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428

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  • Akasmaat Kuchh Kavitayen
    Surendra Pant
    160 144

    Item Code: #KGP-9336

    Availability: In stock

    हिंदी कवियों ने अपने काव्य-मुहावरों को यदि रसिकतापूर्ण काव्यरूपों से श्रृंगारित किया है तो कुछ कवियों ने कविताओं को चीखने की स्वतंत्रता भी दी है। मगर इस संगह की कविताओं में पाठक पाएंगे कि कवि का सरोकार बृहत्तर मानवता की उपस्थिति करने में कई बार वह संप्रेषणीयता की रूप-सज्जा की भी परवाह नहीं करता। व्यापक जनहितों की आकांक्षाओं के बीच से अंकुरित इन कविताओं को सच्चे ईश्वर, खरे अध्यात्म तथा खनकदार वर्तमान की चाहत है, जो भोले-भाले लोक को उसकी निष्कपटता लौटा सके। ‘मदर टेरेसा’ पर केंद्रित कविता को पढ़कर हमें कवि की मानवगत अवधारणाओं का समूचा अहसास होता है।
    पुलिस विभाग के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ‘संवेदनशील’ पद का निर्वहन करते हुए यह कवि समाज और राजनीति की ‘रणनीति’ में लाखों-लाख हंसते-रोते हैवानों-इंसानों के परम-चरम अनुभवों का साक्षी रहा है, इसीलिए ये कविताएं हमारे समय और समाज की धाराओं-उपधाराओं के रूप में कवि के सामने ‘पेशी’ पाकर शब्दांकित होती हैं। संभवतः इस अनुभवबहुलता ने कवि को किसी इकहरे विषय का मर्मज्ञ न रहने देकर, सर्वत्र का प्रवक्ता कवि भी बना दिया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस विविधता के बावजूद कवि का ध्यान अपने देश, संस्कृति और जन पर लगभग प्रत्येक कविता मंे कंेद्रीकृत हुआ है।
    कहना न होगा कि इन कविताओं के नए तेवर का आगमन भले ही अकस्मात् रूप में हुआ है, मगर निश्चित ही इनका सृजन गहरी विचारशीलता के बाद ही संभव हुआ होगा।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Mere Saakshatkaar : Mamta Kaliya
    Mamta Kalia
    200 180

    Item Code: #KGP-558

    Availability: In stock


  • Aanvla Or Uski Baagbani
    Darshna Nand
    180 162

    Item Code: #KGP-7848

    Availability: In stock

    वास्तव में आंवले का ताजा फल भी सीमित मात्रा में ही खाया जा सकता है । मुरब्बे के अतिरिक्त इसके अनेक उत्पाद भी निर्माण किये जाते हैं । इसकी उपयोगिताएं अनन्य हैं । यह औषधीय गुणों का भंडार है । 
    इस विशिष्ट फल पर कोई संकलित साहित्य उपलब्ध नहीं था, जिससे इसकी वैज्ञानिक विधि से बागबानी करने और इसके उपयोग करने में सहायता मिल पाती । प्रस्तुत की पुस्तक की हिंदी में रचना करके लेखक ने इन अभावों की पूर्ति की है । 
  • Door Van Mein Nikat Man Mein
    Ajit Kumar
    360 324

    Item Code: #KGP-868

    Availability: In stock

    दूर वन में निकट मन में
    मनुष्य एक-दूसरे को सुख-दुःख देते किन नातों के जाल में बँधते-जुड़ते रहते हैं? उनके संबंधों की आधारभूमि क्या है? एक-दूसरे के सारे मीठे-कड़वे अनुभव कालांतर में एक भाव, एक स्मृति, एक टीस बनकर रह जाते हैं! उस भाव का महत्त्व क्या है?
    ‘दूर वन में’ अजितकुमार द्वारा रचित कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों के संस्मरणों का संग्रह है। इसमें कुछ प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध विशेषकर ऐसे लोग हैं जो अब भूले से जा रहे हैं, पर अपने ज़माने के विशिष्ट व्यक्तित्व रहे हैं। अधिकांश संस्मरण पारिवारिक दायरे में आने वाले लोगों के हैं। 
    ‘निकट मन में’ भी अजितकुमार के संस्मरणों का संग्रह है।  इन पुस्तकों के शीर्षकों में तुक तो अनायास मिल गया है, उनकी तान, लय और समझ में भी पाठकगण उस निरंतरता का, तारतम्य का आभास पाएँगे, जो अजितकुमार की कविता और गद्य-रचना का स्वाभाविक गुण है।
    संस्मरणों के माध्यम से अजितकुमार अतीत को नहीं पगुराते, हिसाब-किताब भी बराबर नहीं करते, वे अनुभव तथा संवेदना का पथ प्रशस्त करते हैं। इस नाते, ये संस्मरण जितने उनके हैं, लगभग उतने ही या उससे भी अधिक औरों के अपने हो सकेंगे।
    अजितकुमार के संस्मरणों की ये दो पुस्तकें एक ही जिल्द में प्रस्तुत हैं। प्रसिद्ध कवि अजितकुमार एक समर्थ और सशक्त गद्यकार भी हैं। इनके गद्य की ताकत का नमूना तो ये संस्मरण हैं ही, उनके संवेदनशील, सजग, जागरूक व्यक्तित्व का भी परिचय देते हैं।
  • Path Ke Daavedaar
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-866

    Availability: In stock


  • Jaiv Praudyogiki Ke Vividh Aayaam
    Shuk Deo Prasad
    120 108

    Item Code: #KGP-9143

    Availability: In stock

    1953 में जब वाटसन, क्रिक और विलकिंस ने डी.एन.ए. अणु की दुहरी कुंडली वाला अपना सुप्रसिद्ध माॅडल डबल हेलिक्स प्रस्तुत किया तो विज्ञों ने कहा था ‘मानव ने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है’ और अब जबकि मानव या किसी भी प्रजाति के गुणों के संवाहक डी.एन.ए. अणु की अंतर्निहित संरचना ‘जीन’ के अंतस्थल का मनुष्य ने चित्रण कर लिया है और मानव कोशिकाओं में पाई जाने वाली अनुमानतः समस्त जीनों का नक्शा तैयार कर लिया है तो सहज ही ईश्वर की भूमिका के समक्ष चुनौती देने वाले प्रथम सोपान की निर्मिति आधुनिक विश्वामित्रों ने कर ली है। निस्संदेह अनेकानेक नैतिक-अनैतिक यक्ष प्रश्नों के अंबार भी उठ खड़े होंगे लेकिन यह निर्विवाद है कि यदि मानवीय विवेक का समुचित संप्रयोग किया गया तो इस नीजी नक्शे की बदौलत समग्र मानव जाति के सुखद और कल्याणकारी भविष्य हेतु एक नया गवाक्ष खुल जाएगा जो समस्त वसुधा को सुख-शांति, आमोद-प्रामदे-रंजन और रोमांच से लबरेज कर देगा।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Tejendra Sharma (Paperback)
    Tajendra Sharma
    170

    Item Code: #KGP-441

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : तेजेन्द्र शर्मा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कब्र का मुनाफा', मुझे मार डाल बेटा...!', 'हाथ से फिसलती ज़मीन...', 'ज़मीन भुरभुरी क्यों है....?', 'कोख का किराया', 'काला सागर', 'एक ही रंग', 'ढिबरी टाइट', 'कैंसर', तथा 'देह की कीमत है' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक तेजेन्द्र शर्मा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Arvacheen Kavya-Sudha (Paperback)
    Pushp Pal Singh
    30

    Item Code: #KGP-950

    Availability: In stock


  • Rangey Raghav Teen Charchit Upanyas
    Rangey Raghav
    550 495

    Item Code: #KGP-2005

    Availability: In stock

    रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएं अपने समय को लांघकर भी जीवित रहती हैं। रांगेय राघव के तीन उपन्यासों—‘आग की प्यास’, ‘छोटी सी बात’ और ‘दायरे’ को पाठकों की सुविधा के लिए यहां एक ही जिल्द में प्रस्तुत किया जा रहा है—
    ‘आग की प्यास’ रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केंद्र में ग्रामीण जीवन है—वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धर्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेंद्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है।
    ‘छोटी सी बात’ रांगेय राघव का अत्यंत लोकप्रिय एवं पठनीय उपन्यास है। कलेवर में भले ही यह लघु है परंतु अपने कथ्य में अत्यंत विराट है। कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जीवंत दस्तावेज है।
    ‘दायरे’ उपन्यास का केंद्र एक अवैध (?) बच्चे और उसकी मां की यातना है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष के संबंधों से लगाकर धर्म-संस्कृति तक को अपने दायरे में ले लिया है। एक तीव्र संवेदनात्मक तथा वैचारिक द्वंद्व उपन्यास में शुरू से आखिर तक चलता रहता है। रांगेय राघव ने हिंदी कथा साहित्य को रोजा, सत्यदेव, फादर तोलियाती के रूप में तीन अमर पात्र इस उपन्यास में दिए हैं...
  • Adakara Madhubala : Dard Bhari Jeevan Katha
    Shashi Kant Kinikar
    390 351

    Item Code: #KGP-569

    Availability: In stock

    भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग में कुछ नायिकाओं ने दर्शकों के दिल में एक विशिष्ट स्थान बना लिया था, उनमें से प्रमुख कलाकार मधुबाला अपनी सुंदरता, अपने मुस्कराते चेहरे व विभिन्न तरह के रोल करने के कारण दर्शकों की चहेती कलाकार थीं, विशेषकर जो फिल्म जगत् को पसंद करते थे।
    मधुबाला का जन्म 1933 में और देहांत 1969 में हुआ था। मधुबाला ने मात्र 9 वर्ष की आयु से ही अभिनय करना शुरू कर दिया और तो और लड़कपन में ही फिल्मों में नायिका का रोल करना शुरू कर दिया था। सन् 1950 और 1960 के दशकों में मधुबाला ने उस समय के सारे मुख्य अभिनेताओं के साथ अभिनय किया। मधुबाला इस युग में अपनी लोकप्रियता की चरम सीमा पर थीं और इसी युग को भारतीय सिनेमा का स्वर्णकाल कहा जाता है।
    मधुबाला का जीवन उनकी सुंदरता और मुस्कराहट की तरह अच्छा नहीं था। सारा दिन फिल्मों में कार्य करने के बाद भी उन्हें अपने बड़े परिवार को पालने के लिए कार्य करना पड़ता था। अपने बड़े परिवार में वह अकेली जीविका कमाने वाली सदस्य थी और सबका ठीक प्रकार से पालन-पोषण करने के लिए जी-तोड़ मेहनत करती थीं जिस कारण वह बहुत दुखी रहा करती थीं।
    दिलीप कुमार, जो उस समय के शोकाकुल अभिनय के सम्राट माने जाते थे, से प्रेम व कलाकार किशोर कुमार से विवाह दोनों ही विफल रहे। इन विफलताओं ने उनकी पीड़ा को और बढ़ा दिया था। इस सबके अतिरिक्त वह बालपन से ही बहुत दुर्बल थीं और इसी शारीरिक दुर्बलता के कारण भी उन्होंने बहुत कष्ट झेले। शायद इन सब कारणों के होते उनका देहांत इतनी छोटी आयु में हो गया।
    मधुबाला का स्वयं का जीवन भी एक फिल्म की पटकथा के समान ही था। प्रख्यात लेखक शशिकांत किणीकर ने इस पुस्तक में मधुबाला का जीवन-दर्शन बहुत ही निपुणता से प्रस्तुत किया है जो पाठकों के दिलों को छू लेगा।
  • Kavi Ne Kaha : Vinod Kumar Shukla (Paperback)
    Vinod Kumar Shukla
    90

    Item Code: #KGP-7024

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विनोद कुमार शुक्ल
    यद्यपि कविताओं का चयन मैंने किया है, पर इसका आधार स्पष्ट नहीं है कि इन चुनी हुई कविताओं को बाकी कविताओं में मिला दूं और इन्हें फिर से पूरा चुन लूं । दुबारा चुनते समय कुछ कविताएं जरूर बदल जाएंगी । कूल सत्तावन, इतनी कविताएं हैं । कोई कविता वैसे पूरी नहीं होती पर उसके लिखने का अंत है । कुछ लिखना बचा हुआ प्रत्येक कविता के अंत के साथ रहता है । लिखने के इस छूटे रहने के साथ कविता पूरी होती है । प्रत्येक कविता का लिखना बचा हुआ, अभिव्यक्ति का बचा हुआ भी होता है जो पाठक की समझ से पूरा होता है । एक रचना की पूर्ति अलग-अलग पाठकों में अलग-अलग होती है । मैं दूसरों की कविता पढ़ने के बाद अपने लिए इसी तरह उसमें जगह पाता हूं। इस जगह मैं भटकता हूं। जहाँ पहुंचना था वहां पहुंच गए ऐसा कभी नहीं होता, परंतु भटकने की जगह जानी-पहचानी जरूर हो जाती है । भटकने की जगह का जाना-पहनाना हो जाना अच्छा लगता है, इसलिए भटकना भी । कविता मेरे लिए दुनियादारी है, और लिखना भी ।

  • Rajendra Yadav Ne Jyoti Kumari Ko Bataye Swastha Vyakti Ke Beemar Vichar
    Rajendra Yadav
    290 261

    Item Code: #KGP-838

    Availability: In stock

    राजेन्द्र यादव ने ज्योति कुमारी को बताए स्वस्थ व्यक्ति के बीमार विचार 
    लेखक के अनुसार यह पुस्तक इस अर्थ में विलक्षण है कि न तो यह आत्मकथा है, न आत्मवृत्त और न ही संस्मरणों का संकलन । तीन महीने बिस्तर पर निष्क्रिय पड़े रहने के दौरान जो कुछ उल-जलूल असंबद्ध तरीके से दिमाग में आता गया उसे ही कागज पर उतारने की कोशिश है । कोई भूला हुआ क्षण, गूंजता हुआ अनुभव या संपर्क में आए किसी का व्यक्तित्व । अंग्रेजी में ऐसे लेखन को रैम्बलिंग कहते हैं । हिंदी में शायद इसे भटकाव कहेंगे । बिना किसी सूत्र का सहारा लिए जहाँ मन हुआ वहां टहल आना । इस तरह की किसी और किताब का ध्यान सहसा नहीं आता । सब कुछ जो लिखा गया है बहुत तार्किक, सुसंबद्ध और विचारपक्व है ।
  • Ek Mulakat Bahadur Bachchon Ke Sath
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-191

    Availability: In stock

    आज जबकि हमारे आसपास संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है, किसी को संकट की स्थिति में फंसा देख लोग दूर से ही किनारा कर लेते हैं। प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित होने वाले बहादुर बच्चे सहसा ही सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं। दूसरों को संकट से उबारने या उनकी जान बचाने के लिए ये बच्चे अपनी जान जोखिम में डालने में भी नहीं हिचकिचाते। कई बार तो इस दौरान वे काल के क्रूर हाथों का शिकार भी बन जाते हैं।
    ऐसे में इन बच्चों की जितनी सराहना की जाए, वह कम है। इन बच्चों और इनके साहसी कारनामों की ख्याति भी जितनी फैले, उतना अच्छा है। इससे एक ओर यह सुखद एहसास होता है कि मानव-हृदय से संवेदना अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है तो दूसरी ओर ये बच्चे और इनके कारनामे उन लोगों को भी भीतर तक झकझोरते हैं, जो संवेदनाशून्य हो चुके हैं।
    —संजीव गुप्ता
  • Mere Saakshatkaar : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    275 248

    Item Code: #KGP-217

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-55

    Availability: In stock


  • Prasiddha Vyaktiyon Ke Prem-Patra
    Virendra Kumar Gupt
    190 171

    Item Code: #KGP-9034

    Availability: In stock

    स्त्रियों-पुरुषों के हृदयों में एक-दूसरे के प्रति उठते-बैठते ज्वारभाटों की सबसे सच्ची, ईमानदारी शाब्दिक अभिव्यक्ति प्रेम पत्रों में ही हो पाई है । इसका कारण स्पष्ट है । जब भी व्यक्ति ने, स्त्री या पुरुष ने प्रेम-पत्र लिखा है, वह अनायास ही धन-पद-विद्वत्ता या सामाजिक प्रतिष्ठा की ऊंचाइयों से नीचे उतर आया है और स्त्रीत्व-पुरुषत्व की यथार्थ धरती पर खड़े होकर ही उसने अपने प्रेमी या प्रेमिका को संबोधित किया है । तब शरीर की सभी साज-सज्जाएं और चेहरे के सभी मुख़ौटे उतर जाते हैं और धड़कता हृदय ही सामने होता है । इस स्तर पर लिंकन, बायरन, क्रामवेल, नेपोलियन, विस्मार्क,शॉ और गांधी एक ही सुर में बोलते दिखाई पड़ते हैं । 
  • Samkalin Sahitya Samachar December, 2016
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #December,2016

    Availability: In stock

  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-637

    Availability: In stock

    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
  • Maharishi Dayanand Saraswati
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-536

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती उन महान विभूतियों में थे, जिन्होंने राष्ट्रोत्थान के कार्य में महती भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी में धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में स्वामी दयानंद का कार्य स्तुत्य रहा । उन्होंने वैदिक धर्म की ज्योति को भारत के कोने कोने में प्रकाशित किया । महर्षि दयानंद ने जिस आंदोलन का सूत्रपात किया उसकी ओर देश की जनता  उत्साह के साथ बढ़ी। वास्तव में स्वामी दयानंद ने उस कार्य को अपने हाथ में लिया जिसकी काफी समय से उपेक्षा होती चली आ रही थी ।
    आर्यसमाज की स्थापना द्वारा स्वामी दयानंद ने सोती हुई हिंदू जाति को जगाया, उनको आगे बढने की दिशा दिखाई और उसकी रुचि सुधार की ओर ले गए । स्वामी दयानंद सरस्वती वर्तमान भारत के एक प्रमुख विचारक और चिंतक थे । धर्म, नीति, दर्शन, सामाजिक संगठन और राज्य-व्यवस्था आदि पर उन्होंने जो विचार समाज के सम्मुख प्रस्तुत किए, वे सर्वथा नूतन ओर क्रांतिकारी थे । वे धार्मिक सुधारों द्धारा समाज और राष्ट्र का सुधार करना चाहते थे । आर्यसमाज को स्वामी जी ने एक ऐसा स्वरूप दिया कि उसने जन-आंदोलन का सक्रिय रूप धारण कर लिया । वे वैदिक धर्म को अभिनव स्वरूप देने में सफल हुए । उनके विचारों ने पूरे समाज को जगा दिया ।
  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena (Paperback)
    Naresh Saxena
    90

    Item Code: #KGP-1241

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब 

  • Kahani Samgra : Govind Mishra (3rd Part)
    Govind Mishra
    750 675

    Item Code: #KGP-1583

    Availability: In stock


  • Sant Ravidas Ki Ramkahani
    Devendra Deepak
    250 225

    Item Code: #KGP-732

    Availability: In stock

    'संत रविदास की रामकहानी' कवि देवेन्द्र दीपक की संत  रविदास के जीवन-दर्शन पर अपने किस्म की प्रथम औपन्यासिक रचना है । इसमें सृजन और अध्यात्प चेतना के आस्थाशील आयाम उदघाटित हुए हैं । लेखक ने रविदास के अंतत् से उतरने, उसके चिंतन के मर्म को उकेरने का सफल प्रयास किया है । इसमें संत के मन-आत्म की पारदर्शी निर्मलता तथा हाथ के श्रम के प्रति गहरी आस्था भी व्यक्त  हुई है । अपने समाज के श्रमशील उज्जवल समुदाय को दलित बना दिए जाने की पीडा के साथ भारतीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए सामाजिक न्याय, समता, संवेदना की हितैषी स्थापनाएँ भी हुई है ।
    संत रविदास की वाणी से पौराणिक आख्यानों, भक्ति-ज्ञान-कर्म के योग विषयक विचारों, लोक में व्याप्त पारंपरिक इनके रंरा-रूपों को यथावश्यक प्रयुक्त करके देवेन्द्र दीपक ने एक बड़े अभाव की पूर्ति कर बड़ा काम किया है । भारतभूमि पर बहने वाली पुण्य-सलिला नदियों-गंगा, यमुना, सरस्वती को मानव शरीर से कार्यशील-इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना से जोड़कर योग-अध्यात्म को तथा राष्ट्रीयता के चिंतन-दर्शन को पुष्ट किया है ।
    वसुधैव कुटुंबकम के वैश्विक विचार को रविदास की समूची वाणी में लक्षित-रेखांकित कर भारतीय अस्मिता एवं लोक-आस्था के प्रति छीजती निष्ठा को पुनः सृजनात्मक आधार प्रदान किया है तो जात-पांत, ऊँच-नीच के सामाजिक संताप को मन और मनोरथ की स्पंदनशीलता, सुचिता, मानवीयता के समक्ष व्यर्थ एवं अमानवीय सिद्ध किया है । भारतीय समाज में फैले धार्मिक पाखंड को निरस्त करती एवं रविदास के ब्रह्मांड व्यापी राम तथा गुरु रामानंद की देशना को रूपायित करती यह रचना अपने काव्यात्मक ललित गद्य के कारण आकर्ष और पठनीय है ।
  • Kagaar Ki Aag Tatha Anya Radio Naatak
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1888

    Availability: In stock

    कगार की आग तथा अन्य रेडियो नाटक
    लेखक का बहुचर्चित उपन्यास है- 'कगार की आग' । उस पर आधारित नाटक का कई बार मंचन हुआ । रेडियो रूपक भी उस पर बना । इसके अतिरिक्त तेरह कडियों का रेडियो धारावाहिक भी प्रसारित हुआ ।
    आस्ट्रेलिया को केनबरा यूनिवर्सिटी में वर्षों तक वह पाठ्यक्रम में पढाया जाता रहा है । पंजाबी, डोगरी, मराठी, कोंकणी, उडिया आदि के अतिरिक्त उसका अंग्रेजी, नार्वेजियन, चीनी, बर्मी, नेपाली तथा बांग्ला में (बांग्लादेश में) भी रूपांतर हुआ ।
    ‘कगार की आग’ के अलावा 'हरा सूरज' रेडियो धारावाहिक भी चर्चा का विषय रहा । इनके साथ-साथ ‘कांछा', 'सु-राज', 'तपस्या', 'अगला यथार्थ', ‘इस बार’, 'स्वभाव' आदि अनेक रचनाएँ इस श्रृंख़ला में शामिल है । 'तरपन', 'सूरज की ओर’ तथा 'सु-राज' पर फ़िल्में बनी । 'सु-राज’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भारत की ओर से भेजा गया । 'तुम्हरे  लिए' पर तेरह किस्तों का दूरदर्शन-धारावाहिंक तैयार हुआ ।
  • Pakshi Avlokan
    Dr. Anand Saxena
    950 855

