Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar

Ramdhari Singh Diwakar

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  • Year: 2016

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170166177

दस प्रतिनिधि कहानियां
रामधारी सिंह दिवाकर

रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिछड़ेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न होता है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भी दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।

हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।

रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार', 'खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानी', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पुल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।

किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।

Ramdhari Singh Diwakar

रामधारी सिंह दिवाकर
बिहार के गॉव नरपतगंज (जिला अररिया) में 1 जनवरी, 1945 को एक निम्न-मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्म ।
आरंभिक शिक्षा गांव के स्कूलों और महाविद्यालयी शिक्षा फारबिसगंज और मुजफ्फरपुर में। भागलपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० हिंदी ।
'जैनेंद्र की भाषा' शोध-प्रबंध पर भागलपुर विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० की उपाधि ।
1967 से महाविद्यालयों में अध्यापन-कार्य । मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग  में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष ।  प्रतिनियुक्ति पर 1997 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना के निदेशक-पद पर कार्यरत ।
पहली कहानी 'नई कहानियाँ' के जून, 1971 के अंक में प्रकाशित । तब से अनवरत लेखन । हिन्दी की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक कहानियाँ, उपन्यास आदि प्रकाशित
प्रकाशित कृतियाँ 
कहानी-संग्रह : 'नए गाँव में', 'अलग-अलग अपरिचय', 'बीच से टूटा हुआ', 'नया घर चढे', 'सरहद के पार', 'मखान पोखर', 'माटी-पानी'
उपन्यास : 'क्या घर क्या परदेस', 'काली सुबह का सूरज', 'पंचमी तत्पुरूष', 'आग-पानी प्रकाश', 'टूटते दायरे'
संपादित : कथा भारती, गल्प भारती

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