Bhartiya Naitik Shiksha : 4

Dr. Prem Bharti

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788190820434

नैतिक शिक्षा का प्रत्यक्ष पाठ बचपन में माता-पिता से तथा विद्यालयों में गुरुजनों के सान्निध्य में बैठकर मिलता है । धीरे-धीरे समझ विकसित होने पर धर्म और संस्कृति द्धारा भी हमें नैतिक शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष स्वाध्याय के माध्यम से सीखने को मिलता है । फिर समाज और राष्ट्र के लिए किए गए सेवा-कार्यों के लिए समर्पण के प्रति हमारे मन में जो भावना निरंतर उठती रहती है, उससे हम यह जान सकते हैं कि हमारी नैतिक शिक्षा के संबंध में धारणा कितनी व्यावहारिक है।
माता-पिता एवं गुरुजनों के प्रति बढ़ती अश्रद्धा, वैज्ञानिक दुष्टिकोण
के नाम पर धर्म एव संस्कृति के प्रति घटती निष्ठा ने नैतिक शिक्षा को
विवादों के घेरे में ला दिया है। सरकार द्वारा पाठयक्रम में भले ही उसे
पढाने का संकेत दिया जाता रहा है, किन्तु ऐसे कितने शिक्षक एवं
विधालय है जो इसके प्रति गंभीर हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव समाज एवं
राष्ट्र में बढ़ती चोरी, लूटमारी, बेईमानी, हिंसा और भ्रष्टाचार के रूप में
दिखाई देने लगा है।
घर में माता-पिता को समयाभाव के कारण नैतिक शिक्षा का पाठ पढाने का समय भी नहीं मिलता । अत: विद्यालयों को ही इसका दायित्व संभालना होगा । यह ठीक है कि विद्यालयों में भी पठन-पाठन एवं परीक्षा- कार्यों की अधिकता के कारण समयाभाव रहता है, किन्तु तीन स्तरों पर यह संभव है…एक तो विषयों के पठन-पाठन के अंतर्गत ही जो नैतिक संदर्भ आते है, उन प्रसंगों का सदुपयोग कर, दूसरे, नैतिक शिक्षा के अन्य कार्यक्रम बनाकर, जैसे-प्रार्थना, पुस्तकालय, पत्रिका, संग्रह-पुस्तिका, दुश्य-श्रव्य सामग्री तथा दिनचर्या आदि सभी माध्यमों का प्रयोग करने का वातावरण  बनाकर।  तीसरे, विद्यालय की दैनिक गतिविधियों में ऐसे अवसर प्रदान कर जिससे बालको में नैतिक विचारों को व्यावहारिक रूप से अपनाने की भावना जगे ।

Dr. Prem Bharti

डॉ. प्रेम भारती
जन्म: 14 मार्च, 1933, खुजनेर (जिला राजगढ़), मध्य प्रदेश।
शिक्षा: एम.ए. (हिंदी और अर्थशास्त्र), एम.एड. तथा लघु पत्रिकाओं पर पी-एच.डी.।
अभिरुचि: साहित्य, वेदांत, ज्योतिष के माध्यम से समाज-सेवा, पाठ्यपुस्तक लेखन में दक्षता।
प्रकाशित साहित्य: गद्य साहित्य--‘तुलसी के राम’, ‘वीरांगना दुर्गावती’, ‘भगवान महावीर’, ‘बालकृष्ण शर्मा नवीन’, ‘समरस भारत के आधारस्तंभ’, ‘शिक्षा और संस्कृति’, ‘गीता तत्वार्थ’ एवं ‘बाल-साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’। पद्य साहित्य शतक--‘रामायणी शतक’, ‘गीता शतक’, ‘त्रिवेणी शतक’, ‘शृंगार शतक’ एवं ‘शतदल’। काव्य--‘दमयन्ती’ व ‘यशोधरा के आँसू’। खंडकाव्य--‘शबरी’, ‘इला’, ‘पत्थर के आँसू’ और ‘कुरुक्षेत्र की राधा’। कविता- संग्रह--‘उषा’, ‘संध्या’, ‘अवगुंठन’, ‘स्वरति गीता’, ‘अनागस’, ‘शब्दप्रिया’, ‘शब्दकाम’, ‘अंधे चैराहे’ व ‘एक तीली की तलाश में’। नाटक--‘नया सवेरा’। उपन्यास--‘वह फिर न मुस्कराई’। अन्य--‘गांधी चालीसा’ (प्रकाशित), ‘मानस भारती’, ‘विद्याभारती प्रदीपिका’, ‘सेवा सेतना’ एवं अनेक दैनिक, साहित्यिक, मासिक, शालेय एवं शैक्षिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन।
उपलब्धियाँ एवं सम्मान: संस्कार भारती (साहित्य विधा-2004), लायंस क्लब, भोपाल एवं नागरिक मंच, भोपाल तथा अनेक संस्थाओं द्वारा उत्कृष्ट शैक्षिक एवं साहित्यिक गतिविधियों में सराहनीय योगदान हेतु सम्मानित।
संप्रति: राज्य शैक्षिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान परिषद् के पूर्व पाठ्यपुस्तक रचना प्रकोष्ठ के विभागाध्यक्ष, मध्य प्रदेश सर्वशिक्षा अभियान की राज्यस्तरीय कार्यकारिणी के सदस्य, माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्य प्रदेश संचालक मंडल के सदस्य, एस.सी.ई.आर.टी. (म.प्र.) की पाठ्यपुस्तक स्थायी समिति के सदस्य, अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा संघ द्वारा संचालित भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण केंद्र, भोपाल के पूर्व राष्ट्रीय समन्वयक, संस्थापक-अध्यक्ष प्राचार्य मंच मध्य प्रदेश, राष्ट्रीय सह-संयोजक अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, कुरुक्षेत्र, क्षेत्रीय मंत्री--विद्याभारती मध्यक्षेत्र, भोपाल।

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