    Item Code: #KGP-562

    Availability: In stock

    पक्षियों के अवलोकन तथा उनकी पहचान करने के संबंध में हिंदी में पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करने का प्रयास है। पक्षियों की स्पष्ट फोटो तथा पक्षी की जाति (species) पहचानने के विषय में संकेतों को देने पर विशेष ध्यान दिया गया है। अनेक पक्षियों के नर और मादा में काफी अंतर होता है। इसका उल्लेख करते हुए अकसर उनकी पफोटो भी दी गई है।
  • Parv
    Bhairppa
    695 626

    Item Code: #kgp-147

    Availability: In stock

    पर्व
    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Shyamji Krishna Verma : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-480

    Availability: In stock

    भारतभूमि पर बलिदानी क्रांतिकारियों की संख्या असंख्य है किंतु विदेश में जाकर भारत की स्वाधीनता के लिए संग्राम करने वालों में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और महात्मा गांधी का नाम अग्रिम पंक्ति में लिखा जाता है। इसी क्रम में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम भी उल्लेखनीय है। विचारों की भिन्नता और कार्यशैली में अंतर अवश्य हो सकता है किंतु नेताजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा की परिस्थितियों और कार्यशैली में ज्यादा अंतर नहीं है। श्यामजी ने देश-विदेश में अपनी कार्यकुशलता, संगठनशक्ति और भारतीय स्वाधीनता का जो शंखनाद किया उसने भारत सहित समूचे यूरोप और विशेषकर ब्रिटिश साम्राज्य को कंपित कर दिया। ऐसी क्रांति के युद्धवीरों में श्यामजी कृष्ण वर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में रेखांकित करने योग्य है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar (Paperback)
    Ramdhari Singh Diwakar
    125

    Item Code: #KGP-7007

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : रामधारी सिंह दिवाकर
    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिल्लेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न अपना है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भा दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।
    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।
    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार','खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानो', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Kailash Par Chandni
    Sudarshan Vashishath
    75 68

    Item Code: #KGP-1921

    Availability: In stock

    कैलास पर चांदनी
    यात्रा एक सेतु है । जोड़ती है एक को दूसरे से । पहाड को सागर से । शंख को भोज-पत्र से । यात्रा नाम है अन्वेषण का। यात्रा जहाँ नये-नये दृश्य उपस्थित करती है, वहाँ नई खोज की एक दिशा भी निर्धारित करती है ।
    ...वास्तव में संस्कृति पर लेखन एक बहुत कठिन और दुरूह काम है । संस्कृति एक कांचघर है जिसके भीतर साफ दिखाई देने वाला कई बार वह नहीं होता जो दिख रहा है । संस्कृति को बाहर से देखना भ्रामक है ।
    'व्यास की धरा' के बाद सुदर्शन वशिष्ठ की यह दूसरी पुस्तक संस्कृति पर लेखन में एक नया अध्याय जोड़ेगी, ऐसा हमारा विश्वास है ।

  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti (Paperback)
    Hemant Kukreti
    140

    Item Code: #KGP-7019

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Mans Ka Dariya
    Kamleshwar
    80 72

    Item Code: #KGP-9061

    Availability: In stock


  • The Transfer (Paperback)
    Vibhuti Narain Rai
    150

    Item Code: #KGP-354

    Availability: In stock

    What a time for a transfer!
    He had not collected even a tenth of the money he had invested in getting this posting, not to talk of saving anything. And so, Kamalakant Varma, who is called Bara Sahib in the office, was downcast, and was in the process of discussing with his specially chosen juniors and subordinates, behind closed doors, the transfer order which a messenger from the Head Office had handed to him just now.
    In this state, transfer orders in the bureaucracy were on auction anyway: there could be a change in the order several times in course of a day!
    Like other government offices, in this one too, whether work was done or not, politicking was quite rampant. Thousands of years ago, Kautilya had defined the relationship between politics and spying, and this office here believed in it too, with full faith. Unlike the state intelligence agencies, secret information here were not produced from newspaper clippings, but were rather obtained with great labour, and therefore had often some worth in them.
    — from the book
  • 20-Best Stories From Russia (Classics)
    GLOBAL VISION PRESS
    495 446

    Item Code: #KGP-571

    Availability: In stock

    Aleksandr Pushkin undoubtedly heads the list of the Russian writers, and is credited with making Russian literature world famous. His reputation rests on his poetry, and in the field of the long novels. 
    While Leo Tolstoy was called the ‘greatest writer of Russia’ by Turgenev, and ‘second Shakespeare’ by Flaubert, Mikhail Saltykov, wrote under the pseudonym ‘Shchedrin’ and achieved the great success and popularity. 
    Aleksandr Kuprin was called the Russian Kipling by Vladimir Nabokov for his stories about pathetic adventure-seekers, and Ivan Turgenev’s A Sportsman's Sketches was a milestone of Russian Realism.
    While Fyodor Sologub gave us the namesake of a favourite snack today—Hide and Seek, Anton Pavlovich Chekhov’s famous line is still quote-worthy: “Medicine is my lawful wife and literature is my mistress.”
    All these writers and many more in this classic anthology of the 20-BEST Stories from Russia.
  • Kavi Ne Kaha : Leeladhar Mandloyi (Paperback)
    Leeladhar Mandloi
    80

    Item Code: #KGP-1265

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : लीलाधर मंडलोई
    लीलाधर मंडलोई अपनी पीढ़ी के उन थोड़े-से कवियों से अग्रणी हैं, जिन्होंने अपने समय के वैचारिक दिभ्रमों से जूझते हुए, कविता के वृहत्तर सरोकार को बचाए रखने का उपक्रम किया है । पिछले तीस-बत्तीस वर्षों की काव्ययात्रा में उनका एक अलग स्वर उभरकर आया है ।
    हिंदी कविता में किसान चेतना की व्यापकता तो देखी जा सकती है, मगर मज़दूरों, खासकर औद्योगिक मज़दूरों की उपस्थिति सांकेतिक ही रही है । मंडलोई शायद पहली बार उसके जीवन-संघर्ष को, उसकी 'सफ़रिंग' को, उसकी करुणा को अपनी कविता में दर्ज करने में सफल हुए हैं । वे अपने बचपन को याद करते हुए मध्यप्रदेश की कोयला खदानों के उस यथार्थ को सामने लाते हैं जो श्रमिक संगठनों के दस्तावेजो तक में शामिल नहीं है । अपने जीवन के सच को समय के सच से जोड़ देने की कला की व्याप्ति उनकी अन्य कविताओं में भी देखी जा सकती है । अंदमान की जनजातियों के जीवन संघर्ष को पहली बार कविता में लाने का श्रेय भी उन्हें जाता है ।
    लीलाधर मंडलोई की कविताओं में प्रकृति और स्त्री की अपनी खास जगह है । वे केवल नैसर्गिक सौंदर्य का ही उदघाटन नहीं करते हैं, बल्कि उन कठोर सच्चाइयों को भी सामने लाते है जिनसे उनके समकालीन कवि प्राय: बचना चाहते है । उन्होंने कुछ ऐसी मार्मिक कविताएं भी लिखी है जो हमारी संवेदना का विस्तार करती है । प्रसंग चाहे अपने कुत्ते के खो जाने का हो अथवा पत्नी द्वारा मोहल्ले की उस कुतिया को रोटी खिलने का, जो मां बनने वाली है-वे छीजती हुई संवेदना के इस कठिन दोर से भी मनुष्यता के बचे होने की गाथा ही नहीं रचते, अपनी कलात्मकता से पाठको को भी उसमें शामिल कर लेते है ।
    ध्यान देने की बात है कि उनकी मार्मिक कविताएं भी हमें हताश नहीं करती, बल्कि जीवन की जद्दोजहद से और डूबने की प्रेरणा देती है । वे निराशा और मृत्यु के कवि नहीं हैं । उनकी कविता जीने और जीतने की हमारी इच्छा को मज़बूत करती है, दुखों से लड़ते हुए जीवन की सुंदरता को पहचानने की दृष्टि देती है 
  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-479

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Shubhada (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150

    Item Code: #KGP-204

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है शुभदा और दूसरा है बड़ी दीदी।
  • Afrika Road Tatha Anya Kahaniyan
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-610

    Availability: In stock

    अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां 
    अफ्रीकी देशों से प्रवास के दौरान, फिर लंदन में अफ्रीकी लेखकों और उनकी कहानियों से रूबरू होती रही, पड़ती रही । वे इतनी क्यों कि दिल हुआ वे हिंदी पाठकों तक पहुंचें । रास्ता था अनुवाद । और अनुवाद में आसानी इसलिए हुई कि लगभग सभी कहानियां मूल अंग्रेजी में ही लिखी गई है ।
    -उर्मिता जैन
  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125 113

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Shaayad Vasant
    Pranav Kumar Bandhopadhyaya
    100 90

    Item Code: #KGP-1920

    Availability: In stock

    शायद बसंत
    उत्तर कोरिया सामाजिक या आर्थिक रूप में एक बहुख्यात देश तो नहीं है, लेकिन उसकी राजनीति और व्यवस्था की अपनी पहचान है । जापानी और अमेरिकी सामरिक शक्तियों के विरुद्ध रक्तिम संघर्षों ने उस देश को जख्मी जरूर किया है, लेकिन वहाँ अब स्थापित है आत्मविश्वास से भरपूर एक प्रगतिशील राष्ट्र । वहाँ सामान्य रूप में पर्यटकों के जाने को अनुमति अवश्य नहीं है, किंतु मित्र देशों के कुछ बुद्धिजीवी समय-ममय पर आमंत्रित किए जाते रहे है । ऐसे ही एक अवसर पर कवि-कथाकार प्रणवकुमार वंद्योपाथ्याय उत्तर कोरिया  की यात्रा पर जाकर वहाँ के पहाडों, दर्रों, नगरों और गाँवों में घूमते रहे । उस यात्रा की साहित्यिक फसल है शायद वसंत, जो अनौपचारिक डायरी के पन्नों से निकलकर अब प्रस्तुत है एक पुस्तक के रूप में ।
    उत्तर कोरिया पर हिंदी में यह पहली पुस्तक है, जो पाठकों को उस देश की भूमि, पहाड़, समुन्द्र और मनुष्य की आंतरिक बनावट से एक अगम्य अनुभव के साथ परिचित कराती है ।
  • Dushyant Kumar Rachanavali (Paperback)
    Vijay Bahadur Singh
    1250

    Item Code: #KGP-77

    Availability: In stock


  • Svadharma Aur Kaalgati
    Ramesh Chandra Shah
    75 68

    Item Code: #KGP-9123

    Availability: In stock

    स्वधर्म और कालगति
    ‘मनुष्य सत्य को नहीं जान सकता किंतु उसे जीवन में अवतरित अवश्य कर सकता है’
    आधुनिक कवि येट्स ने लिखा था, अपनी मृतयु से एकाध दिन पहले ही। जैसे उसके कुल जीवानानुभव और कवि-कर्म का निचोड़ इस वाक्य में आ गया हो। प्रकारांतर से क्या यह ‘सब होकर सबको देखने’ वाले दर्शन से ही जुड़ी हुई बात नहीं लगती? रचना भी ज्ञान का ही एक प्रकार है; पर रचना का ‘जानना’ ज्ञान के अन्य अनुशासनों के ‘जानने’ की प्रक्रिया से मूलतः भिन्न है। इसलिए कि वह स्वयं जीकर के, स्वयं होकर के जानना है। ‘जानना’ यहां ‘होने’ पर अवलंबित है। रचना का सच अस्तित्वात्मक और रागदीप्त सच है। किंतु क्या इसीलिए वह सत्य के दूसरे किस्म के खोजियों और दावेदारों को उनकी तथाकथित वस्तुपरक कसौटी के चलते संदिग्ध नहीं लगता होगा? आयोनेस्को से पूछा गया कि तुम क्यों लिखते हो? उसने उत्तर का प्रारंभ ही इस वाक्य से किया कि ‘मैं क्यों लिखता हूं-यदि मैं सचमुच यह जानता होता तो मुझे लिखने की कोई प्रेरणा ही नहीं होती, यही जानने के लिए तो मैं लिखता हूं कि मैं क्यांे लिखता हूं?’ जाहिर है कि इस तरह का लगातार जानना भी लेखक होने से छुटकारा नहीं दिलाता। यदि लेखन-कर्म को व्यापक जीवन और सृष्टि के प्रति एक तरह के ऋणशोध या आत्मदान की प्रक्रिया के रूप में देखें तो भी इससे यह कहां निकलता है कि इस जीवनव्यापी प्रयिा की परिणति आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि में होगी ही। हो भी तो वह आत्मज्ञान और आत्मोपलब्धि-सब होकर सबको जानने का अनुभव-सचमुच ‘ज्ञान’ की है और दूसरे वस्तुपरक ज्ञान की तरह ही उपयोगी और समर्थ ज्ञान है, इसका भरोसा दूसरे को कैसे हो?
    (पुस्तक के एक निबंध से)
  • Sahitya Vimarsh
    Jayanti Prasad Nautiyal
    195 176

    Item Code: #KGP-9098

    Availability: In stock


  • Metamorphosis (Novel)
    Franz Kafka
    395 356

    Item Code: #KGP-361

    Availability: In stock

    The Metamorphosis is one of Franz Kafka's most well-known works. It is the story of a young man, Gregor Samsa, who transformed overnight into a giant beetle-like insect, becomes an object of disgrace to his family, an outsider in his own home, a quintessentially alienated man. 
    A harrowing—though absurdly comic — meditation on human feelings of inadequacy, guilt, and isolation, The Metamorphosis has taken its place as one of the most widely read and influential works of twentieth-century fiction.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amarkant
    Amarkant
    150 135

    Item Code: #KGP-2076

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमरकान्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इंटरव्यू', 'जिंदगी और जोंक', 'शुभचिंता', 'लड़का-लड़की', 'फर्क', 'मित्र-मिलन', 'बहादुर', 'बउरैया कोदो', 'श्वान गाथा' तथा 'जनशत्रु'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अमरकान्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Apni Dharti Apne Log (3 Volumes)
    Ram Vilas Sharma
    1200 1080

    Item Code: #KGP-1585

    Availability: In stock


  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-4)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-895

    Availability: In stock


  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala
    Suryabala
    230 207

    Item Code: #KGP-418

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Koi Aur Raasta Tatha Anya Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    200 180

    Item Code: #KGP-731

    Availability: In stock

    कोई और रास्ता तथा अन्य लघु नाटक
    यह नया नाट्य-संग्रह आपके हाथों में है । एकांकी के बंधनों को तोड़ने वाले इन नौ लघु नाटकों के विषय अलग-अलग हैं।
     'अंक-दृष्टा' जहाँ रामानुजन की जीनियस को रेखांकित करता है तो 'अंतराल के बाद' में बदलते मूल्यों के बीच माँ एवं पुत्र के संवेदनात्मक संबंधी के बदलने की गाथा है । 'दफ्तर में एक दिन' एक सरकारी दफ्तर के कर्मचारियों की कार्यशैली एवं उबाऊ माहौल को उकेरता है तो 'कोई और रास्ता' संस्कारों से बँधी एक आधुनिक लड़की की संघर्ष-गाथा है । 'फैसला' में नारी- सम्मान का प्रश्च है तो 'लडाई' जाति के बंधनों के विरोध की दास्तान है । 'वापसी' अपनी जड़ों से उखड़ विदेश बसने की आकांक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते युवा पीढी का बयान है तो 'लम्हों ने खता की थी' एड्स के खतरों से आगाह करने की कोशिश है । इसी तरह से 'मेरी-तेरी सबकी गंगा' में गंगा की पौराणिक कथा को आधुनिक दृष्टि से देखने का प्रयास है ।
    यानी कुल मिलाकर सभी नाटकों का रंग अलग, मिजाज अलग, समस्या अलग है । मामूली लोगों के जीवन के विविध पक्षों को पकड़ते, परखते ये लधु नाटक आपको बाँधेंगे भी, कोंचेंगे भी ।

  • Shrikant
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    600 540

    Item Code: #KGP-764

    Availability: In stock


  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Dharamvir Bharti (Paperback)
    Dharamvir Bharti
    150

    Item Code: #KGP-7114

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’ शृंखला में प्रस्तुत हैं धर्मवीर भारती की दस प्रतिनिधि कहानियांµ ‘कुलटा’, ‘गुलकी बन्नो’, ‘धुआं’, ‘सावित्री नंबर दो’, ‘यह मेरे लिए नहीं’, ‘हिंदू या मुसलमान’, ‘बंद गली का आखिरी मकान’, ‘हरिनाकुस और उसका बेटा’, ‘आश्रम’ तथा ‘एक छोटी मछली की कहानी’ (हस्तलिखित)।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Rassakashi
    Nisha Bhargva
    300 270

    Item Code: #KGP-9220

    Availability: In stock

    निशा भार्गव हिन्दी की उल्लेखनीय हास्य व्यंग्य कवयित्रियों में अपना मुकाम रखती हैं। कुछ ही कवयित्रियां है जो मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर हास्य व्यंग्य की सृष्टि करती हैं। मेरा मानना है कि उन्होंने काव्य मंचों के माध्यम से और दूरदर्शन, आकाशवाणी में अपने काव्य पाठ से असंख्य श्रोताओं को आनंदित, उल्लसित किया है। इधर उनका नया काव्य संकलन 'रस्साकशी’ के शीर्षक से प्रकाशित हो रहा है जिसमें उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज और गहन गम्भीर शैली में आज के जीवन में व्याप्त विसंगतियों द्वंद्व को रेखांकित किया है।  जीवन में न्याय और अन्याय के बिच, सत्य और असत्य के बीच सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच जो द्वंद्व चल रहा है उसके बीच रस्साकशी जैसा माहौल बना हुआ है । रस्साकशी के इस माहोल में उत्पन्न तनाव से बचते हुए निशा भार्गव ने सरस, सारगर्भित और जनप्रिय रचनाएं लिखने का उद्यम जिया है उनके इस प्रयास से सदैव सकारात्मक प्रवृतियों की विजय के संकेत मिलते हैं। कविता का उद्देश्य भी लगभग यही है। तमाम निराशाओं-दुराशाओं के बीच आशा की किरण खोज लेना कवि कर्म का सबसे बडा उद्देश्य माना गया है । निशा भार्गव अपने इस प्रयत्न में पूर्णत: सफल हैं। उनमें एक संवेदनशील मन को सकारात्मक भाव से पेश करने का जज्बा हर कोण से दिखाई देता है। मैं उनक लेखन की सफ़लता की कानना करता हू ।
  • A Coder's Cocktail (Paperback)
    Shashwat Rai
    345 311

    Item Code: #KGP-7207

    Availability: In stock

    An excerpt...
    My dreams had always been extravagant and seemingly more enjoyable to me than my real life. The strange world of 
    imaginations where I rescued the POWs from Somalia to making love to the 
    Hollywood babes was like a daily chore. 
    I would often reach the climax on a high note and would wake up with my heart pounding and sinking like the low-high tides of the moving ridges of the sea.
    My dreams were the answers to my real life questions. I was more than me, a kind of superhero, the Robin Hood alike in my dreams. Like the Iraqi shoe-throw journalist Muntader al-zaidi who was renowned for his dare devil act on Bush, I would somehow find ways while stargazing to flutter woman’s heart or make political revolutions worthy of being termed and credited for cultural turnarounds too. 
    Maybe I always dreamt in lieu of waking up as someone else. Maybe I wanted to be somebody that I wasn’t already now. 
    I loved my dreams more than I loved myself. 
  • Kartavya (Paperback)
    Samual Smiles
    125

    Item Code: #KGP-7034

    Availability: In stock

    कर्तव्य
    चौबीस वर्ष पूर्व मैंने ‘आत्मनिर्भरता’ (Self Help)  पुस्तक लिखी थी। तीन वर्ष उपरांत सन् 1853 में वह प्रकाशित हुई। वह पुस्तक संयोग से ही लिखी गई थी। मैंने ‘लीडस’ स्थान पर नवयुवकों के सम्मुख कुछ भाषण दिए थे। उन भाषणों में मैंने इस बात पर जोर दिया था कि उनके जीवन की प्रसन्नता व सफलता मुख्यतः उनके निरंतर आत्मसंस्कार, अनुशासन, संयम और सबसे अधिक ईमानदारी व साहस सेकर्तव्यपालन करने पर निर्भर करती है। मेरे इन भाषणों का आशा से अधिक प्रभाव हुआ।
    अपने व्यवसाय से अवकाश मिलने के बाद सायंकाल का समय मैं अपनी पुस्तक के लेखन में लगाता था। पुस्तक जब पूरी हो गई, तो मैंने उसे लंदन के एक प्रकाशक के पास भेजा। क्रीमिया के युद्ध के कारण उन दिनों पुस्तकें प्रायः बहुत कम बिकती थीं। इसलिए प्रकाशक ने धन्यवाद सहित मेरी पुस्तक लौटा दी। ‘जार्ज स्टीफेंसन का जीवन-चरित्र’ छपने के बाद ही श्री मूरे की कृपा से ‘आत्मनिर्भरता’ प्रकाशित हो सकी। 
    इसके तेरह वर्ष पश्चात् मेरी पुस्तक ‘चरित्र’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में मैंने महापुरुषों के चरित्रों को चित्रित करने का प्रयत्न किया, क्योंकि नवयुवकों को संस्कार देने का यह सर्वोत्तम ढंग है। इसके पाँच वर्ष बाद मेरी पुस्तक ‘बचत’ (Thrift) प्रकाशित हुई। इसमें मैंने श्रम के महत्त्व और बचत के लाभों पर जोर दिया था। 
    इनके पाँच वर्ष उपरांत इसी क्रम की अंतिम पुस्तक ‘कर्तव्य’ प्रकाशित हो रही है। मुझे आशा है कि पिछली पुस्तकों की तरह यह भी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों को आकर्षित करेगी। इस पुस्तक में मैंने सर्वोत्तम और साहसी स्त्री-पुरुषों के उदाहरण दिए हैं। महापुरुषों के जीवन हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम भी उन्हीं की तरह कार्य कर सकते हैं। जो व्यक्ति कर्तव्य की उच्च अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह महान् बन जाता है।   
    —सैमुअल स्माइल्स
  • Zalzala
    Gulshan Rai Monga
    60 54

