईं सुलझाने की कोशिश इन लेखों में हुई है। संभव है, वह आधी-अधूरी कोशिश हो, जिसका कुछ कारण इस स्थिति में देखा जा सकता है कि अजित कुमार अपने को समीक्षकों के बीच कवि और कवियों के बीच समीक्षक पाते रहे हैं। संभव तो यह भी है कि इसी नाते उन्हें निराला प्रिय हों, जिनका खयाल था-
    ‘बाहर मैं कर दिया गया हूं।
    भीतर, पर, भी दिया गया हूं।’
    कौन जाने, अपठनीयता की मारा-मारी में पठनीयता का यह हस्तक्षेप दमघोंटू माहौल में ताजी हवा के एक झोंके-सा मालूम हो।
  • Antariksh Itihas Ki Vishal Pariyojana
    Praduman Singh
    240 216

    Item Code: #KGP-721

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Italy (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-1141

    Availability: In stock

    What is an anthology, if aot an amalgamation of words?
    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from lands that are as enigmatic as they are intriguing. Italian folktales are world famous for theirstory-telling flow—natural, simple and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, out beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.
    With stories like Lionbruno and Aurelia, Jatagim—Chief of Robbers, Great Mathilda, Love cannot be Replaced, The Evil-Hearted Right-Hand Squire, The Wizard of Lagotorbido, Romolo and Remolo, this book is a compilation of 20 famous Italian folktales. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.
    Time to indulge in some old-world charm all the way from Italy.
  • Aahang (Paperback)
    Majaz Lakhanawi
    150

    Item Code: #KGP-253

    Availability: In stock

    फैज़, जज़्बी, अली सरदार जापफरी और मख़दूम मुहीउद्दीन जैसे जाने-माने शायरों में मजाज़ की गिनती की जाती है। साज़ो जाम का आशिव़फ मजाज़ इनकिलाब और शमशीर ज़नी की बातें भी करता है। मजाज़ के कलाम में न तो मौलवी के नतक की कड़क है, न बाग़ी के दिल की आग बल्कि इसके बरख़िलाफ नग़मा सुख़नी की वह अधिकता है जो सुनने वाले को उस दुनिया में ले जाता है जहां शबाब व जमाल की रंगीनियां हैं।
    मजाज़ सिर्फ शराब और शबनम की बातें ही नहीं करता वह आज के दौर की ज़रूरतों को पूरा करता हुआ इनकिलाबी नौजवान भी बन जाता है जिसके सामने रहबरी और सुल्तानी मजबूर और बेकस नज़र आती है। मजाज़ वह शायर है जो सिर्फ इनकिलाब की बात ही नहीं करता, वह इनकिलाब के तराने भी गाता है।
    मजाज़ ने नौजवानों के दिलों की धड़कन की आवाज़ को सुना भी और उस आवाज़ को अपने सीने में सिमोया और उसके हसीन अल्फाज़ के पैकर में ढाला और पिफर शायरी के आहंग में रचाकर यूँ पेश कर दिया कि नौजवानों के दिलों के तार झनझना उठे और वह इसकी लय पर अपने जज़्बात की परवरिश करने लगे।
  • Sine Sitaron Ke Anchhuye Prasang
    Sheela Jhunjhunwala
    200 180

    Item Code: #KGP-69

    Availability: In stock


  • Who Shares Your Grief (Reminiscence)
    Raj Budhiraja
    215 194

    Item Code: #KGP-152

    Availability: In stock

    WHO SHARES YOUR GRIEF
    How can a younger or elder member of house say that nothing belongs to him/her, rather everything belongs to him/her. The house, decoration of house, comfortable things, car, servants, job respect, honour etc. all belong to him/her only. Without getting more than that it cannot be said that ‘it is me.‘ Here none is king of Dvaraka who longs for the raw rice of Sudama. Here Sudama is busy in collecting his raw rice and Krishna is engaged in securing his throne. We are engaged in making our presence realized. In such a crowded situation what is the use of ‘ it is not mine.’ By experiencing the pleasure of possession over everything how one can say that nothing belongs to her or him. Gone are the days when rivers used to flow for others and trees used to bear fruits for others. Now everything is for self. To gain, put others down as much as you can -— whether physically, mentally or monetarilyi
  • Bimla
    Jagnnath Prabhakar
    75 68

    Item Code: #KGP-2023

    Availability: In stock

    राजा समरसिंह को उनके दीवान सतीशचन्द्र ने अपने एक विश्वस्त नौकर के उकसाने पर मरवा डाला । उनकी रानी ने उसके विरुद्ध अति भयंकर व्रत धारण किया । वह व्रत क्या था ? इन्द्रनाथ को महाश्वेता की बेटी सरला से प्रेम हो गया, पर ब्याह महाश्वेता का व्रत पूरा हुए बिना नहीं हो सकता था । इस व्रत को पूरा करने के लिये इन्द्रनाथ घर से चल पडा । महेश्वर मन्दिर में एक अद्वितीय सुन्दरी उस पर मोहित हो गयी । सुन्दरी ने अपना नाम भिखारिन बताया ।  उसने एक भिक्षा इन्द्रनाथ से सतीशचन्द्र का वध न करने की माँग ली और सतीशचन्द्र के नौकर को हत्यारा बताया । इन्द्रनाथ मुंगेर पहुँच कर राजा टोडरमल की सेना में भरती हो गया । संध्या समय वह गंगा-तट पर शत्रुओं से लड़ता हुआ बेहोश हो कर गंगा से गिर पड़ा । एक युवक! अपनी नाव से कूदा, उसे उठाकर अपनी नाव में डाल लिया । होश आने पर उसने देखा, इस युवक के भेस में वही भिखारिन थी । उधर दीवान के उसी शबित-सम्पन्न नौकर ने महाश्वेता को सरला सहित चतुर्वेष्ठित दुर्ग में कैद कर लिया था । भिखारिन उन्हें काल कोठरी से निकालकर अपने मकान में ले आयी । इधर टोडरमल ने पठानों के दुर्ग पर हमला किया । गुड़सवार नायक इन्द्रनाथ लड़ाई में घायल व बेहोश होकर गिर पडा । शात्रुओं ने उसे उठा कर दुर्ग में कैद कर लिया । भिखारिन ने वहाँ पहुँच कर उसे दुर्ग से कैसे बाहर भेज दिया और स्वय इन्द्रनाथ बन कर कैद हो गयी ? भेद खुलने पर भिखारिन को मृत्यु दण्ड देने के लिये वृक्ष के साथ बांध दिया गया । परन्तु इन्द्रनाथ ने किस प्रकार उसे बचा लिया ? इतने में दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली गयी ।  इसके बाद सतीशचन्द्र के उसी नौकर ने उन्हें मार डाला । विजेता इन्द्रनाथ अपने वचन के अनुसार निश्चित दिन सरला के पास पहुँच गया ।
    राजा टोडरमल की सभा लगी थी । सतीशचन्द्र का हत्यारा कैदी के रूप में राजा के सामने पेश किया गया । उसे मृत्यु दण्ड सुनाया गया । कैदी ने कहा, "मैं ब्राह्मण हूँ । ब्राह्यण को मृत्यु दण्ड देना शास्त्र-विरुद्ध है । धार्मिक टोडरमल सोच में पड़ गये । इतने में एक निहत्थी महिला तेजी से सभा मण्डल में घुसी और छुरी से सतीशचन्द्र के हत्यारे कैदी की हत्या कर डाली । वह महिला कौन थी और उसने छुरी कैसे प्राप्त कर ली ?
    अपने ब्याह के निश्चित दिन इन्द्रनाथ भिखारिन के पास गया और कहा, "भिखारिन । तुमने मुझे चार बार मौत से बचाया, जिसका बदला मैं चुका नहीं सकता । मेरी प्रार्थना है, तुम मेरे पास पटरानी की तरह रहो । सरला तुम्हारी सेवा करेगी ।" इस प्रकार जाने क्या-क्या स्नेह-भरी बाते कह रहा था, परन्तु वास्तव में भिखारिन वहाँ नहीं थी, था उस का प्राणहीन पार्थिव शरीर । वह इन्द्रनाथ के प्रति शाश्वत प्रेम रखती थी, उसी प्रेम की ज्वाला में वह आत्म- बलिदान कर चुकी थी । हाँ तो यह भिखारिन वास्तव में थी कौन?
    उपर्युक्त समस्त रहस्यमय प्रश्नों के उत्तर विविध रोमांचकारी विवरणों सहित यह पुस्तक प्रस्तुत कर रही है ।
  • Sampurna Baal Kavitayen : Sherjung Garg
    Sher Jung Garg
    300 270

    Item Code: #KGP-469

    Availability: In stock

    हिंदी में सबसे चटख, चुटीली और नटखटपन से भरपूर बाल कविताएँ लिखने वाले डॉ. शेरजंग गर्ग उन उस्ताद बाल कवियों में से हैं, जो उचित ही आज बाल कविता के पर्याय बन चुके हैं। समूची हिंदी बाल कविता के ग्राफ को बदलकर उसके मिजाज में बड़ी तबदीली लाने वाले बाल कवियों की छोटी से छोटी सूची बनाएँ, तो भी उसमें डॉ. शेरजंग गर्ग का नाम जरूर होगा। वे हिंदी बाल कविता में पहली बार वह नटखटपन, चुस्ती और शरारती अंदाज लेकर आए, जिसने हजारों बाल पाठकों को रिझा लिया। उनके ‘गाय’, ‘दादी अम्माँ’, ‘गुड़िया’, ‘ईंट’, ‘चिड़िया’, ‘पवनचक्की’, ‘चूहा-बिल्ली’, ‘उल्लू मियाँ’ और ‘टीचर गुड़िया’ सरीखे खिलंदड़े और चुस्त-दुरुस्त शिशुगीत इस कदर चर्चित हुए कि बच्चों के साथ-साथ बड़े भी उनकी नटखटपन से भरी कोमल भावनाओं के साथ बहे और उनके जरिए फिर से अपने बचपन को जिया। खासकर गाय पर भी ऐसा नटखटपन से भरपूर शिशुगीत लिखा जा सकता है, यह डॉ. शेरजंग गर्ग को पढ़ने के बाद ही समझ में आ सकता है। 
    हिंदी में डॉ. गर्ग के अलबेले शिशुगीतों ने ही पहले-पहल यह करिश्मा किया कि वे बदलते समय और बच्चे के मन, सपने और इच्छाओं से जुड़े और वे हर बच्चे के होंठों पर थिरकते नजर आए। और यही बात उनकी गूँजदार लय वाली अपेक्षाकृत लंबी बाल कविताओं के बारे में कही जा सकती है। ‘खिड़की’, ‘नए साल का गीत’, ‘शरारत का मौसम’, ‘यदि पेड़ों पर उगते पैसे’ तथा ‘तीनों बंदर महाधुरंधर’ डॉ. गर्ग की बिलकुल नए शिल्प में ढली अद्भुत कविताएँ हैं, जिनका कोई जोड़ नहीं है। उनके यहाँ बात कहने का जो उस्तादाना अंदाज और सफाई है, वह देखते ही बनती है। 
    सच तो यह है कि हिंदी में भी विश्वस्तरीय बाल साहित्य मौजूद है, यह डॉ. गर्ग की कविताओं से गुजरते हुए ही पहले-पहल समझ में आता है, और यह भी कि हिंदी में मानक शिशुगीत और बाल कविताएँ कौन सी हैं, जिन्हें सामने रखकर बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। 
    डॉ. शेरजंग गर्ग की बेहद तराशी हुई बाल कविताओं की जादुई लय ही नहीं, उनकी कविताओं में हास्य और व्यंग्य की मीठी गुदगुदी भी बाल पाठकों को रिझाती है और वे एक बार पढ़ने के बाद, कभी उन्हें भूल नहीं पाते। उनके गीतों में जैसी पूर्णता है, वैसी कम-बहुत कम नजर आती है। इस लिहाज से वे अपनी नजीर खुद हैं और उन थोड़े से बाल कवियों में से हैं जिनका कविता पर उनका नाम न हो, तो भी आप यकीनन कह सकते हैं कि यह कविता इन्हीं की है।
    डॉ. गर्ग की कविताओं का यह जादुई असर ही है कि एक पूरी पीढ़ी उन्हें गाते-गुनगुनाते हुए बड़ी हुई, तो उनके बच्चे---यानी अगली पीढ़ी भी उनकी जादुई कविताओं की उसी तरह मुरीद है। देश के किसी भी हिस्से में हम जाएँ, डॉ. शेरजंग गर्ग की कविताएँ सबसे ज्यादा बच्चों के होंठों पर नाचती नजर आती हैं। बच्चों के वे सर्वाधिक चहेते और दोस्त कवि हैं।
    डॉ. शेरजंग गर्ग सिर्फ एक बालकवि नहीं, वे बाल कविता का इतिहास रचने वाले दिग्गजों में से हैं। लिहाजा उनकी समूची बाल कविताएँ एक जिल्द में सामने आएँ, यह बरसों से बच्चों की ही नहीं, बाल साहित्य के गंभीर अध्येताओं और शोधार्थियों की भी इच्छा थी। इस पुस्तक के जरिए यह सपना पूरा हो रहा है, यह बाल साहित्य के लिए एक यादगार और ऐतिहासिक घटना से कम नहीं है। आशा है, बच्चे और बाल साहित्यकार ही नहीं, हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक और सहृदय पाठक भी बाल कविता की शिखर उपलब्धियों और कलात्मक लाघव से पूर्ण इस संचयन को बड़ी रुचि से पढ़ेंगे और खूब सराहेंगे।
  • Ek Kiran : Sau Jhaniyan
    Acharya Janki Vallabh Shastri
    195 176

    Item Code: #KGP-676

    Availability: In stock


  • Aalaap-Vilaap
    Rajendra Laharia
    150 135

    Item Code: #KGP-298

    Availability: In stock

    आलाप-विलाप
    कथाकार राजेन्द्र लहरिया के उपन्यास अपने समय से मुठभेड़ करते कथ्य के साथ ही मर्म को छुने वाले होते हैं और उनका शिल्प भी नव्यता से भरा और पाठकीय जिज्ञासा को उकसाने वाला होता है । वे अपने उपन्यासों को 'कहानी' की तरह साधते हैं, जहाँ कुछ भी फालतू होने  (लिखने) की गुंजाइश नहीं होती । 'आलाप-विलाप' भी इसका अपवाद नहीं है । बकौल लेखक, 'सकेतों की 'भाषा मनुष्य हमेशा से समझता आया है । कोई कहानी या उपन्यास लिखते वक्त मेरा ध्यान इस बात पर हमेशा बना रहता है कि मेरा काम यदि एक शब्द लिखने से चलता है तो अनावश्यक दस शब्द क्यों लिखूं! शब्दों की फिजूलख़र्ची तो कई तरह के नुकसान करती है... 
    'आलाप-विलाप' के बारे में एक सुधी पाठक की राय द्रष्टव्य है : 'कथाकार राजेन्द्र लहरिया का लपन्यास 'आलाप-विलाप' मार्मिकता से भरा व मूलत: राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छदमों को उदूघाटित करता है। जीवन की भयावह स्थितियों इस उपन्यास को जीवंत कथ्य देती है । छोटे-छोटे उपकथानकों में परिवेश की  पीड़ाओं के झकझोरने वाले वर्णन इसके प्रभाव को सघन करते हैं। हमारे समय की एक प्रमुख समस्या नक्सलवाद के उभार और उसकी वजहों को भी इस उपन्यास में देखा-पहचाना और समझा जा सकता है । प्रशासनिक और सांस्कृतिक-साहित्यिक छदमों और पाखंडों की लीलाएँ गरीब, कमजोर और संवेदनशील व्यक्तियों तथा तबकों को क्या-क्या नचाती हैं, इसका-दिलचस्प और बेधक दिग्दर्शन इस उपन्यास में है। और खास बात यह है कि  अँधेरे समय और स्याह चरित्रों के बीच भी उम्मीद की  कौंध से भरे कुछ ऐसे उजले चरित्र यह उपन्यास हमें देता  है, जो लड़ाई को बेहद कठिन समझते हुए भी अविचल  रूप से संघर्ष करते है, और इसलिए उनकी हार भी हमें  निराशावाद की ओर नहीं ले जाती । वह इस छोटे से उपन्यास  की बड़ी खुबी है... 
    कहा जा सकता है कि 'आलाप-विलाप' आकार से लघु, मगर सरोकार में बडा उपन्यास है ।
  • Khoyi Huyi Dishaayen
    Kamleshwar
    120 108

    Item Code: #KGP-9060

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee (Paperback)
    Ashok Vajpayee
    90

    Item Code: #KGP-1432

    Availability: In stock


  • Jama Poonji
    Dronvir Kohli
    160 144

    Item Code: #KGP-1830

    Availability: In stock

    जसा-पूँजी
    हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली के इस-प्रथम एवं एकमात्र कहानी-संग्रह 'जमा-पूँजी' की कहानियों को पढ़ते हुए लेखक की कथा-वर्णनात्मकता, भाषा-अनुशासन, संयम तथा इनमें पिरोई गई मार्मिक अनुभूतियों से सहज ही प्रभावित हुआ जा सकता है । अपने सामान्य मगर ठोस कथानकों के चलते पाठक इनकी प्रथम पंक्ति से ही बंध एवं बिंध जाता है तथा लेखक धीरे-धीरे कथा की परवरिश करते हुए उसे ऐसा विश्वसनीय बना देता है मानो यह अपने पाठक से एकमेक होकर विचार-विनिमय का रहा हो। पठनीयता को ऐंठकर, रोचक बनाने की चाह या पाठक को कथा के माध्यम से 'पट्टी पढाने' की अपेक्षा इस लेखक में नहीं पाई जाती है ।
    यद्यपि विभिन्न परिवेशों, पात्रों एवं परिस्थितियों के रंगों से कहानी की तस्वीर उकेरना इस कथाकार को आता है तथापि उनके अधिकांश पात्र उस वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते है जो अपनी अत्यंत सीमित दुनिया में अभावों-तले बिजबिजा रहे हैं, जहाँ दाना-पानी का जुगाड़ किसी मन्नत मांगने से कम नहीं, और जहाँ आर्थिक विषमताएं-विपदाएँ रक्त-संबंधों को भी प्रदूषित कर देती है । शोक, हास-विनोद और विषाद की अनबोली स्थितियों को ज़बान देना भी इस कहानीकार को खूब आता है ।
    विगत कुछ दशकों में ज़ब-तब लिखी गई ये कहानियों हमें निम्न-मध्यवर्गिय समाज के जिजीविषारत उस समय में भी ले जाती हैं जब अँगीठियों का धुआँ हमारे महानगरीय जीवन की कड़वाहट को तिक्त कर देता था और चिंताएँ अठन्नी-चवन्नी की हुआ करती थीं । इस प्रकार ये कहानियाँ अपने समय का कोरस हैं तथा हमारे विगत का स्वाभाविक सामाजिक चित्रण भी ।
    अपने समय, समाज और मनुष्य की संपूर्ण संघर्षमयी  जिजीविषा से सन्नद्ध ये कहानियाँ हमारा अपना भूत, वर्तमान और निश्चित ही भावी भी है । हिंदी कहानी की परिपाटी को जानने का अवसर भी इन कहानियों से मौजूद है ।
  • Katha Ek Naami Gharaane Ki
    Hridyesh
    200 180

