Filter selection

Author
Price

Books

  • grid
  • Kavi Ne Kaha : Vijendra (Paperback)
    Vijendra
    120

    Item Code: #KGP-7022

    Availability: In stock


  • Dushyant Kumar Rachanavali (Four Vols.)
    Vijay Bahadur Singh
    2250 2025

    Item Code: #KGP-834

    Availability: In stock

    Complete Set of 4 Volumes.
  • Is Jantantra Mein
    Prabhakar Shrotiya
    980 882

    Item Code: #KGP-645

    Availability: In stock

    यह पुस्तक हमारी दुनिया के लोकतंत्र की अनेक विसंगतियों का बारीक रूपायन करती है। आज जब अनेक देशों में अखबारों का मुंह तक बंद करा दिया जाता है, आंग सान सूकी जैसी बड़ी नेता और कार्यकर्ता जेल की अनावश्यक और थोपी हुई सजा काटने को विवश होती हैं तो श्रोत्रिय जी के ये लेख बड़े प्रासंगिक लगते हैं।
    यह पुस्तक पिछले कुछ वर्षों की नहीं, बल्कि पिछली कुछ शताब्दियों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक लकीरों की पड़ताल करती है...
    –प्रांजल धर 
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 4
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-267

    Availability: In stock

    नैतिक शिक्षा का प्रत्यक्ष पाठ बचपन में माता-पिता से तथा विद्यालयों में गुरुजनों के सान्निध्य में बैठकर मिलता है । धीरे-धीरे समझ विकसित होने पर धर्म और संस्कृति द्धारा भी हमें नैतिक शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष स्वाध्याय के माध्यम से सीखने को मिलता है । फिर समाज और राष्ट्र के लिए किए गए सेवा-कार्यों के लिए समर्पण के प्रति हमारे मन में जो भावना निरंतर उठती रहती है, उससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी नैतिक शिक्षा के संबंध में धारणा कितनी व्यावहारिक है।
    माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति बढ़ती अश्रद्धा, वैज्ञानिक दुष्टिकोण
    के नाम पर धर्म एव संस्कृति के प्रति घटती निष्ठा ने नैतिक शिक्षा को
    विवादों के घेरे में ला दिया है। सरकार द्वारा पाठयक्रम में भले ही उसे
    पढाने का संकेत दिया जाता रहा है, किन्तु ऐसे कितने शिक्षक एवं
    विधालय है जो इसके प्रति गंभीर हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज एवं
    राष्ट्र में बढ़ती चोरी, लूटमारी, बेईमानी, हिंसा और भ्रष्टाचार के रूप में
    दिखाई देने लगा है।
    घर में माता-पिता को समयाभाव के कारण नैतिक शिक्षा का पाठ पढाने का समय भी नहीं मिलता । अत: विद्यालयों को ही इसका दायित्व संभालना होगा । यह ठीक है कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन एवं परीक्षा- कार्यों की अधिकता के कारण समयाभाव रहता है, किन्तु तीन स्तरों पर यह संभव है…एक तो विषयों के पठन-पाठन के अंतर्गत ही जो नैतिक संदर्भ आते है, उन प्रसंगों का सदुपयोग कर, दूसरे, नैतिक शिक्षा के अन्य कार्यक्रम बनाकर, जैसे-प्रार्थना, पुस्तकालय, पत्रिका, संग्रह-पुस्तिका, दुश्य-श्रव्य सामग्री तथा दिनचर्या आदि सभी माध्यमों का प्रयोग करने का वातावरण  बनाकर।  तीसरे, विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में ऐसे अवसर प्रदान कर जिससे बालको में नैतिक विचारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगे ।
  • Preeti Katha
    Narendra Kohli
    120 108

    Item Code: #KGP-2052

    Availability: In stock

    प्रीति-कथा 
    नरेन्द्र कोहली की प्रत्येक नई कृति उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक नया आयाम उदघाटित करती है । जब तक पाठक उन्हें किसी एक वर्ग अथवा धारा से जोड़कर, किसी एक घेरे  में घेरकर, देखने का अभ्यस्त होने लगता है, तब तक वे उन घेरों को तोड़कर आगे बढ जाते हैं और कुछ नया तथा मौलिक लिखने लगते है । सृज़नधर्मा व्यक्ति प्रयोग और वैविध्य की चुनौती को स्वीकार करता ही है ।
    प्रीति-कथा नरेन्द्र कोहली का नया उपन्यास है । यह एक प्रेम-कथा है । नरेन्द्र कोहली ने  प्रेम-कथा  लिखी है, यह सूचना कुछ लोगों के लिए विस्मयकारिणी भी हो सकती है; किन्तु अधिक विस्मयकारी तथ्य तो यह है कि यह प्रेमाख्यानक उपन्यास, जीवन के कुछ मूलभूत सत्यों का स्वरूप स्पष्ट करता है । कुछ लोग इसे चिंतन-प्रधान ही नहीं, दार्शनिक उपन्यास भी कहना चाहेंगे । प्रेम का विश्लेषण करते-करते ही, मनुष्य अपनी प्रकृति और ईश्वर के स्वरूप तक को पहचान पाया है । किसी भी वर्ग में रखें, किन्तु है यह उपन्यास ही, पहले से भिन्न, नया, ताजा और आकर्षक ।
  • Jhansi Ki Rani
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1821

    Availability: In stock

    जयवर्धन का 'झाँसी की रानी' नाटक इसी क्रम की एक कड़ी है । यह सही है कि उन्होंने उस लडाई की सबसे ज्यादा परिचित और रेखांकित नायिका महारानी लक्ष्मीबाई को अपने नाटक के केंद्र में रखा है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उस अल्पज्ञात इतिहास को भी पुनर्रचना करने की कोशिश की हैं, जो लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर युवा होने तक का इतिहास है । नाटक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि रचनाकार ने गीत-संगीत  अथवा सूत्रधार जैसी किसी भी बार-बार आजमायी हुई नाटकीय युक्ति का प्रयोग नहीं किया, उन्होंने फॉर्म अथवा शैली के स्तर पर यथार्थवादी शैली का चुनाव किया है और उसमें बहुत ही सरल और सहज तरीके से कथा को विकसित करते चले गए हैं।
  • Shabd Ka Uday : Vikas Evam Anuprayog
    Dayanand Pant
    250 213

    Item Code: #KGP-1286

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तिका भारत में वैज्ञानिक शब्दावली-विकास के अभियान से संबद्ध है। इसमें शब्द-चर्चा के अतिरिक्त अभियान के मुख्य उद्देश्य अर्थात् वैज्ञानिक वाड्मय का सृजन, अविज्ञान-शिक्षा का माध्यम आदि पर भी सार्थक चर्चा है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जोर पकड़ता अभियान पूर्णरूपेण सफलता को प्राप्त नहीं हो सका क्योंकि माध्यम परिवर्तन में शिक्षक ही बाधक हो गए और अपनी भाषा के माध्यम से उच्चतर शिक्षा देने वाले एशियाई देशों-जापान, चीन, कोरिया की विलक्षण वैज्ञानिक प्रगति से हम सीख नहीं ले पाए।
    लेखक ने निष्पक्ष रूप से शब्दावली अभियान के चरणों और गुण-दोषों का विवेचन किया है। साथ ही, दो बातों पर रोना रोया है जो हैं (1) शब्दावली-निर्माण में भाषा-प्रेमियों ने लगन और उत्साह से काम तो किया, पर अंग्रेजी समर्थकों की चाल को न समझकर उनकी ही धुन में नाचते रहे और (2) आज का भारतीय भाषा लेखक अंग्रेजी में सोचकर अपनी भाषा में लिख रहा है जिस कारण मुहावरे का सहज विकास अवरुद्ध हो गया है और भाषा की बोध-गम्यता कम होती जा रही है।
  • Koorha Kabaarha
    Ajeet Kaur
    220 198

    Item Code: #KGP-2058

    Availability: In stock

    कूड़ा-कबाड़ा
    इतनी भयानक दूट-फूट में से, इतनी नकारा, बेकार, बेवकूफ़ और डरी-सहमी औरत में से कैसे और कब एक निडर, बेखौफ, अपने जीवन के सभी फैसले खुद लेने की हिम्मत और हौसला करने वाली औरत पैदा हो गई, इसी ट्रांसफॉर्मेशन यानी काया- कल्प की दास्तान सुनाना चाहती हूँ आप सबको ।
    औरत, जिसे हमेशा कूड़ा-कबाड़ा समझा जाता है ।
    औरत, जो खुद भी अपने आपको  कूड़ा-कबाड़ा समझती रहती है उम्र-भर । क्योंकि यही समझकर ही तो जीवन से, जीवन की तमाम कड़वाहटों से समझौता किया जा सख्या है ।
    कि सहना, समझोता करना और अपना अस्तित्व मिटा देना, किसी भी तकलीफ की शिकायत जुबान पर नहीं लाना ही औरत का आदर्श मॉडल समझा जाता है । हर औरत को इसी आदर्श की घुट्टी दी जाती है । समाज में औरत का स्वीकृत  मॉडल यही है । कि वह निगाह नीची रखे, हर जुल्म को चुपचाप सहे, खामोश रहे बेटे पैदा कर ससुराल के खानदान का नाम जीवित रखे और वंश-परंपरा को आगे चलाए । पति के हर आदेश का पालन करे ।
    औरत, जिसे पहले माता-पिता के घर से 'पराई अमानत' समझकर पाला-पोसा जाता है । औरत, जो विवाह के बाद पति के घर की और ससुराल की 'धरोहर' यानी जायदाद होती है । औरत, जिसे उसका पिता दानस्वरूप एक अजनबी पुरुष के हाथों में सौंप देता है कि ले जा, आज से यह गाय तेरी है । इसका दूध निकाली, बछड़े पैदा करवाओ, मारो-पीटो, चाहे चमडी उधेड़ दो इसकी ।
    जा, ले जा, पाल-पोसकर तुझे दान में दी अपनी बेटी हमने । आज से इसके लिए यह घर पराया है । आज से तेरा घर ही इसके सिर छुपाने की जगह है ।
    जा बेटी, जा अपने घर । आज से ये घर तेरे लिए पराया हुआ । चावलों की मुट्ठी भरकर सिर के ऊपर से पीछे फेंक । मखानों की मुट्ठी भरकर पीछे फेंक । तेरे भाई सुखी रहें, और सुखी बसे उनका घर-परिवार । भाइयों का घर हरा-भरा रहे । दूध-पूत से भरा रहे ।
    औरत, जिसके लिए पिता का घर हमेशा पराया रहता है, और विवाह के बाद पति का घर भी अपना नहीं होता ।
    'बेटी, घर जा अपने...'
    अपने घर ।
    कौन-सा घर उसका अपना होता है ?
  • Bhartiya Sabhyata Ki Nirmiti
    Bhagwan Singh
    540 486

    Item Code: #KGP-401

    Availability: In stock

    भारतीय सभ्यता की निर्मिति भगवान सिंह की रचनाओं में ही भारतीय इतिहासलेखन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान इस विशेष अर्थ में है कि इससे पहले इतिहासकारों की दृष्टि हड़प्पा के नगरों या ऋग्वेद तक जाकर रुक जाती थी, इससे आगे कुछ दीखता नहीं था और बहुत से प्रश्नों का हमें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। 
    प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार उन्होंने हड़प्पा काल से भी आठ-दस हजार पीछे के सांस्कृतिक विकासों और सभ्यता के उन नियामक तत्त्वों की खोज की, जिनका उपयोग विविध सभ्यताओं ने अपने निर्माण में गारे और पलस्तर के रूप में किया। विषय गंभीर होते हुए भी उन्होंने इसे इतना सरल और बहुजनग्राह्य रूप में प्रस्तुत किया है कि अखबार पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़ते हुए किसी तरह के भारीपन या उलझाव का अनुभव नहीं करता। इस पुस्तक में उनकी विवेचनशैली भी उनकी अन्य कृतियों से भिन्न है। नृतत्त्व, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और साहित्य की सामग्री का इतनी कल्पनाशीलता से उपयोग किसी अन्य कृति में देखने में नहीं मिलता।
  • Facebook Ke Janak : Mark Zuckerberg (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7081

    Availability: In stock

    अमरीकी युवा मार्क जुकरबर्ग ने किस प्रकार अपनी विलक्षण प्रतिभा से आधुनिक जगत में लोगों को सरलता से आपस में जुड़ने का अवसर दिया, यह एक अत्यंत रोचक विषय है। प्रस्तुत पुस्तक ‘फेसबुक के जनक: मार्क जुकरबर्ग’ उनके विलक्षण मस्तिष्क के अद्भुत कारनामे को प्रेरक रूप में सामने लाने का प्रयास है। यह पुस्तक प्रत्येक वर्ग के पाठकों के लिए प्रेरणादायी सिद्ध होगी और उन्हें अनेक रोचक तथ्यों से अवगत भी कराएगी।
  • A Coders Cocktail
    Shashwat Rai
    595 536

    Item Code: #KGP-853

    Availability: In stock

    An excerpt...
    My dreams had always been extravagant and seemingly more enjoyable to me than my real life. The strange world of 
    imaginations where I rescued the POWs from Somalia to making love to the 
    Hollywood babes was like a daily chore. 
    I would often reach the climax on a high note and would wake up with my heart pounding and sinking like the low-high tides of the moving ridges of the sea.
    My dreams were the answers to my real life questions. I was more than me, a kind of superhero, the Robin Hood alike in my dreams. Like the Iraqi shoe-throw journalist Muntader al-zaidi who was renowned for his dare devil act on Bush, I would somehow find ways while stargazing to flutter woman’s heart or make political revolutions worthy of being termed and credited for cultural turnarounds too. 
    Maybe I always dreamt in lieu of waking up as someone else. Maybe I wanted to be somebody that I wasn’t already now. 
    I loved my dreams more than I loved myself.
  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Insaani Nasl
    Nasera Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-800

    Availability: In stock

    इनसानी नस्ल
    इस संग्रह की सभी कहानियाँ बड़ी सादगी से जीवन के यथार्थ को सामने रखती हैं। अंतर्धारा में एक आग्रह अवश्य महसूस होता है कि इनसान ने अपने ‘स्वयं’ को जीना छोड़ दिया है। वह अपने अंदर यात्रा करने की जगह बाहर की भौतिक दुनिया के कोलाहल में भटकता जा रहा है, जो उसकी सारी सहजता को ख़त्म कर उससे सुख के सारे क्षण छीनता जा रहा है। कभी-कभी ऐसा भी संकेत मिलता है कि वह पाषाण युग की प्रवृत्तियों की तरफ़ अकारण बढ़ रहा है, जो सारी उपलब्धियों के बावजूद उसको वह ‘चैन’ नहीं दे पा रही हैं, जिसका वह सही हक़दार है। आखि़र यह इनसानी नस्ल, जो एक-दूसरे की उत्पत्ति की सिलसिलेवार कड़ी है, वह वास्तव में चाहती क्या है ? एक-दूसरे से हाथ मिला मानव-शृंखला को मज़बूत बनाना या फिर एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर अलगाव की भूमिका निभाना ? यह अलगाव हमें सभ्यता के किस मोड़ पर ले जाएगा ? अलगाव की इस मानसिकता से मुक्त होकर इनसान एक नए युग का सूत्रपात क्यों नहीं कर सकता ? क्या वह आने वाली नस्ल की ख़ातिर जीवन से निरंतर ग़ायब होते जा रहे ‘चैन’ को पाने के लिए कुछ नहीं करेगा ? क्या वह अपने अंदर की यात्रा कर इनसानियत के आलोकित क्षितिजों को छूना नहीं चाहेगा ? इन्हीं सवालों से जूझती ये कहानियाँ आज के इनसान के दिल व दिमाग़ की टकराहट की साक्षी हैं, जो अनेक बुनियादी सवालों से साक्षात्कार करती नज़र आती हैं।
  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125 113

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Mere Saakshatkaar : Prabhakar Shrotriya
    Prabhakar Shrotiya
    175 158

    Item Code: #KGP-2035

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : प्रभाकर श्रोत्रिय
    मैं एक लेखक से अधिक एक मनुष्य होना श्रेयस्कर मानता हूँ। अध्यापन तो अपने में ही एक बादशाहत है, परंतु यहीं से हटकर प्रशासन में संयोगवश मुझे दूसरे नंबर पर नहीं रहना पड़ता । फिर वह भोपाल हो, कलकत्ता हो या दिल्ली । चाहा यही कि इन सर्वोच्च पदों की गरिमा को न गिरने दूं, लेकिन अपने को ऐसा ढालूँ कि इन पदों से उतरने पर मुझे ऐसा न लगे कि किसी पद पर था, जिस पर अब नहीं हूँ। और इस 'पद' का अर्थ मेरे लिए सिर्फ पाँव हो-जो अपनी ज़मीन पर टिका है ।
    मैं अकसर उन लोगों पर लिखना चाहता रहा हूँ जो चुनौती बनते है या उपेक्षित होते हैं । शमशेर बहादुर सिह की कविता पर इसीलिए लिखा। वह हिंदी के सबसे जटिल कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त को कोई कवि नहीं मान रहा था, तब उन पर एक पुस्तक अलग ढंग की लिखी । छायावाद के मूल्यांकन में जब बेहद बीहड़ता थी, तब छायावाद पर लिखा । प्रसाद पर लिखा, नरेश मेहता पर लिख रहा हूँ ।
    ० 
    पत्रिका के स्तरीय पाठक के अलावा भी पाठकों का एक वर्ग होता है, जो साहित्य के प्रति उत्सुक होता है । इसलिए कुछ ऐसी रचनाएँ भी होनी चाहिए, जिनके जरिए ऐसे पाठक पत्रिका में प्रवेश कर सकें, उनका संस्कार हो सके । पत्रिका के महत्त्व की एक कसौटी यह भी है कि वह कितनी प्रतिभाओं को सिरजती और प्रोत्साहित करती है । कई अच्छे लेखक पत्रिकाओं के निर्माण होते है ।
    ० 
    व्यावसायिक पत्रिकाओं से जुडी हुई संपादक की संस्था भी बहुत कमजोर हो गई है। पत्रिकाएं हमेशा संपादक के बलबूते पर ही निकलती और यशस्वी होती है । 'सरस्वती' से लेकर 'सारिका' और 'धर्मयुग' का यहीं इतिहास रहा है । लोकप्रिय पत्रिकाओं को भी दोयम और दृष्टिहीन संपादक नष्ट का देते हैं । 

    [प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा प्रश्नोंत्तर के कुछ अंश]
  • Karmveer Pt. Sunderlal : Kuch Sansmaran
    Sudhir Vidyarthi
    125 113

    Item Code: #KGP-1964

    Availability: In stock


  • Kissa Maujpur Ka
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1819

    Availability: In stock

    'किस्सा मौजपुर का' नाटक को वर्ष 2012 के दस श्रेष्ठ नाटकों में से एक श्रेष्ठ नाटक चुना गया । 'भारतेंदु नाट्य उत्सव' के अंतर्गत 23 मार्च, 2013 को इसका पुनः जोरदार प्रदर्शन हुआ । नाटक देखकर लेखक और वरिष्ठ रंगकर्मी श्री रेवती सरन शर्मा ने कहा था कि इस विषय पर कोई नाटक ऐसे भी लिखा जा सकता है, कम से कम मैं नहीं सोच सकता ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shekhar Joshi
    Shekhar Joshi
    70 63

    Item Code: #KGP-1420

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mridula Garg (Paperback)
    Mridula Garg
    100

    Item Code: #KGP-7015

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मृदुला गर्ग
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मृदुला गर्ग  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'ग्लेशियर से', 'टोपी' , 'शहर के नाम', 'उधार की हवा', 'वह मैं ही थी', 'उर्फ सैम', 'मंजूर-नामंजूर', 'इक्कीसवीं सदी का पेड़', 'वो दूसरी' तथा 'जूते का जोड़', 'गोभी का तोड़' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मृदुला गर्ग की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Alif Laila Hazar Dastan
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-7822

    Availability: In stock


  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Ramayan Bharantiyan Aur Samadhaan
    Swami Vidya Nand Saraswati
    100 90

    Item Code: #KGP-1115

    Availability: In stock

    इस पुस्तक के पढ़ने से पता चलेगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम राज्य पाने के इच्छुक थे, वे पिता के कहने से वन नहीं गए, राम दीपावली के दिन नहीं बल्कि चैत्र शुक्ला 6 को अयोध्या लौटे थे, सीता का स्वयंवर नहीं हुआ था, कौशल्या की स्थिति घर में दासियों से भी बुरी थी, राम ने धोबी या किसी के भी कहने से सीता को वनवास नहीं दिया था, उन्होंने तपस्या करते तथाकथित शुद्र शम्बूक का वध नहीं किया था, हनुमान बंदर नहीं बल्कि व्याकरणाचार्य तथा चारों वेदों के विद्वान् थे, बालि की पत्नी तारा वेदों के रहस्य को जानने वाली थी, उसका पुत्र अंगद बहुत बड़ा कूटनीतिज्ञ था और उसके श्वसुर सुषेण बड़े कुशल सर्जन और प्लास्टिक सर्जरी में निष्णात थे, हनुमान, जटायु, रावण आदि छोटे-छोटे निजी हेलीकाॅप्टरों में यात्रा करते थे, शबरी भीतनी नहीं, उच्च कुल की तपोनिष्ठ देवी थी, अयोध्या तथा लंका की राजभाषा संस्कृत थी इत्यादि...
  • Satta Ke Aar-Paar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    35

    Item Code: #KGP-932

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    -इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Ek Yug Ke Baad
    Pushpa Rahi
    40 36

