Bhartiya Naitik Shiksha : 1

Dr. Prem Bharti

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788190820400

हम सभी इस बात से सहमत है कि समाज में गिरते हुए नैतिक मूल्य देश को, समाज को तथा संस्कृति को खोखला कर रहे हैं । प्राथमिक विद्यालय के छात्रों से लेकर उच्च महाविद्यालय के छात्रों में अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर हो रही है। यह अनुशासनहीनता राष्ट्रीय स्तर पर भी यत्र-तत्र देखने को मिल रही है इसका एकमात्र कारण है--शिक्षण कार्य में नैतिक शिक्षा की उपेक्षा।
भारत एक सांस्कृतिक देश है । यहाँ पर सभी धर्मों का आदर किया जाता है, अत: बालक के सर्वांगीण विकास के लिए परिवार, विद्यालय तथा समाज तीनो को अपना दायित्व संभालना होगा। बालक केवल परिवार का सदस्य नहीं है, वरन् उसे एक उत्तरदायी नागरिक भी बनना है। यदि शिक्षा और शिक्षक ने उसे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी, लिपिक, नेता, श्रमिक बनाकर अपनी भूमिका को पूर्ण मान लिया तो यह एक बहुत बडी त्रुटि होगी। शिक्षा की भूमिया तभी पूर्ण होगी, जब हम नैतिक शिक्षा के माध्यम से बालकों को उचित-अनुचित, अच्छा-बुरा का ज्ञान दे सकें और यह अनुभव करा सकें कि श्रम के कमाए हुए धन का मूल्य भ्रष्टाचार से प्राप्त धन की अपेक्षा कई गुना अधिक है।
प्रस्तुत पुस्तक इस बात का प्रयास है कि बालक में परिवर्तन ताने के लिए ऐसी विषयवस्तु संकलित की जाए जो उसके नैतिक एवं चारित्रिक विकास में सहायक हो । यह तभी संभव है जब इस विषयवस्तु को बौद्धिक कसरत के रूप में न रखकर जीवन की सार्थकता के रूप में रखा जाए । जैसे जलता हुआ दिया ही दूसरे दीये को जलाता है, वैसे ही प्रखर नैतिक जीवन ही नैतिकता का संचार कर सकता है। अत: नैतिक शिक्षण की प्रभावी परियोजना तैयार कर शिक्षक-बंधु इसका शिक्षण करें।

Dr. Prem Bharti

डॉ. प्रेम भारती
जन्म: 14 मार्च, 1933, खुजनेर (जिला राजगढ़), मध्य प्रदेश।
शिक्षा: एम.ए. (हिंदी और अर्थशास्त्र), एम.एड. तथा लघु पत्रिकाओं पर पी-एच.डी.।
अभिरुचि: साहित्य, वेदांत, ज्योतिष के माध्यम से समाज-सेवा, पाठ्यपुस्तक लेखन में दक्षता।
प्रकाशित साहित्य: गद्य साहित्य--‘तुलसी के राम’, ‘वीरांगना दुर्गावती’, ‘भगवान महावीर’, ‘बालकृष्ण शर्मा नवीन’, ‘समरस भारत के आधारस्तंभ’, ‘शिक्षा और संस्कृति’, ‘गीता तत्वार्थ’ एवं ‘बाल-साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’। पद्य साहित्य शतक--‘रामायणी शतक’, ‘गीता शतक’, ‘त्रिवेणी शतक’, ‘शृंगार शतक’ एवं ‘शतदल’। काव्य--‘दमयन्ती’ व ‘यशोधरा के आँसू’। खंडकाव्य--‘शबरी’, ‘इला’, ‘पत्थर के आँसू’ और ‘कुरुक्षेत्र की राधा’। कविता- संग्रह--‘उषा’, ‘संध्या’, ‘अवगुंठन’, ‘स्वरति गीता’, ‘अनागस’, ‘शब्दप्रिया’, ‘शब्दकाम’, ‘अंधे चैराहे’ व ‘एक तीली की तलाश में’। नाटक--‘नया सवेरा’। उपन्यास--‘वह फिर न मुस्कराई’। अन्य--‘गांधी चालीसा’ (प्रकाशित), ‘मानस भारती’, ‘विद्याभारती प्रदीपिका’, ‘सेवा सेतना’ एवं अनेक दैनिक, साहित्यिक, मासिक, शालेय एवं शैक्षिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन।
उपलब्धियाँ एवं सम्मान: संस्कार भारती (साहित्य विधा-2004), लायंस क्लब, भोपाल एवं नागरिक मंच, भोपाल तथा अनेक संस्थाओं द्वारा उत्कृष्ट शैक्षिक एवं साहित्यिक गतिविधियों में सराहनीय योगदान हेतु सम्मानित।
संप्रति: राज्य शैक्षिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान परिषद् के पूर्व पाठ्यपुस्तक रचना प्रकोष्ठ के विभागाध्यक्ष, मध्य प्रदेश सर्वशिक्षा अभियान की राज्यस्तरीय कार्यकारिणी के सदस्य, माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्य प्रदेश संचालक मंडल के सदस्य, एस.सी.ई.आर.टी. (म.प्र.) की पाठ्यपुस्तक स्थायी समिति के सदस्य, अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा संघ द्वारा संचालित भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण केंद्र, भोपाल के पूर्व राष्ट्रीय समन्वयक, संस्थापक-अध्यक्ष प्राचार्य मंच मध्य प्रदेश, राष्ट्रीय सह-संयोजक अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान, कुरुक्षेत्र, क्षेत्रीय मंत्री--विद्याभारती मध्यक्षेत्र, भोपाल।

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