    Item Code: #KGP-769

    Availability: In stock

    हृदयेश की कहानियां जिंदगी से, खासकर उस जिंदगी से, जिसमें मुक्तिबोध के मुहावरे के अनुसार आदमी जमीन में धंसकर भी जीने की कोशिश करता है, पैदा हुई हैं। कुछ लेखक सीधे जमीन फोड़कर निकलते हैं। उसी में अपनी जड़ों का विस्तार करते हैं और नम्र भाव से अपने रेशे-रेशे से उस जमीन से ही अपनी शक्ति खाद-पानी लेकर बढ़ते हैं और अपने तथा जमीन के बीच आसमान को नहीं आने देते हैं। वे इस सत्य को बखूबी समझते हैं कि आसमान जितना भी ऊंचा हो, उस पर किसी के पांव नहीं टिकते। औंध लटका हुआ बिरवा तो किसी को छाया तक नहीं दे सकता। हृदयेश् कलम से लिखते हैं तो भी लगता है जैसे कोई जमीन पर धूल बिछाकर उसपर अपनी उंगली घुमाता हुआ कोई तस्वीर बना रहा है। उनकी उंगलियों के स्पर्श में ही कुछ होगा कि आंघियां तक वहां आकर विराम करने लगती हैं और उनकी लिखत, जिसने भाड लेख होने तक का भ्रम नहीं पाला था, शिलालेख बनने के करीब आ जाती है।
    हृदयेश ने बीच-बीच में आने वाले तमाम साहित्यिक आंदोलनों व फैशनों को गुजर जाने दिया बिना अपने लेखकीय तेवर या प्रकृति में बदलाव लाए हुए। वह चुनाव पूर्वक अपनी जमीन पर टिके रहे–न दैन्यं न पलायनम्। वह एक साथ कई परंपराओं से जुड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक रचनाकार अपने वरिष्ठों, समवयस्कों, यहां तक कि अल्पवयस्कों की कृतियों के प्रभाव को अपनी अनवधनता में सोख लेता है, जैसे पौधें की जड़ें खाद के रस को सोख लेती हैं।
  • Uski Bhee Suno
    Bharti Gore
    320 288

    Item Code: #KGP-471

    Availability: In stock

    ‘उसकी भी सुनो’ पुस्तक की कहानियां सामाजिक रूढ़ियों, पुरुष-प्रधान व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं। इसमें समाज के सभी तबकों की स्त्रिायों की समस्याओं का गंभीर विवेचन है। सफेदपोश समाज में जीती स्त्री, बाहर से अमीर और सुखासीन लगने वाली स्त्री की अस्तित्वहीन स्थिति के साथ-साथ दलित और आदिवासी स्त्री के सदैव उपेक्षित अस्तित्व की चर्चा है। इन कहानियों की नायिकाओं की विशेषता यह है कि वे कभी हार नहीं मानतीं।
    प्रस्तुत पुस्तक की हर कहानी अपने आप में समाज में महिलाओं के प्रति घटने वाली हर घटना को या कहिए हर आयाम को बड़े ही सटीक अंदाज में पेश करती है। साहित्य ने हमेशा से हर आंदोलन को प्रभावित किया है और जन आंदोलनों ने भी हमेशा साहित्य को प्रभावित किया है। चाहे वह आजादी का आंदोलन हो या आजादी के बाद के आंदोलन, साहित्य ने कहानी, कविताओं, गीतों के जरिए हमेशा आम जनता के आंदोलनों को एक बेहतर आवाज दी है। साहित्य के बिना समाज अधूरा है। और अगर साहित्य महिलाओं द्वारा रचा जाए तो उसकी बात ही निराली है।
    धार्मिक उन्माद का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं ही होती हैं। दलित, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक महिलाओं के ऊपर तो इनकी दोहरी मार पड़ती है। नारी-मुक्ति की इस मुहिम को समाज के अन्य हिस्सों को साथ लेकर एक नए बदलाव की तरफ बढ़ना होगा। समाज के बदलाव में साहित्य इसी कड़ी में महिलाओं के लिए एक सशक्त रास्ता है।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • The Hanuman Factor (Self-Help)
    Anand Krishna
    345 311

    Item Code: #KGP-593

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
  • Gyarah Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    300 270

    Item Code: #KGP-9322

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्व साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखने वाले कालजयी रचनाकार हैं। अभिव्यक्ति की अनेक विधओं में उन्होंने नवीन प्रस्थान निर्मित किए। भाषा, शैली, विचार और दर्शन को मानवता के विराट प्रांगण में अभिमंत्रित आमंत्रित किया। प्रस्तुत पुस्तक ग्यारह लघु नाटक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की अपूर्व प्रतिभा का प्रकाश एक नए शिल्प में देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध नाट्य लेखक और रंगमनीषी प्रताप सहगल ने ठाकुर की ग्यारह कहानियों को चुनकर उन्हें नाट्य रूप प्रदान किया है। उनके शब्दों में, ‘‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियों में 1940 से पहले के बंगाल का जीवन धडकता है। ...जब इन ग्यारह कहानियों को मैंने चुना तो स्पष्ट रूप से यह बात मन में काम कर रही थी कि मैं इन्हें नाट्य रूप में ऐसे प्रस्तुत करूं कि इनका मूल भाव एवं मूल परिवेश क्षरित हुए बिना ये हमारे समय में भी प्रासंगिक बनी रहें।’’
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये सभी कहानियां बहुत प्रसिद्ध  हैं। कहना तो यह भी उचित होगा कि अनेक रचनाकारों ने इनके छाया-अर्थ से स्वयं को समृद्ध किया है। एक रात, काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, क्षुधित पाषाण और समाप्ति आदि कहानियों के नाट्य रूपांतर से पाठकों और रंगकर्मियों को कुछ सार्थक विकल्प मिलेंगे। प्रताप सहगल ने कहानियों में निहित नाट्य स्थितियों और रंग- संभावनाओं को समझते हुए रूपांतर को समृद्ध किया है।
    पाठकों के लिए तो इन रूपांतरित रचनाओं से गुज़रना एक विलक्षण अनुभव है ही, उन लोगों को भी आनंद की अनुभूति होगी जो मंचन के लिए सुरुचिपूर्ण नाट्यालेखों की खोज में रहते हैं। एक तरह से प्रताप सहगल ने सार्थक नाट्यालेखों की संख्या में वृद्धि की है। यह करते समय उन्होंने मूल संवेदना को अक्षत रखा है। ‘ग्यारह लघु नाटक’ एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Sikh Dharma Darshan Ke Mool Tattva
    Satayendra Pal Singh
    195 176

    Item Code: #KGP-305

    Availability: In stock

    सिख धर्म दर्शन के मूल तत्त्व
    सदियों से भ्रमित समाज को परमात्मा से मिलन का एक सरल और सहज मार्ग दिखाकर सिख गुरु साहिबान ने धर्म की एक अभिनव दृष्टि प्रदान की। जीवन को विनम्रता, प्रेम, सेवा, समर्पण और संतुष्टि का पर्याय बनाने, परमात्मा के हुक्म के अधीन चलने का संदेश दिया। इससे समाज में अद्भुत चेतना जाग्रत हुई और शोषित, पीड़ित हृदयों में आशा का प्रकाश भर उठा। सिख गुरु साहिबान द्वारा बताया गया मार्ग जितना सरल है उतना ही कठिन भी है।
    उस मार्ग की सरलता और सहजता क्या है और कैसे साहस व समर्पण की आवश्यकता है, इसका उत्तर खोजने के लिए इस पुस्तक का आद्योपांत पठन अपरिहार्य है।
    सिख धर्म दर्शन पर हिंदी में मूल रूप से लिखी गई यह पहली पुस्तक है, जो धर्म के मर्म तक ले जाती है और उसे अपनाने हेतु प्रेरित करती है।
  • Virajbahu (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1246

    Availability: In stock


  • Samjhauton Ka Desh (Paperback)
    Alka Pathak
    30

    Item Code: #KGP-1538

    Availability: In stock


  • Asghar Wajahat Ke Aath Naatak
    Asghar Wajahat
    450 405

    Item Code: #KGP-9001

    Availability: In stock


  • Vishva-Vijeta Vivekanand
    Shanta Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-1869

    Availability: In stock

    विश्व-विजेता विवेकानंद
    आज जब कि देश के सामने आर्थिक व सुरक्षात्मक संकट के साथ सबसे बडा संकट राष्ट्रीय चरित्र का आ खड़ा  हुआ है, स्वामी विवेकानंद जी का जीवन, भावी भारत के निर्माता नवयुवकों के सामने एक ज्वलंत आदर्श उपस्थित का सकता है । देश की इस महत्त्वपूर्ण सामयिक आवश्यकता का अनुभव काके ही इस पुस्तक की रचना की गई है ।  स्वामी जी के गहन दार्शनिक विचारों व जीवन की गहरी अनुभूतियों का विश्लेषण करना इस पुस्तक का विषय नहीं है । यह तो सरल भाषा एवं सुलभ शैली में स्वामी जी के देशभक्त हृदय का एक चित्र मात्र है । छोटे-छोटे अध्यायों में उनके जीवन को इस प्रकार विदित करने का प्रयत्न किया गया है ताकि देश का युवा वर्ग और विशेषकर छात्र समाज उनके महान् जीवन को झलक प्राप्त कर सके ।
  • Hindi Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    80

    Item Code: #KGP-1334

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Mushkil Kaam
    Asghar Wajahat
    160 144

    Item Code: #KGP-1829

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Goswami Tulsidas
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-138

    Availability: In stock

    तुलसीदास विश्व-काव्य गगन के प्रभावान नक्षत्र हैं । उनका काव्य 'स्वान्त: सुखाय' रचा गया है किंतु उससे संपूर्ण समाज का हित होता है । राम की कीर्ति का गान तुलसी ने जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ किया है, उसका वर्णन अन्य किसी कवि ने नहीं किया है ।
    संस्कृत और ठेठ अवधी दोनों को मिलाकर तुलसी ने अपनी कृति 'रामचरितमानस' में अनूठा प्रयोग किया है । उनकी भाषा में लोकोक्तियों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। अब तक तुलसी के 'मानस' का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है ।
    भारतीय जनमानस के हृदय में राम के प्रति अपूर्व भक्ति और श्रद्घा उत्पन्न कर जनमानस के साथ तुलसी ने बहुत बडा उपकार किया है । उनकी यह कृति विश्व की अन्य काव्यकृतियों में सर्वोत्तम स्थान रखती है ।
    'रामचरितमानस' भारतीय जनता का कंठहार बना हुआ है। यह महाकाव्य विद्वानों और अल्पशिक्षितों को समान रूप से प्रिय है।
    यह ग्रंथ हमारी श्रद्धा और भक्ति का अनुपम प्रसाद है।

  • Manushkhor
    Ganga Prasad Vimal
    595 506

    Item Code: #KGP-405

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nasera Sharma
    Nasera Sharma
    200 180

    Item Code: #KGP-618

    Availability: In stock

    अपनी कहानियों में इंसानी पीड़ाओं के अहसास को जीवंत अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली लेखिका नासिरा शर्मा जीवन के विविध कार्य एवं अनुभव-क्षेत्रों से विषय अर्जित करके, रचाव की संपूर्ण प्रयोगनिपुणता के साथ रचना प्रस्तुत करती हैं । कथा-संसार की यह विविधता जहाँ उनके पाठकों के लिए उपहार-सम है यहीं आलोचकों-समीक्षकों के लिए एक चुनौती भी-कि ऐसे में उन्हें किस कद-पद का कहानीकार मान्य किया जाए ? विगत छवि की निर्मिति-भंजन का काम वे स्वयं अपनी प्रत्येक नई रचना में करती प्रतीत होती हैं तथा इस प्रकार पाठक की ताजा आश्वस्ति भी पाती हैं ।
    इन कहानियों में नासिरा शर्मा इंसानी देह-नेह की आदिम इच्छाओं की विचारणाओं के साथा-साथ राष्ट्र, इतिहास, धर्म और प्रकृति की अभिव्यक्ति के पर्यावरण से भी संबोधित हैं । जन की कथाओं की व्यापक परिधि पर जड़ित ये कहानियाँ संपूर्ण मानवीय प्रवृति की संस्कृति और उसकी रसभंगता को पाठकों के सामने रखती हैं। नवरसों को समान कूतित्व देती ये कहानियाँ कालांतर में हमारे मनो-मस्तिष्क से उड़ नहीं जाती, बल्कि यहीं अपनी स्मृति का स्थान निर्धारित कर लेती है ।
    नासिरा शर्मा द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'जोड़ा', 'बावली', 'कशीदाकारी', 'पाँचवाँ बेटा', 'दूसरा ताजमहल', 'आमोख़्ता', 'तीसरा मोर्चा', ‘मिस्टर ब्राउनी', 'अपनी कोख' तथा 'चार बहनें शीशमहल की' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखिका नासिरा शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे ।
  • Vartmaan Ki Dhool
    Govind Prasad
    250 225

    Item Code: #KGP-658

    Availability: In stock

    ‘वर्तमान की धूल’ गोबिन्द प्रसाद का तीसरा काव्य संग्रह है जो एक छोटे से अंतराल के बाद आ रहा है। इस संग्रह के पाठक सहज ही लक्ष्य करेंगे कि इस कवि का अपना एक अलग रंग है जो सबसे पहले उसकी भाषा की बनावट में दिखाई पड़ता है और बेशक अनुभवों के संसार में भी। मेरा ध्यान सबसे पहले जिस बात ने आकृष्ट किया वह यह है कि इस कवि ने हिंदी और उर्दू काव्य भाषा की बहुत सी दूरियाँ ध्वस्त कर दी हैं। और इस तरह एक नई काव्य-भाषा बनती हुई दिखती है। इसे गोबिन्द प्रसाद की एक काव्यगत सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। यह वह परंपरा है जिसकी शुरुआत कभी शमशेर ने की थी और गोबिन्द प्रसाद इसे आज की ज़रूरत के मुताबिक एक नए अंदाज़़ में आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं । पर केवल इतनी सी बात से इस संग्रह की विशेषता प्रकट नहीं होती। असल में यहाँ गोबिन्द प्रसाद एक गहरी घुलावट वाली रूमानियत के समानांतर एक विलक्षण राजनीतिक चेतना को भी बेबाक ढंग से व्यक्त कर सके हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है’ शीर्षक कविता जिसकी आरंभिक दो पंक्तियाँ हमारे समय की एक बहुत बड़ी राजनीतिक गुत्थी को खोलती जान पड़ती हैं-- 
    किस देश में कल क्या होगा
    अल्लाह नहीं अमेरिका जानता है।
    यह पूरी कविता इतने बेबाक ढंग से लिखी गई है कि अलग से हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। यह गोबिन्द प्रसाद के कवि से हमारा नया परिचय है जो इन्हें उनकी पिछली कृतियों से अलग करता है। एक और छोटी सी राजनीतिक कविता पर मेरा ध्यान गया जिसका शीर्षक है ‘क्रांति की जेबों में’। यह एक गहरी चोट करने वाली व्यंग्य की कविता है जो शाब्दिक क्रांति के आडंबर पर चोट करती है। इस दृष्टि से इस कविता का अध्ययन दिलचस्प हो सकता है। 
    इस संग्रह की कई छोटी कविताएँ आधुनिक प्रेम की विसंगतियों को खोलती दिखाई पड़ती हैं। कुल मिलाकर यह संग्रह अनुभव के विभिन्न आयामों से गुज़रता हुआ--जिसमें कुछ विदेशी पृष्ठभूमि के अनुभव भी शामिल हैं--एक भरी-पूरी दुनिया का फलक हमारे सामने रखता है। मैं आज की हिंदी कविता के एक पाठक के रूप में यह पूरे बलाघात के साथ कह सकता हूँ कि संग्रहों की भीड़ में गोबिन्द प्रसाद का यह नया काव्य प्रस्थान अलग से लक्षित किया जाएगा।
  • Parda Beparda
    Yogendra Dutt Sharma
    180 162

    Item Code: #KGP-1561

    Availability: In stock

    पर्दा-बेपर्दा
    कहाँ है सभ्यता ? किधर है प्रगति ? कैसा है विकास ? इतिहास की लंबी यात्रा करने के बाद भी हम मानसिक रूप से शायद अब भी वहीं के वहीं हैं जहाँ से शुरू हुई थी हमारी यात्रा। सच पूछें, तो हम आज भी किसी आदिम अवस्था में ही जी रहे हैं। क्या सभ्यता का कोई विकास-क्रम हमारी बर्बरता को मिटा पाया है ?
    विश्व-मंच पर ही नहीं, देशीय परिवेश में भी सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित होने का हमारा दंभ निरर्थक और खोखला ही सिद्ध होता है।
    योगेन्द्र दत्त शर्मा की ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे हम आज अनेक विपरीत धु्रवों पर एक साथ जी रहे हैं। कहना ज़रूरी है कि ‘पर्दा-बेपर्दा’ की ये कहानियाँ फैशनपरस्त कहानियों की दुनिया से अलग मानवीय संवेदनाओं को जगाने वाली ऐसी सार्थक रचनाएँ हैं जो लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगी।
  • Ye Galion Ke Bachche
    Rekha Rajvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9119

    Availability: In stock

    इस किताब में गलियों के बच्चों की कहानियां, कहानियां नहीं बल्कि एक कड़वा सच है । बेतरतीब बिखरे पन्नों को समेटकर इन बच्चों के जीवन की वास्तविकता को सबके समक्ष लेन का इसमें प्रयास किया गया है । छह अध्यायों के माध्यम से इन बच्चों की जीवनगाथा को सुधी पाठकजनों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है । 
    यह अध्याय गलियों के बच्चों की समस्याओं को उजागर करने के लिए किया गया छोटा-सा प्रयास है । 
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Main Vahan Hoon
    Ganga Prasad Vimal
    75 68

    Item Code: #KGP-1889

    Availability: In stock

    बस कुछ उमर का

    बस कुछ ठहर का
    सब
    ठीक हो जाएगा

    वर्षा के बाद
    धुलती सड़क की तरह

    किस्मत के खुलने पर
    न ताप रहेगा
    न संताप
    न भूख
    न हड़कम्प

    अखबार
    बड़े-बड़े शीर्षक और गुणी लोग
    तेज़ घोडों पर सवार
    अदृश्य हो जाते है हवा में

    और फिर आमरण
    चिंताओं की तरह
    चिपके रहते है स्मृति में

    बस कुछ ठहर कर ।
    -(इसी पुस्तक से)
  • Aadarsh Saamaanya Hindi (Paperback)
    Vijay Agarwal
    40

