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423

  • grid
  • Anaam Yatraayen
    Ashok Jairath
    300 270

    Item Code: #KGP-237

    Availability: In stock

    जीवन एक सफर और हमें निरंतर इस सफर में चलते रहना है । जो चलता रहा, वह जीता रहा और जो बैठ गया, सो बैठ गया । अकसर लोग यात्राओं से घबराते है । कई कारण हैं -आर्थिक अभाव साथ की कमी या वैसे ही मन नहीं करता, आलस्य में स्चा-बसा मन बस आराम करना चाहता है । हमारा शरीर 'हड्ड हराम' हैं, वह आराम चाहता है, पर जितना ही इसे माँजा जाए, उतना ही यह निखरता है ।
    हिमालयी श्रृंखलाएं, हिममंडित शिखर व्यक्ति को बार-बार बुलाते हैं । इनके ऊपर गूंजते संगीत के स्वर और लोककाथाएं आत्मविभोर कर देती हैं और इनके अजस्र जलस्रोत जहां नैसर्गिक परिवेश को जन्म देते है, वहीं पर थके हुए मन और शरीर को संबल देते है ।
    लेखक ने पश्चिमी हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र व अनेक हिमानियों के साथ-साथ दूसरे दुर्गम इलाकों की साहसिक यात्राएं की हैं, जिनका विशद विवरण इस पुस्तक के रूप में पाठकों को सौंपा जा रहा है । ये यात्राएं कूमाऊं-गढ़वाल, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय एव सांस्कृतिक क्षेत्रों से ही संबंधित हैं, मात्र द्वारकापुरी की यात्रा को छोड़कर । यात्राओं का निरंतर सिलसिला लेखक के अलमोड़ा में प्रवास के दौरान शुरू हुआ, जब सारे उत्तरांचल के साथ हिमानियों को भी ट्रेक किया गया, जहाँ हिमालियाई संस्कृति को बहुत करीब से देखकर स्वयं लेखक हिमालियाई हो आया था ।
    इन ब्योरों के साथ ही उन सभी साथियों-सहयोगियों और मार्गदर्शक का सीधा-सहज और बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन भी दिया जा रहा है, जो इन संस्मरणों को और भी मनोरंजक और दिलचस्प बना देता है । आशा है, ये सभी संस्मरण/यात्राओं का वर्णन पाठकों को अच्छा लगेगा ।
  • Neeraj Ke Prem Geet (Paperback)
    Gopal Das Neeraj
    70

    Item Code: #KGP-7063

    Availability: In stock

    नीरज के प्रेमगीत
    लड़खड़ाते हो उमर के पांव,
    जब न कोई दे सफ़र में साथ,
    बुझ गए हो राह के चिराग़
    और सब तरफ़ हो काली रात,
    तब जो चुनता है डगर के खार-वह प्यार है ।
    ० 
    प्यार में गुजर गया जो पल वह
    पूरी एक सदी से कम नहीं है,
    जो विदा के क्षण नयन से छलका
    अश्रु वो नदी से कम नहीं है,
    ताज से न यूँ लजाओ
    आओं मेरे पास आओ
    मांग भरूं फूलों से तुम्हारी
    जितने पल हैं प्यार करो 
    हर तरह सिंगार करो,
    जाने कब हो कूच की तैयारी !
    ० 
    कौन श्रृंगार पूरा यहाँ कर सका ?
    सेज जो भी सजी सो अधूरी सजी,
    हार जो भी गुँथा सो अधूरा गुँथा,
    बीना जो भी बजी सो अधूरी बजी,
    हम अधुरे, अधूरा हमारा सृजन,
    पूर्ण तो एक बस प्रेम ही है यहाँ
    काँच से ही न नज़रें मिलाती रहो,
    बिंब का मूक प्रतिबिंब छल जाएगा ।
    [इसी पुस्तक से ]
  • Godhooli
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-669

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Zalzala
    Gulshan Rai Monga
    60 54

    Item Code: #KGP-2057

    Availability: In stock

    एक अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए आदमी को जिन चीजों की तवक्को रहती है मसलन महानगर में अपना निजी फ्लैट, गाड़ी, चलता हुआ व्यवसाय, वह सब उसे हासिल था । संतुष्टि के लिए पर्याप्त प्राप्य। 
    भीतर यह जो आत्मा है इतने पर संतोष कर ले यह आवश्यक नहीं है । उसकी अपनी इच्छाएं, वृत्तियां, संस्कार और जरूरतें हैं जिन्हें 'सप्रैस' करने में कोई औचित्य नहीं है । ऐसा प्रयास किसी ओर से भी किया जाए तो आत्मा विद्रोह कर देती है और इस विद्रोह की परिणति होती है एक गहरी सोच में । इस जीव-जगत में अपने होने की अर्थवत्ता अर्थात इस संसार में  के मकसद की तलाश। 
    इस दिशा में गजानन की सफलता-असफलता का लेख-जोखा करने की जुर्रत की गयी है । यह चरित्र अपनी तमाम कमियों, कमजोरियों  और कुछ अच्छाइयों के साथ आपके (पाठकों के) निर्णय का मोहताज है जिसे उसके आंतरिक और बाह्य परिवेश में रखते हुए उसके साथ सहानुभूति, नफरत अथवा प्यार करना आप पर निर्भर करता है । 
  • Guftgoo : Sarhadon Ke Aar-Paar
    300 270

    Item Code: #KGP-2063

    Availability: In stock

    गुफ्तगू : सरहदों के आर-पार
    प्रेमकुमार की यह पुस्तक अपनी भिन्न विशिष्ट पद्धति और अभिव्यक्ति वाले साक्षात्कारों के माध्यम से पांच देशों के सात स्थापित-सुविख्यात साहित्यजीवियों की जिंदगी और लेखन के अनेक अनसुने-अनजाने प्रसंगों-हिस्सों से सहज-दिलचस्प ढंग से पाठक का परिचय कराती है। पांच देश-भारत, आस्ट्रिया, ईरान, पाकिस्तान और अमेरिका।  सात साहित्यजीवी--नैयर राही, आंद्रेयास वेबर, अली मुहम्मद मुअज्जनी, सलीमा हाशमी, अहमद फराज, इंतिजार हुसेन और मुनीबुरर्हमान। 
    इन बातचीतों के माध्यम से रचनाकारों के परिवेश, लेखन और लेखन-प्रक्रिया के बारे में तो आसानी और सहजता के साथ जाना-समझा जा ही सकेगा, भिन्न-भिन्न देशों व भाषाओं के पारस्परिक संबंधों, उनके बीच की सामाजिक-सांस्कृतिक समानताओँ-असमानताओँ, समस्याओं-संभावनाओं आदि को भी समझने-सुलझाने या विवेचित-विश्लेषित करने में मदद भी मिलेगी। तमाम तरह की बाडों-सीमाओं को लांघ-पारकर कोई सृजन या अभिव्यक्ति कैसे यहां-वहां सब कहीं स्वीकृत- समादृत हो पाते हैं-ऐसे कुछ सूत्रों-प्रश्नों के मूल और हल भी इन संवादों में ढूंढे-तलाशे जा सकते हैं ।
    अत्यंत अनौपचारिक, आत्मीय और विश्वासपूर्ण वातावरण में अप्रत्याशित ढंग से संभव-संपन्न हुई इन बातों- मुलाकातों का एक अहम और उल्लेख्य पक्ष यह भी है कि सात में से पांच बातचीतें सीधे-सीधे संबंधित साहित्यकारों से हुई हैं, जबकि दो रचनाकारों के जीवन-लेखन को उनके दो अत्यंत करीबी संबंधों के सोच और दृष्टि से जाना-समझा गया है। राही मासूम रजा की पत्नी नैयर राही ने अपने सर्जक-पति और फैज अहमद 'फैज' की बडी बेटी सलीमा हाशमी ने अपने रचनाकार पिता के जीने-सोचने, लिखने तथा उनके जीवन-मूल्यों, अभावों, संघर्षों आदि के बारे में बातों-बातों में बहुत कुछ समझा-बता देना चाहा है।
    निश्चय ही ये बातचीतें सुधी पाठकों, साहित्यसेवियों एवं शोधार्थियों के लिए पठनीय और उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Brahm Kamal
    Swati Tiwari
    300 270

    Item Code: #KGP-497

    Availability: In stock


  • Dr. Ambedkar : Jivan-Marm
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    280 252

    Item Code: #KGP-7843

    Availability: In stock


  • Aaj Aur Abhee
    Ramesh Chandra Shah
    220 198

    Item Code: #KGP-406

    Availability: In stock

    ...डायरी इतनी अंतरंग होती है कि आप खुद जैसे अपनी आत्मा से बात कर रहे हों। तो इसे छपने के लिए क्यों दे देते हैं। आखिर क्या बात है कि हमें जरूरी लगता है कि यह छपना चाहिए। ...रमेशचन्द्र शाह जी की डायरी के कुछ अंश पढ़ लेने के बाद मुझे लगा कि जो मैं आगे लिखने वाला था, वह अब नहीं लिखूँगा। कारण, कि इतना अंतरंग है यह। सुनिए 5 मार्च, 1982 की डायरी का एक अंश: 
    आड़ू के फूलों की गंध..., नीबू की पत्तियों की गंध,...कालिका मंदिर के पिछवाड़े नारंगी की गंध, लकड़ियों के पूले बाँधते हुए, चिरे हुए रामबाँस की गंध,...किलेखाई के निंगाले की गंध,...हनुमान मंदिर में साधुओं के चिलम की गंध,...चमेली और चरणामृत की गंध,...बाबू की जेब से तंबाकूमिले प्रसाद की गंध,...जाने कितनी और तरह-तरह की गंध...
    मुझे लगता है कि हमारी पूरी जिंदगी और आसपास की जिंदगी की सारी जितनी महकें हो सकती हैं,...उन महकों को...डायरी की अंतरंगता के साथ जब वे आती हैं तो मुझे लगता है कि जैसे हमारा अपना भारत, हमारी अपनी धरती, हमारा अपना घर, हमारा अपना खेत, हमारा अपना मंदिर और हमारे अपने फल एकाएक महकने लगते हैं। कुल दस पंक्तियाँ इतनी गहरी बात कह जाती हैं कि लगता है कि समूची पूरी पहचान ये छोटी-छोटी सी पंक्तियाँ ही दे देती हैं। ...डायरी कभी-कभी वह बात कह जाती है जो बात और कोई नहीं सह सकता। लेकिन डायरी का कागज कहीं न कहीं वह बात सह लेता है और सहने के साथ-साथ आपको बर्दाश्त करने का धीरज भी दे देता है। मुझे लगता है कि यह भी डायरी का एक बहुत बड़ा सार्थक पक्ष है। 
    -कमलेश्वर (समकालीन साहित्य समाचार, जनवरी, 2007)
  • Dharti Ki Satah Par
    Adam Gondvi
    250 225

    Item Code: #KGP-1904

    Availability: In stock

    आज से लगभग दो दशक पहले अदम गोंडवी की कुछ गजलें पढ़ने को मिली थीं । सियासत. लोकतंत्र और व्यवस्था पर चाबुक मारती अदम गोंडवी की गजलों में एक ऐसी खनक सुनाई देती थी, जैसी अस्सी के दौर में धूमिल की कविताओं और दुष्यंत कुमार की गजलों में । गोंडा के एक छोटे से गॉव से ऊपर उठकर अदम का यश भूमंडलव्यापी हो उठा था ।  उन्हें देख यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि खसरा खतौनी में रामनाथ सिंह के नाम से जाना जाने वाला यही शख्स गजल की चेतना में चिन्गारियाँ पैदा करने वाला अदम गोंडवी है । उनकी मकबूलियत का आलम यह कि सियासत से लेकर अदब से ताल्लुक रखने वालों तक की जबान पर उनके शेर विराजते रहे हैं । गजल की परंपरा ने दुष्यंत कुमार की गजले एक मोड मानी जाती हैं तो अदम कीं गजलें एक दूसरा मोड अख्तियार करती हैं जिसमें एक साथ वे स्थानीयता से लेकर बाजारवाद और भूमंडलीकरण तक से जिरह करते हैं । धरती की सतह पर' का परिवर्धित संस्करण गज़लों में उनकी अलहदा शख्सियत की गवाही देता है ।
    महज प्राइमरी तक की तालीम हासिल करने वाले अदम गोंडवी का बुनियादी काम यो तो खेती-किसानी रहा है किन्तु इस काश्तकार ने गजल की भी एक इन्कलाबी फसल बोई है, जिसके चाहने वाले पूरे देश में फैले हैं । दशकों पहले से उनकी गजल के इस इन्कलाबी मिसरे- 'काजू भुने हैं प्लेट में व्हिस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में'--ने अचानक उन्हें अदबी इलाके में चर्चा में ला दिया था । मंच पर आग उगलने वाली गजलों को सुन उसी लोग पूछते थे, यह किसानी लिबास वाला शख्स कौन है? चेहरे-मोहरे और पहनावे से लगभग धूमिल की याद दिलाने वाले अदम के चेहरे पर एक किसान की खुद्दारी दिखती थी ता गजलों में आज़ादी के बाद मुल्क का लुता-पिटा नक्शा साफ नजर आता था ।  अदम अभावों की धूसर दुनिया से बावस्ता ऐसे नागरिक थे जिन्हें देखकर आप यह मान ही नहीं सकते थे कि वे ही हमारे समय के अविस्मरणीय कवि अदम हैं ।
    -ओम निश्चल
  • Doobte Waqt (Paperback)
    Dixit Dankauri
    75

    Item Code: #KGP-7053

    Availability: In stock

    पिछले तीन-चार दशकों से देश में 'हिन्दी गजल'–'उर्दू ग़ज़ल'  की एक बहस सी चल रही है। श्री दीक्षित दनकौरी ने इस बहस को निरर्थक सिद्ध कर दिया है। गजल अपने मिजाज और विशिष्ट कहन के कारण ग़ज़ल होती है, न कि उसमें प्रयुक्त शब्दों प्रतीकों के आधार पर । और वैसे भी आज देश में हिन्दी-उर्दू परम्परा की साझा ज़बान ही प्रचलित है । अत: आम जबान में आम आदमी की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति करने वाले अशआर ही पाठकों/श्रोताओं पर अपना असर छोडते है ।
    एक कष्टदायक तथ्य यह भी है कि भारत की आजादी के बाद से ही कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा हिन्दी और उर्दू को मजहब के नाम पर बांटने की फुत्सित चाल चली जा रही है और दुर्भाग्य से इसमें उन्हें आंशिक सफलता भी मिल रही है । आज संसार की कोई भाषा सिर्फ अपने शब्द भंडार तक ही सीमित नहीं है । ग्लोबलाइजेशन के इस युग में जहाँ पूरी दुनिया एक गांव भर होकर रह गई है, एक-दूसरे के शब्दों को अपनी भाषा में आत्मसात किए बगैर भला कैसे काम चलेगा ।
    -मोईन अख्तर अंसारी
  • Kucch Yaaden Bachpan Ki
    Ramdarash Mishra
    100 90

    Item Code: #KGP-9238

    Availability: In stock

    ये कहानियां बच्चों के लिए भी हैं और किशोरांे के लिए भी। अपनी जीवन-यात्रा में आए हुए कुछ मार्मिक प्रसंगों से मेंने ये कहानियां रची हैं। सभी के पात्र मनुष्य हैं। हां, दो कहानियां ऐसी हैं, जो शुद्ध काल्पनिक हैं और जिनके पात्र पशु हैं। मैंने चाहा है कि इन कहानियों से बच्चों का मनोरंजन तो हो ही, वे अपने वय की कुछ समस्याओं से रूबरू हों और उन्हें अच्छे जीवन-व्यवहार की सीख मिले।
    —रामदरश मिश्र
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    120

    Item Code: #KGP-7215

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Prem Anant
    Kamlesh Pandey
    450 405

    Item Code: #KGP-1962

    Availability: In stock

    प्रेम अनंत
    ०  लेखक-पात्र-पाठक को समक्ष रखकर एक त्रिभंगिमा बननी है इस तिहरे उपन्यास में।
    ०  एक नायक के जीवन में तीन नायिकाएँ विभिन्न नाम-काम-धाम-रूपों में देखी-पहचानी जाएं, किंतु वस्तु-केंद्र  में ये एक ही देह के तीन मन हो जाते हैं और एक ही मन की तीन देहें भी । प्रेम इन तीनों के प्रति अनंत पुरुष में प्राणतत्त्व-सा व्याप्त है ।
    ०  'सिन्धु' सागर की तरह उन्मुक्त और लावण्यमय है तो 'रीति' भीतर से रीती-रीती महसूस करती है, जबकि 'रुचि' ? वह पसंद से जुडी है तो बेरुखी से भी। इन तीन तरह के स्त्री-पात्रों का निमित्त बना हुआ 'अनंत' कथा-लेखक है, जो अपने तौर पर द्विधाभाव में रहना-जीना चाहता है, किंतु उसे मात्र लेखक के खोल से विद्यमान अपनी कमजोरियों के साथ जुड़े मनुष्य के तौर से अनपेक्षित मान लिया जाता है ।
    ०  लेखक को स्रष्टा-सा अकेला क्यों मान लिया जाता है ?
    ० यदि हर स्त्री-पात्र पुरुष-लेखक से अथवा इससे उलट पुरुष-पात्र स्त्री-लेखिका से अपेक्षा रखे कि वह स्रष्टा होने तक सीमित रहे, अपनी ऐन्द्रिय इच्छाओं को न परोसे, पात्रों की निजी जिंदगी में न प्रवेश करे, खुद को न प्रस्तावित करे, तो रचना प्रेमिल और प्रभावी कैसे हो पाएगी ?
    ० लेखक में ही तो आकांक्षाएँ-अपेक्षाएँ या सपने लिए हुए अनर्गल पात्र प्रादुर्भुत होते है, प्रतिरूपित होते हैं, खलबली करते है । एक तरह से स्रष्टा लेखक के भीतर अनंन पात्रों के जीवाणु सक्रिय होते रहते हैं ।
    ० 'ऐकोहम बहु स्याम'---ऐसे नहीं चाहा होगा आदि अकेले स्रष्टा ने । स्रष्टा -रचयिता-लेखक-कलाकार-रंगकर्मी जैसी सभी विभूतियाँ एक ही रूप के सहस्त्र नाम है ।
    ०  ढाई आखर प्रेम के पढ़ै सौ पंडित होय !' यहाँ नायक अनंत कितने पांडित्य में है यह जाँच इस उपन्यास को पढ़कर सामने आएगी-फलित होगी ।

  • Jaane-Anjaane Dukh
    Ashwani Kumar Dubey
    330 297

    Item Code: #KGP-484

    Availability: In stock

    अश्विनीकुमार दुबे का उपन्यास ‘जाने-अनजाने दुःख’ एक मध्यवर्गीय परिवार के मुख्य चरित्र जगदीश प्रसाद तथा उनके परिवार की अंतर्कथा  है। एक निम्न मध्यवर्गीय डाक कर्मचारी एवं कृषक के पुत्र जगदीश प्रसाद के जन्म, शिक्षा, शादी-ब्याह, काॅलेज शिक्षक से वाइस चांसलर बनने, इस बीच पुत्र-पुत्रियों के जन्म, उनके शादी-ब्याह और विकास के दौरान 70 वर्ष की अवस्था में उनके सेवानिवृत्त होकर अपने पुश्तैनी गांव पहुंचने की कथा को पूरी विश्वसनीयता एवं सशक्तता के साथ अश्विनीकुमार दुबे ने प्रस्तुत किया है।
    इस उपन्यास के माध्यम से अश्विनीकुमार दुबे ने जगदीश प्रसाद और उनकी पत्नी सुमन के चरित्र को आमने-सामने रखते हुए सुख-दुःख के प्रति उनकी अनुभूतियों की कलात्मक अभिव्यंजना की है।
    इस उपन्यास में अश्विनीकुमार दुबे की भाषा की पठनीयता और किस्सागोई ने इसे महत्त्वपूर्ण बनाया है। विश्वास है, हिंदी जगत् में इसका स्वागत होगा।
  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Asghar Wajahat Ke Aath Naatak
    Asghar Wajahat
    450 405

    Item Code: #KGP-9001

    Availability: In stock


  • Benaras : A Journey Within (Memoirs)
    Roli Jindal
    295 266

    Item Code: #KGP-345

    Availability: In stock

    Benaras – A city so beautiful, even the Ganges changed course and flowed north to be able to swing by it. Lord Shiva located this beautiful city on the tips of his trident, and came here to live the life of a householder with his wife. He is in the very spirit and very soul of the city. With Moksha promised to those that die here, Benarasis, it is said, want to make the most of their last life on earth. Eat, drink and be merry, for never again shall you live. Amazingly, in this day and age, a lot of those ‘eats’ and ‘drinks’ have still not travelled out of the city. With unique flavours, a distinct gharana of classical music, deep-rooted traditions of dance, a spectacular riverfront, a world-renowned seat of learning, a tolerant social fabric as rich as the luxurious saree, and the fabled Benarasi banter, life in Benaras is not the same as everywhere else.
    What is it like to live here? With local insight, Roli Jindal takes you beyond the tourist guides deep inside the heart of Benaras and shows you how this bustling, crowded city retains its spiritual core and its unique culture, while staying perfectly in sync with modern times. This is a personal, insider view of what life is like in this very interesting city.

