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389

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  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock


  • Mere Mitra : Kuchh Mahilayen, Kuchh Purush (Paperback)
    Khushwant Singh
    80

    Item Code: #KGP-1458

    Availability: In stock

    मेरे मित्र : कुछ महिलाएँ, कुछ पुरुष
    प्रस्तुत पुस्तक के विषय-व्यक्तित्व मैंने बिना कसी तरतीब के चुने है । इनमें भी वे महिलाएँ और पुरुष विशेष है, जिनसे कि 60 और 70 के दशकों में मेरी दोस्ती हुई । अपने बारे में मेरे इन उद्गारों को पाकर कुछ तो इतने नाराज हुए कि उनसे बोलचाल ही बंद हो गई, पर कुछ खुश भी हुए । उन्होंने माना के उनके प्रति मैंने अपने स्नेह का ही इजहार किया है । कुछ ऐसे भी है, जिन्होंने अपने बारे में मेरे लिखे को पढ़ने की जहमत उठाना भी गवारा नहीं किया और कहा कि मैं उनके बारे में चाहे जो सोचता रहूँ उससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं है । पर अब आप ही बताएं कि उनके बारे में मेरा यह लिखना किसी काम का है या नहीं । -खुशवंत सिंह
  • Nibandhkar Hazari Prasad Diwvedi
    Usha Singhal
    60 54

    Item Code: #KGP-1468

    Availability: In stock

    निबंधकार हजारीप्रसाद द्विवेदी
    शैली विज्ञान के संदर्भ में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध-साहित्य पर अभी तक कोई निरुपाधि या सोपाधि शोधकार्य संभवत: नहीं हुआ है । अत: शैली विज्ञान की दृष्टि से आचार्य द्विवेदी के निबंधों के सम्यक विश्लेषण का यह पहला प्रयास है ।
    शैलीवैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में किसी कृति के सम्यक विश्लेषण के लिए, आज नानाविध प्रतिमान प्रचलित हैं, जिनमें 'चयन-प्रतिमान' को सभी प्रतिमानों का मूलाधार माना जाता है । प्रस्तुत अध्ययन इसी प्रतिमान को आधार बनाकर किया गया है ।
    आचार्य द्विवेदी ने अपने निबन्धों में किस प्रकार ध्वनि, शब्द, वाक्य, तथा विभिन्न व्याकरणिक कोटियों के सार्थक चयन से कथ्य का चयन किया है, इस पर भी विदुषी आलोचिका डा० उषा सिंहल ने अपनी विश्लेषणपरक दृष्टि केंद्रिय रखी है ।
    यह अध्ययन विद्वत् समाज के लिए आचार्य द्विवेदी के साहित्य के अध्ययन की नई दिशाएँ प्रशस्त करेगा ।
  • Satta Ke Aar-Paar (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    35

    Item Code: #KGP-932

    Availability: In stock

    सत्ता के आर-पार
    सत्ता और सेवा, सत्ता और तप, सत्ता और मनीषा इनका परस्पर क्या संबंध है, अनादिकाल से हम इसी प्रश्न से जूझते आ रहे हैं। कितने रूप बदले सत्ता ने। बाहरी अंतर अवश्य दीख पड़ा, पर अपने वास्तविक रूप में वह वैसे ही सुरक्षित रही, जैसे अनादिकाल में थी, अनगढ़ और क्रूर।
    प्रस्तुत नाटक लिखने का विचार मेरे मन में इन्हीं प्रश्नों से जूझते हुए पैदा हुआ था। जेने वाड्मय की अनेक कथाओं ने मुझे आकर्षित किया। प्रस्तुत नाटक ऐसी ही एक कथा का रूपांतकर है। 
    आधुनिक युग की प्रायः सभी समस्याएं मूल रूप में अनादिकाल में भी वर्तमान थीं। उनका समाधान खोजने के लिए लोग तब भी वैसे ही व्याकुल रहते थे जैसे आज। तो कैसी प्रगति की हमने? कहां पहुंचे हम? ये प्रश्न हमें बार-बार परेशान करते हैं। भले ही उनका वह समाधान न हो सके जो तब हुआ था, पर शब्दों की कारा से मुक्ति पाने को हम आज भी उसी तरह छटपटा रहे हैं। यह छटपटाहट ही मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाती है।
    -इसी पुस्तक की भूमिका से
  • Boomraing
    Rekha Rajvanshi
    225 203

