Kavi Ne Kaha : Anamika

Anamika

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  • Year: 2011

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788189859800

कवि ने कहा : अनामिका
अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।
भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है ।

Anamika

अनामिका
अनामिका निबंध लिखती हैं, अखबारों और पत्रिकाओं में स्तंभ लिखती हैं, कहानियाँ और उपन्यास रचती हैं, कविताओं और उपन्यासों का अनुवाद-संपादन करती हैं, और अंग्रेजी साहित्य का अध्यापन करती हैं । एक पब्लिक इंटलेक्चुअल के रूप में व्याख्यान देने से लेकर नारीवादी पब्लिक स्फियर में सक्रिय रहने तक वे और भी बहुत कुछ करती हैं, पर सबसे पहले और सबसे बाद में वे एक कवि हैं ।
1961 के उत्तरार्द्ध मेँ मुजफ्फरपुर, बिहार में जन्मी और अंग्रेजी साहित्य से पी-एच०डी० अनामिका राजभाषा परिषद पुरस्कार (1987), भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (1995), साहित्यकार सम्मान (1997), गिरिजाकुमार माथुर सम्मान (1998), परंपरा सम्मान (2001) और साहित्य सेतु सम्मान (2004) से विभूषित हो चुकी हैं ।
उनकी प्रकाशित कृतियाँ : आलोचना : 'पोस्ट एलियट पोएट्री : अ वॉएज फ्रॉम कंफिल्कट टु आइसोलेशन', 'डन क्रिटिसिज्म डाउन दि एजेज़', 'ट्रीटमेंट ऑव लव एंड डेथ इन पोस्ट वार अमेरिकन विमेन पोएटस'; विमर्श-'स्त्रीत्व  का मानचित्र', 'मन माँजने की जरूस्त', 'पानी जो पत्थर पीता है'; कविता- 'गलत पते की चिट्ठी', 'बीजाक्षर', 'समय के शहर में', 'अनुष्टुप', 'कविता में औरत', 'खुरदुरी हथेलियां', कहानी-'प्रतिनायक' संस्मरण  'एक तो शहर था', 'एक थे शेक्सपियर', 'एक थे चार्ल्स  डिकेंस', 'दस द्वारे का पिंजरा; उपन्यास-'अवांतर  कथा, अनुवाद-'नागमंडल' (गिरीश कर्नाड), 'रिल्के की कविताएँ', 'एफ्रो-इंग्लिश पीएम्स', 'अटलांत के आर-पार'
(समकालीन अंग्रेजी कविता), 'कहती हैं औरतें' (विश्व साहित्य की स्त्रीवादी कविताएँ)।

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