  • Aadhunik Hindi Kavita_225
    Dr. Hardyal
    225 203

    Item Code: #KGP-888

    Availability: In stock

    आधुनिक हिंदी कविता अनेक दृष्टियों से विशिष्ट कविता है। उसकी विशिष्टता इस बात में है कि उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति से संबंधित इतनी विविधता है जितनी आधुनिक काल से पहले की किसी भी काल की कविता में नहीं रही। उसकी इस विविधता में अंतःसलिला के रूप में ऐसी एकरूपता भी है जो उसे एक स्वतंत्र इकाई बनाती है। उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों को विशिष्टता और उसकी समग्र एकरूपता को पकड़ने और रेखांकित करने के अनेक प्रयत्न विभिन्न विद्वानों ने किए हैं। उन्हीं प्रयत्नों की शृंखला में एक प्रयत्न यह पुस्तक है। ‘इस पुस्तक की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें भारतेन्दु-युग से लेकर नवें दशक तक की हिंदी कविता की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों की क्रमिक चर्चा है। इस कारण कोई चाहे तो इसे आधुनिक हिंदी कविता का प्रवृत्यात्मक इतिहास भी कह सकता है।’ पाठकों को इस पुस्तक में हिंदी के सुख्यात आलोचक डाॅ. हरदयाल की स्पष्ट और निभ्र्रान्त शैली में आधुनिक हिंदी कविता का तटस्थ विवेचन और निष्पक्ष मूल्यांकन मिलेगा। हमारा विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों की बहुत-सी जिज्ञासाओं को शांत करेगी और उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के संबंध में नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित करेगी।
  • Aadhunik Nibandh
    Shyam Chandra Kapoor
    350 315

    Item Code: #KGP-741

    Availability: In stock


  • Kuchh Kharaa Kuchh Khotaa
    Raj Budhiraja
    100

    Item Code: #KGP-1877

    Availability: In stock

    सुविख्यात शिक्षाविद एवं साहित्यकार राज बुद्धिराजा की नवीन कृति है यह । दूटते-बिखरते अत्याधुनिक भारतीय समाज ने जिस प्राचीन संस्कृति की लुटिया को कुएँ में ला डुबोया है, उसे लेखिका ने अपने मन के रहट में भरा है और फिर जल-रूप प्रदान किया है । लेखिका के मन में अपार पीडा है जो उनकी कलम पर धीरे-धीरे उतरकर, कोरे कागजों पर आबदार मोती-रूप बन जाती है । लेखिका की सूक्ष्म-पैनी दृष्टि से छोटी से छोटी बात बच नहीं पाती और वह कलम के हथौड़े से पूरे समाज पर लगातार प्रहार करती चली जाती है और उसके पास हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । लेखनी कभी धर्म की बात करती है, कभी दर्शन-अध्यात्म की, कभी बिखरती मानवीय संवेदना की और कभी जंग खाए रिश्तों की ।
    लगता है कि उनके दिल की गहराई पाठकों पर अमिट छाप छोड़ती है और उनकी आँखें झरने-सी झरने लगती हैँ । ढेर सारे अनुत्तरित प्रश्न सामने आ खड़े होते हैं । इन संस्मरणों का अंत प्रश्नचिह्नों से होता है । ये सभी संस्मरण लेखिका के एकाकीपन के गवाह हैं । लेखन की अंतहीन राह पर चलते-चलते कभी-कभी उन्हें एकाकीपन का अहसास होता है और वे एक बूँद प्यार के लिए तरसती रह जाती हैं । उन्हें अपनेपन की तलाश रहती है । कभी विदेशी मित्र, कभी बाल सखी, कभी युवा मित्र और कभी अनजाने रिश्तों में वे बहुत कुछ ढूँढ़ने का प्रयास करती है और उन्हें यदि एक पल के लिए कुछ मिलता है तो वे उस सुखद पल को अपनों में बाँट देती हैं । यही उनके लेखन की सफलता है, खासकर जब पाठक उनके सुर में सुर मिलाकर झूमते-झामते वृक्षों की तरह झूमने लगता है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rajendra Rao (Paperback)
    Rajendra Rao
    150

    Item Code: #KGP-503

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : राजेन्द्र राव
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार राजेन्द्र राव ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उत्तराधिकार', 'लोकी का तेल', 'अमर नहीं यह प्यार', 'वैदिक हिंसा', 'बाकी इतिहास', 'घुसपेट','छिन्नमस्ता' 'असत्य के प्रयोग', 'शिफ्ट' तथा 'नौसिखिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक राजेन्द्र राव की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kashi Nath Singh
    Kashi Nath Singh
    300 255

    Item Code: #KGP-553

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार काशीनाथ सिंह  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कविता की नई तारीख', 'अपना रास्ता लो बाबा', 'जंगलजातकम', 'माननिय होम मनिस्टर के नाम', 'वे तीन घर', 'मुसइ चा', 'सदी का सबसे का आदमी', 'लाल किले के बाज', 'सुधीर घोषाल' तथा 'कहानी सरायमोहन की'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक काशीनाथ सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha (Paperback)
    Vijaydan Detha
    90

    Item Code: #KGP-7012

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : विजयदान देथा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार विजयदान देथा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'लजवन्ती', 'दूजौ कबीर', 'फितरती चोर', 'बडा कौन', 'दूरि, 'सिकन्दर और कौआ', 'राजीनामा', रैनादे का रूसना', 'अनेकों हिटलर' तथा 'हाथी-कांड' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक विजयदान देथा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Krishan Baldev Vaid
    Krishna Baldev Vaid
    70 63

    Item Code: #KGP-9056

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ekant Shrivastava (Paperback)
    Ekant Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7021

    Availability: In stock

    एकान्त वस्तुतः छत्तीसगढ़ की ‘कन्हार’ के कवि हैं। एकान्त का काव्य-संसार एक ओर माँ-बाप, भाई-बहन का भरा-पूरा परिवार है तो दूसरी ओर अंधी लड़की, अपाहिज और बधिर जैसे असहाय लोगों का शरण्य भी और ‘कन्हार’ जैसी लंबी कविता तो एक तरह से नख-दर्पण में आज के भारत का छाया-चित्र ही है। ‘अन्न हैं मेरे शब्द’ से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले एकान्त उन थोड़े से कवियों में हैं जो ‘शब्द’ को अपनी कविताओं से एक नया अर्थ दे रहे हैं। निश्चय ही एकान्त का काव्य एक लंबी छलाँग है और ऊँची उड़ान भी--कवि के ही शब्दों में एक भयानक शून्य की भरपाई। ---नामवर सिंह
    काली मिट्टी से कपास की तरह उगने की आकांक्षा से उद्वेलित यह कवि अपनी हर अगली कविता में मानो पाठक को आश्वस्त करता है कि वह अपने भाव-लोक में चाहे जितनी भी दूर चला जाए, अंततः लौटकर वहीं आएगा जो उसके अनुभव की तपी हुई काली मिट्टी है। यह एक ऐसी दुनिया है जो एक किसानी परिवेश के चमकते हुए बिंबों और स्मृतियों से भरी है। एक अच्छी बात यह कि गहरे अर्थ में पर्यावरण-सजग इस कवि के पास एक ऐसी देखती-सुनती, छूती और चखती हुई भाषा है, जो पाठक की संवेदना से सीध संलाप करती है।   ---केदारनाथ सिंह
    एकान्त की कविता और कवि-कर्म की खूबी है कि उन्होंने अपने को औपनिवेशिक आधुनिकता के पश्चिमी कुप्रभाव से बचाया है। यही कारण है कि उनकी कविता कलावादी और रूपवादी प्रभाव से मुक्त है। ऐसा इसलिए कि एकान्त अपने जनपद, अपनी जड़ों और अपनी ज़मीन को कभी नहीं छोड़ते। उनकी कविता हमें भारतीय समृद्ध काव्य-परंपरा की याद दिलाती है जो आज की अधिकांश कविता से विलुप्तप्राय है। एकान्त, निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा के सशक्त कवि हैं। एकान्त की कविता में कोई ठहराव नहीं है। वे आज भी नित नवीन और सारगर्भित कविताएँ बिना किसी विचलन या दोहराव के रच रहे हैं। क्योंकि उनका गहरा रिश्ता भारतीय लोक और जनमानस से बना हुआ है। सही अर्थों में वे लोकधर्मी कवि हैं। ‘नागकेसर का देश यह’ हिंदी में एकान्त की सर्वाधिक लंबी कविता है जिसके कई अर्थ-ध्वनिस्तर हैं और बड़ी संश्लिष्टता है।      ---विजेन्द्र
  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain
    Kunwar Narayan
    190 171

    Item Code: #KGP-444

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।
  • Haasya Vyangya Ke Vividh Rang
    Barsane Lal Chaturvedi
    160 144

    Item Code: #KGP-1808

    Availability: In stock

    बरसानेलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पुस्तक "हास्य-व्यंग्य के विविध रंग"
    हास्यरस प्रधान कविताएं सैकड़ों वर्षों से लिखी जा रही हैं । आजकल हास्य-कवि सम्मेलन सर्वाधिक लोकप्रिय हैं । आज का मनुष्य इसी के अभाव में जीता है । वह इतना व्यस्त तथा त्रस्त है कि उसके पास हँसने का समय ही नहीं है ।
    हास्यरस के कवियों ने जहाँ विकृति देखी है उसी को लक्ष्य बनाकर कविता रच डाली है । तुलसीदास हो या सूरदास, बिहारी हों या  अलीमुहीब खाँ 'प्रीतम'—हास्यरस की कविताएं सभी न लिखी हैं । किसी ने दुष्टों पर लिखा है तो किसी ने कंजूसों पर, किसी ने भ्रष्ट नेताओं को अपना शिकार बनाया है तो किसी ने दलबदल की प्रवृति को अपना लक्ष्य बनाया है । भ्रष्टाचारी अफसर, मुनाफाखोर  व्यापारी, रिश्वत, मिलावट, तस्करी, कुर्सीमोह- कहने का तात्पर्य ये है कि हास्यकवियों की निगाह से कोई बच नहीं पाया ।
    यह संकलन उन व्यक्तियों तथा प्रवृतियों का सिलसिलेवार 'एलबम' है जो हास्यरस के कवियों की चपेट में आए हैं और जिनकी पोल समय- समय पर खोली गई हैं। यह आलम्बन कोश इन्हें असंगतियों पर व्यंग्यबाण चलाने वाली हास्य-व्यंग्य की कविताओं का प्रथम संग्रह हैं, जो मनोरंजन के साथ-साथ हास्य-काव्य का इतिहास भी प्रस्तुत करता है ।
  • Agyaat Ka Nimantran
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-1973

    Availability: In stock

    अज्ञात का निमंत्रण 

    यह कौन-सी रात है
    जो मुझे दावत देने आई है
    आर सितारों के चावल फटककर
    यह टेग किसने राँधी है... 

    आज यह चाँद की सुराही-
    कौन आया है!
    कि इस चाँदनी को पीकर
    आसमान बौरा गया है... 

    जाने खुदा वह कौन-सो रात होती है
    जो किसी सपने का मस्तक चूम लेती है
    और फिर ख़यालों के पैरों में
    एक पायल., बजने लगती है... 

    प्रेम भी ईश्वर की तरह अज्ञात का नाम है
    उसकी बात जितनी भर--
    किसी संकेत में उतरती है
    वही संकेत इस पुस्तक के अक्षरों में है...
  • Repartee (Paperback)
    Khushwant Singh
    225

    Item Code: #KGP-328

    Availability: In stock

    KHUSHWANT SINGH, India's iconic journalist and writer, whose works secured largest readership in the country, remains an enigma beyond his writings. His immense popularity and connectivity with his readers made him the common man's idol but his real persona remained in wraps. The 'dirty old man' ensconced in a bulb with a wicked grin and a fountain pen in hand was a far cry in real life.
    This collection of interviews and articles attempts to bring to light the real Khushwant as his family and close friends knew him. 
    A man who was constantly surrounded by beautiful women but remained faithfully wedded to his wife Kaval for 62 years  till she passed away, a man who wrote about wine, women and sex, but lived a life more simple and austere than a commoner, a man who was more disciplined in his fitness regime than men even half his age, a person  who wrote more books, articles and columns than any other journalist or writer in this country, and in a language, so simple that the common reader could comprehend. 
    Little do his readers know that the man famous for his jokes, his love for wine and women and his fierce agnosticism, was a great scholar in real life who wrote classics like A History of the Sikhs, taught comparative religion at Princeton University, was a passionate nature lover who wrote books like Nature Watch, was an art critic and had dabbled in sitar and painting at Shantiniketan in his youth.
    Khushwant Singh voiced his opinions openly and spoke his mind fearlessly through his column's for which he was honoured in 1998, with 'Honest Man of the Year Award and later in 2007 with Padma Vibhushan award.
    He remained reticent about his personal life while he lived. It is about time his loyal fans knew who the real Khushwant was.
  • Yogiraj Shri Krishna
    Lala Lajpat Rai
    250 225

    Item Code: #KGP-101

    Availability: In stock

    योगिराज श्रीकृष्ण
    परवर्ती काल में कृष्ण के उदात्त तथा आर्योचित चरित्र को समझने में चाहे लोगों ने अनेक भूलें ही क्यों न की हों, उनके समकालीन तथा अत्यन्त आत्मीय जनों ने उस महाप्राण व्यक्तित्व का सही मूल्यांकन किया था । सम्राट युधिष्ठिर उनका सम्मान कस्ते थे तथा उनके परामर्श को सर्वोपरि महत्व देते थे । पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण तथा कृपाचार्य जैसे प्रतिपक्ष के लोग भी उन्हें भरपूर आदर देते थे ।
    आर्य जीवनकला का सर्वांगीण विकास हमें कृष्ण के पावन चरित्र में दिखाई देता है । जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली । सर्वत्र उनकी अदभुत मेधा क्या सर्वग्रासिनी प्रतिभा के दर्शन होते हैं । वे एक ओर महान् राजनीतिज्ञ, क्रान्तिबिधाता, धर्म पर आधारित नवीन साम्राज्य के स्रष्टा राष्ट्रपुरुष के रूप में दिखाई पडते हैं तो दूसरी ओर धर्म, अध्यात्म, दर्शन और नीति के सूक्ष्म चिन्तक, विवेचक क्या प्रचारक भी हैं। उनके समय में भारत देश सुदूर गांधार से लेकर दक्षिण की सह्याद्री पर्वतमाला तक क्षत्रियों के छोटे-छोटे, स्वतंत्र किन्तु निरंकुश राज्यों में विभक्त हो चुका था । उन्हें एकता के सूत्र में पिरोकर समय भरतखण्ड को एक सुदृढ़ राजनीतिक इकाई के रूप में पिरोने वाला कोई नहीं था ।
    एक चक्रवर्ती सम्राट के न होने से विभिन्न माण्डलिक राजा नितान्त स्वेच्छाचारी तथा  प्रजापीड़क हो गये थे । मथुरा का कंस, मगध का जरासंध, चेदिदेश का शिशुपाल तथा हस्तिनापुर के दुर्योधन प्रमुख, कौरव सभी दुष्ट, विलासी, ऐश्वर्य-मदिरा में प्रमत्त तथा दुराचारी थे । कृष्ण ने अपनी नीतिमत्ता, कूटनीतिक चातुर्य तथा अपूर्व सूझबूझ से इन सभी अनाचारियों का मूलोच्छेद किया तथा धर्मराज कहलाने वाले अजातशत्रु युधिष्ठिर को आर्यावर्त के सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर आर्यों के अखण्ड, चक्रवर्ती, सार्वभौम साम्राज्य  को साकार किया ।
    जिस प्रकार वे नवीन सामाज-निर्माता तथा  स्वराज्यस्रष्ठा युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हुए, उसी प्रकार अध्यात्म तथा तत्त्व-चिन्तन के क्षेत्र में भी उनकी प्रवृतियाँ चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुकी थीं । सुख-दु:ख को समान समझने वाले, लाभ और हानि, जय और पराजय जैसे द्वंद्वो  को एक-सा मानने वाले, अनुद्विग्न, वीतराग तथा जल में रहने वाले कमल पत्र के समान सर्वथा निर्लेप, स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को यदि हम साकार रूप में देखना चाहें तो वह कृष्ण से भिन्न अन्य कौन-सा होगा ? प्रवृत्ति और निवृत्ति, श्रेय और प्रेय, ज्ञान और कर्म, ऐहिक और पारलौकिक जैसी आपातत: विरोधी दीखने वाली प्रवृत्तियों में अपूर्व सामंजस्य स्थापित का उन्हें स्वजीवन में चरितार्थ करना कृष्ण जैसे महामानव के लिए ही सम्भव था । उन्होंने धर्म के दोनों लक्ष्यों अभ्युदय और नि:श्रेयस के उपलब्धि की । अत: यह निरपवाद रूप से कहा जा सकता है कि कृष्ण का जीवन आर्य आदर्शों  की चरम परिणति है ।
  • Suraj Kiran Ki Chhanv
    Rajendra Avasthi
    100 90

    Item Code: #KGP-SKCM

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam (Paperback)
    Amrita Pritam
    80

    Item Code: #KGP-1518

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : अमृता प्रीतम
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार अमृता प्रीतम ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बृहस्पतिवार का व्रत', 'उधड़ी हुई कहानियाँ', 'शाह की कंजरी', 'जंगली बूटी', 'गौ का मालिक', 'यह कहानी नहीं', 'नीचे के कपड़े', 'पाँच बरस लम्बी सड़क', 'और नदी बहती रही' तथा 'फैज की कहानी'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार अमृता प्रीतम की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Aabid Surti
    Aabid Surti
    200 180

    Item Code: #KGP-49

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है । इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है । 'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार आबिद सुरती ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आतंकित', 'तीसरी आँख', 'सांताक्लोज़ के तीन क्लोज़अप', 'बिज्जू', 'सतह', 'अंधा', 'रहस्य एक बालक के जन्म पूर्व हुए अपहरण का', 'भैंसोंवाली गली', 'कैनाल' तथा 'अनाड़ी नंबर वन'। हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार आबिद सुरती की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ardhavritt (Paperback)
    Mudra Rakshes
    340

    Item Code: #KGP-388

    Availability: In stock


  • Face Your Fears (Paperback)
    David Tolin
    245

    Item Code: #KGP-356

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • Haashiye Per
    Raj Budhiraja
    100 90

    Item Code: #KGP-1963

    Availability: In stock

    हाशिये यर
    सुपरिचिन संवेदनशील लेखिका राज़ बुद्धिराजा की नवीन कृति है 'हाशिये पर' । अत्याधुनिक भारतीय प्तमाज़ ने जिस प्राचीन संस्कृति को हाशिये पर ला बैठाया है उसे  लेखिका ने शब्दों के मोतियों में पिरोकर भव्य रूप प्रदान किया है । लेखिका को पैनी और सूक्ष्म दृष्टि छोटी से छोटी और बडी से बडी बात, घटनास्थल पर आकर टिक जाती है । आज के टूटते परिवेश और बिखरते मानव-मूल्यों ने आहत होकर कभी विदेशी मित्रों और कभी पास-पडौस के माध्यम से इनकी सशक्त कलम पूरे समाज पर प्रहार करती है । प्रहार इतना तीव्र होता है कि पाठक के सामने हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं होता । धर्म, धर्म, अध्यात्प, शिक्षा, परिवार, समाज, मानवीय संबंध सभी पर लेखनी चलती चली जाती है । इनके दिल की गहराई पाठकों के पटल पर रेशमी मोती बिखेरती है और कभी पाठकों के सामने सवालिया निशान छोड़ती है । वस्तुत: उनके मन के पनीले तट पर वर्णों के संबंध आसन लगाए बैठे हैं । उन्हें तिरोहित होता देख वे पाठकों को ही कठघरे में ला खडा करती हैं । 'अब कहाँ है आनंदी', 'नमस्कार नहीं की जाती यहाँ', 'एक बेगम बादशाह बिन' ऐसे ललित संस्मरण हैं जिनमें पाठक पूरो तरह डूब जाता है और वह भी लेखिका के सुर में सुर मिलाकर कहता है 'मैं हूँ न !'
  • Kasturigandh Tatha Anya Kahaniyan
    Poonam Singh
    180 162

    Item Code: #KGP-302

    Availability: In stock

    कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ
    ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ पूनम सिंह का दूसरा कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में व्यक्ति भी है, परिवार भी और समाज भी। विस्तार, गहराई और संपूर्णता के साथ। इसलिए ये कहानियाँ स्त्री द्वारा रचित होने पर भी सिर्फ स्त्री-समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। इनमें स्त्रीवादी लेखन की शक्ति का स्वीकार भी है और उसकी सीमाओं का अतिक्रमण भी। इस तरह हिंदी में हो रहे स्त्री-कथा-लेखन को ये कहानियाँ नया आयाम देती हैं।
    प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व की उपज हैं। इनमें परंपरा के जीवित तत्त्वों का स्वीकार आधुनिकता के दायरे में किया गया है। ‘कस्तूरीगंध’, ‘उससे पूछो सोमनाथ’ तथा ‘पालूशन मानिटरिंग’ जैसी कहानियाँ इस कथन के सर्वोत्तम उदाहरण के रूप में देखी जा सकती हैं। इनमें परंपरा के उस पक्ष का अस्वीकार है, जो आधुनिक सोच के विरुद्ध है। इन कहानियों की आधुनिकता नई जीवन स्थितियों के बेहतर रूप का सृजनधर्मी आयाम है, जिसे कहानी-लेखिका ने सीधे, पर सधे शिल्प में उपलब्ध किया है।
    पूनम सिंह की कथा-चेतना बृहत्तर मानवीय और सामाजिक सरोकारों से आत्मीय जुड़ाव का प्रतिफल है, जिसके कारण उनकी कहानियाँ घर-आँगन और सेक्स के भूगोल तक सीमित नहीं हैं। इसके साथ इनमें सादगी से भरा प्यारा घरेलूपन भी है, जो उनकी निजता के संस्पर्श के साथ आंतरिक लहर-सा मंद-मंद प्रवाहित होता रहता है। उनकी कथा-चेतना सामान्यीकृत होकर अपने समय के साथ है तो विशिष्टीकृत होकर अलग से रेखांकित करने लायक भी है। इसका उदाहरण इस संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ प्रस्तुत करती हैं।
    कहा जा सकता है कि ‘कस्तूरीगंध तथा अन्य कहानियाँ’ समकालीन हिंदी कहानी में नए सृजन का सुंदर और श्रेष्ठ उदाहरण है।
  • Bhaasaa Vigyan Pravesh Evam Hindi Bhaasaa
    Bholanath Tiwari
    230 207

    Item Code: #KGP-274

    Availability: In stock


  • Jeevan Hamara
    Bebi Kambley
    120 108

    Item Code: #KGP-2099

    Availability: In stock

    जीवन हमारा
    मराठी लेखिका बेबी कांबले दलित साहित्य की प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । दलित लोगों के विपन्न, दयनीय और दलित जीवन को आधार बनाकर लिखे गए इस आत्मकथात्मक उपन्यास ने मराठी साहित्य में तहलका मचा दिया था। महाराष्ट्र के पिछडे इलाके के सुदूर गाँवों में अस्मृश्य माने जाने वाले आदिवासी समाज ने जो नारकीय, अमानवीय और लगभग घृणित जीवन का जहर घूँट-घूँट पिया उसका मर्मांतक  आख्यान है यह उपन्यास । शुरु से अंत तक लगभग सम्मोहन की तरह बाँधे रखने वाले इस उपन्यास में दलितो के जीवन में जड़ें जमा चुके अंधविश्वास पर तो प्रहार किया ही गया है, उस अंधविश्वास को सचेत रूप से उनके जीवन में प्रवेश दिलाने और सतत पनपाने वाले सवर्णो की साजिश का भी पर्दाफाश किया गया है । इस उपन्यास को पढ़ना महाराष्ट्र के डोम समाज ही नहीं वरन् समस्त पददलित जातियों के हाहाकार और विलाप को अपने रक्त में बजता अनुभव करना है । शोषण, दमन और रुदन का जीवंत दस्तावेज है यह उपन्यास, जो बेबी कांबले ने आत्मकथात्मक लहजे में रचा है ।


  • Dena Paavna
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    250 225

    Item Code: #KGP-71

    Availability: In stock


  • Vish-Beej
    Suryakant Nagar
    75 68

    Item Code: #KGP-1936

    Availability: In stock


  • Sikhavan (Paperback)
    Jagdish Pandey
    40

    Item Code: #KGP-1445

    Availability: In stock

    प्रार्थना

    सुन लो भगवन विनय हमारी।
    हम सब आये शरण तुम्हारी।।

    सारे जग के रक्षक -पालक,
    हम हैं नाथ तुम्हारे बालक।
    तेरे दर के सभी भिखारी।।

    गुरु, पितु, मात, चरण अनुरागी, 
    बनें सभी ऐसे बड़भागी।
    आशीषों के हों अधिकारी।।

    विद्या पढ़ें विवेक बढ़ाएं,
    अपना जीवन श्रेष्ठ बनाएं।
    हरो ईश बाधाएं सारी।।

    शुभ कर्मों में ध्यान लगाएं,
    पर - सेवा कर नाम कमाएं।
    मातृ - भूमि के हों हितकारी।।

    हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
    रहें सदा बन भाई-भाई।
    शान तिरंगे की हो प्यारी।।
    -इस पुस्तक की ‘प्रार्थना’ कविता
  • Katha Samay : Srijan Aur Vimarsh
    Shashi Kala Rai
    245 221

    Item Code: #KGP-905

    Availability: In stock


  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Swatantrata Ka Prateek-Maharana Pratap (Paperback)
    M.A. Sameer
    150