    Item Code: #KGP-2057

    Availability: In stock

    एक अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए आदमी को जिन चीजों की तवक्को रहती है मसलन महानगर में अपना निजी फ्लैट, गाड़ी, चलता हुआ व्यवसाय, वह सब उसे हासिल था । संतुष्टि के लिए पर्याप्त प्राप्य। 
    भीतर यह जो आत्मा है इतने पर संतोष कर ले यह आवश्यक नहीं है । उसकी अपनी इच्छाएं, वृत्तियां, संस्कार और जरूरतें हैं जिन्हें 'सप्रैस' करने में कोई औचित्य नहीं है । ऐसा प्रयास किसी ओर से भी किया जाए तो आत्मा विद्रोह कर देती है और इस विद्रोह की परिणति होती है एक गहरी सोच में । इस जीव-जगत में अपने होने की अर्थवत्ता अर्थात इस संसार में  के मकसद की तलाश। 
    इस दिशा में गजानन की सफलता-असफलता का लेख-जोखा करने की जुर्रत की गयी है । यह चरित्र अपनी तमाम कमियों, कमजोरियों  और कुछ अच्छाइयों के साथ आपके (पाठकों के) निर्णय का मोहताज है जिसे उसके आंतरिक और बाह्य परिवेश में रखते हुए उसके साथ सहानुभूति, नफरत अथवा प्यार करना आप पर निर्भर करता है । 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajeet Cour (Paperback)
    Ajeet Kaur
    175

    Item Code: #KGP-7010

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अजीत कौर
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजीत कौर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "वन जीरों वन', 'सूरज, चिड़ियां और रब्ब', 'ना मारो', 'मौत अलीबाबा की', 'चौरासी का नवंबर है', 'कसाईबाड़ा', 'पिछले बसंत की पतंग' , 'हरी चिडिया’ , 'चीख एक उकाब की हैं' तथा 'नया साल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजीत कौर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chhajju Ram Dinmani Tatha Anya Kahaniyan
    Mohan Thapliyal
    60 54

    Item Code: #KGP-1929

    Availability: In stock

    छज्जूराम दिनमणि तथा अन्य कहानियाँ
    मोहन थपलियाल ऐसे कहानीकार हैं, जिनके लिखने की रफ्तार बहुत धीमी है, फिर भी कम छपने के बावजूद वह उल्लेखनीय कथाकार बने रहे है । इनकी कहानियों में ग्रामीण और शहरी परिवेश का अदभुत संयोजन दिखाई देता है । निम्न-मध्य और गरीब तबके के लोग इन कहानियों के मुख्य पात्र हैं, जिनके साथ समकालीन समाज की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों की ऐतिहासिकता भी बराबर मौजूद है । जहाँ तक कथ्य और शिल्प का ताल्लुक है, ये कहानियाँ अवसर पारंपरिक ढांचे का निषेध करती हैं। कहीं-कहीं एक नए डिक्शन की तलाश भी इनमें है- 'शवासन' इसी तरह का मंजर पैदा करती है । यथार्थ और फंतासी का ताना-बाना मोहन थपलियाल की कहानियों में एक अलग जादूगरी पैदा करता है, लेकिन यह जादूगरी किसी चकमे या चमत्कार को दिखाने के लिए न होकर पात्रों व परिस्थितियों की हकीका जानने में मददगार सिद्ध होती है । द्वंहात्पक दर्शन को पहचान देने वाली ये कहानियाँ व्यक्ति की निजी लडाई को समाज की व्यापक लडाई से जोडना अपना फर्ज समझती है । यह अलग बात है कि यह मकसद पाने के लिए ऊँचे-ऊँचे आदर्शों, जोशीले नारों और बड़बोले भाषणों का इस्तेमाल प्रत्यक्षत: लेखक ने कहीं नहीं किया है । शायद इस संदर्भ में लेखक बेर्टोल्ट ब्रेष्ट की इस उक्ति --'हमने उनके दुख के नहीं, दुख के कारणों के बारे में बात की' --का सहारा लेकर आगे बढ़ना चाहता है । दुख के कारण और सामाजिक विसंगतियों की गहरी पड़ताल इस संग्रह की तमाम कहानियों में मौजूद है । बतौर बानगी ‘एक वक्त की रोटी' और 'छज्जूराम दिनमणि' देखी जा सकती है । दुख की घडी की टिक-टिक दोनों जगह समान है भले ही सामाजिक परिवेश बिलकुल भिन्न । लेकिन इस संग्रह को वहानियों का अंतिम लक्ष्य दुख और नैराश्य न होकर पाठक के मन में बेहतर भविष्य के लिए एक जीती-जागती उम्मीद भरना है ।
  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava (Paperback)
    Ekant Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7021

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। ---नामवर सिंह
    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   ---केदारनाथ सिंह
    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      ---विजेन्द्र
  • Ek Thi Sara
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1978

    Availability: In stock

    एक थी सारा

    मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है
    लेकिन मैं उनका जायका नहीं बन सकती
    मैं टूटी दस्तकें झोली में भर रही हूँ
    ऐसा लगता है पानी में कील ठोक रही हूँ
    हर चीज़ बह जाएगी—मेरे लफ्ज, मेरी औरत
    यह मशकरी गोली किसने चलाई है अमृता !
    जुबान एक निवाला क्यूँ कुबूल करती है ?
    भूख एक और पकवान अलग-अलग
    देखने के लिए सिर्फ 'चाँद सितारा' क्यूँ देखूँ ?
    समुंदर के लिए लहर ज़रूरी है
    औरत के लिए जमीन जरूरी है
    अमृता ! यह ब्याहने वाले लोग कहाँ गए ?
    यह कोई घर है ?
    कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा... 
    मैंने बगावत की है, अकेली ने,
    अब अकेली आंगण में रहती हूँ
    कि आजादी से बड़ा कोई पेशा नहीं
    देख ! मेरी मज़दूरी, चुन रही हूँ लूँचे मास
    लिख रहीं हूँ
    कभी मैं दीवारों में चिनी गई,
    कभी बिस्तर से चिनी जाती हूँ... 
    [इसी पुस्तक से]

  • Mahasagar
    Himanshu Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-34

    Availability: In stock


  • Hamare Kartavya
    Chandra Pal Singh 'Mayank'
    40

    Item Code: #KGP-1320

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • Hashiye Par Harf
    Prem Bhardwaj
    400 360

    Item Code: #KGP-450

    Availability: In stock

    लक्ष्मण रेखा लांघने वाली बात मीडिया के साथ कैसे कुछ हद तक सही बैठती है, इसे भी समझने की जरूरत है। एक जमाने से पत्रकारिता को पवित्र पेशा या मिशन माना गया है। किसी लक्ष्मण ने नहीं, उससे पवित्रता की इसी जन-अपेक्षा ने लक्ष्मण रेखा न जाने कब, क्यों और कैसे खींच दी? सत्ता का यह चरित्र होता है कि वो अपने समय में पवित्र चीजों को भ्रष्ट करती है और मन को भाने वाली वस्तु या इंसान को भोग की चीज मानती है। सर्वत्र पर मालिकाना हक ही उसका स्वभाव है। लिहाजा उसे गवारा नहीं कि वो गलत है तो सामने वाला सही रहकर उसके लिए ‘गलत’ की परिधि को बरकरार रखे। खुद को इस परिधि से बाहर निकालने या अच्छाई की लकीर को मिटाने के मकसद से ही वो तरह-तरह का छल-प्रपंच करती है। कई दफा वो अपनी ताकत का जौहर दिखाकर जबरदस्ती भी करती है। जरूरत पड़ने पर ‘मायाजाल’ भी रचने से गुरेज नहीं करती। राडिया प्रकरण में कारपोरेट और सत्ता के गठजोड़ ने भी मायाजाल रचा। मीडियारूपी सीता के मन में ‘स्वर्णमृग’ (धन, संपन्नता और सुविधाएं) का लोभ जन्मा। और वह किसी को कुछ देने (एक राजा को मंत्रालय देने) की खातिर लक्ष्मण रेखा को लांघ गई। बदले में उसे क्या मिला, यह अभी सामने नहीं आया है। बहुत संभव है बाद में कुछ पता चले।
  • Hindi Ki Pratinidhi Kahaniyan Taatvik Vivechan
    Jayanti Prasad Nautiyal
    215 194

    Item Code: #KGP-542

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य पर अनुशीलन, साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम ही हुआ है । कहानी साहित्य जहाँ एक ओर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है  वहीं दूसरी ओर कहानी  पाठक वर्ग बहुत विस्तीर्ण है, परंतु इतने विराट और व्यापक साहित्य पर आलोचना, समालोचना तथा तात्त्विक विवेचनपरक साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है । 
    इस पुस्तक में कथा तत्त्वों का विश्लेषण, शब्दार्थ एवं टिप्पणी खंड तथा व्याख्या खंड आदि का अनुशीलन उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम के बोर्डों, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है । 
    संक्षेप में कहें तो कह सकते हैं कि यह पुस्तक सम्पूर्ण भारत में विश्वविद्यालयों, बोर्डों, महाविद्यालयों आदि के प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, साथ ही यह पुस्तक शोधार्थियों, कथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं, समालोचकों, समीक्षकों के लिए भी उपादेय सिद्ध होगी ।  इस पुस्तक को इस प्रकार लिखा गया है कि यदि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ना चाहे तो उसे हिंदी कथा साहित्य की पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो ।
  • Bharat Mein Panchayati Raaj (Paperback)
    Vishv Nath Gupta
    70

    Item Code: #KGP-1405

    Availability: In stock


  • Meethi Neem (Paperback)
    Kusum Kumar
    240

    Item Code: #KGP-389

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Rajesh Joshi (Paperback)
    Rajesh Joshi
    90

    Item Code: #KGP-7023

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : राजेश जोशी
    राजेश जोशी अपने अनुभव को कविता में सिरजते वक्त शोकगीत की लयात्मकता नहीं छोड़ते । लय उनकी कविताओं में अत्यंत सहज भाव से आती है जैसे कोई कुशल सरोदवादक धीमी गति में आलाप द्वारा भोपाल राग का विस्तार कर रहा हो । इस दृष्टि से राजेश जोशी के शिल्प को एक सांगीतिक संरचना कहा जा सकता है । वे स्थानीयता के रंग में डूबकर भी कविता के सार्वजनिक प्रयोजनों को रेखांकित करते हैं । उनकी कविता अपने उत्कृष्ट रूप में एक शहर की कविता होते हुए भी मनुष्य के व्यापक संकट का बयान है । -ऋतुराज़
    समकालीन हिंदी कविता में राजेश जोशी की उपस्थिति एक दिलेर उपस्थिति है-कविता लिखना और उसके लिए लड़ना भी । उनमें एक काव्य व्यक्तित्व भी है, जो कविताएं लिखने वाल कई कवियों में नहीं भी हुआ करता है । उनकी यह उपस्थिति एक लोकतांत्रिक उपस्थिति है, जहां आप ढेर सारा संवाद कर सकते हैं।
    राजेश जोशी की कविता में एक टूट-फूट और संगीत का अवसाद है, लेकिन उठ खड़े होने की कोई मूलगामी संरचना भी  है । पस्ती का महिमामंडन नहीं है और पराजय में पराजित की उधेड़बुन नहीं है । इसलिए कौन-सी भंगिमा कब प्रतिकार में बदल जाएगी और एक कॉस्मिक रुप अख्तियार कर लेगी कोई नहीं जानता । तो साधारण की, पिछडे हुए की, मिटा दिए गए की, भुला दिए गए की, विजय होगी ऐसा कोई यूटोपियाई प्रतिवाद उनमें निरंतर मिलता  है। तो नैतिक श्रेष्ठता में विश्वास कभी खंडित नहीं होता।
  • Sansaar Ki Shreshtha Kahaniyan (Paperback)
    Gyanchand Jain
    150

    Item Code: #KGP-05

    Availability: In stock

    संसार की श्रेष्ठ कहानियां
    कहानी-लेखन विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में प्रचुर परिमाण में होता आया है । उसने विश्व-साहित्य के इतिहास से अपनी एक खास जगह बनाई है। कहानी चाहे राजा-रानी के ऐश्वर्य और विलासितापूर्ण जीवन पर रची गई हो या शासन-सत्ता की बनती-बिगड़ती छवि को अंकित करती हो, वह घोर अराजकता और  असामाजिकता का चित्रण करती हो या भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के गर्त में दूबे हुए राजनीतिज्ञों का नग्न चित्र उतारती हो; देश-काल की व्यथा-कथा कहती हो या उसकी खुशहाली बयान करती हो-अंतत: होती वह आईने की तरह निर्दोष है । एकदम यथार्थ और कटु सत्य ।
    कहानियां चाहे मार्क टूवेन, जेम्स ज्वाएस, मैन्सफील्ड ने लिखी हों या बालज़क, मोपासां ने; लियो टाल्सटाय, चेखव, गोर्की ने लिखी हों या लुई जी पिरानडेलो, मारिसन, ए०ई० कोपर्ड ने; अनातोले फ्रांस, रोमानोफ  ने लिखी हों या एडवर्ड डेक्कर, हरमैन हेजरमैन्स ने, जेसिंन्टो पिकोन, कारेल कापेक, वानगी पामर ने लिखी हो या जेकब वासरमैन, मिक्सजथ, इमानोव ने; बजार्न्सन, आइजक पेरेज, लू शुन ने लिखी हो या प्रेमचंद, गुलेरी और मंटो ने-सबने अपने इर्द-गिर्द के समाज का और स्वयं भोगे हुए यथार्थ का अंकन किया है ।
    प्रस्तुत संकलन में ऊपर चर्चित अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विश्व-भर के लेखकों की तीस चुनिंदा कहानियां सम्मितित हैं। ये कहानियां अपने-जपने देश-काल की सामाजि- कार्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों की अंतरंग झाँकियाँ प्रस्तुत करती हैं । ये विश्व की प्राय: सभी भाषाओं में पढी गई और इन्होंने लोकप्रियता के उच्चतम शिखरों को छुआ । संकलन की अंतिम चार कहानियों (एक चीनी, दो हिंदी, एक उर्दू) के अतिरिक्त शेष सभी का रूपांतरण हिंदी के वरिष्ट साहित्यकार श्री ज्ञानचंद जैन ने अत्यंत सरल और सहज ग्राह्य भाषा- शैली में किया है। 
  • The Luck Of The Jews (Novel)
    Michael Benanav
    595 536

    Item Code: #KGP-893

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Suraj Kiran Ki Chhanv
    Rajendra Avasthi
    100 90

    Item Code: #KGP-SKCM

    Availability: In stock


  • Sikhon Ka Itihaas (Paperback) (Two Valumes)
    Khushwant Singh
    745

    Item Code: #KGP-268

    Availability: In stock

    पुस्तक में उस सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि की चर्चा है, जिसके चलते पंद्रहवीं शताब्दी में सिख धर्म अस्तित्व में आया। फारसी, गुरुमुखी और अंग्रेजी के मूल दस्तावेजों पर आधारित अपने विवरणों में लेखक सिखत्व के विकास को चिन्हित करता है और ‘ग्रंथ साहिब’ में इसके पवित्र धर्म-सिद्धांतों के संकलन के बारे में बताता है।
    इसमें सिखों के, एक शांतिवादी पंथ से, गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में लड़ाकू संप्रदाय ‘खालसा’ में परिवर्तित होने तथा महाराजा रंजीत सिंह द्वारा सिख-शक्ति के समेकन से पहले, मुगलों और अफगानों के साथ उनके संबंधों को विस्तार से वर्णित किया गया है।
    खुशवंत सिंह एक मशहूर पत्रकार, कथा-साहित्य की अनेक कृतियों के रचयिता और सिख-इतिहास के विशेषज्ञ हैं। वे ‘इलस्टेªटेड वीकली आॅफ इंडिया’ तथा ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पूर्व संपादक हैं। 1980 से 1986 तक वे राज्यसभा से सांसद रहे। 1974 में मिली पद्मभूषण की उपाधि उन्होंने भारत सरकार द्वारा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर हुई ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ की कार्रवाई का विरोध करते हुए लौटा दी। वर्ष 2007 में पुनः राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया।
  • Surakshit Pankhon Ki Uraan
    Alka Sinha
    100 90

    Item Code: #KGP-9294

    Availability: In stock

    बारूदी गंध और धुएं से स्याह आज के आकाश पर हवाई आतंक के मनहूस बादल निरंतर मंडरा रहे हैं। हर पिछली भयावह घटना को छोअी बनाती अगली घटना अपने को बड़ा सिद्ध कर रही है। 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय ससंद पर हुए आतंकवादी हमले से देश की संप्रभुता को तो आघात पहुंचा ही है, सुरक्षा का मनोविज्ञान भी घायल हुआ है। आतंवाद की भयावहता शांति और सुरक्षा के प्रति राष्ट्र को आशंकित कर रही है, तो 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ हवाई हमला आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दे रहा है और हवाई आतंक के प्रति समूची धरती और आकाश के माथे पर चिंता और विषाद की लकीरें गहरा गई हैं। आज का समय बच्चे-बच्चे से सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की मांग करता है दरवाजे खुले छोड़कर सोने का समय बहुत पीछे छूट गया। अब तो बंद दरवाजों में भी व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस करता है। सुबह घर से निकला आदमी शाम को सकुशल लौट भी आएगा, कह पाना कठिन है। फिर भी जिंदगी चलती रहती है और चलते रहते हैं जिंदगी के कामकाज। सर्दी-खांदी की तरह भय और आतंक भी जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। ऐसी सूरत में कहानी का उद्देश्य किस्सागोई अथवा मनोरंजन कतई नहीं है। वे जमाने लद गए जब दादी-नानी के पेट से सटकर राजा-रानी की कहानियां सुनते-सुनते नींद आ जाती थी और सपनों में उड़ने वाला घोड़ा लेकर उतर आता था कोई राजकुमार।
    —अलका सिन्हा 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Balram (Paperback)
    Balram
    130

    Item Code: #KGP-411

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : बलराम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बलराम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'शुभ दिन', 'गोआ में तुम', 'शिक्षाकाल', 'पालनहारे', 'सामना', 'कलम हुए हाथ ', 'कामरेड का सपना ', 'मालिक के मित्र', 'अनचाहे सफर' तथा 'पहला सबक' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बलराम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ek Na Ek Din
    Rajni Gupt
    600 510

    Item Code: #KGP-220

    Availability: In stock


  • Metamorphosis (Paperback)
    Franz Kafka
    99

    Item Code: #KGP-1130

    Availability: In stock

    The Metamorphosis is one of Franz Kafka's most well-known works. It is the story of a young man, Gregor Samsa, who transformed overnight into a giant beetle-like insect, becomes an object of disgrace to his family, an outsider in his own home, a quintessentially alienated man. 
    A harrowing—though absurdly comic — meditation on human feelings of inadequacy, guilt, and isolation, The Metamorphosis has taken its place as one of the most widely read and influential works of twentieth-century fiction.
  • Phir Palash Dahke Hain
    Kanhiya Lal Vajpayee
    150 135

    Item Code: #KGP-164

    Availability: In stock

    फिर पलाश दहके हैं
    गीतकार कन्हैया लाल वाजपेयी आपको गली, नगर, क़स्बा, चौबारों, किसी नदी के पास अथवा सूखे तट पर, कहीं भी सहज और सामान्य रूप से गाता-गुनगुनाता घूमता मिल सकता है । मिलने को तो बाजार में भी मिल जाएगा, लेकिन बाजार में बेच सकने के लिए इसके पास कुछ है नहीं-
    हम खाली जेबों में 
    बाजार लिए घूमे... । 
    का यह गायक बाजार में मिल जाने पर भी-
    नयनों की चितवन 
    अधरों की लाली
    फूलों की मुस्कानों' का गाहक हूँ । 
    जैसे ग्राहक के ही रूप में अपना परिचय देता महसूस होगा ।
    इन कन्हैया लाल वाजपेयी ने अपनी अब तक की भिन्न-भिन्न 'मूड' (मानसिकताओं) को गीत-  यात्राओं में अपने जो चरण-चिह्न छोडे हैं वे राजमहल से लेकर गलियों, चौबारों, घाटियों और नदी तटों तक बिलकुल साफ, गहरे और स्पष्ट हैं ।

  • Thank You Idi Amin (Paperback)
    Mohezin Tejani
    395

    Item Code: #KGP-324

    Availability: In stock

    Through adversity, a new life emerges
    Bouncing back from one of the horrific episodes of world history—Idi Amin’s expulsion of 80,000 Asians from Uganda— Mohezin Tejani presents a collection of true stories about being a global Muslim refugee.
    Liberated from the confines of his own culture by political realities, Tejani sets out to learn how to be rooted in the absence of a place to call home. His writing is a hypnotic bhangra dance through time and space where he deftly explores both geographical and psychological displacement. Yet it is precisely through such disorientation and a host of intercultural encounters that he eventually finds solace in being a ‘global village on two legs.’
    Thank You, Idi Amin portrays the intersecting points of congruence among humans that are neither from the East nor the West, nor the North or South, but are all part of a global compass navigating the new world of tomorrow.
  • Mayaram Ki Maya (Paperback)
    Jaivardhan
    80

    Item Code: #KGP-1368

    Availability: In stock

    ‘मायाराम की माया’ नाटक का केंद्रबिंदु मनुष्य है। सृष्टि के असंख्य जीवों में से मनुष्य एक ऐसा जीव है, जो ईश्वर की सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है। जिज्ञासा कहें या फितरत, कभी-कीाी मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व को ललकारता दिखाई देता है। उसका मन नाना प्रकार के विकारों से भरा पड़ा है।
    यही कारण है कि मनुष्य सोचता कुछ है, दिखता कुछ है और करता कुछ और है। समय आने पर प्रगाढ़ संबंधों को भी भूल जाता है। इस संसार में जन्म देने वाले ईश्वर की कृतज्ञता और श्रद्धा को भूल जाता है। ब्रह्मलोक में इसी बात पर चर्चा चल रही है कि क्या मनुष्य इस पृथ्वी लोक का सबसे सीधा जीव है? इस बात को प्रमाणित करने के लिए पृथ्वीलो से ‘मायाराम’ नाम के व्यक्ति को ब्रह्मलोक में लाया जाता है। 
    -जयवर्धन

