Mataki Mataka Matkaina

Dronvir Kohli

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
100.00 90 +


  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 978-93-82114-42-0

तुम यह जानना चाहोगे कि मैंने यह कहानी कैसे लिखी। वैसे, कुछ लेखक अपना भेद बताने से कतराते हैं। लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है सारी बात बताने में।
मैं विदेश-भ्रमण करता रहता हूं। एक बार मैं एक देश के एक ऐसे नगर में गया जहां पतझड़ का मौसम था। सारे इलाके की शोभा देखते ही बनती थी। यह उस प्रदेश की विशेषता थी। पतझड़ के मौसम में वहां के गली-कूचे, सड़कें-पगडंडियों, घर-बाहर के लाॅन, पार्क और जंगल भांति-भांति के पेड़ों के झड़ते रंग-बिरंगे पत्तों से इस तरह ढक जाते थे कि सचमुच धरती दिखाई ही नहीं पड़ती थी। वहां के झड़ते सूखे पत्ते भी सुंदर लगते थे कि देख-देखकर हृदय बल्लियों उछलता था।
इसके साथ ही वहां मैंने एक और अद्भुत बात देखी। वहां के रहने वाले लोग पतझड़ के पत्तों को जलाते नहीं थे क्योंकि इससे वायुमंडल दूषित होता है। वे करते यह थे कि सूखे पत्तों को बटोरकर सड़क के किनारे ढेर करते रहते थे। निश्चित दिन गाड़ी आती थी और पत्तों को समेटकर ले जाती थी।
लेकिन इससे भी विचित्र बात वहां मैंने यह देखी कि ये सूखे पत्ते जब तक सड़क के किनारे पड़े रहते थे, तब तक बेचारी गिलहरियों की जान सांसत में आ जाती थी। सड़क के किनारे पड़े सूखे पत्तों के ऊंचे-ऊंचे अंबार फांदकर बेचारी गिहरियां आ-जा नहीं सकती थीं और गाड़ियों के नीचे आकर कुचली जाती थीं।
संयोग से वहां मैं ऐसी बस्ती के एक घर में ठहरा था जो जंगल के सिरे पर स्थित था। मैं जब बाहर टहलने निकलता, तो सड़क पर दोनों तरफ टीलों की तरह लगे पत्तों के ढेर के साथ मरी हुई गिलहरियों को देखकर मन भारी हो जाता। बस, इन मृत गिलहरियों को देखकर ही मुझे यह कहानी लिखने की प्रेरणा मिली।
सच पूछो तो, मैं उस शहर में न गया होता, और फिर जंगल के किनारे उस घर में न ठहरा होता, तो यह कहानी लिखी ही नहीं जा सकती थी। इसे लिखते समय मुझे अपार आनंद मिला।
—द्रोणवीर कोहली

Dronvir Kohli

द्रोणवीर कोहली
अपने लंबे साहित्यिक जीवन में लेखक ने कुल जमा बीसेक कहानियाँ ही लिखी होंगी, लेकिन उनमें से मात्र बारह कहानियों को ही चुना 'जमा-पूँजी' से संगृहीत करने के लिए ।
लेखक के अब तक आठ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं -- 'टप्परगाडी', 'चौखट', 'हवेलियों वाले', 'आँगन-कोठा', 'काया-स्पर्श', 'तकसीम', ‘वाह कैंप' तथा 'नानी' । 'चौखट' के लिए बिहार राजभाषा विभाग से 'राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह' पुरस्कार ।
बाल-साहित्य में उत्तर प्रदेश से 'कंथक' तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली से 'देवताओं की घाटी' पुरस्कृत । इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब ने भी बाल-साहित्य से मूल्यवान योग के लिए लेखक को सम्मानित किया है । कुछ विश्वप्रसिद्ध लेखकों की बाल-रचनाओं का अनुवाद करने के अतिरिक्त लोककथाएँ तथा दूसरी कहानियाँ भी लिखी हैं ।
लेखक का जन्म 1932-33 में रावलपिंडी के निकट एक गाँव में हुआ, जहाँ संस्कृति, पाली का पुट लिए अवाणी अथवा अवाणकी बोली बोली जाती है। लड़कपन बीता रावलपिंडी में, जहाँ पोठोहारी बोली बोली जाती है । इन बोलियों का साहित्यिक प्रयोग लेखक ने अपनी रचनाओं में खुलकर किया है । देश-विभाजन के उपरांत 1949 में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग में नौकरी, जहाँ 'आजकला', 'बाल भारती', 'सैनिक समाचार' पत्रिकाओं का संपादन किया । आकाशवाणी में वरिष्ठ संवाददाता, हिंदी समाचार विभाग में प्रभारी समाचार संपादक तथा प्रेस इंफरमेशन ब्यूरो में सूचना अधिकारी की हैसियत से भी काम किया ।

Scroll