    Item Code: #KGP-7210

    Availability: In stock

    स्वतंत्रता और महाराणा प्रताप जैसे पर्यायवाची बन गए हैं। आजादी के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करने वाले इस महान् योद्ध को पूरा देश अपना आदर्श मानता है। अकबर की विशाल सेना के सामने हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध करना और उसमें दुश्मनों के दांत खट्टे कर देना यह महाराणा प्रताप के वश की ही बात थी। राजपूतों के शौर्य और स्वाभिमान को उन्होंने आकाश की ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जाने कितने कष्ट सहे, घास की रोटियां खाईं, अपने साथियों को युद्ध में खोया, प्रिय घोड़े चेतक का विछोह सहा लेकिन अपनी प्रतिज्ञा पर अडिग रहे। 
    ‘स्वतंत्रता का प्रतीक—महाराणा प्रताप’ पुस्तक ऐसे महान् व्यक्तित्व के जीवन दर्शन को सरल शब्दों में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक आत्मबोध कराती है, देशभक्त बनाती है। यह संदेश भी देती है कि यदि मनुष्य हिम्मत न हारे तो वह कुछ भी कर सकता है। 
  • Fantasia (Paperback)
    Vaughn Petterson
    245

    Item Code: #KGP-343

    Availability: In stock

    Touching on a wide range of different themes, Fantasia on a Theme of Thomas Tallis is a truly compelling read. Throughout the pages of his thought-provoking novel, the author, Vaughn Petterson, presents readers with a vivid portrait of the best and worst that humanity has to offer, inviting them to form their own conclusions about the respective moral weight of our various social folkways and mores. Written in a deeply lyrical style, Fantasia successfully incorporates the transformative media of art, music, and literature as a figurative backdrop for Joe’s personal metamorphosis—highlighting the significance of the arts in helping to change us in ways we could hardly imagine. Petterson also skillfully invokes higher levels of deeper thought in the reader, chiefly by inviting them to consider the deeper spiritual ramifications of the issues with which his characters are forced to contend—issues that rest at the core of our collective existence.
  • Paanch Rang Naatak
    Pratap Sehgal
    495 446

    Item Code: #KGP-767

    Availability: In stock

    पाँच रंग नाटक
    हिंदी में अच्छे नाटकों की कमी की दुहाई हमेशा दी जाती है । अच्छे नाटकों की कमी विश्व की किस भाषा में नहीं है, इसलिए हिंदी को अपवाद मानना सही नहीं है । यह भी सच है कि हिंदी रंगमंच के विकास एवं विस्तार के साथ-साथ नाटकों की कमी गहरे  स्तर पर खलने लगी तो विदेशी एवं हिंदीतर भारतीय भाषाओँ के नाटकों के अनुवाद/रूपांतर का प्रचलन बढा । यह प्रक्रिया स्वस्भाविक  ही है । रंगमंच के विकास ने हिंदी के कई लेखकों को अपनी ओर आकृष्ट किया और साहित्य की अन्य विधाओं में लिखने वाले नाट्य-लेखन में प्रवृत्त हुए ।  इस तरह से हिंदी के नाटक भी हुए और हिंदीतर भाषाओं के भी । 
    प्रताप सहगल कविता से नाटक की और प्रवृत्त हुए है और उन्होंने
    नाट्य-लेखन को रंगमंच से जोड़कर ही देखा है, इसलिए उनके
    नाटकों में नाटकीय गत्यात्मकता, नाटकीय बिम्ब और नाटकीय
    शब्द भरपूर मिलता है । उनका मानना है कि नाटक के संवादों में
    अभिनय-कला को उजागर करने की जगह जरूर होनी चाहिए । 
    गत दो दशकों में उन्होंने नाटक के विविध रूपों को अपने 'संप्रेष्य' का माध्यम बनाया है । प्रस्तुत 'पाँच रंग नाटक' उनके विपुल नाट्य-लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । यहीं 'अन्वेषक' हैं 'रंग बसंतो', 'मौत क्यों रात भर नहीं आती', 'अँधेरे में’ तथा 'नहीं कोई अंत'--पाँच नाटक मौजूद हैं।
    'अन्वेषक' को जहाँ विज्ञान-नाटक नाम से एक नई नाट्य-धारा की शुरुआत माना जा रहा है, वहीं 'रंग बसंती' भगतसिंह के जीवन एवं समय को ब्रेख्तियन रंग-शैली की परंपरा में नाट्यांकित  करता है । 'मोत क्यों रात पर नहीं आती' फार्स और यथार्थ का मिला-जुला प्रारूप है तो 'नहीं कोई अंत’ यथार्थवादी नाटकों की श्रेणी में रखा जा सकता है । 'अँधेरे में' नाटक में तो ब्लैक कॉमेडी निहित है ही ।
    अपनी अलग-अलग भंगिमाओं एवं प्रस्तावनाओं के कारण ये सभी नाटक देश के विभिन्न छोटे-बड़े नगरों में बार-बार  खेले गए है और इन्होंने कई बहसों, विवादों और संवादों को जन्म दिया है । अब वे पांचों रंग नाटक एक ही जिल्द में, ताकि इधर-उधर भटना न पड़े ।
  • Mera Jamak Vapas Do (Paperback)
    Vidya Sagar Nautiyal
    150

    Item Code: #KGP-7073

    Availability: In stock


  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai
    Ubaid Siddqi
    300 270

    Item Code: #KGP-547

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
  • Mere Saakshatkaar : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    350 315

    Item Code: #KGP-713

    Availability: In stock


  • Bhartiya Sabhyata Ki Nirmiti
    Bhagwan Singh
    540 486

    Item Code: #KGP-401

    Availability: In stock

    भारतीय सभ्यता की निर्मिति भगवान सिंह की रचनाओं में ही भारतीय इतिहासलेखन के इतिहास में एक नया कीर्तिमान इस विशेष अर्थ में है कि इससे पहले इतिहासकारों की दृष्टि हड़प्पा के नगरों या ऋग्वेद तक जाकर रुक जाती थी, इससे आगे कुछ दीखता नहीं था और बहुत से प्रश्नों का हमें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। 
    प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार उन्होंने हड़प्पा काल से भी आठ-दस हजार पीछे के सांस्कृतिक विकासों और सभ्यता के उन नियामक तत्त्वों की खोज की, जिनका उपयोग विविध सभ्यताओं ने अपने निर्माण में गारे और पलस्तर के रूप में किया। विषय गंभीर होते हुए भी उन्होंने इसे इतना सरल और बहुजनग्राह्य रूप में प्रस्तुत किया है कि अखबार पढ़ने की योग्यता रखने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़ते हुए किसी तरह के भारीपन या उलझाव का अनुभव नहीं करता। इस पुस्तक में उनकी विवेचनशैली भी उनकी अन्य कृतियों से भिन्न है। नृतत्त्व, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान और साहित्य की सामग्री का इतनी कल्पनाशीलता से उपयोग किसी अन्य कृति में देखने में नहीं मिलता।
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri
    Leeladhar Jaguri
    150 135

    Item Code: #KGP-1871

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Insaani Nasl
    Nasera Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-800

    Availability: In stock

    इनसानी नस्ल
    इस संग्रह की सभी कहानियाँ बड़ी सादगी से जीवन के यथार्थ को सामने रखती हैं। अंतर्धारा में एक आग्रह अवश्य महसूस होता है कि इनसान ने अपने ‘स्वयं’ को जीना छोड़ दिया है। वह अपने अंदर यात्रा करने की जगह बाहर की भौतिक दुनिया के कोलाहल में भटकता जा रहा है, जो उसकी सारी सहजता को ख़त्म कर उससे सुख के सारे क्षण छीनता जा रहा है। कभी-कभी ऐसा भी संकेत मिलता है कि वह पाषाण युग की प्रवृत्तियों की तरफ़ अकारण बढ़ रहा है, जो सारी उपलब्धियों के बावजूद उसको वह ‘चैन’ नहीं दे पा रही हैं, जिसका वह सही हक़दार है। आखि़र यह इनसानी नस्ल, जो एक-दूसरे की उत्पत्ति की सिलसिलेवार कड़ी है, वह वास्तव में चाहती क्या है ? एक-दूसरे से हाथ मिला मानव-शृंखला को मज़बूत बनाना या फिर एक-दूसरे के विरोध में खड़े होकर अलगाव की भूमिका निभाना ? यह अलगाव हमें सभ्यता के किस मोड़ पर ले जाएगा ? अलगाव की इस मानसिकता से मुक्त होकर इनसान एक नए युग का सूत्रपात क्यों नहीं कर सकता ? क्या वह आने वाली नस्ल की ख़ातिर जीवन से निरंतर ग़ायब होते जा रहे ‘चैन’ को पाने के लिए कुछ नहीं करेगा ? क्या वह अपने अंदर की यात्रा कर इनसानियत के आलोकित क्षितिजों को छूना नहीं चाहेगा ? इन्हीं सवालों से जूझती ये कहानियाँ आज के इनसान के दिल व दिमाग़ की टकराहट की साक्षी हैं, जो अनेक बुनियादी सवालों से साक्षात्कार करती नज़र आती हैं।
  • 20-Best Stories From Scandinavia
    Prashant Kaushik
    395 356

    Item Code: #KGP-9314

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics  from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Scandinavian short stories  are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious.  A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup  of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new  world on each page.

    With stories like Shortshanks, Priest and The Clerk, Golden Castle in the Air,  Two Stepsisters, Princess on the Glass Hill, Master-smith, this book is a compilation of 20 famous Scandinavian short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Scandinavia.
  • Rahiman Dhaaga Prem Ka
    Malti Joshi
    150 143

    Item Code: #KGP-1992

    Availability: In stock

    रहिमन धागा प्रेम का
    "पापा, अगर आप सोच रहे है कि जल्दी ही मुझसे पीछा छुडा लेंगे तो आप गलत सोच रहे है । मैं अभी दस-बीस साल शादी करने के मूड में नहीं हूँ। मैं आपके साथ आपके घर में रहूंगी । इसलिए यह घर हमारे लिए बहुत छोटा है । प्लीज़, कोई दूसरा बड़ा-सा देखिए।"
    "तुम शादी भी करोगी और मेरे घर में भी रहोगी, उसके लिए मैं आजकल एक बड़ा-सा घर और एक अच्छा सा घर-जमाई खोज रहा हूँ। रही इस घर की, तो यह तुम्हारी माँ के लिए है । यह जब चाहे यहीं शिफ्ट हो सकती है । शर्त एक ही है-कविराज इस घर में नहीं आएंगे और तुम्हारी माँ के बाद इस घर पर तुम्हारा अधिकार होगा ।"
    अंजू का मन कृतज्ञता स भर उठा । उसने पुलकित स्वर में पूछा, "तो पापा, आपने माँ को माफ कर दिया ?"
    "इसमें माफ करने का सवाल कहाँ आता है ? अग्नि को साक्षी मानकर चार भले आदमियों के सामने मैंने उसका हाथ थामा था, उसके सुख-दुःख का जिम्मा लिया था । जब उसने अपना सुख बाहर तलाशना चाहा, मैंने उसे मनचाही आज़ादी दे दी । अब तुम कह रही हो कि वह दुखी है तो उसके लौटने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया । उसके भरण-पोषण का भार मुझ पर था । गुजारा-भत्ता तो दे ही रहा हूँ अब सिर पर यह छत भी दे दी।"
    -[इसी संग्रह की कहानी "रहिमन धागा प्रेम का' से]
  • Shabdon Mein Rahti Hai Vah
    Pushpita Awasthi
    390 351

    Item Code: #KGP-438

    Availability: In stock

    वेद ने प्रकृति को देवता का काव्य कहा है--पश्य देवस्य काव्यम्। इस काव्य के प्रति सबसे ज्यादा लगाव कवियों में होता है। पुष्पिता के इस काव्य-परिसर में अनेक देशों, द्वीपों, पहाड़ों, नदियों, महासागरों, आदिवासी जातियों की स्मृति है जिसमें कैरेबियाई द्वीप, आस्ट्रिया का नाउदर गांव, रोम के भव्य भवन, आल्प्स की कोमो झील, सेंटलूशिया, अटलांटिक और हिंद महासागर तथा जाने क्या-क्या एक साथ उपस्थित है। विविध् देशों के प्राकृतिक परिवेश और कलात्मक उत्कर्ष के साथ कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व भी हैं जैसे कवि वालकट या अलेक्सजेंडर महेंद्र आदि। पुष्पिता के मन में भारत की याद भी साथ-साथ चलती है जैसे नाउदर की गायों को देखकर मथुरा, वृंदावन, गोप, गोपी और श्रीकृष्ण की याद या लांगडाईक की नहरों को देखकर बनारस की गलियों की या भारतीय पर्वों, त्योहारों और तिथियों की याद। उसकी व्यापक संवेदनशीलता उसे अनंतरूपात्मक जगत से जोड़े हुए है। इसीलिए वह विश्वव्यापी हिंसा के विरुद्ध  है।
    स्त्रिायां और बच्चे पुष्पिता के खास सरोकार हैं। कवयित्री होने के नाते स्वाभाविक भी है कि वह सैनिकों की गर्भस्थ स्त्रियों की व्यथा तथा अजन्मे शिशुओं के प्रति मां के विछोह और वात्सल्य के मर्म को अधिक तीव्रता से महसूस कर सके। एक ओर स्त्री को नाखून की तरह कुतरते और जोंक की तरह चूसते पुरुष का क्रूर बिंब उसके मन में है तो दूसरी ओर देह ढलने के बाद स्वयं ही अपना ताबूत बनती स्त्री का मार्मिक चित्रा भी। लेकिन इसके साथ ही उसकी प्रेम संबंधी कविताओं में देह का सुगंधित स्वाद और उसका बखान भी है। समय की अपराजेयता में विश्वास करते हुए भी पुष्पिता शब्द की अमरता में भरोसा रखती हैं, जो कभी मरते नहीं, जो मनुष्य की अस्मिता को बचाए रखते हैं। कहना न होगा कि यही कवि में कविता को भी जिंदा रखते हैं। मुझे विश्वास है, काव्यप्रेमी इस संग्रह की कविताओं का स्वागत करेंगे।
  • Yug Pravartak Swami Dayanand (Paperback)
    Lala Lajpat Rai
    80

    Item Code: #KGP-815

    Availability: In stock


  • Apna Hi Desh (Paperback)
    Madan Kashyap
    90

    Item Code: #KGP-1301

    Availability: In stock

    यह चर्चित कवि मदन कश्यप का पांचवां संग्रह है। मदन कश्यप आम आदमी का शोषण करने वाले और उसे उसके हक़ से दूर करने वाले तंत्र पर कड़ी नज़र रखते हैं और उसे बेनक़ाब करने का कोई मौका नहीं चूकते। बाज़ार उनके निशाने पर है, जिसने बड़ी बारीकी से मनुष्य को उपभोक्ता में बदलने का अभियान चला रखा है। उसने न सिर्फ सत्ता को अपने चंगुल में ले लिया है बल्कि सामाजिक मूल्यों पर भी गहरा आघात किया है। उसकी कोशिश है कि सब कुछ उसी के रंग में रंग जाए ताकि हर कोई बाज़ार के मुताबिक ही सोचे ‘कुछ ऐसा चल निकला रंगों का खेल कि बेरंग ज़िंदगियों को भी बदरंग करने लगे हैं रंगों के सौदागर/अब हमारी आकांक्षा, हमारे संघर्ष, हमारी करुणा पर कालिख नहीं रंग-बिरंगे रंग पोते जाते हैं।’ बाज़ार कई रूपों में, कई स्तरों पर सक्रिय है। वह एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें कोई विचार न हो, संघर्ष की कोई बात न हो। वह तकलीफ को भी एक उत्सव में बदल देना चाहता है। आज का समय ऐसा है कि ‘जिसमें कोई बहस नहीं/केवल गिरोहबंदियां हैं/मतभेदों के लिए कोई जगह नहीं।’ यह स्थिति बाज़ार ने ही पैदा की है। उसने एक ऐसा नवधनाढ्य वर्ग तैयार किया है जिसका शेष समाज से कोई संवाद नहीं है, किसी और के प्रति उसके भीतर कोई संवेदना भी नहीं है। यह तबका ग़रीबों की त्रासदी में भी अपने लिए मनोरंजन ढूंढ़ता है। उसके लिए निठारी की त्रासदी भी महज़ एक सूचना है, सनसनी से भरी हुई। वह उसे तटस्थ होकर एक रियलिटी शो की तरह देखता है--‘दूर खड़े तालियां बजा रहे थे/भूसंपदा की उछाल से/रातोरात खरबपति बन चुके धनपशु/उन्हें भा रहा था यह रियलिटी शो।’ निठारी की तरह देश की असंख्य ग़रीब बच्चियों का दर्द इस वर्ग को दिखाई नहीं देता। इसे बस अपनी तरक्की और मुनाफे से मतलब है। यह नया सौदागर है, ‘इन्हें सखुए के बीज नहीं पूरा जंगल चाहिए/हड़िया के लिए भात नहीं सारा खेत चाहिए।’ यह वर्ग आज देश का नियंता बना हुआ है। हमारा शासक वर्ग सीधे या परोक्ष रूप से इसकी दलाली में लगा हुआ है। वह इसी के हित के लिए आदिवासियों से जंगल और ज़मीन छीनने पर आमादा है और इसके लिए हिंसा तक का सहारा लेता है। पर विडंबना यह है कि यह सब वह लोकतंत्र का मुखौटा लगाकर करता है--‘महोदय! लूट और हिंसा के अलावा/और क्या बचा है आपके लोकतंत्र में/आपने पहाड़ बेच डाले/नदियां बेच डालीं जंगल बेच दिया...आपको जिसने भी वोट दिया देश चलाने के लिए दिया होगा देश बेचने के लिए तो नहीं।’ दुर्भाग्य से पढ़ा-लिखा और अपने को बुद्धिजीवी कहने वाला मध्यवर्ग भी नवधनाढ्य तबके की नकल करता है और उसमें शामिल होना चाहता है हालांकि ऊपर से वह बदलाव और क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें करता रहता है। इस पर व्यंग्य करते हुए मदन कश्यप कहते हैं--‘आप क्रांति करना नहीं चाहते/लेकिन क्रांति होते देखना चाहते हैं/आपके बारे में सिर्फ यह तय है/कि कुछ भी तय नहीं है।’ पर इन सबके बावजूद कवि में निराशा नहीं है। उसे जनता की ताक़त पर पूरा भरोसा है क्योंकि वह बड़े-बड़े तानाशाहों को उनकी औकात बता देती है--‘लेकिन यह क्या कि एक जोड़े जूते के उछलते ही/खिसक गयी उसके पांव के नीचे दबी दुनिया/चारों तरपफ से फेंके जाने लगे जूते।’ मदन कश्यप संघर्ष में ही सौंदर्य देखते हैं। वंचितों और पीड़ितों के लिए संघर्ष करती हुई स्त्री उन्हें औरों से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है। गुजरात के दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत समाजसेवी तीस्ता सीतलवाड़ के लिए वह कहते हैं--‘जब हवा में तनी तुम्हारी मुट्ठी/तुम सबसे ख़ूबसूरत लगी।’ यह निश्चय ही एक अलग सौंदर्यदृष्टि है जो स्त्री की गरिमा को प्रतिष्ठित करती है। उनका दृढ़ विश्वास है कि कोई समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब वह स्त्री को स्वतंत्रता और सम्मान दे। इस संग्रह की प्रायः सभी कविताएं बदलाव की गहरी आकांक्षा से भरी हुई हैं।
    --संजय कुंदन
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ajit Kumar
    Ajit Kumar
    160 144

    Item Code: #KGP-419

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अजितकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'दांपत्य राग', 'एक घर', 'सुबह का सपना', 'वह एक शाम', 'मास्टर जी', 'झुकी गरदन वाला ऊंट', 'शहद की मक्खी', 'अपने-अपने बोझ', 'लाल-पीली-हरी बत्तियां' तथा 'मेरी मध्यस्थता' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अजितकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Bhagwandas Morwal (Paperback)
    Bhagwan Das Morwal
    150

    Item Code: #KGP-476

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : भगवानदास मोरवाल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार भगवानदास मोरवाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महराब', 'बस, तुम न होते पिताजी', 'दु:स्वप्न की मौत', 'बियाबान', 'सौदा', 'चोट', 'रंग-अबीर', 'सीढियां, माँ और उसका देवता', 'वे तीन' तथा 'छल'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक भगवानदास मोरवाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Panchtantra Ke Natak (Paperback)
    Shri Prasad
    50

    Item Code: #KGP-1363

    Availability: In stock


  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 990

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Shri Arvind
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-130

    Availability: In stock

    भारतीय मनीषा की विशिष्ट गरिमा और गौरव को संसार ने प्राचीन काल से ही स्वीकारा है । भारत का अध्यात्म, योग, दर्शन और साहित्य अपने वैभव का प्रभाव सर्वत्र प्रस्तुत करता रहा है । यहाँ के विज्ञान ने विभिन्न क्षेत्रों में अपना विशेष प्रभाव प्रदर्शित  किया है ।
    भारतीय योग विद्या के विभिन्न चमत्कारों की प्रशंसा विदेशियों  ने मुक्त कंठ से की है । हमारा प्राचीन योग आज भी बडी उत्सुकता और चाव के साथ विदेशों में अपनाया जा रहा  है। अनेक विदेशी भारत आकर योग विद्या का व्यावहारिक और सैद्धांतिक अध्ययन करने में रत हैं ।
    महान् योगी महर्षि श्री अरविन्द के जीवन-काल में ही विदेश के अनेक विद्वान, उनके रहस्यों को जानने के लिए उत्सुक थे । आज भी देशी और विदेशी आचार्य उनके रहस्यमय जीवन के गुह्य  तत्त्वों पर शोध-कार्य कर रहे  ।
    योगिराज अरविन्द का जीवन विभिन्न विलक्षण रहस्यों से युक्त था । वे समाधि विज्ञान  सिद्ध महापुरुष थे । उनका जीवन राष्ट्रहित के लिए समर्पित था । भारतीय राष्ट्रवाद के वे पक्षधर थे । उनका अदभुत एवं विलक्षण व्यक्तित्व चिंतन, मनन, साधना और तपश्चर्या में व्यतीत हुआ ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Parineeta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1353

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है परिणीता और दूसरा है मझली दीदी।
  • Lalachi Brahman
    Maitreyi Pushpa
    50

    Item Code: #KGP-1188

    Availability: In stock


  • Zanjeer Bol Uthi
    Jaidi Zafar Raza
    180 162

    Item Code: #KGP-1839

    Availability: In stock

    ज़ंजीर बोल उठी
    घटनाओं का कालक्रम में होना इतिहास नहीं बुनता। हाँ, घटनाएँ जब ठहरकर संवाद की स्थिति बनाती हैं और समय के भाल पर अपना निशान छोड़ जाती हैं तो इतिहास के अंकुर स्वतः फूट पड़ते हैं। डॉ जै़दी के कहानी-संग्रह ‘ज़ंजीर बोल उठी’ की चार-पाँच कहानियाँ शुद्ध ऐतिहासिक हैं। इनमें व्यथा भी है और आक्रोश भी। कारण यह है कि ये अपने समय की ज़मीनी सच्चाई और बुनियादी सवालों को उठाती हैं और तर्क एवं तथ्य की तलाश में वर्तमान से अतीत तक का सफ़र तय करती हैं। इनमें बौद्धिक संवादों की टकराहटों के बजाय समय की ओट में छुपी विसंगतियों को उधेड़ने की शक्ति है जो सियासी शतरंज की बिसात को उलटने का साहस रखती है। इन कहानियों के तेवर तीखे और तल्ख़ ज़रूर हैं, मगर साथ ही इन कहानियों में संवेदनारूपी सरिता का प्रवाह बड़ी सहज गति से बहता महसूस होता है, जो शब्दों पर विश्वास को बहाल और निराशा को आशा में बदलने में ख़ासा सक्षम है। ये कहानियाँ अपने ईमानदाराना प्रयास के चलते अरसे तक पढ़ने वालों की सोच में अटकी रहेंगी।
  • Har Baar Musaphir Hota Hoon
    Pratap Sehgal
    280 252