    Item Code: #KGP-7105

    Availability: In stock


  • Rangey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-151

    Availability: In stock

    रंगे ग़ज़ल
    यह एक अनूठा दस्तावेज है, जिसे एक प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।  इस संकलन की कुछ गज़लें जहां अपनी परम्पराओं के साथ नजर आयेंगी, वहीं कुछ ग़ज़लों का रूप रूढियों और परम्पराओं से हटकर जमाने के नयेपन को छूता नजर आयेगा ।
    इस संकलन में पुराने शाइरों की ग़ज़लों के साथ ही कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी सम्मिलित की गयी हैं, जो आज लोगों के दिलों में अपनी जगह बना रहे हैं तथा ग़ज़ल के प्रगतिवादी स्वरूप को नयी दिशा ध्यान कर रहे हैं । इन शाइरों में प्रमुख हैं-डा० बशीर 'बद्र', निदा फाजली, अख्तर शीरानी, ताहिर अली 'ताहिर', यूसुफ हसन, मुनीर नियाजी, मुजफ्फर हनफी, परवीन 'शाकिर', शोहरत बुखारी, शह्रयार, महकूर ‘खिजां', जिगर श्योपुरी, तस्नीम सिद्दीकी, अहमद 'कमाल', जफर 'इक्बाल', खालिद अहमद, जावेद शाहीँ, कतील शिफ़ाई, कर्रार 'नूरी', 'जोश' मलीहाबादी, साहिर होशियारपुरी, निश्तर खानकाही, मजीद अमजद, कुमार 'पाशी' और गुलशन मदान आदि ।
  • Sense And Sensibility (Novel)
    Jane Austen
    495 446

    Item Code: #KGP-362

    Availability: In stock

    Sense and Sensibility, published in 1811, was Jane Austen's first published novel, which she wrote under the pseudonym "A Lady".
    The story is about Elinor and Marianne, two daughters of Mr Dashwood by his second wife. They have a younger sister, Margaret, and an older half-brother named John. When their father dies, the family estate passes to John, and the Dashwood women are left in reduced circumstances. The novel follows the Dashwood sisters to their new home, a cottage on a distant relative's property, where they experience both romance and heartbreak. The contrast between the sisters' characters is eventually resolved as they each find love and lasting happiness. Through the events in the novel, Elinor and Marianne encounter the sense and sensibility of life and  love.
  • 1857 : Samar Gatha
    Sudrashan Kumar Chetan
    100 90

    Item Code: #KGP-9010

    Availability: In stock

    1857 समर गाथा
    विद्रोह सुधार माँगता है, क्रांति परिवर्तन।  सन् 1857 का जन-आंदोलन विद्रोह नहीँ था । वह तो गत सौ वर्षों (1757-1857) के विदेशी शासन के विरुद्ध जनता की शिकायतों का परिणति था । इस जनक्रांति को सैनिकों ने प्रारंभ किया और जनता के विभिन्न वर्गों ने उसमें सहयोग दिया। इस क्रांति में हिंदू और मुसलमानों ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की । यह दूसरी बात है कि आंदोलन विफल हो गया और अंग्रेजों ने पूरी शक्ति से उसे कुचल दिया ।
    सफलता से बडी कोई उपलब्धि नहीं और विफलता से बड़ा कोई अपराध नहीं । यदि 1857 का यह सैनिक- आंदोलन सफल हो जाता तो समस्त विश्व स्वतंत्रता- आंदोलन के नाम से उसे ससम्मान पुकारता किन्तु उसके विफल हो जाने के कारण ही इतिहासकारों ने उसे विभिन्न नामों से संबोधित किया, यथा किसी ने इसे देशी राज्यों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का असफल प्रयास बताया तो किसी ने उसे सैनिक-विद्रोह का नाम दिया । किसी ने गदर की संज्ञा दी तो अन्यों ने स्वतंत्रता- आन्दोलन के नाम से अभिहित किया ।
    स्वतंत्रता-आंदोलन का यह प्रथम प्रयास असफल हो गया, उसे कुचल दिया गया और देश से ऊपरी सतह पर शांति भी स्थापित हो गई, किन्तु क्रांति के बीज मरे नहीं । देशवासी यह मानने को कदापि तैयार नहीं थे कि अंग्रेज़ अजेय हैं । तभी तो समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भीतर ही भीतर सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में जुट गया । परिणामत: देश के विभिन्न भागों में समय-समय पर अंग्रेजो की विरोधिता जारी रही । सच तो यह है कि 1857 की क्रांति के बाद से अगस्त, 1947 तक भारत से अंग्रेजी सरकार एक क्षण के लिए भी चैन से शासन नहीं का पाई ।
  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan (Paperback)
    Narendra Mohan
    295

    Item Code: #KGP-04

    Availability: In stock


  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Aazaadi Mubarak
    Kamleshwar
    290 261

    Item Code: #KGP-41

    Availability: In stock

    आजादी मुबारक
    मैंने देखा है कि कमलेश्वर ने कभी भी किसी 'डॉग्मा' से चालित होकर लिखना स्वीकार नहीं किया । कमलेश्वर की हर कहानी उसके जीवनानुभवों से निकली है । कमलेश्वर ने पढ़-पढ़कर संक्रांति के नहीं झेला है, बल्कि स्वय जिया है... उसकी शायद ही कोई ऐसी कहानी हो, जिसके सूत्र जिंदगी में न हों, क्योंकि वह बहुत खूबी से अपने समय के अंतर्विरोधों को पकड़ता है...  मुझे बहुत-सी वे घटनाएँ, लोग, स्थितियाँ, विचार, संदर्भ आदि याद है, जिन्होंने उसकी सशक्त  कहानियों को जन्म दिया है । कमलेश्वर इस मामले में एक बंजारा है, क्योंकि वह अनवरत यात्रा पर रहता है उसकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की सादगी है शुरू होकर आधुनिकतम संचेतनाओँ और संश्लिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करती है...  उसका स्टैमिना परिवर्तन की तेज से तेज रफ्तार में उसका सहायक होता है, इसीलिए वह कभी पिछड़ता नहीं और न प्रयत्न-शिथिल होता है...  और मैं कहना चाहूँगा कि यह कोई साधारण बात नहीं कि एक कलाकार अपनी भावभूमियों पर परिश्रमपूर्वक तैयार की गई अपनी निर्मितियों को इतनी निर्ममता से तोड़कर अलग हो जाए और नए सफल प्रयोग करने लगे । -दुष्यंत कुमार (सन् 1 966)

    कमलेश्वर की कहानियों का यहीं सच है । तमाम क्था आंदोलन  आए और गए, उनके साथ और उनके बाद भी कमलेश्वर ने अपनी निर्मिंतियों को विलक्षण रचनात्मक निर्ममता से तोड़ा से । उसी प्रयोगधर्मिता का उदाहरण हैँ-'आजादी मुबारक' संकलन की यह कहानियां
  • Mannu Bhandari : Srijan Ke Shikhar
    Sudha Arora
    550 495

    Item Code: #KGP-801

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
    हिन्दी साहित्य का समृद्ध करने में जिन कथा-लेखिकाओं  का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, मन्नू भंडारी उनमें एक अग्रणी नाम हैं । पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय मन्नू भंडारी हिंदी भाषा के साथ-साथ अनेक देशी-विदेश भाषाओं में एक से आदर-सम्मान के साथ पढी जाने वाली रचनाकार हैं ।
    मन्नू भंडारी के दो उपन्यास 'आपका बंटी' और  'महाभोज' हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर और सृजनात्मकता शिखर पर प्रतिष्ठित हैं । ये दोनों  उपन्यास अपने समय से आगे की कहानी कहत्ते और एक लंबे कालखंड का सच होने के कारण कालजयी उपन्यास, की श्रेणी में आते हैं ।
    मीडिया लेखन में भी मन्नू जी की पटकथाओं ने और  धारावाहिकों में 'रजनी' ने अपनी धाक जमाई । मन्नू  जी  व्यक्तित्व व रचनात्मक पक्ष  सभी कोणों का इस  पुस्तक में विश्लेषण है।
    एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी मन्नू जी का जीवन एक दृढ़ और जिजीविषा की अद्भुत  मिसाल हैं । हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में पहले एक पग्म स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं. जो पहली  ही मुलाकात में आपका बनावट आया दिखावट से पर अपने आत्मीय घेरे में  ले लेता है   ।
    बंगाल की सर्वाधिक लोकप्रिय लेखिका और  सामाजिक कार्यकर्ता महास्वेता देवी से लेकर ? वरिष्ट चिंतक-समीक्षक नामवर सिंह, निर्मला जैन, राजेद्र यादव, गिरिराज किशोर, विश्वनाथ त्रिपाटी, विजयमोहन सिंह, अजितकुमार, देवेंद्रराज अंकुर, स्वयं प्रकाश, राजी सेठ, अर्चना वर्मा तथा मन्नू जी का करीब से जानने वाले उनके अध्याय स्वजनों ने अपने वक्तव्यों, आलेखों और  विश्लेषण से इम पुस्तक को समृद्ध बनाया है । आशा है  पाठकों की कसौटी पर भी यह पुस्तक खरी उतरेगी ।
    -सुधा अरोड़ा
  • Buddha Charitam
    Hari Krishna Taileng
    120 108

    Item Code: #KGP-1840

    Availability: In stock

    बुद्ध चरितम्
    संस्कृत के सात श्रेष्ठ महाकाव्यों और नाटकों पर आधारित हिंदी कथाएँ
    बुद्ध चरितम् की विशेषता यह है कि इसमें भगवान बुद्ध के जन्म से निर्वाण तक का जीवन-चरित्र तो है ही, साथ ही  महाकवि ने बौद्ध धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को रुचिकर कथा में पिरोकर मधुर और सहज ग्राह्य बना दिया है ।
    सौंदर नंद में बोद्ध धर्म के सिद्धांतों और साधना-रीति को कथा में गूँथकर महाकवि ने सहज और बोधगम्य बना दिया है । इस महाकाव्य में गौतम बुद्ध की विमाता से उत्पन्न भाई नंद और उसकी अतीव सुंदर पत्नी सुंदरी की मनोहारी कथा है ।
    नागानंद में नागों की रक्षा में प्राणोत्सर्ग कर देने वाले परोपकारी नायक जीमूतवाहन की कथा है । संयत और उदात्त प्रेम, लोकहित और प्राणीत्सर्ग की यह कथा मानवीय गुणों से परिपूर्ण और प्रभावशाली है ।
    मालती-माधवम में मालती और माधव की प्रणय गाथा है, जो अनेक बाधाओं के आते रहने के बावजूद सफलता प्राप्त करती है । कथा बडी रोचक है ।
    प्रतिमा नाटक में पुरुषोत्तम राम के वनगमन से लेकर राज्यारोहण की कथा कही गई है । कथावस्तु का प्रस्तुतीकरण अत्यंत कलापूर्ण और मनोहारी है । यह नाटक बड़ा आदर- प्राप्त और विशिष्ट है । इसमें भरत का उदात्त चरित्र और महारानी कैकेयी का मार्मिक व सहानुभूतिपूर्ण चित्रण हुआ है । कैकेयी महाकवि द्वारा निर्दोष सिद्ध की गई है ।
    रत्नावली नाटक में वत्सराज उदयन से सिंहल की राजकुमारी रत्नावली के विवाह की रोचक व सरस कथा है ।
    विक्रमोर्वशी नाटक में चंद्रवंश के इंद्र के समान प्रतापी महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रेमकथा प्रस्तुत की गई है।
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai
    Ubaid Siddqi
    300 270

    Item Code: #KGP-547

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
  • Lokmanya Baalgangadhar Tilak : Jivan Darshan
    M.A. Sameer
    280 252

    Item Code: #KGP-809

    Availability: In stock

    1857 की क्रांति ने जो बयार बहाई, उसने घर-घर में मन को छुआ और अगले स्वातंत्र्य समर की—जो अनवरत था और शांत भले ही था, लेकिन थमा नहीं था—रूपरेखा बना दी। इस उत्तरार्द्ध में केवल जोशीले राष्ट्रभक्त ही नहीं हुए बल्कि बौद्धक क्रांति का बिगुल बजाने वाले लोकमान्य बालगंगाधर तिलक असाधारण चिंतक और वक्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी।
    यह पुनर्जागरण का काल था, जिसने समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांध। इस काल में अनेक राष्ट्रभक्तों का योगदान रहा, जिनमें बालगंगाधर तिलक को राष्ट्रीय आंदोलन की गरम विचारधारा का प्रणेता माना गया। तिलक वह नेता थे, जिनकी अगुवाई में राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। यह पुस्तक ‘लोकमान्य बालगंगाधर तिलक : जीवन दर्शन’ इसी गाथा को अपने में समेटे हुए है।
  • Lauhpurush Sardar Vallabhbhai Patel-Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    80

    Item Code: #KGP-1410

    Availability: In stock

    सरदार वल्लभभाई पटेल
    सरदार वल्लभभाई पटेल को भारत के इतिहास में लौहपुरुष के रूप में जाना जाता है, जबकि विदेशी इतिहासकारों ने उनकी तुलना बिस्मार्क से की है। वे कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति थे और परिस्थिति फिर चाहे जैसी भी रही हो, अपने कर्तव्य का निर्वाह करने से नहीं चूके। इस संदर्भ में वह घटना याद आती है, जब वे अदालत में अपने मुवक्किल की पैरवी कर रहे थे कि तभी उन्हें उनकी पत्नी की मृत्यु से संबंधित तार मिला। उन्होंने वह तार पढ़ा और उसे अपनी जेब में रख लिया तथा मनोयोग से अपने कर्तव्यपालन में लगे रहे। उनका विचार था कि यदि वे अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते तो एक बेगुनाह को सजा हो जाती।
    सरदार पटेल की सहनशक्ति बड़ी अद्भुत थी। जब उनकी आयु केवल 9 वर्ष थी तो उनकी बगल में एक फोड़ा निकल आया था। फोड़ा पक गया था, जिस कारण उसमें मवाद बन गयी था। इस फोड़े के कारण उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी थी। ऐसे में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस फोड़े को लोहे की गर्म सलाख से फोड़ दिया। इस आयु में इस तरह के साहस व सहनशक्ति के उदाहरण बहुत ही कम देखने को मिलते हैं।
    बाल्यावस्था से ही सरदार पटेल में निर्णय लेने की बड़ी अद्भुत क्षमता थी और उन्होंने जीवन में जो भी निर्णय लिए, उनमें सफलता भी प्राप्त की। पराधीन भारत में उन्होंने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें निडर, साहसी तथा वीर बनने का पाठ पढ़ाया, जबकि स्वतंत्रा भारत में उन्होंने देशी रियासतों को एकीकृत करने का जो गौरवशाली कार्य किया, वह हमारे सामने एकीकरण की आदर्श मिसाल है। 
    प्रस्तुत पुस्तक ‘लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल: जीवन दर्शन’ में सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी घटनाओं एवं तथ्यों को सरस, सरल एवं रोचक भाषा में समाहित करने का प्रयास किया गया है।
  • Viklango Ke Liye Rojgar
    Vinod Kumar Mishra
    175 158

    Item Code: #KGP-7845

    Availability: In stock

    आम विकलांग कर्मचारी अत्यंत परिश्रम और अनुशासनप्रिय होते हैं । बढ़ते तकनिकी विकाश ने जहाँ विभिन्न कार्यों में शारीरिक श्रम की आवश्यकता को काम किया है वहीँ विकलांगों की कार्यक्षमता को नए-नए सहायक उपकरणों और बेहतर कृत्रिम उपकरणों के जरिये लगातार बढ़ाया है और आगे इसका और विस्तार होगा । 
    बदलते आर्थिक परिवेश में विकलांगों के लिए नयी रोजगार संभावनाओं की विशेष रूप से निजी क्षेत्र में तलाश आवश्यक है । इसके लिए उद्योग जगत, राष्ट्रीय संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और विकलांग युवक-युवतियों को एक जगह आना होगा और इस तरह प्रयास करना होगा ताकि विकलांग व्यक्ति बड़ी संख्या में रोजगार पा सकें और समाज को अपनी योग्यता का लाभ दें । 
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri (Paperback)
    Leeladhar Jaguri
    80

    Item Code: #KGP-1442

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Ritusamhaar
    Kaalidas
    395 356

    Item Code: #KGP-308

    Availability: In stock

    ऋतुसंहार
    प्रेम, सौंदर्य, भक्ति, मर्यादा, कला व संस्कृति के सम्मिश्रण का दूसरा नाम है—कालिदास। स्थान व काल के संदर्भ में अपने को अपरिचित रखकर जिसने अपनी कृतियों के माध्यम से, विषयवस्तु के साथ-साथ भारतवर्ष की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक गरिमा और भौगोलिक सौंदर्य से हमें सुपरिचित कराया, वह आज किसी एक काल व एक स्थान का कवि न होकर, सार्वकालिक विश्वकवि के रूप में प्रतिष्ठित हो गया है।
    उसी महाकवि की एक छोटी-सी काव्यकृति है—‘ऋतुसंहार’। इसमें सचित्रा षड् ऋतु वर्णन के परिपार्श्व में तदनुरूप स्त्री-पुरुष के प्रेम और सौंदर्य-भोग का श्रृंगारिक चित्रण हुआ है।
    इस त्रैभाषिक पुस्तक की विशेषता एक तो यह है कि सामान्य हिंदी पाठक हिंदी रूपांतर द्वारा कालिदास के काव्य-सौंदर्य एवं प्रेम की अनुभूति प्राप्त करेंगे, दूसरी यह कि संस्कृत जानने वाले संस्कृत मूल का भी रसास्वादन कर सकेंगे। तीसरी विशेषता यह कि अंग्रेजी अनुवाद से आधुनिक पाश्चात्य प्रेमी भी भारत की संस्कृति की सरसता से परिचय पा लेंगे।
    इस चित्रात्मक कृति की सर्वोपरि विशेषता भी है। वह यह कि यह पुस्तक गृहस्थाश्रम में कदम रखने वाले युवक-युवतियों के लिए पठनीय है और मित्रों एवं सखियों को विवाहोत्सव पर भेंट करने के लिए इसे खास तौर से तैयार कराया गया है।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhisham Sahni (Paperback)
    Bhishm Sahni
    120

    Item Code: #KGP-10

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भीष्म साहनी
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार भीष्म साहनी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'वाङ्चू',  'साग-मीट', 'पाली', 'समाधि भाई रामसिंह', 'फूलां', 'सँभल के बार', 'आवाजें', 'तेंदुआ', 'ढोलक' तथा 'साये'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार भीष्म साहनी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey
    Agyey
    260 221

    Item Code: #KGP-662

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अज्ञेय ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मेजर चौधरी की वापसी', 'गैंग्रीन (रोज)', 'नगा पर्वत की एक घटना', 'हीली-बोन की बत्तखें', 'पठार का धीरज', 'जयदोल', 'विवेक से बढ़कर', 'साँप', 'शरणदाता' तथा 'कोठरी की बात'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अज्ञेय की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rangon Ki Gandh-2
    Govind Mishra
    595 536

