Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal

Viren Dangwal

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789381467268

कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

Viren Dangwal

वीरेन डंगवाल
जन्म  : 5 अगस्त, 1947, कीर्तिनगर, टिहरी गढ़वाल ।
मुजफ्फर नगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल में शुरुआती शिक्षा के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी से एम०ए० और आधुनिक हिंदी कविता के मिथकों और प्रतीकों पर डी०लिट्० । 1971 से बरेली कॉलेज में अध्यापन । साथ ही हिंदी और अंग्रेजी में पत्रकारिता । इलाहाबाद से प्रकाशित 'अमृत प्रभात' में कुछ वर्ष तक घूमता आईना शीर्षक से स्तंभ-लेखन । दैनिक 'अमर उजाला' के संपादकीय सलाहकार ।
पहला कविता-संग्रह 'इसी दुनिया में' 1991 में प्रकाशित । तुर्की के महाकवि नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद 'पहल' पुस्तिका के रूप में ।
विश्व कविता से पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊष रुजेविक आदि की कविताओं के अलावा कुछ आदिवासी लोक कविताओं के अनुवाद । कई कविताओं के अनुवाद बांग्ला, मराठी, पंजाबी, मलयालम और अंग्रेजी में प्रकाशित ।
'इसी दुनिया में' के लिए रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1992), श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार (1993), कविता के लिए शमशेर सम्मान (2002) ।

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