    Item Code: #KGP-611

    Availability: In stock

    हर बार मुसाफिर होता हूं' के यात्रा-वृत्तांत निरे वृतांत नहीं हैं। निरे वृतांत कभी भी यात्रा-साहित्य का हिस्सा नहीं बन सकते। यह यात्रा-वृतांत कभी इतिहास की गलियों से गुज़रते हुए आपको अतीत के किसी पन्ने से जोड़ देते हैं तो कभी भूगोल में प्रवेश करते हुए आपको उसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जिस जगह का जिक्र लेखक कर रहा है। कभी आप उस जगह के लोक के रीति-रिवाजों से रू-ब-रू होते हैं, कभी वहां के सांस्कृतिक घटकों का तो कभी वहीं की प्राकृतिक संपदा और सौंदर्य का हिस्सा बन जाते हैं।
    विविध विधाओं में लेखन करने वाले लेखक प्रताप सहगल एक घुमंतू जीव भी हैं, यह जानकारी इन यात्रा-वृतांतों को पढ़कर पुख्ता होती है। वन वृत्तातों में कहीं कविता, कहीं नाटक और कहीं कथा का रंग मिलने लगना कोई अजूबा नहीं बल्कि इसे लेखक का शैल्पिक वैशिष्टय ही मानना चाहिए।
    ये यात्रा-वृत्तात इसलिए भी विशिष्ट हो जाते है कि लेखक वर्णित स्थान, समय और वहीं समाहित सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का रूपांकन किनारे या किसी सिरे पर खडा होकर नहीं करता। यह सीधे-सीधे स्थान, समय और परिवेश में दाखिल होकर उसका हिस्सा बनकर जीता है और खुद की भी वहीं शामिल कर लेता है। अपने इन्हीं अनुभवों को पाठक के साथ साझा करने की इच्छा ही लेखक को शब्द का सहारा लेने के लिए विवश करती है। और इसी बहाने और तमाम सार्थक यात्रा-वृत्तांतों की तरह से यह यात्रा-वृत्तांत भी हिंदी के वृहद यात्रा-साहित्य के द्वार पर दस्तक देते हुए आपके हाथ में है।
  • Aacharya Ram Chandra Shukla Ka Chintan Jagat
    Krishna Dutt Paliwal
    695 626

    Item Code: #KGP-9007

    Availability: In stock


  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 468

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamal Kumar
    Kamal Kumar
    230 207

    Item Code: #KGP-688

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमल कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फॉसिल',  'के नाम है थारो', 'केटलिस्ट', 'वैलेन्टाइन डे', 'मंडी', 'खोखल', 'कीच', 'धारावी', 'चौराहा' तथा 'अपराजेय'। 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमल कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Parv
    Bhairppa
    695 626

    Item Code: #kgp-147

    Availability: In stock

    पर्व
    भारतीय वाडमय में पंचम वेद के रूप में अधिष्टित महाभारत पर आधारित भैरप्पा की महान् औपन्यासिक कृति । इस उपन्यास में लेखक ने महाभारत के पात्रों, स्थितियों और घटनाओं का जो वस्तुनिष्ठ आलेखन प्रस्तुत किया है, वह अदभुत और अनुपम है । महापारतकालीन भारत की सामाजिक संरचना क्या तत्कालीन इतिहास और परंपराओं के लंबे अरसे तक अनुसंघान, व्यापक भ्रमण और अध्ययन पर आधारित यह उपन्यास भारतीय साहित्य की महान् उपलब्धि है । अतीतोन्मुखी भारतीय जनमानस के साथ जुडे महाभारत के पात्रों के अलंकरण और चमत्कारों एवं अतिशयोक्तियों की कैचुली उतारकर उन्हें मानवीय धरातल पर साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करने के कारण यह उपन्यास वस्तुत: एक क्रांतिकारी जाते है । संक्षेप में इतना कहना ही शायद पर्याप्त हो कि 'पर्व' आधुनिक संदर्मों से जुडा महाभास्त का पुनराख्यान है ।
    'पर्व' का फलक भले ही महाभारत पर आधारित हो, लेकिन यह एक साहित्यिक कृति है-एक उपन्यास । पाठक इसे एक उपन्यास के रूप में ही स्वीकार करेंगे-ऐसा लेखक का अनुरोध है । 

  • Vaya Pandepur Chauraha
    A.M. Nayar
    350 315

    Item Code: #KGP-249

    Availability: In stock

    डा. नीरजा माधव हिंदी कथा-साहित्य का एक जाना- पहचाना नाम है। अनेक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तथा छोटी कक्षाओं में भी उनकी कहानियां, कविताएं और उपन्यास पढ़ाए जा रहे हैं। नित नई और अनछुई भूमि पर अपना कथानक रचने वाली डा. नीरजा माधव ‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’ के माध्यम से ‘इम्पोटेंट इन्टेलीजेंसिया’ का एक भीतरी चेहरा बेनकाब करती हैं। किस तरह आज का बुद्धिजीवी मुखौटा लगाए सामाजिक सरोकारों की बात करता है, किस प्रकार शस्त्र बने शब्दों का मुंह स्वयं अपनी ओर घूम जाता है और हम तिलमिला उठते हैं अपना ही असली चेहरा देख। मानव मन की कृत्रिमता और विवशता को परत दर परत उधेड़ने वाली अलग ढंग की कहानियों का अनूठा संग्रह है--‘वाया पांड़ेपुर चैराहा’।
  • 1128 Mein Crime 27
    C. J. Thomas
    100

    Item Code: #KGP-1817

    Availability: In stock

    1128 में क्राइम 27
    '1128 में क्राइम 27' थॉमस का दूसरा नाटक है । उसकी समस्या सार्वदेशीय है । उन्होंने मौत को एक विशेष प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है । नाटक में जिंदगी और मृत्यु के प्रति उनका दृष्टिकोण स्पष्ट झलकता है । कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सिनिक है, क्योंकि उनका यह नाटक सिनिसिज्म की सृष्टि है।... 
    तत्कालीन रंगमंच पर जमी हुई हास्य रूढियों के प्रति विद्रोह, प्रबोधन की शक्ति पर विश्वास रखकर संसार का उद्धार करने की मूर्खता आदि पर भी उन्होंने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। असली जिंदगी और जीवन की व्याख्या करने वाले नाटक टेकनीक के वैभवों क द्वारा उनकी असली भिन्नताओं को उसी तरह रहने देकर रंगमंच पर प्रस्तुत करने का उनका कौशल आश्चर्यजनक ही है। जिंदगी मिथ्या है, यह दार्शनिक आशय दर्द-भरी हँसी के साथ वे मंच पर प्रस्तुत करते हैं। नाटक चलाने वाला और नाटक की व्याख्या करने वाला गुरु एक तरफ़, नाटक खेलने वाले, नेपथ्य, प्रोप्टर, स्टेज मैनेजर आदि का एक ढेर दूसरी तरफ, अखबार का दफ्तर, संपादक, चक्की आदि का एक ढेर तीसरी तरफ।  इन सबके सम्मुख गुरु के लिए जब चाहे तब इशारा कर सकने वाला एक प्रेक्षक समूह । इस प्रकार नाटक और जिंदगी को उनके असली रूप में अपने-अपने व्यक्तित्व से युक्त एक ही स्टेज पर एक साथ इस नाटक में प्रस्तुत करता है । नाटकीय प्रभाव एवं आंतरिक संघर्षों की दृष्टि से यह नाटक अत्यंत सफल है।
  • Virajbahu (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1246

    Availability: In stock


  • Janmanmayi Subhadra Kumari Chauhan
    Rajendra Upadhyaya
    120 108

    Item Code: #KGP-180

    Availability: In stock


  • Gadya Ka Parivesh
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-814

    Availability: In stock

    गद्य का परिवेश
    प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी के महत्त्वपूर्ण गद्य लेखकों (प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा, नंददुलारे वाजपेयी, लक्ष्मीनारायण मिश्र, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नेमिचंद्र जैन, विद्यानिवास मिश्र, निर्मल वर्मा आदि) पर नई दृष्टि से गंभीर विचार हुआ है। इसमें आलोच्य लेखकों को नए कोणों से देखने तथा उनकी शक्ति और सामर्थ्य को पहचानने की कोशिश की गई है। इसमें कुछ विशिष्ट गद्यकारों के उन पक्षों पर लिखा गया है, जिन पर प्रायः कम विचार हुआ है। जैसे कि प्रेमचंद की दलित संदर्भ की कहानियों पर या निराला, अज्ञेय, जैनेंद्र कुमार, निर्मल वर्मा के आलोचक और विचारक रूप पर। यह एक तटस्थ और निर्भीक विश्लेषण तथा सहृदय मूल्यांकन करने वाली कृति है। 
    प्रसिद्ध कवि-आलोचक डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी स्वयं एक सर्जनात्मक गद्यकार हैं, जिन्होंने संस्मरण और यात्रा की कई मूल्यवान कृतियां लिखी हैं। उनके इन आलोचनात्मक निबंधों में उनकी रचनात्मक अंतर्दृष्टि के दर्शन होते हैं। साथ ही एक गंभीर पाठक की संतुलित बेधक दृष्टि के भी। हिंदी गद्य के एक मूल्यवान अंश का साक्षात्कार करने वाली यह पुस्तक निश्चय ही पाठकों के लिए उपयोगी और मूल्यवान होगी।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Upendranath Ashq
    Upender Nath Ashq
    150 135

    Item Code: #KGP-2071

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पलंग', 'आकाशचारी', 'काकड़ां का तेली', 'उबाल', 'मि० घटपाण्डे', 'बैंगन का पौधा', 'डाची', 'पिजरा', 'काले साहब' और  'अजगर' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • Guleri Rachanawali (Two Vol.)
    Manohar Lal
    1600 1440

    Item Code: #KGP-02

    Availability: In stock

    पं. चंद्रधर  शर्मा गुलेरी उन महान् रचनाकारों और मनीषियों में अग्रगण्य हैं जिन्हें ‘हिंदी का निर्माता’ कहा जाता है। खड़ी बोली हिंदी के प्रारंभिक काल में गुलेरी ने कहानी और निबंध् सहित अनेक विधओं में संवेदना व शिल्प की बुनियाद तैयार की। लेखक, पत्रकार, विमर्शकार, अनुसंधनकर्ता और शास्त्राज्ञ आदि अनेक रूपों में गुलेरी ने भाषा और साहित्य को समृद्ध किया। 
    ‘गुलेरी रचनावली’ (दो खंड) कालजयी साहित्यकार 
    पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा विरचित साहित्य का प्रामाणिक संकलन है। डाॅ. मनोहर लाल ने अत्यंत परिश्रम, विद्वत्ता व निष्ठा के साथ इस रचनावली का संपादन किया है। इसमें कहानी, निबंध्, शोध्, पांडुलिपि विवरण, संस्मरण, साक्षात्कार, पौराणिक विवेचन, लोककला, राजनीति, धर्म, साहित्य समीक्षा, पत्रकारिता, काव्य, जीवन चरित, भूमिका लेखन, भाषा विवेचन, अनुसंधन, इतिहास, पुरातत्त्व, विज्ञान, ललित निबंध्, संपादकीय, पत्र साहित्य में निहित गुलेरी की रचनाओं को संजोया गया है। उनके व्यक्तित्व का विशद विवेचन है। उनके द्वारा संस्कृत और अंग्रेजी में लिखी रचनाएं हैं।
    गुलेरी इस बात के उदाहरण हैं कि किसी लेखक की केवल एक रचना उसे अमरत्व प्रदान कर सकती है। ‘उसने कहा था’ एक ऐसी अपूर्व अविस्मरणीय कहानी, जिसने भारतीय साहित्य में गुलेरी को अक्षय कीर्ति प्रदान की। अज्ञेय के शब्दों में, ‘गुलेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं, पर उन तीनों में से एक ऐसी सर्वांग सुंदर रचना हुई कि कोई भी कहानी संग्रह उसे लिए बिना प्रतिनिध्त्वि का दावा नहीं कर सकता।’ यह कहानी है ‘उसने कहा था।’ नामवर सिंह के अनुसार, ‘गुलेरी जी हिंदी में सिर्फ एक नया गद्य या नई शैली नहीं गढ़ रहे थे बल्कि वे वस्तुतः एक नई चेतना का निर्माण कर रहे थे।’ यह उल्लेखनीय है कि गुलेरी के ‘कछुआ धर्म’ और ‘मारेसि मोहि कुठाउं’ जैसे निबंध् भी अत्यंत प्रसिद्ध  हुए। भाषाविद् और प्राचीन साहित्य के अचूक मर्मज्ञ के रूप में गुलेरी अद्वितीय सि( हुए।
    स्वाभाविक है कि डाॅ. मनोहर लाल द्वारा सुसंपादित ‘गुलेरी रचनावली’ का ऐतिहासिक महत्त्व है। पाठक, आलोचक, शोध्कर्ता—सबके लिए संग्रहणीय। पुस्तकालयों को समृद्ध  करतीं ऐसी पुस्तकें ही राष्ट्रभाषा हिंदी की पहचान हैं।
  • Aag-Paani Aakaash
    Ramdhari Singh Diwakar
    280 252

    Item Code: #KGP-796

    Availability: In stock


  • The Luck Of The Jews (Paperback)
    Michael Benanav
    395

    Item Code: #KGP-323

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Lekhak Ki Chherchhar
    Kashi Nath Singh
    350 315

    Item Code: #KGP-434

    Availability: In stock

    लेखक की छेड़छाड़ 
    आलोचना की भाषा और रचना की भाषा एक नहीं हो सकती–इस मानने वाले लोग हैं लेकिन काशीनाथ सिंह ऐसे लेखक हैं जिनका प्रबल विश्वास है कि आलोचना भी रचना है । 'लेखक की छेड़छाड़' में उनके इस विश्वास के आधार देखे जा सकते हैं । काशीनाथ सिंह के मूल स्वभाव यहाँ भी देखा जा सकता है–बतकही, चुहल और मजे-मजे में जमाने भर की बात कह देना । वे अपने साथ चलने वाले समकालीनों के काम पर नजर डालते हैं तो अग्रजों को अघर्य  भी देते हैं । उनके अपने कहानी लेखन के अंतरसूत्रों को जानना हो या अभी-अभी के नए कथा परिदृश्य का सिंघावलोकन, यहाँ सब मौजूद है । 'अपना मोर्चा' और 'कशी एक अस्सी' जैसे कालजयी उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया में केवल शोधार्थियों की ही दिलचस्पी नहीं हो सकती और न ही लेखक की सामाजिक भूमिका पर बहस पर किन्हीं ख़ास पाठकों की। यह एक अनुपम गद्य सर्जक के ही बुते की बात है कि वह धूमिल जैसे कवि पर आलेख लिखता है तो गोदान का नए जमाने में महत्त्व भी खोज पाता है । यहां भी काशीनाथ सिंह की पहले दर्जे की गद्य सर्जन का आस्वाद लिया जा सकता  है जो आलोचना, लेख, मूल्यांकन, समीक्षा या स्मृति लेख के रूप में आए हैं । यह लेखक की छेड़छाड़ तो है लेकिन इस छेड़छाड़ की व्यंजन गहरी है और मार दूर तक जाने वाली है । 
  • Das Pranidhini Kahaniyan : Akhilesh
    Sushil Sidharth
    500 450

    Item Code: #KGP-9217

    Availability: In stock

    इस सीरीज़ के अत्यंत महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है वे हैं-चिट्ठी, शापग्रस्त, बायोडाटा, ऊसर, पाताल, मुहब्बत, जलडमरूमध्य, वजूद, शृंखला तथा अँधेरा । 
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale (Paperback)
    Chanderkant Deotale
    90

    Item Code: #KGP-1492

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।

    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।

    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
    -चन्द्रकांत देवताले
  • Ek Thi Sara
    Amrita Pritam
    150 135

    Item Code: #KGP-1978

    Availability: In stock

    एक थी सारा

    मेरी तहरीरों से कई घरों ने मुझे थूक दिया है
    लेकिन मैं उनका जायका नहीं बन सकती
    मैं टूटी दस्तकें झोली में भर रही हूँ
    ऐसा लगता है पानी में कील ठोक रही हूँ
    हर चीज़ बह जाएगी—मेरे लफ्ज, मेरी औरत
    यह मशकरी गोली किसने चलाई है अमृता !
    जुबान एक निवाला क्यूँ कुबूल करती है ?
    भूख एक और पकवान अलग-अलग
    देखने के लिए सिर्फ 'चाँद सितारा' क्यूँ देखूँ ?
    समुंदर के लिए लहर ज़रूरी है
    औरत के लिए जमीन जरूरी है
    अमृता ! यह ब्याहने वाले लोग कहाँ गए ?
    यह कोई घर है ?
    कि औरत और इजाजत में कोई फर्क नहीं रहा... 
    मैंने बगावत की है, अकेली ने,
    अब अकेली आंगण में रहती हूँ
    कि आजादी से बड़ा कोई पेशा नहीं
    देख ! मेरी मज़दूरी, चुन रही हूँ लूँचे मास
    लिख रहीं हूँ
    कभी मैं दीवारों में चिनी गई,
    कभी बिस्तर से चिनी जाती हूँ... 
    [इसी पुस्तक से]

  • Bhartiya Naitik Shiksha : 1
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-264

    Availability: In stock

    हम सभी इस बात से सहमत है कि समाज में गिरते हुए नैतिक मूल्य देश को, समाज को तथा संस्कृति को खोखला कर रहे हैं । प्राथमिक विद्यालय के छात्रों से लेकर उच्च महाविद्यालय के छात्रों में अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर हो रही है। यह अनुशासनहीनता राष्ट्रीय स्तर पर भी यत्र-तत्र देखने को मिल रही है इसका एकमात्र कारण है--शिक्षण कार्य में नैतिक शिक्षा की उपेक्षा।
    भारत एक सांस्कृतिक देश है । यहाँ पर सभी धर्मों का आदर किया जाता है, अत: बालक के सर्वांगीण विकास के लिए परिवार, विद्यालय तथा समाज तीनो को अपना दायित्व संभालना होगा। बालक केवल परिवार का सदस्य नहीं है, वरन् उसे एक उत्तरदायी नागरिक भी बनना है। यदि शिक्षा और शिक्षक ने उसे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी, लिपिक, नेता, श्रमिक बनाकर अपनी भूमिका को पूर्ण मान लिया तो यह एक बहुत बडी त्रुटि होगी। शिक्षा की भूमिया तभी पूर्ण होगी, जब हम नैतिक शिक्षा के माध्यम से बालकों को उचित-अनुचित, अच्छा-बुरा का ज्ञान दे सकें और यह अनुभव करा सकें कि श्रम के कमाए हुए धन का मूल्य भ्रष्टाचार से प्राप्त धन की अपेक्षा कई गुना अधिक है।
    प्रस्तुत पुस्तक इस बात का प्रयास है कि बालक में परिवर्तन ताने के लिए ऐसी विषयवस्तु संकलित की जाए जो उसके नैतिक एवं चारित्रिक विकास में सहायक हो । यह तभी संभव है जब इस विषयवस्तु को बौद्धिक कसरत के रूप में न रखकर जीवन की सार्थकता के रूप में रखा जाए । जैसे जलता हुआ दिया ही दूसरे दीये को जलाता है, वैसे ही प्रखर नैतिक जीवन ही नैतिकता का संचार कर सकता है। अत: नैतिक शिक्षण की प्रभावी परियोजना तैयार कर शिक्षक-बंधु इसका शिक्षण करें।
  • Ajit Kumar : Rachna-Sanchayan
    Ganga Prasad Vimal
    450 405

    Item Code: #KGP-9005

    Availability: In stock

    अजितकुमार: रचना-संचयन
    अजितकुमार अपने समय के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में अग्रणी हैं। उनके लेखन का वैविध्य साबित करता है कि वे अपनी पीढ़ी की सभी विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवियों के बीच कविता के साथ-साथ वे श्रेष्ठ कथाकार हैं। कथाकारों के बीच वे श्रेष्ठ कवि हैं। कवि और कथाकार होने के साथ-साथ वे गंभीर गद्य लेखक हैं। चिंतक, विवेचक और अद्भुत अनुवादक के रूप में उनकी ख्याति सर्वत्र व्याप्त है।
    प्रस्तुत संचयन उनके 80 वर्ष के होने के उपलक्ष्य में तैयार किया गया है। चिर शिशु, चिर किशोर, चिर युवा अजित- कुमार के सृजन में एक साथ कई गुण मिलते हैं। उनमें एक नैसर्गिक विनोदप्रियता है। इस अनोखी आदत के कारण वे सभी वर्गों में लोकप्रिय हैं। उनसे ईषर्या रखने वाले लोग तो उन्हें महिलाओं में ही लोकप्रिय मानते हैं। उनके शत्रुओं का कथन यहाँ ज़्यादा विश्वसनीय लगता है कि उन्होंने स्त्री-रिझावु साहित्य का प्रणयन किया है तथापि स्त्री और पुरुष समान रूप से उनकी रचनाओं के पाठक हैं। कल्पनाशीलता उनकी रचनाओं का आद्य गुण है, किंतु यथार्थ के वे उतने ही बड़े संस्थापक हैं, जितने बड़े वे भाषा के द्वारा वास्तविकता की सजीवता स्थापित करते हैं।
    अजितकुमार के लेखन में समता, असांप्रदायिकता, सौंदर्यवादिता और जनपक्षधरता मौलिक रूप से विद्यमान है। उनका इतिहास-बोध भारतीय उपमहाद्वीप को भौगोलिक और राजनीतिक परिसीमाओं से ज़्यादा उदार घोषित करता है। वे भारत की बहुलता के समर्थक हैं। उनकी रचनाएँ उनकी वैचारिक ऊष्मा की प्रतीक हैं। सृजन के सभी गुणधर्मों का स्पर्श करने वाला अजितकुमार का लेखन परंपरा और आधुनिकता व उत्तर-आधुनिकता के आदर्शों को संकेतित करते हुए सनातनता की अवधारणा को पुष्ट करता है।
  • Betava Bahati Rahee
    Maitreyi Pushpa
    250 225

    Item Code: #KGP-2004

    Availability: In stock

    बेतवा बहती रही
    एक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी !
    नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है ।
    बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा ।
    प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता ।
    उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप ।
    प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mridula Garg
    Mridula Garg
    195 176

    Item Code: #KGP-212

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मृदुला गर्ग  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'ग्लेशियर से', 'टोपी' , 'शहर के नाम', 'उधार की हवा', 'वह मैं ही थी', 'उर्फ सैम', 'मंजूर-नामंजूर', 'इक्कीसवीं सदी का पेड़', 'वो दूसरी' तथा 'जूते का जोड़, गोभी का तोड़' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मृदुला गर्ग की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kucha E Kaatil
    Ram Lal
    175 158

    Item Code: #KGP-2067

    Availability: In stock

    कूचा-ए-कातिल

    यह एक बहुत ही मामूली आदमी की खुदनोश्त
    दास्तान है, जिसने काफी गुरबत देखी है
    और यह महरूमियों का भी शिकार हुआ है ।
    कौमी और समाजी सतह पर इसने
    बेशुमार मसायब का खामोशी से मशाहदा
    किया है और दर-बदरी इसके
    खुन में हमेशा मोजूद रहीं हे।