    Item Code: #KGP-9161

    Availability: In stock

    रंगों की गंध

    यात्रा जीवन के दूसरे अनुभवों से थोड़े अलग किस्म का अनुभव है। जहां दूसरे अनुभव हमें साफ-साफ जोड़ते-तोड़ते हैं, अपनी अंतरंगता में चरमरा डालते हैं या फिर सूखा-सूखा और दूर-दूर रखते हैं...वहां यात्रा दूसरी रखते हुए भी पास लाती हे, हम अपने खोल से बाहर निकलकर संसार की व्यापकता को छूते होते हैं। व्यापकता की यह छांह दुखी व्यक्ति को टूटने से बचाती है। स्वयं से थोड़ा वैराग्य और बाहर से जुड़ना दोनों एक साथ होता चलता है। मेरे लिए जो इससे बड़ी बात है, वह यह कि यात्रा में हम चलते हैं, हर हाल में चलते रहना-यह मेरी जिद दृढ़तर करती है यात्रा।
    -गोविन्द मिश्र
  • Raseedi Ticket
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-2068

    Availability: In stock


  • Saadat Hasan Manto Ke Natak
    Narendra Mohan
    400 360

    Item Code: #KGP-3

    Availability: In stock

    सआदत हसन मंटो के नाटक
    सआदत हसन मंटो के नाटकों से हिंदी पाठकों का उतना परिचय नहीं है जितना उनकी कहानियों से, जब कि उन्होंने उच्चकोटि के नाटक लिखे हैं । उनके नाटकों में विडम्बनापूर्ण  स्थितियों के दृश्यात्मक संयोजन के आधार पर चरमबिंदु  की रचना की गई है और फिर उसी में से उभरता है एंटी क्लाइमेक्स । कार्य-व्यापार को आलोकित करने की यह पद्धति, चरमबिंदु के साथ इस ढंग का सलूक मंटो के नाटय-कर्म का अहम हिस्सा है ।
    मंटो के नाटकों में व्यंग्य-दृष्टि और फार्स के साथ-साथ हास्य और क्रीडा का भी विधान हुआ है । इनमें मंटो की संवेदना और सोच का दायरा काफी विस्तृत है-वैयक्तिक कुंठाओं, आकांक्षाओं और सरोकारों से लेकर सामाजिक- राजनीतिक चिंताओं और विदूपताओं तक । ये नाटक श्रव्य माध्यम द्वारा प्रस्तुत किए गए थे, अत: उर्दू हिंदी भाषाओं की साँझी विरासत हैं ।
    सआदत हसन मंटो के नाटक पुस्तक से मंटो के नाटकों को, उनके नाटककार रूप को पहली बार हिंदी पाठकों के सामने लाने का महत्त्वपूर्ग कार्य किया है हिंदी के जाने-माने नाटककार, कवि और आलोचक डॉ० नरेन्द्र मोहन ने । संपादकीय दृष्टि की वजह से यह मंटो के नाटकों का एक संकलन भर नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज बन गया है जो पीढियों के फासले को पाटता हुआ हमसे आ जुड़ता है ।
    मंटो ने न आघुनिक्तावादी सांचा कबूल किया, न प्रगतिवादी । यह जिंदगी की जुराब के धागे को एक सिरे से पकड़कर उघेड़ता रहा और उसके साथ हम सब उधड़ते चले गए ।
  • Mere Saakshaatkaar : Govind Mishra
    Govind Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-760

    Availability: In stock


  • Reverse Your Thoughts Reverse Your Diseases (Paperback)
    Anil Bhatnagar
    245

    Item Code: #KGP-337

    Availability: In stock

    Like an artist who expresses herself on canvas with colors, our thoughts do so on the canvas of life (health included). Health or diseases, therefore, do not come by chance; they are created through our mental processes—though unknowingly.
    As per Psychoneuroimmunology, a new branch of science that studies the mind-body connection, the thoughts and emotions that we choose get instantly transformed into chemicals. These chemicals are, effectively, either self- administered injections of ‘slow poisons’ or of ‘healing medicines’ that eventually freeze into and become our physical states, i.e. the way we feel physically in our bodies—dis-eased or eased (i.e., healthy).
    Reverse Your Thoughts, Reverse Your Diseases is your guide to retrace your path back towards health from diseases through the same route whence these came from, i.e. through the route of your thoughts, emotions, beliefs and imagination. The book shares with you symptoms, emotional causes, metaphysical reasons, affirmations and dietary suggestions for averting and curing over 150 diseases . . . along with power-packed strategies for liberating you from corrosive thoughts and emotions.
  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

    Availability: In stock


  • Himachal Pradesh Ka Lok Jeevan
    Kuldeep Singh
    225 203

    Item Code: #KGP-9113

    Availability: In stock

    हिमाचल प्रदेश का लोक-जीवन
    आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारी लोक-संस्कृति पिछड़ी तो नहीं है, परंतु आधुनिकता के लबादे ने इसको ढक अवश्य दिया है। एक तरफ पाश्चात्य संस्कृति की चकाचैंध से आम व्यक्ति प्रभावित हुआ है तो दूसरी तरफ आधुनिकता और परंपरा में सामंजस्य न बिठा पाने के कारण भी हमारी लोक-संस्कृति पतनोन्मुख हुई है। टी.वी. के विदेशी चैनलों ने आम व्यक्ति के पहनावे, खान-पान, रहन-सहन तथा दिनचर्या को प्रभावित ही नहीं किया, बल्कि परिवर्तित करके रख दिया है। फलतः मूल लोक-संस्कृति की जड़ें हिल गई हैं। आम व्यक्ति दोराहे पर आ गया है। न तो वह स्वयं को आधुनिकता के अनुरूप ढाल पा रहा है और न ही पूर्ण रूप से अपनी लोक-संस्कृति को व्यवहार में ला रहा है। 
    गत दो-तीन दशकों में हिमाचल प्रदेश की ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारत की लोक-संस्कृति में व्यापक उथल-पुथल देखने को मिली है। संस्कृति के ढाँचे में परिवर्तन भी हुए हैं। अनेक रीति-रिवाजों, परंपराओं, प्रथाओं का तथाकथित आधुनिकीकरण हुआ है, परंतु यह सब होने के बावजूद आधुनिकता और लोक-संस्कृति  का आपसी सामंजस्य नहीं बैठ पाया है।
    इस पुस्तक के माध्यम से भारत का जनमानस हिमाचल प्रदेश के जनजीवन की केवल झलक ही नहीं पा सकेगा, बल्कि उसे वास्तविक रूप में निहार भी सकेगा, उसका अनुभव भी कर सकेगा। साहित्यकार किस प्रकार किसी भी संस्कृति और जनजीवन को अंकित करता है, यह कृति उसका प्रमाण है।
  • Kucch Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100 90

    Item Code: #KGP-9238

    Availability: In stock

    ये कहानियां बच्चों के लिए भी हैं और किशोरांे के लिए भी। अपनी जीवन-यात्रा में आए हुए कुछ मार्मिक प्रसंगों से मेंने ये कहानियां रची हैं। सभी के पात्र मनुष्य हैं। हां, दो कहानियां ऐसी हैं, जो शुद्ध काल्पनिक हैं और जिनके पात्र पशु हैं। मैंने चाहा है कि इन कहानियों से बच्चों का मनोरंजन तो हो ही, वे अपने वय की कुछ समस्याओं से रूबरू हों और उन्हें अच्छे जीवन-व्यवहार की सीख मिले।
    —रामदरश मिश्र
  • Hindi Turkey Dictionary
    Sita Laxmi
    495 446

    Item Code: #KGP-2039

    Availability: In stock


  • Parakh
    Malti Joshi
    180 162

    Item Code: #KGP-1983

    Availability: In stock

    परख
    "तुमने अपने बचपन में मुझे एक सपना दिखाया था कि तुम पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनोगे, तुम्हारा एक बड़ा-सा बँगला होगा, बँगले में मेरा भी एक कमरा होगा, कमरे से लगी बालकनी में एक झूला पड़ा होगा, उस झूले पर बैठकर मैं तुम्हारे बच्चों को कहानियाँ सुनाऊँगी, उनके लिए स्वेटर बुनूँगी।
    "अब तुम बड़े आदमी बन गए हो। तुम्हारे पास बड़ा-सा बँगला भी है, घर में बाल-गोपाल भी हैं, पर मेरा सपना तो अधूरा ही रह गया न ! अभी तुमने मेरे लिए इतने ठिकाने गिनाए, पर एक बार भी नहीं पूछा कि जिया, मेरे घर रह सकोगी ? देखो, मुझसे जैसा बना, मैंने तुम्हारा बचपन सँवारा था। अब तुम मेरा बुढ़ापा सुधार रहे हो। हिसाब बराबर हो गया।"
    "कैसी बात कर रही हो जिया !" वीरेश आवेश में एकदम उठकर खड़ा हो गया, "कसम ले लो जो आज तक मैंने कभी तुम्हें आया समझा हो।" उसका स्वर एकदम तरल हो आया, "अपनी जन्मदायिनी माँ को तो मैंने बस तस्वीर में ही देखा है। उनकी कोई याद मेरे मन में नहीं है। पर सच कहता हूँ, बाहर रहते हुए जब भी घर की याद आई है, माँ के रूप में तुम्हारी छवि मन में उभरी है। मुझे दुःख है तो इसी बात का कि इस रिश्ते को कोई वैधानिक दर्जा नहीं मिल सका, नहीं तो मैं वृद्धाश्रमों की खाक क्यों छानता ! तुम्हें साधिकार, ससम्मान सीधे अपने घर ले जाता।"
    "यह तुम्हारा वहम है बेटे ! इसे अपने मन से निकाल दो। वैधानिकता रिश्तों को गारंटी नहीं देती, नहीं तो तुम्हारे उस पाँचसितारा वृद्धाश्रम में इतने लोग आकर क्यों बसते !"           
    [इसी संग्रह की कहानी ‘अनिकेत’ से]
  • Apna Raag
    Pushpa Mehra
    140 126

    Item Code: #KGP-176

    Availability: In stock

    अपना राग
    जिस युग में सब अपना-अपना राग आलापना चाह रहे हों, श्रीमती पुष्पा मेहरा का ‘अपना राग’ जितना उनका, उतना ही मेरा-आपका, बल्कि हम सबका राग है। उसके इस लक्षण की ओर आपका ध्यान अवश्य जाएगा कि भले ही वह रग-रग में समाया प्रतीत न हो, पर वह घुन की तरह भीतर पैठा रोग कदापि नहीं। 
    पुष्पा मेहरा ने हिंदी कविता के समसामयिक मुहावरे को अपनाने या आधुनिकता की होड़ में शामिल होने की जगह अपने आसपास की दुनिया को ऐसी सीधी, सरल शैली में चित्रित किया है कि उनकी अनुभूति सहृदय पाठक को अपनी वह अनुभूति मालूम होगी, जिसे हम-आप व्यस्तता या लापरवाही के कारण भले लिपिबद्ध न कर पाएँ, किंतु पुष्पा मेहरा ने सँजोकर हमारे लिए सुलभ कर दिया है। यह कुछ-कुछ वैसा है, जैसे तड़क- भड़क-भरे माहौल में किसी का बिलकुल सीधे-सादे परिधान में प्रकट हो, कइयों को इस पछतावे से भर देना कि वे नाहक ही इतना सजे-सँवरे।
    वैसे तो कविता के बहुतेरे प्रयोजन होते हैं–उनमें से एक यह भी कि वह जहाँ उपजे, उससे कहीं अन्यत्र उसकी शोभा झलके। आशा करनी चाहिए कि पुष्पा मेहरा की कविताएँ अंधी दीवार से टकराकर लौट आने वाली बंद कविताएँ होने के बजाय विभिन्न हृदयों में खुलने-खिलने वाली कविताएँ सिद्ध होंगी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala (Paperback)
    Suryabala
    130

    Item Code: #KGP-417

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सूर्यबाला
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी  न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Aur Ant Mein Ishu
    Madhu Kankria
    120 108

    Item Code: #KGP-160

    Availability: In stock

    ...और अंत में ईशु
    मधु कांकरिया के प्रस्तुत नव्य कथा-संग्रह की कहानियाँ समसामयिक भारतीय जीवन के ऐसे व्यक्तिव के कथामयी रेखाचित्र हैं, जो समाज के मरणासन्न और पुनरुज्जीवित होने की समांतर कथा कहते हैं । इनमें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के वैसे विरोधाभास और वैपरीत्य के दर्शन-दिग्दर्शन होते हैं, जिनसे उत्पन्न विसंगतियों के ही चलते 'दीये तले अँधेरे' वाला मुहावरा प्रामाणिक बना हुआ है।
    आज का जागरुक पाठक सर्जनात्मक कथा-साहित्य में वर्ण और नारी आदि के विमर्शों की अनंत बाढ़ की चपेट में है और ऐसे 'हवा महलों' के संभवत: खिलाफ भी, जो कि उसे ज्ञान जोर संज्ञान के स्तर पर कहीं शून्य में ले जाकर छोड़ देते है । इसके उलट प्रस्तुत कहानियों में जीवन की कालिमा और लालिमा, रति और यति, दीप्ति और दमन एवं प्रचार और संदेश को उनके सही-सही पदासन पर बैठाकर तोला, खोला और परखा गया है । अभिव्यक्ति के स्तर पर विचारों का कोरा रूखापन तारों न रहे, इसलिए लेखिका ने प्रकृति और मनोभावों की शब्दाकृतियों को भी लुभावने ढंग और दुश्यांकन से इन कहानियों में पिरोया है । धर्मांतरण  का विषय हो या कैरियर की सफलता के नाम पर पैसा कमाने की 'मशीन' बनते बच्चों के जीवन की प्रयोजनहीनता ...या फिर स्त्री के नए अवतार में उसके लक्ष्मी भाव और उर्वशीय वांछनाओं की दोहरी पौरुषिक लोलुपताएँ-कथाकार की भाषागत जुलाहागीरी एकदम टिच्च मिलती है। इसे इन कहानियों का महायोग भी कहा जा सकता है ।
    सृजन को जो कथाकार अपने कार्यस्थल के रूप में कायांतरित का देता है, वह अपने शीर्ष की ओर जा रहा सर्जक होता है । विश्वास है कि पाठक को भी यह कृति पढ़कर वेसा ही महसूस होगा। ऐसा अनुभव इसलिए अर्जित हो सका है, क्योंकि ये कहानियाँ जीवन के अभिनंदन पत्र नहीं, बल्कि माननीय अपमान और सम्मान की श्री श्री 1008 भी हैं।
  • Kaaya Ke Daaman Mein
    Amrita Pritam
    125 113

    Item Code: #KGP-1960

    Availability: In stock

    काया के दमन में
    एक प्राचीन गाथा कहती हूँ कि अत्रि ऋषि जब अग्निवेश को काया तंत्र क्य रहस्य बता रहे थे, तो उन्होंने कहा- 'कालगणना से चार युग कहे जाते हैं, वही चार युग इन्सान की काया में होते हैं... 
    जन्म के साथ इंसान जो मासूमियत लिए हुए होता है, एक बीज से फूल की तरह खिलती हुई मासूमियत, जो समय सतयुग होता है... 
    अग्निवेश खिले हुए मन से ऋषि की ओर देखने लगे तो ऋषि बोले-'इंसान की ज़वानी जो सपनों में सितारे की गलियों में चली जाती है, वे त्रेता युग होता है…”
    … अग्निवेश का चेहरा गुलाबी से रंग का हो गया जो ऋषि मुस्काए, कहने लगे-'और जब उम्र पक जाती है, मन-मस्तक से ज्ञान की लौ झलकने लगती है, तो वहीं द्वापर युग होता है...' 
    इतना कहने के बाद ऋषि खामोश हो गए तो अग्निवेश ने पूछा-'महाऋषि ! फिर कलियुग कौनसी अवस्था होती है ?'
    उस समय अवि ऋषि ने कहा-'तन और मन में जब विकार भी है, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और भय पैदा होते हैं- वही कलिकाल की बेला है ।'
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    150 135

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Charaiveti-Charaiveti
    Shyam Singh Shashi
    75 68

    Item Code: #KGP-1892

    Availability: In stock


  • Khoyi Huyi Thati
    Ganga Prasad Vimal
    50 45

    Item Code: #KGP-9064

    Availability: In stock


  • Kahin Kuchh Aur
    Ganga Prasad Vimal
    200 180

    Item Code: #KGP-9067

    Availability: In stock


  • Pattharon Per Tootata Jal
    Surendra Pant
    40 36

    Item Code: #KGP-1852

    Availability: In stock

    पत्थरों पर टूटता जल

    आरम्भिक कविताएँ कवि के आत्मसंघर्ष का,
    खुद से लड़ते हुए कहीं न पहुँचने की
    विवशता के बीच भी अपनी पहचान
    बनाने की ललक से भरी तैयारी
    का दस्तावेज होती है ।
    उनमें एक ओर प्रचलित काव्यविधान
    से टूटने की छटपटाहट होती है
    तो दूसरी और शास्त्र की चुनौतियों के सम्मुख
    कुछ नया कहने का तेवर होता है ।
    इतना कहने का प्रयोजन यह नहीं कि
    सुरेन्द्र पंत की कविताएँ अन्तिम कविताएँ हैं
    जिन पर बहस नहीं की जा सकती ।
    वास्तव में वे कविताएँ बहस की कविताएँ है ।
    कारण यह कि उनमें एक गंभीर किस्म के
    कवि की मुद्रा सहसा किसी शब्द मा शब्दार्थ
    के कोने से झलकने लगती है ।

    वे चाहे आज की भाषा में खुद को खोजने की
    कोशिशें हो पर उनमें आज और कल की
    कालगत धारणाओं से बचने की कोशिशें हों ।
    इस अर्थ में वे ऐसे वर्तमान की कविताएँ है
    जो सदैव अमानवीय परिस्थितियों में
    ऐसी ही रुपाकृ्ति देता है ।
  • Ghanchakkar
    Nisha Bhargva
    225 203

    Item Code: #KGP-1805

    Availability: In stock

    व्यंग्य-लेखन की प्रवृत्ति आधुनिक युग की देन है। पिछले चंद दशकों में समाज में विषमताओं, विद्रूपताओं, विडम्बनाओं, विसंगतियों, स्वार्थपरता का जो सैलाब आया है वह अभूतपूर्व है। ऐसी परिस्थितियों में स्वाभाविक है कि जागरूक लेखक व्यंग्य की ओर उन्मुख हो । यहाँ इस ओर संकेत करना भी आवश्यक है कि व्यंग्य-साहिंत्य के क्षेत्र में लेखिकाओं की उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज नहीं हो पाईं। गिनी-चुनी हास्य-व्यंग्य को बहुचर्चित कवयित्रियों में निशा भार्गव का नाम विशेष रूप से उभरकर आया है।
    निशा भार्गव की कविताओं में हास्य-व्यंग्य के साथ ही एक अतिरिक्त तत्त्व भी विद्यमान है। उनकी कविता में तीखे प्रहार के साथ ही अच्छे संस्कार की पैरवी भी मौजूद है । उनकी कविताओं में सामाजिक, परिवारिक, राजनीतिक आडम्बरों को तो निपुणता के साथ बेनकाब किया ही गया है, स्वस्थ समाज के निर्माण का आह्वान भी किया गया है। उनकी रचनाएं ठोस सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत हैं।
  • 20-Best Stories From Spain & Portugal
    Prashant Kaushik
    395

    Item Code: #KGP-9311

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Spanish & Portuguese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories 
    open up a new world on each page.