    ‘मायाराम की माया’ को मैं फार्स की श्रेणी में ही रखना चाहूंगा। इस नाटक की स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों की बुनावट जयवर्धन ने फैंटेसी के अंदाज में की है। बाह्य यथार्थ से कोसों दूर, लेकिन आंतरिक यथार्थ के बहुत करीब और नाटक के अंत में ब्रह्मा का नारद से यह कहना ‘‘आप ठीक कह रहे हैं मुनिवर। एक इंसान की गलती की सजा समस्त इंसान को देना ठीक नहीं होगा। यह सृष्टि है। सृष्टि का चक्र सदा चलता रहेगा। हां, भविष्य में इंसान को बनाते समय इंसानियत थोड़ा ज्यादा डालनी होगी।’’
    -प्रताप सहगल
  • Bhagn Seemayen
    Balshauri Reddy
    120 108

    Item Code: #KGP-2047

    Availability: In stock

    भग्न सीमाएँ
    "मेरे देवता, आप प्रेम के अवतार हैं । आप मेरे जीवन में प्रेम के देवता बनकर आए । इस प्रेम-मूर्ति की मैं सदा आराधना करती रहूंगी ।
    मैँ जानती हूँ कि आप मुझे अपनी शरण में लेने को तैयार हैँ। कहावत है न, भगवान् भले ही वर दे, लेकिन पुजारी वर नहीं देता । आपके चतुर्दिक जो पुजारी बने हुए हैं, वे चाहते हैं कि मैं आपसे दूर रहूँ। वे यह नहीं चाहते कि मैं आपकी उपासना करूं । मैं उनकी दृष्टि में अस्पृश्य हूँ अयोग्य हूँ। पर आपकी करुणा और कृपा सब पर समान होती है ।
    मैं अपना प्यार रूपी दीपक जला, स्नेह रूपी बत्ती जगा अपने हृदय को आलोकित करना चाहती थी, लेकिन क्या करूँ । परिस्थिति रूपी प्रभंजन का वेग अधिक हो चला है, शायद मैं निकट रहूँ तो वह बुझ जाए । मैं दूर से ही निरंतर अलख जगाए रखना चाहती हूँ।
    आपसे दूर होने के पहले मैंने अपने गत जीवन का एक बार सिंहावलोकन दिया । आपके जीवन में मैंने एक रोगी के रूप में प्रवेश क्रिया । आपने मेरे शरीर को स्वास्थ्य प्रदान किया, जीवन के प्रति आशा और विश्वास पैदा किया, प्रेम दिया आज मैं उसके पुरस्कारस्वरूप आपके हृदय को अस्वस्थ बनाकर जा रही हूँ, मलिन और दुखी बनाकर जा रही हूँ ।
    -[इसी पुस्तक से]
  • Muhim
    Sitesh Alok
    280 252

    Item Code: #KGP-291

    Availability: In stock

    कहानियाँ किसी अन्य अनजान लोक से नहीं आतीं...हमारे बीच, हमारे आसपास ही उपजती और पनपती रहती हैं...किंतु कोई साहित्यकार ही अपनी पारखी दृष्टि से चुनकर और संवेदना से सँवारकर उन्हें शब्दों के संसार में स्थापित करता है। 
    बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. सीतेश आलोक ने गत तीन दशकों में साहित्य की अनेकानेक विधओं में अपने अवदान द्वारा एक विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। उपन्यास, कहानी, कविता, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य, समसामयिक विषयों पर लेख आदि पर लिखी डॉ. आलोक की अनेक पुस्तकों को न केवल पाठकों ने सराहा, कई संस्थाओं ने सम्मान भी प्रदान किया। मौलिकता इनके लेखन की एक विशेषता है। इनके चरित्र एवं कथानक न तो किसी साँचे में ढलकर आते हैं और न किसी वाद से प्रभावित होकर रूपाकार ग्रहण करते हैं।
    डॉ. सीतेश आलोक उन इने-गिने लेखकों में से हैं जिनमें लीक से हटकर अनेक ऐसे विषयों पर भी लिखने का साहस है, जिन्हें अधिकांश लेखक छूने से भी कतराते हैं।
    इस संग्रह की अनेक कहानियाँ वागर्थ, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, कथादेश, साहित्य अमृत, नयी धारा आदि में प्रकाशित एवं आकाशवाणी से प्रसारित हो चुकी हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Davendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    70 63

    Item Code: #KGP-9052

    Availability: In stock


  • Mera Sangharsh : Hitler Ki Aatmkatha (Paperback)
    Ramchandra Verma Shastri
    280

    Item Code: #KGP-7033

    Availability: In stock

    मेरा संघर्ष : हिटलर की आत्मकथा
    हिटलर की आत्मकथा को हिन्दी में प्रकाशित करने का उद्देश्य उसके उन दोषों को प्रकाशित करना नहीं है, जिनके कारण वह काफी बदनाम हुआ ।  उसकी बदनामी के तीन मुख्य कारण थे--फासिस्टवादी विचारधारा, जातीयतावाद और युद्ध की मानसिकता । इन्हें तीन कारणों से उसे विश्व-मानवता का शत्रु समझा जाता है । किन्तु उसकी राष्ट्रवादी मनोवृति एक ऐसा तत्त्व या, जिसने उसके चरित्र को काफी ऊँचा उठाया।  इसी उम्र राष्ट्रवादी प्रवाह की लपेट में वह दूसरे दोषों का भी शिकार हो गया । यह आत्मकथा उसकी राष्ट्रवाद की इसी भावना को उजागर करती है।  राष्ट्रवाद से अभिप्राय जातीय संकीर्णता नहीं है, बल्कि मातृभूमि के प्रति अपार श्रद्धा और असीम गौरव का नाम ही सच्चा राष्ट्रवाद है ।
    अपने देश से प्रेम, उसके प्रति निष्ठा, देशवासी होने का स्वाभिमान, देश के लिए बलिदान की भावना तथा राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की चाह जैसे गुणों की हमारे देश को आज कितनी जरूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं । इसका जीता-जागता उदाहरण हमें हिटलर की प्रस्तुत आत्मकथा में पढ़ने को मिलता है ।
    मेरा संघर्ष (हिटलर की आत्मकथा) को हिन्दी में प्रकाशित करने के पीछे हमारा परम उद्देश्य यही है कि इसके अध्ययन-मनन से देशवासियों में सच्चे राष्ट्रवाद की भावना का जन्म हो ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi (Paperback)
    Manohar Shyam Joshi
    120

    Item Code: #KGP-462

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मनोहर श्याम जोशी
    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका  में  यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुडिया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Asprishya
    Ajay Mahapatra
    180 162

    Item Code: #KGP-8003

    Availability: In stock

    ईश्वर की बनाई दुनिया में हर व्यक्ति समान है। सबमें परमात्मा का अंश है। सब उसी परमज्योति से आलोकित हैं। फिर यह असमानता, अन्याय, शोषण, भेदभाव, जातिवाद, नस्लवाद क्यों ! ये मनुष्य की बनाई अवधारणाएं हैं। इनके कारण जाने कितने व्यक्तिगत और सामाजिक संकट उत्पन्न होते रहते हैं। समय-समय पर इनका प्रतिरोध विभिन्न रूपों में सामने आता है। प्रतिवाद और प्रतिरोध का एक विशिष्ट स्वर अजय महापात्र के उपन्यास ‘अस्पृश्य’ में सुना जा सकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक में मानवीय संवेदना का गहन प्रभाव है। लेखक ने कला-कौशल या शाब्दिक साहस के स्थान पर कथ्य को प्रमुखता दी है। यह समय को स्पष्ट और सतर्क ढंग से प्रस्तुत करने का रचनात्मक उपक्रम है। 
    ‘अस्पृश्य’ एक शब्द भर नहीं, मात्रा एक भाव संवेद नहीं; यह निरंतर सक्रिय समय का आख्यान है। इसमें समय और समाज के बहुतेरे बिंब देखे जा सकते हैं।
  • Bheer Mein Akela
    Vishv Nath Gupta
    35 32

    Item Code: #KGP-1917

    Availability: In stock

    भीड़ में अकेला
    गाँव से पलायन करके शहर में आने वाला आदमी अपने गम के सागर में इस तरह डूब जाता है कि उससे बाहर निकलने की कोई राह उसे नजर नहीं आती । शहर में नया होने के कारण शुरू-शुरू में उसे भ्रम होता है । जल्दी ही उसका वह भ्रम टूट जाता है । जब वह शहर की भीड़ में गुम होता है तो उसे अहसास होता है कि उसका अस्तित्व वहाँ पर वैसा ही है जैसा समुद्र में एक लहर का । अपने दिल की बात वह किसी से कहना चाहता है, लेकिन उसे सुनने की किसी को फुर्सत ही नहीं है । उसे अपनी जिन्दगी ज़हर- सी लगती है ।  उसका मन उडने के लिए छटपटाता है, लेकिन एक परले परिन्दे की तरह वह कहीं उड़ नहीं सकता । बेबस-सा, असहायता झेलता रहता है वह उस गम की जिन्दगी को और पीता रहता है उसके जहर को ।
    गाँव के आदमी की इसी त्रासदी को रूपायित किया है कवि विश्वनाथ गुप्त ने अपनी गज़लों में, जो सीधे-सादे शब्दों में, बिना किसी लाग-लपेट के उसकी दास्तां बया करती है ।
  • Betva Ki Lehrein
    Shanta Kumar
    250 225

    Item Code: #KGP-400

    Availability: In stock


  • Khoyi Huyi Thati
    Ganga Prasad Vimal
    50 45

    Item Code: #KGP-9064

    Availability: In stock


  • Do Naatak
    Jaivardhan
    200 180

    Item Code: #KGP-862

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Kumar Ambuj (Paperback)
    Kumar Ambuj
    90

    Item Code: #KGP-1497

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : कुमार अम्बुज 
    मैं आधा-अधूरा जैसा भी हुं, एक कवि हूँ और बीत रही इस सदी का एक गवाह हूँ। मेरे सामने हत्याएं की गई है । मेरे सामने ही एक आदमी भूख से तब मरा है, जबकि मैं भोजन कर रहा था । एक स्त्री मेरी आँखों के सामने बेइज्जत की गई । मेरे गर्म बिस्तर से सिर्फ पचास मीटर दूर फुटपाथ पर लोगों ने शीत-भरे जीवन की रातें बिताई हैं । मुआवजा न मिलने से बरबाद हो गए लोगों ने जब सड़क पर जुलूस निकाला, मैं मदिरा पीता पाया गया । मैं चश्मदीद गवाह हूँ। मुझे गवाही देनी होगी । अभी न दूँगा तो अपने अंत में देनी होगी । इस गवाही से बचा नहीं जा सकता। इसी मायने में किसी कवि के लिए और किसी समाज के लिए कविता का रकबा महत्वपूर्ण है । कविता में लिखे शब्द, एक साक्षी के बयान हैं । अपने को सजदे से लाकर, झुककर, लिखे गए बयान । इन बयानो से कवि के अंतमू का और अपने समय के हालात का दूर तक पता चलता है । समाज के पाप और अपराध, एक कवि के लिए पश्चाताप, क्रोध, संताप और वेदना के कारण है । वह एक यूटोपिया का निर्माण भी है, जिसकी संभावना को असंभव नहीं कहा जा सकता ।

  • Bankon Mein Anuvaad Ki Samasyaen
    Bholanath Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-808

    Availability: In stock

    बैंकों में अनुवाद की समस्याएँ
    हिन्दी में बैंकों के प्रयोग पर बहुत कम पुस्तकें आई है, किन्तु बैंकों में अंग्रेजी सामग्री के हिन्दी अनुवाद की समस्याओं पर शायद यह पहली पुस्तक है ।
    डॉ० भोलानाथ तिवारी के 'अनुवाद : सिद्धान्त और प्रयोग' माला से 'अनुवाद विद्वान', 'काव्यानुवाद की समस्याएं', 'कार्यालयी अनुवाद की समस्याएं', 'वैज्ञानिक अनुवाद की समस्याएं', 'भारतीय भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ', 'विदेशी भाषाओं से हिन्दी अनुवाद की समस्याएँ' तथा 'पत्रकारिता में अनुवाद की समस्याएँ' के बाद यह आठवीं पुस्तक है ।
    यह पुस्तक विशेषत: बैकों में अनुवाद तथा सामान्यता अनुवाद में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Sulagati Inton Ka Dhuaan
    Poonam Singh
    250 225

    Item Code: #KGP-9196

    Availability: In stock

    सुलगती ईंटों का धुआं कहानीकार पूनम सिंह का नया संग्रह है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मंे प्रकाशित इन कहानियों को पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त हो चुकी है। पूनम सिंह नए बनते समाज को आलोचनात्मक दृष्टि के साथ कहानियों के कंेद्र में रखती हैं, यह एक सामान्य कथन है। यह उपयुक्त कथन है कि वे भाषा और शैली से पाठक के मन में भी खुशी और खलिश पैदा कर देती हैं। विकास के नाम पर लुटती जमीन, परंपरा और अस्मिता विमर्श से जूझती स्त्री, जिम्मेदारियों से घिरा ‘नैतिक बेरोजगार’, ग्रहों के अंधविश्वास में उलझे आधुनिक, उत्पीड़न के विरुद्ध उठ खड़ी हुईं स्त्रियां, अकेलेपन से आक्रांत व आत्मीयता को तलाशती वृद्धवस्था और व्यवस्था के खिलाफ एकजुट जनता-इन कहानियों के यही सूत्र-संदर्भ हैं। देखा जाए तो रचनाशीलता को चारों तरफ से घेरे इन सूत्र-संदर्भों को पूनम सिंह ने अपने रचाव से विशेष बना दिया है। उनमें स्थानीयता का एक मोहक अंदाज है। यह अंदाज केवल भाषा में ही नहीं, कहानी कहने के मिजाज में भी समाया है। इन कहानियों के कई चरित्र मन में कहानी समाप्त हो जाने के बाद भी उद्विग्न रहते हैं। कहानी पाठक के मन में दुबारा-तिबारा लिखी जाती है शायद।
  • Koi To
    Vishnu Prabhakar
    125 113

    Item Code: #KGP-9096

    Availability: In stock


  • Pracheen Brahman Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    150

    Item Code: #KGP-499

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Parakh
    Malti Joshi
    180 162

    Item Code: #KGP-1983

    Availability: In stock

    परख
    "तुमने अपने बचपन में मुझे एक सपना दिखाया था कि तुम पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनोगे, तुम्हारा एक बड़ा-सा बँगला होगा, बँगले में मेरा भी एक कमरा होगा, कमरे से लगी बालकनी में एक झूला पड़ा होगा, उस झूले पर बैठकर मैं तुम्हारे बच्चों को कहानियाँ सुनाऊँगी, उनके लिए स्वेटर बुनूँगी।
    "अब तुम बड़े आदमी बन गए हो। तुम्हारे पास बड़ा-सा बँगला भी है, घर में बाल-गोपाल भी हैं, पर मेरा सपना तो अधूरा ही रह गया न ! अभी तुमने मेरे लिए इतने ठिकाने गिनाए, पर एक बार भी नहीं पूछा कि जिया, मेरे घर रह सकोगी ? देखो, मुझसे जैसा बना, मैंने तुम्हारा बचपन सँवारा था। अब तुम मेरा बुढ़ापा सुधार रहे हो। हिसाब बराबर हो गया।"
    "कैसी बात कर रही हो जिया !" वीरेश आवेश में एकदम उठकर खड़ा हो गया, "कसम ले लो जो आज तक मैंने कभी तुम्हें आया समझा हो।" उसका स्वर एकदम तरल हो आया, "अपनी जन्मदायिनी माँ को तो मैंने बस तस्वीर में ही देखा है। उनकी कोई याद मेरे मन में नहीं है। पर सच कहता हूँ, बाहर रहते हुए जब भी घर की याद आई है, माँ के रूप में तुम्हारी छवि मन में उभरी है। मुझे दुःख है तो इसी बात का कि इस रिश्ते को कोई वैधानिक दर्जा नहीं मिल सका, नहीं तो मैं वृद्धाश्रमों की खाक क्यों छानता ! तुम्हें साधिकार, ससम्मान सीधे अपने घर ले जाता।"
    "यह तुम्हारा वहम है बेटे ! इसे अपने मन से निकाल दो। वैधानिकता रिश्तों को गारंटी नहीं देती, नहीं तो तुम्हारे उस पाँचसितारा वृद्धाश्रम में इतने लोग आकर क्यों बसते !"           
    [इसी संग्रह की कहानी ‘अनिकेत’ से]
  • Shaam Ki Jhilmil
    Govind Mishra
    300 270

    Item Code: #KGP-9309

    Availability: In stock

    बुढ़ापे में अकेले हो जाने पर, फिर जी भर जी लेने की उद्दाम इच्छा, उसे साकार करने के प्रयत्न, एक-पर-एक...कुछ हास्यास्पद, कुछ गंभीर, कुछ बेहद गंभीर कि जीवन इहलोक और परलोक में इस पार से उस पार बार-बार बह जाता हो....कोई सीमारेखा नहीं। हताशा, जीने की मजबूरी, कुछ नया लाने की कोशिश...दरम्यान उठते जीवन सम्बन्ध मूलभूत प्रश्न
    गोविन्द मिश्र का यह बारहवाँ उपन्यास वृद्धावस्था के अकेलेपन और जिजीविषा के द्वन्द और टकराहट पर लिखा गया संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है।
  • Khiraki Khulane Ke Baad
    Nilesh Raghuvanshi
    250 225

    Item Code: #KGP-9339

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी में अपनी ही कविता और घर-संसार के लिए एक उत्सुक आलोचनात्मक रवैया बना रहा है।

    नीलेश जादुई फंतासी की जगह घर.परिवार, बच्चे का जन्म, प्रसव के दर्द आदि को काव्य विशय बनाती हैं और उन्हें सादगी का मर्म जानने में ही कविता अकसर सहायक होती है। राजनीति प्रकट न हो, पर नीलेश इस हद तक समय से बेखबर नहीं हैं कि राजनीति उनके लिए सपाट झूठ और गलत शब्द हो। इस तरह नीलेश रघुवंशी को पढ़ना एक भरोसेमंद साथी को पढ़ना है। उनकी कविताएँ इधर की कविता में आए ठहराव, कीमियागिरी या उसके उलट सरलतावाद के विरुद्ध नया प्रस्थान हैं। स्त्रीवाद को विमर्श बनाए बगैर नीलेश रघुवंशी के यहाँ संघर्शरत स्त्री है, जो जटिल समय को ‘क्लीषे’ नहीं बनने देती।

    कविता अप्रत्याषित की खोज नहीं है-मामूलीपन के खटराग में औसतपन का प्रतिकार है। नीलेश गंजबासौदा की जनपदीय, कस्बाई चेतना से लबरेज लंबी कविताओं में वृत्तांत रचती हैं और भीतर.बाहर के सफरनामे को इस तरह संभव करती हैं कि ‘देखना’ क्रिया ‘जानना’ क्रिया से अभिन्न है। 

    आज जब कविता विचारधारा से ऊबकर शहरी भद्रलोक की कविता हो गई है, नीलेश किसान जीवन का वृत्तांत लिख रही हैं।

    यही समय है जब किसान आत्महत्या कर रहे हैं और मीडिया पर्यटन की डाॅक्यूमेंट्री बना रहा है। यहाँ किसान जीवन की त्रासदी है, तो तंत्र का शगल भी है और फिर ‘बाइट’!