    Item Code: #KGP-1891

    Availability: In stock

    एक युग के बाद
    पुष्पा राही के गीतों में सुख-दुःख, आशा-निराशा, अन्धकार-प्रकाश, संयोग-वियोग, व्यथा-वेदना, मिथ्या मोह, दम्भ, पाखंड सबका वर्णन मिलता है । कुछ गीत इतने मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं कि उन्हें पढते समय जीवन के अनेक तथ्य नेत्रों के सामने उदघाटित होने लगते है ।
    इन गीतो की एक विशेषता है नूतन बिम्बों का निर्माण । दर्द के मोती, रेशमी सुख, शोर की कालिख, उलझनों का झाड, नींद की कमजोर आँखे, विषमताएं रोग-सी, अंधेरे दर्द के साए, मीठी-मीठी इच्छा आदि प्रयोग गीत को संवेदन के स्तर पर बहुत मार्मिक बना देते हैं । कवयित्री अपनी अनुभूतियों और परिवेश की हलचल को ही लिखना चाहती है । दूसरों से उधार लेकर कुछ भी कहने में उसकी रुचि नहीं है ।
    एक युग के बाद में संकलित गीत उच्चस्तरीय होने के साथ काव्य की भावभूमि पर अपनी छाप छोड़ते है । कोहरेभरे प्रभात से निकालकर चन्दन वन की शीतल छाया में हमें भ्रमण का अवसर देते हैं । प्यार के वृत्त में घुमते हुए हम सन्नाटे के पार पहुँच जाते है ।
  • Krantiveer Savarkar
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-182

    Availability: In stock

    इस धरा पर कुछ जन्मभूमि का उद्धार करने के लिए उत्पन्न होते हैं तो कुछ संसार में अपने देश का गौरव बढाने के लिए । स्वर्ग से भी श्रेष्ठतर मानी जाने वाली जन्मभूमि के उद्धार के लिए जो अपने प्राणों को राष्ट्रसेवा में न्यौछावर कर देते हैं, उन्हीं का जन्म धरा पर सार्थक है ।
    'क्रांतिवीर सावरकर' एक ऐसे ही महापुरुष थे, जिन्होंने अपने शरीर का कण-कण देश-सेवा में अर्पित कर दिया । चाहे देश से रहे हों या विदेश में, उनके सन्मुख मातृभूमि का पावन चित्र सदैव रहता था । जीवन को उन्होंने जन्मभूमि की सेवा में अर्पित कर दिया ।
    जहाज से अतल जलराशि वाले सागर में कूदकर फ्रांस के तट पर दम लिया । अंडमान की सेल्युलर जेल में एकाकी कोठरी में कैद के दस वर्ष व्यतीत किए । कोल्हू में बैल की तरह जुतकर सुबह से शाम तक तेल पेरते रहे और अंग्रेजों के डंडे सहते रहे ।
    यह सब उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए सहन किया था । यह क्रांतिकारी वीर योद्धा थे । अपनी जन्मभूमि की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अनेक प्रकार की शारीरिक-मानसिक यातनाएँ सहीं । भारत की स्वतंत्रता उन्हें प्राणों से अधिक प्यारी थी ।
    ऐसे महापुरुषों का देश युग-युग तक स्वागत करता रहेगा । हमें उन पर सदैव गर्व रहेगा । वे अजर-अमर है । उनके सम्मान में देशवासियों का मस्तक सदैव झुका रहेगा । हम उनकी जयजयकार करते हैं ।
  • Jangal Ke Jeev-Jantu (Paperback)
    Ramesh Bedi
    200

    Item Code: #KGP-178

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Kuchh Deh / Kuchh Videh
    Raj Narain Bisaria
    200 180

    Item Code: #KGP-9085

    Availability: In stock


  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • Kavi Ne Kaha : Leeladhar Mandloyi
    Leeladhar Mandloi
    150 135

    Item Code: #KGP-227

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : लीलाधर मंडलोई
    लीलाधर मंडलोई अपनी पीढ़ी के उन थोड़े-से कवियों से अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने समय के वैचारिक दिभ्रमों से जूझते हुए, कविता के वृहत्तर सरोकार को बचाए रखने का उपक्रम किया है । पिछले तीस-बत्तीस वर्षों की काव्ययात्रा में उनका एक अलग स्वर उभरकर आया है ।
    हिंदी कविता में किसान चेतना की व्यापकता तो देखी जा सकती है, मगर मज़दूरों, खासकर औद्योगिक मज़दूरों की उपस्थिति सांकेतिक ही रही है । मंडलोई शायद पहली बार उसके जीवन-संघर्ष को, उसकी 'सफ़रिंग' को, उसकी करुणा को अपनी कविता में दर्ज करने में सफल हुए हैं । वे अपने बचपन को याद करते हुए मध्यप्रदेश की कोयला खदानों के उस यथार्थ को सामने लाते हैं जो श्रमिक संगठनों के दस्तावेजो तक में शामिल नहीं है । अपने जीवन के सच को समय के सच से जोड़ देने की कला की व्याप्ति उनकी अन्य कविताओं में भी देखी जा सकती है । अंदमान की जनजातियों के जीवन संघर्ष को पहली बार कविता में लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है ।
    लीलाधर मंडलोई की कविताओं में प्रकृति और स्त्री की अपनी खास जगह है । वे केवल नैसर्गिक सौंदर्य का ही उदघाटन नहीं करते हैं, बल्कि उन कठोर सच्चाइयों को भी सामने लाते है जिनसे उनके समकालीन कवि प्राय: बचना चाहते हैं । उन्होंने कुछ ऐसी मार्मिक कविताएं भी लिखी हैं  जो हमारी संवेदना का विस्तार करती हैं । प्रसंग चाहे अपने कुत्ते के खो जाने का हो अथवा पत्नी द्वारा मोहल्ले की उस कुतिया को रोटी खिलाने का, जो मां बनने वाली है-वे छीजती हुई संवेदना के इस कठिन दोर से भी मनुष्यता के बचे होने की गाथा ही नहीं रचते, अपनी कलात्मकता से पाठको को भी उसमें शामिल कर लेते हैं
    ध्यान देने की बात है कि उनकी मार्मिक कविताएं भी हमें हताश नहीं करती, बल्कि जीवन की जद्दोजहद से और डूबने की प्रेरणा देती हैं । वे निराशा और मृत्यु के कवि नहीं हैं । उनकी कविता जीने और जीतने की हमारी इच्छा को मज़बूत करती है, दुखों से लड़ते हुए जीवन की सुंदरता को पहचानने की दृष्टि देती है 
  • Sapt Aadarsh Mahilayen
    Chandrika Prasad Sharma
    90 81

    Item Code: #KGP-9298

    Availability: In stock

    भारत वर्ष की महिलाएं विश्व में अपने त्याग, तपस्या और औदार्य के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका गौरवशाली व्यक्तित्व प्रत्येक क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ता रहा है। अपने अद्ीाुत त्याग, तपस्या और सेवा-भाव के कारण उन्हें ‘देवी’ की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। यहां यह उक्ति प्रसिद्ध है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।’
    सीता ने वन-वन अपने प्राणनथ राम के साथ कष्ट झेलकर भारतीय नारी के गोरवपूर्ण चरित्र को विश्व के सम्मुख प्रस्तुत किया। सावित्री के तपोबल ने यमराज से अपने पति को वापस ले लिया। गार्गी ने शास्त्रज्ञान को प्रस्तुत करके याज्ञवल्क्य को दुविधा में डाल दिया था। अपाला ने तपोवन से अपने शरीर को स्वर्ण जेसा सुंदर बना लिया था। अनसूया ने सतीत्व की महिमा के बल पर त्रिदेवों-ब्रह्मा, विष्णु, महेश को शिशु रूप देकर पालने में झुलाया था। भारती देवी ने अपने अद्भुत ज्ञान के बल पर शंकराचार्य को असमंजस की स्थिति में डाल दिया था और राम को जूठे-मीठे बेर खिलाकर शबरी ने नवधा शक्ति का ज्ञान प्राप्त किया था।
    इस पोथी में इन उपर्युक्त महिमापूर्ण महिलाओं का आदर्श चरित्र प्रस्तुत कर लेखक ने भारतीय नारी के श्रद्धा रूप को प्रस्तुत किया है।
    —चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा
  • Guftgoo : Sarhadon Ke Aar-Paar
    300 270

    Item Code: #KGP-2063

    Availability: In stock

    गुफ्तगू : सरहदों के आर-पार
    प्रेमकुमार की यह पुस्तक अपनी भिन्न विशिष्ट पद्धति और अभिव्यक्ति वाले साक्षात्कारों के माध्यम से पांच देशों के सात स्थापित-सुविख्यात साहित्यजीवियों की जिंदगी और लेखन के अनेक अनसुने-अनजाने प्रसंगों-हिस्सों से सहज-दिलचस्प ढंग से पाठक का परिचय कराती है। पांच देश-भारत, आस्ट्रिया, ईरान, पाकिस्तान और अमेरिका।  सात साहित्यजीवी--नैयर राही, आंद्रेयास वेबर, अली मुहम्मद मुअज्जनी, सलीमा हाशमी, अहमद फराज, इंतिजार हुसेन और मुनीबुरर्हमान। 
    इन बातचीतों के माध्यम से रचनाकारों के परिवेश, लेखन और लेखन-प्रक्रिया के बारे में तो आसानी और सहजता के साथ जाना-समझा जा ही सकेगा, भिन्न-भिन्न देशों व भाषाओं के पारस्परिक संबंधों, उनके बीच की सामाजिक-सांस्कृतिक समानताओँ-असमानताओँ, समस्याओं-संभावनाओं आदि को भी समझने-सुलझाने या विवेचित-विश्लेषित करने में मदद भी मिलेगी। तमाम तरह की बाडों-सीमाओं को लांघ-पारकर कोई सृजन या अभिव्यक्ति कैसे यहां-वहां सब कहीं स्वीकृत- समादृत हो पाते हैं-ऐसे कुछ सूत्रों-प्रश्नों के मूल और हल भी इन संवादों में ढूंढे-तलाशे जा सकते हैं ।
    अत्यंत अनौपचारिक, आत्मीय और विश्वासपूर्ण वातावरण में अप्रत्याशित ढंग से संभव-संपन्न हुई इन बातों- मुलाकातों का एक अहम और उल्लेख्य पक्ष यह भी है कि सात में से पांच बातचीतें सीधे-सीधे संबंधित साहित्यकारों से हुई हैं, जबकि दो रचनाकारों के जीवन-लेखन को उनके दो अत्यंत करीबी संबंधों के सोच और दृष्टि से जाना-समझा गया है। राही मासूम रजा की पत्नी नैयर राही ने अपने सर्जक-पति और फैज अहमद 'फैज' की बडी बेटी सलीमा हाशमी ने अपने रचनाकार पिता के जीने-सोचने, लिखने तथा उनके जीवन-मूल्यों, अभावों, संघर्षों आदि के बारे में बातों-बातों में बहुत कुछ समझा-बता देना चाहा है।
    निश्चय ही ये बातचीतें सुधी पाठकों, साहित्यसेवियों एवं शोधार्थियों के लिए पठनीय और उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Kachche Resham Si Larki
    Amrita Pritam
    250 225

    Item Code: #KGP-9079

    Availability: In stock


  • Svadeshi Chikitsa Paddhati (Paperback)
    Om Prakash Sharma
    160

    Item Code: #KGP-7072

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Ek Qatara Khoon (Paperback)
    Ismat Chugatai
    250

    Item Code: #KGP-97

    Availability: In stock


  • Yugdrashta Shivaji
    Shashi Bhushan Singhal
    280 252

    Item Code: #KGP-288

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि ने खूब कहा है—
    ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। 
    कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ 
    महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे।
    आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था।
    यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है।
    उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।
  • The Hanuman Factor (Paperback)
    Anand Krishna
    195

    Item Code: #KGP-336

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
    Let us explore together…..
  • Kavi Ne Kaha : Rituraj
    Rituraaj
    150 135

    Item Code: #KGP-224

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ऋतुराज
    ऋतुराज की कविता गरीब, वंचित, बहुत दूर रहने वाले लोगों की ताकत को रेखांकित करती है । वस्तुओं, लोगों और संवेदनाओं के 'आदिवास' के प्रति चिंता एक खोज और उसे बचाने की चिंता ऋतुराज की रचना में कई स्तरों पर व्यक्त होती रही हैं । बहुराष्ट्रीय निगमों के इस साम्राज्यवादी समय में ज्यादातर लोग आशा और प्रसन्नता जैसी चीजों के लिए बाजार की तरफ देख रहे हैं और उसे खरीद लेने की सुख-भ्रांति में भी रह रहे हैं, लेकिन ऋतुराज के लिए वास्तविक उम्मीद बाजार से बाहर घटित होती है; वह बाजार विरोधी है और समाज के अत्यंत साधारण मनुष्यों, गरीब आदिवासियों के भीतर निवास करती है ।
    ऋतुराज की संवेदना पर समकालीनता और उसके साथ अनायास आ जाने वाले विषयों का बहुत कम दबाब दिखता है । इसीलिए उनकी कविताएं प्रचलित, स्वीकृत और तयशुदा मुहावरे से अलग हैं । वे मुख्य भूमि से दूर किन्हीं हाशियों पर रहने वाले साधारण आदिवासी संसार से आधुनिक शहराती सभ्यता को देखते हैं और उसकी अमानुषिक, अश्लीलता, विसंगति और उसके विरूप के खिलाफ एक प्रति-संसार की रचना करते हैं और अगर कभी उनकी कोई कविता किसी आदिवासी के धनुष-बाण की तरह दिखने लगती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है [ इसलिए कि ऋतुराज आदिवासी सभ्यता के ही कवि हैं और अपनी भाषा को एक आदिम औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसका एक कारण तो शायद यह है कि ऋतुराज का ज्यादातर जीवन राजस्थान के आदिवासियों, भीलों के क्षेत्र में बीता है और दूसरा शायद यह कि उनकी संवेदना शहरी तनावों के प्रति सजगता के बावजूद देशज और स्थानिक है ।
    आदिवासी जीवन की सरलता, मासूमियत और अच्छाइयाँ ऋतुराज की कविता का प्राणतत्त्व हैं, लेकिन वह आदिवासियों के मन की ही तरह जटिल और सांकेतिक भी है । एक आदिवासी व्यक्ति जितना व्यक्त होता है उससे कहीं अधिक अव्यक्त रहता है । शायद ऋतुराज की कविता भी इसी तरह है : शब्दों के शिल्प के पीछे एक जटिल संरचना ।
  • Ghanta
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    160 144

    Item Code: #KGP-425

    Availability: In stock


  • Shubhada
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    270 243

    Item Code: #KGP-574

    Availability: In stock


  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Sant Raidas
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-276

    Availability: In stock

    दलित वंश में संभूत रैदास अपने समय में एक श्रेष्ठ चमत्कारी संत माने जाते थे। उनका आदर राजा से लेकर रंक तक करते थे। रैदास विचित्र संत थे। वे जूते सिलते जाते थे और भजन गुनगुनाते जाते थे। उनका अधिकांश काव्य इसी प्रकार रच गया ।
    संत रैदास का जीवन आर्थिक तंगी में कटा, किंतु उन्होंने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया । उन्हें पारस पत्थर तक प्राप्त हुआ। वे चाहते तो चाहे जितना सोना बना लेते किंतु उन्होंने उस पारस पत्थर का उपयोग कभी नहीं किया । वे अत्यंत संतोषी जीव थे। फाकेमस्त और फक्कड़ रैदास चमत्कारी संत थे।
    यह विशेष उल्लेख्य है कि वे इतने यशस्वी बन गए कि चर्मकार बिरादरी अपने आप को 'रैदास' कहने लगी। आज भी गाँवों में चर्मकार अपने को रैदास बताते हैं।
    धन्य थे रैदास ! पूज्य थे रैदास !!
  • Manto Zinda Hai
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-805

    Availability: In stock

    मंटो जिन्दा है
    सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । फीनिक्स पक्षी की तरह वह उड़ानें भरता रहा, अपनी ही राख से पुनर्जीवित होता रहा, जिन्दगी और लेखन के मोर्चों पर जीता-मरता रहा और भारतीय उपमहाद्वीप की साइकी में उतर गया । जाहिर हैं, ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है ।
    'मंटो जिन्दा है' ऐसी जीवनकथा है जो वृतांत होते हुए भी, वृतांत को बाहर-भीतर से काटती-तोड़ती पाठकीय चेतना को झकझोरती जाती है । मंटो की जिन्दगी के कई केंद्रीय मोटिफ, प्रतीक और पेटॉफर पाठक को स्पन्दित करने लगते है और यह महसूस करता है जैसे वह मंटो को अपनी परिस्थिति, समय और साहित्य के साथ जीने लगा हो । लेखक ने जैसे मंटो को जिन्दा महसूस किया है, पाठक भी किताब पढ़ते हुए वैसी ही हरारत महसूस करने लगता है ।
    मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है ।
    वृतांत और प्रयोग के निराले संयोजन में बँधी यह मंटो- कथा मंटो को उसके विविध रंगों और छवियों के साथ उसके प्रशंसकों-पाठकों के रू-ब-रू खडा कर देती है ।
  • Saphalata Ka Rahasya
    Jagat Ram Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-99

    Availability: In stock

    सफलता का रहस्य
    जीवन में सफलता की चाहना सब रखते हैं, लेकिन सफल हो नहीं पाते। ऐसा न होने पर कोई भाग्य को कोसता है, कोई हालात को। जबकि सफलता हमारे अपने व्यवहार पर ज्यादा निर्भर है, न कि किन्हीं और बाह्य कारणों पर।
    सफलता के आधारभूत सूत्र हैं-शुद्ध व्यवहार, सीखने की प्रवृत्ति, आत्मनिर्भरता, संतोष तथा और भी बहुत कुछ।
    आर्य जी ने अपनी इस पुस्तक में सफलता के रहस्यों की सरल-सुबोध भाषा में व्याख्या की है। पुस्तक पठनीय तो है ही, जीवन से लिए गए सच्चे उदाहरणों के चलते संग्रहणीय भी बन पड़ी है।
  • Ramlubhaya Haazir Hai (Paperback)
    Raj Kumar Gautam
    120

    Item Code: #KGP-1175

    Availability: In stock


  • Charitraheen
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    400 360

    Item Code: #KGP-878

    Availability: In stock


  • Dwidhaa
    Bhairppa
    575 460

    Item Code: #KGP-646

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Ukaav
    Kshitij Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-765

    Availability: In stock

    उकाव
    'उकाव' पहाडी जिंदगी की गाथा है। एक मायने में उपन्यास की कथा पुरुष-नियंत्रण समाज द्वारा नारी पर थोपे गए उत्पीडक नियमों की भर्त्सना है । नैतिकता के इकहरे मानदंडों के कारण किन्हीं कमजोर क्षणों में हुई एक तथाकथित 'गलती' के प्रतिकार में श्यामा किस तरह सारा जीवन होम कर देती है, लेखक ने इस संघर्ष को इतने मार्मिक और प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया है कि यह पहाडी औरत की जिंदगी का ही दस्तावेज बन गया है । कुमाऊँ के पहाडों का ग्रामीण जीवन जितनी अंतरंगता  और विविधता में इस उपन्यास में चित्रित हुआ है, यह बरबस रेणु और शैलेश मटियानी की याद दिला देता है । संभवत: किसी रचना का आंचलिक बनना इस बात पर निर्भर है कि वह किसी स्थान विशेष के लोगों का चित्रण करते हुए यहीं की भौगोलिक ही नहीं वक्ति सांस्कृतिक और मूल्यगत विशिष्टताओं को कितनी उत्कटता व सघनता से अभिव्यक्त करती है । इस संदर्भ में देखें तो 'उकाव' निश्चित ही एक आंचलिक रचना है, पर तब दुनिया की कौन-प्ती ऐसी रचना है जो इस बात से न पहचानी जाती हो कि उसमें कितनी गहराई और मजबूती से अपने समय और स्थान की पहचान छिपी है ?
    सही मायनों में देखा जाए तो प्रेम, प्रतिकार, बलिदान और संघर्ष की यह गाथा अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई पहाडी औरत के ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय नारी के बहुआयामी व विराट, स्वरूप का दर्शन कराती है । और यही लेखक की सृजनात्मकता की कसौटी है ।
    यह इत्तफाक नहीं है कि क्षितिज शर्मा लेखन की उस परंपरा के अधिक निकट पड़ते है जिसका स्रोत शैलेश मटियानी है । मटियानी जी की रचनाओं में पहाडी जीवन की झाँकी सबसे ज्यादा वास्तविक और प्रामाणिक ढंग से नजर जाती है । क्षितिज शर्मा उस परंपरा को आगे बताते हुए पहाडी गाँवों के संघर्षमय जीवन को जिस तरह से चित्रित करते है, वह मुझ जैसे तथाकथित पहाडियों के लिए भी एक 'रिबिलेशना से कम नहीं है ।
    -पंकज बिष्ट
  • Prourh Shiksharthion Ki Shiksha-Prapti Ke Vaataavaran Ke Ghatak Tatva
    Naseem Ahmed
    140 126

    Item Code: #KGP-9129

    Availability: In stock

    यह पुस्तक ‘दिल्ली में एक शहरी स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण को निर्धारित करने वाले तत्त्वों के अध्ययन’ विषय पर लेख के पी-एच.डी. के सोध-प्रबंध का परिणाम है। इस प्रयास पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने डाॅक्टर आॅफ फिलाॅसफी (पी-एच.डी.) की उपाधि प्रदान की है।
    पुस्तक ‘प्रौढ़ शिक्षार्थियों’ की ‘शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण’ तथा विशिष्टताओं की अवधारणा को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित करती है। भारत के संदर्भ में शहरी स्लम बस्तियों में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण की रूपरेखा को पुस्तक में दर्शाया गया है। एक स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की विशिष्टताआं तथा शिक्षा-प्राप्ति के आसपास के वातावरण के संदर्भ में उन्हें विस्तार से समझने के लिए पुस्तक उपयोगी है। इस प्रकार की समझ प्रौढ़ों में साक्षरता को बढ़ावा देने के प्रयासों का सफल बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई संभावनाओं को उत्पन्न करने में सहायक होगी।
    साथ ही शहरी क्षेत्रों में सामान्य रूप से तथा शहरी स्लम बस्तियों के वातावरण में विशेष रूप से साक्षरता तथा प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों की योजना बनाने और उसका प्रबंध करने की प्रक्रिया के लिए यह उपयोगी सूचनाओं की एक स्रोत-पुस्तिका भी हो सकती है।
  • Khiraki Khulane Ke Baad
    Nilesh Raghuvanshi
    250 225

    Item Code: #KGP-9339

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी में अपनी ही कविता और घर-संसार के लिए एक उत्सुक आलोचनात्मक रवैया बना रहा है।

    नीलेश जादुई फंतासी की जगह घर.परिवार, बच्चे का जन्म, प्रसव के दर्द आदि को काव्य विशय बनाती हैं और उन्हें सादगी का मर्म जानने में ही कविता अकसर सहायक होती है। राजनीति प्रकट न हो, पर नीलेश इस हद तक समय से बेखबर नहीं हैं कि राजनीति उनके लिए सपाट झूठ और गलत शब्द हो। इस तरह नीलेश रघुवंशी को पढ़ना एक भरोसेमंद साथी को पढ़ना है। उनकी कविताएँ इधर की कविता में आए ठहराव, कीमियागिरी या उसके उलट सरलतावाद के विरुद्ध नया प्रस्थान हैं। स्त्रीवाद को विमर्श बनाए बगैर नीलेश रघुवंशी के यहाँ संघर्शरत स्त्री है, जो जटिल समय को ‘क्लीषे’ नहीं बनने देती।

    कविता अप्रत्याषित की खोज नहीं है-मामूलीपन के खटराग में औसतपन का प्रतिकार है। नीलेश गंजबासौदा की जनपदीय, कस्बाई चेतना से लबरेज लंबी कविताओं में वृत्तांत रचती हैं और भीतर.बाहर के सफरनामे को इस तरह संभव करती हैं कि ‘देखना’ क्रिया ‘जानना’ क्रिया से अभिन्न है। 

    आज जब कविता विचारधारा से ऊबकर शहरी भद्रलोक की कविता हो गई है, नीलेश किसान जीवन का वृत्तांत लिख रही हैं।

    यही समय है जब किसान आत्महत्या कर रहे हैं और मीडिया पर्यटन की डाॅक्यूमेंट्री बना रहा है। यहाँ किसान जीवन की त्रासदी है, तो तंत्र का शगल भी है और फिर ‘बाइट’!