    With stories like Vain Queen, Maid and the Negress, Three Citrons of Love, Daughter of the Witch, Pedro and the Prince, Tower of ill Luck, this book is a compilation of 20 famous Spanish & Portuguese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Spain & Portugal.
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Dharamvir Bharti (Paperback)
    Dharamvir Bharti
    150

    Item Code: #KGP-7114

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’ शृंखला में प्रस्तुत हैं धर्मवीर भारती की दस प्रतिनिधि कहानियांµ ‘कुलटा’, ‘गुलकी बन्नो’, ‘धुआं’, ‘सावित्री नंबर दो’, ‘यह मेरे लिए नहीं’, ‘हिंदू या मुसलमान’, ‘बंद गली का आखिरी मकान’, ‘हरिनाकुस और उसका बेटा’, ‘आश्रम’ तथा ‘एक छोटी मछली की कहानी’ (हस्तलिखित)।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Ek Na Ek Din
    Rajni Gupt
    600 510

    Item Code: #KGP-220

    Availability: In stock


  • Sarhad Paar Ki Bisaten
    Kanhiya Lal Nandan
    180 162

    Item Code: #KGP-9195

    Availability: In stock

    महानायकों की मुसीबत यह होती है कि उन्हें एक साइकिलबाज की तरह कर समय पैडल चलाते रहना पड़ता है, क्योंकि पैडल रुका नहीं कि सवार लुढ़का। बल्कि आगे जाने के लिए उसे पैडल मारने में मेजी से काम लेना होता है, वरना चढ़ाई की दौड़ में उसके पिछड़ जाने का खतरा भी रहता है।
    ये आलेख एक तरह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण हैं, जो लगातार घूमते चक्रव्यूह के माध्यम से अपने समय की तस्वीर पेश करते हैं। एक संक्षिप्त कालखंड अपने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय हितों को दृष्टि में रखकर आकार लेता दिखाई दे, यही इन आलेखों की सार्थकता है। किसी भी देश के इतिहास में दो-चार साल का समय कोई बड़ी अहमियत नहीं रखता, लेकिन उन दो-चार सालों के घटनाक्रम को काटकर समूचे इतिहास-क्रम को समझा भी नहीं जा सकता। ये आलेख उस इतिहास-क्रम को समझने में मदद करेंगे, ऐसा विश्वास है।
  • Bhinsaar
    Gyanendrapati
    160 144

    Item Code: #KGP-1882

    Availability: In stock

    भिनसार
    'भिनसार' समकालीन कविता-परिदृश्य में अपनी तरह के अकेले कवि ज्ञानेन्द्रपति का अनूठा संकलन है । इससे कवि की बहुचर्चित कृतियाँ 'आँख हाथ बनते हुए' और 'शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है' तो सम्पूर्णता  शामिल हैं ही, अब तक आसंकलित-और अनेक तो अप्रकाशित-रही आयी कविताएँ भी पुस्तकाकार आ रही है । एक सघन बसा कविता-संसार पाठकों की यायावरी को आमंत्रित कर रहा है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की इन कविताओं से एक ओर तो तीव्र परिवर्तनकामिता से उपजा क्रान्तिकारी रोमान है, वर्ग- शत्रुओं को ललकारता युयुत्सु उदूघोष; तो दूसरी ओर सामाजिक आत्मालोचन का वह विरल स्वर है जो अपनी आत्मा को खराद पर चढाये बगैर नहीं उठता, अपने नैतिक विवेक के आगे वेध्य बने रहने पर ही जिसका स्फुटन संभव हो पाता है । यहीं, चेतना पारीक और बनानी बनर्जी से होने वाली अविस्मरणीय मुलाकातें हैं । रात से लगी भोर में भटक आया चमगादड़ का बच्चा भी इस कविता-दुनिया का बाशिन्दा है । परित्यक्त चीजें भी यहाँ निरर्थक नही, उनमें नये अर्थ अँखुआते है ।
    दरअस्ल, ज्ञानेन्द्रपति को पढ़ना बनते हुए इतिहास के बीच से गुजरना ही नहीं, युग के कोलाहल के भीतर से छन कर आते उस मन्द्र स्वर को सुनना है इतिहासों से जिसकी सुनवाई नहीं होती; यह नश्वरताओं की भाषा से शाश्वत का द्युति-लेख पढ़ना है । इसीलिए यहाँ एक तरह की अनगढ़ता काव्य-सौष्ठव की अविधि ठहरती है । उच्च-भ्रू आलोचकों की पर्वा किये बगैर यह मनुष्य की ओर बढा हुआ समव्ययी हाथ है ।
    ये वे कविताएँ हैं जिनकी जीवनधर्मिता अबूझ ढंग से मानवीय जिजीविषा को पुष्ट करती है ।
  • Aupacharik Patra-Lekhan
    Om Prakash Singhal
    380 342

    Item Code: #KGP-786

    Availability: In stock

    औपचारिक पत्र-लेखन
    विषय एवं शैली की दृष्टि से पत्रों का एक महत्त्वपूर्ण वर्ग औपचारिक पत्रों का है। औपचारिक पत्र एक प्रकार के दस्तावेज होते हैं। जरूरत पड़ने पर उनका उपयोग साक्ष्य एवं प्रमाण के रूप में किया जाता है। अतएव उन्हें लिखते समय पर्याप्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। अब विभिन्न कार्यालयों में नियुक्त हिन्दी पढ़े-लिखे व्यक्तियों से हिन्दी पत्रचार में दक्ष होने की अपेक्षा की जाती है।
    औपचारिक पत्रों के विविध रूपों की  लेखन-शैली का सोदाहरण सैद्धांतिक विवेचन करने वाली पुस्तक का हिन्दी में सर्वथा अभाव है। विषयगत अपेक्षाओं एवं समय की माँग को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक हिन्दी में अपने विषय की पहली पुस्तक है।
    अनुप्रयुक्त हिन्दी के क्षेत्र में एक नया मार्ग प्रशस्त करने के कारण हिन्दी के प्रत्येक जागरूक पाठक और पुस्तकालय के पास इसका होना अनिवार्य है।
  • Mool Chankya Niti
    Vigyan Bhushan
    250 225

    Item Code: #KGP-192

    Availability: In stock

    आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान् विभूति थे, जिन्होंने  अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री होने के साथ ही नीतिशास्त्रज्ञ के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवनानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह निःस्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।
    वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारु ढंग से संचालित करने के लिए चाणक्य द्वारा बताई गई नीतियाँ और सूत्रा अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। उनके सिद्धांतों में निहित अर्थों की महत्ता समझते हुए ही कई विश्वविद्यालयों और प्रबंधन संस्थानों में भी ‘चाणक्य नीति’ पर शोध और अध्ययन किया जा रहा है। ऐसे विलक्षण व्यक्ति के अमूल्य वचनों को सार-रूप में प्रस्तुत करती इस पुस्तक में ‘चाणक्य नीति’ और ‘चाणक्य सूत्र’ के साथ ही ‘अर्थशास्त्र’ को भी सम्मिलित किया गया है।


  • Mrigtrishna
    Shanta Kumar
    350 315

    Item Code: #KGP-1995

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal
    Bhagwan Das Morwal
    300 255

    Item Code: #KGP-706

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढ़ियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kahani Samgra : Govind Mishra (3rd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1583

    Availability: In stock


  • Zanjeer Bol Uthi
    Jaidi Zafar Raza
    180 162

    Item Code: #KGP-1839

    Availability: In stock

    ज़ंजीर बोल उठी
    घटनाओं का कालक्रम में होना इतिहास नहीं बुनता। हाँ, घटनाएँ जब ठहरकर संवाद की स्थिति बनाती हैं और समय के भाल पर अपना निशान छोड़ जाती हैं तो इतिहास के अंकुर स्वतः फूट पड़ते हैं। डॉ जै़दी के कहानी-संग्रह ‘ज़ंजीर बोल उठी’ की चार-पाँच कहानियाँ शुद्ध ऐतिहासिक हैं। इनमें व्यथा भी है और आक्रोश भी। कारण यह है कि ये अपने समय की ज़मीनी सच्चाई और बुनियादी सवालों को उठाती हैं और तर्क एवं तथ्य की तलाश में वर्तमान से अतीत तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें बौद्धिक संवादों की टकराहटों के बजाय समय की ओट में छुपी विसंगतियों को उधेड़ने की शक्ति है जो सियासी शतरंज की बिसात को उलटने का साहस रखती है। इन कहानियों के तेवर तीखे और तल्ख़ ज़रूर हैं, मगर साथ ही इन कहानियों में संवेदनारूपी सरिता का प्रवाह बड़ी सहज गति से बहता महसूस होता है, जो शब्दों पर विश्वास को बहाल और निराशा को आशा में बदलने में ख़ासा सक्षम है। ये कहानियाँ अपने ईमानदाराना प्रयास के चलते अरसे तक पढ़ने वालों की सोच में अटकी रहेंगी।
  • Brunch Tatha Anya Kahaniyan
    Shailendra Sagar
    225 203

    Item Code: #KGP-452

    Availability: In stock

    सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार शैलेन्द्र सागर के इस संग्रह में आज की उपभोक्तावादी संस्कृति के चलते उभरती सामाजिक-सांस्कृतिक टूट-फूट के तहत जटिल विसंगतियों के दुष्चक्र में फंसे पात्रों की कहानियां दर्ज हैं। अधिकांश कहानियों में स्त्री-पुरुष की परंपरागत छवियों के बरक्स उपभोक्तावादी दौर में बुनते-घुनते संबंधें में दिनोदिन पसरते तनावों, अलगावों और नए पनपते रिश्तों की ऐसी अलक्षित सच्चाइयां पूरी प्रामाणिकता के साथ नजर आती हैं जहां पुराने समय की रूढ़ भूमिकाएं धूमिल हैं और बाजारवाद के बदलते दौर में रिश्ते पहले से ज्यादा जटिल, यथार्थपरक और अवसरवादी होते जा रहे हैं। घर-परिवार से लेकर बाहर की दुनिया में संघर्षरत पात्रों की उद्विग्नता, बेचैनी और संवेदना के क्षरित होने की दास्तां यहां पूरी बेबाकी से उकेरी गई है। सच तो यह है कि संक्रमण के इस संवेदनहीन समय में निष्प्रभ पड़ते संबंधें की बारीकी से पड़ताल करती ये कहानियां आश्वस्त करती हैं कि अचूक अवसरवाद की अंदरूनी चालों को समझने के लिए हमें संवेदना संसार में लौटना पड़ेगा जहां आपको दरारों के बीच दिखेगी मुस्कराहट, अनकही टकराहटों के बीच दिखेगी मनुष्यता और हताशा के बीच कहीं से खिल उठेंगी आशा-उल्लास की कोंपलें भी...।
    विडंबनापूर्ण स्थितियों से उबरने के लिए रिश्तों की कोमलता को बचाए रखने की मुहिम छेड़ती हैं ये कहानियां...
  • Hindustan Aur Pakistan Ki Behatreen Urdu Haasya-Vyang Shaaeree (Paperback)
    T.N. Raj
    195

    Item Code: #KGP-7054

    Availability: In stock

    उर्दू ज़बान अपनी शीरीनी, लताफ़त और नज़ाकत के सबब सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उर्दू शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़ल लिखने, पढ़ने, सुनाने या गाने वाला शख्स हमें कहीं न कहीं मिल ही जाता है । मीर, ग़ालिब, इकबाल, दाग, फ़ैज, फ़िराक़, जिगर और साहिर वग़ैरा की शायरी का जादू हमेशा बरकरार रहेगा । यह मानने में कोई हरज नहीं कि उर्दू की संजीदा शायरी के मुकाबले में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत-सी गुंजाइशें बाक़ी हैं । जहाँ तक उर्दू नस्र (गद्य) में हास्य-व्यंग्य का तआल्लुक है यह बात पूरे यकीन से कही जा सकती है कि इसमें अनमोल हीरों औरमोतियों की कोई कमी नहीं । 
  • Arddhnaarishwar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    300

    Item Code: #KGP-215

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Krishan Baldev Vaid
    Krishna Baldev Vaid
    70 63

    Item Code: #KGP-9056

    Availability: In stock


  • Ek Jala Huaa Ghar
    Iqbal Mazeed
    140 126

    Item Code: #KGP-1837

    Availability: In stock

    एक जला हुआ घर
    आज के पाठक को जिन चीज़ों को दुनिया में, अपने आसपास या अपने भीतर भी देखकर जो हैरत-सी होती है, यह उन्हीं हैरतों की कहानियाँ हैं।
    साहित्य को इनसान से, समाज से, जीवन से, संस्कृति और राजनीति से नए संबंध स्थापित करने पर प्रगतिशील आंदोलन ने जो ज़ोर दिया था यह उन्हीं संबंधों द्वारा जीवन के सौंदर्य, उसकी उठान और उभार को समझने का एक प्रयास है।
    कहानी का यथार्थ समाचार-पत्रों और अदालतों में प्रस्तुत किए गए यथार्थ से कैसे अलग होता है उसके लिए यह अंतर जानना, जो फिक्शन से जुड़ाव नहीं रखता, मुश्किल है। इसके अतिरिक्त कोई दावा करना या कहानियों से यह उम्मीद करना कि वह गलत होने वाली चीजों को ठीक कर देंगी, मूर्खता है; क्योंकि हर चीज़ साहित्य से ठीक नहीं की जा सकती। देखना यह होगा कि साहित्य, जिसका आधार Joy of understanding होता है, ये कहानियाँ अपने पाठक को वह आनंद कितना दे पाने में समर्थ हैं और इस काम में लेखक की ओर से डंडी तो नहीं मारी गई है। अगर इन कहानियों में उस सुंदरता और शक्ति की खोज मिल जाए, जिनको नए सांस्कृतिक मूल्यों में स्थान मिल सके तो यह लेखन सफल है।
  • Doordarshan Evam Media Vividh Aayam
    Amar Nath 'Amar'
    260 234

    Item Code: #KGP-190

    Availability: In stock

    क्या टेलीविजन माध्यम आज अपनी राह से भटक चुका है? क्या यह अपना बुनियादी स्वरूप खोने लगा है? क्या साहित्य, कला, संगीत, नृत्य और लोकपरंपराओं की सांस्कृतिक धरोहर धुंधली होने लगी है? नहीं, ऐसा भी नहीं है। आज आम जनता इस सशक्त इलेक्ट्राॅनिक माध्यम को पब्लिक ब्राॅडकास्टर के रूप में ही देखना पसंद करती है। उनके मन में आज भी उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर दूरदर्शन पर ऐसे कौन-कौन से कार्यक्रम हैं, जिन्हें देखकर हम मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानवर्द्धन भी करना पसंद करेंगे।
    इस पुस्तक में विविध पक्षों पर लेख के रूप में विद्वानों के विचार हैं जो दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों और अन्य माध्यमों की न केवल चर्चा करते हैं बल्कि उनकी समीक्षा भी करते हैं। ये लेख कई वर्षों से धीरे-धीरे एकत्र हुए और आज एक किताब के रूप में आपके समक्ष हैं।

  • Chetana
    Madan Lal Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-1812

    Availability: In stock


  • Vanya Jeevon Ki Romanchak Kahaniyan
    Shivani Chaturvedi
    80

    Item Code: #KGP-1057

    Availability: In stock


  • Sahitya Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    100 90

    Item Code: #KGP-1266

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From Italy (Classics)
    GLOBAL VISION PRESS
    395 336

    Item Code: #KGP-365

    Availability: In stock

    Imagine reading a 20-page introduction about an author and their times before we even start reading a story. Wait… do not imagine… just pick up any classic available, and the imagination will transform into reality. In all possibility, we 'reject' these classics outright but our grandparents still swear by their narrations and their plots. They say a good story can never be put down… what happened to these? Younger generation, wrong choices—is it?
    A good story lives and touches our hearts but only in the form the author wrote it, and not with editorial notes. What is an enjoyable tale today is a classic tomorrow. Over generations, each piece of literary classic has received newer interpretations, perceptions and proportions. The 21st century world too needs a dollop of the classics of the yesteryears, which still stand relevant to our present conditions, even though the times have changed, be it only historically.
    Keeping this thought in mind, each classic in this collection comes to the reader just as the original piece; meaning, neither the publisher nor the editor have tampered with the authors' original writings. Each classic stands untouched and unabridged—just like it was years back, fresh from the author, fresh from the press!
  • Nikka Nimana (Paperback)
    Sushil Kalra
    180

    Item Code: #KGP-427

    Availability: In stock


  • Cement Nagar (Paperback)
    VIJAY
    130

    Item Code: #KGP-258

    Availability: In stock


  • Pakistan Mein Waqt Se Mulaqat
    Shyam Vimal
    300 270

    Item Code: #KGP-255

    Availability: In stock

    लेकिन पैसा हर जगह वह काम नहीं करता जो काम मीठी हमबोली कर जाती है। यही तो हुआ मेरे साथ मैं मुलतानी बोली में उन सज्जनों से परिचय व बातचीत कर रहा था, बदले में जहां उन्होंने मुझे कोल्ड ड्रिंक पेश किया, वहां उन्होंने मोची के तयशुदा पॉलिश के दस रुपए नहीं लिए। मोची तक ने मना कर दिया लेने सै। मैं हिंदू पकिस्तान के इस नगर में पराया नहीं माना गया-हमवतनी माना। उनके इस प्रेम ने मुझे अभिभूत कर दिया। जूती पहनकर लौट लिया पैदल अपने डेरे पर। 
    इस पैदल चलने में मुझे फायदा यह था कि मैं पहले के देखे हुए इलाके में अपनी उन जगहों को, गलियों को पहचान सकूं जिनसे मैं कई दफा गुजरा होऊंगा। मुझे ऐसा लगता रहा, मैं वक्त के खोल में कैद हूँ और पारदर्शी बुलबुले समान उस खौल का सुरक्षाकवच पहने हूँ और वर्तमान में उस पार के अतीत को निहारने में कामयाब हो रहा हूं। चलते-देखते एक जगह कामयाबी मिल गई। भीड़ से भरे उस गली के मुहाने को अंदाज से पहचान लिया कि हां, यह वही गली है जहाँ मेरी भरजाई का ननिहाल है-होता था ।
  • Poster
    Shanker Shesh
    120 108

    Item Code: #KGP-1897

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla (Paperback)
    Rita Shukla
    180