    यह है बदला हुआ समय, जहाँ क्रूरता भी प्रदर्शन  प्रिय है। बीच.बीच में अनकहा छोड़कर वे कहे का  मर्म खोल जाती हैं। विस्तार और संक्षेप का कोलाज  हैं-नीलेश की कविताएँ। उनका वैविध्य चकित  करता है। 

    घर.गिरस्ती, हाट.बाजार, सफर और समय की अनंतता के बीच नीलेश रघुवंशी कब ‘पर्सनल’ को ‘पाॅलिटिकल’ बना देंगी, कहना मुष्किल है। वे पर्यटक की निगाह से चीजों को नहीं देखतीं-जीवनअरण्य में धँसती हैं और स्त्री मुक्ति के साथ सामाजिक मुक्ति के लिए विकल.व्यग्र होती हैं।

    नीलेश रघुवंशी ‘घर निकासी’ में प्रगीतात्मकता का सार्थक उपयोग कर सकीं। ‘पानी का स्वाद’ की कविताओं में काव्य फलक का विस्तार दिखा। ‘अंतिम पंक्ति’ की आधी कविताएँ आख्यानमूलक हैं। कहीं लैंडस्केप, कहीं दृष्य.श्रव्य का कोलाज, कहीं कथा.कहानी।

    नीलेश रघुवंशी की कविता में नई खिड़कियाँ खुल रही हैं।

    नीलेश की तद्भवता सिर्फ भाशायी खेल नहीं है, वह उनकी अपनी भाशायी अस्मिता है, जो सीधे संस्कृति से छनकर आती है।

    वही कविता, वही जीवन श्रेश्ठ है जो विस्थापन को अतिक्रमित करता है। इस अवधारणा को नीलेश की कविताएँ चरितार्थ करती हैं। वे पुराने प्रतिमानों को खारिज करती हैं और सामाजिकता को ही राजनीतिक विमर्श में ढालती हैं।

    कविता का लोकरंग विस्थापन का प्रतिवाद है। स्थानीयता नीलेश की काव्यात्मकता का मुख्य ध्रुवक है। गंजबासौदा की धूल भी नीलेश के लिए कविता है। यह कविता का प्रकृत देशज ठाठ है। खुद से भिड़ने की ताकत।

    परमानंद श्रीवास्तव के लेख से कुछ अंश
     

  • Malviya Ji Ke Sapnon Ka Bharat
    Ishwar Prasad Verma
    395 356

    Item Code: #KGP-612

    Availability: In stock

    मैं मनुष्यता का पुजारी हूं। मनष्यत्व के आगे मैं जात-पांत नहीं जानता। कानपुर में जो दंगा हुआ, उसके लिए हिंदू या मुसलमान इनमें से एक ही जाति जवाबदेह नहीं है। जवाबदेही दोनोंजातियों पर समान है। मेरा आपसे आग्रहपूर्वक कहना है कि ऐसी प्रतिज्ञा कीजिए, अब भविष्य में अपने भाइयों से ऐसा युद्ध नहीं करेंगे, वृद्ध, बालक और स्त्रियों पर हाथ नहीं छोड़ेंगे। मंदिर अथवा मस्जिद नष्ट करने से धर्म की श्रेष्ठता नहीं बढ़ती। ऐसे दुष्कर्मों से परमेश्वर प्रसन्न नहीं होता। आज आप लोगों ने आपस में लड़कर जो अत्याचार किए हैं, उसका जवाब आपको ईश्वर के सामने देना होगा। हिंदू और मुसलमान इन दोनों में जब तक प्रेम-भाव नहीं उत्पन्न होगा, तब तक किसी का भी कल्याण नहीं होगा। एक-दूसरे के अपराध भूल जाइए और एक-दूसरे को क्षमा कीजिए। एक-दूसरे के प्रति सद्भाव और विश्वास बढ़ाइए। गरीबों की सेवा कीजिए, उनको प्रेम से आलिंगन कीजिए और अपने कृत्यों का पश्चात्ताप कीजिए। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Agyey
    Agyey
    260 221

    Item Code: #KGP-662

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अज्ञेय ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मेजर चौधरी की वापसी', 'गैंग्रीन (रोज)', 'नगा पर्वत की एक घटना', 'हीली-बोन की बत्तखें', 'पठार का धीरज', 'जयदोल', 'विवेक से बढ़कर', 'साँप', 'शरणदाता' तथा 'कोठरी की बात'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अज्ञेय की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Bhinsaar
    Gyanendrapati
    160 144

    Item Code: #KGP-1882

    Availability: In stock

    भिनसार
    'भिनसार' समकालीन कविता-परिदृश्य में अपनी तरह के अकेले कवि ज्ञानेन्द्रपति का अनूठा संकलन है । इससे कवि की बहुचर्चित कृतियाँ 'आँख हाथ बनते हुए' और 'शब्द लिखने के लिए ही यह कागज बना है' तो सम्पूर्णता  शामिल हैं ही, अब तक आसंकलित-और अनेक तो अप्रकाशित-रही आयी कविताएँ भी पुस्तकाकार आ रही है । एक सघन बसा कविता-संसार पाठकों की यायावरी को आमंत्रित कर रहा है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की इन कविताओं से एक ओर तो तीव्र परिवर्तनकामिता से उपजा क्रान्तिकारी रोमान है, वर्ग- शत्रुओं को ललकारता युयुत्सु उदूघोष; तो दूसरी ओर सामाजिक आत्मालोचन का वह विरल स्वर है जो अपनी आत्मा को खराद पर चढाये बगैर नहीं उठता, अपने नैतिक विवेक के आगे वेध्य बने रहने पर ही जिसका स्फुटन संभव हो पाता है । यहीं, चेतना पारीक और बनानी बनर्जी से होने वाली अविस्मरणीय मुलाकातें हैं । रात से लगी भोर में भटक आया चमगादड़ का बच्चा भी इस कविता-दुनिया का बाशिन्दा है । परित्यक्त चीजें भी यहाँ निरर्थक नही, उनमें नये अर्थ अँखुआते है ।
    दरअस्ल, ज्ञानेन्द्रपति को पढ़ना बनते हुए इतिहास के बीच से गुजरना ही नहीं, युग के कोलाहल के भीतर से छन कर आते उस मन्द्र स्वर को सुनना है इतिहासों से जिसकी सुनवाई नहीं होती; यह नश्वरताओं की भाषा से शाश्वत का द्युति-लेख पढ़ना है । इसीलिए यहाँ एक तरह की अनगढ़ता काव्य-सौष्ठव की अविधि ठहरती है । उच्च-भ्रू आलोचकों की पर्वा किये बगैर यह मनुष्य की ओर बढा हुआ समव्ययी हाथ है ।
    ये वे कविताएँ हैं जिनकी जीवनधर्मिता अबूझ ढंग से मानवीय जिजीविषा को पुष्ट करती है ।
  • Krishan Upasika Meera
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-184

    Availability: In stock

    मीरा शाश्वत हैं
    भारतीय नारी समाज की गौरव दीप है । गिरधर गोपाल के  प्रेम में आकंठ डूबी मीरा लोक-लाज और परिजन समूह की चिंता न करते हुए मंदिरों में पद-कीर्तन गाती हुई घुँघरू बांधकर नाचती थी। वे नटनागर कृष्ण मुरारी के गीत गाती हुई वृंदावन से द्वारिका तक अपने कन्हैया को रिझाती रहती थीं ।
    विश्व-साहित्य में मीरा जैसी अन्य कोई नारी नहीं  जो लोक-लाज त्यागकर छैल-छबीले बाँके सांवरिया के रंग में रँगी थी । मीरा नारी के अतिरिक्त मात्र भाव बनकर घूमती थीं । उनकी साधना गौरवमयी थी । वे अपन कन्हैया की दीवानी थीं,  उन्हें वृंदावन की कूंज गलियों में खोजती फिरती थीं ।
    परिवार में पति के निधन के बाद  नाना प्रकार के कष्ट दिए गए ।  उन्हें पीने के  लिए विष-प्याला भेजा गया, जो अमृत बन गया ।  पिटारे में जहरीला नाग भेजा गया, जो तुलसी की मोहक माला बन गया। सोने  लिए शूली की सेज भेजी गई, जो पुष्पों की शैया बन गई ।
    सैकडों पद रचकर मीरा अंततोगत्या अपने गिरधर के चरणों में बैठकर उन्हीं में समाहित दो गई ।
    मीरा आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगी । जव तक नटनागर गिरधारी रहेंगे तब तक मीरा भी रहेंगी । और नटनागर तो शाश्वत है तो फिर मीरा भी शाश्वत हैं  ।
  • Parnaam Kapila
    Devendra Deepak
    400 360

    Item Code: #KGP-1894

    Availability: In stock


  • Aadami Aur Uska Samaaj
    Vishnu Nagar
    225 203

    Item Code: #KGP-88

    Availability: In stock


  • Kya, Kab, Kahan?
    Mahendra Raja Jain
    1100 990

    Item Code: #KGP-702

    Availability: In stock

    ‘क्या, कब, कहाँ?’ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ-ग्रन्थ है। यह राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित ‘हंस’ पत्रिका के समस्त अंकों (अगस्त 1986-अक्टूबर 2013) की विषय सूची है। लेखक, शीर्षक, विषयानुक्रमणिका के रूप में इसे तैयार किया है ‘सन्दर्भिका निर्माण’ के विशेषज्ञ महेन्द्र राजा जैन ने। उन्होंने सर्जनात्मक रुचि के साथ अत्यन्त परिश्रमपूर्वक ‘क्या, कब, कहाँ?’ को आकार दिया है। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के शब्दों में, ‘मैं सचमुच महेन्द्र राजा जैन को हृदय से धन्यवाद देना चाहूँगा—एक पाठक के नाते, एक लेखक के नाते कि वे अपनी भाषा और साहित्य के लिए इतना महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं।’
    कई वर्षों के अथक परिश्रम से ‘हंस’ के इन अंकों की विषय सूची तैयार की गई है। लेखक, शीर्षक और विषयों के अकारादि क्रम से संयोजित इस सूची से तत्काल पता चलेगा कि ‘हंस’ में—
    ० किसी लेखक की, किसी शीर्षक की कोई रचना छपी या नहीं या कब छपी?
    ० किसी विषय की कौन-कौन सी रचनाएँ छपीं या वे किसकी लिखी हुई हैं?
    ० किसी पुस्तक की समीक्षा छपी या नहीं या कब छपी या वह किसकी लिखी हुई है?
    ० ‘हंस’ में छपी किसी रचना पर किसकी क्या प्रतिक्रिया कब छपी?
    ० ‘मेरी-तेरी उसकी बात’ में कब किस विषय पर चर्चा की गई है या किसी विषय पर कुछ लिखा गया है या नहीं?
    ० ‘काँटे की बात’ में कब किस-किस विषय पर लिखा गया है?
    ० ‘हंस’ में किसी महत्त्वपूर्ण गोष्ठी, सेमिनार आदि की रिपोर्ट छपी या नहीं या कब छपी?
    ० ‘बात बोलेगी’ और ‘समकालीन सृजन-सन्दर्भ’ में कब किस विषय पर लिखा गया है?
    इसके साथ और भी बहुत कुछ जानने योग्य।
    राजेन्द्र यादव की कीर्ति के स्थायी स्मारक ‘हंस’ के प्रत्येक पृष्ठ का अवगाहन करता यह ग्रन्थ समस्त हिन्दी प्रेमियों, पाठकों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और बौद्धिकों के लिए पठनीय व संग्रहणीय है।
  • Anmol Vichaar
    Sudha Gautam
    300 270

    Item Code: #KGP-9029

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक अनमोल विचार में सुश्री सुधा गौतम ने अनेक महापुरुषों और धार्मिक ग्रंथों से अनमोल विचार संकलित किए हैं । उदाहरण के लिए—

    जिसने अपनी इच्छाओं का दमन करके मन पर विजय और शांति पा ली है, वह राजा हो या रंक, उसे जगत् में सुख ही सुख है । —हितोपदेश 

    इच्छा से दु:ख आता  इच्छा से भय आता है । जो इच्छाओं से मुक्त है, वह न दु:ख जानता है, न भय । -महात्मा बुद्ध 

    यदि तुम सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने के आकाँक्षी हो तो सबसे नीचे से चढ़ना प्रारंभ करों । -साइरल

    अधूरा काम और अपराजित शत्रु—ये दोनों बिना बुझी आग की चिंगारियों की तरह हैं । वे मौका पाकर बैठ जाएँगे और उस लापरवाह आदमी को आ दबाएँगे । -चाणक्य

    कायर लोग अपनी मृत्यु के पहले भी कई बार मरते हैं, परंतु वीर पुरुष मृत्यु का एक बार ही अभिनंदन करते हैं। -शेक्सपियर

    जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है, उसने मानो सारे जगत् पर विजय प्राप्त कर ली । -वेदव्यास

    जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने ही ऊपर झेल लेता है, वही दूसरों के क्रोध से बच सकता है । वही अपने जीवन को सुखी बना सकता है। -सुकरात 

    ज्यों-ज्यों मनुष्य बूढा होता जाता है, त्यों-त्यों जीवन से प्रेम और मृत्यु से भयभीत होता जाता है । -जवाहरलाल नेहरू 

    दयालु पुरुष धन्य हैं, क्योंकि वे ही भगवान की दया को प्राप्त कर सकेंगे । -ईसा मसीह

    परोपकार-रहित मनुष्य के जीवन को धिक्कार है, क्योंकि उससे तो पशु ही धन्य हैं, जिनका चमडा भी दूसरों के काम में आता है । -विनोबा भावे 

    किसी के गुणों की प्रशंसा करने में अपना समय मत खोओ, उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करों । -कार्ल मार्क्स 

    जो मनुष्य निश्चित कार्यों को छोडकर अनिश्चित के पीछे दौड़ता है, उसके निश्चित कार्य भी नष्ट हो जाते है, अनिश्चित तो नष्ट ही हुआ रहता है । -चाणक्य 

    मनुष्य को अपने कमाए हुए धन से तब तक कोई तृप्ति नहीं होनी चाहिए, जब तक उनमें से कोई नेक काम करना न शुरु कर दे । -भगवन महावीर 

    वे राजा धन्य हैं जो पुत्रों के समान पुरवासियों को अपने सामने पूर्ण सुखी देखकर रात को चैन से सोते है । -राजतरंगिणी 

    कुटिल मत बनो, किसी भी व्यक्ति के साथ कुटिलता, धोखेबाजी और मक्कारी का व्यवहार मत करो । सभी के साथ सभ्यता, नम्रता, भद्रता और श्रेष्ठता का व्यवहार करो । -यजुर्वेद 

    माता के आँचल और घर के कोने से बड़ा ही अंतर होता है—एक तो शीतल जल का सागर होता है, दूसरा मरुभूमि । -प्रेमचंद 

    यह मानना कि हम कुछ नहीं कर सकते, सबसे बडी कायरता है । इसे त्यागो और पुरुषार्थ को जागृत करों । फिर देखोगे कि तुम्हारी उन्नति तुम्हारे हाथ में है । -मुनि गणेशवर्णी
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal
    Bhagwan Das Morwal
    300 255

    Item Code: #KGP-706

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढ़ियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Ram Vilas Sharma
    Ram Vilas Sharma
    450 405

    Item Code: #KGP-712

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sahitya Par Ramayan Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-595

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर रामायण का प्रभाव
    रामकथा से संबद्ध काव्य-रचना की एक सुदीर्घ परंपरा है, जिसका उद्गम वैदिक वाङ्मय से माना जाता है। लौकिक संस्कृत में इस परंपरा का विधिवत् सूत्रपात आदिकवि वाल्मीकि से हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने रामकथा को जो व्यवस्था, उदात्तता, महनीयता और कालजयिता प्रदान की उसके लिए साहित्य जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामकथा ने अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। भारत के अतिरिक्त आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, मंगोलिया, इग्नेशिया तक रामकथा की अमिट छाप देखी जा सकती है। भारत और भारतीय मूल के लोगों के लिए रामकथा शक्तिशाली सांस्कृतिक आधार है। भारतीय भाषाओं में रामकथा का स्वरूप अनेक रूपों में विद्यमान है जो भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता को सिद्ध करता है।
    रामकथा की नित्य-प्रवाही पुण्यसलिला की अजस्र धारा अनादि काल से भारतीय मनीषा को सम्मोहित और भारतीय जीवन को संस्कारित करती रही है।
    रामकथा के सार्वदेशिक स्वरूप को विभिन्न भारतीय भाषाओं में जांचना-परखना ही इस उपक्रम का अभीष्ट है।
    विश्वास है कि रामकथा और रामकथा से संबद्ध साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए इसमें प्रचुर सामग्री मिल सकेगी।
  • Yaadon Ke Galiyaare Se
    Ramesh Chandra Diwedi
    180 162

    Item Code: #KGP-9321

    Availability: In stock

    साहित्य समाज का दर्पण है। काव्य समाज का स्वरूप है। समाज के अनुरूप ही काव्य की रचना होती है। यह धारणा अनादिकाल से चली आ रही है, जो आज भी चरितार्थ है। काव्य और साहित्य का अन्योन्याश्रय संबंध है। अद्यतन कवि की रचना संसर्ग से प्रभावित होती है। चूँकि कवि भ्रमणशील होते हैं, इसलिए संसर्ग गुणों का प्रभाव उन पर पड़ता ही है। ‘संसर्गजा दोष गुणा भवंति’ यह सूक्ति सार्थक प्रतीत होती है। साथ ही आज काव्य की रचना समाज की माँग के अनुरूप होती है। कवि जब आत्मा की आवाज को सुनकर रचना करता है, तब वह हृदयस्पर्शी हो जाता है। कवि की कवित्व शक्ति अनंत होती है। यह पूर्व संस्कारों से मिलती है। ‘नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा, कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा’।
    ब्रह्मा की सृष्टि में केवल छह रस होते हैं—कटु, अम्ल,कषाण, लवण, तिक्त तथा मधुर किंतु कवि की सृष्टि में  शृंगार, हास, करुण, रौद्र, वीर, बीभत्स, अद्भुत, भयानक और शांत नौ रस होते हैं। कवि अपने संकल्प मात्र से ही किसी रस का आवाहन कर सकता है, पर ब्रह्मा के रस को प्राप्त करने के लिए अन्यान्य उपकरणों की आवश्यकता होती है। कवि का अपना एक काव्य लोक होता है। काव्य कल्पना पर आधरित है। कल्पना का आधर सत्य है। यह आधर कवि को समाज से प्राप्त होता है।
    कविता, कवि के हृदय की वह ध्वनि है, जो मुँह से अथवा लेखनी से निकलते समय कवि को भी अचेत कर देती है। सुनने के बाद ही कवि को भी पता चलता है कि उसने क्या कहा। ऐसी ही कविता काव्य लोक में समादृत होती है।
    आज शहरी सामाजिक जीवन तथा संस्कृति में सिमटा भारत गाँव की ओर उन्मुख हो रहा है। ग्रामीण भारत को शहर में लाने का प्रयास कर रहा है। सरकारी तंत्रा भी ग्रामीण विकास पर अधिकाधिक बल दे रहा है। महात्मा बुद्ध ने भी राजभवन छोड़कर शांति के लिए ग्राम और वन की ओर प्रस्थान किया था। इस सामाजिक परिवेश में रचित यह काव्य संग्रह समाज और परिवारों के उन अनछुए स्वरूप को सामने लाया है, जो बुध जन हृदय के किसी कोने में दम तोड़ रहा था।
    —रमेश चन्द्र द्विवेदी

  • Anuvaad Aur Bhaashik Sanskriti Hindi Ke Prayojanparak Sandarbh
    Rita Rani Paliwal
    325 293

    Item Code: #KGP-528

    Availability: In stock

    हिंदी लंबे समय से अनुवाद कर्म करने के बावजूद हम अनुवाद को भाषायी गतिविधियों से सकारात्मक और सर्जनात्मक ढंग से जोड़ने में बहुत सफल नहीं हो पाए हैं। अनुवाद के माध्यम से हिंदी को अभिव्यक्ति की सहजता से, उसकी बोलियों की अपनी कमाई हुई शब्दावली और भंगिमाओं से, जीवन संदर्भों की निकटता से जोड़ते हुए भाषायी पैनेपन को निखार नहीं पाए हैं।
    भूमंडलीकरण के दौर में दुनिया भर की भाषाओं के लिए कई तरह की चुनौतियां हैं। हिंदी को उन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपनी भाषिक संस्कृति को न केवल पहचानना होगा बल्कि उस भाषिक सांस्कृतिक परिवेश को कायम रखने का हर प्रयास करना होगा, जिसमें हिंदी भाषी समाज का सामूहिक अवचेतन और जातीय स्मृति संचित है; साथ ही जिसमें हिंदी भाषी समाज की मौजूदा और भावी पीढ़ियों की आशाएं, आकांक्षाएं अपना विस्तार और प्रसार पाती हैं और पाएंगी। भाषायी अस्मिता केवल बोलचाल, घरेलू व्यवहार, मनोरंजन से संचित और समृद्ध नहीं होती। उसके लिए उच्चकोटि के सर्जनात्मक साहित्य और साहित्य-विमर्श के साथ-साथ आवश्यक होती है उस भाषा में ज्ञान-संपदा की, दैनंदिन जीवन के बड़े से बड़े कार्यकलाप के संचालन, प्रयोजन और चिंतन की निरंतर और सिलसिलेवार मौजूदगी।
    प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा-संस्कृति के इन्हीं व्यापक सरोकारों से संबंधित है।
  • Ek Bhaasha Huaa Karati Hai
    Uday Prakash
    140 126

    Item Code: #KGP-293

    Availability: In stock

    हमारे भागते-दौड़ते कठिन और तेज़ समय में जब बहुत कुछ हाशिये पर जा रहा है, जिसे पहले ज़रूरी समझा जाता था, क्या कविता के लिए कोई जगह, कोई काम बचे हैं? उदय प्रकाश की कविता के केंद्र में यही चिंता है। उनके यहाँ ‘अब हर बार हारा हुआ यह माथा है/अकेला अपनी आत्मा से लाचारी के साथ क्षमा माँगता हुआ’ और यह तीखा अहसास भी कि ‘अपनी ही भाषा और अपने ही लोकतंत्र के भीतर/हम अबुगरेब के कै़दी’ हैं। इस दुनिया में ‘कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते हैं/ इतनी देर में चालीस हज़ार बच्चे मर चुके होते हैं/ ज़्यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से’। ऐसी दुनिया और समय में कविता का काम मानवीय अंतःकरण को संक्षिप्त होने से बचाना, जो हो रहा है उसे खुली आँखों देखना और इस समय पर अंतःकरण की ओर से चैकसी करना है। कविता याद दिलाती है कि ‘यह एक लुटेरा अपराधी समय है/जो जितना लुटेरा है, वह उतना ही चमक रहा है और गूँज रहा है/हमारे पास सिर्फ़ अपनी आत्मा की आँच है और थोड़ा-सा नागरिक अंधकार/कुछ शब्द हैं जो अभी तक जीवन का विश्वास दिलाते हैं’। ‘आत्मा की आँच’, ‘थोड़ा-सा नागरिक अंधकार’ और ‘कुछ शब्द’ आज कविता का यही शास्त्र संभव है।
  • Rang Basanti
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1913

    Availability: In stock

    रंग बसंत
    आजादी के आंदोलन के संभवत: ऐसे दो ही क्रांतिकारी महानायक है, जो सैक्टेरियन सोच से परे जाकर व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं राजनीतिक विकास का स्वरूप सामने रखते है । किसी भी भारतीय से पूछिए, वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस और भगतसिंह का नाम लेगा । प्रताप सहगल का ‘रंग बसंती' नाटक भगतसिंह के जीवन का आख्यान मात्र नहीं, बल्कि उसके समय को भी पूरी शक्ति एवं जीवंतता के साथ हमारे सामने रखता है । भगतसिंह अपने जीवनकाल में ही लीजेंड बन गया था । उसके क्रांतिकारी कृत्यों को तो बार-बार सामने लाया गया, लेकिन उसके समाजवादी चिंतन को हमेशा नेपथ्य में ही रखा गया । भगतसिंह न सिर्फ अपने एक्शन में, बल्कि अपनी सोच में भी एक रैडिकल व्यक्तिव के रूप में सामने आता है । प्रस्तुत नाटक भगतसिंह के इसी रूप को हमारे सामने रखता है ।
    नाटक का ढाँचा दृश्यों में बाँधा गया है, जो इसे बेहद लचीला बना देता है । मुक्ताकाशी रंगमंच हो या प्रेक्षागृह का मंच, शैली यथार्थवादी से या प्रतीकवादी- हर तरह से नाटक को खेलने की संभावनाएँ इसमें मौजूद हैं । बई बार मंचित होकर तथा साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख के रूप में समादृत हो चुका 'रंग बसंती' नए रंग में पाठकों के हाथ में देते हुए सार्थकता का ही अनुभव किया जा सकता है । वस्तुत: गंभीर रंग-कर्म करने वालों के लिए यह एक उपहार है ।
  • Durg-Bhed
    Deepak Sharma
    50 45