    यह है बदला हुआ समय, जहाँ क्रूरता भी प्रदर्शन  प्रिय है। बीच.बीच में अनकहा छोड़कर वे कहे का  मर्म खोल जाती हैं। विस्तार और संक्षेप का कोलाज  हैं-नीलेश की कविताएँ। उनका वैविध्य चकित  करता है। 

    घर.गिरस्ती, हाट.बाजार, सफर और समय की अनंतता के बीच नीलेश रघुवंशी कब ‘पर्सनल’ को ‘पाॅलिटिकल’ बना देंगी, कहना मुष्किल है। वे पर्यटक की निगाह से चीजों को नहीं देखतीं-जीवनअरण्य में धँसती हैं और स्त्री मुक्ति के साथ सामाजिक मुक्ति के लिए विकल.व्यग्र होती हैं।

    नीलेश रघुवंशी ‘घर निकासी’ में प्रगीतात्मकता का सार्थक उपयोग कर सकीं। ‘पानी का स्वाद’ की कविताओं में काव्य फलक का विस्तार दिखा। ‘अंतिम पंक्ति’ की आधी कविताएँ आख्यानमूलक हैं। कहीं लैंडस्केप, कहीं दृष्य.श्रव्य का कोलाज, कहीं कथा.कहानी।

    नीलेश रघुवंशी की कविता में नई खिड़कियाँ खुल रही हैं।

    नीलेश की तद्भवता सिर्फ भाशायी खेल नहीं है, वह उनकी अपनी भाशायी अस्मिता है, जो सीधे संस्कृति से छनकर आती है।

    वही कविता, वही जीवन श्रेश्ठ है जो विस्थापन को अतिक्रमित करता है। इस अवधारणा को नीलेश की कविताएँ चरितार्थ करती हैं। वे पुराने प्रतिमानों को खारिज करती हैं और सामाजिकता को ही राजनीतिक विमर्श में ढालती हैं।

    कविता का लोकरंग विस्थापन का प्रतिवाद है। स्थानीयता नीलेश की काव्यात्मकता का मुख्य ध्रुवक है। गंजबासौदा की धूल भी नीलेश के लिए कविता है। यह कविता का प्रकृत देशज ठाठ है। खुद से भिड़ने की ताकत।

    परमानंद श्रीवास्तव के लेख से कुछ अंश
     

  • Computer : Kya? Kyon? Kaise?
    Varun Kumar Sharma
    100 90

    Item Code: #KGP-9153

    Availability: In stock

    कंप्यूटर शब्द अंग्रेजी के 'कम्प्यूट' (Compute) शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है – गणना करना । इस प्रकार साधारण भाषा में कम्प्यूटर का अर्थ एक ऐसी मशीन से है, जो गणना संबंधी कार्यों को शीघ्रता से कर सकती है । परंतु सही अर्थों में गणना करने के अलावा कम्प्यूटर और भी कई कार्य कर सकता है । कंप्यूटर की जानकारी के लिए इसकी विशेषताओं को जानना आवश्यक है ।
  • Vish Vansh (Paperback)
    Rajesh Jain
    25

    Item Code: #KGP-1503

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।
  • Tabdeel Nigahein
    Maitreyi Pushpa
    240 216

    Item Code: #KGP-396

    Availability: In stock

    तबदील निगाहें
    किसी भी व्यक्ति, विषय या कृति के संबंध में जो सिद्धांत, मान्यताएं और अवधारणाएं, वर्षों या सदियों पहले सही मान ली गई थीं, जरूरी नहीं कि हर युग में उनको उसी रूप में स्वीकार किया जाए। समय और परिस्थितियों से उपजे सवाल, उसे अपने मानकों पर कसते हैं। हालांकि सच यह भी है कि साहित्य और समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताओं और प्रतिमानों को खंडित करने का साहस यदा-कदा ही किया जाता है, क्योंकि बहुजन के दबाव और विरोध को सहकर अपनी बात कहने से प्रायः बुद्धिजीवी लोग बचने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बावजूद इसके कुछ रचनाकार अपवाद रहे हैं।
    सच को पूरे साहस से कहने वाली रचनाकारों में सम्मिलित मैत्रेयी पुष्पा ने इस पुस्तक के संकलित लेखों में कुछ ऐसा ही प्रयास किया है। ‘उसने कहा था’, ‘गोदान’, ‘चित्रालेखा’, ‘धु्रवस्वामिनी’, ‘त्यागपत्र’, ‘मैला आंचल’ और ‘राग दरबारी’ जैसी अपने समय की कालजयी रचनाओं को बिलकुल अलग निगाह से देखतीं और उसके स्त्री-पात्रों के मन में सोए पड़े सवालों को उघाड़कर उन्होंने एक नई बहस को आधार प्रदान किया है। इन कृतियों के संदर्भ में लेखिका द्वारा उठाए गए सवाल, न केवल पढ़ने वाले को बेचैन कर सकते हैं बल्कि इन्हें नए तरह से तबदील निगाहों के जरिए पुनर्मूल्यांकित करने की मांग भी करते हैं। 
    कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके और कुछ अवसरों पर दिए गए इन वक्तव्यों में मैत्रेयी पुष्पा के भीतर की आलोचकीय दृष्टि भी सघन रूप से प्रकट हुई है। बनी-बनाई धारणाओं और अपनी कूपमंडूकता में आनंदित रहने वाले आलोचकों के लिए यह पुस्तक एक सबक की तरह हो सकती है।
    –विज्ञान भूषण
  • Ghane Kertarutale
    N.E. Vishwanath Iyyer
    140 126

    Item Code: #KGP-9118

    Availability: In stock

    निबंधकार के रूप में लेखक का राष्ट्रीय व्यक्तित्व हर रचना में अपनी छाप छोड़ता है। यह उस सृजनधर्मी राष्ट्रीय व्यकिततव के अनुरंजक छाप की गुणवता होती है कि मोटे रूप में शुष्क समझा जाने वाला यात्रा-वर्णन सरल ललित निबंध की कलाभंगिमा में प्रस्तुत मिलता हैं
    यात्रा-वर्णन के अतिरिक्त इन निबंधों में संस्करण, स्मृति-तर्पण, वर्णन, पत्र, रिपोर्ताज और संवाद-शिल्प प्रयुक्त हुआ है। विधा कोई भी हो, लेखक का लक्षित विधेयक मूलतः एक है और वह है राष्ट्रीय समन्वयात्मक विशालता। इसके लिए व्यष्टि के छोर से समष्टि की खोज-खबर ली जाती है और साहित्य चिंतन अथवा आत्म-चिंतन से राष्ट्रीय चिंतन को संपृक्त करते हुए लेखक प्रादेशिक छवियों, रंगारंग सभ्यताओं और नए अभ्युत्थान के प्रतिष्ठानी आकर्षणों को संवेदनीय शिल्प में विस्तार के साथ रेखांकित-चित्रित करता है।
    —डाॅ. विवेकीराय
  • Pakistan Mein Waqt Se Mulaqat
    Shyam Vimal
    300 270

    Item Code: #KGP-255

    Availability: In stock

    लेकिन पैसा हर जगह वह काम नहीं करता जो काम मीठी हमबोली कर जाती है। यही तो हुआ मेरे साथ मैं मुलतानी बोली में उन सज्जनों से परिचय व बातचीत कर रहा था, बदले में जहां उन्होंने मुझे कोल्ड ड्रिंक पेश किया, वहां उन्होंने मोची के तयशुदा पॉलिश के दस रुपए नहीं लिए। मोची तक ने मना कर दिया लेने सै। मैं हिंदू पकिस्तान के इस नगर में पराया नहीं माना गया-हमवतनी माना। उनके इस प्रेम ने मुझे अभिभूत कर दिया। जूती पहनकर लौट लिया पैदल अपने डेरे पर। 
    इस पैदल चलने में मुझे फायदा यह था कि मैं पहले के देखे हुए इलाके में अपनी उन जगहों को, गलियों को पहचान सकूं जिनसे मैं कई दफा गुजरा होऊंगा। मुझे ऐसा लगता रहा, मैं वक्त के खोल में कैद हूँ और पारदर्शी बुलबुले समान उस खौल का सुरक्षाकवच पहने हूँ और वर्तमान में उस पार के अतीत को निहारने में कामयाब हो रहा हूं। चलते-देखते एक जगह कामयाबी मिल गई। भीड़ से भरे उस गली के मुहाने को अंदाज से पहचान लिया कि हां, यह वही गली है जहाँ मेरी भरजाई का ननिहाल है-होता था ।
  • In Sabke Baavajood
    Manohar Bandhopadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-545

    Availability: In stock

    इन सबके बावजूद
    प्राइवेट कॉलेज के असुरक्षित कार्य को छोड़कर अजय एक संपन्न व्यापारी की ‘भानजी’ रति को ट्यूशन पढ़ाता है। यहाँ उसे प्रॉपर्टी डीलिंग का भी काम मिल जाता है। इस व्यापार के दाँव-पेच सीख वह रति को हथियाकर धनवान बनने के स्वप्न देखता है। इस कोशिश में वह बुरी तरह पिटता ही नहीं, अपनी जान भी खतरे में डाल देता है। व्यापारी को उसके शोषण की फिक्र है और लड़की उसे झटककर किसी और की हो जाती है। हताश अजय तब रेनु की ओर मुड़ता है, जिसे वह किसी समय चाहने लगा था। 
    कहानी वर्तमान युग के नवयुवकों की त्रासदी को उजागर करती है, जिसमें वे वैवाहिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर जोखिम-संघर्ष में स्वयं को झोंक देते हैं। यह मर्मस्पर्शी उपन्यास आज की अस्तित्ववादी वास्तविकता को समझने के लिए पाठकों को विवश करता है।
  • Goswami Tulsidas
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-138

    Availability: In stock

    तुलसीदास विश्व-काव्य गगन के प्रभावान नक्षत्र हैं । उनका काव्य 'स्वान्त: सुखाय' रचा गया है किंतु उससे संपूर्ण समाज का हित होता है । राम की कीर्ति का गान तुलसी ने जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ किया है, उसका वर्णन अन्य किसी कवि ने नहीं किया है ।
    संस्कृत और ठेठ अवधी दोनों को मिलाकर तुलसी ने अपनी कृति 'रामचरितमानस' में अनूठा प्रयोग किया है । उनकी भाषा में लोकोक्तियों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। अब तक तुलसी के 'मानस' का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है ।
    भारतीय जनमानस के हृदय में राम के प्रति अपूर्व भक्ति और श्रद्घा उत्पन्न कर जनमानस के साथ तुलसी ने बहुत बडा उपकार किया है । उनकी यह कृति विश्व की अन्य काव्यकृतियों में सर्वोत्तम स्थान रखती है ।
    'रामचरितमानस' भारतीय जनता का कंठहार बना हुआ है। यह महाकाव्य विद्वानों और अल्पशिक्षितों को समान रूप से प्रिय है।
    यह ग्रंथ हमारी श्रद्धा और भक्ति का अनुपम प्रसाद है।

  • Ab Kachhu Kahibe Naahin
    Hazari Prasad Dwivedi
    750 675

    Item Code: #KGP-752

    Availability: In stock


  • Ghar Nikaasi
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1890

    Availability: In stock


  • Ek Thi Chiriya
    Mastram Kapoor
    60

    Item Code: #KGP-917

    Availability: In stock


  • Mandakranta
    Maitreyi Pushpa
    140 126

    Item Code: #KGP-1896

    Availability: In stock

    मंदाक्रान्ता
    श्यामली । एक आदर्श गांव । छोटे-बड़े, जात-पाँत का भेदभाव नहीं । आपस में स्नेह, प्रेम, भाईचारा ऐसा कि लोग मिसाल दे, लेकिन आज श्यामली के लोग अपनी परछाईं तक पर विश्वास नहीं कर पाते । भाई-भाई के बीच रंजिश, घर-घर में क्लेश । जाने कैसा ग्रहण लग गया श्यामली की अच्छाई को ! कुछ भी वैसा न रहा, सिवाय दादा के । बस, बदलते वक्त की आँधी में यही एक बरगद बच रहा है श्यामली में ।
    और सोनपुरा ! गरीबी, बीमारी, भुखमरी और आपसी कलह से जूझता सोनपुरा आब सचमुच सोने-सा दमक रहा है । एकता और आत्मविश्यास से अजित स्वाभिमान और खुशहाली की दमक ।
    एक बहुत पुरानी कहावत है--'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।' श्यामली का मन हार गया, सोनपुरा का मन जीत गया । एकता, प्रेम, भाईचारा, सदूभाव, सामाजिक चेतना आदि के बारे में हम बहुत बार भाषण सुनते रहते हैं और उन्हें किताबी बातें मानकर अनदेखा करते आए हैं, लेकिन सोनपुरा ने इन शब्दों के मर्म को समझ लिया शायद और उन्हें अपनी दिनचर्या में उतार लिया ।
     इन बातों ने गाँवों के प्रति मेरी धारणा, मेरे सरोकार और चिंतन को बेहद प्रभावित किया, जिसे मैंने अपने उपन्यास 'इदन्नमम' के माध्यम से अपने पाठकों के साथ बांटने की अपनी जिम्मेदारी का भरसक सावधानी और ईमानदारी से निर्वाह करने का प्रयास किया । उसी उपन्यास पर आधारित है प्रस्तुत नाटक मंदाक्रान्त ।
    --मैत्रेयी पुष्पा
  • Godhooli (Paperback)
    Bhairppa
    150

    Item Code: #KGP-1414

    Availability: In stock

    गोधूलि
    ‘वंशवृक्ष’, ‘उल्लंघन’ तथा ‘पर्व’ जैसे महान् उपन्यासों के यशस्वी कृतिकार श्री भैरप्पा के श्रेष्ठतम उपन्यासों में है—‘गोधूलि’। कर्नाटक के ग्रामीण अंचल के माध्यम से भैरप्पा ने भारतीय अस्मिता की पहचान को ‘गोधूलि’ में सांस्कारिक गौरव के साथ उभारा है।
    प्रामाणिकता के साथ निर्लिप्तता भैरप्पा के लेखन की विशेषता है, जो ‘गोधूलि’ में उभरकर सामने आई है। ‘गोधूलि’ के कई संस्करण कन्नड़ में निकल चुके हैं। कन्नड़ तथा हिंदी में यह उपन्यास फिल्माया भी जा चुका है।
    गोधूलि’ जीवन के प्रति आस्था और मूल्यों के संघर्ष का संकेत है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar (Paperback)
    Ajit Kumar
    90

    Item Code: #KGP-1384

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजितकुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'उपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kahani Samagra : Nasera Sharma(3Vols.)
    Nasera Sharma
    2100 1785

    Item Code: #KGP-375

    Availability: In stock

    प्रख्यात कथा-लेखिका नासिरा शर्मा की कहानियाँ  समकालीन स्त्री रचनाकारों की कहानियों से कई मायनों में अलग और सर्वथा नई परिभाषा गढ़ती हुई नजर आती हैं । उनके यहाँ इनसानी रिश्ते केवल खून से ही नहीं, संवेदनाओं के उन तंतुओं से निर्मित होते हैं, जो इनसानियत के वजूद को बचाए रखने के लिए जारी हैं ।
    पहले खंड की कहानियाँ परिवार, देश-समाज की सीमा को लाँघते हुए ईरान तक की यात्रा कराती हैं । ईरान के अपने प्रवास काल के दौरान लेखिका ने जिस शिद्दत से वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति को आत्मसात् किया, उसको बहुत प्रभावी ढंग से उन्होंने इन कहानियों में अभिव्यक्त भी किया है ।  इस बहाने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों की भी लेखिका शिनाख्त करती हैँ। इस खंड की कई कहानियों में लेखिका अपने अतीत के पन्ने उलटते हुए उन क्षणों को वर्तमान संदर्भों से पुन: जीवंत करने का प्रयत्न करती है, जिन पर समय की बेशुमार परतें चढ़ चुकी हैं । दरअसल इन कहानियों के जरिए लेखिका अपने अतीत में घटित उन सामाजिक-राजनीतिक घटनाओँ की पड़ताल बदले हुए समय में करती हैं, जिनका संबंध वर्तमान से विच्छेद नहीं हुआ है ।
    दूसरे खंड की कहानियाँ इनसान के भीतर मौजूद शैतान को बाहर खींच निकालती हैं। सत्तालोलुपता की हवस में इनसान के हैवान में रूपांतरण की ये कहानियाँ अनेक सवालों को उठाती हैं। धर्म-स्थापना के नाम पर किसी भी प्रकार के अधार्मिक और अमानवीय क्रियाकलापों को जायज़ ठहराने वाली बीमार मानसिकता को भी ये कहानियाँ अनावृत करती हैं। इन कहानियों में समाज के निचले तबके के उन लोगों के दारुण यथार्थ की तस्वीर भी मौजूद है, जो अपना सब कुछ न्योछावर करके किसी भी देश-समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार करते हैं। बावजूद इसके शक्तिसंपन्न और सामंती मानसिकता के लोग उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।
    तीसरे खंड में लेखिका द्वारा पिछले तीन दशक में लिखी गई कहानियाँ सम्मिलित हैं । इनमें कुछ लंबी और कुछ लघु कथाएँ भी हैं । कथानक और घटनाक्रम के आधार पर इस खंड की कहानियाँ पूर्ववर्ती दो खंडों की कहानियों से कूछ अलग नजर आती हैं । इसका कारण यह है कि इस खंड की कहानियों में लेखिका ने अपनी दृष्टि के  विस्तार को थोड़ा संघनित किया है । यही वजह है कि इनमें देश-समाज-राजनीति-इतिहास से जुड़ी कहानियों के स्थान पर इनसानी नस्ल की प्रवृतियों पर आधारित कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं । बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जिनकी आँखें बारीक़ से बारीक रेशे को पकड़ती हैं, जिनके कान महीन से महीन आवाज को सुनते हैं और नाक हलकी से हलकी गंध ग्रहण करती है । ऐसे लेखकों को हम सहस्राक्षी लेखक भी कह सकते हैं । नासिरा शर्मा भी ऐसी ही लेखिका ।
    इनसानी मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण करती ये कहानियाँ लेखिका के भाषा-प्रवाह और ट्रीटमेंट के प्रति सजगता को भी प्रमाणित करती हैं ।
  • Gehoon Ghar Aaya Hai
    Divik Ramesh
    175 158