    मैं इस शख्स को बहुत करीब से जानता हूँ,
    क्योंकि वह मैं ही हूँ। मैंने 1943 से अब तक
    जितने अफ़साने, नावल, ड्रामे, सफरनामे,
    मजामीन वगैरह लिखे हैं, इनमें मेरी
    जाती कैफियतें मुख्तलिफ शक्लों और रवैयों 
    का रूप धारकर हमेशा मौजूद रही हैं ।
    मेरे नज़दीक खुदनोश्त भी एक तरह का
    तखलीकी इजहार है, लेकिन इसमें 
    बयान की गई सच्चाइयाँ
    दूसरी असनाफ़ के मुकाबले में कुछ
    ज्यादा ही खुरदरी और तकलीफदेह हैं।
    -रामलाल
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-4)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1579

    Availability: In stock


  • Shakti Se Shanti (Paperback)
    Atal Bihari Vajpayee
    190

    Item Code: #KGP-459

    Availability: In stock

    शक्ति से शान्ति
    हम सब जानते है कि यह आजादी हमें सस्ते में नहीं मिली है । एक तरफ महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में आजादी के अहिंसात्मक आन्दोलन में लाखों नर-नारियों ने कारावास में यातनाएँ सहन की, तो दूसरी ओर हजारों क्रान्तिकारियों ने हँसते-हँसते फाँसी का तख्ता चूमकर अपने प्राणों का बलिदान  दिया । हमारी आजादी इन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों की देन है ।
    आइये, हम सब मिलकर इनको अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करें और प्रतिज्ञा करें कि हम इस आजादी की रक्षा करेंगे, भले ही इसके लिए सर्वस्व की आहुति क्यों न देनी पड़े ।
    हमारा देश विदेशी आक्रमणों का शिकार होता रहा है । पचास वर्षों के इस छोटे-से कालखंड में भी हम चार बार आक्रमण के शिकार हुए हैं। लेकिन हमने अपनी स्वतंत्रता और अखंडता अक्षुण्ण रखी । इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है—हमारे सेना के जवानों को । अपने घर और प्रियजनों से दूर, अपना सर हथेली पर रखकर, ये रात-दिन हमारी सीमा की रखवाली करते है । इसलिए हम अपने घरों में चैन की नींद सो सकते है । सियाचिन की शून्य से 32 अंश कम बर्फीली वादियाँ हों  या पूर्वांचल का घना जंगल, कच्छ या जैसलमेर का रेगिस्तान का इलाका हो या हिंद महासागर का गहरा पानी, समी स्थानों पर हमारा जवान चौकस खडा है । इन सभी जवानों की जो थलसेना, वायुसेना और जलसेना के साथ-साथ अन्य सुरक्षा बलों से संबंधित है, मैं अपनी ओर से और आप सबकी ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ देता हूँ और इतना ही कहता हूँ कि हे भारत के वीर जवानों । हमें हुम पर नाज है, हमें हुम पर गर्व है । -[इसी पुस्तक से]
  • Parineeta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-78

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ballabh Dobhal
    Ballabh Dobhal
    170 153

    Item Code: #KGP-451

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार बल्लभ डोभाल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उतरा हुआ', 'जय जगदीश हरे', 'चुनाव चक्रम्', 'काठ की टेबुल', 'दूर का दर्शन', 'दर्द अपनेपन का', 'तन का देश : मन का देश', 'खेड़ा गांव', 'बुलडोजर' तथा 'समाधान'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक बल्लभ डोभाल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Sushila
    Manorma Jafa
    175 158

    Item Code: #KGP-7810

    Availability: In stock

    सुशीला
    लंदन में बफाँली हवा चल रहीं श्री। सुशीला को इसका अनुमान नहीं था। उनको लन्दन के घर में ले जाने के लिए कुछ सांग उनके स्वागत के लिए खड़े थे। लंदन में चारों तरफ गोरे-गोरे लोग थे और सबके हाथों में छाता था ।
    लंदन की हबा सुशीला को बडी मनभावनी लगी। भविष्य में विलायत की सब यादें उनके साथ सदा बनी रहें इसलिए वह बाजार गई और उन्होंने सबसे पहले एक कैमरा और कैमरे की रील खरीदी। उसी दुकानदार ने उन्हें कैमरे के बारे में भी विस्तार से बताया, साथ ही साथ कैमरे में फोटो खौब्वेनै की रील भी लया दो। बच्चे सुशीला के पथ थे, वह उसी समय लंदन के ट्रफात्नार स्ववायर में गई। ट्रफग्लार स्वचायर के मैदान में अनगिनत कबूतर जाना चुग रहैं थे। सुहावना मौसम था । सुशीला ने अपनी बेटी को उनके बीच में बैठा दिया। सब सामान बेटे को पकड़। दिया और सबसे पहले कबूतरों के बीच में जैसी हूई बिटिया की तस्वीर खंचि ली।
    अगले दिन वह बच्चों को लेकर लंदन के अजायबघर जू) में गई। तरह-तरह के जानवर देखकर बच्चे बडे खुश हुए ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Suryabala (Paperback)
    Suryabala
    130

    Item Code: #KGP-417

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सूर्यबाला
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सूर्यबाला  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'रेस', 'बिन रोई लड़की', 'बाऊजी और बंदर', 'होगी जय, होगी जय...हे पुरुषोत्तम नवीन !', 'न किन्नी  न', 'दादी और रिमोट', 'शहर की सबसे दर्दनाक खबर, 'सुमिन्तरा की बेटियां', 'माय नेम इश ताता' तथा 'सप्ताहांत का ब्रेकफास्ट'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सूर्यबाला की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • The Mother Of All Books (Paperback)
    Rajni Arun Kumar
    99

    Item Code: #KGP-1451

    Availability: In stock

    Sense has been banned from discotheque, multiplex, several restaurants, shopping mall, plane and many other places of recreation*. And this was even before the baby was born... Yes, Sense was expecting... A baby...
    To make things worse, she has to contend with having no permanent address, a set of friends who think nothing of scrutinising her like a specimen under a microscope, and relatives who mean well. Then there’s the journey of re-discovering her constantly changing body, which for anyone who has crossed puberty is not in the least pleasant – now it’s cold, now it isn’t; now it’s fat, no, it isn’t; now it fits, Ha! Now it doesn’t! All very confusing... For someone who has prided on knowing her mind since she was three, this was allgoing horribly wrong.
    Come due date, and Sense, as usual has managed to get herself into a pickle and is once again, very nearly banned from the hospital*! Can the Baa-lamb (who has the patienceof a saint) and Sense’s parents (whose understanding parallels the Dalai Lama) guide her through these tumultuous times? Will the little one survive Sense’s adventures unscathed? And what other adventures are in store for Sense and family in this journey called Motherhood? 
    *She staunchly insists this is through no fault of hers and blames it squarely on extenuating circumstances.
  • Unke Hastakshar
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-2029

    Availability: In stock

    उनके हस्ताक्षर
    ० एक लम्बा रास्ता गुजर गया, जब एक उपन्यास लिखा था, डॉक्टर देव । अब चालीस साल के बाद जब मैंने उसे फिर से देखा, लगा-उसका  हिन्दी अनुवाद अच्छा नहीं हुआ है । मन में आया, अगर उसका अनुवाद मैं अब स्वयं करूँ, तो उसकी रगों में कुछ धड़कने लगेगा और यही जब करने लगी, तो बहुत कुछ बदल गया ।
    ० इसी तरह एक मुद्दत हो गई, एक उपन्यास लिखा था…'घोंसला' । प्रकाशित हुआ तो बाद में किफायती संस्करण 'नीना' नाम से चलता रहा । आज उसे देखकर लगा कि वह उस कदर पुख्ता नहीं हो पाया था, जो होना चाहिए था । और उसी को अब फिर से लिखा है, जिससे वह सघन भी हो पाया है और पुख्ता भी ।
    ० इसी तरह कभी एक कहानी लिखी थी ‘पाँच बहनें-और उस कहानी को लेकर जब किसी ने फिल्म बनाने की बात की, तो मैंने कहानी को फिर से देखा । अहसास हुआ कि इस जमीन पर जो कहा जा सकता था, वह कहानी में नहीं उतर पाया था। यह अहसास कुछ इस तरह मेरा पीछा करने लगा कि एक दिन मुझे पकड़कर बैठ गया । कुछ और मसले भी थे, जो कहानी में नहीं आ पाए थे । और उन सबको लेकर पाँच की जगह सात श्रेणियों के किरदार सामने रखे और उन सबको कागज़ पर उतार दिया । अब उसे नाम दिया है-उनके हस्ताक्षर' ।
    -अमृता प्रीतम
  • Mayaram Ki Maya
    Jaivardhan
    160 144

    Item Code: #KGP-1820

    Availability: In stock

    ‘मायाराम की माया’ नाटक का केंद्रबिंदु मनुष्य है। सृष्टि के असंख्य जीवों में से मनुष्य एक ऐसा जीव है, जो ईश्वर की सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहता है। जिज्ञासा कहें या फितरत, कभी-कीाी मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व को ललकारता दिखाई देता है। उसका मन नाना प्रकार के विकारों से भरा पड़ा है।
    यही कारण है कि मनुष्य सोचता कुछ है, दिखता कुछ है और करता कुछ और है। समय आने पर प्रगाढ़ संबंधों को भी भूल जाता है। इस संसार में जन्म देने वाले ईश्वर की कृतज्ञता और श्रद्धा को भूल जाता है। ब्रह्मलोक में इसी बात पर चर्चा चल रही है कि क्या मनुष्य इस पृथ्वी लोक का सबसे सीधा जीव है? इस बात को प्रमाणित करने के लिए पृथ्वीलो से ‘मायाराम’ नाम के व्यक्ति को ब्रह्मलोक में लाया जाता है। 
    -जयवर्धन

    ‘मायाराम की माया’ को मैं फार्स की श्रेणी में ही रखना चाहूंगा। इस नाटक की स्थितियों, घटनाओं और चरित्रों की बुनावट जयवर्धन ने फैंटेसी के अंदाज में की है। बाह्य यथार्थ से कोसों दूर, लेकिन आंतरिक यथार्थ के बहुत करीब और नाटक के अंत में ब्रह्मा का नारद से यह कहना ‘‘आप ठीक कह रहे हैं मुनिवर। एक इंसान की गलती की सजा समस्त इंसान को देना ठीक नहीं होगा। यह सृष्टि है। सृष्टि का चक्र सदा चलता रहेगा। हां, भविष्य में इंसान को बनाते समय इंसानियत थोड़ा ज्यादा डालनी होगी।’’
    -प्रताप सहगल
  • Teen Laghu Upanyas : Mamta Kaliya (Paperback)
    Mamta Kalia
    150

    Item Code: #KGP-211

    Availability: In stock


  • Premchand Kee Kahaniyon Kaa Kaalkramanusar Adhyayan
    Kamal Kishore Goyenka
    1100 990

    Item Code: #KGP-671

    Availability: In stock

    प्रेमचंद पराधीन भारत के स्वाधीनताकामी कालजयी कहानीकार हैं। वे विराट् भारतीय जीवन के महागाथाकार हैं तथा उनकी कथा-सृष्टि में महाकाव्यीय चेतना है। वे भारत राष्ट्र एवं स्वराज्य, भारतीय विवेक एवं अस्मिता तथा भारतीय चेतना एवं भारतीयता के कथाकार हैं। प्रेमचंद कथाकार के रूप में वाल्मीकि, व्यास, तुलसीदास, कबीर, भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में आते हैं। ये देश के ऐसे राष्ट्रीय साहित्यकार हैं, जिन्होंने उच्च कोटि के मानवीय जीवन-मूल्यों, आत्म-बोध, स्वत्व तथा अस्मिता की प्रतिष्ठा तथा रक्षा करके भारतीयता को स्वरूप प्रदान करके उसे भारत की आत्मा के रूप में सदैव के लिए प्रतिष्ठित कर दिया। प्रेमचंद का कहानीकार इसी भारतीयता का अन्वेषक, उद्घोषक तथा प्रस्थापक है। प्रेमचंद की कहानी-यात्रा में प्रमुखतः राष्ट्रीय-सांस्कृतिक नवजागरण, गांधीवाद, कभी-कभी माकर्स का साम्यवाद, भारत का अद्वैत-दर्शन इत्यादि उनकी इस यात्रा को अपनी-अपनी दर्शन-दृष्टि के अनुसार आलोकित करते हैं, परंतु प्रेमचंद सभी को अपने भारतीय भाव एवं विवेक से देखते और ग्रहण करते हैं और देश-संस्कृति-मानवता के अनुकूल तत्त्वों को ग्रहण करके अपनी भारतीयता में संग्रथित-संश्लिष्ट करके पराधीन भारत को मुक्ति का एक संदेश तथा एक स्वप्न देते हैं। प्रेमचंद की कालक्रमानुसार कहानी-यात्रा को इस पुस्तक में इसी दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया है। यदि हम भारत को ‘इंडिया’ के स्थान पर ‘भारत’ बनाए रखना चाहते हैं तो प्रेमचंद के कहानी-संसार की मूल आत्मा भारतीयता को अपने राष्ट्रीय-सांस्कृतिक जीवन का अंग बनाना होगा।
    प्रेमचंद की कहानियों के कालक्रमानुसार अध्ययन का यह पहला प्रयास है। इससे पूर्व किसी आलोचक ने न तो इस दृष्टि से सोचा है और न कहानियों को कालक्रम में पढ़ने तथा परखने की ही चेष्टा की है। 
    यहां तक कि हिंदी का कोई आलोचक यह दावा नहीं कर सकता कि उसने प्रेमचंद की कहानियों पर जो कुछ लिखा है, वह उनकी संपूर्ण कहानियों के अध्ययन के बाद ही लिखा है। जिन आलोचकों ने ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों की कहानियों को अध्ययन का आधार बनाया है, वे भी उनमें संकलित 203 कहानियों तक ही सीमित रहे हैं और लगभग 95 कहानियां उनकी पकड़ से बाहर रही हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ‘मानसरोवर’ के आठ खंडों में भी कहानियां कालक्रमानुसार संकलित नहीं हैं, अतः किसी भी आलोचक के कालक्रम से कहानियों के अध्ययन की कोई संभावना भी नहीं रह गई थी। अतः कहानियों पर दिए गए उनके निष्कर्ष एवं आलोचनात्मक अवधरणाएं भी निर्मूल, निरर्थक तथा भ्रमोत्पादक बनकर रह जाती हैं।
    ‘प्रेमचंद की कहानियों का कालक्रमानुसार अध्ययन’—यह पहला प्रामाणिक अध्ययन है, जो प्रत्येक कहानी को कालक्रम में देखता और परखता है तथा कहानी के पूर्वापर संबंधें के रहस्यों को भी उद्घाटित करता है। कोई भी कहानी हो, श्रेष्ठ या साधरण, अच्छी या बुरी, उसे इस अध्ययन में समान रूप से महत्त्व दिया गया है और कहानी की संवेदना, उसकी आत्मा तथा लेखकीय दृष्टिकोण का विवेचन किया गया है और इस प्रकार उनकी उपलब्ध 298 कहानियों की रचना-प्रक्रिया, उनकी मूल चेतना, उनके युग-संदर्भ तथा लेखकीय अभिप्रेत की, कहानी के पाठ के आधार पर, समीक्षा की गई है तथा पुरानी मान्यताओं की परीक्षा के साथ कुछ नई अवधारणाएं स्थापित की गई हैं, किंतु यह काम प्रमाणों तथा तथ्यों एवं तर्कों के आधर पर किया गया है।...
    अतः मेरा विश्वास है कि यह अध्ययन पाठकों को एक नए प्रेमचंद से परिचित कराएगा, जिसे इससे पूर्व न तो खोजा गया था, न देखा गया था, बल्कि उसे दबा दिया गया था।
    –भूमिका से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Rita Shukla (Paperback)
    Rita Shukla
    180

    Item Code: #KGP-510

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : ऋता शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार ऋता शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'प्रतीक्षा', 'छुटकारा', 'देस बिराना', 'विकल्प', 'जीवितोअस्मि…!', 'रामो गति देहु सुमति...', 'निष्कृति', 'सलीब पर चढे सूरज का सच', 'उबिठा बनाम उभयनिष्ठा...' तथा 'हबे, प्रभात हबे' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक ऋता शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Antariksh Itihas Ki Vishal Pariyojana
    Praduman Singh
    240 216

    Item Code: #KGP-721

    Availability: In stock


  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan
    Sudha Arora
    400 360

    Item Code: #KGP-909

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है।
  • Jharkhand Ki Sanskritik Dharohar Saraikela Chhau
    Yogendra Prasad
    190 171

    Item Code: #KGP-398

    Availability: In stock

    झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर सरायकेला छऊ
    सरायकेला छऊ झारखंड की अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है। इस नृत्य में मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य की अभिव्यक्ति इतनी सशक्त है कि बिना संवाद के ही नर्तक पूरी कथा समझा देते हैं। इसकी ताल और गति लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
    सरायकेला छऊ 1930 के दशक से ही कलाप्रेमियों के लिए जिज्ञासा और आकर्षण का केंद्र रहा है। चाहे कला संस्कृति से जुड़ी हस्ती हो, बुद्धिजीवी या फिर राजनीति से ताल्लुक रखने वाली शख्सियत–सभी इस छऊ नृत्य के कायल रहे हैं। इंदिरा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘इटरनल इंडिया’ में सरायकेला छऊ को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। सरायकेला राजपरिवार ने भी इस कला के संरक्षण और संवर्द्धन में अपनी विशेष भूमिका का निर्वाह किया है। इस अनमोल कला के महत्त्व को देखते हुए राज्य सरकार प्रत्येक वर्ष चैत्र पर्व के अवसर पर ‘छऊ महोत्सव’ का आयोजन करने लगी है।
    इस नृत्य ने अपने चारू प्रदर्शन से न सिर्फ देश के कोने-कोने में अपितु विदेशों में भी अपनी धाक जमाई है। 1938 में यहाँ के कलाकारों ने इंग्लैंड, इटली, फ्रांस आदि देशों में इस कला का प्रदर्शन किया और अब तो यह भारत सरकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों का अभिन्न अंग बन चुकी है। इस कला से प्रभावित होकर विदेशों से भी लोग यहाँ प्रशिक्षण के लिए आते हैं।
    भारत सरकार ने भी इस कला का सम्मान किया है। अब तक इस नृत्य से जुड़े छह कलाकारों को ‘पद्मश्री’ से नवाजा जा चुका है। झारखंड की इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत के महत्त्व को देखते हुए सन् 2010 में यूनेस्को ने सरायकेला छऊ को ‘इंटेजिबल कल्चरल हैरिटेज’ की सूची में शामिल कर लिया है। झारखंड राज्य तथा भारतवर्ष की लोकसंस्कृति में सरायकेला छऊ नृत्य शैली गौरवमयी स्थान रखती है।                  
  • Himalaya Gaatha-1 (Dev Parampara)
    Sudarshan Vashishath
    450 405

    Item Code: #KGP-166

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-1 (देव परंपरा)
    महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बाद संस्कृति पर लेखन और यात्रा-वृत्तांत जैसे साहित्य की धीरे-धीरे कमी होती गई । बहुत ही कम ऐसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने आसपास की संस्कृति पर कलम चलाई । ऐसे बिरले साहित्यकारों में सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसा नाम है, जिसने सशक्त कथाकार और कवि होने के साथ-साथ संस्कृति-लेखन में भी बराबर पैठ बनाए रखी। आठवें दशक के आरंभ से लेकर इनके सांस्कृतिक लेख सामने आते रहे । 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी', 'संस्कृति', 'योजना' जैसी पत्रिकाओं तथा सभी समाचार-पत्रों के सांस्कृतिक पृष्ठों में ये बराबर लिखते रहे। कुल्लू के मलाणा गणतंत्र को यही सबसे पहले सामने लाए । 'धर्मयुग' के फागुन अंक में 'फागुन में मलाणा' लेख छपा ।
    ‘आँखिन देखी' और उसका कथात्मक शैली में वर्णन वशिष्ठ के संस्कृति-लेखन की विशिष्टता रही है । पढ़ते हुए ऐसा लगता है, आप यह उत्सव स्वयं देख रहे हैं । सरल और स्पष्ट भाषा से रोचकता के साथ संस्कृति के गंभीर पहलुओं का विश्लेषण, उनकी वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।  संस्कृति का कोई ऐसा पहलू अछूता नहीं रहा है, जिस पर वशिष्ठ ने लेखनी न चलाई हो। इतिहास और परंपरा, धर्म और संस्कृति, मंदिर और पुरातत्त्व, मेले और उत्सव, लोक-परंपरा और लोक-वार्ता कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जो अछूता रहा हो । लेखक की यायावर प्रवृत्ति ने हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राएँ की ।
    यदि इनके अभी तक प्रकाशित हजारों लेखों और दर्जनों पुस्तकों को देखा जाए तो इन्हें दूसरा राहुल कहा जा सकता है । राहुल जी ने बहुत जगह पूरे के पूरे गजेटियर उतार डाले । वशिष्ठ ने ऐसा नहीं किया । इन्होंने संस्कृति को बहुत करीब से देखा । जो देखा, वह लिखा । संस्कृति को निष्पक्ष नजरिए से देखा, परखा, समझा है और फिर लेखनीबद्ध किया है । आशा है, यह संस्कृति श्रृंखला पाठकों, शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Ek Aur Chandrakanta (2nd Part)
    Kamleshwar
    245 221

    Item Code: #KGP-900

    Availability: In stock


  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock


  • Jangal Ke Jeev-Jantu
    Ramesh Bedi
    450 405

    Item Code: #KGP-820

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Gharaunda (Paperback)
    Shanker Shesh
    20

    Item Code: #KGP-7096

    Availability: In stock


  • Patra-Samvad : Ageya Aur Nand Kishore Aacharya
    Krishna Dutt Paliwal
    175 158

    Item Code: #KGP-2018

    Availability: In stock

    पत्र-संवाद  : अज्ञेय और नंदकिशोर आचार्य
    अज्ञेय जी ने पुराने-नए लेखकों को अनगिनत पत्र लिखे हैं। यहीं मैंने नंदकिशोर आचार्य और अज्ञेय के पत्रों को एक साथ दिया है। इन पत्रों का मूल स्वर आत्मीयता से भरा-पूरा है। सार संक्षेप यह कि एक-दूसरे के प्रति स्नेह, आदर का इन पत्रों में एक संसार है। आचार-विचार में मतांतर रहते हुए भी आत्मीय संबंधों की मिठास में कोई कमी नहीं है।
    अज्ञेय जी की अंतरंगता तो बहुतों से रही लेकिन नंदकिशोर आचार्य से उनकी अंतरंगता की कोई सीमा नहीं रही। कभी यात्रा के बहाने, कभी शिविर के बहाने, कभी कार्यक्रमों की योजना के बहाने, कभी व्याख्यान माला के बहाने, कभी कार्यक्रमों में प्रतिभाशाली युवकों को आमंत्रित करने के बहाने अज्ञेय का अकेलापन नंदकिशोर आचार्य से भराव पाता रहा। इस दृष्टि से आचार्य उनके जीवन के 'कीमती' सखा रहे हैं।
    इन पत्रों की कथ्य-कला का सौंदर्य निजता के परम क्षणों का विस्तार है। इस विस्तार ने ही अज्ञेय जी और आचार्य जी के बीच एक अटूट संवाद-सेतु निर्मित किया है । -संपादक
  • Bindu-Bindu Vichar
    Atal Bihari Vajpayee
    295 266