    Item Code: #KGP-877

    Availability: In stock

    बूमरैंग
    इस पुस्तक की संपादक रेखा राजवंशी को आस्ट्रेलिया के प्रमुख कवियों को जोड़ने और पुस्तक-प्रकाशन का विचार तब सूझा जब कैनबरा और सिडनी में आयोजित कवि-सम्मेलनों में किशोर नंगरानी, अब्बास रजा अलवी, शैलजा चतुर्वेदी, हरिहर झा तथा सुभाष शर्मा जी से उनकी मुलाकात हुई । पर्थ के प्रेम माथुर जी व अनिल वर्मा जी की कविताएं भी उन्हें यहीं सुनने को मिली । बाद में जब वह होली के कवि-सम्मेलन में मेलबर्न गईं तो सुभाष जी से इस बारे से चर्चा हुई और उनके सहयोग तथा ई-पत्रों के माध्यम से इस विचार को आकार मिला । बाद में एडीलेड से राय कूकणा जी व पर्थ से रेनू शर्मा जी को भी इसने सम्मिलित किया गया । 
    रेखा राजवंशी के अनुसार, पुस्तक का नाम 'बूमरैंग' इसलिए रखा गया, क्योंकि 'बूमरैंग' आस्ट्रेलिया की आदिवासी देशीय जनजाति का प्रतिनिधित्व करता है । यह एक ऐसा हथियार है, जिसे किसी भी दिशा में फेंका जाए, यह फेंकने वाले के पास ही वापस आ जाता है । तात्पर्य यह कि भारतीय कवि कहीं भी रहें, उनका हृदय बार-बार अपने देश भारत की और ही वापस जाता है। यानी हर भारतीय प्रवासी चाहे- अनचाहे ही 'बूमरैंग' बन जाता है ।
  • Dus Baal Naatak (Paperback)
    Pratap Sehgal
    120

    Item Code: #KGP-376

    Availability: In stock

    दस बाल नाटक
    ये नाटक रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जिन कहानियों से प्रेरित हैं, उन कहानियों का समय वह समय है, जिसे हम भारत के  पुनर्जागरण और आजादी के संघर्ष का समय कहते हैं। भारत के अन्य इलाकों की अपेक्षा बंगाल में शिक्षा को व्यवस्था बेहतर थी, लेकिन आज के मुकाबले में उस शिक्षा-व्यवस्था को भी हम पिछड़ा हुआ ही कहेंगे।  ऐसे ही समय में रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा बहुआयामी व्यक्तित्व दुनिया को  चौका देता हैं। अपनी अन्य कलात्मक कियाओं के साथ-साथ वे बच्चों को कभी नहीं भूले। उन्होंने एक जगह कहा भी है कि बच्चा बडों का पिता होता है। यानी हम आने वाली हर पीढ़ी से कुछ सीखते हैं और कुछ सिखाते हैं।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बाल-कहानियों में सन्देश स्पष्ट हैं। ये संदेश बच्चों की अपेक्षा उनके अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अधिक हैं। अपना संदेश समाज तक पहुँचाने के लिए रवीन्द्रनाथ ठाकुर बच्चे को भी एक व्हीकल की तरह से इस्तेमाल करले हैं। कहानी का पाठक भल ही मौजूद हो, लेकिन उसका दर्शक नहीं होता। इसलिए प्रताप सहगल ने इन कहानियों को यहाँ लघु नाटकों के माध्यम से रखा है।  प्रताप सहगल हिंदी के जाने-माने कवि-नाटककार हैं। उन्हें भी अपन बहुविध लेखन के लिए जाना जाता हैं। इससे पूर्व उनके बाल-नाटकों की एक किताब 'छूमंतर' ( किताबघर प्रकाशान) प्रकाशित होकर मकबूल साबित हुई है। इसका प्रमाण उसके लगातार छपने चाल संस्करण हैं। इस बार प्रताप सहगल ने गुरुदेव की बाल-कहानियों का अपनेबाल-नाट्य-लेखन का आधार बनाया है। ये नाटक जहाँ अपने समय में अवस्थित हैं, वहीं वे हमारे समय के साथ भी जुड़ जाते हैं और आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में इनकी उपयोगिता बनी रहेगी।
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रताप सहगल-दोनों के कन्सर्न्स का जानने के लिए दस बाल-नाटकों का यह संग्रह हर बड़े  और हर बच्चे के लिए एक जरूरी किताब बन जाता है।
  • Mera Mobile Tatha Anya Kahaniyan
    Ansuya Tyagi
    225 203