    Item Code: #KGP-1893

    Availability: In stock

    गेहूँ घर आया है
    ‘रास्ते के बीच’ से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित हिंदी कवि दिविक रमेश बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। 38 वर्ष की आयु में ही ‘रास्ते के बीच’ और ‘खुली आँखों में आकाश’ कविता-संग्रहों पर सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलना उनकी कविताओं की महत्ता को रेखांकित करता है। उनकी अब तक की कविता-यात्रा को इस संग्रह में हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने अपनी रुचि के अनुसार चुनिंदा ढंग से प्रस्तुत किया है। निःसंदेह इससे पाठकों का एक बड़ा हित सधेगा।
    युवा कवि हेमंत कुकरेती की धारणा है कि दिविक रमेश की "कविताओं में हम जिंदगी से प्यार करने वाले मन को महसूस कर सकते हैं। वह सुख-दुःख से रची ज़िंदगी में डूबकर ही जीवन का वास्तविक अर्थ हासिल करता है। इसीलिए उसका संबोधन सीधे पृथ्वी, काल, हवा, रात, धूप और अंततः जीवन से है। आसानी से समझ में आने वाली ये कविताएँ किताबी अनुभववाद का भाषानुवाद नहीं हैं। सरलीकरण से बचते हुए दिविक रमेश जीवन की जटिलताओं को आसानी से कह देते हैं और उनका इतना सहज और स्वाभाविक होकर कहने में सफल होना कई बार हैरत में डालता है...।" (‘इंडिया टुडे’, 10 जनवरी, 2001)
    और ‘छोटा-सा हस्तक्षेप’ की कविताओं पर बोलते हुए प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा--इस संग्रह को पढ़कर उन्हें प्रीतिकर आश्चर्य हुआ। कवि दिविक रमेश ने बहुत लंबी छलाँग लगा दी है। कविताओं में कई तरह की आवाजें हैं। जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, ये कविताएँ उनसे हटकर हैं। दिविक रमेश ने कविता की एक नई आवाज़ विकसित कर दी है। अशोक वाजपेयी और विष्णु खरे जैसे रचनाकारों ने इन कविताओं को सराहा है। ‘यात्रांत’ एक अद्भुत कविता है। रूस पर बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन रूस के अनुभव पर लिखी गई कविता बहुत ही बारीक है। हिंदी में पहली बार ऐसी कविता संभव हुई है। हिंदी में ‘भूत’ जैसी कविता नहीं है। फैंटेसी की बहुत बात की जाती है, लेकिन फैंटेसी यहाँ देखिए। यह एकमात्रा ऐसा संग्रह है, जिसमें एक साथ दर्जन से ऊपर उत्कृष्ट कविताएँ हैं।   
  • Swami Ram Tirath Ki Shreshtha Kahaniyan
    Jagnnath Prabhakar
    80 72

    Item Code: #KGP-9140

    Availability: In stock

    स्वामी रामतीर्थ की श्रेष्ठ कहानियां जहाँ अत्यंत रूचि-मोहक है, वहां उसका दामन उज्ज्वल प्रेरणाओं और सुनहले शिक्षा-तत्वों से जगमगा रहा है तथा ह्रदय व मन को आलोकित किये देता है । 
    प्रत्येक कहानी के अंत में कुछ शब्दों द्वारा कहानी में निहित शिक्षा-तत्त्व का संकेत दिया  गया है । यही ऐसा न किया जाता, तो इन कहानियों एवं स्वामी जी के उद्देश्य से न्याय नहीं हो सकता था । स्वामी जी ने प्रत्येक कहानी का उद्भावना केवल इसीलिए किया था की उसके रोचक माध्यम से अपने श्रोताओं एवं पाठकों के निकट विषय की गंभीरता तथा दुरूहता बोधगम्य व सरल हो जाये और साथ ही साथ शिक्षा के तत्त्व भी उजागर हो उठें । 
  • Raastrakavi Maithili Sharan Gupta Aur Saaket
    Prof. Surya Prasad Dixit
    300 270

    Item Code: #KGP-9136

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और साकेत 
    राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का काव्य परिमाण तथा स्तर, दोनों दृष्टियों से महत् है और अद्यावधि प्रासंगिक भी । गुप्त जी ने पारंपरिक वस्तु-शिल्प का नवीकरण किया, ख़डीबोली को काव्योपम बनाया, पुराख्यानों को आधुनिकता-बोध से जोड़ा और कविता को जन-संवाद की दिशा में मोडा । उन्होंने वाचिक परंपरा का पुनरारंभ करके स्वातंत्र्य-समर की कालावधि में एक विशिष्ट कोटि का जन-प्रबोधन किया । उनका जैसा विशद रचना-संसार किसी अन्य आधुनिक कवि का नहीं है ।
    'साकेत' गुप्त जी की सर्वोच्च सिद्धि है। उसके समतुल्य प्रबंधपदुता, कथ्य-कौशल और भाव-संपदा बहुत कम महाकाव्यों में प्राप्य है ।
    'साकेत' पर अनेक समीक्षाएं प्रकाशित हुई है, किन्तु उसके मूल प्रतिपाद्य को अब तक परखा-पहचाना नहीँ जा सका था । इस ग्रंथ के प्रणेता प्रो० दीक्षित की स्थापना है कि यह एक अंचल विशेष (साकेत) को नायक-पद पर प्रतिष्ठित कर रचा गया महाकाव्य है, जिसे आंचलिक प्रबंध की संज्ञा दी जा सकती है । 'साकेत' एक ओर रामोपासकों का दिव्या धाम है और दूसरी ओर राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना, पुरातत्त्व एवं उच्च उदात्त भारतीय आदर्शों से अभिमपिडत पुण्यभूमि भी, अत: वैष्णव भक्त, साथ ही राष्ट्रकवि गुप्त जी की पूर्ण तदात्म परिणति इसमें फलित हुई है ।
    यह समीक्षा जितनी मौलिक है, उतनी ही परीक्षोपयोगी भी। इसे अपने जीवनकाल में स्वयं राष्ट्रकवि ने भावविभोर होकर सराहा था । वस्तुत: सूक्ष्म, सुविचारित, संयत कृति समीक्षा है यह ।
  • Maanush Gandh
    Suryabala
    200 180

    Item Code: #KGP-53

    Availability: In stock

    मानुष-गंध
    अपने इस कथा-संग्रह में सूर्यबाला फिर से कथ्य और शिल्प के अपने पुराने प्रतिमानों को तोड़ती नजर आती हैं।
    एक तरफ ‘क्रासिंग’ और ‘क्या मालूम’ जैसी कहानियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों के कुछ अनूठे और अबोध रहस्यों को थहाती हैं तो दूसरी तरफ ‘जश्न’ और ‘तिलिस्म’ भावुकता को थिराते हुए एक विरल कथा-रस की सृष्टि करती हैं।
    कुछ ऐसा लगता है जैसे लेखन में चलने वाले ट्रेंड, फैशन से सूर्यबाला को परहेज-सा है। लेकिन इसका अर्थ, समय की तल्ख सच्चाइयों से मुकरना या उन्हें नकारना हर्गिज नहीं है। इसी तरह अपनी कहानियों के कैनवस पर, ‘लाउड’ और अतिमुखर रंग-रेखाओं के प्रयोग से भी बचती हैं वे। उनके पात्रों के विरोध और संघर्ष मात्र विध्वंसक न होकर विश्वसनीय और विवेकसम्मत होने पर ज्यादा जोर देते हैं।
    सिद्धांतों, वादों और आंदोलनों के ऊपरी घटाटोपों से बचती हुई जिजीविषा की भरपूर मानुष-गंध लेकर चलती हैं इस संग्रह की कहानियाँ।
  • Jyotipunj Himalaya
    Vishnu Prabhakar
    300 270

    Item Code: #KGP-568

    Availability: In stock

    ज्योतिपुंज हिमालय
    किन्हीं के लिए हिमालय प्रणव की भूमि है, किन्हीं के लिए प्रणय की रम्यस्थली, कोई यहाँ प्रेरणा पाता है तो किसी के लिए यह पलायन का स्थान है। ये सब तो मानव की सीमित कल्पना की सीमा-रेखा के रूप हैं। अपने आप में तो यह मूक तपस्वी सौंदर्य और साधना में कोई अंतर नहीं मानता। इसीलिए किसी भी कारण से हो, सर-सरिताओं, वृक्ष-पादपों, पशु- पक्षियों और औषधियों के समान ही मानव को भी उसने सदा शरण दी है। शरण के वे स्थान आज भी वर्ष में आठ मास तक मानवीय क्रीड़ा से गूँजते रहते हैं। उसकी छोटी-छोटी चोटियों पर तो वर्ष-भर बस्तियाँ बसी रहती हैं, परंतु सर्वोच्च शिखरों पर भी मनुष्य के चरण-चिह्न अंकित हो गए हैं। 
    हिमालय आयु की दृष्टि से संभवतः सबसे तरुण गिरिमाला है, परंतु प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से कदाचित् यह सर्वोच्च पर्वत संसार में सर्वश्रेष्ठ है।
    इसकी विशिष्टता अर्थात् झीलों और नदियों की प्रमुखता, प्राकृतिक वैभव की संपन्नता, अनुपम सुंदरता और सुषमा के कारण ही न केवल भारतवासी, बल्कि दूसरी जातियों के लोग भी इसे देवताओं का आवासगृह मानते रहे हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक में उत्तरकाशी, गंगोत्री, गोमुख और तपोवन की यात्राएँ इसके महत्त्व को और भी बढ़ा देती हैं।
  • Kya Haal Sunaavaan
    Narendra Mohan
    390 351

    Item Code: #KGP-696

    Availability: In stock


  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla (Paperback)
    Rita Shukla
    180

    Item Code: #KGP-510

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ऋता शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    175 158

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Kavi Ne Kaha : Vishnu Khare
    Vishnu Khare
    150 135

    Item Code: #KGP-1873

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: विष्णु खरे
    मैंने जब विष्णु खरे की कविताओं को यह जानने के उद्देश्य से पढ़ना शुरू किया कि उनकी कविता का संसार किन तत्त्वों से बना है तो मुझे अत्यंत स्फूर्तिदायक अनुभव हुआ। एक के बाद एक काफ़ी दूर तक मुझे ऐसी कविताएँ मिलती रहीं जिन्होंने मुझे समकालीन जीवन के त्रासद से लेकर सुखद अनुभव तक से प्रकंपित किया। सबसे अधिक कविताएँ सांप्रदायिकता और फ़ासिस्ट मनोवृत्ति के जोर पकड़ते जाने को लेकर लिखी गई हैं। ‘शिविर में शिशु’ गुजरात के दंगे से संबंधित है, ‘चुनौती’ शीर्षक कविता में धर्म-भावना के ख़तरनाक रूप का संकेत है, ‘न हन्यते’ में दंगाइयों का रोंगटे खड़े कर देने वाला बयान है, ‘गुंग महल’ भी धार्मिक कट्टरता को ही सामने लाती है और ‘हिटलर की वापसी’ शीर्षक कविता जर्मनी की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। विष्णु खरे की ख़ूबी है कि उनकी कविताएँ अधिकांश वामपंथी कवियों की तरह सिर्फ़ जज़्बे का इज़हार नहीं करतीं बल्कि अपने साथ सोच को भी लेकर चलती हैं, जिससे उनमें स्थिति की जटिलता का चित्राण होता है और वे सपाट नहीं रह जातीं।...
    विष्णु खरे की असली कला और उनका तेवर ‘गुंग महल’ शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है, जिसका अंत जितना ही सशक्त है उतना ही कलात्मक--पाठकों को अनुभूति, सोच और कल्पना तीनों ही स्तर पर उत्तेजित करने वाला। ‘विनाशग्रस्त इलाके से एक सीधी टी.वी. रपट’ कविता में टी.वी. रपट शैली में अनुमानतः गुजरात के भूकंप का ज़िक्र है। अंतर्वस्तु की दृष्टि से इसमें भारत के नैतिक विनाश का ऐसा चित्रण है कि एक बार तो यह प्रतीति होती है कि विष्णु खरे हमारे नैतिक विनाश के ही कवि हैं।...
    विष्णु खरे का गहरा लगाव इस देश की साधारण जनता और साधारण जीवन से है, जिसे वे आधुनिक सभ्यता के बड़े परिप्रेक्ष्य में भी रखकर देखते हैं।...इन्हीं साधारण जनों में औरतों को भी गिनना चाहिए। आकस्मिक नहीं कि इस संग्रह में औरतों पर भी तीन-चार बहुत अच्छी कविताएँ हैं। विष्णु खरे का यथार्थ चित्रण इतना गहरा होता है कि उन्हें फैंटेसी में लिखने की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने उस गद्य को आवश्यकतानुसार अनेक रूप प्रदान करके उसे ऐसा बना दिया है कि किसी काव्य और कला-मर्मज्ञ को उससे कोई शिकायत न हो।  
    --नंदकिशोर नवल
  • Vipradas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-1404

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-869

    Availability: In stock

    कहानियां कहानियां होते हुए भी कहीं सच भी होती हैं । बल्कि सच से भी अधिक सच । हिमांशु जोशी की ये कहानियां उसी सच को रेखांकित करती अनाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती हुई कई प्रश्न जगाती हैं ।
    इन रचनाओं की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, इनकी सरलता, सहजता एवं मार्मिकता। सरल शब्दों में बड़ी बात कह देना बड़ा कठिन कार्य है। परंतु हिमांशु जोशी की इस महारत ने आज के अनेक कथाकारों के बीच उनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हैं । शायद इसीलिए ये कहानियां कहानियां  होते हुए भी जिए हुए जीवन के जीवंत अंश-सी लगती हैं । इनमें स्पदित होता यथार्थ, इन्हें सच के इतने निकट ले जाता है कि ये सच का ही पर्याय बन जाती हैं । किसी की अपनी ही जीवन-गाथा के सजीव दृश्य !
    इनमें धुँधलाए गाँव हैं मैले कस्बे, भीड़-भरे महानगर ! दिन-रात हांफते-कांपते, यंत्रवत जीते लोग ! उनके दुःख-सुख । उनकी समस्याएं ! एक नन्हे-से संसार में समाए कई-कई संसार !
    गहन अनुभव एवं अनुभूतियों के ताने-बाने से बुनी  इन रचनाओं के कुछ अलग रंग हैं। अलग राग ।
  • Kaalchiti
    Shekhar Mallik
    350 315

    Item Code: #KGP-9320

    Availability: In stock

    यह उपन्यास है...
    उस हौसले और हिम्मत के लिए, 
    जो अपने हक के लिए लड़ती है...
    उस आदिम, जीवट, 
    अथक संघर्षशीलता के लिए...
    उस इनकलाबी भावना के लिए, 
    जो हर दौर में जिंदा होती है...
    सत्ता पोषित हिंसा के खिलाफ...
    जन-विमुख, भ्रष्ट सत्ता और 
    काॅरपोरेट गठबंधन के खिलाफ...
    उस आततायी सत्ता के खिलाफ...
    जो सोनी सोरी जैसों के खिलाफ 
    घृणित षड्यंत्र रचती है!
    निर्धन, निहत्थे, शांतिप्रिय आदिम 
    मनुष्यों का संहार करने वाली
    राजनीति के खिलाफ...!

    प्रस्तुत उपन्यास अर्ध गल्प और अर्ध समकालीन यथार्थ! क्योंकि चाहे कथा और पात्रा काल्पनिक हों, कुछ घटनाएँ वास्तविकता पर आधारित हैं। पहाड़-पानी और वन एवं भूमि सहित सामान्य मनुष्यों पर बलपूर्वक अधिकार करना अनैतिक है। केवल आम जन के समसामयिक उत्पीड़न को व्यक्त करना और ऐसे हिंड्ड कृत्यों की निंदा करना ही इस रचना का एकमात्र ध्येय है। जनजातीय समुदायों, मूलवासियों और आदिम संस्कृतियों पर इस दौर में हो रहे सत्ता-पोषित दमन का प्रतिवाद करना प्रत्येक विवेकशील नागरिक का कर्तव्य है। यह गद्य-पुस्तक सर्वमान्य मानवाधिकारों, सच्चे लोकतंत्र के पक्ष में और मनुष्य की स्वतंत्रता के हनन के सभी प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध है।
  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Vriksh Tha Hara-Bhara
    Surendra Tiwari
    150 135

    Item Code: #KGP-1886

    Availability: In stock

    सुश्री ममता किरण के कविता-संग्रह ‘वृक्ष था हरा-भरा’ की टंकित प्रति देख गया। उनकी कविताओं से यह मेरा पहला परिचय था। पहला प्रभाव यह पड़ा मेरे मन पर कि प्रचलित लोकप्रिय कविता और सुपरिचित समकालीन कविता के बीच से एक रास्ता निकालने की कोशिश इनके यहाँ दिखाई पड़ती है। यह कोशिश दिलचस्प है और इसलिए सहज पठनीय भी। यहाँ दो प्रकार की कविताएँ देखने को मिलीं। एक जो बाकायदे गीत की शैली में लिखी गई हैं और दूसरी वे जो मुक्त छंद को माध्यम बनाकर लिखी गई हैं।
    इस संग्रह में जहाँ जाकर मैं रुका, वह ‘संबोधन’ शीर्षक कविता थी, जिसमें ये पंक्तियाँ आती हैं--
    कंक्रीट के इस जंगल में
    एकदम अप्रत्याशित
    एक बुजुर्ग से अपने लिए
    बहूरानी संबोधन सुनकर
    जिस तरह मैं चौंकी
    उसी तरह अनायास
    श्रद्धा से झुक भी गई
    बहूरानी कहने वाले के सामने
    इन पंक्तियों में एक मानवीय संस्पर्श है जो अच्छा लगता है। कहीं-कहीं एक शुभाकांक्षा की प्रतिध्वनि भी सुनाई पड़ती है कुछ पंक्तियों में और शायद इस रचनकर्त्री की कविता का मूल स्वर भी यही है। अपने अस्तित्व से नदियों-पोखरों और झीलों को भर देने के आवेग के साथ-साथ ‘प्यार का पैगाम’ बन जाने और ‘बुझे चूल्हों की आँच’ बन जाने की स्त्रीसुलभ संवेदना भी यहाँ दिखाई पड़ सकती है। अपने इसी मूल स्वर के कारण यह संग्रह प्रेमी पाठकों तक पहुँचेगा, ऐसा मुझे लगता है।
    ---केदारनाथ सिंह
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Cour (Paperback)
    Ajeet Kaur
    175

    Item Code: #KGP-7010

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजीत कौर
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरों वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिडिया’ , 'चीख एक उकाब की हैं' तथा 'नया साल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee (Paperback)
    Ashok Vajpayee
    90

    Item Code: #KGP-1432

    Availability: In stock


  • The 10-Pound Shred (Paperback)
    Tommy Europe
    295

    Item Code: #KGP-346

    Availability: In stock

    The 10-Pound Shred lets you bring Tommy Europe's tough-love, bootcamp-style workouts home. In just 31 days, Tommy will take you from flab to fit, helping you shed 10 poundsor more in the process. Each day has complete, easy-to- understand exercise instructions with step-by-step photos. There's no complicated flipping around to figure out what you need to be doing–and no free breaks, either! You don't need fancy equipment or even a gym membership–just a good pair of shoes and the willingness to get moving. There's also a nutritious, flexible meal plan designed to help you set a new, lifelong pattern of healthy eating. And through it all, Tommy's there with his signature blend of drill sergeant and inspiring friend, pushing you to reach higher, go faster and shred a little harder.
    Whether you have a wedding coming up, want to look great at the beach or just want to have more energy, Tommy will help you lose those 10 pounds. You're going to sweat, you're going to hurt–but you're going to love the results. So stop making excuses, put down that cupcake and pick up The 10-Pound Shred.
  • Ek Svich Tha Bhopal Mein
    Narendra Nagdev
    215 194

    Item Code: #KGP-379

    Availability: In stock


  • Kaag Ke Bhaag Bare
    Prabha Shanker Upadhayaye
    145 131

    Item Code: #KGP-1811

    Availability: In stock

    काग के भाग बड़े
    व्यंग्य को भले ही लेटिन के ‘सेटुरा’ से व्युत्पन्न बताया गया हो, किंतु भारत के प्राचीन साहित्य में व्यंग्य की बूझ रही है। ऋग्वेद में मंत्रवाची मुनियों को टर्राने वाले मेढकों की उपमा दी गई है। भविष्येतर पुराण तथा भर्तृहरिशतकत्रयं में खट्टी-मीठी गालियों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य प्रसंग उत्पन्न किए हैं— ‘गालिदानं हास्यं ललनानर्तनं स्फुटम्’, ‘ददतु ददतु गालीर्गालिगन्तो भवन्तो’। वाल्मीकि रामायण में मंथरा की षड्यंत्र बुद्धि की कायल होकर, कैकेयी उसकी अप्रस्तुत प्रशंसा करती है, "तेरे कूबड़ पर उत्तम चंदन का लेप लगाकर उसे छिपा दूँगी, तब तू मेरे द्वारा प्रदत्त, सुंदर वस्त्र धारण कर देवांगना की भाँति विचरण करना।" रामचरितमानस में भी ‘तौ कौतुकिय आलस नाहीं’ (कौतुक प्रसंग) तथा राम कलेवा में हास्य-व्यंग्य वार्ताएँ हैं। संस्कृत कवियों कालिदास, शूद्रक, भवभूति ने विदूषक के ज़रिए व्यंग्य-विनोद का कुशल संयोजन किया है, "दामाद दसवाँ ग्रह है, जो सदा वक्र व क्रूर रहता है। जो सदा पूजा जाता है और सदा कन्या राशि पर स्थित है।"
    लोक-जीवन में तमाशेबाज़ी, बातपोशी, रसकथाओं, गालीबाज़ों, भांडों और बहुरुपियों ने हास्य-व्यंग्य वृत्तांत वर्णित किए हैं। विवाह और होली पर्व पर हमारा विनोदी स्वभाव उभर आता है। अतः दीगर यह कि विश्व में हास्य-व्यंग्य के पुरोधा हम ही हैं।
    अस्तु, इस व्यंग्य-संग्रह को विषय एवं शैली-वैविध्य के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। इसमें व्यंग्य- कथा, निबंध, गोष्ठी, प्रश्नोत्तरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस, संवाद, साक्षात्कार, सर्वे आदि शिल्पों की चौंतीस व्यंग्य रचनाएँ संकलित की गई हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    220 198