    Item Code: #KGP-9022

    Availability: In stock

    बिन्दु-बिन्दु विचार
    राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि हम राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना लेकर चलें । राष्ट्र कुछ संप्रदायों अथवा जनसमूहों का समुच्चय मात्र नहीं, अपितु एक जीवमान इकाई है, जिसे जोड- तोड़कर नहीं बनाया जा सकता । इसका अपना व्यक्तित्व होता है, जो उसकी प्रकृति के आधार पर कालक्रम का परिणाम है । उसके घटकों में राष्ट्रीयता की यह अनुभूति, मातृभूमि के प्रति भक्ति, उसके जन के प्रति आत्मीयता और उसके संस्कृति के प्रति गौरव के भाव में प्रकट होती है । इसी आधार पर अपने-पराये का, शत्रु-मित्र का, अच्छे-बुरे का और योग्य-अयोग्य का निर्णय होता है । जीवन की इन निष्ठाओँ तथा मूल्यों के चारों ओर विकसित इतिहास राष्ट्रीयत्व की भावना घनी- भूत करता हुआ उसे बल प्रदान करता है । उसी से व्यक्ति को त्याग और समर्पण की] पराक्रम और पुरुषार्थ की, सेवा और बलिदान की प्रेरणा मिलती है । -इसी पुस्तक से

  • Maansik Svasthya Aur Manahchikitsa
    Asha Rani Vhora
    160 144

    Item Code: #KGP-1095

    Availability: In stock

    मानसिक स्वास्थ्य और मन:चिकित्सा 
    विसंगतियों और विद्रूपताओं, भागदौड़ और आपाधापी के संघर्ष और तनाव के माहौल में व्यक्ति या तो भीड़ का अंग होकर रह गया है या फिर आत्मकेंद्रित हो अकेले जूझने के लिए विवश हो गया है । आज लगभग हर व्यक्ति को अपना मानसिक संतुलन कायम रखने में कठिनाई आ रही है । यही संतुलन अधिक गडबडा जाने पर वह अनेक मानसिक आधियों-व्याधियों से घिरने लगता है । अधियां, यानी मानसिक समस्याएँ और व्याधियां, यानी मानसिक रोग । लेकिन दूर मानसिक रोग पागलपन नहीं होता, न ही लाइलाज, जबकि हमारे समाज में फैली अनेक भ्रांतियों के कारण एक ओर लोग सामान्य मानसिक रोगों को भूत-प्रेत-बाधा मान लेते हैं और झाढ़-फूँक के चक्कर में बिना इलाज रोग को और बढा लेते हैं, दूसरी और मामूली मानसिक समस्या के समाधान के लिए भी मानसिक विशेषज्ञ के पास जाने पर व्यक्ति को संदेह की वृष्टि से देखा जाने लगता है । एक स्वस्थ समाज की रचना के लिए पहले व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक होना चाहिए । अत: मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, सभी स्तरों पर अपेक्षित है । इसी अपेक्षा, आकांक्षा, आवश्यकता-पूर्ति की दिशा में एक सदप्रयास है प्रस्तुत पुस्तक ।

  • Himalaya Gaatha-3 (Janjati Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    550 495

    Item Code: #KGP-639

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-3 (जनजाति संस्कृति)
    न जाने कब फहराने लगीं धर्म पताकाएँ हिमप्रदेश के बीहडों में । कब बौद्ध मंत्र भोटी में गूँजने लगे । तथागत कब महाविरोचन, अक्षोभ्य, अमिताभ, अमोधसिद्धि बने । कब आए पदूमसम्भव, रत्नभद्र । इस अभियान में कौन भिक्षु त्यागी हुए । और बौद्ध  वाड़मय से पहले गुफाओं मेँ कौन लोग वास करते थे । क्या कहते हैं, हजारों वर्ष से भी पुराने ताबो मठ के पास चट्टानों पर खुदे गुफा चित्र । ये बाते अभी पूर्णतया स्पष्ट नहीं है । इतिहास ग्लेशियर में छिपी नदी की तरह है ।
    तथापि ए० एच० फ्रेंके तथा दुची जैसे यूरोपीय विद्वानो ने खोले हैं । आज तक इन्हीं का अनुसरण करते जाए शोधकर्ता । हिमालय की संस्कृति पर गंभीरता से मौलिक कार्य नहीं हुआ । कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाई है । 'आँखिन देखी’ के आधार पर संस्मरण, यात्रा और कथात्मक शैली में वर्णन इन का गुण है । सरल, सुरुचिपूर्ण और स्पष्ट भाषा में रोचकता के साथ गंभीर पहलुओं का विवेचन, वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।
    संस्कृति पर लिखने वाले ऐसे बिरले साहित्यकारों में है वशिष्ठ । जो अपनी यायावर प्रवृति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते है । संस्कृति को बहुत करीब से देखा, परखा, समझा और फिर लिखा है । किन्नौर के अंतिम गांव छितकुल और नसज्ञा से लेकर चम्बा के साच दर्रे से होकर सुदूर पांगी तक पैदल यात्राओं के बाद यहाँ की अनूठी संस्कृति पर लेखनी चलाई है ।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत तीसरे खंड में हिमाचल के किन्नौर, लाहौल स्थिति और पांगी-भरमौर जैसे दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों की संस्कृति पर अछूती सामग्री दी जा रही है ।
  • Shubhada
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    270 243

    Item Code: #KGP-574

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amarkant
    Amarkant
    150 135

    Item Code: #KGP-2076

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमरकान्त ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इंटरव्यू', 'जिंदगी और जोंक', 'शुभचिंता', 'लड़का-लड़की', 'फर्क', 'मित्र-मिलन', 'बहादुर', 'बउरैया कोदो', 'श्वान गाथा' तथा 'जनशत्रु'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक अमरकान्त की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Papa, Muskuraiye Na!
    Prahlad Shree Mali
    200 180

    Item Code: #KGP-9299

    Availability: In stock

    मुस्कुराते हुए पापा कितने हैंडसम लगते हैं क्या पापा को यह जानकारी है। कभी तो मम्मी ने उन्हें बताया होगा। कौन जाने मम्मी ने उन्हें मुस्कुराते हुए देखा भी है या नहीं। मम्मी से पूछूं औ वे उदास होकर टेंशन में आ गईं तो। तो मम्मी की शुगर बढ़ जाएगी। वह गंभीर हो जाता है। अपनी मम्मी से बहुत प्यार है उसे। जितना प्यार करता है, उससे ज्यादा श्रद्धा है मम्मी के प्रति। यूं तो हर कोई अपनी मम्मी को चाहता है। महान् मानता है। लेकिन मेरी मम्मी वाकई ग्रेट हैं। इस विश्वास का ठोस आधार है अनंतके पास।
    मम्मी बड़ी संवेदनशील हैं। उसकी भावनाओं का ध्यान रखती हैं। कहीं वह कमजोर पड़कर भटक न जाए। अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं मम्मी। तभी तो उस दिन पापा का पक्ष लेते हुए विस्तार से बताया था, उनके ऐसे स्वभाव के बारे में। जिस दिन पापा ने छोटी-सी बात पर तुनककर उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया था। कहीं पापा के प्रति उसके भावुक किशोर मन में नफरत घर न कर डाले। इसी चेतनावश मम्मी ने लाड़-दुलार से पास बिठाकर उसे समझाई थीं। मम्मी की इस जागरूकता से अभिभूत है अनंत। वाकई मम्मी यदि यह सब नहीं बतातीं तो पापा के प्रति उसके मन में कड़वाहट निरंतर बढ़ती जाती। यह मम्मी का उस पर बहुत बड़ा उपकार है।
    —इसी पुस्तक से
  • Bayaan
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-684

    Availability: In stock


  • Honour Killing Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    80

    Item Code: #KGP-1269

    Availability: In stock


  • Kaaya Ke Daaman Mein
    Amrita Pritam
    125 113

    Item Code: #KGP-1960

    Availability: In stock

    काया के दमन में
    एक प्राचीन गाथा कहती हूँ कि अत्रि ऋषि जब अग्निवेश को काया तंत्र क्य रहस्य बता रहे थे, तो उन्होंने कहा- 'कालगणना से चार युग कहे जाते हैं, वही चार युग इन्सान की काया में होते हैं... 
    जन्म के साथ इंसान जो मासूमियत लिए हुए होता है, एक बीज से फूल की तरह खिलती हुई मासूमियत, जो समय सतयुग होता है... 
    अग्निवेश खिले हुए मन से ऋषि की ओर देखने लगे तो ऋषि बोले-'इंसान की ज़वानी जो सपनों में सितारे की गलियों में चली जाती है, वे त्रेता युग होता है…”
    … अग्निवेश का चेहरा गुलाबी से रंग का हो गया जो ऋषि मुस्काए, कहने लगे-'और जब उम्र पक जाती है, मन-मस्तक से ज्ञान की लौ झलकने लगती है, तो वहीं द्वापर युग होता है...' 
    इतना कहने के बाद ऋषि खामोश हो गए तो अग्निवेश ने पूछा-'महाऋषि ! फिर कलियुग कौनसी अवस्था होती है ?'
    उस समय अवि ऋषि ने कहा-'तन और मन में जब विकार भी है, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और भय पैदा होते हैं- वही कलिकाल की बेला है ।'
  • Mushkil Kaam
    Asghar Wajahat
    160 144

    Item Code: #KGP-1829

    Availability: In stock

    मुश्किल काम
    लघुकथा के संबंध में फैली भ्रांतियों को तोड़ती असग़र वजाहत की लघुकथाएँ अपनी विशिष्ट शैलियों तथा व्यापक कथ्य प्रयोगों के कारण चर्चा में रही हैं। वे पिछले पैंतीस साल से लघुकथाएँ लिख रहे हैं। उनकी लघुकथाएँ इन अर्थों में अन्य लघुकथाओं से भिन्न हैं कि उनकी लघुकथाएँ  किसी विशेष शैली के सामने समर्पण नहीं करती है। पंचतंत्र की शैली से लेकर अत्याधुनिक अमूर्तन शैलियों की परिधि को अपने अंदर समेटे असग़र वजाहत की लघुकथाएँ पाठक का व्यापक अनुभव जगत् से साक्षात्कार कराती हैं। प्रस्तुत लघुकथाएँ सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विषयों तक फैली हुई हैं। सामाजिक प्रतिबद्धता इन लघुकथाओं की एक विशेषता है, जो किसी प्रकार के अतिरिक्त आग्रह से मुक्त है। इन लघुकथाओं के माध्यम से मानवीय संबंधों, सामाजिक विषमताओं और राजनीतिक ऊहापोह को सामने लाया गया है।
    निश्चित रूप से प्रस्तुत लघुकथाएँ हिंदी लघुकथा की विकास-प्रक्रिया को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Usha Kiran Khan (Paperback)
    Usha Kiran Khan
    140

    Item Code: #KGP-504

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : उषाकिरण खान
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार उषाकिरण खान ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'मौसम का दर्द', 'दूब-धान', 'नीलकंठ', 'कौस्तुभ-स्तंभ', 'कुमुदिनी', 'जलकुंभी', 'तुअ बिनु अनुखन विकल मुरारि', 'नटयोगी', 'घर से घर तक' तथा 'हमके ओढ़ा  द चदरिया हो, चलने की बेरिया'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक उषाकिरण खान की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mahaan Deshbhakt Pt. Madan Mohan Malviya
    Rashtra Bandhu
    60

    Item Code: #KGP-1059

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Ibbar Rabbi (Paperback)
    Ibaar Rabbi
    90

    Item Code: #KGP-1406

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : इब्बार रब्बी
    बचपन में महाभारत और प्रेमचंद होने का भ्रम, किशोर अवस्था में छंदों की कुंज गली में भटकने का भ्रम, फिर व्यक्तिवाद की दलदल में डुबकियां । लगातार भ्रमों और कल्पना-लोक में जीने का स्वभाव । क्या आज भी किसी स्वप्न-लोक के नए मायालोक में ही खड़ा हूं? यह मेरा नया भ्रम है या विचार और रचनात्मकता की विकास-यात्रा? क्या  पता । कितनी बार बदलूं।
    नया सपना है शमशेर और नागार्जुन दोनों  महाकवियों का महामिलन । इनकी काव्यदृष्टि और रचनात्मकता एक ही जगह संभव कर पाऊं । जटिल और सरल का समन्वय, कला और इतिवृत्तात्पकता एक साथ । ध्वनि का अभिधा के साथ पाणिग्रहण ।  नीम की छांह में उगे पीले गुलाबों की खुशबू से नाए रसायन, नए रंग और नई गंध जन्म लें । गुलाबों की शफ्फाक नभ-सी क्यारी में बीजों-सी दबी निबोलियां । इस नई मिट्टी और खाद से उगने वाले फूल, लताएं और वनस्पतियां बनें मेरी कविता ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Himanshu Joshi
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-869

    Availability: In stock

    कहानियां कहानियां होते हुए भी कहीं सच भी होती हैं । बल्कि सच से भी अधिक सच । हिमांशु जोशी की ये कहानियां उसी सच को रेखांकित करती अनाज के यथार्थ से साक्षात्कार कराती हुई कई प्रश्न जगाती हैं ।
    इन रचनाओं की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, इनकी सरलता, सहजता एवं मार्मिकता। सरल शब्दों में बड़ी बात कह देना बड़ा कठिन कार्य है। परंतु हिमांशु जोशी की इस महारत ने आज के अनेक कथाकारों के बीच उनकी अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई हैं । शायद इसीलिए ये कहानियां कहानियां  होते हुए भी जिए हुए जीवन के जीवंत अंश-सी लगती हैं । इनमें स्पदित होता यथार्थ, इन्हें सच के इतने निकट ले जाता है कि ये सच का ही पर्याय बन जाती हैं । किसी की अपनी ही जीवन-गाथा के सजीव दृश्य !
    इनमें धुँधलाए गाँव हैं मैले कस्बे, भीड़-भरे महानगर ! दिन-रात हांफते-कांपते, यंत्रवत जीते लोग ! उनके दुःख-सुख । उनकी समस्याएं ! एक नन्हे-से संसार में समाए कई-कई संसार !
    गहन अनुभव एवं अनुभूतियों के ताने-बाने से बुनी  इन रचनाओं के कुछ अलग रंग हैं। अलग राग ।
  • Kavi Ne Kaha : Anamika (Paperback)
    Anamika
    90

    Item Code: #KGP-1317

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : अनामिका
    अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करती ।
    भारतीय स्त्रियों के जीवन-संघर्ष तथा हास-परिहास और गीत-अनुष्ठान आदि के जरिए पीड़ा को सह पाने की उनकी परंपरागत युक्तिहीन युक्ति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने पर अनामिका की कविताओं के नए अर्थ खुलते हैं, जिन तक कविता को देखने-परखने के रूढ़ ढाँचे को तोड़कर ही पहुंचा जा सकता है ।
    उनकी संवेदना का फैलाव उन वंचित जनों तक है, जिनसे एक स्त्री की करुणा सहज रूप से जुड़ जाती है । लोकभाषा के शब्द उनके यहाँ किसी गुर की तरह नहीं आते, बल्कि वे उनके अनुभव का अनिवार्य हिस्सा हैं । 'जनमतुआ' बच्चे की 'चानी' की तरह 'पुलपुल' कविताओं में परिपक्व कठोरता की विपुल संभावनाएं अंतर्निहित हैं । हिंस्र  समय के प्रतिरोध का उनका अपना ढंग है, जो भारतीय स्त्रियों की प्रतिरोध की परंपरा की गहरी समझ और संवेदनात्मक जुड़ाव से उपजा है ।
    समस्याओं और घटनाओं को देखने का उनका दृष्टिकोण एक ऐसी संवेदनशील स्त्री का दृष्टिकोण है, जिसके भीतर अभी भी निष्पाप बचपन बचा हुआ है । संवेदना का यही वह धरातल है, जो हमारे समय से उन्हें विशिष्ट बनाता है ।
  • Aalamgeer
    Anamika
    150 135

    Item Code: #KGP-1903

    Availability: In stock

    [जहानारा के चले जाने पर औरंगजेब पुश्तैनी तलवार को उठाकर देर तक देखता रहता है।]
    औरंगजेब : दिल्ली के तख्त पर बादशाह सलामत मुझे खुद बिठा रहे  हैं ।  बादशाह सलामत समझ गए हैं कि मैं ही हुकूमत करने के काबिल हूँ । (उल्लास के साथ) एक ही झटके से पका-पकाया फल गोद में आ गिरा है । (ऊपर-नीचे टहलता है) पर नहीं, यह खुदावंदताला की बख्यिश है ।  यह बरकत  खुदावंदताला की ही हुई है, और किसी की नहीं । 
    [कहीं से हलकी-सी आवाज आती है ।]
    आवाज़ : जहानारा ने जो कुछ कहा, तुमने फ़ौरन ही मान लिया । 
    औरंगजेब : वह बादशाह सलामत की तरफ़ से पेशकश लाई थी ।
    आवाज़ : पर यह एक चाल भी तो हो सकती है ।
    औरंगजेब : चाल क्यों ? यब 'आलमगीर' तलवार, भी उसने साफ कहा हैं कि दिल्ली के तख़्त पर तुम बैठोगे ।
    आवाज़ : वह दिल्ली तृम्हारे दुश्मनों से घिरी  होगी । दारा शूकोह जो इस वक्त भागता फिर रहा है, वह फिर से पंजाब का सूबेदार बनकर लोट आएगा, मुरादबख्श गुजरात में और शुजा बंगाल में । क्या तुम भूल गए कि दारा को ज़हानारा ने ही वली अहद बनवाया था । दारा और जहानारा दो जिस्म एक जान है । दोनों सूफी मुल्लाशाह के शागिर्द।  दिल्ली मुल्लाशाह के मुरीदों का अड्डा बनेगी ।
    औरंगजेब : (स्वत:) सब बात वहीं को वहीं लौट आएगी । ...पर बादशाह सलामत ने मुझे दिल्ली का तख्त अता फर्माया है ।
    आवाज़ : नहीं, वह तुमने अपनी तलवार के जोर में हासिल किया है । वह तुम्हें खुदावंदताला के फजल से मिला है । यह नादर मौका है, औरंगजेब । फिर ऐसा नायाब मौका तुम्हारे हाथ नहीं आएगा । इस चाल को समझो, औरंगजेब । बादशाह सलामत तुम्हारे हाथ में बिल्ली के तख़्त  का झुनझुना पकड़ा देना चाहते है । दारा शुकोह  को बहाल करने का उनके पास यही एक तरीका है ।
    औरंगजेब : (स्वत:) न जाने कौन लोग बादशाह सलामत ने मिलने  आते है । उनके इरादे कौन जान सकता है ? किले की ऊंची दीवारों के पीछे न जाने साजिशें पक रही हैं।
    आवाज़ : दारा की सुबेदारी बहाल होगी तो वह फिर से फ़ौजें मुनज्जम कर सकता है । बादशाह सलामत उसकी पीठ पर हैं । वह अभी भी अपने आपको वली अहद समझे हुए है ।
    औरंगजेब : बादशाह सलामत दारा की पीठ पर है तो ख़ुदावंदताला  मेरे हक में है ।  ख़ुदावंदताला  ने मुझे दिल्ली के तख़्त का हकदार करार  दिया है । वरना मेरो फतह क्योंकर होती ? यह फतह नहीं एक करिश्मा था ।  ख़ुदावंदताला  में मुझे अपना एलची बनाकर भेजा है । उन्हें मुझ पर भरोसा है । पूरा एतमाद है । [इसी पुस्तक से]
  • Tukara-Tukara Waqt
    Shashi Sahgal
    60 54

    Item Code: #KGP-1866

    Availability: In stock

    टुकड़ा-टुकड़ा वक्त
    शशि सहगल की कविताओं के केन्द्रीय स्वर को जानने के लिए उनकी एक कविता 'असर' पर नज़र डाले :
    झाड़ा-पोंछा
    दिखने में साफ
    कलफ लगी साडी-सा
    कड़क व्यक्तित्व ओढ
    बाहर जाना अच्छा लगता है ।

    ढ़ीले-ढाले वजूद के
    घर के पायदान पर ही छोड़
    हीन भावना से उबरती हुई देह
    दो कदम बाहर रखते ही
    आत्मविश्वास से भर उठती है
    कलफ़ का असर
    कुछ ऐसा ही होता है ।

    शशि जी की कविताएँ घर के अन्दर की कविताएँ जरूर है, लेकिन वे घर में बंद नहीं हैं और ना ही घर और परिवार के संबंध मात्र ही उनकी कविताओं की सीमा हैं । वे घर से बाहर भी झाँकती है और अपने से बाहर भी । अपने भीतर और बाहर तथा घर के अन्दर और घर से बाहर के द्वन्द्वात्मक रिश्तों की वजह से आई दरारें उनकी कविताओं का विषय बनती हैं । उनके पहले कविता-संग्रह में भी इस संवेदन के पहचान बड़े गहरे स्तर पर रही है । इस कविता-संग्रह में यह संवेदन और भी गहराया है । इसमें कहीं मूल्य तलाशने की उत्कटता भी है, 'बाजार' होते रिश्तों में कहीं खुद को बचाकर रखने की केशिश भी । यही इन कविताओं के शक्ति है ।

  • 20-Best Stories From Europe
    Prashant Kaushik
    545 491

    Item Code: #KGP-9318

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. European short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Elsi, The Unusual Farm Maid by Jeremias Gotthelf, The Jews’ Beech-tree by Annette Von Droste-hülshoff, The Broommaker of Rychiswyl by Jeremias Gotthelf, Fair Eckbert by Ludwig Tieck, How Joggeli Finds A Wife by Jeremias Gotthelf, A Little Legend of the Dance by Gottfied Keller, this book is a compilation of 20 famous European short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Europe.
  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta (Paperback)
    Dr. Kripa Shanker Singh
    240

    Item Code: #KGP-7087

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Samkalin Sahitya Samachar January, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #January, 2017

    Availability: In stock

  • Akasmaat Kuchh Kavitayen (Paperback)
    Surendra Pant
    160

    Item Code: #KGP-7216

    Availability: In stock

    हिंदी कवियों ने अपने काव्य-मुहावरों को यदि रसिकतापूर्ण काव्यरूपों से श्रृंगारित किया है तो कुछ कवियों ने कविताओं को चीखने की स्वतंत्रता भी दी है। मगर इस संगह की कविताओं में पाठक पाएंगे कि कवि का सरोकार बृहत्तर मानवता की उपस्थिति करने में कई बार वह संप्रेषणीयता की रूप-सज्जा की भी परवाह नहीं करता। व्यापक जनहितों की आकांक्षाओं के बीच से अंकुरित इन कविताओं को सच्चे ईश्वर, खरे अध्यात्म तथा खनकदार वर्तमान की चाहत है, जो भोले-भाले लोक को उसकी निष्कपटता लौटा सके। ‘मदर टेरेसा’ पर केंद्रित कविता को पढ़कर हमें कवि की मानवगत अवधारणाओं का समूचा अहसास होता है।
    पुलिस विभाग के अत्यंत महत्वपूर्ण एवं ‘संवेदनशील’ पद का निर्वहन करते हुए यह कवि समाज और राजनीति की ‘रणनीति’ में लाखों-लाख हंसते-रोते हैवानों-इंसानों के परम-चरम अनुभवों का साक्षी रहा है, इसीलिए ये कविताएं हमारे समय और समाज की धाराओं-उपधाराओं के रूप में कवि के सामने ‘पेशी’ पाकर शब्दांकित होती हैं। संभवतः इस अनुभवबहुलता ने कवि को किसी इकहरे विषय का मर्मज्ञ न रहने देकर, सर्वत्र का प्रवक्ता कवि भी बना दिया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस विविधता के बावजूद कवि का ध्यान अपने देश, संस्कृति और जन पर लगभग प्रत्येक कविता मंे कंेद्रीकृत हुआ है।
    कहना न होगा कि इन कविताओं के नए तेवर का आगमन भले ही अकस्मात् रूप में हुआ है, मगर निश्चित ही इनका सृजन गहरी विचारशीलता के बाद ही संभव हुआ होगा।
  • Dehri Bhai Vides
    Rajendra Yadav
    400 360

