Kavi Ne Kaha : Madan Kashyap

Madan Kashyap

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  • Year: 2008

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788189859831

कवि ने कहा : मदन कश्यप
'मदन कश्यप सिर्फ लोक-जीवन की मासूम लगती सतह पर ही नहीं रहते, उसमें पैठते हैं, उसकी नई जड़ों तक जाते हैं और शायद यही वजह है कि कई कविताओं में जनता की बोली-बानी के नए शब्द, नई अभिव्यक्तियाँ हिंदी की काव्यभाषा को दे जाते हैं ।‘
'बोली से लाए गए 'फाव' और 'मतसुन' जैसे शब्द हों या बहेलियों का पेशागत शब्द 'कुरूज' -इन सबके द्वारा कवि अपने अनुभव और भाषा-दोनों के विस्तार की सूचना देता है और इस तरह अपने पूरे काव्य-बोध को अधिक विश्वसनीय बनाता है । इस कवि का अपना एक देशी चेहरा है, जिसे अलग से देखा और पहचाना जा सकता है ।'
'उनका मानसिक क्षितिज कितना विस्तृत है यह उनकी कविताओं से जाना जा सकता है । एक खास  बात यह कि मदन कश्यप के पास राजनीति से लेकर विज्ञान तक की गहरी जानकारी है, जिसका वे अपनी कविताओं में बहुत सृजनात्मक उपयोग करते हैं ।'
'बदलते समय-सन्दर्भ को पकड़ने और उसे व्याख्यायित करने में मदन कश्यप को महारत हासिल है ।'

Madan Kashyap

मदन कश्यप
29 मई, 1954 को वैशाली (बिहार) के एक निम्न-मध्यवर्गीय परिवार से पैदा हुए मदन कश्यप की माँ का निधन आठ वर्ष की उम्र में हो गया । उसके बाद ननिहाल में रहकर किसी प्रकार अपनी पढ़ाई पूरी की और 1979 में रोजी-रोटी की तलाश में धनबाद आ गए । यहीं एक दैनिक पत्र से जुड़कर कोई 2 वर्ष तक सक्रिय पत्रकारिता की । फिर (1981 में) एक सार्वजनिक उपक्रम में नौकरी कर ली । 1987 में एक दूसरे सार्वजनिक उपक्रम में पटना आ गए । नवंबर, 2000 में उस नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया । उसके बाद राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर नियमित रूप से लिखना शुरू क्रिया ।
मदन कश्यप के अब तक तीन कविता-संग्रह-'लेकिन उदास है पृथ्वी' (1992), 'नीम रोशनी में' (2000) तथा 'फुरूज' (2006) और दो निबंध-संग्रह-'मतभेद' (2002) तथा 'लहुलुहान लोकतंत्र' (2006) प्रकाशित हो चुके हैं । कविता के लिए उन्हें कुछ पुरस्कार और सम्मान भी मिल चुके हैं ।
मदन कश्यप अपनी कविता के अलावा वैचारिक लेखन तथा सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के लिए भी जाने जाते हैं । वे 2005 से दिल्ली में रह रहे हैँ और इन दिनों एक वैचारिक पत्रिका 'सामयिक विमर्श' का संपादन कर रहे हैं ।

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