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Doosara Gazal Shatak
    Sher Jung Garg
    200 160

    Item Code: #KGP-775

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Mere Saakshatkaar : Chitra Mudgal
    Chitra Mudgal
    335 285

    Item Code: #KGP-557

    Availability: In stock


  • Stri Srokaar
    Asha Rani Vhora
    125 113

    Item Code: #KGP-1343

    Availability: In stock

    ‘और ने जन्म दिया मरदों को, मरदों ने उसे बाजार दिया।’
    यहां बाजार का अर्थ सीमित था यानी वेश्या का कोठा। पर अब बाजार का अर्थ विस्तार पा गया है यानी उपभोक्ता बाजार में स्त्री या स्त्री का बाजार मूल्य। बदले समय में स्त्री अपनी भूमिका तलाशती कहां आ पहुंची है? ‘ग्लैमर’ के इस बाजार में खड़ी आज की स्त्री ने क्या पाया, क्या खोया। इसकी जांच-पड़ताल करनी होगी।
    -इसी पुस्तक से

    स्त्री की छवि हो या भूमिका, बात अधिकार की हो या सरोकार की, या दोनों के सामंजस्य से सफल, गर्वोन्नत जीवन जीने की। स्वतंत्रता कितनी सीमांत कहां? शोषण क्यों, उससे मुक्ति कैसे? स्त्री का सशक्तीकरण कैसे हो? मां के नाते पुरुष को संस्कारित कैसे करें? समाज की नियंता कैसे बनें? नई सदी को दी गई ‘महिला-युग’ की संज्ञा को साकार कैसे करें? आदि आधुनिक स्त्री के जीवन से जुड़े ऐसे ढेरों सवालों के उत्तर तलाशती और तनावमुक्त संतुलित जीवन के गुर सिखाती एक प्रेरक पुस्तक।
  • Vigyan Ka Itihaas
    Dyanand Pant
    300 270

    Item Code: #KGP-748

    Availability: In stock

    विज्ञान का इतिहास
    विज्ञान की अद्भुत प्रगति विश्व-भर के चिंतकों और कर्मठों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफलन है। धर्म, देश, जाति, भाषा आदि की सीमाएँ विज्ञान को बाँध न सकीं। प्रस्तुत पुस्तक में इसी सार्वभौम विज्ञान की समग्र गाथा का रोचक वर्णन है। आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव की विलक्षण उपलब्धियों वाली इस विश्वव्यापी बौद्धिक यात्रा का लेखा-जोखा बिना पूर्वग्रहों के प्रस्तुत करने और पाश्चात्य लेखकों के पक्षपातपूर्ण प्रतिपादन का पर्दाफाश करने का लेखक का प्रयत्न सराहनीय है।
    जनसाधारण सुलभ भाषा और रोचक शैली में लिखी अपने विषय की हिंदी की यह प्रथम मौलिक पुस्तक ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ पाठक में चिंतन और तर्क की वैज्ञानिक विधि के विकास में भी सहायक होगी।
  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi
    Rajesh Joshi
    190 171

    Item Code: #KGP-384

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Sabeena Ke Chaalees Chor
    Nasera Sharma
    295 266

    Item Code: #KGP-31

    Availability: In stock

    सबीना के चालीस चोर
    'सबीना के चालीस चोर' इस संग्रह की बाकी कहानियों के कथा-सूत्रों का बुनियादी विचार है । सबीना एक छोटी लड़की है, जो बडों जैसी दृष्टि और समझ रखती है । उसका मानना है कि फसाद कराने वाले, दूसरों का हक मारने वाले ही चालीस चोर है, जो हमेशा कमजोर वर्ग को दबाते हैं । इसी सबके बीच बार-बार अपने होने का अहसास दिलाती छोटी-छोटी मगर समझदार लड़कियां समूचे संघर्ष का हिस्सा है, अलग-अलग कहानियों से अलग-अलग किरदार निभाती सबीना से लेकर गुल्लो, सायरा, चम्पा, मुन्नी जैसी लड़कियों में नासिरा शर्मा खुद को ही 'प्लांट' करती हैं।
    दर्द की बस्तियों की ये कहानियाँ जिस भारतीय आबादी का प्रतिनिधित्व करती है वही इस देश की बुनियाद हैं ।  दरअसल ये ही कहानियां हिंदुस्तान की सच्ची तस्वीर हैं, जिनका अंतर्संगीत  इनके कथानकों के तारों में छिपा है, जिन्हें जरा-सा छेड़ो तो मानवीय करुणा का अधाह सागर ठाठें मारने लगता है । कहानियों का कैनवास और लेखक के सरोकार में जहाँ विस्तार एव गहराई है वहाँ घनीभूत और चौतरफा व्यथा है ।
    इन कहानियों की भाषा जिंदा भाषा है, जिसमें निजता और लोक-गंध की मिठास है। एक वरिष्ट कथाकार की ये कहानियां सचमुच उसके संपूर्ण कथा-संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं ।
  • Dhoop Dhalne Ke Baad
    Mahip Singh
    225 203

    Item Code: #KGP-627

    Availability: In stock


  • Naachane Vaalee Aankhen
    Vibha Devsare
    100 90

    Item Code: #KGP-981

    Availability: In stock

    तीन-चार घंटे की बस यात्रा के बाद गीता और रमेश संतू काका के गांव रायगढ़ पहुंच गए। चारों ओर हरे लहराते खेत, बड़े-बड़े छायादार पेड़ों की छांव और अमराइयों के बीच से गुजरते हुए गीता और रमेश को बहुत अच्छा लग रहा था। खपरैल और मिट्टी के बने छोटे घर, कुएं और तालाब। गांव का ऐसा दृश्य उन्होंने सिर्फ किताबों में पढ़ा था, या फिर सिनेमा में देखा था। लेकिन जब गीता और रमेश साक्षात् गांव के उस मनोहारी दृश्य से गुजर रहे थे तो उन्हें बहुत आनंद आ रहा था। संतू काका के घर पहुंचकर तो उन्हें बहुत मजा आया। संतू काका भी गीता और रमेश को आया देखकर बहुत प्रसन्न हुए। काकी और संतू काका ने गीता और रमेश की बहुत आवभगत की। संतू काका बोले, ‘‘देखो बच्चों, हमारा छोटा सा गांव है। शहर जैसी सुख-सुविधा तो यहां मिलेगी नहीं, लेकिन हम कोशिश यही करेंगे कि तुम लोग यहां खूब खुश रहो।’’
    —इस पुस्तक ‘किस्सा हबूचंद की सफाई का’ कहानी से

  • Das Pratinidhi Kahaniyan : S.R. Harnot (Paperback)
    S. R. Harnot
    180

    Item Code: #KGP-7214

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : एस. आर. हरनोट

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिंदी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठकों, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियां भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी ‘कहानीकार’ होने का अहसास बना रहा हो। भूमिकास्वरूप लेखक का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। 
    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार एस. आर. हरनोट ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैंµ‘मां पढ़ती है’, ‘बेजुबान दोस्त’, ‘मिट्टी के लोग’, ‘दीवारें’, ‘माफिया’, ‘चीखें’, ‘सड़ान’, ‘सवर्ण देवता दलित देवता’, ‘चश्मदीद’ तथा ‘लाल होता दरख्त’।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार एस. आर. हरनोट की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद संतोष का अनुभव करेंगे।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Uday Prakash
    Uday Prakash
    395 356

    Item Code: #KGP-904

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : उदय प्रकाश 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उदय प्रकाश  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं: ‘मौसाजी’, ‘टेपचू’, ‘तिरिछ’, ‘अरेबा-परेबा’, ‘राम सजीवन की प्रेम-कथा’, ‘डिबिया’, ‘हीरालाल का भूत’, ‘दिल्ली की दीवार’, ‘...और अंत में प्रार्थना’ तथा ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उदय प्रकाश  की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Goma Hansti Hai
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-1991

    Availability: In stock

    गोमा हंसती है
    शहरी मध्यवर्ग के सीमित कथा-संसार में मैत्रीय पुष्पा का कहानियाँ उन लोगों को लेकर आई हैं, जिन्हें आज समाजशास्त्री 'हाशिए के लोग' कहते है । वे अपनी 'कहन' और 'कथन' में ही अलग नहीं हैं, भाषा और मुहावरे में भी ‘मिट्टी की गंध' समेटे हैं ।
    'गोमा हंसती है' की कहानियों के केंद्र में है नारी, और वह अपन सुख-दु:खों, यंत्रणाओं और यातनाओं में तपकर अपनी स्वतंत्र पहचान माँग रही है । उसका अपने प्रति ईमानदार होना ही 'बोल्ड' होना है, हालाँकि यह बिलकुल नहीँ जानती कि वह क्या है, जिसे 'बोल्ड होने' का नाम दिया जाता है । नारी-चेतना की यह पहचान या उसके सिर उठाकर खड़े होने में ही समाज की पुरुषवादी मर्यादाएं या महादेवी वर्मा के शब्दों में 'श्रृंखला की कडियाँ' चटकने-टूटने लगती है । वे औरत को लेकर बनाई गई शील और नैतिकता पर पुनर्विचार की मजबूरी पैदा करती है । 'गोमा हंसती है' की कहानियों की नारी अनैतिक नहीं, नई नैतिकता को रेखांकित करती है ।
    इन साधारण और छोटी-छोटी कथाओं को 'साइलैंट रिवोल्ट' (निश्शब्द विद्रोह) की कहानियाँ भी कहा जा सकता है क्योंकि नारीवादी घोषणाएँ इनसे कहीं नहीं है । ये वे अनुभव-खंड है जो स्वयं 'विचार' नहीं हैं, मगर उन्हीं के आधार पर 'विचार' का स्वरूप बनता है ।
    कलात्मकता की शर्तों के साथ बेहद पठनीय ये कहानियाँ निश्चय ही पाठको को फिर-फिर अपने साथ बॉंधेंगी, क्योंकि  इनमें हमारी जानी-पहचानी दुनिया का वह 'अलग' और 'अविस्मरणीय' भी है जो हमारी दृष्टि को माँजता है।
    इन कहानियों की भावनात्मक नाटकीयता निस्संदेह हमें चकित भी करेगी और मुग्ध भी। ये सरल बनावट की जटिल कहानियां है ।

    'गोमा हँसती है' सिर्फ एक कहानी नही, कथा-जगत्की एक 'घटना' भी है । -राजेन्द्र यादव

  • Megha Megha Pani De
    Madhukar Singh
    60

    Item Code: #KGP-1155

    Availability: In stock

    मेघा-मेघा पानी दे
    (एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा पर आधारित नाटक)

    गांव की एक डगर। सामने बड़ा-सा चरागाह है। कृष्ण एक ऊंचे टीेले पर बैठा है। तीन-चार लड़के कुछ दूरी पर एक-दूसरे से कटे हुए बैठे हैं। कृष्ण की बंसी के स्वर धीरे-धीरे तेज होते जा रहे हैं।
  • Soochana Ka Adhikaar (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1438

    Availability: In stock


  • Adakara Madhubala : Dard Bhari Jeevan Katha
    Shashi Kant Kinikar
    390 351

    Item Code: #KGP-569

    Availability: In stock

    भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग में कुछ नायिकाओं ने दर्शकों के दिल में एक विशिष्ट स्थान बना लिया था, उनमें से प्रमुख कलाकार मधुबाला अपनी सुंदरता, अपने मुस्कराते चेहरे व विभिन्न तरह के रोल करने के कारण दर्शकों की चहेती कलाकार थीं, विशेषकर जो फिल्म जगत् को पसंद करते थे।
    मधुबाला का जन्म 1933 में और देहांत 1969 में हुआ था। मधुबाला ने मात्र 9 वर्ष की आयु से ही अभिनय करना शुरू कर दिया और तो और लड़कपन में ही फिल्मों में नायिका का रोल करना शुरू कर दिया था। सन् 1950 और 1960 के दशकों में मधुबाला ने उस समय के सारे मुख्य अभिनेताओं के साथ अभिनय किया। मधुबाला इस युग में अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर थीं और इसी युग को भारतीय सिनेमा का स्वर्णकाल कहा जाता है।
    मधुबाला का जीवन उनकी सुंदरता और मुस्कराहट की तरह अच्छा नहीं था। सारा दिन फिल्मों में कार्य करने के बाद भी उन्हें अपने बड़े परिवार को पालने के लिए कार्य करना पड़ता था। अपने बड़े परिवार में वह अकेली जीविका कमाने वाली सदस्य थी और सबका ठीक प्रकार से पालन-पोषण करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती थीं जिस कारण वह बहुत दुखी रहा करती थीं।
    दिलीप कुमार, जो उस समय के शोकाकुल अभिनय के सम्राट माने जाते थे, से प्रेम व कलाकार किशोर कुमार से विवाह दोनों ही विफल रहे। इन विफलताओं ने उनकी पीड़ा को और बढ़ा दिया था। इस सबके अतिरिक्त वह बालपन से ही बहुत दुर्बल थीं और इसी शारीरिक दुर्बलता के कारण भी उन्होंने बहुत कष्ट झेले। शायद इन सब कारणों के होते उनका देहांत इतनी छोटी आयु में हो गया।
    मधुबाला का स्वयं का जीवन भी एक फिल्म की पटकथा के समान ही था। प्रख्यात लेखक शशिकांत किणीकर ने इस पुस्तक में मधुबाला का जीवन-दर्शन बहुत ही निपुणता से प्रस्तुत किया है जो पाठकों के दिलों को छू लेगा।
  • Hausale Buland Hain (Paperback)
    Suraj Nagar
    100

    Item Code: #KGP-372

    Availability: In stock

    संसार में जो कुछ भी अनूठे, अद्वितीय, अविस्मरणीय, अतुलनीय एवं अद्भुत काम हुए हैं, वे चाहे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, जैसे- स्थापत्यकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, साहित्य-सृजन हो या कोई वैज्ञानिक आविष्कार, सब बुलंद हौसले का परिणाम है। हौसले की उड़ान से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, हर सपना साकार होता है। हौसले बुलंद होना जीवन में प्रसन्नता का सूर्योदय होने जैसा है और हौसले पस्त होना सूर्यास्त होने जैसा है। बचपन से ही मेरे मन में कविताओं की ऐसी पुस्तक लिखने की इच्छा थी, जो निराशा को आशा में बदल दे। गम के काँटों में खुशियों के फूल खिला दे। अमावस की काली रात को दीपावली की तरह जगमगा दे। देश के प्रतिष्ठित किताबघर प्रकाशन, दिल्ली ने मेरे गीतों को पुस्तक का आकार दिया है। जिसका नाम है-‘हौसले बुलंद हैं’।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक के सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय गीतों को साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डा. अलका तोमर ने अपनी अनूठी शैली में अंग्रेजी भाषा में रूपांतरित कर सार्वदेशिक बनाकर चार चाँद नहीं चालीस चाँद लगा दिए हैं। नई ऊर्जा, नया जोश, नई उमंग का संचार करने वाली इस पुस्तक के पहले गीत की रचना मंदोदरी का मायका, कालिदास द्वारा रचित मेघदूत में वर्णित दशपुर, शिवना तट पर स्थित पशुपतिनाथ की नगरी मंदसोर में हुई। रचना का यह क्रम क्षिप्रा तट स्थित ज्योतिर्लिंग मृत्युंजय महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल, झारखंड की राजधानी राँची देश की राजधानी दिल्ली, शंकर के त्रिशूल पर बसी अविनाशी काशी, त्रिवेणी संगम प्रयागराज, यमुना तट स्थित मथुरा गोवर्धन, देवी अहल्या की नगरी इंदौर, नर्मदा तट स्थित ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, सागर तट स्थित मायानगरी मुंबई से चलकर ऐतिहासिक एवं पुरातत्त्व संपदा से भरपूर सूर्य पुत्री ताप्ती तट स्थित बुरहानपुर में पूर्ण हुआ।
    ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक प्रेरणा का पथ पराक्रम का रथ प्रसन्नता की गंगा है। इस पुस्तक की रचना में मुझे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरणा, सहयोग एवं मार्गदर्शन देने वाले सभी बुलंद हौसले वालों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ‘हौसले बुलंद हैं’ पुस्तक पढ़ने वालों के हौसले अवश्य बुलंद होंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
    -सूरज नागर
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Yadav
    Rajendra Yadav
    180 162

    Item Code: #KGP-2077

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र यादव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिंहवाहिनी', 'मैं तुन्हें मार दूँगा', 'वहाँ तक पहुँचने की दौड़', 'रोशनी कहीं है?', 'संबंध', 'सीज फायर', 'मेहमान', 'एक कटी हुई कहानी', 'छोटे-छोटे ताजमहल' तथा 'तलवार पंचहजारी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Shakti Kanon Ki Leela
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-1993

    Availability: In stock

    शक्ति कणों की लीला
    सोच की इकाई के तोड़ने की पहली साजिश दुनिया में जाने किसने की थी... 
    बात चाहे जिस्म की किसी काबलियत की हो, या मस्तक की किसी काबलियत की पर दोनों तरह की काबलिया के एक दूसरी की मुखालिफ़ करार देकर, एक को 'जीत गई' और एक को 'हार गई' कहने वाली यह भयानक साजिश थी, जो इकाई के चाँद सूर्य को हमेशा के लिए एक ग्रहण लगा गई... 
    और आज हमारी दुनिया मासूम खेलों के मुकाबले से लेकर भयानक युद्धों के मुकाबले तक ग्रहणित है... 
    पर इस समय मैं जहनी काबलियत के चाँद सूर्य को लगे हुए ग्रहण की बात करूँगी, जिसे सदियों से 'शास्त्रार्थ' का नाम दिया जा रहा है ।
    अपार ज्ञान के कुछ कण जिनकी प्राप्ति होते हैं, वे कण आपस में टकराने  के लिए नहीं होते । वे तो एक मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति को, दूसरो मुट्ठी में आई किसी प्राप्ति में मिलाने के लिए होते हैं ताकि हमारी प्राप्तियां बड़ी हो जाएँ ... 
    अदबी मुलाकातें दो नदियों के संगम हो सकते है पर एक भयानक साजिश थी कि वे शास्त्रार्थ हो गए... 
    ज्ञान की नदियों को एक-दूसरे में समाना था, और एक महासागर बनना था पर जब उनके बहाव के सामने हार-जीत के बड़े-बड़े पत्थर रख दिए गए, तो वे नदियां सूखने लगीं...  नदियों की आत्मा सूखने लगी... 
    जीत अभिमानित हो गई, और हार क्रोधित हो गई... 
    अहम् भी एक भयानक अग्नि है, जिसकी तपिश से आत्मा का पानी सूख जाता है, और क्रोध भी एक भयानक अग्नि है, जो हर प्राप्ति को राख कर देता है... 
  • Manjhi Na Bajao Vanshi
    Om Bharti
    225 203

    Item Code: #KGP-1883

    Availability: In stock

    माँझी! न बजाओ वंशी
    केदारनाथ अग्रवाल के जीवन और कविता दोनों में एक अनिंद्य प्रेम का भाव विराजता है। जो जीवन में है वह कविता की परिधि से बाहर नहीं है। जहां लोग दांपत्य प्रेम को जीते हुए अपने उत्तरवर्ती जीवन तक आकर ऊब का अनुभव करने लगते हैं, वहीं केदार जी आजीवन इस प्यार से बँधे-बिंधे रहे। हिंदी की काव्य परंपरा में प्रेम का अनूठा और अद्वितीय स्थान है पर है वह परकीया प्रेम से बँधा हुआ। आधुनिक कवियों में  केदारनाथ अग्रवाल का एक विरल उदाहरण है जहाँ वे दांपत्य प्रेम में ही लौकिक-अलौकिक सुखों की अपूर्व व्यंजना कविताओं में संभव करते हैं। जमुन जल तुम जैसा संग्रह तथा अन्य संकलनों की प्रेम कविताएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने प्रेम को दांपत्य की सुखद अनुभूतियों और संवेदना से भरा है। छायावादियों में जो प्रेम लौकिक धरातल से ऊपर उठकर दार्शनिक उपपत्तियों में पर्यवसित हो गया था, सूफी कवियों के यहाँ जो प्रेम ईश्वरीय सत्ता से लगन का पर्याय बन गया है, वह केदारनाथ अग्रवाल जैसे प्रगतिवादी कवि के यहाँ लोक में उपलब्ध प्रेम की कर्मठ जिजीविषा का पर्याय है।
    प्रेम केदारनाथ अग्रवाल की दिनचर्या का ही एक अंग रहा है। वह जीवन की मांसपेशियों में रुधिर की तरह प्रवाहित है। प्रेममय जीवन के सारे काम जीवन के काम हैं। कुरते में बटन नहीं लगी, ऊपर से वह फटा हुआ है, सारा घर अस्त-व्यस्त हो उठा है, न सोपकेस में साबुन, न तेल की एक बूँद, न खोजने से मिल पाता रूमाल, मेजपोश पर धूल, किताब पर प्याला, कॉपी पर औंधा रखा गिलास-कवि अधीर होकर संबोधित करता है पत्नी को कि घर सँवारने कब आओगी। घर की सारी शिष्ट सँवरन पत्नी की देन है-पत्नी जो प्रिय है, जिसके होने से जीवन है।
    कभी ठाकुर प्रसाद सिंह ने ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’ लिखकर रोमानी अनुभूतियों के प्रदेश में एक हलचल मचा दी थी। ‘वंशी और मादल’ के इस गीत को नवगीत के स्थापत्य में नवता के उन्मेष के रूप में देखा गया। गीत स्निग्धता के लिए जाने जाते रहे हैं, उनकी कोमल पदावलियों को केदारनाथ अग्रवाल ने अपने कवि-जीवन में एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में ग्रहण किया है। आज भी हम उनकी कविताएँ पढ़ते हैं तो लगता है, माँझी कहीं दूर वंशी बजा रहा है और उसकी टेर हमारे भीतर सुनाई दे रही है। वह किसी कान्हा की बाँसुरी से कम नहीं है। जीवन में प्रेम हो तो समूची कविता मानवीय प्रेम की व्यंजना में बदल जाती है। केदार जी ने कविता में यही किया है।
     यह संग्रह केदारनाथ अग्रवाल की श्रेष्ठ प्रेम कविताओं का एक गुलदस्ता है।
  • Toro Kara Toro-3 (Parivrajak)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #Kgp-1575