    Item Code: #KGP-510

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ऋता शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-480

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है।
  • Arogyadayi Vanaspatiyan
    Ramesh Bedi
    300 270

    Item Code: #KGP-186

    Availability: In stock

    आरोग्यदायी वनस्पतियां
    हरड़, बहेडा, आंवला, नीम, पिप्पली, सर्पगंधा, भांग, मुलेठी, सौंफ, तुलसी आदि वनस्पतियों का सदियों से भारत में रोग-निवारण के लिए प्रयोग किया जाता रहा है । इस पुस्तक में विविध रोगों को नष्ट करने वाली ऐसी 54 वनस्पतियों का सचित्र परिचय दिया गया हैं ।
    प्रत्येक वनस्पति का वानस्पतिक नाम, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के नाम दिए गए हैं । निघण्टुओं में आए उनके नामों का विस्तार से परिचय दिया गया है । वनस्पति के स्वरूप की जानकारी, प्राप्ति- स्थान, खेती करने का तरीका, रासायनिक संघटन, उद्योग और व्यापार में उसके उपयोग की विधि का विस्तार से वर्णन किया गया है ।
    प्रत्येक वनस्पति के आयुर्वेदिक उपयोग की सरल भाषा में जानकारी दी गई है । अपने देश में ज़डी-बूटियों की भारी खपत है । फार्मेसी उद्योग की निरंतर बढती हुई मांग को पूरा करने के लिए इनकी खेती करनी होगी । पुस्तक में वर्णित पौधों के स्वरूप की पहचान के लिए 109 फोटो (93 सादे फोटो और रेखाचित्र तथा 16 रंगीन फोटो) दिए गए है । यह पुस्तक चिकित्सकों, आयुर्वेद के छात्रों, फार्मेसियों, वन सेवा के कर्मियों व अधिकारियों और जडी-बूटियों में रुचि लेने वाले हर व्यक्ति के लिए संग्रहणीय है ।
  • Doosara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    200 160

    Item Code: #KGP-775

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Mere Saakshatkaar : Nagarjun
    Nagaarjun
    300 270

    Item Code: #KGP-15

    Availability: In stock


  • Kavita Ki Rangshaala
    Kuber Dutt
    125 113

    Item Code: #KGP-1911

    Availability: In stock

    कविता की रंगशाला
    कुबेर दत्त की कविताओं का कथ्य सविशेष होकर सविशेष शिल्प में व्यक्त हुआ है । कवि की कविताएँ मानवीय बोध से सम्मन्न हैं और इनमें जो तथ्य और स्थितियाँ प्रस्तुत है, उन्हें कवि ने अपने ढंग से पाया । यह कठिन काम था, जोखिम का काम था, पर इसे कवि ने सफ़लतापूर्वक प्रिय और विशिष्ट बनाया । ये कविताएँ सारवान और सार्थक हैं। हिन्दी में ऐसी कविताएँ प्राय: दुर्लभ हैं।

  • Nanaji Deshmukh : Jeevan Darshan
    Gaurav Chauhan
    280 252

    Item Code: #KGP-1864

    Availability: In stock

    इस जीवात्मा ने अपने व्यक्तित्व की कुछ ऐसी अमिट छाप समाज पर छोड़ी कि उनके विषय में समाज और देश को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या साधारण मनुष्य भी दलित, शोषित, पीड़ित व वंचित के दुःखों को दूर कर उनके हृदय में एक ईश्वर, गुरु, प्रेरक, श्रद्धा का स्थान ले सकता है। ऐसी ही एक पवित्र जीवात्मा थे जिन्हें हम नानाजी देशमुख के नाम से जानते हैं। 
    "हम अपने लिए नहीं अपनों के लिए हैं। अपने वे हैं जो सदियों से पीड़ित, शोषित व उपेक्षित हैं।" यह कथन इन्हीं जीवात्मा का था जो आज नानाजी के नाम से इस संसार में याद किए जाते हैं। ऐसा ही कोई विरला व्यक्तित्व इस धरा पर जन्म लेकर इस धरा को पवित्र बनाता है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya
    Ravindra Kalia
    180 162

    Item Code: #KGP-74

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar (Paperback)
    Jainendra Kumar
    150

    Item Code: #KGP-501

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : जैनेन्द्र कुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना- अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-1
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-847

    Availability: In stock

    बीसवीं सदी की लघुकथाएं-1
    इतिहास अगर अतीत की शव-साधना हो तो ऐसे इतिहास में जाने का हमारा कोई  इरादा नहीं, लेकिन लघुकथा के इतिहास में जाना लघुकथाओं के शवों के बीच से गुजरना भर नहीं है। बेशक एक समय बहुत शक्तिशाली मानी जाने वाली अनेक रचनाएं कालांतर में रचनाओं के शव भर रह जाती हैं और बड़े रचनाकारों की ऐसी शव-रूप रचनाओं को भी साहित्य के आचार्य बहुत समय तक विक्रमादित्य की मुद्रा में ढोते रहते हैं, लेकिन कुछ रचनाएं दीर्घजीवी होती हैं, कालजयी। सदियों पुरानी ऐसी दीर्घजीवी रचनाओं के बीच से गुजरने वाला इतिहास अतीत में समकालीनता की प्रतिष्ठा-पुनर्प्रतिष्ठा का श्रम-साध्य उपक्रम होता है और दुर्भाग्य से हिंदी लघुकथा में यह जरूरी काम अभी तक नहीं हो सका है। और शायद इसीलिए इतनी रचना-बुहलता के बावजूद लघुकथा को विधा का दर्जा अभी तक हासिल नहीं हो सका है। अभी हम विधा और उपविधा के द्वंद्व से ही नहीं निकल पाए हैं। हम लेकिन इस बहस में पड़े बगैर सिर्फ निवेदन यह करना चाहते हैं कि बीसवीं सदी की आंख खुलते हिंदी लघुकथा ने भी आंख-कान खोलकर मुलुर-मुलुर इस दुनिया-जहान को देखना, सुनना और समझना शुरू कर दिया था। बीसवीं सदी के शुरू होने से 20-25 साल पहले लिखी गई भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुस्तिका ‘परिहासिनी’ की चुटकियों को चुटकुला कहकर उड़ा दें और सन् 1900 के आसपास लिखी गई माखनलाल चतुर्वेदी की लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ के काल-निर्णय पर मतैक्य न हो सके, ऋषि जैमिनी कौशिक ‘बरुआ’ को बोलकर लिखाई गई माखनलाल चतुर्वेदी की इस लघुकथा की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए तो भी 1901 में लिखी गई माधव सप्रे की लघुकथा ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ से हम हिंदी लघुकथा का आरंभ बेहिचक स्वीकार कर सकते हैं। बीसवीं सदी के खत्म होते न होते हिंदी लघुकथा ने अपनी जड़ और जमीन पर मजबूत तर्कों के साथ जो दावे ठोंक दिए हैं, उन्हें खारिज कर सकना अब किसी के लिए भी आसान नहीं होगा। हिंदी लघुकथा का अब तक का सबसे बड़ा यह संचयन दो सौ से अधिक कथाकारों की चुनी हुई लघुकथाओं का ऐसा गुलदस्ता है, जो हिंदी के प्रांगण में मह-मह महकेगा, देर तक और दूर तक, ऐसी उम्मीद हमें है।
  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda (Paperback)
    Vinod Verma
    240

    Item Code: #KGP-26

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Repartee (Paperback)
    Khushwant Singh
    225

    Item Code: #KGP-328

    Availability: In stock

    KHUSHWANT SINGH, India's iconic journalist and writer, whose works secured largest readership in the country, remains an enigma beyond his writings. His immense popularity and connectivity with his readers made him the common man's idol but his real persona remained in wraps. The 'dirty old man' ensconced in a bulb with a wicked grin and a fountain pen in hand was a far cry in real life.
    This collection of interviews and articles attempts to bring to light the real Khushwant as his family and close friends knew him. 
    A man who was constantly surrounded by beautiful women but remained faithfully wedded to his wife Kaval for 62 years  till she passed away, a man who wrote about wine, women and sex, but lived a life more simple and austere than a commoner, a man who was more disciplined in his fitness regime than men even half his age, a person  who wrote more books, articles and columns than any other journalist or writer in this country, and in a language, so simple that the common reader could comprehend. 
    Little do his readers know that the man famous for his jokes, his love for wine and women and his fierce agnosticism, was a great scholar in real life who wrote classics like A History of the Sikhs, taught comparative religion at Princeton University, was a passionate nature lover who wrote books like Nature Watch, was an art critic and had dabbled in sitar and painting at Shantiniketan in his youth.
    Khushwant Singh voiced his opinions openly and spoke his mind fearlessly through his column's for which he was honoured in 1998, with 'Honest Man of the Year Award and later in 2007 with Padma Vibhushan award.
    He remained reticent about his personal life while he lived. It is about time his loyal fans knew who the real Khushwant was.
  • Bankon Mein Anuvaad Ki Samasyaen
    Bholanath Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-808

    Availability: In stock

    बैंकों में अनुवाद की समस्याएँ
    हिन्दी में बैंकों के प्रयोग पर बहुत कम पुस्तकें आई है, किन्तु बैंकों में अंग्रेजी सामग्री के हिन्दी अनुवाद की समस्याओं पर शायद यह पहली पुस्तक है ।
    डॉ० भोलानाथ तिवारी के 'अनुवाद : सिद्धान्त और प्रयोग' माला से 'अनुवाद विद्वान', 'काव्यानुवाद की समस्याएं', 'कार्यालयी अनुवाद की समस्याएं', 'वैज्ञानिक अनुवाद की समस्याएं', 'भारतीय भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ', 'विदेशी भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ' तथा 'पत्रकारिता में अनुवाद की समस्याएँ' के बाद यह आठवीं पुस्तक है ।
    यह पुस्तक विशेषत: बैकों में अनुवाद तथा सामान्यता अनुवाद में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Mayaram Ki Maya
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1820

    Availability: In stock

    ‘मायाराम की माया’ नाटक का केंद्रबिंदु मनुष्य है। सृष्टि के असंख्य जीवों में से मनुष्य एक ऐसा जीव है, जो ईश्वर की सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है। जिज्ञासा कहें या फितरत, कभी-कीाी मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व को ललकारता दिखाई देता है। उसका मन नाना प्रकार के विकारों से भरा पड़ा है।
    यही कारण है कि मनुष्य सोचता कुछ है, दिखता कुछ है और करता कुछ और है। समय आने पर प्रगाढ़ संबंधों को भी भूल जाता है। इस संसार में जन्म देने वाले ईश्वर की कृतज्ञता और श्रद्धा को भूल जाता है। ब्रह्मलोक में इसी बात पर चर्चा चल रही है कि क्या मनुष्य इस पृथ्वी लोक का सबसे सीधा जीव है? इस बात को प्रमाणित करने के लिए पृथ्वीलो से ‘मायाराम’ नाम के व्यक्ति को ब्रह्मलोक में लाया जाता है। 
    -जयवर्धन

    ‘मायाराम की माया’ को मैं फार्स की श्रेणी में ही रखना चाहूंगा। इस नाटक की स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों की बुनावट जयवर्धन ने फैंटेसी के अंदाज में की है। बाह्य यथार्थ से कोसों दूर, लेकिन आंतरिक यथार्थ के बहुत करीब और नाटक के अंत में ब्रह्मा का नारद से यह कहना ‘‘आप ठीक कह रहे हैं मुनिवर। एक इंसान की गलती की सजा समस्त इंसान को देना ठीक नहीं होगा। यह सृष्टि है। सृष्टि का चक्र सदा चलता रहेगा। हां, भविष्य में इंसान को बनाते समय इंसानियत थोड़ा ज्यादा डालनी होगी।’’
    -प्रताप सहगल
  • Saleem Ke Shanidev
    Pankaj Prashar
    100 90

    Item Code: #KGP-9100

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Upendranath Ashq (Paperback)
    Upender Nath Ashq
    90

    Item Code: #KGP-1505

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उपेन्द्रनाथ अश्क
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' क्या 'अजगर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    225 203

    Item Code: #KGP-841

    Availability: In stock


  • Prakaaraantar
    Madhur Shastri
    125 113

    Item Code: #KGP-1862

    Availability: In stock

    प्रकारान्तर
    वर्तमान जीवन-परिवेश की दुर्दान्त अमानवीयता के सामने पड़ने पर अस्वीकार का स्वर ही स्वाभाविक परिणति होती है एक सर्जक कवि की । मधुर शास्त्री का कवि भी मुक्त- छंद की इन कविताओं में अपना कटु अस्वीकार दर्ज करता है : 'चलो, लौट चलें पुराने दिनों की ओर/शाम झुकने लगी है/रात जाने वाली है/मुँह में भरकर झाग/लाल जीभ में है काला जहर इसके साथ है खूँख्वार अँधेरा' -प्रतीकात्मक व्यंजना में युग की विभीषिका व्यक्त है ।
    गीत के ऊँचे सृज़न-तल से बाध्यकारी जिन सीमाओं- स्थितियोंवश मधुर शास्स्त्री का गीतकार मुक्तछंद के तल पर उतरा है, वे निश्चय ही युग-यथार्थ  को रेखांकित कर रही हैं तथा जिन्होंने कवि को झेंझोड़ दिया है। अन्याय, हिंसा, हत्या के अपूर्व भयावह वर्तमान को भावोपचार  से अधिक संवेदनात्मक विचारोपचार एवं व्यंग्य-प्रहार की दरकार है ।
    समाज-जीवन की विचार-विश्लेषणमयी पहचान के बावजूद मधुर जी का गीतकार कवि अपनी मूल प्रकृति को पूरी तरह छोड़ नहीं देता । यह अच्छा हैं, क्योंकि सृजन की मौलिक चिंतन-दृष्टि ही प्रामाणिकता को सिद्ध करती है। बाहरी बाध्यताओं में घिरकर भी मधुर शास्त्री दृष्टि, भाषा, लय, तुक आदि को शिथिल नहीं होने देते तथा निराला की मुक्तछंद परंपरा में काव्य-सृजन की हरीतिमा, सरसता, संवेदना, लोकाभिमुखता, संप्रेषणीयता, सहजता की भूमि को विकसित करने में संलग्न रहते हैं । यहीं यह कह देना अप्रासंगिक न होगा कि निराला ने छंद तोड़ा नहीं था, एक नया छंद-मुक्तछंद, जोड़ा था।
  • Rang De Basanti Chola
    Bhishm Sahni
    2014 1813

    Item Code: #KGP-19

    Availability: In stock

    रंग दे बसन्ती चोला
    [जलियाँवाला बाघ रतनदेवी आती है । हाथ में पानी का लोटा है ।]
    रतनदेवी : ले मेरे लाल । मैं तेरे लिए पानी लाई हूँ। (किश्ना के होंठों से पानी डालती है ।) तू बोलता क्यों नहीं किश्ना बेटे । (माथे को छुकर) चला गया, यह भी चला गया । इसकी भी प्यास बुझ गई । मैं कर्मजली तेरे होंठों में दो बूँट पानी भी नहीं डाल पाई । तू भगवान् को प्यारा हो गया है। (रो पड़ती है, फिर धीरे से उठकर अपने पति के शव के पास पहुंचती है। ) तू भी भगवान् के पास जा रहा है । मैं रोऊँगी नहीं । मैं तेरा सफर खराब नहीं करूँगी । हँसता-हँसता जा। भगवन् तुझे गले लगाएंगे ।
    तेरे सैकडों संगी-साथी मौत की नींद सोए पडे हैं । वे भी तेरे साथ भगवान् के दरबार में जाएँगे। उनके घरवाले अभी भी उनकी राह देख रहे हैं। 
    तूने अपने लिए कभी कुछ नहीं माँगा । तू अपनी जान निछावर कर गया । मैं पापिन तुझे सारा वक्त उलाहने देती रही । तेरे साथ झगड़ती रही, पर मुझे क्या मालूम था, तू सचमुच चला जाएगा । (उसका माथा सहलाती हुई) मैं कहाँ लुट-पुट गई ? मैं तो चिर सुहागिन हूँ । जिसका घरवाला ऐसा शूरवीर हो । तू तो मेरा सूरमा पति है । तू तो नाचता-गाता हुआ घर आया करता था : मेरा रंग दे, मेरा रंग दे बसन्ती चोला ।
    -(इस पुस्तक से)
  • Swami Ram Tirath Ki Shreshtha Kahaniyan
    Jagnnath Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9140

    Availability: In stock

    स्वामी रामतीर्थ की श्रेष्ठ कहानियां जहाँ अत्यंत रूचि-मोहक है, वहां उसका दामन उज्ज्वल प्रेरणाओं और सुनहले शिक्षा-तत्वों से जगमगा रहा है तथा ह्रदय व मन को आलोकित किये देता है । 
    प्रत्येक कहानी के अंत में कुछ शब्दों द्वारा कहानी में निहित शिक्षा-तत्त्व का संकेत दिया  गया है । यही ऐसा न किया जाता, तो इन कहानियों एवं स्वामी जी के उद्देश्य से न्याय नहीं हो सकता था । स्वामी जी ने प्रत्येक कहानी का उद्भावना केवल इसीलिए किया था की उसके रोचक माध्यम से अपने श्रोताओं एवं पाठकों के निकट विषय की गंभीरता तथा दुरूहता बोधगम्य व सरल हो जाये और साथ ही साथ शिक्षा के तत्त्व भी उजागर हो उठें । 
  • Stri Srokaar
    Asha Rani Vhora
    125 113

    Item Code: #KGP-1343

    Availability: In stock

    ‘और ने जन्म दिया मरदों को, मरदों ने उसे बाजार दिया।’
    यहां बाजार का अर्थ सीमित था यानी वेश्या का कोठा। पर अब बाजार का अर्थ विस्तार पा गया है यानी उपभोक्ता बाजार में स्त्री या स्त्री का बाजार मूल्य। बदले समय में स्त्री अपनी भूमिका तलाशती कहां आ पहुंची है? ‘ग्लैमर’ के इस बाजार में खड़ी आज की स्त्री ने क्या पाया, क्या खोया। इसकी जांच-पड़ताल करनी होगी।
    -इसी पुस्तक से

    स्त्री की छवि हो या भूमिका, बात अधिकार की हो या सरोकार की, या दोनों के सामंजस्य से सफल, गर्वोन्नत जीवन जीने की। स्वतंत्रता कितनी सीमांत कहां? शोषण क्यों, उससे मुक्ति कैसे? स्त्री का सशक्तीकरण कैसे हो? मां के नाते पुरुष को संस्कारित कैसे करें? समाज की नियंता कैसे बनें? नई सदी को दी गई ‘महिला-युग’ की संज्ञा को साकार कैसे करें? आदि आधुनिक स्त्री के जीवन से जुड़े ऐसे ढेरों सवालों के उत्तर तलाशती और तनावमुक्त संतुलित जीवन के गुर सिखाती एक प्रेरक पुस्तक।
  • Kavi Ne Kaha : Manglesh Dabral (Paperback)
    Manglesh Dabral
    100

