Tiger Tantra (Novel)

Ganga Prasad Vimal

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  • Year: 2010

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Global Vision Press

  • ISBN No: 9789380707006

A first ever Novel on an Untouched Subject
The Tantra, its cults and practices have always attracted attention worldwide due to its strange disciplines and various hidden secrets. Chiefly because of its use of esoteric practices— in acquiring siddhis (supernatural powers), spiritual perfection and other material gains—Tantra came to be regarded as anti-social and unethical, forcing it to go underground.
The present novel explores an unusual aspect of the tantric discipline, which makes it quite interesting. The author has taken up a subject inherent to the sub-culture of the Himalayan regions to which he belongs, and tried to weave it into a quite probable story, realistic as well as readable.
‘Tiger Tantra’ or the Tantra which changes the practitioner into a tiger or Bokshu and makes him immortal, lies buried under the ruins of a temple in the village of Jaled, the centre of an isolated Tantric Peeth in the Himalayan region.
A scholar in search of the Tiger Tantra visits the village, to uncover the secret and to find the hidden mantra, finds a swami engaged in some strange practices . . . and the story unfolds in its fantastic dimensions . . . till the virgin offers herself to the scholar to corrupt the swami’s sadhana.

Ganga Prasad Vimal

गंगाप्रसाद विमल हिमालय के एक छोटे-से कस्बे में, 1939 में जन्मे गंगाप्रसाद विमल ने अनेक विश्वविद्यालयों में शिक्षा पाई । एक-चौथाई शताब्दी अध्यापन करने के बाद वे 1989 में भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक नियुक्त किए गए । साथ ही साथ उन्होंने सिंधी भाषा की राष्ट्रीय परिषद और उर्दू भाषा की राष्ट्रीय परिषदों का काम भी संभाला । विश्व की अनेक भाषाओं में उनकी कहानियों के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं । 'न्यूडायमेंशंस', 'मेडिटिरेनियन रिव्यू', 'वैस्टर्न ह्यूमेनिटीज रिव्यू', 'द न्यू रेनेंया', 'क्वैरी', ‘प्रिन्य इंटरनेशनल', 'इस्टर्न होराइ्जन' आदि विश्वप्रसिद्ध पत्रिकाओं में उनकी कहानियों का प्रकाशन हुआ है । लंदन के फॉरेस्ट बुक्स ने उनकी कविताओं और कहानियों का एक बृहद संकलन कुछ वर्ष पहले प्रकाशित किया था । अब तक हिंदी में उनके ग्यारह कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए हैं । इसके साथ ही चार उपन्यास तथा सात कविता-संग्रह व विश्व की अनेक कृतियों की उनके द्वारा अनुदीत पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं । हाल ही से उनके उपन्यास 'मृगान्तक' पर एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म "बोक्षु : द मिथ' का निर्माण हुआ है, जिसका प्रदर्शन अंतर्राष्टीय फिल्म महोत्सव में किया गया। अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत गंगाप्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर-पद से सेवामुक्त होकर लेखन में सक्रिय है ।

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