Samarpan

Bhanu Pratap Shukla

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  • Year: 1992

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Bhartiya Prakashan Sansthan

  • ISBN No: 4412125887452

समर्पण 
शताब्दियों से साथ-साथ रहने के बावजूद मुस्लिम मानसिकता भारतीय जीवन-दृष्टि से रच-बस क्यों नहीं सकी ? राष्ट्रीय मूल धारा के प्रवाह को और व्यापक न बनाकर उसे संकीर्ण या उससे हटकर अपनी एक अलग धारा बनाने का प्रयास क्यों चलता रहता है ? भारत में इस्लाम के मतानुयायी यहाँ की विविधता में एकता की अवधारणा के अधिष्ठान का अंग क्यों नहीं बन पाते ? हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई का नारा जितना गगनभेदी होता है, दिल की दूरियाँ और दरारें उतनी ही गहरी क्यों होती जाती है ? कैसा स्वर्णिम होगा वह दिन जब भारत के सभी नागरिक मुक्तकण्ठ से 'भारतमाता की जय' के उदघोष में ही सर्वाधिक गौरव और प्रेरणा का अनुभव करेंगे । यहीं लालसा इस पुस्तक की मूल प्रेरणा है । इस पुस्तक में उठाए गए ऐसे तमाम सवालों का बेबाक जवाब मिल जाए और खुले मन से हम उन्हें मान लें तो निश्चित ही उस दिन भारतीय जीवन का सौदर्य अपने पूरे निखार पर होगा । शताब्दियों के संताप से संत्रस्त देश के लिए सहीं, सामयिक और स्थायी विकल्प की तलाश का ही एक नाम है-समर्पण ।

Bhanu Pratap Shukla

भानुप्रताप शुक्ल
जन्म : 7 अगस्त, 1935, ग्राम बंजरवा. जिला सुलतानपुर (उ० प्र०) ।
जन्म के एक माह बाद ही श्री शुक्ल की माँ का निधन हो गया, अत: लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा नानी की देख- रेख में हुई । बाल्यावस्था से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध रहे । लेखन व पत्रकारीय संस्कार 'सर्वश्री अम्बिका- प्रसाद वाजपेयी डॉ० सम्पूर्णानन्द, यशपाल, अमृतलाल नागर प्रभूति विभूतियों के निकट सान्निध्य प्राप्त हुए दूसरी ओर सर्वश्री माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी), भाऊराव देवरस, पं० दीनदयाल उपाध्याय, रज्जू भैया, बापूराव मोये और दत्तोपन्त ठेंगड़ी जैसे राष्ट्रवादी मनीषियों/ विचारकों से चिन्तनधारा पायी । वह हिन्दी के उन पत्रकारों में अग्रगण्य माने जाते हैं, जिनसे वर्तमान युवा पत्रकारों की एक पूरी पीढी या तो बनी है, या प्रभावित हुई है । वह 1961 से लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में आये । उन्होंने मासिक 'राष्ट्रधर्म', साप्ताहिक 'पाञ्चजन्य' और हिन्दी दैनिक 'तरुण भारत' का सम्पादन किया। उनके द्वारा संपादित या लिखित अनेक वैचारिक कृतियाँ हिन्दी पाठको तक पहुँच चुकी हैं ।

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