    Item Code: #KGP-1411

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: मंगलेश डबराल
    मुक्तिबोध और रघुवीर सहाय से अपनी सृजनात्मक प्रेरणा ग्रहण करती हुई हिंदी कविता की आज जो पीढ़ी उपस्थित है, उसमें मंगलेश डबराल जैसे समर्थ कवि इतने वैविध्यपूर्ण और बहुआयामी होते जा रहे हैं कि उनके किसी एक या चुनिंदा पहलुओं को पकड़कर बैठ जाना अपनी समझ और संवेदना की सीमाएं उघाड़कर रख देना होगा। एक ऐसे संसार और समय में जहां ज़िंदगी के हर हिस्से में किन्हीं भी शर्तों पर सफल हो लेने को ही सभ्यता का चरम आदर्श और लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया हो, मंगलेश अपनी कविताओं में ‘विफल’ या अलक्षित इंसान को उसके हाशिये से उठाकर बहस और उल्लेख के बीचोबीच लाते हैं। ऐसा नहीं है कि मंगलेश का कवि ‘सफलता’ के सामने कुंठित, ईषर्यालु अथवा आत्मदयाग्रस्त है, बल्कि उसने ‘कामयाबी’ के दोज़ख़ को देख लिया है और वह शैतान को अपनी आत्मा बेचने से इनकार करता है।
    मंगलेश की इन विचलित कर देने वाली कविताओं में गहरी, प्रतिबद्ध, अनुभूत करुणा है, जिसमें दैन्य, नैराश्य या पलायन कहीं नहीं है। करुणा, स्नेह, मानवीयता, प्रतिबद्धता--उसे आप किसी भी ऐसे नाम से पुकारें, लेकिन वही जज़्बा मंगलेश की कविता में अपने गांव, अंचल, वहां के लोगों, अपने कुटुंब और पैतृक घर और अंत में अपनी निजी गिरस्ती के अतीत और वर्तमान, स्मृतियों और स्वप्नों, आकांक्षाओं और वस्तुस्थितियों से ही उपजता है। उनकी सर्जना का पहला और ‘अंतिम प्रारूप’ वही है।
    आज की हिंदी कविता में मंगलेश डबराल की कलात्मक और नैतिक अद्वितीयता इस बात में भी है कि अपनी शीर्ष उपस्थिति और स्वीकृति के बावजूद उनकी आवाज़ में उन्हीं के ‘संगतकार’ की तरह एक हिचक है, अपने स्वर को ऊंचा न उठाने की कोशिश है, लेकिन हम जानते हैं वे ऐसे विरल सर्जक हैं जिनकी कविताओं में उनकी आवाज़ें भी बोलती-गूंजती हैं जिनकी आवाज़ों की सुनवाई कम होती है।
  • Jal Jo Jeevan Hai
    Harish Chandra Vyas
    300 270

    Item Code: #KGP-520

    Availability: In stock

    जल, जो जीवन है 
    विश्व-स्टार पर गहराते जल-संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्षा 2003 को 'अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ जल वर्ष' घोषित किया है । यही भारत सहित दुनिया के देशों ने अपना रवैया नहीं बदला तो जल विभिन्न देशों में तनाव और जबर्दस्त प्रतिद्वंद्विता का विषय बने बगैर नहीं रह सकता। अतः जल-संसाधनों के प्रति सचेत होने की परम आवश्यकता है । 'जल, जो जीवन है' का सर्जन लेखक ने दो प्रतिमानों को सामने रखकर किया है— प्रथम, जल-संकट की गंभीरता के बारे में जागरूकता में वृद्धि करना और द्वितीय इस समस्या के निदान व समाधान हेतु सर्जनात्मक सुझाव पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना। 
    प्रस्तुत पुस्तक में जल से संबंधित उभरते समस्त संकटों तथा उनके समाधान हेरु सरल भाषा में जानकारी प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया गया है। 
  • Vishnugupta Chanakya
    Virendra Kumar Gupt
    450 383

    Item Code: #KGP-1969

    Availability: In stock

    विष्णुगुप्त चाणक्य
    "वत्स यवन ! मैं सत्यान्वेषी अध्येता और अध्यापक हूँ। यही मेरी मूल वृत्ति और साधना है ।
    इसी सत्य-शोध की साधना के बीच अनायास ही चन्द्रगुप्त मुझे मिला, नंद-वंश के विनाश और नए साम्राज्य के निर्माण का संकल्प मुझे मिला; संकल्प की पूर्ति मिली और इस विशाल आर्य साम्राज्य का महामंत्रित्व मिला । पर सदैव ये सब मेरे लिए माध्यम ही रहे, सत्य ही लक्ष्य रहा ।"
    -(इसी उपन्यास से)
  • Saadat Hasan Manto Ki Kahaniyan
    Narendra Mohan
    490 441

    Item Code: #KGP-1953

    Availability: In stock


  • Ek Sur Mera-Ek Saarangi Ka
    Pandit Ram Narayan
    195 176

    Item Code: #KGP-2069

    Availability: In stock

    एक सुर मेरा-एक सारंगी का
    पंडित रामनारायण ऐसे पहले कलाकार हैं, जिनके माध्यम से सारंगी वाद्य का पुनर्जन्म हुआ, इस वाद्य को लंबे समय से खोई हुई अपनी सांस्कृतिक पहचान मिली ।
    सारंगी वाद्य को लेकर यदि इस महापुरुष की सही में किसी से तुलना की जा सकती है तो पाश्चात्य संगीत के महान् वॉयलिनवदक पागानीनी, जिन्होंने वॉयलिन की वादनशेली में आमूलचूल परिवर्तन कर नये सिरे से वादनशैली को स्थापित किया । दूसरे महान संगीतज्ञ रेस्ट्रो पस्वीज और तीसरे यहूदी मेनुहिन जैसे महारथी संगीतज्ञों से ही उनकी तुलना की जा सकती है । 
     यदि धनुर्वाद्य के इस महापंडित एवं आचार्य के बारे में  संक्षेप से कुछ कहा जाए तो उनकें वाद्य से जिस तरह की ध्वनि  (साउंड) संचारित हुई, वैसी आज तक किसी अन्य वादक के वाद्य में नहीं सुनी गई । गज के संचालन को लेकर सार्थक अनुसंधान करते हुए पंडित जी ने जो तकनीक विकसित की वो किसी अन्य वादक की क्षमता और कल्पना से बाहर की बात सिद्ध हुई । फिर आलाप की बात करें तो पंडित जी ने अपनी अद्भुत सोच से इसमें एक-एक स्वर का प्रयोग समझदारी के साथ करते हुए संपूर्ण आलाप में लय का समावेश करते हुए उसे नए ढंग से परिभाषित किया और विलक्षण जोड़ की परिकल्पना सारंगी जैसे वाद्य से साकार किया । पंडित जी ने जिस राग को छुआ, उसकी शुद्धता को कायम रखते हुए उसे नए आयाम दिए। इसके अतिरिक्त विलंबित 'गत' अथवा रचनाओं को बजाने का उन्होंने अपना अलग कौशल और इन रचनाओं से बजने वाले एक-एक 'बोल' का लय में कुशलता के साथ गुँथा होना, तानों की विविधता और उनमें विलक्षण द्रुतगति, जो आज तक न देखी, न सुनी गई और इस सब पर आत्मा को छू जाने वाले स्वरों जैसी कुछ चंद विशेषताओं ने उन्हें इस वाद्य का आचार्य एवं महापंडित बना दिया ।
  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Suraj Se Puchhen
    Neelam Kanvdia
    60 54

    Item Code: #KGP-9035

    Availability: In stock

    सूरज से पूछे
    रचना कब, क्यों, कहां, कैसे, कैसी जन्म लेती है,
    यह रचनाकार स्वयं भी नहीं जानता, न बता
    सकता है । लेकिन जीवन में कभी ऐसा पल, अवसर
    या प्रसंग आ जुटता है जो रचनारत करता है, तो
    कभी रचनाकर्म को एक नया आयाम,
    नए क्षितिज दे जाता है ।
    श्रीमती नीलम कावडिया के जीवन में ऐसा एक
    अवसर आया, रक्षाबंधन के दिन भानुजी के
    राखी बंधवाने के लिए घर आने पर ।
    राखी बाँधकर नीलमजी ने अपनी एक कविता
    भानुजी को सुनाई। उस पुरस्कृत कविता
    को सुनकर भानुजी गंभीर हो आए ।
    बाद को एक दिन वह प्रसंग उठाने पर भानुजी ने
    जो उत्तर दिया उसे सुनकर नीलमजी तत्काल
    तो मौन रह गई लेकिन वह मौन कहीं
    अंतरतम में बार-बार, लगातार गुंजित होता रहा,
    मथता रहा रचनाकार को,
    उनकी सोच, समझ और दृष्टि को ।
    अनंतर जब अंतरतम की वह गुँज बाहर मुखरित हुई
    तब सामने आई ये कविताएँ, जिन्होंने न केवल
    नीलमजी की दिशा ही बदल दी,
    साहित्य-जगत को मिली एक अनूठी काव्यकृति
    'सूरज से पूछें'। 
  • Kammi Or Nanda
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-7836

    Availability: In stock

    कम्मी और नन्दा
    नन्दा यूनिवर्सिटी की बाहरी दीवार के पास
    पहुँची ही थी कि उसने देखा कि दीवार
    के साथ  ढासना लगाकर खडी हुई एक
    औरत ने पैसे मांगने के लिए अपना हाथ
    आगे किया हुआ है—
    वह हाथ नन्दा की तरफ बढ़ता हुआ
    नन्दा की कमीज़ से छू गया... 
    नन्दा ने उस माँगने वाली औरत की तरफ
    देखा—उस औरत का चेहरा उजड़ा
    हुआ था, बाल खुश्क और माथे
    पर बिखरे हुए थे, सिर पर
    एक लीर-सा दुपट्टा थाµपर
    आँखों में एक अजीब सी चमक
    और हसरत थी-नक्श रुले हुए थे,
    बुरे नहीं थे—वह हाथ के नन्दा के
    आगे पसारकर-एकटक नन्दा के
    मुँह को देखे जा रही थी…
    नन्दा उकताई-सी तेज कदमों से घर
    जाने वाली बस क्रो तरफ़ चल दी ।
    लेकिन बस के पायदान पर
    एक पॉव रखा ही था कि
    अचानक नन्दा को खयाल आया—
    'कौन जाने यह माँगने वाली
    औरत ही मेरी माँ हो...'
    -नन्दा का एक सपना
  • Na Dainyam Na Palaynam (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    60

    Item Code: #KGP-1428

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Yadav (Paperback)
    Rajendra Yadav
    100

    Item Code: #KGP-1264

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र यादव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र यादव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिंहवाहिनी', 'मैं तुन्हें मार दूँगा', 'वहाँ तक पहुँचने की दौड़', 'रोशनी कहीं है?', 'संबंध', 'सीज फायर', 'मेहमान', 'एक कटी हुई कहानी', 'छोटे-छोटे ताजमहल' तथा 'तलवार पंचहजारी'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Raag Viraag
    Shree Lal Shukla
    150 135

    Item Code: #KGP-42

    Availability: In stock


  • Hamare Aadarsh Mahapurush
    Nirankar Dev Sewak
    40

    Item Code: #KGP-948

    Availability: In stock


  • Naya Vidhaan
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-633

    Availability: In stock


  • Maut Kyoun Raat Bhar Nahin Aati
    Pratap Sehgal
    50 45

    Item Code: #KGP-1815

    Availability: In stock

    मौत क्यों रात भर नहीं आती
    'मौत क्यों रात भर नहीं आती' की शुरुआत तो एक यथार्थवादी नाटक की तरह से होती है, लेकिन ज्यों-ज्यों यह आगे बढ़ता है, एक 'फार्स' की शक्ल अख्तियार कर लेता है । अपने पूरे घटनाक्रम में नाटक मध्य- वर्गीय मानसिकता एवं मूल्यों पर हलकी-हलकी चोट करता चलता है ।
    इस नाटक की दिलचस्प बात इसके दो अंत है । किसी भी घटनाक्रम का एक ही अंत हो सकता है, लेकिन संभावना के स्तर पर नाटककार कई तरह के 'अंत' सोच सकता है । यह भी एक तरह से 'फार्स' ही तो है । नाटक की भाषा धुर सिरे से धुर सिरे तक बोलचाल की ही भाषा है ।
    विभिन्न रंग-मंडलियों ने इसे अपने-जपने तरीके से खेला है, जिससे साफ जाहिर होता है कि इसमें खेले जाने की अनंत राहें मौजूद है ।
    हिंदी के प्रतिष्ठित नाटककार प्रताप सहगल का यह नाटक उनके लिए, जो खेलने के लिए किसी नाटक की तलाश में है ।
  • Shakti Se Shanti
    Atal Bihari Vajpayee
    300 270

    Item Code: #KGP-9021

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति

    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।

    जाइए, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।

    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें तुम पर नाज है, हमें तुम पर गर्व है । [इसी पुस्तक से]
  • Papa, Muskuraiye Na! (Paperback)
    Prahlad Shree Mali
    100

    Item Code: #KGP-1486

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    -इसी पुस्तक से
  • Insaani Nasl
    Nasera Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-800

    Availability: In stock

    इनसानी नस्ल
    इस संग्रह की सभी कहानियाँ बड़ी सादगी से जीवन के यथार्थ को सामने रखती हैं। अंतर्धारा में एक आग्रह अवश्य महसूस होता है कि इनसान ने अपने ‘स्वयं’ को जीना छोड़ दिया है। वह अपने अंदर यात्रा करने की जगह बाहर की भौतिक दुनिया के कोलाहल में भटकता जा रहा है, जो उसकी सारी सहजता को ख़त्म कर उससे सुख के सारे क्षण छीनता जा रहा है। कभी-कभी ऐसा भी संकेत मिलता है कि वह पाषाण युग की प्रवृत्तियों की तरफ़ अकारण बढ़ रहा है, जो सारी उपलब्धियों के बावजूद उसको वह ‘चैन’ नहीं दे पा रही हैं, जिसका वह सही हक़दार है। आखि़र यह इनसानी नस्ल, जो एक-दूसरे की उत्पत्ति की सिलसिलेवार कड़ी है, वह वास्तव में चाहती क्या है ? एक-दूसरे से हाथ मिला मानव-शृंखला को मज़बूत बनाना या फिर एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर अलगाव की भूमिका निभाना ? यह अलगाव हमें सभ्यता के किस मोड़ पर ले जाएगा ? अलगाव की इस मानसिकता से मुक्त होकर इनसान एक नए युग का सूत्रपात क्यों नहीं कर सकता ? क्या वह आने वाली नस्ल की ख़ातिर जीवन से निरंतर ग़ायब होते जा रहे ‘चैन’ को पाने के लिए कुछ नहीं करेगा ? क्या वह अपने अंदर की यात्रा कर इनसानियत के आलोकित क्षितिजों को छूना नहीं चाहेगा ? इन्हीं सवालों से जूझती ये कहानियाँ आज के इनसान के दिल व दिमाग़ की टकराहट की साक्षी हैं, जो अनेक बुनियादी सवालों से साक्षात्कार करती नज़र आती हैं।
  • Sikha Acharshastra
    Satayendra Pal Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-453

    Availability: In stock

    सिख गुरु साहिबान ने मानवता पर सबसे बड़ा परोपकार किया धर्म को धीर-गंभीर शब्दों के इंद्रजाल और कर्मकांडों के भंवर से मुक्त करके। उन्होंने कहा कि ऐसा पांडित्य और विद्वत्ता व्यर्थ है, खच्चर पर लदे भार व कुंचर स्नान की तरह, यदि इंद्रियां वश में नहीं और आचरण शुद्ध-पवित्र नहीं। इसका एक मात्र उपाय है परमात्मा की शरण में उसकी कृपा प्राप्ति जिससे मन ज्ञान के सूर्य से उद्दीप्त हो उठे। धर्मानुकूल आचार के लिए मन पर सतिगुरु ज्ञान का अंकुश आवश्यक है। सार्थक-सफल जीवन योग्य ज्ञान-चक्षु प्राप्त करने की जो राह सिख गुरु साहिबान ने दिखाई उस ओर ले चलने का संपुष्ट प्रयास है यह पुस्तक जिससे सभी वैयक्तिक व सामाजिक प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं।
  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen Kuchh Purush
    Khushwant Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-1881

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Mere Saakshatkaar : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    215 194

    Item Code: #KGP-538

    Availability: In stock


  • Ghanta
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    160 144

    Item Code: #KGP-425

    Availability: In stock


  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan
    Sudha Arora
    400 360

    Item Code: #KGP-909

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है।
  • Aacharya Chanakya
    Vishv Nath Gupta
    160 144

    Item Code: #KGP-251

    Availability: In stock


  • Ek Asamapta Katha
    Rama Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-447

    Availability: In stock

    उपन्यास लिखते हुए कभी-कभी लगता था जैसे पात्रों के साथ मैं भी उन बीहड़ों में भटक रही हूं। कई एक सवाल थे जो मुझे कोंचते रहे। सबसे बड़ा सवाल कि ये विचारधारा मेरी समझ से परे लगी, जहां एक ओर गरीबों, बेसहारा और दलितों की आवाज बनकर नक्सली आंदोलन अस्तित्व में आया, वहीं निर्दोष अमीरों के खून से ही नहीं, गरीबों के खून से भी जमीन लाल होती रही। तभी कानू सान्याल नक्सल आंदोलन के जन्मदाता के निधन से एक बहुत बड़ा जन-समुदाय शोक-संतप्त था। उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़ी भीड़ को पढ़कर, सुनकर, देखकर मैं चकित रह गई। उन शोक-संतप्त लोगों की भीड़ को मैं पहचानना चाह रही थी...कानू सान्याल ने इनके लिए क्या किया था? क्या बीज-मंत्रा दिया था कि आज भी उनकी सोच में, उनके आचार-विचार में वह सब ध्वनित होता दिख रहा है।
    कुछ तो नक्सली आंदोलन में ऐसा रहा होगा कि आज भी उस लहर का असर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। मेरे खयाल में अभावों की पराकाष्ठा, दूभर होती दिनचर्या के आक्रोश की आवाज एक ही होती है। वह कुछ कर गुजरने के आगे के औचित्य नहीं देखती है। ऐसे लोगों को कानू सान्याल या फिर चारु मजुमदार ने क्रांति का जो बीज-मंत्रा दिया होगा, वह उनकी दुखती रग पर हाथ रखने जैसा ही रहा होगा और राहत की उसी धुन में वे आगे बढ़ते गए। फिर तो बीहड़ों से वापस आना कहां संभव हो पाता है? मुझे मेरे सवाल का जवाब मिल गया था।
    -लेखिका
  • Nirogyogsadhna (Paperback)
    Manoj Kumar Chaturvedi
    180