    Item Code: #KGP-9110

    Availability: In stock

    दुर्ग-भेद
    "अजीब संयोग है, आप दोनों ही किसी एक चीज को चाहने और पाने को इतना अधिक महत्व देते है कि अपना सारा अस्तित्व ही उस एक के प्रति अर्पित कर देना चाहते है । पर क्या अपनी शक्तियों व इन्द्रियों को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर जब आप अपनी परिधि निर्धारित का लेंगे तो अपनी स्वतन्त्रता नहीं खो बैठेंगे ? जब मुक्त गीत आपको पुकारेंगे  तो क्या आप उसी संकीर्ण दुर्ग में बँधे रह पायेंगे ?" "जब उस दुर्ग को अभेद्य व अपारदर्शी बनाए रखने का उत्तरदायित्व ही हमीं पर होगा तो क्यों हम...", "हाँ तो क्यों आप सुमन व सुमन के माता-पिता की तरह उसी प्रकार के लौहगढ़ में बंद नहीं हो जाएँगे, जहाँ निजी स्वार्थी घेरों में कैद आप हर क्रन्दन , हर उत्सव से अछूते , पैसे कमाने के लिए कोरे, रूखे व कठोर चेहरे लिए दिन-रात मेहनत करते चले जाएँगे ।"
    (कहलीं-संग्रह की 'दुर्ग-भेद' काली से)

  • Pracheen Tutan Kahaniyan
    Rangey Raghav
    250 225

    Item Code: #KGP-07

    Availability: In stock

    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
  • Meri Ekyavan Kavitayen
    Atal Bihari Vajpayee
    160 144

    Item Code: #KGP-1849

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Naresh Saxena
    Naresh Saxena
    190 171

    Item Code: #KGP-446

    Availability: In stock

    नरेश सक्सेना समकालीन हिंदी कविता के ऐसे कवि हैं, जिनकी गिनती बिना कविता-संग्रह के ही अपने समय के प्रमुख कवियों में की जाने लगी।
    एक संग्रह प्रकाशित होते-होते उच्च माध्यमिक कक्षाओं से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाए जाने लगे। पेशे से इंजीनियर और फिल्म निर्देशन का राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ ही संगीत, नाटक आदि विधाओं में गहरा हस्तक्षेप। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ अपनी लय, ध्वन्यात्मकता और भाषा की सहजता के कारण अनगिनत श्रोताओं, पाठकों की शुबान पर चढ़ गई हैं। वैज्ञानिक संदर्भों ने न सिर्फ उनकी कविताओं को मौलिकता प्रदान की है बल्कि बोलचाल की भाषा में उनके मार्मिक कथन, अभूतपूर्व संवेदना जगाने में सपफल होते हैं। निम्न उद्धरण इसका प्रमाण है--
    पुल पार करने से, पुल पार होता है
    नदी पार नहीं होती
    या 
    शिशु लोरी के शब्द नहीं, संगीत समझता है
    बाद में सीखेगा भाषा
    अभी वह अर्थ समझता है
    या 
    बहते हुए पानी ने पत्थरों पर, निशान छोड़े हैं
    अजीब बात है
    पत्थरों ने, पानी पर
    कोई निशान नहीं छोड़ा
    या 
    दीमकों को पढ़ना नहीं आता 
    वे चाट जाती हैं / पूरी किताब
  • Khushboo Udhaar Le Aye
    Upendra Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-1902

    Availability: In stock

    खुशबू उधार ले आए
    उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लों का 'हिन्दीपन' एक ओर 'उर्दू' की फारसीयत से अलगाता है तो दूसरी ओर गजल के व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य को सबल बनाता है, जिसका अनुकरण पाकिस्तान के ग़ज़लकार भी करते है । डॉ० शेरजंग गर्ग ने ठीक ही कहा है कि उपेन्द्र की कहन में वैविध्य है जो उन्हें बहुत-से ग़ज़लकारों से सर्वथा अलग का देता है । 
    -डॉ० गंगाप्रसाद विमल
    हबीब जालिब की तरह उपेन्द्र कुमार भी व्यवस्था से लड़ते और कारावास में डाले गए इंसान की वेदना को शिद्दत से महसूस करते है :
    वो कैदी चुप था लेकिन गुनगुनाया
    बजी जंजीर की जब इक कड़ी थी
    उपेन्द्र के पास शे'र कहने का सलीका भी है और कल्पना को इस्तेमाल करने का फन भी । 
    -ज्ञानप्रकाश विवेक
    उपेन्द्र के पास शायद किसी चालाक अनुभवी कवि का शिल्प-कौशल नहीँ है, यह अच्छी बात है अन्यथा उनकी रचनाओं में कथ्य की प्रमुखता नहीं रह पाती । अनगढ़ यथार्थ का विशाल भंडार परोसती उपेन्द्र कुमार की ग़ज़लें पाठकों को अपने आसपास को सतर्कता से देखने को मजबूर करेंगी, ऐसा विश्वास है ।
    - विजय किशोर मानव
    न तो उपेन्द्र जी उर्दू ग़ज़ल की रिवायतों की रौ में बहे है और ना ही उन्होंने अपनी ग़ज़लों पर हिन्दी का ‘कवितापन हावी होने दिया है । उनकी ग़ज़लों की बुनावट और उनकी प्रकृति गीतों से अलग है । इसीलिए उनमें गजलियत की मौजूदगी का अहसास बना रहता है । सोजो-साज़ (वेदना और संगीतात्मकता) हूँ तो कविता मात्र के आधार तत्त्व माने जाते है, मगर इनके बरौर तो ग़ज़ल का काम ही नहीं चल सकता । ग़ज़ल में रोमानिया की चाशनी भी ज़रूरी है । उपेन्द्र जी ने ग़ज़ल की इन खूबियों को न केवल समझा है, बल्कि इनसे अपनी ग़ज़लों को बखूबी सँवारा भी है ।
    - बालस्वरूप राही
  • Hindu Sanskars
    M.L. Ahuja
    395 356

    Item Code: #KGP-768

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindu sanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life.
  • Bhartiya Bhaashaaon Ki Shreshtha Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    260 234

    Item Code: #KGP-73

    Availability: In stock

    भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियां 
    प्रस्तुत संकलन में भारत की सोलह प्रमुख भाषाओं की सोलह प्रतिनिधि कहानियां समाविष्ट की गई हैं । कश्मीर से कन्याकुमारी तक का परिवेश किसी हद तक इनमें प्रतिबिंबित हुआ है । ये कहानियां हमें मात्र छूती-छेड़ती ही नहीं, बल्कि हँसाती, गुदगुदाती और कहीं-कहीं रुलाती भी हैं । साथ ही बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करती हैं ।
    इनमें भारत के स्थूल स्वरूप का प्रतिबिंबन ही नहीँ, भारत की अंतश्वेतना का स्पंदन भी मिलेगा और भारत की माटी की गंध भी ।
    क्या है भारत ? क्या है उसकी अस्मिता की पहचान ? क्या हैं उसकी खूबियाँ ? खूबियों के साथ-साथ खामियां भी। यथार्थ के धरातल पर अंकित ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर इन जीती-जागती, बोलती-बतियाती कालजयी कृतियों में अनायास उपलब्ध हुए बिना नहीं रहेंगे ।
    इनमें अतीत या वर्तमान ही नहीं, भविष्य का अंधकार से उबरता उजास भी है । अपने समग्र रूप में एक बृहुत् समाज, जो कहीं एक देश का ही नहीं, महादेश की पर्याय  भी बन जाता है। ये साधारण-सी कहानियां अपने में  अनेक असाधारण संसार सहेजे हैं ।
  • Dona Paavala Aur Teen Auraten
    Rohitashv
    175 158

    Item Code: #KGP-1836

    Availability: In stock

    गोवा का समुद्री तट। लहरों में लहराता एकांत। फैनी की मादक गिरफ्त। ऑन्जना बीच पर निर्वस्त्र विदेशी नर-नारी देखकर व्हिस्की पीने को मचलता मन। पीने के बाद इस स्वर्ग में गोते खाता नायक ! हाँ, यही तो होटल, बार और क्रूज के साथ तस्वीर है गोवा की। धनाढ्य पर्यटकों की मौज-मस्ती का अपना निजी रंगस्थल, देश-विदेशों में मशहूर ! प्रचलित यह भी है कि गोवा की औरतें स्वच्छंद जीवन की अभ्यस्त होती हैं। वे पैसे कमाती हैं और ऐश करती हैं।
    मगर रोहिताश्व की लिखी कहानियाँ, ये किस गोवा की कथाएँ हैं, जिनमें गोवा का स्वर्ग अपने ही बाशिंदों को आजाद रहन-सहन के बावजूद गरीबी, धोखे, जालसाजी और भावात्मक शोषण की चक्की में पीसकर रख देता है। अत्याचार और शोषण चक्र को खोलता हुआ लेखक सागर-किनारे के चप्पे-चप्पे को खँगालता है। संवेदना की बुनावट में गोवा की तस्वीर बदल जाती है। समुद्र की लहरों पर बल खाती चाँदनी के नीचे कितनी-कितनी काली रातें बिछी हुई हैं। उजाला होने की उम्मीद यहाँ स्त्री-पुरुषों के त्याग और बलिदानों से बने सूरज के हाथ है।
    दोना पावला और तीन औरतें’ संसार की उन तमाम औरतों का प्रतिनिधित्व करती है, जिनका जीवन अकेलेपन की त्रसदी के लिए है। पढ़ते हुए भयानक बेचैनी जकड़ती चली जाती है। कहीं आशा जागती है कि संघर्ष ही उनका मकसद है। स्त्रियाँ टूटती हैं, डगमगाती फिर भी नहीं...
    लेखक कहानियों में विभिन्न नामों से उपस्थित है और अपनी परिचय-भूमियों (गोवा और हैदराबाद) पर घटित होते इतिहास तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को बराबर दर्ज करता जाता है। कहन का प्रस्तुतीकरण ऐसा जैसे समूह में बैठकर हम लोककथाएँ सुन रहे हों। यहाँ कथाओं के प्रति वही अटूट आकर्षण जागता है, जिसके गायब हो जाने से कथा-कहानी के प्रति पाठक उदासीन हुआ है। संवेदी लगाव की यह धारदार प्रस्तुति रोमानी हालात में भी संघर्ष की पराकाष्ठा तक अनायास ही पहुँच जाती है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam (Paperback)
    Amrita Pritam
    80

    Item Code: #KGP-1518

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृता प्रीतम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृता प्रीतम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बृहस्पतिवार का व्रत', 'उधड़ी हुई कहानियाँ', 'शाह की कंजरी', 'जंगली बूटी', 'गौ का मालिक', 'यह कहानी नहीं', 'नीचे के कपड़े', 'पाँच बरस लम्बी सड़क', 'और नदी बहती रही' तथा 'फैज की कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Videshi Mahilaon Ka Bharatprem (Paperback)
    M.A. Sameer
    160

    Item Code: #KGP-7082

    Availability: In stock

    प्रस्तुत पुस्तक ‘विदेशी महिलाओं का भारतप्रेम’ उन महिलाओं के विषय में लिखी गई है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारतभूमि की तथा भारत के लोगों की तन मन धन से सेवा एवं सहायता की। चाहे वे कोक्को सोमा हों या उनकी बेटी तोशिको, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सेवा की। इसी क्रम में आगे श्रीमती एनीबेसेंट, मारग्रेट कजिंस और एमिली शैंकल के नाम भी उल्लेखनीय हैं। इन महिलाओं ने जन्म भले ही भारतभूमि पर न लिया हो, लेकिन उनके भारतप्रेम को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनका भारत से घनिष्ठ संबंध है। उनके द्वारा दिए गए अविस्मरणीय योगदान को इस पुस्तक में सरल, सरस और रोचक शैली में उल्लिखित किया गया है। 
  • Bindu-Bindu Vichar (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    130

    Item Code: #KGP-457

    Availability: In stock

    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की, पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है ।
    -पुस्तक से
  • Alif Laila Hazar Dastan
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-7822

    Availability: In stock


  • Aazaadi Mubarak
    Kamleshwar
    290 261

    Item Code: #KGP-41

    Availability: In stock

    आजादी मुबारक
    मैंने देखा है कि कमलेश्वर ने कभी भी किसी 'डॉग्मा' से चालित होकर लिखना स्वीकार नहीं किया । कमलेश्वर की हर कहानी उसके जीवनानुभवों से निकली है । कमलेश्वर ने पढ़-पढ़कर संक्रांति के नहीं झेला है, बल्कि स्वय जिया है... उसकी शायद ही कोई ऐसी कहानी हो, जिसके सूत्र जिंदगी में न हों, क्योंकि वह बहुत खूबी से अपने समय के अंतर्विरोधों को पकड़ता है...  मुझे बहुत-सी वे घटनाएँ, लोग, स्थितियाँ, विचार, संदर्भ आदि याद है, जिन्होंने उसकी सशक्त  कहानियों को जन्म दिया है । कमलेश्वर इस मामले में एक बंजारा है, क्योंकि वह अनवरत यात्रा पर रहता है उसकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन की सादगी है शुरू होकर आधुनिकतम संचेतनाओँ और संश्लिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करती है...  उसका स्टैमिना परिवर्तन की तेज से तेज रफ्तार में उसका सहायक होता है, इसीलिए वह कभी पिछड़ता नहीं और न प्रयत्न-शिथिल होता है...  और मैं कहना चाहूँगा कि यह कोई साधारण बात नहीं कि एक कलाकार अपनी भावभूमियों पर परिश्रमपूर्वक तैयार की गई अपनी निर्मितियों को इतनी निर्ममता से तोड़कर अलग हो जाए और नए सफल प्रयोग करने लगे । -दुष्यंत कुमार (सन् 1 966)

    कमलेश्वर की कहानियों का यहीं सच है । तमाम क्था आंदोलन  आए और गए, उनके साथ और उनके बाद भी कमलेश्वर ने अपनी निर्मिंतियों को विलक्षण रचनात्मक निर्ममता से तोड़ा से । उसी प्रयोगधर्मिता का उदाहरण हैँ-'आजादी मुबारक' संकलन की यह कहानियां
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria (Paperback)
    Madhu Kankria
    180

    Item Code: #KGP-414

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मधु कांकरिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Doobte Waqt
    Dixit Dankauri
    150 135

    Item Code: #KGP-1901

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।

  • Delhi
    Khushwant Singh
    400 340

    Item Code: #KGP-818

    Availability: In stock


  • Vishwa Ke Mahaan Shikshavid
    M.A. Sameer
    395 356

    Item Code: #KGP-9330

    Availability: In stock

    जीवन में सफलता व अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा–इन तीन शक्तियों को भलीभांति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित कर लेना चाहिए।
    यह विचार एक ऐसे शिक्षक का है, जिसके एक शिष्य ने इन विचारों को न केवल आयुध बनाकर अपने जीवनयुद्ध में प्रयोग किया, अपितु इनसे जीवनयुद्ध का विजेता बनकर संसार के सर्वश्रेष्ठ आयुध्-निर्माताओं में से एक बना। जी हां, यह विचार है इयादुराई सोलोमन नाम के दक्षिण भारतीय शिक्षक और उनका यह शिष्य भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति डाॅ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का, जिन्होंने वैज्ञानिकी में स्वयं को समर्पित करके ‘मिसाइलमैन’ की उपाधि प्राप्त की।
    पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद डाॅ. अब्दुल कलाम भारत के ऐसे पहले राजनेता थे, जिन्हें बच्चों का स्नेह प्राप्त था और ‘काका कलाम’ कहकर संबोधित किया जाता था। बच्चों को देश का भविष्य मानने वाले डाॅ. अब्दुल कलाम अकसर समय निकालकर छात्रों के बीच जाते और बच्चों के प्रश्नों के उत्तर बड़ी सहजता से देते और उन्हें भविष्य में कुछ करने के लिए प्रेरित करते। जीवन के मूल्य, आदर्श और सफलता के मंत्र बड़ी रोचक वाणी में बताते। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘विंग्स आॅफ फायर’ में उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने विचारों और दृष्टिकोण से मार्ग दिखाया है। उनकी एक-एक बात प्रेरणादायी है। उनका समूचा जीवन ही प्रेरणादायी है।
    आज तकनीक के क्षेत्र में भारतीय युवाओं की बढ़ती संख्या का कारण डाॅ. अब्दुल कलाम की वह प्रेरणा ही है, जिसने देश को आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में सक्षम किया है। डाॅ. कलाम भारतीय तकनीकी विकास को विज्ञान के हर क्षेत्र में लाने का समर्थन करते थे। उनका कहना था कि साॅफ्टवेयर का क्षेत्र सभी वर्जनाओं से मुक्त होना चाहिए, जिससे अधिक संख्या में लोग इसकी उपयोगिता का लाभ उठा सकें। इसी से सूचना तकनीक का विकास तीव्र गति से हो सकेगा। डाॅ. कलाम का राष्ट्रपति काल भारत के स्वर्णिम काल में से एक है। बिना किसी राजनीतिक विवाद के उन्होंने यूरोपीय देशों और पड़ोसी देशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे और देश की विकास गति को थमने नहीं दिया। 25 जुलाई, 2007 को उनका कार्यकाल समाप्त हुआ और वे फिर से वैज्ञानिकी एवं तकनीक के क्षेत्र में आ गए।
    ऐसा कहा जाता है कि जब डाॅ. कलाम राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति के रूप में प्रवेश कर रहे थे तो उनके एक हाथ में एक थैला था, जो पांच वर्ष बाद जब वे वहां से कार्यमुक्त हुए तो उनके साथ ही था। वे शाकाहारी थे और अनुशासित जीवन व्यतीत करते थे। समय का उनकी दृष्टि में बड़ा महत्त्व था और इसके सदुपयोग के लिए वे व्यवस्थित चर्या का पालन करते थे।
    –इसी पुस्तक से
  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    180

    Item Code: #KGP-7055

    Availability: In stock

    रांगेय राघव रचित  प्राचीन सांस्कृतिक कहानियों के छह बृहत संग्रह 
    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।
    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।

  • Naav Na Baandho Aisi Thaur
    Dinesh Pathak
    315 284

    Item Code: #KGP-277

    Availability: In stock

    नाव न बाँधो ऐसी ठौर
    हिंदी के सुपरिचित कथाकार दिनेश पाठक के इस उपन्यास का केंद्रीय विषय है प्रेम।  यह विवाहेतर प्रेम है, जिसका अपना अलग रंग है और अलग संघर्ष भी। नारी-पुरुषजन्य आकर्षण प्रकृति का सहज स्वभाव है। यह स्वभाव इतना प्रबल है, इतना अदम्य कि बावजूद तमाम वर्जनाओं के इसकी धार सतत प्रवाहित रहती है। इस आकर्षण में न तो कोई उम्र होती है और न ही कोई शर्त। कब, कहाँ और कैसे दो विपरीत एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होकर साडी वर्जनाओं को चुनौती देने लगेंगे, कहना मुश्किल है। आज के दौर में जब स्त्री-पुरुष साथ-साथ काम कर रहे हैं, कंधे से कंधा मिलकर, तब इस आकर्षण की परिधि और व्यापक हो उठी है। साथ-साथ काम करते हुए कब दो प्राणी चुपके से एक-दूसरे की भावनाओं में भी शामिल हो जाते हैं, ज्ञात नहीं पद्त। और यदि वे दोनों ही पहले से विवाहित हों तो भावनाओ का यह ज्वार एक नयी समस्या को जन्म देता है - सामाजिक दृष्टि से कदाचित यह अवैध प्रेम है, एकदम वर्जित व निषिद्ध प्रेम, विवाह-व्यवस्था के नितांत विपरीता उपन्यास में एक साथ दो धुरियां हैं-एक में समाज के विखंडन का भय है, परंपरागत मान्यताओं-मूल्यों के साथ परिवारों के टूटने व समाज के अराजक होने का डर है तो दूसरे में व्यक्ति स्वातंत्र्य के आगे सामाजिक मूल्यों के प्रति अस्वीकार का भाव। प्रश्न है विवाहित स्त्री-पुरुष के बीच क्या यह विवाहेतर प्रेम-सम्बन्ध सही है ? निष्कर्ष पर तो पाठकों को पहुंचना है।
  • Gopal Krishna Gokhale : Jeevan Darshan (Paperback)
    Gaurav Chauhan
    120

    Item Code: #KGP-482

    Availability: In stock

    जिस समय हमारी यह भारतभूमि अंग्रेजों के अत्याचारों, प्रताड़नाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई थी उस समय देश के अनेक वीर सपूतों ने या तो अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश के मान-प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की रक्षा की या जीवन भर देश के लोगों को देश की आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करते रहे। उन्हीं वीर सपूतों में से एक वीर सपूत थे—गोपालकृष्ण गोखले। गोखले जी ने उस समय न केवल इस देश के युवाओं को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया बल्कि अपना संपूर्ण जीवन देश को आजादी दिलाने के प्रयासों में ही न्योछावर कर दिया।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar (Paperback)
    Kamal Kumar
    130

    Item Code: #KGP-412

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : कमल कुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jhooth Nahin Bolta Itihaas
    Dr. Jagdish Chandrikesh
    250 225

