Arddhnaarishwar

Vishnu Prabhakar

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  • Year: 2015

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788189859503

अर्द्धनारीश्वर 
'अर्द्धनारीश्वर ' व्यक्तिमन, समाजमन एवं अंतर्मन के विविध स्तरों पर नारी और नर थे इन्हीं के एकमएक सुर और स्वर-मिलन की प्राप्ति का प्रयास है यह उपन्यास । वही जाति-पाति और धर्म को समस्या, वही विवाह, तलाक, बलात्कार की समस्या, वही नारी-शोषण, उत्पीडन, वही टूटते-बिखरतें जीवन की कहानी, किन्तु मुक्ति के लिए 'कोई तो' की प्रतीक्षा नहीं है । यहीं लेखक ने समाधान के रूप में एक वृहत्तर रूपरेखा की सर्जना की है ।
'अर्द्धनारीश्वर ' का अभिप्रेत नारी और नर की समान सहभागिता को प्राप्त करना है । इसके लिए जरूरी है, एक-दूसरे को अपनी-अपनी दुर्बलताओं व सबलताओं के साथ स्वीकार करना तथा मान लेना कि रचना के लिए प्रकृति व पुरुष का मिलन भी जरूरी है ।
मूल समस्या तो पुरुष की है, उसके पौरुषिक अहम् की, जो उसे 'बेचारा' बना देती है । सहज तो इसे ही बनाना है । इसी की असहजता से स्त्री बहुत-से बंधन तोड़कर आगे निकल आई है । लेकिन बंधनहीन होकर किसी उच्छ्रंखल को रचना करना लेखक का अभिप्रेत नहीं है, बल्कि बंधनो की जकड़न को समाप्त कर प्रत्येक सुर को उसका यथोचित स्थान देकर जीवन-राग का निर्माण करना है । अजित के शब्दों में लेखक कहता है :
"मैं सुमिता को अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा । मैं उसकी दासता से मुक्त हो जाऊँगा। तभी हम सचमुच पति-पत्नी हो सकेंगे।"
इसी स्वयं की दासता से मुक्ति का नाम है, 'अर्द्धनारीश्वर'।

Vishnu Prabhakar

विष्णु प्रभाकर विष्णु जी का जन्म 21 जून, 1912, को जिला मुजफ्फरनगर (उ०प्र०) के एक गॉव में हुआ था । विष्णु प्रभाकर हिन्दी में नाटक के क्षेत्र में विशिष्ट प्रतिभासंपन्न रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं । बांग्ला उपन्यासकार शरतचन्द्र के जीवन पर 'आवारा मसीहा' के कृतित्व ने विष्णु जी को भारत के महान जीवनीकार के रूप में भी प्रस्तुत किया है । बचपन हिसार (हरियाणा) में गुजरा। वहीं शिक्षा प्राप्त की और सरकारी नौकरी से जिन्दगी की शुरुआत की । कुछ दिन आकाशवाणी में अधिकारी भी रहे । कुछ समय पश्चात नौकरी छोड़ स्वतन्त्र लेखन अपनाया । मौलिक लेखन के अतिरिक्त उन्होंने साठ से अधिक पुस्तकों का संपादन किया । उनकी अनेक पुस्तके पुरस्कृत हैं । पुरस्कार तथा सम्मान : इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट अवार्ड (1975); सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1976), राष्ट्रीय एकता पुरस्कार (1980), मूर्तिदेवी पुरस्कार, भारतीय ज्ञानपीठ (1988); शलाका सम्मान, हिन्दी अकादमी, दिल्ली (1988), केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार (1993); पाब्लो नेरूदा सम्मानम्, इण्डियन राइटर्स एसोसिंएशन; विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, उ० प्र० हिन्दी संस्थान; शरत् पुरस्कार, बंग साहित्य परिषद्, भागलपुर; सूर पुरस्कार, साहित्य कला परिषद्, तुलसी पुरस्कार, हरियाणा साहित्य अकादमी और संस्थान सम्मान, नागरी प्रचारिणी सभा, प्रयाग एवं अन्य कई पुरस्कार।
 स्मृति-शेष : 11 अप्रैल, 2009

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