    Item Code: #KGP-601

    Availability: In stock

    दक्षिण अफ्रीका में रेल यात्रा के समय गांधी जी रस्किन का उपन्यास ‘अनटू द लास्ट’ पढ़ रहे थे। अंगूर के बाग में काम करने वाले मजदूरों के एक छोटे से कथा प्रसंग की चर्चा ‘सर्मन ऑफ़ द माउंट’ के आधार पर रस्किन ने अपने उपन्यास में की है। इस प्रसंग ने बापू को द्रवित किया। किस्सा यह है कि अंगूर के बाग में कुछ मजदूर काम के लिए बुलाए गए थे, कुछ मजदूरों को सुबह ही काम पर रख लिया गया व कुछ को तीन घंटे बाद बुलाया गया। लेकिन शाम को जब बाग के मालिक ने मजदूरी बांटी तो सबको एक बराबर पैसे दिए। पहले काम पर लगे मजदूरों को यह बात खटकी तब मालिक ने समझाया कि भले ही ये मजदूर देर से काम पर लगे, किंतु मजदूरी की आशा में ये सुबह से ही खड़े थे, मैंने इन्हें देर से काम पर लगाया, पर आखिर इनका हक तो बराबर का है।
    पारुल को यह प्रसंग याद आ गया और उसने सोचा, जब चंद्रकला मेरे यहां काम करती है तब इसके दुःख में मुझे भी भागीदार बनना चाहिए। यदि मैं अपने एक महीने की ट्यूशन की आधी कमाई इसे देकर इसके नुकसान की भरपाई कर देती हूं तब यह कितनी प्रसन्न हो जाएगी। मुझे तो अधिक अंतर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिम्मेदारियां तो सब समाप्त हो गई हैं, वैसे भी आशीष और उसे कितना चाहिए, उनका तो अब थोड़े में ही गुजारा चल जाता है। 
    -(इसी संग्रह की कहानी ‘थोड़ी सी खुशी’ से)
  • Ila (Paperback)
    Prabhakar Shrotiya
    35

    Item Code: #KGP-1093

    Availability: In stock


  • Vyangya Samay : Ravindranath Tyagi
    Maitreyi Pushpa
    380 342

    Item Code: #KGP-9342

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ त्यागी का रंग व्यंग्य में सबसे निराला है। उनका अध्ययन व्यापक था। स्मृति अच्छी होने से संदर्भ सामने रहते थे। संदर्भों को प्रसंग देकर रचने की विलक्षण योग्यता उनके पास थी। यही कारण है कि त्यागी के व्यंग्य पढ़ते हुए पाठक को आनंद के साथ ज्ञान भी उपलब्ध होता है। बतरस इतना है कि गांव की गोरी पर लिखते हुए प्राकृत से लेकर पेरिस तक अभिव्यक्ति का विस्तार हो सकता है। व्यंग्य में सहज हास्य के वे आचार्य हैं। दफ्रतरशाही,  शृंगार, प्रकृति और अद्भुत तथ्य–प्रायः इन क्षेत्रों से वे विषय चुनते हैं। संस्कृत और अन्य भाषाओं से उद्धरण देते हुए त्यागी व्यक्तिगत समस्याओं से लेकर राष्ट्रीय प्रश्नों तक बात करते हैं। कई बार लगता है कि उनके लेखन का उद्देश्य निर्मल हास्य की सृष्टि करना है। यह कठिन काम उन्होंने सरलता से किया है। हास्य में आ जाने वाली दुराग्रही वृत्ति उनके लेखन में नहीं है। वे सिद्धांतो से नहीं, आसपास के तथ्यों या व्यक्ति वैचित्रय से हास्य के क्षण निर्मित करते हैं। ‘व्यंग्य समय’ में रवीन्द्रनाथ त्यागी के चयनित व्यंग्य उनके विस्तृत व्यंग्य लेखन से कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। पाठकों को रचनाकार को समग्रता में पढ़ने और पुनः पाठ के लिए प्रेरित करने का उद्देश्य भी इस उपक्रम में निहित है।
  • Anuvad Vigyan : Siddhant Evam Pravidhi (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    180

    Item Code: #KGP-230

    Availability: In stock

    अनुवाद विज्ञान : सिद्धांत एवं प्रविधि
    लंबे समय से अनुवाद पर एक ऐसी प्रामाणिक पुस्तक की कमी महसूस की जा रही थी जो सभी प्रकार के पाट्यक्रमों की ज़रूरत को तो पूरा करती ही हो, साथ ही शोधार्थियों, अनुवाद के शिक्षकों, प्राध्यापकों के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ अनुवाद कार्य से जुडे अनुवादकों तया अनुवाद व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों के लिए उपयोगी हो ।
    इस पुस्तक में अनुवाद विद्वान की समस्त प्रविधियों व सिद्धांतों का विवेचन-विशलेषण भी किया गया है तथा जुत्ताई, 2008 तक अनुवाद के क्षेत्र से हुए चिंतन एव शोधों को समाहित करते हुए इस अनुवाद पर अद्यतन एवं प्रामाणिक पुस्तक के रूप में तैयार किया गया है । इसलिए इसका पुराना नाम 'अनुवाद विज्ञान' न रखकर इसे अनुवाद विज्ञान : सिंद्धांत एवं प्रविधि' नाम दिया गया है, क्योंकि  यह पुस्तक नवीनतम उदभावनाओं व विचारों से युक्त है तथा  मेरे 30 वर्षों से भी अधिक के अनुवाद के अनुभवों को समेटे हुए है । मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में अवश्य ही सफल होगी तथा विद्यार्थियों, प्राध्यापकों, अनुवादकों व अनुवाद के गंभीर अध्येताओं के लिए भी समान रूप से उपादेय सिद्ध होगी ।
    -डों० जयन्तीप्रसाद नौटियाल
    (संपादक)
  • Mandakranta
    Maitreyi Pushpa
    140 126