    Item Code: #KGP-579

    Availability: In stock

    झूठ नहीं बोलता इतिहास 
    इतिहास झूठ नहीं बोलता, यह सच है; लेकिन प्रायः इतिहासकार झूठ बोल जाते हैं, क्योंकि इतिहास लिखने वाले पहले भी दरबारी होते थे चारण, भाट और राजकवि, और आज भी दरबारी होते हैं कुछ प्रत्यक्ष तो कुछ परोक्ष । सत्ता-प्रतिष्ठान का वरदहस्त तो उन्हें मिला ही होता है । इसलिए इतिहास में वही सब कुछ लिखा जाता है, जो सत्ता चाहती है । हां, इतना अवश्य है कि किसी-किसी इतिहास लेखक का जमीर कभी-कभी उसे इस बात की गवाही नहीं देता था कि वह झूठ की मक्खी को जानते-बुझते निगल ले । इसलिए वह घटनाओं के बीच 'गैप' या 'संकेत' छोड़ देता है, जो घटना के दूसरे पक्ष को उजागर कर सके । इन्हीं 'गैप' या 'संकेतों' को पढ़ने को अंग्रेजी में 'बिटवीनस दी लाइंस' पढ़ना कहा गया है । इसी तरह 'बिटवीनस न लाइंस' पढ़ने की कोशिश से जन्मी हैं प्रस्तुत संकलन की रचनाएं । 
    प्रस्तुत संकलन को  रचनाओ में इतिहास की ज्ञात, अज्ञात और अल्पज्ञात रोचक घटनाओं  आलेख  हैं जो प्रमाणित हैं, जिनके स्रोत और संदर्भ यथास्थान दिए गए हैं ।
    हालांकि सभी रचनाएँ इतिहास से जुड़ी हैं फिर भी कुछ रचनाएं चमत्कारों से संबंधिन हैं जो यह बताती हैं कि प्रकृति के नियमों के बारे में जितना इम समझे हुए हैं, शायद उतना पर्याप्त नहीं हैं, । कुछ रचनाएँ गुप्तचरी को किंवदंतियां बनी गुप्तचर युवतियो माताहारी, नूर इनायत और तेनिया पर हैं, जो अद्यतन जानकारी लिए हुए हैं, जैसे माताहारी तो जासूस थी ही नहीं ।
    एक आलेख टावर ऑव लंदन की लेकर, जिसमें ब्रिटेन के छह सौ साल के इतिहास का क्रूरतम चेहरा दफन है । एक आलेख नेपोलियन के उस चेहरे का बेनकाब करता है, जो उनसे  प्रजातंत्र के नाम पर ओढ़ रखा था । चर्च के अंधे धर्माधिकरण  न सत्य की खोज करने वाले वैज्ञानिकों को किस तरह जिंदा  जलवा दिया, यह भी जानना रोमांचक है ।
    आलेखों की वस्तुगत विविधना लेखक के बहुपठित और  बहुविज्ञ होने को प्रमाणित ना करती ही है, साथ ही भाषा पर उसकी पकड़ और शैली की प्रवाहमय सहज सरलता पाठक को अभिभूत किए बिना नहीं रहती।
  • Parv (Paperback)
    Bhairppa
    300

    Item Code: #KGP-7195

    Availability: In stock

    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Vidrohini Shabri
    Hiralal Bachhotia
    100 90

    Item Code: #KGP-1854

    Availability: In stock

    विद्रोहिणी शबरी 
    जन्मजात विद्रोहिणी शबरी का विद्रोह जड़-परंपराओं और रूढियों के खिलाफ था । शबरी ने एक तरह से अतीत को या उस अतीत को जो हिंसा पर टिका था, को ललकारा था । वह आतंक के रावण के खिलाफ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी । शबरी ने नारी के रक्षिता माने जाने पर भी उँगली उठाई तो तरुणी शबरी पर भी जिसने देखा उसी ने उँगली उठाई थी । लेकिन शबरी अपने रास्ते चलती रही और जा पहुंची पंपा सरोवर क्षेत्र में । कठोर यथार्थ की रगड़ से उत्पन्न आदर्श ही शबरी का प्राप्तव्य बना और यह आदर्श शस्य श्यामल राम के रूप में परिकल्पित हुआ। मुग्धमना शबरी उसी राम के लिए प्रतीक्षारत रही । राम उद्धारक नहीं, शबरी के लिए मीत बनकर प्रकट हुए थे। केवट, निषाद के साथ राम के व्यवहार ने शबरी को ऐसा ही आश्वासन दिया था । राम का सबके प्रति समता भाव ही शबरी के लिए वरेण्य था । शबरी की वृष्टि में राम ने मानव-गरिमा की प्रतिष्ठा कर एक नई पहल की धी। शबरी अपनी इसी आस्था पर आरूढ राम के लिए प्रतीक्षारत रही । प्रतीक्षा के क्षणों को काटने के लिए शबरी बेर के पेडों का रोपण और फलो का संचयन करती रही । शबरी अरण्य संस्कृति की प्रतिरूप प्रकृति के संरक्षण में संलग्न रही। शबरी ने शूर्पणखा प्रकरण में अमर्यादित नारी को वरेण्य नहीं माना । इसीलिए राम ने हाथ उठाकर कहा था-शबरी प्रतिरूप है नवधा भक्ति का । इसीलिए शबरी सामान्य से असामान्य या असाधारण बन गई और राम के हृदय में मूर्ति के समान विराजित रही । यही शबरी की आस्था की विजय थी । शबरी ने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर राम को जनकनंदिनी को खोजने के संकेत दिए थे । इसमें सुग्रीव-हनुमान मिलन के पूर्व संकेत भी शामिल थे । भावी आपदाओं की ज्वालाओं को शांत करने हेतु सांत्वना नीर उड़ेलते रहना ही शबरी का प्राप्तव्य बना रहा ।
  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Samrat Ashok
    Vishv Nath Gupta
    120 108

    Item Code: #KGP-250

    Availability: In stock


  • Qasaaibaaraa
    Ajeet Kaur
    240 216

    Item Code: #KGP-43

    Availability: In stock

    कसाईबाड़ा
    नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
    “पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
    "बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
    "ठीक कहते हो।"
    "पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
    "कौन से मेमने ?”
    “बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
    अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
    लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Narendra Kohli (Paperback)
    Narendra Kohli
    90

    Item Code: #KGP-7004

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : नरेन्द्र कोहली
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नरेन्द्र कोहली ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'परिणति', 'किरचें', 'दुष्टि-देश में एकाएक', 'शटल', 'नमक का कैदी', 'निचले फ्लैट में', 'नीद आने तक', 'संचित भूख', 'संकट' तथा 'छवि' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Krishan Baldev Vaid
    Krishna Baldev Vaid
    70 63

    Item Code: #KGP-9056

    Availability: In stock


  • Ek Nirvasit Maharaja
    Navtej Sarna
    425 383

    Item Code: #KGP-642

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Mere Saakshatkaar : Prabhakar Shrotriya
    Prabhakar Shrotiya
    175 158

    Item Code: #KGP-2035

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : प्रभाकर श्रोत्रिय
    मैं एक लेखक से अधिक एक मनुष्य होना श्रेयस्कर मानता हूँ। अध्यापन तो अपने में ही एक बादशाहत है, परंतु यहीं से हटकर प्रशासन में संयोगवश मुझे दूसरे नंबर पर नहीं रहना पड़ता । फिर वह भोपाल हो, कलकत्ता हो या दिल्ली । चाहा यही कि इन सर्वोच्च पदों की गरिमा को न गिरने दूं, लेकिन अपने को ऐसा ढालूँ कि इन पदों से उतरने पर मुझे ऐसा न लगे कि किसी पद पर था, जिस पर अब नहीं हूँ। और इस 'पद' का अर्थ मेरे लिए सिर्फ पाँव हो-जो अपनी ज़मीन पर टिका है ।
    मैं अकसर उन लोगों पर लिखना चाहता रहा हूँ जो चुनौती बनते है या उपेक्षित होते हैं । शमशेर बहादुर सिह की कविता पर इसीलिए लिखा। वह हिंदी के सबसे जटिल कवि हैं। मैथिलीशरण गुप्त को कोई कवि नहीं मान रहा था, तब उन पर एक पुस्तक अलग ढंग की लिखी । छायावाद के मूल्यांकन में जब बेहद बीहड़ता थी, तब छायावाद पर लिखा । प्रसाद पर लिखा, नरेश मेहता पर लिख रहा हूँ ।
    ० 
    पत्रिका के स्तरीय पाठक के अलावा भी पाठकों का एक वर्ग होता है, जो साहित्य के प्रति उत्सुक होता है । इसलिए कुछ ऐसी रचनाएँ भी होनी चाहिए, जिनके जरिए ऐसे पाठक पत्रिका में प्रवेश कर सकें, उनका संस्कार हो सके । पत्रिका के महत्त्व की एक कसौटी यह भी है कि वह कितनी प्रतिभाओं को सिरजती और प्रोत्साहित करती है । कई अच्छे लेखक पत्रिकाओं के निर्माण होते है ।
    ० 
    व्यावसायिक पत्रिकाओं से जुडी हुई संपादक की संस्था भी बहुत कमजोर हो गई है। पत्रिकाएं हमेशा संपादक के बलबूते पर ही निकलती और यशस्वी होती है । 'सरस्वती' से लेकर 'सारिका' और 'धर्मयुग' का यहीं इतिहास रहा है । लोकप्रिय पत्रिकाओं को भी दोयम और दृष्टिहीन संपादक नष्ट का देते हैं । 

    [प्रभाकर श्रोत्रिय द्वारा प्रश्नोंत्तर के कुछ अंश]
  • Tinke-Tinke
    Nisha Bhargva
    165 149

    Item Code: #KGP-1806

    Availability: In stock

    निशा भार्गव के लघु कथा संग्रह, 'तिनके-तिनके' में परिवर्तित जीवन मूल्यों के छोटे-छोटे सच हैं, स्त्री प्रश्न, परिवारिक-सामाजिक वैषम्य और संबंधों की आइरनी दर्शाती छोटी-छोटी घटनायें हैं, जिन्हें अर्थकेंद्रित जीवन की आपाधापी में रोज़मर्रा की बाते समझकर, 'यह सब तो होता ही रहता है', वाले खाने में डालकर अदेखा किया जाता है ।
    हमारी आसपास की दुनिया में आए दिन काफी कुछ घटता रहता है। चौतरफ हेर फेर, अनाचार, स्कैम्स, आतंकी हमलों से लेकर, स्त्रियों से दुराचार, वृद्धों की अवमानना एवं आत्महत्याओं से टीवी और समाचार पत्र भरे रहते है । ऐसे में देखने सुनते में साधारण और औसत, पर चीन्हने में अर्थगर्भित ये बातें महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि गुट्ठिल होते जीवन में हमारा दिलोदिमाग, जो अशुभ और अनाचार सुनने का आदी हो गया है उसे हुन रोज़मर्रा के सुख-दु:ख, राग-विराग, प्रेम, ईषर्या और ईमानदारी की छोटी-छोटी घटनाओं से रू-ब-रू करा कर, उसकी संवेदनशीलता को टहोका जाय । शायद नज़र अंदाज होती ये छोटी-छोटी घटनाएं उन्हें अपने भीतर झांकने को प्रेरित करें । इनमें उन्हें खुशहाल जिन्दगी के कुछ छोटे-बड़े नुस्खे मिल जाये, जिनसे आए दिन के तनावों और घरेलू कलहों से कुछ तो मुक्ति मिले ।
    निशा नाउम्मीदी में भी संस्कारशील व्यक्ति और स्वस्थ समाज की उम्मीद नहीं छोड़ती । उसे अच्छाई पर भरोसा है यह भरोसा वह अपने पाठकों को सौंपना चाहती है । सीधी-सादी बोलचाल की भाषा में निशा बडे प्रश्न उठाती है । कैंसर की मरीज चारु, मौत के  इंतजार में सजना-संवरना क्यों छोडे? पचपन की उम्र में अकेली पडी शशि का पुनर्विवाह उसका गुनाह क्यों साबित किया जाय ? इस छोटे से जीवन को बयों भरपूर न जिया जाय ?
    बिना किसी भाषायी करिश्मे और दावे के निशा इस तिनके-तिनके  संग्रह में, स्मृतियों में अटके , यादों-स्थितियों के कुछ तिनके संजोकर बतकहियों और किस्सों के माध्यम से पाठकों से संवाद करती है, देखे जिए क्षणों को, छोटे-छोटे अनुभवों को सहज संवेदना से रेखांकित कर संधि पाठक तक पहुंचती है । इनकी सादगी ही इनकी खूबी हैं ।
  • Adher Aayuwale
    Devendra Chaubey
    50 45

    Item Code: #KGP-9094

    Availability: In stock


  • Ghar Nikaasi
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1890

    Availability: In stock


  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock


  • Mein Bhi Aurat Hoon
    Ansuya Tyagi
    245 196

    Item Code: #KGP-183

    Availability: In stock

    मैं भी औरत हूँ
    ‘हे भगवान् ! ओंकार चुप क्यों हो गया है ? क्या अब वापस वही स्थिति आ पहुँची है, जिससे मैं अब तक डरती आई हूँ ? जिस सच्चाई को जानकर पिछले दो पुरुष--नकुल व सौरभ--मुझे छोड़कर चले गए थे--एक प्रकार से मुझे ठुकराकर--बल्कि सौरभ ने तो अपनी पौरुष की कमी ही मेरे सिर पर थोप दी थी, मुझे ही दोषी ठहरा दिया था--पर ओंकार तो मुझसे शादी कर चुका है। क्या वह अब मुझसे तलाक लेने की सोचेगा ? कितनी जगहँसाई होगी, यदि कोर्ट में यह केस गया तो। सब मुझ पर कितना हँसेंगे ! कहेंगे, अरे, जब भगवान् ने ही तुझे इस लायक नहीं बनाया तो क्यों इच्छा रखती है वैवाहिक जीवन जीने की ! क्या संन्यासिनें इस दुनिया में नहीं रहतीं ? विधवाएँ नहीं रहतीं ? क्या कामक्रीड़ा इतनी अधिक महती आवश्यकता बन गई, जो इसने पूरी सच्चाई अपने होने वाले जीवनसाथी को भी नहीं बताई ? क्या पता, मीडिया इस बात को बहुत अधिक उछाल दे ! आखिर उन्हें तो एक चटपटा मसाला चाहिए लोगों को आकर्षित करने का। जिस बात को मैं इतने वर्षों से छुपाती आई हूँ, वही दुनिया के सामने मुझे नंगा कर देगी। इस नग्न सच्चाई को जानकर लोग मेरे माता-पिता को कितनी दयनीय दृष्टि से देखेंगे ! ओह ! इस वृद्धावस्था में क्या मेरे पापा, मेरे दादा जी ऐसी बातें सहन कर पाएँगे ?’
    (इसी पुस्तक से)
  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi
    Maitreyi Pushpa
    380 342

    Item Code: #KGP-9342

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh (Paperback)
    Shravan Kumar
    240

    Item Code: #KGP-136

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    300 270

    Item Code: #KGP-2038

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : विष्णु प्रभाकर
    गांधीवादी चिंतक, विचारक, लेखक विष्णु प्रभाकर ने जितना साहित्य रचा है, उससे कम बोला भी नहीं कहा जा सकता ।
    सन् '52 में विष्णु जी का पहला साक्षात्कार पदूमसिंह शर्मा 'कमलेश' ने लिया था । उसके बाद अब तक न जाने कितने वार्ताकारों ने विष्णु जी को अपने समय, समाज और यादों के पिटारे को आने पर बाध्य किया है ।
    वार्ताकार अपनी और से कुछ नया, कुछ महत्वपूर्ण जानने ही किसी विशिष्ट जन के पास जाता है, पर क्या हर बार ऐसा हो पाता है कि विशिष्ट जन कुछ अनकहा कह पाया हो ? प्रस्तुत पुस्तक में विष्णु जी के कई ऐसे साक्षात्कार है जिनके जवाबों ने तो पाठकों को चौंकाया ही, जिनके सवालों ने स्वयं विष्णुजी को भी कम हैरत में नहीं डाला । पुस्तक की भूमिका में उन वार्ताकारों का, उनके सवालों का और उनके सरोकारों का उल्लेख करना ही इस बात का पुख्ता  प्रमाण है कि वार्ताकार ने वार्तादाता को कितना मथा ।
    विष्णु प्रभाकर न सिर्फ गांधीवादी लेखक-चिंतक है, वे बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवनीकार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, मसिजीवी, यायावर, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध और साठित्य की विविध विधाओं के सर्जक हैं । स्वाभाविक है, विष्णु जी की वार्ताओं में न केवल हमारा निकट अतीत, विकट वर्तमान और संकटग्रस्त भविष्य उजागर हुआ है, साहित्य के सरोकार, एक लेखक का संधर्ष और साहित्य की धरोहर भी उजागर हुई है ।
    संकलित साक्षात्कार पाठक तक उतना कुछ थोंड़े में पहुंचाने में समर्थ हैं, जितना कुछ कई योगियों में दर्ज करने पर भी न पहुँच पाया होगा ।
  • Baarish Ke Baad
    Radhey Shyam Tiwari
    125 113

    Item Code: #KGP-1990

    Availability: In stock

    बारिश के बाद
    राधेश्याम तिवारी हिंदी के एक ऐसे कवि हैं, जो अपने आसपास के साधारण-सामान्य और लगभग घटनाविहीन जीवन से मार्मिकता को बड़े अचूक ढंग से पकडने की क्षमता रखते हैं। उनकी कविताओं में कल्पना की ऊँचाइयाँ हैं, लेकिन जैसा कि वे अपनी एक कविता 'बीज-मंत्र' में कहते हैं कि बीज का बाहर निकलकर भी धरती से जुडाव कम नहीं होता, उसी तरह उनकी कविता  का लगाव भी किसी भी हालत में इस धरती से, यहाँ के इंसान से, यहाँ के मौसमों से, अभावों और स्मृतियों से कम नहीं होता, बल्कि और सघन होता जाता है । उनकी हर कविता जीवन के बीच सहज ही मिलने वाला एक मार्मिक प्रसंग बन जाती है । यह मार्मिकता शब्द-क्रीड़ा से हासिल नहीं की गई है बल्कि जीवन की परिस्थितियों से प्राप्त की गई है। शहर तथा गाँव के बीच हिलगी हुई राधेश्याम तिवारी की कविता कई जगह गीतात्मक हो जाती है बल्कि कहीं-कहीं वे अपनी बात कहने के लिए गीत का सहारा भी लेते है, मगर दिलचस्प बात यह है कि यह कवि जीवन के प्रति हमेशा बहुत सकारात्मक है, कटु और कठोर नहीं । उसका लहजा शिकायत-भरा नहीं, ललक-भरा है । उनकी कविताओं से जीवन के दबावों-तनावों को दरगुजर नहीं किया गया है, अभावों की चर्चा से परहेज नहीं किया गया है, मगर विवशता की बजाय एक दार्शनिक ऊँचाई दी गई है । उनकी एक कविता है 'न्यूटन', जिसमें वह कहते हैं कि "न्यूटन ने यह तो सोच लिया कि सेब पेड़ से नीचे क्यों गिरता है, लेकिन यह नहीं सोचा कि नीचे गिरकर भी वह नीचे के लोगों को क्यों नहीं मिलता?" इतना ही नहीं, वे आगे कहते हैं कि "यह तो ठीक है कि गुरुत्वाकर्षण सबको अपनी ओर खींचता है, मगर जमीन में दबा हुआ बीज कैसे ऊपर उठ जाता है, न्यूटन ने यह नहीं सोचा ।" यहीं अभावों की चर्चा है, लेकिन यहाँ बेचैनी का स्वर और स्तर भिन्न है तथा इसी के साथ यह सकारात्मक स्वर भी है ।
    इस संग्रह में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जैसे 'बाकी सब माया हैं, 'पुराना पता', 'सर्कस में बाघ', ‘संबंध', 'घर', 'किराए का मकान' आदि जो हमारे इस दैनिक संसार की कविताएँ हैं मगर उससे बाहर ले जाकर विचलित करने वाली कविताएँ भी हैं। ये कविताएँ सहज हैं, क्योकि मर्मभेदी हैं । वे सहज हैं, क्योंकि मनुष्य के साथ ये प्रकृति से भी सघन रूप से जुड़ती हैं। ये सहज हैं, क्योंकि इनमें हमारा सहजात मनुष्य है, उसकी मानवीयता है, उसका राग और विराग है ।
  • Kyon Tanaavgrast Hai Shiksha-Vyavastha
    Jagmohan Singh Rajput
    250 225

    Item Code: #KGP-218

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Govind Mishra
    Govind Mishra
    180 162

    Item Code: #KGP-170

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार गोविन्द मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं :'जनतंत्र', 'फांस', 'सिर्फ इतनी रोशनी', 'सुनंदो की खोली', 'खुद के खिलाफ', 'युद्ध', 'खाक इतिहास', 'पगला बाबा', 'वरणांजलि' तथा 'मायकल लोबो' ।

    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vishnu Prabhakar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    80

    Item Code: #KGP-1255

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ  : विष्णु प्रभाकर
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार विष्णु प्रभाकर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बँटवारा', "क्रान्तिकारी', 'पर्वत से भी ऊँचा', 'ठेका', 'पिचका हुआ केला और क्रान्ति', 'चितकबरी बिल्ली', 'एक मौत समन्दर किनारे', 'एक और कुन्ती', 'पैड़ियों पर उठते पदचाप' तथा 'पाषाणी'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार विष्णु प्रभाकर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Nau Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    120 108

    Item Code: #KGP-2088

    Availability: In stock

    नौ लघु नाटक
    हिंदी में नाट्य-लेखन संस्कृत नाटय-परंपरा और लोक-नाट्य के विविध रूपों से जुड़कर विकसित हुआ हैं । बाद में उस पर ग्रीक त्रासदी, पारसी शैली  और पश्चिमी रंग-शैलियों का असर भी दिखाई देता है ।  मंचीय नाटक बनाम पाठ्य नाटक की बहस भी हिंदी  में होती रही है । इधर हिंदी नाटय-लेखक और हिंदी  रंगमंच अपनी-अपनी दर्पमंडित घोषणाओं के वावजूद एक-दूसरे के पास ही आया है। एकांकी नाटकों-लेखन के विकास के पाशर्व में जहाँ रेडियो की  भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है, वहीं स्कूलों एवं कॉलेजों की नाट्य-संस्थाओं द्वारा महसूस की जाने वाली एकांकी नाटकों की ज़रूरत भी एक कारण रही है ।
    अजब बात है कि इधर एकांकी-लेखन कम हुआ है, पर उसकी जगह लघु नाटक एव नुक्कड़ नाटक ने ली है ।
    प्रताप सहगल रंगमंच से जुड़े हुए नाटककार के रूप में विख्यात हैं । उनके नाटक 'रंग बसंती', 'मौत को रात भर नहीं जाती' तथा 'अँधेरे में' आदि के मंचन बार-बार हुए हैं। अपने पिछले नाटक 'अन्वेषक' से उन्हें विशेष ख्याति मिली है ।
    'नौ लघु नाटक' में समय-समय पर लिखे गए नौ लघु नाटक संग्रह के रूप में आ रहे हैं । प्रताप सहगल का नाट्य-लेखन परंपरा एवं प्रयोगशीलता के संतुलन बिंदु पर खडा नजर आता है । अपनी इसी छवि के अनुरूप उनके इन लघु नाटकों में भी कहीं परंपरा की गंध मिलेगी तो कहीं प्रयोगशीलता की ललक । कहीं मूल्यों का भंजक रूप मिलेगा तो कहीं चरित्रों कै भीतर सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पेठ। इनमें से अनेक नाटक कई-कई बार मंचित हुए हैं और कई एक प्रकाशित होकर अपना पाठक वर्ग बना चुके हैं ।
    छोटे-छोटे शहरों, कस्बों तथा कॉलेजों एवं स्कूलों की नाट्य-मंडलियों को अच्छे लघु नाटकों की प्राय: तलाश रहती है। इस दृष्टि से भी यह संकलन महत्त्वपूर्ण है और लघु नाटकों के विकास की दृष्टि से भी ।
  • Rashtra Kavi Ka Stri Vimrash
    Prabhakar Shrotiya
    150 135