    Item Code: #KGP-7070

    Availability: In stock

    निरोगयोगसाधना
    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं और दिन-रात उसके लिए प्रयास करते रहते हैं। इस आपाधापी में व्यक्ति सबसे अहम चीज को जो नकार देता है वह है ‘स्वयं का स्वास्थ्य’। वह यह नहीं समझते कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु तभी आपके लिए उपयोगी होगी जब आप उसका आनंद लेने के लिए तैयार होंगे। व्यक्ति यदि स्वस्थ नहीं तो संसार की कीमती से कीमती वस्तु भी उसके लिए बेकार है। स्वस्थ जीवन है तो जहान है। 
    योग द्वारा कैसे व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से संपूर्णतया स्वस्थ रह सकता है, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन इस ‘निरोगयोगसाधना’ नामक पुस्तक के माध्यम से किया गया है।
    योग दर्शनशास्त्र में वर्णित सूत्र षड्दर्शन का ही छठा अंग है। ये षड्दर्शन वेदों के उपांग माने गए हैं। इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निशक्त, छंद, ज्योतिष आदि वेदों के अंग कहलाते हैं जिनके द्वारा वेद मंत्रों के अर्थ का ज्ञान होता है।
    योग ऐसी कला है जो प्रकृति और मनुष्य के बीच के अंतर को स्पष्ट कर व्यक्ति के समक्ष प्रस्तुत करती है। अर्थात् व्यक्ति योग के माध्यम से इंद्रियों को अपने वश में करने लायक बन जाता है और माया के बंधन से भी स्वयं को तोड़कर मुक्त हो जाता है। योग अनादिकाल से चला आ रहा है और इसकी उपयोगिता व्यक्ति तभी समझ सकता है जब वह योग को स्वयं पर लागू करे, उसमें रम जाए। योग करने वाला व्यक्ति कभी बूढ़ा या बीमारी से ग्रसित नहीं होता।
    —भूमिका से
  • Baat Meri Kavita
    Trilochan
    325 293

    Item Code: #KGP-1907

    Availability: In stock

    बात मेरी कविता
    त्रिलोचन भले बोलते न दिख रहे हों, उनकी कविता बोल रही है और बोलती रहेगी--इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता।
    ऐसे सैकड़ों शब्द हैं, जिनका आधुनिक कविता में प्रयोग त्रिलोचन के अलावा किसी ने नहीं किया। हिंदी कविता इसलिए भी उनके प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेगी कि एक ऐसे युग में, जिसमें कविता की शब्द-संपदा लगातार घटती गई है, वह उन बिरलों में से थे, जो इस संपदा में कुछ नया बराबर जोड़ते रहे और इस तरह हिंदी की प्राणधारा को पूर्णतया बनाए रखने की चेष्टा की।
    यह निरी भाषिक विविधता का मामला नहीं है। यह विविधता आती ही है जीवन की उस सहज विपुलता से, जिसके त्रिलोचन एक लगभग ज़िद्दी कवि हैं।
    --अशोक वाजपेयी
    ० 
    त्रिलोचन की कविता में आवेगों की रास तनी रहती है। वह उसे उन्मुक्त नहीं छोड़ते। कविता का स्वर सधा हुआ है। पिच बहुत ऊपर-नीचे नहीं जाता। रोमैंटिक कविता से बने पाठकीय संस्कार के साथ त्रिलोचन की कविता के करीब आना इसलिए कई बार बहुत कठिन होता है। उसे पढ़ने के लिए एक अभ्यास और कविता का एक अलग संस्कार चाहिए। उसमें एक क्लासिकीय काव्य-संयम है। --राजेश जोशी
  • TORO KARA TORO : PRASAR (6TH PART)
    Narendra Kohli
    560 504

    Item Code: #KGP-668

    Availability: In stock


  • Aids : Kya? Kyon? Kaise? (Paperback)
    Kanval Nayan Kapoor
    50

    Item Code: #KGP-7104

    Availability: In stock


  • Kabir Ka Samagra Anbhai Sansar (1st Part)
    Govind Rajnish
    1000 900

    Item Code: #KGP-689

    Availability: In stock

    संत कबीर भारतीय चेतना का ऐसा शिखर है जिसके सम्मुख शब्द और शब्दातीत नतमस्तक होते हैं। उनकी बानी ‘अनहद का अनुभव’ है। ऐसा अनुभव; जिसमें जीव, जगत् और परमात्मा की सघन अभिव्यक्ति है। कबीर की बानी साखी, सबद, रमैनी के अंतर्गत रखकर पढ़ने व विश्लेषित करने की सुदीर्घ परंपरा है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ में मर्मज्ञ आलोचक प्रो. गोविंद रजनीश ने इस परंपरा को संवधिर्त किया है।
    कबीर-काव्य के तीन स्रोत हैं—राजस्थानी, पंजाबी और पूरबी की प्राचीन पांडुलिपियाँ। इनके तुलनात्मक विवेचन द्वारा मूल व प्रामाणिक पाठ तक पैठने का यत्न किया गया है। कबीर के नाम से प्रचलित ‘बानियों’ और ‘क्षेपकों’ का तार्किक परीक्षण किया गया है। इससे कबीर-काव्य का आस्वाद दुगुना हो गया, ऐसा पाठक महसूस करेंगे।
    प्रो. रजनीश ने भावार्थ, पाठांतर और टिप्पणी के द्वारा कबीर के अनेक आयामों को उद्घाटित किया है। कबीर लोक में समाए संत-कवि हैं। उनसे संबंधित बहुतेरे तथ्य दंतकथाओं, जनश्रुतियों और अन्य शब्द-प्रपंच में ओझल होते रहे हैं। यहाँ एक प्रयास यह भी है कि ‘चिनगी’ को ‘राख’ से निकाल लिया जाए। तभी यह सिद्ध हो सका कि कबीर-काव्य समकालीन संदर्भों में एक नयी प्रासंगिकता अर्जित कर रहा है। झूठ, कपट, पाखंड के खिलाफ सदियों पहले गूँजे शब्द आज भी चुनौती और चेतावनी दे रहे हैं।
    ‘संसकिरत है कूप जल भाखा बहता नीर’ ऐसा कहने वाले कबीर की अंतरात्मा को थाहना बेहद कठिन रहा है। ‘ढाई आखर’ के बल पर पंडिताई को ललकारने वाले कालजयी कबीर के प्रामाणिक पाठ को अर्थ-विस्तार से पढ़कर पाठक निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे। शोध्कर्ताओं से लेकर प्रबुद्ध पाठकों तक समानरूपेण उपयोगी। मानव जीवन के उन्नयन व परिष्कार के साथ भक्ति और अध्यात्म की रश्मियाँ बिखेरती कबीर बानी को विद्वान् लेखक ने ‘पुनः पाठ की सार्थकता’ प्रदान की है। ‘कबीर का समग्र अनभै संसार’ वस्तुतः अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
  • Dharti Hai Balidaan Ki
    Shanta Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9139

    Availability: In stock

    भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेता तथा केंद्रीय मंत्री शान्ता कुमार जी राजनीति के क्षेत्र में जितने सक्रिय रहे हैं, साहित्य-लेखन के क्षेत्र में भी उससे कम सक्रिय नहीं रहे हैं।
    राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की गतिविधियों का उन्होंने बारीकी से अध्ययन किया है और इस संघर्ष में भारतमाता के जिन वीर सपूतों ने अपना बलिदान दिया है उनकी यशोगाथा को उन्होंने इस पुस्तक में बड़ी सूझबूझ से प्रस्तुत भी किया है।
    उनकी भाषा सहज और विवरण प्रेरणाप्रद हैं। कई ऐसे अछूते प्रसंग भी शान्ता कुमार जी ने इस पुस्तक में तटस्थ भाव से लेखनीबद्ध किए हैं जिनकी सामान्य भारतवासियां को बहुत कम जानकारी है।
  • Toro Kara Toro-2 (Sadhna)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-763

    Availability: In stock


  • Mera Sangharsh : Hitler Ki Aatmakatha
    Ramchandra Verma Shastri
    450 405

    Item Code: #KGP-2016

    Availability: In stock

    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा)
    हिटलर की आत्मकथा को हिन्दी में प्रकाशित करने का उद्देश्य उसके उन दोषों को प्रकाशित करना नहीं है, जिनके कारण वह काफी बदनाम हुआ ।  उसकी बदनामी के तीन मुख्य कारण थे--फासिस्टवादी विचारधारा, जातीयतावाद और युद्ध की मानसिकता । इन्हें तीन कारणों से उसे विश्व-मानवता का शत्रु समझा जाता है । किन्तु उसकी राष्ट्रवादी मनोवृति एक ऐसा तत्त्व या, जिसने उसके चरित्र को काफी ऊँचा उठाया।  इसी उम्र राष्ट्रवादी प्रवाह की लपेट में वह दूसरे दोषों का भी शिकार हो गया । यह आत्मकथा उसकी राष्ट्रवाद की इसी भावना को उजागर करती है।  राष्ट्रवाद से अभिप्राय जातीय संकीर्णता नहीं है, बल्कि मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा और असीम गौरव का नाम ही सच्चा राष्ट्रवाद है ।
    अपने देश से प्रेम, उसके प्रति निष्ठा, देशवासी होने का स्वाभिमान, देश के लिए बलिदान की भावना तथा राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की चाह जैसे गुणों की हमारे देश को आज कितनी जरूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं । इसका जीता-जागता उदाहरण हमें हिटलर की प्रस्तुत आत्मकथा में पढ़ने को मिलता है ।
    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा) को हिन्दी में प्रकाशित करने के पीछे हमारा परम उद्देश्य यही है कि इसके अध्ययन-मनन से देशवासियों में सच्चे राष्ट्रवाद की भावना का जन्म हो ।
    हिटलर की इस पुस्तक 'मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्पकथा)' में ऐसे अनेक सन्दर्भ मिलते हैं, जिनसे राजनीति के स्वरूप, राजनीतिज्ञों के आचरण, संसद की भूमिका, शिक्षा के महत्त्व, श्रमिकों एवं साधारण जनमानस की मानसिकता, नौकरशाही, भाग्य एवं प्रकृति, मानवीय मूल्यों और सबसे बढ़कर राष्ट्रीय भावना की महानता आदि का बोध होता है ।
    इस पुस्तक का एक उद्देश्य 'चेतना' है तो उसके साथ-साथ इसका दूसरा उद्देश्य 'चेतावनी' भी है । स्वतन्त्र भारत के युवा वर्ग में राष्ट्रप्रेम की चेतना पैदा करना है । भारतीय समाज में बढ़ रही राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक बुराइयों, राजनीतिक दलों की बढती संख्या, क्रुछ राजनीतिज्ञों में बढ़ता निहित स्वार्थ देश-सेवा के नाम पर परिवार सेवा की प्रवृत्ति, सार्वजनिक जीवन में फैलता भ्रष्टाचार, जैसे-तैसे धन बटोरने की निरन्तर बढती लालसा, धर्म, जाति और भाषा के नाम पर होने वाली व्यापक हिंसा और काम से जी चुराने की मानसिकता आदि कुछ ऐसी बुराइयाँ है, जो समकालीन भारतीय समाज को खोखला कर रहीं हैं। इन्हें रोकने चेतावनी देना इस पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य है । यदि समय रहते इन बुराइयों को न रोका जाता तो 'हिटलर' के पैदा होने की संभावनाएँ बढ़ जाती है । ऐसा हिटलर, जो सम्पूर्ण प्रजातंत्रीय व्यवस्था को उखाड़ फेंके । बुराई को बताना भी बुराई से बचने की प्रेरणा देने का एक माध्यम है । इस रूप में यह पुस्तक हमारे विशाल टेश को चेतावनी देकर उसमें चेतना लाने का प्रयास है।
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-7110

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Shiv Prasad Singh
    Shiv Prasad Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2024

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : शिवप्रसाद सिंह
    शिवप्रसाद सिंह स्वीकार करते हैं कि "मैं भाव और रूप को अपनी क्षमता पर बाँध सकने की कोशिश में कुछ भी उठा नहीं रखता । उनका यह भी मानना है कि सत्य तो साक्षात् देखा होने पर भी भाषा की गुंजलक में अँट नहीं पाता । अधूरे सपने पूरे मानसिक ताप में जब पिघलते हैं तो सही क्षण पहचानकर उन्हें भी में डालना, शीतल करना और फिर बाहर निकालकर चमक दे देना कलाकार की तपस्या है । उसकी डाई (साँचा) विश्व के किसी भी अन्य कथाकार-रचनाकार से मेल नहीं खाती, न तो कहीं से कोई सादृश्य ही रखती है, यहीं वैयक्तिक स्वतन्त्रता रचनाकार की निजी धरोहर और यही उसके मन की प्रतिबद्धता भी ।
    साक्षात्कारों में अक्सर प्रस्तुतकर्ता की अपनी समझ रूपायित होती है, पर जो पाठक प्रश्न के साथ जुड़े हो उन्हें उत्तर से भी जुड़ना लाजिम नही है । शिवप्रसाद सिंह कहते है कि प्रेमबंधन को चटकाकर तोड़ने पर गाँठ पड़ना अनिवार्य है । जुड़ना बिना ग्रंथि के संभव नहीं होता, पर इससे धीरे-धीरे धागा छोटा होता रहता है । उसे अगर पहली स्थिति में लाना हो तो गांठें खोलिए और तब वह धागा वस्तु-जगत को प्रेम की डोर से बाँध लेगा ।
    यह नई पुस्तक साक्षात्कारों पर केंद्रित है जिसमें उनके समवयस्क या नई पीढी, समकालीन पीढी से जुड़े रचनाकारों, पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर है । शायद इनमें से कोई प्रश्न आपका भी हो, तो उत्तर पर सोचिए--
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao (Paperback)
    Rajendra Rao
    150

    Item Code: #KGP-503

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र राव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लोकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट','छिन्नमस्ता' 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bayaan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-684

    Availability: In stock


  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta (Paperback)
    Dr. Kripa Shanker Singh
    240

    Item Code: #KGP-7087

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Vish Vansh (Paperback)
    Rajesh Jain
    25

    Item Code: #KGP-1503

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।
  • Hashiye Ka Raag (Paperback)
    Sushil Sidharth
    150

    Item Code: #KGP-7185

    Availability: In stock


  • Dr. Siddharth
    Kavita Surabhi
    260 234

    Item Code: #KGP-1950

    Availability: In stock

    डॉ० सिद्धार्थ
    'डॉ० सिद्धार्थ' लेखिका का पहला उपन्यास है। उनकी दृढ मान्यता है कि जहाँ समाज में विडंबनाएं, विसंगतियां, अपराध, पीडा, विकृतियाँ और भोगवादी  राक्षसी अपसंस्कृति है, वहीं डॉ० सिद्धार्थ जैसी निर्मापाधर्मा शक्तियां भी हैं। सच्चे, निर्मल और सात्यिक जीवन में बहुत आकर्षण है; किंतु उसे अंगीकार करने का मूल्य असाधारण है । अत: एक शाश्वत प्रश्न हमारे सामने है कि क्या कोई व्यक्ति धर्म की राह पर चलकर भी सामाजिक दृष्टि से सफल हो सकता है ?
    शिष्या  के रूप से दामिनी, अपने गुरु के स्नेह का सुख पाती हे। समय के साथ डॉ० सिद्धार्थ की बौद्धिकता, उसकी प्रतिभा को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी सँवारती है । वह समझ पाती है कि चमक और दिव्यता में अंतर होता है । लौकिक सफलताओं की चमक हमारी आँखों को चौंधियाती है और आत्मिक विकास हमें दिव्यता से भर देता है। अध्यापक की बुद्धि से उच्च है उसका विवेक, और विवेक से उच्चतर  है उसका आचरण । आचार्य वही है, जो आचरण को शुद्ध ही नहीं दिव्य भी कर दे । डॉ. सिद्धार्थ का चरित्र इन सिद्धांतों का मूर्तिमंत रूप है ।
  • Raahi Ko Samjhaye Kaun
    Bal Swaroop Raahi
    130 117

    Item Code: #KGP-523

    Availability: In stock

    बालस्वरूप राही हिंदी ग़ज़ल और गीत के एक ऐसे पुख्ताकलम रचनाकार हैं जिन्होंने गत पचास वर्षों में अपनी रचनाओं द्वारा जहाँ एक ओर हिंदी ग़ज़ल और गीत को स्तर, प्रतिष्ठा और एतबार बख्शा है, वहीं दूसरी ओर इन्होंने हिंदी के छंद-काव्य को ऐसे समय में समृद्ध करने का कार्य किया है जब वह विभिन्न काव्यांदोलनों के चलते अपनी साख खोने लगा था। स्पष्ट है कि ये दोनों कार्य अपना विशेष महत्व रखते हैं ।
    राही ने पीर, नजीर, गालिब और इकबाल का कलाम पढा है और इन शायरों के बेशुमार अशआर उन्हें कंठस्थ हैं, जिनका प्रयोग वह उचित मौकों पर करते हैं । लेकिन यदि हम राही की शायरी पर इनमें से किसी का प्रभाव तलाश करने का प्रयास करें तो सफलता मिलनी मुमकिन नहीं।  यही कारण है कि राही की गज़लें उनकी अपनी भाषा, शैली और सोच की मज़हर हैं ।
    उसकी ग़ज़लें उर्दू ग़ज़ल की परंपरा से अलग एक नई परंपरा की स्थापना करती नजर जाती हैं । निसंस्देह यह एक नई परंपरा है ।
    राही की गज़लें हिंदी साहित्य में एक खुशगवार इजाफे की हैसियत और विशेष महत्व रखती हैं ।

  • Kama Sutra (Paperback)
    Vatsyayana
    99

    Item Code: #KGP-1100

    Availability: In stock

    It is one of the three goals of Hindu life. It is what the west called ‘erotica’. It is the one we consider sacred. It is Kama. And this is its manual—The Kama Sutra.
    A compilation of seven books, starting with the description of general principles of mortal life that Brahma laid down when he created men and women—dharma (fulfillment of duty), artha (accumulation of wealth), and kama (pleasurable experience of the five senses, to moving forward about the ‘right’ way of life where it talks about many issues including the behaviour and actions during copulation between a man and a woman. A 4th century guide to a virtuous and gracious living, still valid in the 21 century and beyond.    
    Vatsyayana unbashingly talks scientifically and spiritually about what is a taboo today, and emphasises that this book is a must for both men and women. It lays more stress on the fact that women, especially, should be knowledgeable in the arts complimentary to Kama Sutra
    The physical beauty of Khajuraho is the manifestation of the beauty trapped in this book, which the west unknowingly calls the ‘manual of sex’. 
    Discover the knowledge of the gods translated for the mortals by the mortals.
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    1200 1080

    Item Code: #KGP-607

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खण्डों में)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है।
  • Mere Saakshatkaar : Amrit Lal Nagar
    Amritlal Nagar
    490 417

    Item Code: #KGP-478

    Availability: In stock


  • Shishu Seekhen Achchhi Baaten-1
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1116

    Availability: In stock


  • Vish Vansh
    Rajesh Jain
    40 36

    Item Code: #KGP-1916

    Availability: In stock