    Item Code: #KGP-1896

    Availability: In stock

    मंदाक्रान्ता
    श्यामली । एक आदर्श गांव । छोटे-बड़े, जात-पाँत का भेदभाव नहीं । आपस में स्नेह, प्रेम, भाईचारा ऐसा कि लोग मिसाल दे, लेकिन आज श्यामली के लोग अपनी परछाईं तक पर विश्वास नहीं कर पाते । भाई-भाई के बीच रंजिश, घर-घर में क्लेश । जाने कैसा ग्रहण लग गया श्यामली की अच्छाई को ! कुछ भी वैसा न रहा, सिवाय दादा के । बस, बदलते वक्त की आँधी में यही एक बरगद बच रहा है श्यामली में ।
    और सोनपुरा ! गरीबी, बीमारी, भुखमरी और आपसी कलह से जूझता सोनपुरा आब सचमुच सोने-सा दमक रहा है । एकता और आत्मविश्यास से अजित स्वाभिमान और खुशहाली की दमक ।
    एक बहुत पुरानी कहावत है--'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।' श्यामली का मन हार गया, सोनपुरा का मन जीत गया । एकता, प्रेम, भाईचारा, सदूभाव, सामाजिक चेतना आदि के बारे में हम बहुत बार भाषण सुनते रहते हैं और उन्हें किताबी बातें मानकर अनदेखा करते आए हैं, लेकिन सोनपुरा ने इन शब्दों के मर्म को समझ लिया शायद और उन्हें अपनी दिनचर्या में उतार लिया ।
     इन बातों ने गाँवों के प्रति मेरी धारणा, मेरे सरोकार और चिंतन को बेहद प्रभावित किया, जिसे मैंने अपने उपन्यास 'इदन्नमम' के माध्यम से अपने पाठकों के साथ बांटने की अपनी जिम्मेदारी का भरसक सावधानी और ईमानदारी से निर्वाह करने का प्रयास किया । उसी उपन्यास पर आधारित है प्रस्तुत नाटक मंदाक्रान्त ।
    --मैत्रेयी पुष्पा
  • Mataki Mataka Matkaina
    Dronvir Kohli
    100 90

    Item Code: #KGP-977

    Availability: In stock

    तुम यह जानना चाहोगे कि मैंने यह कहानी कैसे लिखी। वैसे, कुछ लेखक अपना भेद बताने से कतराते हैं। लेकिन मुझे कोई आपत्ति नहीं है सारी बात बताने में।
    मैं विदेश-भ्रमण करता रहता हूं। एक बार मैं एक देश के एक ऐसे नगर में गया जहां पतझड़ का मौसम था। सारे इलाके की शोभा देखते ही बनती थी। यह उस प्रदेश की विशेषता थी। पतझड़ के मौसम में वहां के गली-कूचे, सड़कें-पगडंडियों, घर-बाहर के लाॅन, पार्क और जंगल भांति-भांति के पेड़ों के झड़ते रंग-बिरंगे पत्तों से इस तरह ढक जाते थे कि सचमुच धरती दिखाई ही नहीं पड़ती थी। वहां के झड़ते सूखे पत्ते भी सुंदर लगते थे कि देख-देखकर हृदय बल्लियों उछलता था।
    इसके साथ ही वहां मैंने एक और अद्भुत बात देखी। वहां के रहने वाले लोग पतझड़ के पत्तों को जलाते नहीं थे क्योंकि इससे वायुमंडल दूषित होता है। वे करते यह थे कि सूखे पत्तों को बटोरकर सड़क के किनारे ढेर करते रहते थे। निश्चित दिन गाड़ी आती थी और पत्तों को समेटकर ले जाती थी।
    लेकिन इससे भी विचित्र बात वहां मैंने यह देखी कि ये सूखे पत्ते जब तक सड़क के किनारे पड़े रहते थे, तब तक बेचारी गिलहरियों की जान सांसत में आ जाती थी। सड़क के किनारे पड़े सूखे पत्तों के ऊंचे-ऊंचे अंबार फांदकर बेचारी गिहरियां आ-जा नहीं सकती थीं और गाड़ियों के नीचे आकर कुचली जाती थीं।
    संयोग से वहां मैं ऐसी बस्ती के एक घर में ठहरा था जो जंगल के सिरे पर स्थित था। मैं जब बाहर टहलने निकलता, तो सड़क पर दोनों तरफ टीलों की तरह लगे पत्तों के ढेर के साथ मरी हुई गिलहरियों को देखकर मन भारी हो जाता। बस, इन मृत गिलहरियों को देखकर ही मुझे यह कहानी लिखने की प्रेरणा मिली।
    सच पूछो तो, मैं उस शहर में न गया होता, और फिर जंगल के किनारे उस घर में न ठहरा होता, तो यह कहानी लिखी ही नहीं जा सकती थी। इसे लिखते समय मुझे अपार आनंद मिला।
    —द्रोणवीर कोहली
  • Mahayaatra Gaatha (3 & 4 Part)
    Rangey Raghav
    750 675