    Availability: In stock


  • Bharatratna Dr. A.P.J. Abdul Kalam : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    240 216

    Item Code: #KGP-1570

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ravindra Kaliya (Paperback)
    Ravindra Kalia
    120

    Item Code: #KGP-430

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : रवीन्द्र कालिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रवीन्द्र कालिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'नौ साल छोटी पत्नी', 'सिर्फ एक दिन', 'बड़े शहर का आदमी', 'अकहानी', 'मौत', 'सत्ताईस साल की उमर तक', 'हथकड़ी', 'चाल', 'सुंदरी' तथा 'रूप की रानी चोरों का राजा' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रवीन्द्र कालिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Doobte Waqt (Paperback)
    Dixit Dankauri
    75

    Item Code: #KGP-7053

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।
    -मोईन अख्तर अंसारी
  • Gardish Ke Din
    Kamleshwar
    250 225

    Item Code: #KGP-794

    Availability: In stock

    गर्दिश के दिन
    ‘गर्दिश के दिन’ बारह भारतीय लेखकों के अपने आत्मकथ्य हैं--केवल उनकी अपनी भीतरी दुनिया के नहीं बल्कि बाहर की दुनिया से जुड़ने और लड़ने के दौरान जो कुछ उन्होंने अनुभव किया है और रचनात्मक संघर्ष के जिस दौर से वे लगातार गुज़रे हैं--उसी सिलसिले का एक आत्मिक और समयगत कथन इन रचनाओं का आधार है।
    इस गर्दिश से सभी गुज़रे हैं--और अभी बहुत से संघर्षशील लेखकों को इससे गुज़रना पड़ेगा, उन लेखकों को खास तौर से जो ‘ललित-लेखन’ 
    के पक्षधर नहीं हैं बल्कि दलित लेखन के लिए प्रतिबद्ध हैं।
    यह ऐसे ही भारतीय लेखकों की अपनी गर्दिश की विवरण-भरी कहानियां हैं।
    ‘सारिका’ के संपादन-काल में यह धारावाही स्तंभ प्रकाशित करना मेरे लिए अपने समकालीन लेखकों के माध्यम से समय की धड़कन को पहचानने का ‘कुतुबनुमा’ रहा है--जिससे मुझे दृष्टि भी मिलती रही है और मैं अपने समकालीनों से देश की हर भाषा की आत्मीय आवाज़ का साक्ष्य पाता रहा हूं और भारतीय युवा रचना की पहचान का जायज़ा भी लेता रहा हूं।
    --कमलेश्वर
  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Qabra Tatha Anya Kahaniyan
    Raj Kumar Gautam
    150 135

    Item Code: #KGP-1845

    Availability: In stock


  • Kahin Kuchh Aur
    Ganga Prasad Vimal
    200 180

    Item Code: #KGP-9067

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao (Paperback)
    Rajendra Rao
    150

    Item Code: #KGP-503

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र राव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लोकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट','छिन्नमस्ता' 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Raseedi Ticket
    Amrita Pritam
    180 162

    Item Code: #KGP-2068

    Availability: In stock


  • Saamveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    120

    Item Code: #KGP-7108

    Availability: In stock

    सामवेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की दूसरी पुस्तक ‘सामवेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें सामवेद के 93 मन्त्रों की व्याख्याएँ बिलकुल नवीन एवं मौलिक रूप से की गई हैं। आज का युवा संगीत के स्वरों पर थिरकता है, नई-नई शैलियों के गीत गुनगुनाता है। उसके लिए प्रस्तुत हैं संगीत के मूल ग्रन्थ सामवेद के मन्त्र। इन मन्त्रों के अर्थ भी जीवन के लिए प्रेरणास्पद हैं। संगीत की वाणी सबको मुग्ध कर देती है। सामवेद वाणी की विशेषताओं को रेखांकित करता है। मधुर वाणी बोलने को प्रेरित करता है। नवसृजन के गीत जीवनप्रवाह को गति देते हैं, आनन्दित करते हैं। मौसम की विशेषताएँ, विश्रामदायिनी रात, पशु-प्रेम जैसे नवीन विषय यहाँ चर्चित हुए हैं। अतः युवाओं के साथ-साथ बड़ों के लिए भी (जो मन से युवा हैं) यह पुस्तक प्रस्तुत है।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Navjaagran Aur Mahadevi Verma Ka Rachana-Karm Stri-Vimarsh Ke Svar
    Krishna Dutt Paliwal
    445 401

    Item Code: #KGP-624

    Availability: In stock

    नवजागरण और  महादेवी वर्मा का रचना-कर्म स्त्री-विमर्श के स्वर
    महादेवी वर्मा के जन्मशताब्दी वर्ष में यह सोचकर हृदय में  पीडा होती है कि उन जैसी भारतीय स्वाधीनता-आंदोलन की लय से निमग्न कवयित्री के साथ हिंदी-आलोचना के मर्दवाद ने ऐसा सलूक क्यों किया?
    उनके सृजन के नवजागरणवादी  पक्ष को अनदेखा करते हुए 'रहस्यवाद-अध्यात्मवाद' में लपेटकर उसे पूरी तरह छिपा दिया गया । आखिरकार क्यों?
    ऐसा क्यों हुआ कि देश और समाज के लिए किया गया उनका मौन-मुखर विद्रोह पूरी तरह 'विस्मृति' के अंधकार में धकेल दिया गया ?
    आज इस स्थिति पर दूर तक स्त्री-विमर्श की अवधारणाओं से सोचने की ज़रूरत है ।
  • Tan Man
    Shivram Karant
    100 90

    Item Code: #KGP-2086

    Availability: In stock

    भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शिवराम कारंत का अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास 'तन मन' कन्नड़ साहित्य की अनुपम कृति है ।
    चिरन्तन काल से विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध विषयक प्रवृत्ति ने 'विश्व के सबसे पुराने पेशे' को जन्म दिया । यह पेशा आज भी जीवित है । पुरुष ने नारी को शब्दों में जितने सम्मान का नाटक रचा है, अपनी प्रवृति से उसे निरीह और भोग्य ही रखा है । कल की देवदासी और आज की मॉडल या सुन्दरियों का चुनाव क्या है ? इसी जीवन्त समस्या को लेखक ने काफी गहरे उतरकर अपने अनुपम शिल्प में बाँधा है । इसमें एक ही प्रधन-स्वर बार- बार ध्वनित होता है—आखिर यह कबतक, आखिर यह कब तक...?
  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Hindi Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    80

    Item Code: #KGP-1334

    Availability: In stock

    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उर्दू में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है । मीर, गालिब, जौक, सौदा से लेकर जिगर, सजाना, फैज, साहिर और उनके बाद की अनेक पीढियों तक ग़ज़ल उर्दू शायरी का जरूरी हिस्सा रही है । इधर हिंदी में भी ग़ज़ल ने अपनी एक परंपरा बना ली है और निराला, प्रसाद, रामनरेश त्रिपाठी, हरिकृष्णा 'प्रेमी', शंभुनाथ शेष, विजित, त्रिलोचन, शमशेर, बलवीर सिंह रंग, दुश्यंत कुमार और उनके बाद छंदबद्ध लिखने वालों की लगभग पूरी की पूरी पीढ़ी  ग़ज़ल -लेखन से जुड़ गई है। कहना ही होगा कि हिंदी ग़ज़ल  के क्षेत्र में पूरे भारत में लगभग हजार से अधिक रचनाकार अपने ढंग से, अपने रंग में, अपनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ ग़ज़लें कह रहे हैं । असलियत यह है कि आज काव्य-मंचों पर, पत्र-पत्रिकाओं में, पुस्तक प्रकाशन में ग़ज़ल का बोलबाला है ।
    इतने व्यापक रचना-संसार में निश्चय ही बहुत-सी ग़ज़लें ऐसी है, जिन्हें काव्यपेमी बार-बार पढ़ना और अपने पास सँजोकर रखना चाहेंगे । प्रस्तुत 'हिन्दी ग़ज़ल शतक' में ग़ज़ल को विविध शैलियों में लिखने वाले पच्चीस ग़ज़लकारों की चार-चार ग़ज़लें दी जा रही है, जो हिंदी ग़ज़ल  के वैविध्य को निश्चय ही प्रभावकारी अंदाज में पेश करती है ।
  • Davanal
    Balshauri Reddy
    80 72

    Item Code: #KGP-2101

    Availability: In stock

    दावानल
    प्रस्तुत ऐतिहासिक उपन्यास पलनाडु-युद्ध पर आधारित है । पलनाडु जिला गुंटूर का एक प्रदेश है । यह युद्ध 12वी शती में पलनाडु के राजाओं के बीच राज्य बंटवारे का लेकर कारंपूडि रणक्षेत्र में हूआ था, जो आपस में भाई-भाई थे। इस युद्ध की तुलना महाभारत-युद्ध से की जाती है।  कुरुक्षेत्र की भाँति कारंपूडि रणक्षेत्र का भी सामरिक दृष्टि से उतना ही महत्त्व है । आंध्र के विद्वान् इसे 'पलनाडु महाभारत' की संज्ञा देने में संकोच नहीं करते । यद्यपि यह संग्राम आंध्र में घटित हुआ था, तथापि इसमें सार्वदेशिकता की झलक मिलती है। पलनाहु के इस युद्ध ने आंध्र के कवि, नाटककार, लेखक और इतिहासकारों पर ऐसा प्रभाव डाला कि इसे इतिवृत्त बनाकर उन्होंने दर्जनों काव्य,  नाटक, उपन्यास, वीर गीत, गद्य काव्य और गीति काव्य लिख डाले । साथ ही इस पर अनेक फिल्में भी बन गईं ।

    (उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत)
  • Himachal Pradesh Ka Lok Jeevan
    Kuldeep Singh
    290 261

    Item Code: #KGP-9113

    Availability: In stock

    हिमाचल प्रदेश का लोक-जीवन
    आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारी लोक-संस्कृति पिछड़ी तो नहीं है, परंतु आधुनिकता के लबादे ने इसको ढक अवश्य दिया है। एक तरफ पाश्चात्य संस्कृति की चकाचैंध से आम व्यक्ति प्रभावित हुआ है तो दूसरी तरफ आधुनिकता और परंपरा में सामंजस्य न बिठा पाने के कारण भी हमारी लोक-संस्कृति पतनोन्मुख हुई है। टी.वी. के विदेशी चैनलों ने आम व्यक्ति के पहनावे, खान-पान, रहन-सहन तथा दिनचर्या को प्रभावित ही नहीं किया, बल्कि परिवर्तित करके रख दिया है। फलतः मूल लोक-संस्कृति की जड़ें हिल गई हैं। आम व्यक्ति दोराहे पर आ गया है। न तो वह स्वयं को आधुनिकता के अनुरूप ढाल पा रहा है और न ही पूर्ण रूप से अपनी लोक-संस्कृति को व्यवहार में ला रहा है। 
    गत दो-तीन दशकों में हिमाचल प्रदेश की ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारत की लोक-संस्कृति में व्यापक उथल-पुथल देखने को मिली है। संस्कृति के ढाँचे में परिवर्तन भी हुए हैं। अनेक रीति-रिवाजों, परंपराओं, प्रथाओं का तथाकथित आधुनिकीकरण हुआ है, परंतु यह सब होने के बावजूद आधुनिकता और लोक-संस्कृति  का आपसी सामंजस्य नहीं बैठ पाया है।
    इस पुस्तक के माध्यम से भारत का जनमानस हिमाचल प्रदेश के जनजीवन की केवल झलक ही नहीं पा सकेगा, बल्कि उसे वास्तविक रूप में निहार भी सकेगा, उसका अनुभव भी कर सकेगा। साहित्यकार किस प्रकार किसी भी संस्कृति और जनजीवन को अंकित करता है, यह कृति उसका प्रमाण है।
  • Gujrati Katha Sanchayan
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    100 90

    Item Code: #KGP-7812

    Availability: In stock

    कथा साहित्य ही क्या कोई भी  साहित्य किसी देश, काल और समाज की सीमाओं में आबद्ध नहीं होता, वह तो जीवन-जगत का व्याख्यान होने के नाते सार्वजनीन और सार्वभौमिक होता है । हां, इतना अवश्य होता है कि देशज व् क्षेत्रीय परम्पराएं, संस्कार, मान-मूल्य और रीति-रिवाज उसमें सहज ही अपना स्थान बना लेते है, जो उसे एक निजी पहचान देते हैं, लेकिन उसके वैचारिक या भावनात्मक आंतरिक अनुभव मात्र क्षेत्रीय न होकर भूमंडलीय होते हैं, मानवीय होते हैं । इस संचयन की प्रस्तुत कहानियां गुजरात की निजी संस्कृति की विशिष्ट पहचान बनाये रखती हुईं मानवीय संवेदनाओं की मुखर प्रवक्ता हैं, जो पाठकों से बहुत कुछ कहना चाहती हैं, साथ ही गुजराती कहानी की विकास-यात्रा के पड़ावों को भी रेखांकित करती चलती हैं । 
  • Tumhare Liye (Paperback)
    Himanshu Joshi
    120

    Item Code: #KGP-7057

    Availability: In stock

    तुम्हारे लिए
    आग की नदी!
    नहीं, नहीं, यह दर्द का दरिया भी है, मौन-मंथर गति से निरंतर प्रवाहित होता हुआ ।
    यह दो निश्छल, निरीह उगते तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा ही नहीं, उभरते जीवन का स्वप्निल कटु यथार्थ भी है कहीं । वह यथार्थ, जो समय के विपरीत चलता हुआ भी, समय के साथ-साथ, समय का सच प्रस्तुत करता है ।
    मेहा-विराग यानी विराग-मेहा का पारदर्शी, निर्मल स्नेह इस कथा की भावभूमि बनकर, अनायास यह यक्ष-प्रश्न प्रस्तुत करता है-प्रणय क्या है? जीवन क्या है ? जीवन की सार्थकता किसमें है ? किसलिए ?
    ० 
    बहुआयामी इस जीवंत मर्मस्पर्शी कथा में अनेक कथाधाराएँ हैं। अनेक रूप हैं, अनेक रंग। पर ऐसा क्या है इसमें कि हर पाठक को इसके दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ?
    ० 
    हिंदी के बहुचर्चित उपन्यासों में, बहुचर्चित इस उपन्यास के अनेक संस्करण हूए । मराठी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में अनुवाद भी । दूरदर्शन से धारावाहिक रूप में प्रसारण भी हुआ । ब्रिटेन की एक कंपनी ने आडियो कैसेट भी तैयार किया, जो लाखों श्रोताओं द्वारा सराहा गया ।
  • Thus Spake Lord Krishna (Self-Help)
    Shiv K. Kumar
    295 266

    Item Code: #KGP-329

    Availability: In stock

    Only he whose hands are steady on the steering wheel of his mind and body and is in full control of his desires, can carry the wisdom's mark on his forehead. To such an enlightened mind, the darkness of the night glows like a sunlit day, dark ignorance yielding to bright knowledge. Nothing can hoodwink his all-perceiving eyes. A genuine saint is such a man blessed by the Gods.
    Like the deep sea, he absorbs an insurgent flood but does not let its shore-line be deflected. It welcomes rivers from all directions but is not overwhelmed by them—its underworld remains undisturbed because its centre can always hold.
    So, O blessed Prince, throw away the yoke of your impulses, their oppressive burden, regaining your suzerainty over them. Disengage yourself from man's prime infirmities—his ego and passion.
    This, O Prince, is the only way to merge into God, the individual soul's union with the Oversoul. Once you are up there on the heights, you will never slide down to the dark valley below. It will then be the same for you—living or dying, waking or dreaming, gaining or losing.
    This is what the sages call Moksha—release from the bondage of birth and death—basking forever in the sunshine of Life Divine, of peace eternal.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria
    Madhu Kankria
    280 238

    Item Code: #KGP-719

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bazmey Ghazal
    Om Prakash Sharma
    200 180

    Item Code: #KGP-165

    Availability: In stock

    बज्मे-ग़ज़ल
    उर्दू अदब में ग़ज़ल का क्षेत्र जितना व्यापक है, उतनी ही बडी तादाद उन शाइरों की भी  जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाया ।
    गजल शब्द के अर्थ से आज लगभग सभी परिचित है, लेकिन आज के परिवेश में ग़ज़ल की परिभाषा बदली हुई दिखाई दे रही है । इस संकलन को तैयार करते हुए यह प्रयास रहा है कि ग़ज़ल के शाब्दिक अर्थ के अतिरिक्त, इसके बदले हुए रूप को भी पाठकों के सन्मुख रखा जाये। इसीलिए 'बज्मे-गजल' में संगृहीत ग़ज़लें कभी परम्पराओं में बंधी नज़र आयेंगी, तो कभी इनका रूप आज़ के ज़माने को छूता हुआ दिखाई देगा ।
    उर्दू गजल आज जिस बुलन्दी पर पहुंच चुकी है, साहित्य की किसी दूसरी विधा का यहा तक पहुंच पाना शायद सम्भव नहीं; क्योंकि  गजल कहीं नहीँ जाती, बल्कि खुद-ब-खुद हो जाती है । ग़ज़ल सिर्फ इल्तिजा ही नहीं करती, ऐलान भी करती है, समझोता करना ही नहीं सिखाती, अधिकार प्राप्त करने के लिए लड़ना भी सिखाती है तथा सिर्फ फूल ही नहीं, अंगारे बरसाने का हौंसला भी देती है ।
    इस संकलन से जहां अनेक पुराने शाइरों की गज़लें दी जा रही हैं, वहीं कुछ नये शाइरों की ग़ज़लें भी मौजूद हैं, जो आज लोगों के दिलों में घर कर रहे हैं।
  • Doston Ke Jaane Par Kamleshwar Ki Yadein
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-403

    Availability: In stock


  • 23 Lekhikayen Aur Rajendra Yadav (Paperback)
    Geeta Shree
    195

    Item Code: #KGP-262

    Availability: In stock

    23 लेखिकाएँ और राजेन्द्र यादव
    अपने ढंग की अद्भुत पुस्तक है यह '23 लेखिकाएं और  राजेन्द्र यादव' । शायद किसी भी भारतीय भाषा में अकेली । इसे गीताश्री के पत्रकार-जीवन की एक उपलब्धि भी कह सकते  हैं । यहाँ गीता ने समय-समय पर लिखे गए समकालीन महिला-रचनाकारों के इम्प्रैशन (प्रभाव-चित्रों) का संयोजन किया है । कहीं ये साक्षात्कार हैं तो कहीं संस्मरण, कहीं राजेन्द्र जी के रचनाकार को समझने की कोशिश है तो कहीँ 'हंस' के संपादकीय, को लेकर उन पर बाकायदा मुकदमे । यहाँ अगर मन्नू भंडारी, मृदुता गर्ग, चित्रा मुद्गल, सुधा अरोडा, ममता कालिया, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अनामिका तथा कविता हैं तो निर्मला जैन, जयंती  रंगनाथन, पुष्पा सक्सेना, वीना उनियाल और रचना यादव भी अपने वक्तव्यों के साथ उपस्थित है । राजेन्द्र यादव अपने समय के सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार, नई कहानी आंदोलन के प्रमुख प्रवर्तक और कथा-समीक्षा के विलक्षण व्याख्याकार हैं । इधर चौबीस वर्षों में तो 'हंस' के तूफानी विचारों ने हंगामा ही खड़ा कर दिया हैं--राजेन्द्र जी को खलनायक और माफिया डॉन या पता नहीं और क्या-क्या बना दिया । विवादास्पद होना  जैसे उनकी स्थायी नियति है--'हंस' के माध्यम से उन्होंने स्त्री-दलित और अल्पसंख्यकों के पक्ष में जो जेहादी मुहिम चलाई है उसने निश्चय ही हिंदी के यथास्थितिवादी परंपरा-पोषकों की नींद हराम कर दी है । वे तर्क से नहीं, गालियों और आक्षेपों से राजेन्द्र जी के प्रश्नों का उत्तर देते हैं । मठाधीशों के लिए यह सचमुच बैचेन कर देने वाला सत्य है कि उनके देखते-देखते दलित और स्त्री-विमर्श आज साहित्य की केंद्रीय मुख्य धाराएँ हैं ।
    राजेन्द्र यादव के इस विकट और अपने समय के सबसे जटिल व्यक्तित्व के विविध आयामों को समेटने की कोशिश करती हैं ये लेखिकाएँ गीताश्री के मंच से ।
    किताबघर प्रकाशन की एक भव्य प्रस्तुति ।
  • Namaskar Bharat Mera Mahan
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-314