    Item Code: #KGP-70

    Availability: In stock


  • Encounter-E-Love Story Tatha Anya Prem Kahaniyan
    Shyam Sakha 'Shyam'
    200 180

    Item Code: #KGP-1843

    Availability: In stock

    एनकाउंटर-ए-लव स्टोरी तथा अन्य प्रेम कहानियां
    डॉ. श्याम सखा 'श्याम' की कहानियां, देह में आती-जाती ठहरती-बिछलती सांसों की तरह हैं। इनमें आशाओं की ऊष्मा है, निराशा की ठंडक है, उत्साह और आत्मविश्वास की आंच हैं। इन कहानियों का आकार भी सांसों की ही तरह लघु-दीर्घ और मदमय है, सब कुछ अनायास और निश्चित, एक लय-ताल में बद्ध । कहीं छोटी भी ही सांस में देह में दीप्ति है तो कहीं दीर्घ श्वास ने पूरी काया को कंपित कर दिया है।
    जैसे श्यास ही जीवन का सूचक है, वैसे ही कहानी की रोचक वस्तु ही प्राणधार है। सेक्स की लंतरानी को जगह प्रेम की फुहार हैं। यहां रंगरलियां नहीं हैं, अंगरलियां हैं और उसकी स्वनिर्मित सैंद्धन्तिकी भी हैं। पठनीयता इस कदर कि हाथ से कहानी रखते न बने; गालिब की भाषा में 'बुझाए न बने ' सी हालत.. बस संग्रह की हर कहानी ऐसी ही आतिश है जिस पर कांई जोर नहीं चलता।
    इन कहानियों का कैनवास बहुत बड़ा है। सभी वर्गों की जिंदगियां यहां हाथ उठाए खडी हैं कि पहले हमारी तरफ देखो । पाठक विस्मय से इन सबकी ओर उत्सुक भाव से देखता है । वह जिसका हाथ पकड़ लेता है, वही उसे एक ऐसे अनुभव संसार में ल जाती है जो उसके लिए अपरिचित भले न हो परंतु परिचित भी नहीं था; जैसे कोई किमी मुहल्ले के मुहाने तक तो पहुंचा हो, परंतु भीतर कभी न जा सका हो।
    ये कहानियां, मन और ममाज के ऐसे ही अल्प-परिचित मुइल्लों में पाठक को खींच ले आती हैं। श्याम सखा 'श्याम' एक समर्थ कथाकार है, कहना चाहिए कि इंसानी जिंदगी के कुशल लेखा-जोखाकार हैं। इनकी नाप-जोख, ऐसी जानी पहचानी और अपनत्व वाली भाषा में है जी पल भर का भी पराई नहीं लगती।
    एक ओर किशोर प्रेम की कोमलांगी कहानी रसभरी पाठक को उसकी अपनी किशोर अवस्था के स्नेह कणों से भिगो देती है तो दूसरी ओर प्रेमिका की मजबूरी व एनकाउंटर- ए-लव स्टोरी प्रेम के भयावह यथार्थ को उकेरती सफल कहानियां हैं। एनकाउंटर शब्द प्रेम के साथ अजीब लगते हुए भी कहानी शीर्षक की सार्थकता को सिद्ध करने में सफल है ।
  • Aadivasi : Srijan Mithak Evam Anya Lokkathayen (Paperback)
    Ramnika Gupta
    200

    Item Code: #KGP-509

    Availability: In stock

    आदिवासी संस्कृति अब तक ज्ञात मानव सभ्यताओं में सबसे प्राचीन है। इस समाज की लोककथाओं-गाथाओं में मानव सभ्यता के शुरुआती दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यबोध की झलक तो मिलती ही है, साथ ही ये हमें आदिम मनुष्य को विस्मित कर देने वाली कल्पना की उड़ान और मनुष्य की आकांक्षाओं-अपेक्षाओं की मंत्र-मुग्ध करने वाली विरासत भी सौंपती हैं। ये कथाएँ--मिथक मानव सभ्यता के विकास की कथाएँ हैं--परिवर्तनों की दस्तकें दर्ज हैं इनमें--कल्पना और यथार्थ की भाषा में बोलती हैं ये कथाएँ। यदि हमने मौजूदा भूमंडलीकरण के दौर में मानव सभ्यता की इस विरासत को सुरक्षित नहीं रखा तो वर्तमान पीढ़ी के साथ ही ये विस्मृत हो जाएँगी।  
    इस संकलन में झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार की कथाओं को शामिल किया गया है। इन्हें पाठकों की सुविधा के लिए 12 खंडों में विभाजित किया गया है। पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित खंड में आदिवासी समूहों व समाजों में मौजूद आस्थाओं, विश्वासों व उनकी अपनी-अपनी अवधारणाओं पर आधारित लोककथाएँ शामिल की गई हैं।
    ‘पशु-पक्षी और जलचर खंड’ में संताली की ‘छोटी चिड़िया की कथा’ में छोटी चिड़िया की वीरोचित कथा का संवाद सुनकर मानव में एक संदेश पहुँचता है कि कैसे एक छोटी चिड़िया भी एक अन्यायी एवं अहंकार से भरे हाथी का दर्प-दलन कर सकती है। यह साहस तभी जुटने लगता है, जब कोई व्यक्ति अथवा प्राणी सत्य-पथ पर चलकर किसी अत्याचारी के विरुद्ध अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति एवं संकल्प के साथ सामना करने के लिए तैयार हो। इस खंड में मानव और अन्य जीवों के बीच भावनात्मक संबंधों की प्रेरणादायक कथाएँ संकलित हैं। 
    इसके अलावा ‘प्रेम-कथा’, ‘विवाह, गोत्र और रीति- रिवाज’, ‘रिश्तों का सच’, ‘कायांतरण’ और ‘लोकजन्य कथाएँ’ खंड की मिथ कथाओं में स्वैरागात्मक व संवेदनाओं, सामाजिक गतिविधियों के उद्भव व विकास, प्रकृति के सहयोग व संवाद और मनुष्य की विभिन्न अच्छी-बुरी प्रवृत्तियों को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Ramnika Gupta
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Jalte Huye Daine Tatha Anya Kahaniyan
    Himanshu Joshi
    225 203

    Item Code: #KGP-25

    Availability: In stock

    जलते हुए डैने तथा अन्य कहानियाँ
    'जलते हुए डैने' से 'इस बार' तक की कथा-यात्रा के ये अनेक पड़ाव है । अनुभव एवं अनुभूतियों के कई अक्स ! जीवन और जगत में जो हो रहा है, उसके कुछ धुँधले, कुछ उजले रेखा-चित्र ! पर रेखा-चित्रों में यथार्थ की मात्र रेखाएँ ही नहीं, कहीं-कहीं कुछ रंग भी है, जो मिट कर मिटते नहीं । घुलने के बावजूद भी घुलते नहीं । स्मृति-पटल पर ऐसे अंक्ति हो जाते है, जैसे पाषाण पर उकेरी गहरी रेखाएँ । रेखाओं की भी अपनी भाषा होती है । रेखाओं के भी अपने सुख-दु:ख, अपनी व्यथा-वेदना होती है ।  इस निखिल सृष्टि में ऐसा कुछ भी तो नहीं, जो अर्थपूर्ण न हो ! जिसकी अपनी कोई सार्थकता न हो !
    अनेक सत्यों को परिभाषित करती ये सरल, सहज, सपाट-सी कहानियाँ, कहीं कुछ न कह कर भी कितना कुछ नहीं कह जाती । असत्य का यथार्थ, सत्य के यथार्थ से सम्भवत: आज़ अधिक गहरा होता है । अधिक विस्तृत, अधिक प्रामाणिक । प्रासंगिक ही नहीं, अधिक आकर्षक भी । शायद इसलिए हर दौड़ में सत्य के पाँव, झूठ से पीछे रह जाते हैं ।  पर असत्य जीत कर भी हार क्यों जाता है ? जल में पड़ी परछाई पकड़ने की तरह आदमी कुछ चाहता है । परन्तु जो है, और जो होना चाहिए के बीच की संधि-रेखा इतनी धुँधली क्यों है ?

  • Mahan Deshbhakt Swami Shraddhanand
    Jagat Ram Arya
    140 126

    Item Code: #KGP-9111

    Availability: In stock

    महान् देशभक्त स्वामी श्रद्धानन्द
    धर्मवीर, कर्मवीर, निर्भीक संन्यासी, जिनके नाम से अंग्रेज सरकार भी डरती थी, जिनको महात्मा गांधी ने अपना गुरु माना, उन्हीं स्वामी श्रद्धानन्द जी  के बारे में आज तकभारतीय जनता यही समझनी रही है कि वे आर्य संन्यासी थे— उन्होंने केवल आर्यसमाज का ही प्रचार किया, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है । स्वामी श्रद्धानन्द जी ने आर्यसमाज के प्रचार के साथ-साथ देश की एकता के लिए, देश को विदेशी सरकार की गुलामी से आजाद कराने के लिए, साम्प्रदायिकना का बीज नाश काने के लिए, देज्ञा का गौरव बढाने के लिए जो महान कार्य किए उसी के फलस्वरूप आज भारत स्वतंत्र  है। प्रस्तुत जीवनी में स्वामी जी  के राष्ट्रीय जीवन पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है ।

  • Yahaan Se Kahin Bhi
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2092

    Availability: In stock

    यहाँ से कहीं भी
    'सफ़री झोले में' के बाद 'यहाँ से कहीं भी' अजितकुमार की यात्राओं का दूसरा संग्रह है । उनकी कविता ही नहीं, समीक्षा-कहानी-उपन्यास संरमरणादि के भी पाठक जानते है कि अजितकुमार विधाओं की जकड़बंदी म नहीं फंसते। लेखन उनके लिए कोई समर-भूमि नहीं, जहाँ जिरह-बख्तर से लेख वे लगातार तलवार  भाँजने रहें या अंतरिक्ष-यात्री का लबादा ओढ़ लंबे सफ़र पर निकल पडे ।  वह उनके लिए संवाद का सरल माध्यम है, कभी-कभी तो अपने-आप में ही संवाद का।  एक रंग के भीतर मौजूद तमाम रंग जैसे इंद्रधनुष में बिखर उठते है, कुछ-कुछ वैसा ही दृश्य— डायरी, टीप, रेखाचित्र, आत्मकथा, रपट, वार्ता जैसे  बहुत कुछ को झलकाता यात्रावृत्तों में मिलेगा।  जटिल या सरल, वह दृश्य जैसा भी है— यदि आपके लिए भी प्रीतिकर हुआ तो इम कामना की संभावना रहेगी कि जैसे उनके यात्रा-दिन बहुरे, वैसे आपके भी बहुरें । 

  • Toro Kara Toro-5 (Paperback)
    Narendra Kohli
    300

    Item Code: #KGP-505

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : ShrInaresh Mehta
    Shree Naresh Mehta
    245 221

    Item Code: #KGP-871

    Availability: In stock


  • Vigyan Ka Itihaas
    Dyanand Pant
    300 270

    Item Code: #KGP-748

    Availability: In stock

    विज्ञान का इतिहास
    विज्ञान की अद्भुत प्रगति विश्व-भर के चिंतकों और कर्मठों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफलन है। धर्म, देश, जाति, भाषा आदि की सीमाएँ विज्ञान को बाँध न सकीं। प्रस्तुत पुस्तक में इसी सार्वभौम विज्ञान की समग्र गाथा का रोचक वर्णन है। आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव की विलक्षण उपलब्धियों वाली इस विश्वव्यापी बौद्धिक यात्रा का लेखा-जोखा बिना पूर्वग्रहों के प्रस्तुत करने और पाश्चात्य लेखकों के पक्षपातपूर्ण प्रतिपादन का पर्दाफाश करने का लेखक का प्रयत्न सराहनीय है।
    जनसाधारण सुलभ भाषा और रोचक शैली में लिखी अपने विषय की हिंदी की यह प्रथम मौलिक पुस्तक ज्ञानवर्द्धक होने के साथ-साथ पाठक में चिंतन और तर्क की वैज्ञानिक विधि के विकास में भी सहायक होगी।
  • Maanush Gandh
    Suryabala
    200 180

    Item Code: #KGP-53

    Availability: In stock

    मानुष-गंध
    अपने इस कथा-संग्रह में सूर्यबाला फिर से कथ्य और शिल्प के अपने पुराने प्रतिमानों को तोड़ती नजर आती हैं।
    एक तरफ ‘क्रासिंग’ और ‘क्या मालूम’ जैसी कहानियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों के कुछ अनूठे और अबोध रहस्यों को थहाती हैं तो दूसरी तरफ ‘जश्न’ और ‘तिलिस्म’ भावुकता को थिराते हुए एक विरल कथा-रस की सृष्टि करती हैं।
    कुछ ऐसा लगता है जैसे लेखन में चलने वाले ट्रेंड, फैशन से सूर्यबाला को परहेज-सा है। लेकिन इसका अर्थ, समय की तल्ख सच्चाइयों से मुकरना या उन्हें नकारना हर्गिज नहीं है। इसी तरह अपनी कहानियों के कैनवस पर, ‘लाउड’ और अतिमुखर रंग-रेखाओं के प्रयोग से भी बचती हैं वे। उनके पात्रों के विरोध और संघर्ष मात्र विध्वंसक न होकर विश्वसनीय और विवेकसम्मत होने पर ज्यादा जोर देते हैं।
    सिद्धांतों, वादों और आंदोलनों के ऊपरी घटाटोपों से बचती हुई जिजीविषा की भरपूर मानुष-गंध लेकर चलती हैं इस संग्रह की कहानियाँ।
  • Mahaan Sant Raidas
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-208

    Availability: In stock


  • Moldeviya Ki Lokkathayen
    Sanjiv Thakur
    175 158

    Item Code: #KGP-195

    Availability: In stock

    मोल्देविया की लोककथाएँ
    मोल्देविया (वर्तमान नाम मोलदोव (Moldova)) उक्रेन के पास एक छोटा-सा देश है। वहाँ  लोककथाओं की अच्छी-खासी परंपरा रही है। लोककथाओं के साथ-साथ वहीं लंबी-लंबी परीकथाएँ भी कही-सुनी जाती रही हैं। इस संग्रह मेँ उनमें से कुछ लोककथाएँ और परीकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं। संग्रह में प्रस्तुत लोककथाओं में जहाँ जनजीवन से जुडी बाते है, वहीँ परीकथाओं में अदभुत कल्पनालोक दिखाई देता है । इन्हें पढ़कर मोल्देविया के सामान्य लोगों के कल्पनाशील होने का पता चलता है तो अपने समाज के यथार्थ के प्रति उनके जागरूक होने का पता भी चलता है। एक तीसरी धारा हास्य की है जो मोल्देविया के जन-मानस में बहती दिखाई देती है ।
    राजा, राजकुमारी, राजकुमार, जमींदार, पादरी, गरीब आदमी, गड़रिया, ड्रैगन, दैत्य आदि अच्छे-बुरे पात्रों के द्वारा कही गई ये कथाएँ अच्छाई, बुराई, चालाकी, दुष्टता, बुद्धिमानी, मूर्खता, शत्रुता, मित्रता जैसी चीजो से पाठकों का परिचय अनायास करवा सकती है ।
    मोल्देविया के लोक-मानस की थाह दिलाने वाली ये कथाएँ बच्चों और बडों को समान रूप से आकर्षित करने की सामर्थ्य रखती हैं ।
  • Is Khirki Se
    Ramesh Chandra Shah
    425 383

    Item Code: #KGP-711

    Availability: In stock

    इस खिड़की से
    ‘इस खिड़की से’...यानी ‘अकेला मेला’ के ही नैरंतर्य में एक और मेला, एक और समय-संवादी आलाप...जो एकालाप भी है, संलाप भी, मंच भी, नेपथ्य भी...
    ‘अकेला मेला’ देखते-सुनते-गुनते...कुछ प्रतिध्वनियाँ ...कतिपय पाठक-समीक्षक मंचों से...अब इस खिड़की से जो दिखाई-सुनाई देने वाला है--मानो उसी की अगवानी में।
    ०० 
    डायरी-लेखन को साहित्य का गोपन कक्ष कहना अतिशयोक्ति न होगी।...काफ्का, वाल्टर बेन्यामिन जैसे कई लेखकों ने डायरी विधा के अंतर्गत श्रेष्ठ लेखन किया। मलयज या निर्मल वर्मा की डायरी उनके समस्त लेखन को समझने का उचित परिप्रेक्ष्य देती है। डायरी- लेखन की इसी परंपरा में नई प्रविष्टि है रमेशचन्द्र शाह की डायरी ‘अकेला मेला’। इस डायरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि लेखक में कहीं भी दूसरों को बिदका देने वाली आत्मलिप्तता नहीं। 
    --हिंदुस्तान 
    शाह केवल डायरी नहीं लिखते, वे अपने समय से संवाद करते दिखाई देते हैं। उनकी डायरी की इबारतें ऐसी हैं कि एक उज्ज्वल, संस्कारी अंतरंगता मन को छूती हुई महसूस होती है।...यह डायरी एक ऐसा ‘ग्लोब’ भी बनकर सामने आती है, जो मनुष्य की बनाई सरहदों को तोड़ती हुई शब्द-सत्ता का संसार रचती है, जिसमें दुनिया के महान् रचनाकारों की मौजूदगी को भी परखा जा सकता है। डायरी में शाह ने अपने विषय में अपेक्षाकृत कम लिखा है, लेकिन जितना लिखा है, वह एक विनम्र लेखक की शाइस्ता जीवन-शैली की ही अभिव्यक्ति है।
    --कादम्बिनी
    एक अकेला लेखक कितनी तरह के लोगों के मेले में एक साथ! कितनी विधाओं और कृतियों में एक साथ!...और कितनी आत्म-यंत्रणाओं और मंत्रणाओं में एक साथ!
    --जनसत्ता
  • Bhaasha Vigyan Pravesh (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    50

    Item Code: #KGP-998

    Availability: In stock

    यदि यह कहा जाए कि सच्चे अर्थों में भाषाविज्ञान का प्रारंभ भारत में हुआ तो अत्युक्ति न होगी, किंतु आधुनिक काल में अपने देश में इसके प्रति रुचि बहुत बाद में जगी और वह भी यूरोपीय प्रभाव ओर प्रेरणा के फलस्वरूप। यह प्रसन्नता की बात है कि इधर लगभग तीन-चार दशकों से यह विषय यहां काफी लोकप्रिय हुआ है और होता जा रहा है।
    हिंदी में उच्चतम कक्षा के उपयुक्त इस विषय की कुछ पुस्तकें तो हैं किंतु ऐसी कोई प्रारंभिक पुस्तक नहीं थी जो इस विषय में रुचि रखने वाले सामान्य लोगों तथा विषय की प्रारंभिक जानकारी चाहने वाले छोटी या बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों आदि के लिए उपयोगी हो। इसी कमी की पूर्ति की दिशा में यह एक प्रयास है। 
    इस संस्करण में कुछ नई सामग्री भी जोड़ दी गई है तथा शेष का संशोधन कर दिया गया है, जिसके कारण यह पुस्तिका अधिक उपयोगी हो गई है।
    —भोलानाथ तिवारी
  • Samajik Vigyan Hindi Vishwakosh (Vol-2)
    Shyam Singh Shashi
    600 540

    Item Code: #KGP-632

    Availability: In stock


  • Chhor
    Bhairppa
    400 360

    Item Code: #KGP-886

    Availability: In stock

    छोर
    कुशाग्र बुद्धि अमृता ने चाची के कुचक्र की ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया और अपनी पढ़ाई-लिखाई में ही व्यस्त रही। कुछ समय उपरांत पिता भी स्वर्गवासी हुए और तब घर-परिवार तथा व्यापार पर चाची का वर्चस्व स्थापित हो गया। अमृता की संपत्ति धीरे-धीरे और भीतर ही भीतर चाची तथा उसके बच्चों की ओर खिसकने लगी। अमृता की संपत्ति पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चाची ने अमृता को बहला-फुसलाकर उसका ब्याह अपने छोटे भाई से करा दिया।
    हालात को स्वीकार करके मजबूर अमृता एक कॉलिज में अध्यापन करने लगी और अपने दो बच्चों के साथ बागान से दूर पिता की एक पुरानी कोठी में रहने लगी। वहीं उसकी मुलाकात वास्तुकार सोमशेखर से हुई जो बंबई छोड़कर मैसूर आ गया था। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की ओर आकृष्ट होने लगे। इस बीच अमृता को चाची के कुचक्रों का भी आभास होने लगा। परिस्थितियों ने उसके स्वभाव में अजीब चिड़चिड़ापन, जीवन के प्रति अरुचि, कुंठा और विकर्षण को जन्म दिया। उसे जीवन बेमानी लगने लगा किंतु बेटों के प्रति मोह और सोमशेखर के प्रति अस्पष्ट आकर्षण उसे बार-बार आत्महत्या की कगार से लौटा लाता। अमृता की जिंदगी में जीवन और मृत्यु की ऊहापोह, उसकी कुंठा ही उसकी जिंदगी के दो छोर हैं जिनके बीच वह बार-बार झोंटे खाती रहती है।
    यह उपन्यास रोचक होने के साथ-साथ एक विशेष मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ पैदा करता है। जो यथार्थ के साथ-साथ विचित्र भी हो गई हैं। यहाँ है भैरप्पा की कल्पनामय यथार्थ शैली का अद्भुत चमत्कार!
  • Chunmun Aur Gopa
    Tanu Malkotia
    40

    Item Code: #KGP-1239

    Availability: In stock


  • Premchand Ki Shresth Kahaniyan
    Premchand
    150 135

    Item Code: #KGP-7801

    Availability: In stock

    यद्यपि प्रेमचंद ने नाटक, जीवनी, अनुवाद, निबंध तथा बाल-साहित्य की रचना भी की किंतु उनकी अक्षय कीर्ति का आधर उनके उपन्यास और कहानियां ही हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूति, काया-कल्प, गबन, कर्मभूमि तथा गोदान जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों एवं प्रायः तीन सौ कहानियों की रचना कर अपने को अमर करने वाले प्रेमचंद की गुल्ली-डंडा, नमक का दारोगा, प्रेरणा, दो बैलों की कथा, मंदिर, ईश्वरीय न्याय, सवा सेर गेहूं, रामलीला, पूस की रात, महातीर्थ, जुलूस, पशु से मनुष्य, दुस्साहस, आत्माराम, नशा, गृह-दाह आदि लोकप्रिय कहानियां हैं। प्रेमचंद ने अपने समय और समाज के ज्वलंन प्रश्नों को अपनी कहानियों के माध्यम से चित्रित किया है। ग्रामीण जीवन-परिवेश और पात्रों का इतना जीवंत चित्रण करने वाला कथाकार हिंदी में तो क्या अन्य भारतीय भाषाओं में भी कदाचित् ही कोई हुआ हो। यही कारण है कि वे उस समय के सर्वप्रमुख भारतीय कथाकार हैं। विद्वानों ने बीसवीं शती के विश्व-साहितय के तीन बड़े शीर्ष कथाकारों में प्रेमचंद की गणना की है।
  • Naachane Vaalee Aankhen
    Vibha Devsare
    100 90