    Item Code: #KGP-2055

    Availability: In stock

    महायात्रा गाथा (4 भाग में)
    सृष्टि को रचना अब भी कैसे हुई; और कब इसमें मनुष्य नामक प्राणी का जन्म हुआ, कोई नहीं जानता । यह भी कोई  नहीं जानता कि कब और किस प्रकार मनुष्य ने अपने पांवों पर खडा होना सीखा और इस महायात्रा का आरम्भ हुआ । फिर भी प्रकृति से मनुष्य के सुदीर्घ संग-साथ, उसके औत्सुक्य, अनुमान, अनुभव, बुद्धिमत्ता, साहस और संघर्ष ने उसे अपने इतिहास के र्गापन-आगोपन चरणों को विहित करने की और निरंतर प्रवृत किया है । इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक दृष्टिबोध और तज्जनित शोधानुसंधान ने मनुष्य जाति को उसके अछोर काल-कुहासे से बाहर लाने में भारी योगदान दिया है । दूसरे शब्दों में, मनुष्य का जैविक, भाषिक, पुरातात्त्विक और रचनात्मक इतिहास उसके विकास को समझने-समझने में सहायक सिद्ध हुआ । श्रुत-अश्रुत अवधारणाओं को विकासवादी अवधारणा ने  अपने निर्णय पर रखा-परखा, फलस्वरूप मानव-विकास का एक वैश्चिक परिदृश्य सामने आया । इसमें हमारी दुनिया के अनेक वैज्ञानिकों, पुरातत्त्ववेत्ताओं, इतिंहासज्ञों और मनिषी  साहित्यिकों ने अपनी-अपनी तरह से अपनी भूमिका का निर्वाह किया है ।
    विकासवादी सिद्धांत के अनुसार आज का मनुष्य 'होमोसैपियन’ नाम से अभिहित मनुष्य का वंशज है । पिथिकैथोपस, निंदरथेलियन, क्रोमैनन आदि पाँच जातियाँ हमारी पूर्ववर्ती कही जाती है । ये सब अपने-अपने कालखण्डों को गुंजान करती हुई काल की ही अनंतता में समा गई, लेकिन 'होमोसैपियन’ की यात्रा अभी बदस्तूऱ जारी है । कहना न होगा कि हिन्दी के प्रख्यात उपन्यासकार रांगेय राघव ने उसकी अथवा हमारी इसी महायात्रा को अपनी इस वृहत कथाकृति का विषय बनाया है ।
    मनुष्य-यात्रा के छह विशिष्ट कालखंडों के अपने में समायोजित करने वाली यह ऐतिहासिक और महत्काव्यात्मक कथाकृति पूर्व-पाषाणकाल और उतर-पाषाणकाल के बाद प्रागैतिहासिक
    कल के मनुष्य से हमारा परिचय कराती है । उस समय उसकी एक मौखिक भाषा बन चुकी थी और उसने झुंड बनाकर रहना सीख लिया था । उसमें स्त्री ही शक्तिमती थी, क्योंकि वहीं जननी ही । जन्म के कारण का तब तक किसी को पता नहीं था । कालांतर में ऐसे ही झुंडों है दुनिया-भर में कबीलाई समाज का जन्म हुआ । भारत में इसके प्रथम प्रमाण उत्तर में शिवालिक की  पहाडियों से लेकर उत्तर-पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और समुद्री  टापुओं में न जाने कहाँ-कहाँ तक पाए गए है ।
    पहले तीन कालखंडों में रांगेय राघव है आदि से महाभारत काल तक के समय का अवगाहन किया है । इस समय को 'अँधेरा रास्ता’ कहते हुए उन्होंने भारतीय पुराण-इतिहास काल में गतिशील जन-जीवन को पहचानने का कार्य किया है । यह अदभुत है, क्योंकि इसके पीछे एक रचनाकार की कल्पनाशीलता तो है ही, मानव-विकास की तर्कसम्मत जीवन-स्थितियों और उनके ऐतिहासिक साक्ष्य भी मौजूद है । यहाँ हम अनेकानेक जनजातीय टोटम्स और मिथकीय चरित्रों को उनके वास्तविक रूप में पहचान पाते है ।
    दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।
    संक्षेप में कहा जाए तो रांगेय राघव की यह कृति इतिहास ही नहीं, इतिहास की लोकधर्मी सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या है, और एक कालजयी कथारचना भी ।
  • Chhuttiyan
    Ajit Kumar
    50 45