    Availability: In stock

    नमस्कार! भारत मेरा महान!
    अमृतलाल नागर और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का शिष्य कहने में मनोहर श्याम जोशी बहुत गौरव का अनुभव करते थे। जोशी जी के निजी जीवन, साहित्य, पत्राकारिता और सिनेमा के पन्नों में उक्त दोनों आचार्यों की छाप देखी जा सकती है। 
    भारतीय राजनीति और समाज पर मनोहर श्याम जोशी की बेबाक टिप्पणियाँ हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। राजेंद्र माथुर की तरह उनके पत्रकारीय लेखन से लोग चकित और कुछ भ्रमित हो जाते थे, क्योंकि किसी टिप्पणी में वह मार्क्सवादी-समाजवादी, किसी लेख में हिंदूवादी, किसी विश्लेषण में कांग्रेसी विचारों से ओतप्रोत लगते थे। प्रगतिशील होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी या इंदिरा गांधी या डॉ. कर्णसिंह से अच्छे संवाद और संबंध की क्षमता उनमें थी। 
    अमृतलाल नागर की तरह उनके व्यंग्य और कहानी- उपन्यास में सामाजिक कुप्रथाओं, बंधनों पर पैना प्रहार पढ़ने को मिलता है। इसी तरह पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ-लेखन में जोशी जी देश-विदेश के किसी नेता, पूँजीपति या बड़ी हस्ती की कमियों पर सीधे प्रहार करने में नहीं चूके। शरद जोशी की तरह मनोहर श्याम जोशी प्रतिदिन स्तंभ लिखने की क्षमता रखते थे। इसीलिए ‘नवभारत टाइम्स’ के प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने जोशी जी को एक नियमित स्तंभ लिखने का निमंत्रण दिया। सत्ता और प्रबंधन का भय इन संपादकों को कभी नहीं रहा। इसलिए जोशी जी ने भारत की सामाजिक-राजनीतिक दशा पर ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ लिखना शुरू किया। 
    ‘मेरा भारत महान’ स्तंभ की विशेषता यह थी कि इस स्तंभ की टिप्पणियों पर पत्र आमंत्रित किए जाते थे और सैकड़ों पत्रों में से चुनिंदा छाँटकर अगली किस्त में स्तंभ के साथ छपते थे। यह स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुआ। जोशी जी ने जीवन की अंतिम साँस तक यह स्तंभ लिखा, जिसकी रचनाएँ दशकों तक कई पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
  • Angaaron Main Phool
    Santosh Shelja
    140 126

    Item Code: #KGP-1981

    Availability: In stock

    अंगारों में फूल
    माँ का अडिग साहस देख तिलक विस्मित थे । आज पहली बार मां व बाबा को अपने दु:ख का संवेदनशील श्रोता मिला था । इस लंबी वार्ता में तीनों की आँखें कईं बार गीली हुई और कई बार गर्व से छाती फूल उठी । जाने से पहले लोकमान्य ने झुककर माँ व बाबा के चरण स्पर्श किए और रुँधे कंठ से कहने लगे,  गौरवशाली बलिदान का श्रेय न मुझे है न उन्हें है-बल्कि सचमुच में इसका श्रेय आपको और आपकी बहुओं को है । गीता पढ़ना सरल है मां, पर उसे वास्तविक जीवन में उतारना बहुत ही कठिन है । एक बार मरना संभव है, किन्तु इस प्रकार मरण  को हृदय से लगाए हुए जिंदा रहना बहुत असंभव है । पर अपने वही कर दिखाया... धन्य है आप!'
    [इसी पुस्तक से]
  • Main Or Mera Man
    Dr. Sharad Nagar
    480 432

    Item Code: #KGP-7851

    Availability: In stock

    मैं और मेरा मन जीवन के एक विलक्षण साधक और रसिक की कलम से निकली हुई यादों, बातों, दास्तानों और दस्तावेज़ों का अनूठा सम्मिश्रण है। इस पुस्तक में हम मिलते हैं एक ऐसे सर्जक से जो अपनी गहरी से गहरी तकलीफें भूलने की कोशिश करता तथा तमाम जगहों और लोगों को दिए हुए अपने वायदों को निभाता हुआ उनके इतिहास और भूगोल को, उनकी बातों और वि़फस्सों को जिलाए रखने के काम में पूरे यव़फीन और मोहब्बत से जुटकर अपने जीने की ख़ुराक ढूँढ़ता है।
    डॉ. शरद नागर के मन में समाए इन लोगों और लोकों के किस्सों में हमें मिलते हैं घने पारिवारिक रिश्ते, गली-मोहल्लों के यादगार चित्रा और चरित्रा तथा अनदेखे पूर्वज। साथ ही हमें मिलती हैं बीसवीं सदी के सामाजिक इतिहास की कुछ ऐसी बारीकियाँ जिनके आज की पाठ्यपुस्तकों में पहुँचने की नौबत ही नहीं आती-जैसे, 1918 के इन्फ्ऱलूएन्ज़ा के प्रकोप की दिल को दहला देने वाली यादें; आगरा में बसे गुजराती नागरों के मोहल्लों-टोलों की भूली-बिसरी आवाज़ें; आज़ादी की जंग के दौर में मिले सृजन और सौहार्द के संस्कार; मैकॉले की नीति का शिक्षा और सामाजिक स्तरीकरण पर प्रभाव; समाज के बदलते उसूलों और खुलती-कसती बेड़ियों के बीच औरतों की स्थिति ही नहीं, बल्कि उनका श्रम, उनकी रचनात्मकता, उनकी जंग; तथा भारतीय रंगमंच के इतिहास से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ाव।
    शरद जी एक साहित्यकार और ज़िंदगी तथा समाज की तहों में गहरे उतरकर रमने वाले आराधक और कलाकार के रूप में अमृतलाल नागर के बहुत बड़े उपासक थे। इस पुस्तक में प्रस्तुत उनका लेखन अमृतलाल नागर जी को लेखक और पिता के रूप में बड़े निराले ढंग से जिलाता है। हम न केवल लेखक बनने से जुड़ी अमृतलाल नागर जी की निजी और उनके परिवार की अनेक संघर्ष यात्राओं को पहचान पाते हैं बल्कि आज़ादी के पहले के तीन दशकों में और आज़ादी के बाद के चार दशकों में साहित्य और रंगमंच समाज से किस व़फदर गुँथकर अपनी दिशाएँ खोज रहे थे, उसका अहसास भी हमें ख़ूब होता है।
  • Aalamgeer
    Dr. Sharad Nagar
    150 135

    Item Code: #KGP-1903

    Availability: In stock

    [जहानारा के चले जाने पर औरंगजेब पुश्तैनी तलवार को उठाकर देर तक देखता रहता है।]
    औरंगजेब : दिल्ली के तख्त पर बादशाह सलामत मुझे खुद बिठा रहे  हैं ।  बादशाह सलामत समझ गए हैं कि मैं ही हुकूमत करने के काबिल हूँ । (उल्लास के साथ) एक ही झटके से पका-पकाया फल गोद में आ गिरा है । (ऊपर-नीचे टहलता है) पर नहीं, यह खुदावंदताला की बख्यिश है ।  यह बरकत  खुदावंदताला की ही हुई है, और किसी की नहीं । 
    [कहीं से हलकी-सी आवाज आती है ।]
    आवाज़ : जहानारा ने जो कुछ कहा, तुमने फ़ौरन ही मान लिया । 
    औरंगजेब : वह बादशाह सलामत की तरफ़ से पेशकश लाई थी ।
    आवाज़ : पर यह एक चाल भी तो हो सकती है ।
    औरंगजेब : चाल क्यों ? यब 'आलमगीर' तलवार, भी उसने साफ कहा हैं कि दिल्ली के तख़्त पर तुम बैठोगे ।
    आवाज़ : वह दिल्ली तृम्हारे दुश्मनों से घिरी  होगी । दारा शूकोह जो इस वक्त भागता फिर रहा है, वह फिर से पंजाब का सूबेदार बनकर लोट आएगा, मुरादबख्श गुजरात में और शुजा बंगाल में । क्या तुम भूल गए कि दारा को ज़हानारा ने ही वली अहद बनवाया था । दारा और जहानारा दो जिस्म एक जान है । दोनों सूफी मुल्लाशाह के शागिर्द।  दिल्ली मुल्लाशाह के मुरीदों का अड्डा बनेगी ।
    औरंगजेब : (स्वत:) सब बात वहीं को वहीं लौट आएगी । ...पर बादशाह सलामत ने मुझे दिल्ली का तख्त अता फर्माया है ।
    आवाज़ : नहीं, वह तुमने अपनी तलवार के जोर में हासिल किया है । वह तुम्हें खुदावंदताला के फजल से मिला है । यह नादर मौका है, औरंगजेब । फिर ऐसा नायाब मौका तुम्हारे हाथ नहीं आएगा । इस चाल को समझो, औरंगजेब । बादशाह सलामत तुम्हारे हाथ में बिल्ली के तख़्त  का झुनझुना पकड़ा देना चाहते है । दारा शुकोह  को बहाल करने का उनके पास यही एक तरीका है ।
    औरंगजेब : (स्वत:) न जाने कौन लोग बादशाह सलामत ने मिलने  आते है । उनके इरादे कौन जान सकता है ? किले की ऊंची दीवारों के पीछे न जाने साजिशें पक रही हैं।
    आवाज़ : दारा की सुबेदारी बहाल होगी तो वह फिर से फ़ौजें मुनज्जम कर सकता है । बादशाह सलामत उसकी पीठ पर हैं । वह अभी भी अपने आपको वली अहद समझे हुए है ।
    औरंगजेब : बादशाह सलामत दारा की पीठ पर है तो ख़ुदावंदताला  मेरे हक में है ।  ख़ुदावंदताला  ने मुझे दिल्ली के तख़्त का हकदार करार  दिया है । वरना मेरो फतह क्योंकर होती ? यह फतह नहीं एक करिश्मा था ।  ख़ुदावंदताला  में मुझे अपना एलची बनाकर भेजा है । उन्हें मुझ पर भरोसा है । पूरा एतमाद है । [इसी पुस्तक से]
  • Manushkhor
    Ganga Prasad Vimal
    595 506

    Item Code: #KGP-405

    Availability: In stock


  • Meethi Neem (Paperback)
    Kusum Kumar
    240

    Item Code: #KGP-389

    Availability: In stock


  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Parnaam Kapila
    Devendra Deepak
    400 360

    Item Code: #KGP-1894

    Availability: In stock


  • Reality Repair (Self-Help)
    William Cottringer
    695 626

    Item Code: #KGP-9013 A

    Availability: In stock

    Something very important is missing in the world today and it’s no secret as to what it is. It is sad but true that common sense isn’t common anymore. The problems we face in living today, require something that has been lost—a collective consciousness of common sense. Some say that it has been bred out of the human gene pool. That is serious business! 
    I have studied long-term success all my professional life and I can tell you the most important common denominator—that success is built on a foundation of common sense. Without it, success is just a fleeting dream of rambling images. No one in the history of the world has achieved genuine success and the real peace of heart that comes with it, without learning and using good old common sense.
    Reality Repair is a book of common sense. This book gives you 7 simple ways to improve your store of it that guarantees more success than you can imagine. Here are the seven simple ways to find the valuable 5% truth that is hidden away in the 95% worthless, non-sensical information overload that doubles every two years:
    •  Purpose
    •  Principles
    •  Perspectives
    •  Passions
    •  Polarizations
    •  Priorities
    •  Problems
    Reality Repair admits funny mistakes and offers plenty of practical solutions to improve success in these seven important areas of living, working and relating. It is your easy-to-read guide to start going from surviving to thriving.
  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Hindustan Aur Pakistan Ki Behatreen Urdu Haasya-Vyang Shaaeree (Paperback)
    T.N. Raj
    195

    Item Code: #KGP-7054

    Availability: In stock

    उर्दू ज़बान अपनी शीरीनी, लताफ़त और नज़ाकत के सबब सदियों से लोगों के दिलों पर राज कर रही है। उर्दू शायरी ख़ास तौर पर ग़ज़ल लिखने, पढ़ने, सुनाने या गाने वाला शख्स हमें कहीं न कहीं मिल ही जाता है । मीर, ग़ालिब, इकबाल, दाग, फ़ैज, फ़िराक़, जिगर और साहिर वग़ैरा की शायरी का जादू हमेशा बरकरार रहेगा । यह मानने में कोई हरज नहीं कि उर्दू की संजीदा शायरी के मुकाबले में अभी हास्य व्यंग्य कविता में बहुत-सी गुंजाइशें बाक़ी हैं । जहाँ तक उर्दू नस्र (गद्य) में हास्य-व्यंग्य का तआल्लुक है यह बात पूरे यकीन से कही जा सकती है कि इसमें अनमोल हीरों औरमोतियों की कोई कमी नहीं । 
  • Ghalib : Sangeet Ke Saanche Mein Dhali Gazalen_300
    T.N. Raj
    300 270

    Item Code: #KGP-84

    Availability: In stock


  • Dek Par Andhera
    Hira Lal Nagar
    400 360

    Item Code: #KGP-402

    Availability: In stock


  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-480

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है।
  • Darshaniya Bharat : Atulya Bharat
    Hiralal Bachhotia
    270 230

    Item Code: #KGP-254

    Availability: In stock

    दर्शनीय भारत : अतुल्य भारत
    भारत दर्शनीय भी है, अतुलनीय भी।  उत्तर में हिमालय की सुंदरता इसके सीमांत स्थानों में अक्षुण्ण रूप में विद्यमान है । हिमाचल में स्थित 'नम्झा' तिब्बत-सीमा से लगा भारत का अंतिम गांव है तथा हिमाचल के दक्षिण-पूर्व का अंतिम गांव छितकुल से हिम-श्रृंगों और बस्पा का सौंदर्य भी अतुलनीय है । अलकनंदा घाटी की अपार सुंदरता सुविधायों के बावजूद खतरों से भरी हुई तो है ही । सिक्कम अरुणाचल, नगालैंड उत्तर-पूर्व के सीमांतों पर फैले सौंदर्य को आत्मसात् करने का अवसर देते हैं  और अनुभव कराते हैं-सौंदर्यानुभूति के साथ-साथ भारत की विशालता और विविधता की गौरवपूर्ण अनुभूति का और हममें होता है राष्ट्रभावना का उद्रेक भी ।
    भारत की दर्शनीयता से भारत का पूरा भू-भाग समाहित है। वह चाहे सतपुडा के घने जंगल हों, कोंकण का समुद्रीतट, केरल की अनुपम नारिकेल सुषमा या बांग्ला  का शांतिनिकेतन क्षेत्र । उधर महाबलीपुरम की समृद्ध सांस्कृतिक पुरा संपदा से लेकर मणिपुर की वैष्णवधर्मिता-सारा कुछ भारत की अतुल्यता का ही बखान है । विदा लेते सूर्य की अनुपम शोभा का साक्षी पचमढी का धूपगढ़ हो या मैदानों की झुलसाती गर्मी के बीच बादलों में खो जाने का अहसास जगाता ऊटी का डोडा-बेट्टा-सभी निसर्ग शोभा के अनछुए पृष्ठ है । यात्रा इन पृष्ठों के अनुभवों से गुजरने और यात्रा-सुख में खो जाने का निमंत्रण देती है । ये पृष्ठ पहले से, न जाने कब से फैले हुए हैं । कोई यायावर उन्हें जिस रूप में देखता और संजोता है, वही हैं - दर्शनीय भारत : अतुल्य भारत ।
  • Papa, Muskuraiye Na! (Paperback)
    Prahlad Shree Mali
    100

    Item Code: #KGP-1486

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    -इसी पुस्तक से
  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Malviya Ji Ke Sapnon Ka Bharat
    Ishwar Prasad Verma
    395 356

    Item Code: #KGP-612

    Availability: In stock

    मैं मनुष्यता का पुजारी हूं। मनष्यत्व के आगे मैं जात-पांत नहीं जानता। कानपुर में जो दंगा हुआ, उसके लिए हिंदू या मुसलमान इनमें से एक ही जाति जवाबदेह नहीं है। जवाबदेही दोनोंजातियों पर समान है। मेरा आपसे आग्रहपूर्वक कहना है कि ऐसी प्रतिज्ञा कीजिए, अब भविष्य में अपने भाइयों से ऐसा युद्ध नहीं करेंगे, वृद्ध, बालक और स्त्रियों पर हाथ नहीं छोड़ेंगे। मंदिर अथवा मस्जिद नष्ट करने से धर्म की श्रेष्ठता नहीं बढ़ती। ऐसे दुष्कर्मों से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। आज आप लोगों ने आपस में लड़कर जो अत्याचार किए हैं, उसका जवाब आपको ईश्वर के सामने देना होगा। हिंदू और मुसलमान इन दोनों में जब तक प्रेम-भाव नहीं उत्पन्न होगा, तब तक किसी का भी कल्याण नहीं होगा। एक-दूसरे के अपराध भूल जाइए और एक-दूसरे को क्षमा कीजिए। एक-दूसरे के प्रति सद्भाव और विश्वास बढ़ाइए। गरीबों की सेवा कीजिए, उनको प्रेम से आलिंगन कीजिए और अपने कृत्यों का पश्चात्ताप कीजिए। 
  • Who Shares Your Grief (Reminiscence)
    Raj Budhiraja
    215 194

    Item Code: #KGP-152

    Availability: In stock

    WHO SHARES YOUR GRIEF
    How can a younger or elder member of house say that nothing belongs to him/her, rather everything belongs to him/her. The house, decoration of house, comfortable things, car, servants, job respect, honour etc. all belong to him/her only. Without getting more than that it cannot be said that ‘it is me.‘ Here none is king of Dvaraka who longs for the raw rice of Sudama. Here Sudama is busy in collecting his raw rice and Krishna is engaged in securing his throne. We are engaged in making our presence realized. In such a crowded situation what is the use of ‘ it is not mine.’ By experiencing the pleasure of possession over everything how one can say that nothing belongs to her or him. Gone are the days when rivers used to flow for others and trees used to bear fruits for others. Now everything is for self. To gain, put others down as much as you can -— whether physically, mentally or monetarilyi
  • Ratangarbha
    Shanker Shesh
    40 36

    Item Code: #KGP-2087

    Availability: In stock


  • Deshraag
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-9306

    Availability: In stock

    ‘देशराग’ सुविज्ञ और सुप्रतिष्ठित कवि-आलोचक-संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अध्ययन व मनन को रेखांकित करती एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। रचना के अपूर्व आयाम विकसित करने के साथ-साथ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ‘दस्तावेज़’ जैसी उल्लेखनीय साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते हुए शब्द की संस्कृति को शिखर तक पहुंचाया है। यह पत्रिका संतुलित, सकारात्मक व संपन्न सामग्री के लिए तो प्रशंसित है ही, इसके संपादकीय प्रत्येक पाठक की अमूल्य धरोहर हैं। ‘देशराग’ में कुछ ऐसे ही विचारोत्तेजक संपादकीय संगृहीत हैं।
    राजनीति, समाज और साहित्य के विविध पक्षों पर ‘दस्तावेज़’ के इन संपादकीयों में विचार किया गया है। लेखक के शब्दों में, इन टिप्पणियों में साहित्य, संस्कृति, भाषा, समाज और व्यक्तियों के प्रति जो कुछ भी व्यक्त हुआ है, वह गहरे देशराग के ही कारण। भारत का साधरण आदमी और उच्चतर मूल्य ही इन टिप्पणियों का पक्ष रहा है और उसे संकट में डालने वाला सब कुछ विपक्ष। भाव का जो अंश रचना में ढलने से रह गया, वही इस सीधे कथन के रूप में व्यक्त हुआ।
    विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने इन लेखों के माध्यम से स्वस्थ विमर्श का उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे ‘निर्णयात्मक’ होकर विचार नहीं करते। एक चिंतन प्रक्रिया चलती है, तर्क मुखर होते हैं, पक्ष-विपक्ष प्रकट होते हैं, व्यापक सामाजिक निहितार्थ खुलते हैं–तब कोई निर्णय उपलब्ध होता है। भाषा में वे सारे तत्त्व हैं जिनसे मिलकर ‘हिंदी जाति का तेजस्वी गद्य’ बनता है। 
    देश और उसमें गूंजने वाली प्रशस्त सामाजिकता के राग को चीन्हने के लिए ‘देशराग’ बहुमूल्य पुस्तक है।
  • Aranya-Tantra
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-659

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ashok Vajpayee
    Ashok Vajpayee
    190 171

    Item Code: #KGP-440

    Availability: In stock

    लगभग एक हजार लिखी गई कविताओं से कुछ चुनना स्वयं कवि के लिए मुश्किल काम है। एक अधसदी भर कविता लिखने और कविता के लिए अपने समय और समाज में थोड़ी सी जगह बनाने की कोशिश करते हुए उसकी रुचि और दृष्टि बदलती रही है। फिर अगर आप कविता लिखने के अलावा आलोचना भी लिखते हों, जो कि मैं करता रहा हूँ, तो मुश्किल और बढ़ जाती है। आपको रुचि और दृष्टि की अपार बहुलता से निपटना पड़ता है। आप कितने ही तीख़े आत्मालोचक क्यों न हों जो आपको प्रिय लगता हो वह जरूरी नहीं कि महत्त्वपूर्ण भी हो या कि वस्तुनिष्ठ ढंग से ऐसा माना जा सके। स्वयं कवि के अपनी कविता को लेकर भी पूर्वग्रह होते हैं और उनमें से कई जीवन भर उसका साथ नहीं छोड़ते। इस संचयन में वे सक्रिय नहीं होंगे इसकी संभावना नहीं है। फिर भी प्रयत्न यह है कि कई रंगों की कविताएँ उसमें आ जाएँ।
    बाकी सब तो कविताएँ ही अपने ढंग से कहेंगी: उनके बारे में कवि को संभव हो तो चुप ही रहना चाहिए। अकसर कविताएँ कवि से अधिक जानती हैं; अपने रचयिता से। इतना भर इस मुकाम पर कहा जा सकता है कि ज्यादातर एक ऐसे समय और समाज में जो कविता से कोई उम्मीद नहीं लगाता और अकसर उसकी अनसुनी-अनदेखी ही करता है, कविता में विश्वास बना रहा है।
    -लेखक
  • Nasera Sharma : Shabd Aur Samvedana Ki Manobhoomi
    Lalit Shukla
    595 536