    Item Code: #KGP-1543

    Availability: In stock

    स्त्री-जागरण और स्त्री-गरिमा को लेकर गुप्त जी ने जो रचनाएं लिखी, वे आज की जरूरत भी हैं, भले ही भिन्न रूप रंग-तेवर में। उन्हांने तभी महसूस कर लिया था कि स्त्री की समस्या सबसे पुरानी, सबसे जटिल लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण है। गुप्त जी ने बड़े घर की नारियों से लगाकर साधारण घर-संसार की ऐसी नारियों का सृजन और पुनर्सृजन किया जो समाज के बहुकोणीय स्वरूप को प्रकट करती हैं। उनके माध्यम से गुप्त जी ने समाज, संस्कृति और मानवीय गुणावगुण रेखांकित किए हैं। उनके स्त्री-चरित्रों की विविधता, उनके अभिप्राय और मर्मस्पर्शिता समाज को शील और आचरण का आईना दिखाती है।
    स्त्री-विमर्श और नारी-सशक्तीकरण के युग में आज यदि हम गुप्त जी के नारी-पात्रों पर विचार करते तो हमें उनके माध्यम से उस संघर्ष और विमर्श का पता चलेगा जो बीसवीं शती के दूसरे-तीसरे दशक में कवि कर रहे थे। उनकी संवेदना, उदारता, प्रगतिशीलता और समय को भरोसे में लेकर समयातीत पहल की क्षमता रेखांकित की जानी चाहिए। इससे यह भी प्रकट होता है कि खड़ीबोली हिंदी के जन्मकाल से ही सामाजिक विकास और उन्नयन का वह आंदोलन प्रारंभ हो गया था जिसे हम 70-89 साल बाद उत्तर-आधुनिक विमर्श बना रहे हैं। हमारी भाषा, हमारे संघर्ष की प्रणाली और अभिव्यक्ति-शिल्प भले बदल गया हो, परंतु चिंता के बीज लगभग वे ही हैं। इस तरह देखने पर हिंदी की जीवट और अग्रगामिता का पता चलता है।
    गुप्त जी के स्त्री-चरित्रों और स्त्री-चिंतन पर यह छोटी-सी पुस्तक दरअसल नई उपजाऊं पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
  • Nobel Puraskaar Vijetaaon Ki 51 Kahaniyan
    Surendra Tiwari
    595 476

    Item Code: #KGP-1985

    Availability: In stock

    नोबेल पुरस्कार विजेताओं की 51 कहानियाँ
    साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार की महत्ता सर्व-स्वीकृत है, क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, एक राष्ट्र का सम्मान होता है। साहित्य के क्षेत्र में सन् 1901 से 2005 तक 98 पुरस्कार दिए जा चुके हैं और पुरस्कृत साहित्यकारों में कवि भी हैं, कथाकार भी, दार्शनिक भी हैं और इतिहासकार भी। लेकिन मेरी यह निश्चित धारणा है कि इन रचनाकारों में जो कथाकार रहे हैं, उन्होंने पूरे विश्व पर अपना एक अलग प्रभाव छोड़ा है और उनकी कथाकृतियाँ सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित होती रही हैं। इस पुस्तक में यह प्रयास है कि इन कथाकारों की कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ एक साथ उपलब्ध हो सकें।
    इन कहानियों को पढ़ने के बाद सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विश्व के इन श्रेष्ठ और समर्थ रचनाकारों के पास कैसी वैचारिक दृष्टि या रचना-शैली थी या है। और यह भी अनोखी बात इन कहानियों के माध्यम से हमारे सामने आती है कि अलग-अलग देशों के अलग-अलग रचनाकारों की वैचारिक दृष्टि भले ही अलग हो, किंतु मानवीय संवेदनाओं के, मूल्यों के, जीवन के प्रति गहरी आस्था और विकास के वे एक जैसे पक्षधर हैं और शायद यही इनकी श्रेष्ठता का कारण है, मापदंड है।
    इस पुस्तक की अनिवार्यता और महत्ता को मैं इसी दृष्टि से स्वीकारता हूँ और शायद आप भी स्वीकारेंगे।
  • Computer : Kya? Kyon? Kaise?
    Varun Kumar Sharma
    100 90

    Item Code: #KGP-9153

    Availability: In stock

    कंप्यूटर शब्द अंग्रेजी के 'कम्प्यूट' (Compute) शब्द से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है – गणना करना । इस प्रकार साधारण भाषा में कम्प्यूटर का अर्थ एक ऐसी मशीन से है, जो गणना संबंधी कार्यों को शीघ्रता से कर सकती है । परंतु सही अर्थों में गणना करने के अलावा कम्प्यूटर और भी कई कार्य कर सकता है । कंप्यूटर की जानकारी के लिए इसकी विशेषताओं को जानना आवश्यक है ।
  • Yatra Ke Panne
    Rahul Sankrityayan
    350 315

    Item Code: #KGP-1923

    Availability: In stock

    यात्रा के पन्ने
    कालजयी व्यक्तिव के स्वामी महापंडित राहुल सांकृत्यायन  की प्रस्तुत पुस्तक 'यात्रा के पन्ने' से उनके द्वारा की गई तिब्बत-यात्राओं को शामिल किया गया है । अपनी प्रमुख कर्मस्थली तिब्बत से लेखक का अत्यंत गहरा एवं भावनात्मक लगाव रहा है । तिब्बत की पहली, दूसरी तथा तीसरी यात्राओं का विवरण इस पुस्तक में आने  से राहुल जी के यात्रा-साहित्य की यह एक उल्लखनीय कृति बन गई है । 'यात्रा  के पन्ने' में जहाँ राहुल जी तिब्बत के सर्वस्व को अपनी चेतस दृष्टि से जान और पहचान पाए है, वहीं इन यात्राओं में उनकी जन-प्रतिबद्धता की झलक भी दिखाई पड़ती हैं । इतिहास-दृष्टि के आलोक में आधुनिक जीवन-दृष्टि को वैज्ञानिक विस्तार देती उनकी यात्राएं पाठक को समृद्ध करने में सक्षम है । तिब्बत की शताब्दियों की स्मृति, निर्माण और ध्वंस को यहीं महसूस किया जा सकता है ।
    इस पुस्तक में संकलित लेखक के पत्रों का भी विशिष्ट महत्त्व हैं । पेरिस, जर्मनी, लंका तथा स्वदेश से लिखे उनके पत्रों में न केवल लेखक का 'वर्तमान' रचा-बसा है बल्कि अपन समय तथा समाज का दस्तावेजीकरण भी हुआ है । इन संकलित पत्रों को इतिहास के संभवत: सर्वाधिक प्रामाणिक दस्तावेज माना जा सकता है ।
    'यात्रा के पन्ने' पुस्तक का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष है स्वदेशी यात्राओं का । राहुल जी की इस प्रस्तुति में राजस्थान तथा बिहार के अनेक ऐतिहासिक नगरों का यात्रा-वर्णन है, जो इन स्थलों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक निधियों को सामने लाता है
  • Wuthering Heights (Paperback)
    Emily Bronte
    125

    Item Code: #KGP-348

    Availability: In stock

    A snowstorm evening. A moorland farmhouse. A visitor from south England on a recuperation trip. And a nightmare featuring the ghost of the earlier occupant of the farmhouse—trying to get in.
    Wuthering Heights and its chambers have stood the test of time and temperaments of the illustrious Earnshaws and the dark-skinned orphan Heathcliff. Through this classic romance, Emily Bronte takes us to the rebellious young Catherine Earnshaw, who with time, grows into an opinionated, treacherous woman in love with two men. And to Heathcliff, adoration and hatred for Catherine is the stuff classics are made of. All this while two illustrious families fall prey to the perfect scheming of the dark-skinned lunatic orphan! Will her love win or will it be his hatred?
    With love, betrayal, rivalry, and revenge at its heart, this saga of the moorland farmhouse has everything that awakens the base humane emotions. Realistically real with its vivid imagery, Wuthering Heights—166 years later too lives on, because love still drives the world, and revenge still destroys it.
  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi (Paperback)
    Maitreyi Pushpa
    225

    Item Code: #KGP-7218

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Jahaan Charan Pare Raghuvar Ke (Paperback)
    Rajesh Tripathi
    195

    Item Code: #KGP-7031

    Availability: In stock

    इतिहास में ओरल हिस्ट्री (मौखिक इतिहास) को मान्यता मिली हुई है। ओरल हिस्ट्री यानी इतिहास के वे ब्योरे जो किताबों में भले न हों पर जुबान पर हों, स्मृतियों में हों। राजेश ने इस अंचल की ओरल हिस्ट्री को रिकॉर्डेड हिस्ट्री में बदलने का भी काम किया है जिसके लिए इतिहासकारों को भी उनका आभारी होना चाहिए। यह किताब इतिहास और उपन्यास के दो छोरों के बीच झूलते उस हिंडोले की तरह है जिसकी हर पेंग एक नई दुनिया की सैर कराती है। मुझे विश्वास है कि यह किताब सिर्फ अपने कंटेंट के लिए नहीं बल्कि अपने अंदाजे- बयां के लिए भी पाठकों का इस्तकबाल हासिल करेगी।
  • Gyarah Shreshtha Kahaniyan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-804

    Availability: In stock

    ग्यारह श्रेष्ठ कहानियां
    हिंदी कहानी ने अपनी यात्रा में अनेक सुगम और दुर्गम मार्ग तय किए हैं । वैदिक साहित्य की आख्यायिकाओं तथा ब्राह्मण ग्रंथों में आए अनेक आख्यान हमारी कहानी-परंपरा के आदि स्रोत रहे हैं । सर्जना की सर्वथा लोकप्रिय विधा रहने के कारण कहानी, लेखकों की लेखनी की लाडली विधा भी बनी रही और संभवत: इसीलिए कहानी के अलंकरण और उपयोग निरंतर विकासमान रहे । प्रेमचंद और प्रसाद ने हिंदी कहानी को जिस श्रेष्ठ लोकहित में मर्यादित और निर्धारित किया, उसकी अनुगूँजें आज भी हिंदी के युवा कथाकारों की रचनाओं में प्रवहमान है ।
    जनप्रियता के कारण हिंदी कहानी की गति को खूब-खूब  उतार-चढाव भी देखने पड़े तथा कथा-आंदोलनों के शोर में विशिष्ट कहानियों के प्रभामंडल का पहचान पाना तक एक मुश्किल कार्य हो गया । कहीं अनुभूत यथार्थ के चित्रण  का शोर, तो यहीं कल्पनावृत्ति को तिलांजलि देने की जिद । ऐसे में कहानी की रचनाशीलता को समग्रता में हानि पहुंची। मगर इस गुलगपाड़े के बीच जो अच्छी कहानियाँ लिखी गई, वे ही अंतत: हमारी कथा-धरोहर भी बनती गई हैं।
    प्रस्तुत संकलन से संपादकद्वय ने हिंदी की ऐसी श्रेष्ठ कहानियों को प्रस्तुत किया है जो अपने पाठ के माध्यम से हमें लौकिक बनाती हैं तथा हमारे सामाजिक संज्ञान और सरोकारों को, समय की कसौटी पर कुशलता से स्थापित और उद्वेलित करती हैं। व्यक्ति भले ही न रहे, मगर पात्र का चित्रण उस व्यक्ति का शाश्चता सौंप सके-ऐसी क्षमता जिन कहानियों में समाहित है-उन्हें ही प्रस्तुत संग्रह में संकलित किया गया है । प्रेमचंद, जयशंकर पसार तथा विष्णु प्रभाकर आदि वरिष्ट कथाकारों की कालजयी कहानियों के साथ-साथ, अन्य सुप्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ भी पाठक एवं साहित्य के छात्र इस एक ही जिल्द से पढ़कर लाभान्वित होंगे, इसी आशमा और अपेक्षा के साथ यह संग्रह आपको सौंपा जा रहा है ।
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    190 171

    Item Code: #KGP-549

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।
    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।
    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
  • Kashmir : Raat Ke Baad (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    80

    Item Code: #KGP-7027

    Availability: In stock

    कश्मीर : रात के बाद
    हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर का कश्मीर से पुराना और गहरा लगाव रहा है । 'कश्मीर : रात के बाद' में लेखक के इस पुराने और गहरे कश्मीरी लगाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । एक गल्पकार की नक्काशी, एक पत्रकार की निर्भीकता, एक चेतस इतिहास-द्रष्टा की पैनी नज़र तथा इन सबके मूल में जन सामान्य से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों से लैस यह यात्रा-वृत्तांत लेखक कमलेश्वर का एक और अप्रतिम योगदान है ।
    'कशमीर : रात के बाद' संभवत: हिंदी में पहला ऐसा मानक प्रयास भी है जो कैमरा और कलम को एक साथ इस अंदाज़ से प्रस्तुत करता है ताकि दोनों की अस्मिता पूर्णतः मुक्त भी रहे । शायद इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा-रिपोर्ताज में कश्मीर के बर्फीले तूफानों और चट्टानों के खिसकी का शाब्दिक 'रोमांच' मात्र नहीं है बल्कि यहाँ है-इतिहास और धर्म (युद्ध) को अपनी एकल परिभाषा देने के मंसूबों को तर्क  और विवेक के बल पर ध्वस्त कर सको की सहमतिजन्य प्रतिभा । कशमीर की राजनीति में, बल्कि कहे कि अराजक 'अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिज्' में यह लेखक मात्र पत्रकार का तटस्थ और निष्फल बाना धारण करके प्रवेश नहीं करता बल्कि वह एक ऐसे सच्चे और खरे इंसान के रूप में हस्तक्षेप करता है जो भारतीयता को जानता है और कश्मीरियत को पहचानता है । वह प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य-पाशा में बँधा, प्रकृति के अप्रत्याशित रौद्र रूप को, जान की बाजी लगाकर देखता है, तो वह आतंकवादियों के विष-की ठिकानों को भी अपने कलम और कैमरे के माध्यम से उदघाटित करता है । वास्तव में यही साहस इस यात्रा-वृतांत को अविस्मरणीयता सौंपता है ।
    इस पुस्तक में कश्मीर की कुछ खंडित यात्राएँ भी हैं जिनमें जन सामान्य के प्रति लेखक की प्रतिबद्धता को शब्द-दर-शब्द पढ़ा  और महसूस किया जा सकता है । परवर्ती यात्रा के रूप में कमलेश्वर ने सुलगते कश्मीर की उस झुलसन को शब्द दिए है, जिसे तमाम तकनीकी विकास के बाबजूद कैमरा पकड नहीं पाता । यह किताब मुद्रित शब्द और कैमरे के आधुनिक युग की सामर्थ्य  और सीमा का भी संभवत: अनुपम दस्तावेज साबित होगी ।
  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190 171

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • Path Ke Daavedaar (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    160

    Item Code: #KGP-157

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
    Mohan Rakesh
    200 180

    Item Code: #KGP-770

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मोहन राकेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमाएँ', 'मलबे का मालिक', 'उसकी रोटी’, 'अपरिचित', ‘क्लेम', 'आर्दा', 'रोज़गार', 'सुहागिनें', 'गुनाह बेलज्जत' तथा 'एक ठहरा हुआ चाकू' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मोहन राकेश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Yugdhvani
    Bal Swaroop Raahi
    250 225

    Item Code: #KGP-807

    Availability: In stock

    लोकप्रियता की युगधवनि
    बालस्वरूप राही की ये कविताएं उस यादगार दौर की कविताए हैं, जब कविता के पाठक तथा श्रोता रसज्ञ तथा संवेदनशील हुआ करते थे और युवक-युवतियों में विशेष रूप से कविता के प्रति गहरा लगाव होता था। इन कविताओं को पढ़-पढ़ कर प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे कविता-प्रेम भी पुन: युवा को जाया करते थे। आज को लगभग पांच दशक पहले भी राही की रुबाइयों, ग़ज़लों, गीतों तथा लम्बी कविताओं में यही खूबी थी। इन पंक्तियों के लेखक ने वह ज़माना देखा है, जब मंच से सुनाए जाने पर ये कविताएं श्रोताओं के मन-प्राण पर अंकित हो जाया करती थीं और उन की डायरियों में दर्ज हो जाती थीं। घनघोर रूप से पसन्द की जाने वाली उन की अनेक कविताएं देश- भर में काव्य-प्रेमियों को कंठस्थ है ।
    प्रसन्नता की बात है कि राही की ऐसी विविध आयामी परम लोकप्रिय कविताएं, जो अब तक उन के किसी संकलन में नहीं आई थीं और कविता-प्रेमियों  द्वारा जिन के प्रकाशन की मांग निरन्तर की जा रही थी, अब पुस्तकाकार प्रकाशित हो रही हैं।
    देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओँ में एक के बाद एक प्रकाशित होने वाली ये अविस्मरणीय कविताएं न केवल राही की लम्बी सार्थक काव्य-यात्रा में मील के पत्थर के समान हैं, वरन् पिछले पांच दशकों में हिन्दी-कविता के बदलते रूप-रंग तथा मिजाज़ की भी पुख्ता पहचान कराती हैं।
    राही का यह अनूठा काव्य-संकलन 'युगध्वनि' हिन्दी कविता की लोकप्रियता के इतिहास को समझने के इच्छाओं तथा काव्य-प्रेमियों के लिए सचमुच एक तोहफे के समान है।
  • Raastrakavi Maithili Sharan Gupta Aur Saaket
    Prof. Surya Prasad Dixit
    300 270

    Item Code: #KGP-9136

    Availability: In stock

    राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और साकेत 
    राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का काव्य परिमाण तथा स्तर, दोनों दृष्टियों से महत् है और अद्यावधि प्रासंगिक भी । गुप्त जी ने पारंपरिक वस्तु-शिल्प का नवीकरण किया, ख़डीबोली को काव्योपम बनाया, पुराख्यानों को आधुनिकता-बोध से जोड़ा और कविता को जन-संवाद की दिशा में मोडा । उन्होंने वाचिक परंपरा का पुनरारंभ करके स्वातंत्र्य-समर की कालावधि में एक विशिष्ट कोटि का जन-प्रबोधन किया । उनका जैसा विशद रचना-संसार किसी अन्य आधुनिक कवि का नहीं है ।
    'साकेत' गुप्त जी की सर्वोच्च सिद्धि है। उसके समतुल्य प्रबंधपदुता, कथ्य-कौशल और भाव-संपदा बहुत कम महाकाव्यों में प्राप्य है ।
    'साकेत' पर अनेक समीक्षाएं प्रकाशित हुई है, किन्तु उसके मूल प्रतिपाद्य को अब तक परखा-पहचाना नहीँ जा सका था । इस ग्रंथ के प्रणेता प्रो० दीक्षित की स्थापना है कि यह एक अंचल विशेष (साकेत) को नायक-पद पर प्रतिष्ठित कर रचा गया महाकाव्य है, जिसे आंचलिक प्रबंध की संज्ञा दी जा सकती है । 'साकेत' एक ओर रामोपासकों का दिव्या धाम है और दूसरी ओर राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना, पुरातत्त्व एवं उच्च उदात्त भारतीय आदर्शों से अभिमपिडत पुण्यभूमि भी, अत: वैष्णव भक्त, साथ ही राष्ट्रकवि गुप्त जी की पूर्ण तदात्म परिणति इसमें फलित हुई है ।
    यह समीक्षा जितनी मौलिक है, उतनी ही परीक्षोपयोगी भी। इसे अपने जीवनकाल में स्वयं राष्ट्रकवि ने भावविभोर होकर सराहा था । वस्तुत: सूक्ष्म, सुविचारित, संयत कृति समीक्षा है यह ।
  • Unke Hastakshar
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2029

    Availability: In stock

    उनके हस्ताक्षर
    ० एक लम्बा रास्ता गुजर गया, जब एक उपन्यास लिखा था, डॉक्टर देव । अब चालीस साल के बाद जब मैंने उसे फिर से देखा, लगा-उसका  हिन्दी अनुवाद अच्छा नहीं हुआ है । मन में आया, अगर उसका अनुवाद मैं अब स्वयं करूँ, तो उसकी रगों में कुछ धड़कने लगेगा और यही जब करने लगी, तो बहुत कुछ बदल गया ।
    ० इसी तरह एक मुद्दत हो गई, एक उपन्यास लिखा था…'घोंसला' । प्रकाशित हुआ तो बाद में किफायती संस्करण 'नीना' नाम से चलता रहा । आज उसे देखकर लगा कि वह उस कदर पुख्ता नहीं हो पाया था, जो होना चाहिए था । और उसी को अब फिर से लिखा है, जिससे वह सघन भी हो पाया है और पुख्ता भी ।
    ० इसी तरह कभी एक कहानी लिखी थी ‘पाँच बहनें-और उस कहानी को लेकर जब किसी ने फिल्म बनाने की बात की, तो मैंने कहानी को फिर से देखा । अहसास हुआ कि इस जमीन पर जो कहा जा सकता था, वह कहानी में नहीं उतर पाया था। यह अहसास कुछ इस तरह मेरा पीछा करने लगा कि एक दिन मुझे पकड़कर बैठ गया । कुछ और मसले भी थे, जो कहानी में नहीं आ पाए थे । और उन सबको लेकर पाँच की जगह सात श्रेणियों के किरदार सामने रखे और उन सबको कागज़ पर उतार दिया । अब उसे नाम दिया है-उनके हस्ताक्षर' ।
    -अमृता प्रीतम
  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Sense And Sensibility (Novel)
    Jane Austen
    495 446

    Item Code: #KGP-362

    Availability: In stock

    Sense and Sensibility, published in 1811, was Jane Austen's first published novel, which she wrote under the pseudonym "A Lady".
    The story is about Elinor and Marianne, two daughters of Mr Dashwood by his second wife. They have a younger sister, Margaret, and an older half-brother named John. When their father dies, the family estate passes to John, and the Dashwood women are left in reduced circumstances. The novel follows the Dashwood sisters to their new home, a cottage on a distant relative's property, where they experience both romance and heartbreak. The contrast between the sisters' characters is eventually resolved as they each find love and lasting happiness. Through the events in the novel, Elinor and Marianne encounter the sense and sensibility of life and  love.
  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और