Bhagn Seemayen

Balshauri Reddy

Availability: In stock

Seller: KGPBOOKS

Qty:
120.00 108 + Free Shipping


  • Year: 2004

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Arya Prakashan Mandal

  • ISBN No: 9788188118403

भग्न सीमाएँ
"मेरे देवता, आप प्रेम के अवतार हैं । आप मेरे जीवन में प्रेम के देवता बनकर आए । इस प्रेम-मूर्ति की मैं सदा आराधना करती रहूंगी ।
मैँ जानती हूँ कि आप मुझे अपनी शरण में लेने को तैयार हैँ। कहावत है न, भगवान् भले ही वर दे, लेकिन पुजारी वर नहीं देता । आपके चतुर्दिक जो पुजारी बने हुए हैं, वे चाहते हैं कि मैं आपसे दूर रहूँ। वे यह नहीं चाहते कि मैं आपकी उपासना करूं । मैं उनकी दृष्टि में अस्पृश्य हूँ अयोग्य हूँ। पर आपकी करुणा और कृपा सब पर समान होती है ।
मैं अपना प्यार रूपी दीपक जला, स्नेह रूपी बत्ती जगा अपने हृदय को आलोकित करना चाहती थी, लेकिन क्या करूँ । परिस्थिति रूपी प्रभंजन का वेग अधिक हो चला है, शायद मैं निकट रहूँ तो वह बुझ जाए । मैं दूर से ही निरंतर अलख जगाए रखना चाहती हूँ।
आपसे दूर होने के पहले मैंने अपने गत जीवन का एक बार सिंहावलोकन दिया । आपके जीवन में मैंने एक रोगी के रूप में प्रवेश क्रिया । आपने मेरे शरीर को स्वास्थ्य प्रदान किया, जीवन के प्रति आशा और विश्वास पैदा किया, प्रेम दिया आज मैं उसके पुरस्कारस्वरूप आपके हृदय को अस्वस्थ बनाकर जा रही हूँ, मलिन और दुखी बनाकर जा रही हूँ ।
-[इसी पुस्तक से]

Balshauri Reddy

बालशौरि रेड्डी 
जन्म : 1 जुलाई, 1928, गोल्लल गुडूर, जिला कडपा, आंध्र प्रदेश
शिक्षा : नेल्लूर कडपा, वाराणसी, इलाहाबाद
मातृभाषा : तेलुगू
अन्य भाषाएँ : हिंदी, अंग्रेजी तथा तमिल का साहित्यिक ज्ञान
सेवाएँ : हिंदी प्रशिक्षण विद्यालयों में वर्षों तक प्रवक्ता (प्राध्यापक) तथा प्रिसिपल के पदों पर कार्य किया । दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रकाशन विभाग में संपादन का कार्य । 25 वर्ष तक 'चंदामामा' के संपादक
पुरस्कार : 1956 में भारत सरकार के शिक्षा विभाग से इनके द्वारा रचित 'पंचामृत' पर पुरस्कार । उसी वर्ष उ०प्र० शासन ने उसी पुस्तक पर एक और पुरस्कार दिया । 1960 मेँ 'आंध्र-भारती' आलोचनात्मक ग्रंथ पर उ०प्र० शासन ने पुरस्कार दिया । 1966 में इनके मौलिक उपन्यास 'जिंदगी की राह' पर पुरस्कार दिया । 1966 में आंध्र प्रदेश साहित्य अकादमी, हैदराबाद ने इनके मौलिक स्तरीय सर्जनात्मक साहित्य-सृजन हेतु पुरस्कार प्रदान किया । जनवरी, 1976 में राष्ट्रभाषा परिषद, पटना ने अपने रजत जयंती उत्सव के अवसर पर 'धरती मेरी माँ' मौलिक उपन्यास को सम्मानित किया । उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'शुभ निमंत्रण' (नाटक) तथा 'दावानल' (उपन्यास) पुरस्कृत । 16 अगस्त, 1983 को विहार सरकार के राजभाषा दिमाग ने सम्मानित किया । 1983 में ही तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन में सम्मानित हुए।

स्मृति- शेष : 15 सितम्बर, 2015

Scroll