    Item Code: #KGP-2095

    Availability: In stock

    छुट्टियाँ
    पूरी मनाली एक अनपढी पुस्तक की भांति सामने खुली थी । इसे कितनी ही बार पढ़ो, हर बार यह बिलकुल ताजी, अनछुई-सी जान पड़ेगी, विद्रोही जी ने सोचा । फिर मीरा को इशारे से बताया, “वह देख रही हो—नीचे, सामने, उधर दूर पर, वो पतली-सी सड़क । हाँ, हाँ, वही, जिस पर अभी एक मोटर आती दिखाई दी थी । वह कुल्लू-मनाली सड़क है । उसी से होकर कल शाम हम यहीं पहुँचे थे... " 
    सफ़रनामे, कहानी, कविता, फंतासी, रपट और व्यंग्य आदि विधाओं को अपने  में घुलाती-मिलाती अजितकुमार की यह प्रथम औपन्यासिक रचना 'छुट्टियाँ' उसी अर्थ में एक उपन्यास है, जिसमें अजितकुमार के लिए 'कविता के रूप में प्रस्तुत प्रत्येक रचना कविता है और वह भी कविता है जो भले ही उस रूप में न प्रस्तुत की गई हो पर किसी को कविता प्रतीत हो ।'
    साहित्यिक विधाओं की परस्पर घुसपैठ के इस युग में, जब उपन्यास की अलग पहचान गुम हो चली हो और वह ऐतिहासिक, सामाजिक, जासूसी, फुटपाथी आदि शिकंजों में फाँस दिया गया हो. 'छुट्टियां' प्रमुखत: कुतूहल पर आधारित है, बावजूद इस भय के कि हिंदी के अतिवृद्ध और अकालवृद्ध परिवेश में, उसे बालोपयोगी या किशोरोपयोगी समझ लिया जाएगा ।
  • Kartaar Ki Taksaal
    H. Tipperudraswamy
    1100 990

    Item Code: #KGP-828

    Availability: In stock

    धर्म, राजकीय, सामाजिक आंदोलन तथा संघटन की दृष्टि से कर्नाटक प्रदेश के इतिहास में बारहवीं शताब्दी एक महत्त्वपूर्ण काल-खंड है। इन सारे अंशों ने एक-दूसरे से घुलमिलकर तत्कालीन आंदोलन को एक संकीर्ण रूप प्रदान किया है। वे जैसे व्यक्ति-कंेद्रित चिंतन थे, वैसे समुदाय-केंद्रित चिंतन भी थे। यही कारण है कि उसे समष्टि का समवेत स्वर भी कह सकते हैं। ऐसे एक समुदाय के समर्थ प्रतिनिधि के रूप में बसवण्णा जी दिखाई देते हैं। वैसे देखा जाए तो बसवण्णा पर लिखी गई सारी कृतियां तत्कालीन अन्य शरणों पर लिखी गई कृतियां ही बन जाती हैं।
    ऐसे एक अपूर्व उपन्यास का श्रीमती शशिकला सुब्बण्णा जी ने बहुत ही सशक्त रूप में हिंदी में अनुवाद किया है। इनके इस प्रयास पर हमें आश्चर्य है। एक सर्जनात्मक कृति का उसकी सारी भावसंपदा को समेटते हुए भाषा की हर ध्वनि के साथ अन्य भाषा में अनुवाद करना एक साहस का काम है।