    Item Code: #KGP-894

    Availability: In stock

    नासिरा शर्मा : शब्द और संवेदना की मनोभूमि
    प्रस्तुत कृति सुप्रसिद्ध कथाकार नासिरा शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्व का विवेचन है। उनका स्थान साहित्य में अब निश्चित हो चुका है। भिन्न-भिन्न मानसिकता के लेखकों के विचार यहाँ एक साथ देखने को मिल जाएँगे। संपादन के इस प्रयास से एक तो लेखिका के विपुल अनुभवों का संसार सामने आता है; दूसरे, अनुभूति की बारीकियों से पाठकों का परिचय होता है। 
    नासिरा शर्मा की लेखनी ज़मीन-ज़मीन का फ़क़ऱ् भली-भाँति पहचानती है। संकलित लेखों से लेखिका की सूझबूझ, विवेक, पात्रोचित भाषा एवं कथा- साहित्य की सरसता की पूरी-पूरी जानकारी मिलती है। पाठक इस तथ्य से बख़ूबी परिचित हो जाता है कि साहित्य का उद्देश्य क्या है। वह इंसानियत की वास्तविक तस्वीर बनाने में कहाँ तक सहायक है। 
    अपने लेखन में लेखिका ने परंपरा से प्राप्त ख़ूबियों, जनजीवन से मिली संघर्ष-गाथाओं एवं जिंदगी की तकलीफ़ों का वास्तविक बयान प्रस्तुत किया है। इस प्रस्तुति से नासिरा शर्मा को जानने-समझने एवं परखने में मदद मिलेगी, विश्वास है।
  • Gitanjali : Rabindranath Thakur
    Rabindra Nath Thakur
    300 270

    Item Code: #KGP-908

    Availability: In stock


  • Ek Bhaasha Huaa Karati Hai
    Uday Prakash
    140 126

    Item Code: #KGP-293

    Availability: In stock

    हमारे भागते-दौड़ते कठिन और तेज़ समय में जब बहुत कुछ हाशिये पर जा रहा है, जिसे पहले ज़रूरी समझा जाता था, क्या कविता के लिए कोई जगह, कोई काम बचे हैं? उदय प्रकाश की कविता के केंद्र में यही चिंता है। उनके यहाँ ‘अब हर बार हारा हुआ यह माथा है/अकेला अपनी आत्मा से लाचारी के साथ क्षमा माँगता हुआ’ और यह तीखा अहसास भी कि ‘अपनी ही भाषा और अपने ही लोकतंत्र के भीतर/हम अबुगरेब के कै़दी’ हैं। इस दुनिया में ‘कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते हैं/ इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं/ ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से’। ऐसी दुनिया और समय में कविता का काम मानवीय अंतःकरण को संक्षिप्त होने से बचाना, जो हो रहा है उसे खुली आँखों देखना और इस समय पर अंतःकरण की ओर से चैकसी करना है। कविता याद दिलाती है कि ‘यह एक लुटेरा अपराधी समय है/जो जितना लुटेरा है, वह उतना ही चमक रहा है और गूँज रहा है/हमारे पास सिर्फ़ अपनी आत्मा की आँच है और थोड़ा-सा नागरिक अंधकार/कुछ शब्द हैं जो अभी तक जीवन का विश्वास दिलाते हैं’। ‘आत्मा की आँच’, ‘थोड़ा-सा नागरिक अंधकार’ और ‘कुछ शब्द’ आज कविता का यही शास्त्र संभव है।
  • 20-Best Stories From Europe (Paperback)
    Prashant Kaushik
    150

    Item Code: #KGP-7205

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. European short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Elsi, The Unusual Farm Maid by Jeremias Gotthelf, The Jews’ Beech-tree by Annette Von Droste-hülshoff, The Broommaker of Rychiswyl by Jeremias Gotthelf, Fair Eckbert by Ludwig Tieck, How Joggeli Finds A Wife by Jeremias Gotthelf, A Little Legend of the Dance by Gottfied Keller, this book is a compilation of 20 famous European short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Europe.
  • Ardhavritt
    Mudra Rakshes
    795 716

    Item Code: #KGP-883

    Availability: In stock


  • Ai Ganga Tum Bahati Ho Kyoon (Paperback)
    Vivek Mishra
    100

    Item Code: #KGP-7036

    Availability: In stock

    ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ’ युवा कथाकार विवेक मिश्र का तीसरा कहानी-संग्रह है। ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ और ‘पार उतरना धीरे से’ कहानी संग्रहों से विवेक ने पाठकों के बीच प्रियता व प्रामाणिकता अर्जित की है। उन्होंने बहुत शाइस्तगी और रचनात्मक विनम्रता के साथ यह सिद्ध किया है कि आसपास पसरा यथार्थ हर रचनाकार के लिए समान नहीं होता। यह रचनाकार पर है कि वह ‘दिखते’ के पीछे छिपे जीवन सत्य और ‘दिखते’ में वास्तविक को कितना देख-समझ पाता है। विवेक वास्तविक और प्रायोजित का अंतर समझने वाले समर्थ कहानीकार हैं। यही कारण है कि आज जब संपादकों, संगठनों, प्रायोजकों के कंधें पर बेतालवत् सवार कुछ कहानीकार ठस व ठूँठ हो रहे हैं तब विवेक मिश्र की कहानियाँ अपना महत्त्व असंदिग्ध रूप से प्रकाशित कर रही हैं।
    विवेक मिश्र सुस्पष्ट सामाजिक सरोकारों से लैस लेखक हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ साबित करती हैं कि परिवार में बद्धमूल अप्रासंगिक धारणाओं से लेकर सामाजिक परंपराओं में घुसपैठ करती अमानवीय प्रवृत्तियों तक लेखक की पैनी नजर है। परिवेश विवेक के यहाँ एक पात्र सरीखा है। मैत्रेयी पुष्पा के बाद बुंदेलखंड का जीवन-जगत् उनके यहाँ सर्जनात्मक संदर्भ प्राप्त करता है। साथ ही, वे महानगरों की संधियाँ-दुरभिसंधियाँ भी परखते हैं।
    संग्रह में शामिल ‘घड़ा’, ‘चोरजेब’, ‘निर्भया नहीं मिली’ तथा ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं’ सरीखी कहानियाँ रेखांकित करती हैं कि लेखक मन के अतल में व्याप्त ध्वनियों को सुनने की अद्भुत क्षमता रखता है। उसके पास अर्थ को अनेक स्तरों पर वहन करने वाली भाषा है, जैसे--‘पनरबा कस्बे के किसी कागज को माचिस की तीली से जलाकर देखिएगा। शायद उससे उठती लपटों में आपको विश्रांत अनल की कुछ कहानियाँ मिलें।’ यह कहानी संग्रह वर्तमान हिंदी कहानी में मूल्यवान उपस्थिति की तरह स्वागत योग्य है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar (Paperback)
    Ramdhari Singh Diwakar
    125

    Item Code: #KGP-7007

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : रामधारी सिंह दिवाकर
    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिल्लेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न अपना है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भा दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।
    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।
    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार','खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानो', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Sahitya Vimarsh
    Jayanti Prasad Nautiyal
    195 176

    Item Code: #KGP-9098

    Availability: In stock


  • Himanshu Joshi Rachana Sanchayan
    Himanshu Joshi
    995 896

    Item Code: #KGP-589

    Availability: In stock


  • Roopa Aur Ek Pari
    Varsha Das
    60

    Item Code: #KGP-1234

    Availability: In stock


  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।
  • Kaagaz Ki Naav
    Nasera Sharma
    495 446

    Item Code: #KGP-472

    Availability: In stock


  • Vidrohini Shabri
    Hiralal Bachhotia
    100 90

    Item Code: #KGP-1854

    Availability: In stock

    विद्रोहिणी शबरी 
    जन्मजात विद्रोहिणी शबरी का विद्रोह जड़-परंपराओं और रूढियों के खिलाफ था । शबरी ने एक तरह से अतीत को या उस अतीत को जो हिंसा पर टिका था, को ललकारा था । वह आतंक के रावण के खिलाफ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी । शबरी ने नारी के रक्षिता माने जाने पर भी उँगली उठाई तो तरुणी शबरी पर भी जिसने देखा उसी ने उँगली उठाई थी । लेकिन शबरी अपने रास्ते चलती रही और जा पहुंची पंपा सरोवर क्षेत्र में । कठोर यथार्थ की रगड़ से उत्पन्न आदर्श ही शबरी का प्राप्तव्य बना और यह आदर्श शस्य श्यामल राम के रूप में परिकल्पित हुआ। मुग्धमना शबरी उसी राम के लिए प्रतीक्षारत रही । राम उद्धारक नहीं, शबरी के लिए मीत बनकर प्रकट हुए थे। केवट, निषाद के साथ राम के व्यवहार ने शबरी को ऐसा ही आश्वासन दिया था । राम का सबके प्रति समता भाव ही शबरी के लिए वरेण्य था । शबरी की वृष्टि में राम ने मानव-गरिमा की प्रतिष्ठा कर एक नई पहल की धी। शबरी अपनी इसी आस्था पर आरूढ राम के लिए प्रतीक्षारत रही । प्रतीक्षा के क्षणों को काटने के लिए शबरी बेर के पेडों का रोपण और फलो का संचयन करती रही । शबरी अरण्य संस्कृति की प्रतिरूप प्रकृति के संरक्षण में संलग्न रही। शबरी ने शूर्पणखा प्रकरण में अमर्यादित नारी को वरेण्य नहीं माना । इसीलिए राम ने हाथ उठाकर कहा था-शबरी प्रतिरूप है नवधा भक्ति का । इसीलिए शबरी सामान्य से असामान्य या असाधारण बन गई और राम के हृदय में मूर्ति के समान विराजित रही । यही शबरी की आस्था की विजय थी । शबरी ने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर राम को जनकनंदिनी को खोजने के संकेत दिए थे । इसमें सुग्रीव-हनुमान मिलन के पूर्व संकेत भी शामिल थे । भावी आपदाओं की ज्वालाओं को शांत करने हेतु सांत्वना नीर उड़ेलते रहना ही शबरी का प्राप्तव्य बना रहा ।
  • Bharat Ke Pramukh Sahityakaron Se Antrang Baatcheet
    Ranvir Rangra
    450 405

    Item Code: #KGP-234

    Availability: In stock

    भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अन्तरंग बातचीत
    किताबघर प्रकाशन श्रेष्ठ भारतीय साहित्य के आदान-प्रदान से भी सक्रिय रहा है । भारतीयता और भारतीय साहित्य की अंतर्धारा को समझने के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपनी भाषा की सीमारेखाओं से बाहर भी झाँकें । प्रमुख भारतीय साहित्यकारों को एक मंच पर लाने की दिशा में हमारा पहला अभिनव प्रयोग था 'भारतीय लेखिकाओं से साक्षात्कार' । प्रस्तुत प्रकाशन उसी की अगली कड़ी है जिससे भारत के पच्चीस साहित्यकारों से इस विधा के विशेषज्ञ डॉ० रणवीर रांग्रा की अन्तरंग बातचीत सम्मितित है, जिसके माध्यम से अनेक ऐसे रचना-रहस्य प्रकाश में आए हैं जिनसे अब तक हिंदी-जगत ही नहीं, भारतीय साहित्य-समाज भी अनभिज्ञ था ।
    इस प्रकार, यह पुस्तक मात्र एक और प्रकाशन नहीं, बल्कि एक दस्तावेज से जिसका उपयोग भारतीय साहित्य के संदर्भ-ग्रंथ के रूप में भी किया जा सकता है । आशा हैं, इससे प्रबुद्ध पाठको की अनेक जिज्ञासाओं का समाधान हो सकेगा और उन्हें एक ऐसी अंतर्दूष्टि प्राप्त होगी जिससे समकालीन भारतीय साहित्य की आत्मा तक पहुंचने में सहायता मिलेगी ।
  • Charaiveti-Charaiveti
    Shyam Singh Shashi
    75 68

    Item Code: #KGP-1892

    Availability: In stock


  • Mujhse Kaisa Neh
    Alka Sinha
    200 180

    Item Code: #KGP-395

    Availability: In stock

    मुझसे कैसा नेह
    बहुचर्चित कहानीकार अलका सिन्हा ने अपने पहले ही कहानी-संग्रह 'सुरक्षित पंखों की उडान' की टेक्नोलिटररी कहानियों से अपनी अलग पहचान बनाई । इस संग्रह के लगातार प्रकाशित हो रहे संस्करणों और इस पर संपन्न शोध-कार्य आदि पाठकों की पुरजोर स्वीकृति के प्रमाण हैं ।
    अलका सिन्हा का दूसरा कहानी-संग्रह 'मुझसे कैसा नेह' भूमंडलीकरण और बाजारवाद के दौर में आधुनिक संदर्भों  और बदलते समीकरणों का खुलासा करता है, बहुत कुछ हासिल कर चुकने के बाद भी भीतर से रिक्त होते जा रहे व्यक्ति की पहचान कराता है । आज के जटिल यथार्थ से उपजे संघर्ष, तनाव और एकाकीपन के धरातल पर खडी ये कहानियां घर-परिवार के बीच से निकलती हुई वैश्विक परिदृश्य की साक्षी बन जाती हैं ।
    मानवीय मूल्यों की पक्षधर इन कहानियों के पात्र तयशुदा ढर्रे से हटकर नए विकल्पों की खोज करते हैं । बेहतरी के नाम पर ये अपने देशकाल या परिस्थितियों से पलायन नहीं करते, न ही अपने स्त्री-पात्रों को जबरन 'बोल्ड' बनाकर स्त्री-विमर्श का झंडा उठाते हैं । दैहिक विमर्श से आगे अपनी अस्मिता के प्रति चेतना संपन्न ये स्त्रियां आधुनिकता की ओट में अमर्यादित नहीं होती तथा उच्छ्रंखल  और उन्मुक्त हुए बिना भी स्त्री मुक्ति की अवधारणा को संपुष्ट करती हैं ।
    स्फीति से बचती दूश्य-प्रधान भाषा-शैली पाठक को एक नई दुनिया का हिस्सा बना देती है और वह सहज ही इन पात्रों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है । भाव प्रवणता के साथ-साथ वैचारिक चिंतन से दीप्त ये कहानियाँ साधारण व्यक्ति की असाधारण भूमिका की संस्तुति करती हैं और अपने यथार्थ को कोसने के बदले अभिनव संकल्पनाओं की जमीन तोड़ती हैं ।
  • Varjit Baag Ki Gatha
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-7820

    Availability: In stock


  • Teesara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-7051

    Availability: In stock

    ग़ज़ल शतकों में सम्मिलित कवि
    हिन्दी ग़ज़ल शतक
    उदयप्रताप सिंह ०  कुमार शिव ०  गोपालदास ‘नीरज’ ०   चिरंजीत ०  ज़हीर कुरैशी ०  ज्ञानप्रकाश विवेक ०  त्रिलोचन ०  दुष्यंत कुमार ०  देवेंद्र माँझी ०  प्रमोद तिवारी ०  बलबीर सिंह ‘रंग’ ०  बालस्वरूप राही ० भवानी शंकर ०  मासूम ग़ाज़ियाबादी ०  मृदुला अरुण ०  राजनारायण बिसारिया ०   रामकुमार कृषक ०  रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’ ०  रामदरश मिश्र ०  रामावतार त्यागी ०  शलभ श्रीराम सिंह ०  शिव ओम ‘अंबर’ ०  शेरजंग गर्ग ०  सुरेंद्र श्लेष ०  सूर्यभानु गुप्त।
    दूसरा ग़ज़ल शतक
    अशोक वर्मा ०  आचार्य सारथी ०  उपेन्द्र कुमार ०  उर्मिलेश ०  ओमप्रकाश चतुर्वेदी ‘पराग’ ०  कमल किशोर ‘भावुक’ ०  कमलेश भट्ट ‘कमल’ ०  कुँअर बेचैन ०  ज्योति शेखर ०   नरेन्द्र वसिष्ठ ०  पुरुषोत्तम ‘वज्र’ ०  प्रभात शंकर ०  महेश जोशी ०  योगेन्द्र दत्त शर्मा ०  रंजना अग्रवाल ०  रामनारायण स्वामी ०  रामनिवास ‘मानव’ ०  लक्ष्मण ०   विजय किशोर ‘मानव’ ०  विनीता गुप्ता ०  शिवबहादुर सिंह भदौरिया ०  श्रवण राही ०  सरोज व्यास ०  हरजीत ०   हरिओम।
  • Bhagn Seemayen
    Balshauri Reddy
    120 108

    Item Code: #KGP-2047

    Availability: In stock

    भग्न सीमाएँ
    "मेरे देवता, आप प्रेम के अवतार हैं । आप मेरे जीवन में प्रेम के देवता बनकर आए । इस प्रेम-मूर्ति की मैं सदा आराधना करती रहूंगी ।
    मैँ जानती हूँ कि आप मुझे अपनी शरण में लेने को तैयार हैँ। कहावत है न, भगवान् भले ही वर दे, लेकिन पुजारी वर नहीं देता । आपके चतुर्दिक जो पुजारी बने हुए हैं, वे चाहते हैं कि मैं आपसे दूर रहूँ। वे यह नहीं चाहते कि मैं आपकी उपासना करूं । मैं उनकी दृष्टि में अस्पृश्य हूँ अयोग्य हूँ। पर आपकी करुणा और कृपा सब पर समान होती है ।
    मैं अपना प्यार रूपी दीपक जला, स्नेह रूपी बत्ती जगा अपने हृदय को आलोकित करना चाहती थी, लेकिन क्या करूँ । परिस्थिति रूपी प्रभंजन का वेग अधिक हो चला है, शायद मैं निकट रहूँ तो वह बुझ जाए । मैं दूर से ही निरंतर अलख जगाए रखना चाहती हूँ।
    आपसे दूर होने के पहले मैंने अपने गत जीवन का एक बार सिंहावलोकन दिया । आपके जीवन में मैंने एक रोगी के रूप में प्रवेश क्रिया । आपने मेरे शरीर को स्वास्थ्य प्रदान किया, जीवन के प्रति आशा और विश्वास पैदा किया, प्रेम दिया आज मैं उसके पुरस्कारस्वरूप आपके हृदय को अस्वस्थ बनाकर जा रही हूँ, मलिन और दुखी बनाकर जा रही हूँ ।
    -[इसी पुस्तक से]
  • Dr. Siddharth
    Kavita Surabhi
    260 234

    Item Code: #KGP-1950

    Availability: In stock

    डॉ० सिद्धार्थ
    'डॉ० सिद्धार्थ' लेखिका का पहला उपन्यास है। उनकी दृढ मान्यता है कि जहाँ समाज में विडंबनाएं, विसंगतियां, अपराध, पीडा, विकृतियाँ और भोगवादी  राक्षसी अपसंस्कृति है, वहीं डॉ० सिद्धार्थ जैसी निर्मापाधर्मा शक्तियां भी हैं। सच्चे, निर्मल और सात्यिक जीवन में बहुत आकर्षण है; किंतु उसे अंगीकार करने का मूल्य असाधारण है । अत: एक शाश्वत प्रश्न हमारे सामने है कि क्या कोई व्यक्ति धर्म की राह पर चलकर भी सामाजिक दृष्टि से सफल हो सकता है ?
    शिष्या  के रूप से दामिनी, अपने गुरु के स्नेह का सुख पाती हे। समय के साथ डॉ० सिद्धार्थ की बौद्धिकता, उसकी प्रतिभा को ही नहीं, उसकी आत्मा को भी सँवारती है । वह समझ पाती है कि चमक और दिव्यता में अंतर होता है । लौकिक सफलताओं की चमक हमारी आँखों को चौंधियाती है और आत्मिक विकास हमें दिव्यता से भर देता है। अध्यापक की बुद्धि से उच्च है उसका विवेक, और विवेक से उच्चतर  है उसका आचरण । आचार्य वही है, जो आचरण को शुद्ध ही नहीं दिव्य भी कर दे । डॉ. सिद्धार्थ का चरित्र इन सिद्धांतों का मूर्तिमंत रूप है ।
  • Sikhon Ka Itihaas (Paperback) (Two Valumes)
    Khushwant Singh
    745

    Item Code: #KGP-268

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Kucch Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100 90

    Item Code: #KGP-9238

    Availability: In stock

    ये कहानियां बच्चों के लिए भी हैं और किशोरांे के लिए भी। अपनी जीवन-यात्रा में आए हुए कुछ मार्मिक प्रसंगों से मेंने ये कहानियां रची हैं। सभी के पात्र मनुष्य हैं। हां, दो कहानियां ऐसी हैं, जो शुद्ध काल्पनिक हैं और जिनके पात्र पशु हैं। मैंने चाहा है कि इन कहानियों से बच्चों का मनोरंजन तो हो ही, वे अपने वय की कुछ समस्याओं से रूबरू हों और उन्हें अच्छे जीवन-व्यवहार की सीख मिले।
    —रामदरश मिश्र