    Item Code: #KGP-981

    Availability: In stock

    तीन-चार घंटे की बस यात्रा के बाद गीता और रमेश संतू काका के गांव रायगढ़ पहुंच गए। चारों ओर हरे लहराते खेत, बड़े-बड़े छायादार पेड़ों की छांव और अमराइयों के बीच से गुजरते हुए गीता और रमेश को बहुत अच्छा लग रहा था। खपरैल और मिट्टी के बने छोटे घर, कुएं और तालाब। गांव का ऐसा दृश्य उन्होंने सिर्फ किताबों में पढ़ा था, या फिर सिनेमा में देखा था। लेकिन जब गीता और रमेश साक्षात् गांव के उस मनोहारी दृश्य से गुजर रहे थे तो उन्हें बहुत आनंद आ रहा था। संतू काका के घर पहुंचकर तो उन्हें बहुत मजा आया। संतू काका भी गीता और रमेश को आया देखकर बहुत प्रसन्न हुए। काकी और संतू काका ने गीता और रमेश की बहुत आवभगत की। संतू काका बोले, ‘‘देखो बच्चों, हमारा छोटा सा गांव है। शहर जैसी सुख-सुविधा तो यहां मिलेगी नहीं, लेकिन हम कोशिश यही करेंगे कि तुम लोग यहां खूब खुश रहो।’’
    —इस पुस्तक ‘किस्सा हबूचंद की सफाई का’ कहानी से

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Mannu Bhandari (Paperback)
    Mannu Bhandari
    90

    Item Code: #KGP-7001

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मन्नू भंडारी
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मन्नू भंडारी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अकेली', 'मजबूरी', 'तीसरा आदमी', 'नई नौकरी', 'असामयिक मृत्यु', 'बन्द दराजों का साथ', 'क्षय', 'तीसरा हिस्सा', 'त्रिशंकु' तथा 'शायद' ।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मन्नू भंडारी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Chaanda Sethani
    Yadvendra Sharma Chandra
    125 113

    Item Code: #KGP-2042

    Availability: In stock

    'चाँदा सेठानी' के लिखने की प्रेरणा मुझे अपने इस समाज की सेठानियों से मिलने के बाद मिली । जब उन्होंने अपने जीवन के सत्यों को उजागर किया तो मेरे विचारों में जोर का कंपन हुआ । लगा कि इन सेठानियों के त्याग, तप, संयम और सच के कारण ही राजस्थानी लोगों ने देश के धन्नासेठों में अपने नाम लिखाए । पूर्वी देशों की यातनापूर्ण कठिन यात्राएँ, संकट और संस्कृति व वहाँ की भाषा को अजानकारी, सभी परिस्थितियों में राजस्थानी लोगों ने अदम्य साहस का परिचय दिया । आरंभिक पीढ़ी के त्रासदपूर्ण जीवन का शुभ फल दूसरी पीढ़ी को मिला और यह फल पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता रहा । यहीं कारण है कि चाहे बिरला हो, चाहे गोयनका, पोद्दार हो चाहे सोमानी, दम्माणी हो, चाहे डागा, सब के सब अब समृद्धि के शिखर को छू रहे हैं ।
    पाँच से दस सालों तक की यात्राएँ की परदेश में गांव जमाने का संघर्ष । अपनी जवान पत्नियों का त्याग! क्या यह तपस्या नहीं ? और उन पत्नियों का तप तो और भी महान् लगता है, जिन्होंने सूखे प्रांतर की तपती रेत और उसके असह्य ठंडेपन का सूखी रोटियाँ और मोठ-बाजारी के खिचड़े को खाकर सहा ओर सहज जीवन जिया ।
    -लेखक
  • Anuvaad Vigyan
    Bholanath Tiwari
    250 225

    Item Code: #KGP-735

    Availability: In stock

    अनुवादविज्ञान
    अनुवाद को उसके पूरे परिप्रेक्ष्य में लें तो वह मूलतः अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत आता है। साथ ही अनुवाद करने में व्यतिरेकी भाषाविज्ञान से भी हमें बड़ी सहायता मिलती है। इस तरह अनुवाद भाषाविज्ञान से बहुत अधिक संबद्ध है।...
    जहाँ तक अनुवाद का प्रश्न है, विद्यार्थी-जीवन में पाठ्यक्रमीय अनुवाद की बात छोड़ दें तो सबसे पहले अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘नेहरू अभिनंदन ग्रंथ’ में मुझे अनुवाद करने का अवसर मिला। उसी समय कुछ भाषा-संबंधी लेखों के मैंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किए। ‘गुलनार और नज़ल’ नाम से एक अंग्रेज़ी पुस्तक का संक्षिप्तानुवाद 1952 में पुस्तकाकार भी छपा था। 1962-64 में रूस में अपने प्रवास-काल में कुछ उज़्बेक, रूसी तथा इस्तोनियन कविताओं का भी मैंने हिंदी-अनुवाद किया था। ताशकंद रेडियो में 1962 में मेरे सहयोग से हिंदी विभाग खुला था। वहाँ प्रतिदिन आध घंटे के कार्यक्रम के लिए रूसी, उज़्बेक, अंग्रेज़ी आदि से हिंदी में अनुवाद किया जाता था, जिसका पुनरीक्षण मुझे करना पड़ता था। 1968 में भारतीय अनुवाद परिषद् ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुवाद’ के संपादन का भार मुझे सौंपा और समयाभाव के कारण, न चाहते हुए भी, कई मित्रों के आग्रह से मुझे यह दायित्व लेना पड़ा।
    प्रस्तुत पुस्तक की सामग्री के लेखन का प्रारंभ मूलतः ‘अनुवाद’ पत्रिका का सिद्धांत विशेषांक निकालने के लिए कुछ लेखों के रूप में हुआ था। विशेषांक के लिए कहीं और से अपेक्षित सामग्री न मिलने पर धीरे-धीरे मुझे अपनी सामग्री बढ़ानी पड़ी, किंतु अंत में सामग्री इतनी हो गई कि विशेषांक में पूरी न जा सकी। वह पूरी सामग्री कुछ अतिरिक्त लेखों के साथ प्रस्तुत पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।  -भोलानाथ तिवारी
  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    1200 1080

    Item Code: #KGP-607

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खण्डों में)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है।
  • Path Ke Daavedaar (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    160

    Item Code: #KGP-157

    Availability: In stock


  • Roshni Mein Chhipe Andhere
    Gurudeep Khurana
    250 225

    Item Code: #KGP-485

    Availability: In stock

    शुभ्रा उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, "नहीं दीप, ऐसी बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगती। अगर हालात ऐसे बने हैं तो इसमें शहर का क्या दोष। ऐसे दया भाई तो कहीं भी हो सकते हैं। कब, कहां ऐसा जहर भर दें, कुछ नहीं कह सकते। बहुत दिन नहीं ठहरेगा यह जहर। देखना, जल्दी सब नार्मल हो जाएगा।"
    "मुझे तो लगता है इस दौरान नफरत के जो बीज बो दिए गए हैं उनका असर पुश्तों तक चलेगा।"
    "यह तो है। नफरत फैलाने में घड़ियां लगती हैं और मिटाने में सदियां।"
    "बिलकुल ठीक।"
    "वैसे मैं एक बात और भी कहना चाहती हूं...कह दूं?"
    "जरूर!"
    "देखो दीप, घृणा केवल वही नहीं जो दया भाई जैसे लोग फैला रहे हैं...घृणा वो भी है जो तुम्हारे मन में पल रही है दया भाई के प्रति।"
    "कहना क्या चाह रही हो?"
    "यही कि वह घृणा भी कम घातक नहीं। मैं तो सोचती हूं...उन लोगों के बारे में भी घृणा से नहीं, प्यार से भरकर सोचो। आखिर वे कोई अपराधी तत्त्व नहीं। अपनी तरफ से वे जो भी कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। बस, दिशा भटक गए हैं। बहके हुए लोग हैं वे।..."
    —इसी पुस्तक से

  • Zane Ajeeb : Nasera Sharma
    Prem Kumar
    275 248

    Item Code: #KGP-281

    Availability: In stock

    ज़ने अजीब : नासिरा शर्मा
    अपनी मनबसी नामी-गिरामी शख़्सियतों के बारे में बहुत कुछ—ख़ूब-ख़ूब जान लेने की चाहत सबमें होती है। पसंदीदा के प्रभाव के बढ़ते-गहराते जाने के क्रम में एक बिंदु वह भी आता है, जब यह चाहत कसकता-सा एक जुनून तक बन जाती है। उस अपने मनभावन के अंदर- बाहर-आसपास से जुड़ी हर छोटी-छिपी बात जानने-सुनने के लिए हम उत्कर्ण-उत्कंठ हो उठते हैं। अगर वह मनभावन कोई कलाकार-साहित्यकार है तो स्थिति और भी विकट एवं दिलचस्प हो जाती है। उसकी रचनाओं के पात्रों, घटनाओं, चित्रों, कथनों के आधार पर हम अपनी- अपनी तरह से उसके निज—नितांत निज की दुनिया की अजब-ग़ज़ब तस्वीरें बनाने लगते हैं—बनाते रहते हैं।
    लेकिन जब कोई बड़ी शख़्सियत—नासिरा शर्मा जैसी लेखिका—अपने स्वभाव, अनुभवों, संवेदनाओं, संबंधों, मान्यताओं, विचारों, अभावों, आघातों, संघर्षों, प्राप्तियों...उससे भी अहम यह कि अपने पात्रों, सरोकारों, इरादों एवं रचित-संभावित रचनाओं के बारे में सहज, स्पष्ट, उत्सुक भाव से रचना करने की तरह कहे-बताए...तो...तो यह पाठक, रचना और साहित्य की दृष्टि से विशिष्ट, उपयोगी और मूल्यवान हो जाता है। तब और भी अधिक—जब हम नासिरा जी के पास-साथ होने के उन क़रीबी क्षणों में यह जानें-महसूस करें कि इस लेखिका के जीने-लिखने-सोचने का अंदाज़ और सोच का आसमान एकदम अलग भी है एवं व्यापक व विराट् भी।
    किसी कलाकार की सृष्टि व कलाकारिता की वीथियों-अमराइयों में उसके साथ चल, गुज़र, देख, सुन, जान पाना अपने आप में भिन्न, सुखद, अधिकतम प्रामाणिक और बेहतरीन क़िस्म का अनुभव होता है। ऐसे इस अनुभव का अहसास-भर पाठक को कराने की मुन्नी-सी एक ख़्वाहिश और कोशिश है यह—ज़ने अजीब: नासिरा शर्मा।
  • Anhad Naad
    Pratap Sehgal
    250 225

    Item Code: #KGP-35

    Availability: In stock


  • Samgra Kahaniyan : Ab Tak
    Maitreyi Pushpa
    695 626

    Item Code: #KGP-271

    Availability: In stock

    समग्र कहानियाँ: अब तक
    आँधी की तरह अपने उपन्यासों से पाठकों को झकझोर देने वाली मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री के अपने फैसलों की विचारोत्तेजक कहानियाँ-उपन्यास लिखे हैं। शहरी मध्यवर्गीय कहानियों के संसार को गाँव के उभरते मेहनतकश समाज से जोड़ा है, जहाँ अपनी परंपराएँ हैं, रूढ़ियाँ हैं और सबसे ऊपर है ‘खानदान की नाक’ और सब कुछ टिका है स्त्री के कंधों पर--जमीन और स्त्री ही उलझनों के केंद्र हैं और दोनों के ‘उत्पादन’ आपस में गुँथे हैं। सब मालिक की कृपा पर साँस लेते हैं। मैत्रेयी की स्त्रियों की सारी शिकायतें इसी मालिक से हैं कि वह साथी और हमसफर क्यों नहीं हो सकता--क्यों मालिक बनकर ढोर-डंगर की तरह औरत को ही हाँके रखता है। 
    स्त्री का अपनी नियति को अस्वीकार करना ही सामाजिक मर्यादाओं का टूटना है।
    स्त्री के उत्थान और सबलीकरण की ये कहानियाँ यथास्थिति से विद्रोह ही नहीं, भविष्य की दृष्टि से समाज-परिवर्तन की ध्वजवाहिनी भी हैं। मैत्रेयी ने कहानियाँ शहरी जीवन को लेकर भी लिखी हैं, मगर जिस आत्मीयता और गहराई से उन्होंने गाँव के जीवन को देखा है वह हिंदी में प्रेमचंद और रेणु 
    के सिवा शायद ही किसी को नजर आया हो। ये बेजुबानी स्त्री की यातनाओं, उसके संघर्षों और सपनों के बेआवाज विद्रोह की दस्तावेज हैं।
  • Bankon Mein Dvibhashi Computerikaran : Dasha Aur Disha
    Jayanti Prasad Nautiyal
    245 221

    Item Code: #KGP-675

    Availability: In stock

    बैकों में द्विभाषी कंप्यूटरीकरण
    दशा और दिशा
    हिंदी तथा भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर पर कार्य करने हेतु उपलब्ध सुबिधाओं की अद्यतन जानकारी से युक्त यह पुस्तक विद्वान् लेखक के गत तीस वर्षों के भाषा प्रौद्योगिकी के अनुभव पर आधारित है।
    कंप्यूटर विज्ञान पर अंग्रेजी भाषा में बहुत-सी पुस्तकें है, परंतु हिंदी में कंप्यूटर जैसे विषय पर प्रामाणिक पुस्तकों का सर्वथा अभाव है। इस अभाव की पूर्ति करने का विनम्र प्रयास है या पुस्तक। 
    यह पुस्तक कंप्यूटर जगत विशेषज्ञों द्वारा सामग्री को जाँच के बाद भारतीय रिजर्व बैंक, कृषि बैंकिंग महाविद्यालय की हिन्दी में मौलिक पुस्तक लेखन योजना के अंतर्गत प्रकाशित है। इसकी प्रामाणिकता और उपयोगिता का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है।
    इस पुस्तक में कंप्यूटर के माध्यम से हिंदी में तथा भारतीय भाषाओं में काम करने संबंधी उपलब्ध सुविधाओं, विभिन्न सॉफ्टवेयरों, पैकजों, उपकरणों पर प्रामाणिक एवं अद्यतन जानकारी दी गई है । इसमें नवंबर, 2007 तक हुए कंप्यूटर संबंधी समस्त विकास एवं सूचनाएँ और शोधपरक सामग्री समाहित हैं। माथ ही कंप्यूटर के भाषायी अनुप्रयोग संबंधी विभिन्न विषयों पर गभीर विवेचन है ।
    यह पुस्तक सभी बैकों के कर्मचारियों तथा अधिकारियो, उनके राजभाषा विभागो के कर्मचारियों व अधिकारियों, सभी विश्वविद्यालयों के बैंकिंग वाणिज्य व हिंदी में अध्ययनरत विद्यार्थियों व प्राध्यापकों, भारत सरकार के सभी कार्यालयों, सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, भाषाविदों, भाषा प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों, अनुवाद विज्ञान व अनुवाद में हर स्तर के पाठयक्रम में अध्ययन-अध्यापन में कार्यरत अध्यापको एवं विद्यार्थियों कंप्यूटर निर्माण में लगे सभी सॉफ्टवेयर निर्माताओं, कंप्यूटर में नीति निर्माताओं व निरीक्षण से जुडे कार्मिकों और भाषा तथा कंप्यूटर से सरोकार रखने वाले आम पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है ।

  • Rachna Ka Jeevdravya
    Jitendra Shrivastva
    600 510

    Item Code: #KGP-9222

    Availability: In stock

    ‘रचना का जीवद्रव्य’ इस दौर के महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव की नई आलोचना पुस्तक है। इस पुस्तक की परिधि में आपातकाल के बाद की हिंदी कहानी का इतिहास है तो महापंडित राहुल सांकृत्यायन की अद्वितीय आत्मकथा का गहन विश्लेषण भी। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब हैं तो विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर भी। जितेन्द्र जिस बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कविता पर विचार करते हैं, उसी बौद्धिक तैयारी, सहृदयता और संलग्नता से कथा साहित्य पर भी। वे आलोचना के औजारों को गड्डमड्ड नहीं करते। उनकी आलोचना में गहरी विचारशीलता है। जितेन्द्र श्रीवास्तव जब भी किसी विषय को उठाते हैं, उसे संपूर्णता में समझने-समझाने का उद्यम करते हुए उसे एक सर्वथा नई ऊंचाई भी देते हैं। यह अकारण नहीं है कि उनकी छवि एक विश्वसनीय आलोचक की है। वे भाषा की ताकत को जानते हैं इसलिए भाषिक पारदर्शिता के घनघोर आग्रही हैं। इस पुस्तक में संकलित आलेख भाषिक ताज़गी के अप्रतिम उदाहरण हैं। यह देखना सुखद है कि जितेन्द्र अपने पाठकों को उलझाते नहीं हैं। वे उन्हें वह मार्ग दिखाते हैं जो बिना किसी भटकाव के रचना के जीवद्रव्य तक ले जाता है। कहना न होगा कि जितेन्द्र श्रीवास्तव के बहुप्रशंसित और बहुउद्धृत आलोचनात्मक आलेखों की यह पुस्तक आलोचना के वर्तमान परिदृश्य को निश्चित रूप से संपन्न बनाएगी। 
  • Mere Saakshatkaar : Maheep Singh
    Mahip Singh
    160 144

    Item Code: #KGP-529

    Availability: In stock


  • Prakarantar
    Roop Singh Chandel
    100 90

    Item Code: #KGP-9088

    Availability: In stock


  • Namvar Hone Ka Arth (Paperback)
    Bharat Yayavar
    225

    Item Code: #KGP-392

    Availability: In stock

    नामवर होने का अर्थ
    प्रस्तुत पुस्तक नामवर सिंह के जीवन एवं साहित्य का एक पाश्र्वचित्र या प्रोफाइल है। इसे सही मायनों में ‘जीवनी’ भी नहीं कहा जा सकता। कोशिश यह रही है कि उनके जीवन एवं साहित्य का एक सामान्य परिचय इस पुस्तक के द्वारा प्रस्तुत हो जाए। इस कोशिश में मैं कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह स्वयं नहीं कह सकता। बस निश्चयपूर्वक इतना अवश्य कह सकता हूँ कि उनके जीवन एवं साहित्य को जानने-समझने का यह मेरा विनम्र प्रयास है।
    बात उस समय की है, जब मैं साहित्य की दुनिया में अपनी आँखें खोल रहा था। यह बीसवीं शताब्दी का आठवाँ दशक था और मैं हिंदी साहित्य का विद्यार्थी था। उन्हीं दिनों मैंने नामवर जी की तीन पुस्तकें खरीदीं और पढ़ी थीं-- ‘छायावाद’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ और ‘कविता के नए प्रतिमान’। इनमें उनकी ‘छायावाद’ पुस्तक मुझे तब बहुत अच्छी लगी थी और आज भी उनकी सभी पुस्तकों में यही मेरी सर्वाधिक प्रिय पुस्तक है। 
    1982 ई. की गर्मियों में मैं दिल्ली गया। उन्हीं दिनों एक दिन मुझसे त्रिलोचन जी ने कहा कि नामवर अपने समय के एक समर्थ कवि थे, उनकी कविताओं को खोजकर पुस्तक-रूप में प्रकाशित कीजिए। इन कविताओं की खोज के साथ-साथ तभी मैंने प्रस्तुत पुस्तक तैयार करने का मन बना लिया था। खोज की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर यह पुस्तक तैयार की।
    मैं यह भी स्पष्टीकरण कर देना चाहता हूँ कि यह पुस्तक एक सहयोगी प्रयास है। इसमें सबसे ज्यादा नामवर जी की विलुप्त रचनाएँ दी गई हैं। उनसे संबंध रखने वाले लेखकों के संस्मरण एवं पत्रों का भी उपयोग इसमें हुआ है। इस सहयोगी प्रयास में जिन लेखकों के वक्तव्य या कथन का इसमें प्रयोग किया गया है, उनके प्रति मैं आभार स्वीकार करता हूँ।
  • Tumhare Liye
    Himanshu Joshi
    200 180

    Item Code: #KGP-2030

    Availability: In stock

    तुम्हारे लिए
    आग की नदी!
    नहीं, नहीं, यह दर्द का दरिया भी है, मौन-मंथर गति से निरंतर प्रवाहित होता हुआ ।
    यह दो निश्छल, निरीह उगते तरुणों की सुकोमल स्नेह-गाथा ही नहीं, उभरते जीवन का स्वप्निल कटु यथार्थ भी है कहीं । वह यथार्थ, जो समय के विपरीत चलता हुआ भी, समय के साथ-साथ, समय का सच प्रस्तुत करता है ।
    मेहा-विराग यानी विराग-मेहा का पारदर्शी, निर्मल स्नेह इस कथा की भावभूमि बनकर, अनायास यह यक्ष-प्रश्न प्रस्तुत करता है-प्रणय क्या है? जीवन क्या है ? जीवन की सार्थकता किसमें है ? किसलिए ?
    ० 
    बहुआयामी इस जीवंत मर्मस्पर्शी कथा में अनेक कथाधाराएँ हैं। अनेक रूप हैं, अनेक रंग। पर ऐसा क्या है इसमें कि हर पाठक को इसके दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ?
    ० 
    हिंदी के बहुचर्चित उपन्यासों में, बहुचर्चित इस उपन्यास के अनेक संस्करण हूए । मराठी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में अनुवाद भी । दूरदर्शन से धारावाहिक रूप में प्रसारण भी हुआ । ब्रिटेन की एक कंपनी ने आडियो कैसेट भी तैयार किया, जो लाखों श्रोताओं द्वारा सराहा गया ।
  • Ab Kachhu Kahibe Naahin
    Hazari Prasad Dwivedi
    750 675

    Item Code: #KGP-752

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Sudha Arora (Paperback)
    Sudha Arora
    180

    Item Code: #KGP-420

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : सुधा अरोड़ा 
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सुधा अरोड़ा  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'महानगर की मैथिली', 'सात सौ का कोट', 'दमनचक्र', 'दहलीज पर संवाद', 'रहोगी तुम वहीं', 'बिरादरी बाहर', 'जानकीनामा', 'यह रास्ता उसी अस्पताल को जाता है', ‘कांसे का गिलास' तथा 'कांच के इधर-उधर'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सुधा अरोड़ा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Pashchatya Kavya Shastra Ka Itihas
    Dr. Tarak Nath Bali
    395 356

    Item Code: #KGP-864

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shekhar Joshi
    Shekhar Joshi
    70 63

    Item Code: #KGP-1420

    Availability: In stock


  • Doosara Gazal Shatak (Paperback)
    Sher Jung Garg
    100

    Item Code: #KGP-1203

    Availability: In stock

    दूसरा ग़ज़ल  शतक
    इस श्रृंखला की शुरुआत 'हिन्दी गजल शतक' से हुई थी । दुष्यन्त, बलबीर सिंह रंग, चिरंजीत, रामावतार लागी, सूर्यभानु गुल, बालस्वरूप राही, शलभ श्रीराम सिंह, मृदुता अरुण आदि-आदि पच्चीस उल्लेखनीय गज़लकारों की ग़ज़लें इस संकलन में समाविष्ट की गई थीं। इस बार शिवबहादुर सिंह भदौरिया, ओमप्रकाश चतुर्वेदी 'पराग' से लेकर युवा ज्योति शेखर और हरिओम तक 'दूसरा ग़ज़ल शतक' में आए है । कवयित्रियों में रंजना अग्रवाल, सरोज व्यास और विनीता गुप्ता है; लोकप्रिय गीतकारों में कुँअर बेचैन, उर्मिलेश, श्रवण राही हैँ । मानव, उपेन्द्र कुमार, कमलेश भट्ट 'कमल', कमल किशोर भावुक, प्रभात शंकर, योगेन्द्र दत्त शर्मा और लक्ष्मण आदि है । तात्पर्य यह कि 'दूसरा ग़ज़ल शतक में ग़ज़ल से जुडे विभिन्न मूडों, मान्यताओं, संवेदनाओं, सरोकारों, शिल्पों, कथ्यों वाले रचनाकारों का यह संगम हिंदी में लिखी जा रही ग़ज़लों का एक गुलदस्ता है ।