  • Aag-Paani Aakaash
    Ramdhari Singh Diwakar
    280 252

    Item Code: #KGP-796

    Availability: In stock


  • Sahitya : Vividh Vidhayen (Paperback)
    Shashi Sahgal
    100

    Item Code: #KGP-1354

    Availability: In stock

    साहित्य : विविध विधाएं
    हिंदी साहित्य का संसार जितना विपुल है, उसी अनुपात में साहित्य की विधाओं का भी विस्तार हुआ है। साहित्य की विकास-यात्रा में भले ही एक विधा का प्रवेश दूसरी विधा में हो रहा है, फिर भी प्रत्येक विधा के कुछ ऐसे लक्षण हैं, जिनसे हम उस विधा की पहचान करते हैं। मसलन नाटक और उपन्यास या फिर कहानी और डायरी आदि सभी विधाओं के कुछ ऐसे बुनियादी तत्त्व हैं जो साहित्य की एक विधा से दूसरी विधा को अलग पहचान देते हैं। शशि सहगल की पहचान एक कवि, आलोचक एवं अनुवादक के रूप में है। 
    एक लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पठन-पाठन करते हुए उन्होंने जिस जरूरत को खुद महसूस किया, यह पुस्तक उन्हीं बिंदुओं एवं अनुभवों से प्रेरित है और साहित्य की विविध विधाओं के बुनियादी तत्त्वों से जुड़े भारतीय एवं पाश्चात्य विचारकों की धारणाओं को संक्षेप रूप में सामने रखती है। 
    प्रस्तुत पुस्तक का महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि इसमें बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित करने के साथ-साथ कुछ प्रमुख लेखकों या प्रमुख रचनाओं के बहाने प्रत्येक विधा की अद्यतन जानकारी भी दी गई है। इस मायने में यह किताब साहित्य की प्रत्येक विधा का सैद्धांतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पाठक के सामने रखती है। 
    इस प्रकार ‘साहित्य: विविध विधाएं’ साहित्य के आम जिज्ञासु पाठकों, छात्रों, शिक्षकों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी और जरूरी किताब बन जाती है।
  • Antyoday Purus : Shanta Kumar
    Satish Dhar
    195 176

    Item Code: #KGP-232

    Availability: In stock

    अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार
    शान्ता कुमार स्वच्छ छवि की भारतीय राजनीतिक परंपरा के राजनेता हैं। राजनीति के साथ-साथ शान्ता कुमार कई महत्त्वपूर्ण एवं चर्चित साहित्यिक पुस्तकों के रचयिता भी हैं ।
    ‘अन्त्योदय पुरुष : शान्ता कुमार' ऐसी पुस्तक है, जिसमें शान्ता कुमार के घर-परिवार से लेकर अभिन्न मित्रों के गरिमापूर्ण रिश्तों की सांद्रता है । पुस्तक शान्ता कुमार के जीवन-संघर्षों के कई अनछुए प्रसंगों को समेटे हुए है । शान्ता कुमार के ओजस्वी वक्तव्यों से परिपूर्ण साहित्यिक सभाओं अथवा अन्य कार्यक्रमों में की गई बेबाक टिप्पणियाँ इस महान् व्यक्तित्व की बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाती है ।
    हिमाचल प्रदेश के इस महान् सपूत ने अपनी प्रखर सोच से देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को नई दिशा प्रदान की है। पुस्तक में राजनीति के चलते राष्ट्रीय स्तर पर शान्ता कुमार द्वारा प्रारंभ की गई लोक-हितकारी योजनाओं की बानगी भी देखने को मिलती है। यह कृति सृजनात्मकता की छौन्क के साथ-साथ राजनीतिक इतिहास का भी दस्तावेज है ।
    पुस्तक में लेखक द्वारा लिया गया साक्षात्कार शान्ता कुमार के व्यक्तित्व के कई कोने-अंतरों को खोलने में सक्षम रहा है। पुस्तक की प्रांजल व लयात्मक भाषा पाठको को अंत तक बॉंधे रखने में सक्षम है ।
  • Usane Kaha Tha Aur Anya Kahaniyan
    Shri Chandra Dhar Sharma Guleri
    150 135

    Item Code: #KGP-9078

    Availability: In stock


  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Kaljayee Kathakar Jaishankar Prasad
    Jaishankar Prasad
    180 162

    Item Code: #KGP-9158

    Availability: In stock

    ‘दस प्रतिनिधि कहानियां’ किताबघर प्रकाशन की अत्यंत प्रतिष्ठित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला है। इसी के अंतर्गत ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला प्रारंभ हो रही है। ऐसे अनेक महत्त्वपूर्ण कहानीकार हैं जिन्होंने हिंदी कहानी के विकास में अविस्मरणीय योगदान दिया है। इन रचनाकारों को पढ़ते समय सामाजिक स्थितियों का उतार-चढ़ाव विस्मित करता है। इनके द्वारा काल विशेष में रची जाने और उस पर केंद्रित होने के बावजूद अपनी आंतरिकता में बहुतेरी कहानियां कालजयी हैं। उनका नाभिनाल संबंध मूल मानवीय संचेतना से है। 
    ‘कालजयी कथाकार’  शृंखला में प्रस्तुत हैं जयशंकर प्रसाद की दस प्रतिनिधि कहानियां—‘आकाश-दीप’, ‘ममता’, ‘आंधी’, ‘मधुआ’, ‘व्रत-भंग’, ‘पुरस्कार’, ‘इंद्रजाल’, ‘गुंडा’, ‘देवरथ’ तथा ‘सालवती’।
    इन कहानियों को पढ़ना ‘सभ्यता समीक्षा’ की प्रक्रिया से गुजरना है। 
  • Mere Saakshaatkaar : Malti Joshi
    Malti Joshi
    180 162

    Item Code: #KGP-1298

    Availability: In stock


  • Aawara
    Pandey Baichain Sharma 'Ugra'
    175 158

    Item Code: #KGP-436

    Availability: In stock

    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का समाज-अध्ययन बड़ा प्रखर था। उन्होंने गरीबी में उसकी संपूर्ण भयावहता को बाल्यावस्था में ही भोगा था, अतः उग्र जी ‘आवारा’ नाटक में पूरी तरह सपफल सामाजिक नाटककार प्रतीत होते हैं। ‘उग्र’ का यह नाटक उस अभिनंदनीय योजना का पावन-प्रेरक स्मृति-चिन्ह बन आज भी विजयपताका की तरह यशगान करता पफहरा रहा है। सभ्य, समृद्ध समाज और उसमें कलाकार की दयनीय स्थिति, जमींदार की क्रूरता व जालसाजी का बिलकुल नग्न चित्रण है। 
    लाली-दयाराम की निश्छल प्लेटोनिक मनोवैज्ञानिक प्रेमगाथा को भी ‘उग्र’ ने जीवन के घिनौने पाशविक प्रेम-व्यवहारों से अलग-थलग चित्रित कर मर्मस्पर्शी और हृदयद्रावक बना दिया है।
    आलोचकों ने इस नाटक को स्वाभाविक माना था किंतु समसामयिक प्रगतिशील नाट्य रचनाओं में नई धारा और नूतन अभिव्यक्ति के अभाव का अनुभव कर उग्र ने सामाजिक जीवन में कला का स्वरूप निखारने के लिए नाटक में प्रचलित और रुचिकर शैली का अनुगमन किया है।
    ‘उग्र’ ने अपने लेखन-जीवन का आरंभ ही नाटकों से किया था। उनका पहला ही नाटक ‘महात्मा ईसा’ हिंदी का अत्यंत सफल और चर्चित नाटक रहा था।
    ‘चुंबन’, ‘गंगा का बेटा’, ‘अन्नदाता’, ‘माधव महाराज महान’ उनकी अन्य लोकप्रिय नाट्य कृतियां रही हैं। उपन्यास और भारी-भरकम संपादकीय से समय निकालकर ‘उग्र’ ने एकांकी और प्रहसन की भी रचना की है।
    पांडेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ रचित नाटक ‘आवारा’ में सामान्य सहायक पात्रों के अलावा छह पुरुष पात्र और तीन स्त्री पात्र हैं, नाटक तैंतीस दृश्यों तथा तीन अंकों 
    में समायोजित है। पहले अंक में आठ, दूसरे में अठारह व तीसरे अंक में सात दृश्य हैं। ‘नाटक’ में ‘उग्र’ द्वारा प्रणीत गीत भी समायोजित हैं जो कथानक व वातावरण को सजीव बनाते हैं। गीत-नाट्य की यह पद्धति लोक-नाट्य परंपरा की-सी है। कथानक में प्रायः जो घटनाएं मंच पर नहीं दिखाई जातीं उनकी सूचना व वातावरण की मार्मिकता को और गहन बनाए रखने के लिए या कभी-कभी उसके प्रतीकात्मक अर्थों को स्पष्ट करने के लिए गायन पद्धति उपयोगी सिद्ध होती है।
    प्रस्तुत नाटक ‘आवारा’ में बूढ़े भिखारी बुद्धूराम की बेटी लाली और क्रूर जमींदार के छोटे भाई दयाराम को प्रमुख पात्र के रूप में चित्रित कर हमारी सामाजिक मान्यताओं और परिस्थितियों पर सामयिक, तीखा और तीव्र व्यंग्य किया गया है। आज हिंदी में ‘उग्र’ नहीं रहे, न वैसे गुण-ग्राहक पाठक, मगर ‘उग्र’ का अकल्पनीय नाटक ‘आवारा’ आज भी उग्र की अपनी अद्भुत शैली ‘उग्र-शैली’  की याद दिलाता है।
  • Keral Ka Krantikari (Paperback)
    Vishnu Prabhakar
    40

    Item Code: #KGP-1122

    Availability: In stock


  • The Great Gatsby (Novel)
    F. Scott Fitzgerald
    345 311

    Item Code: #KGP-364

    Availability: In stock

    Nick Carraway, the narrator of the novel, takes us back to the spring in 1922, when Wall Street was booming, and bootleggers were in business due to the alcohol ban. Nick travels to New York from the mid-west in order to become a bondsman. He takes residence in West Egg, next to a huge mansion which belongs to a mysterious Mr. Gatsby.  Nick is reacquainted with Daisy and Tom Buchanan, a wealthy couple who lives across the bay from him. Nick befriends Gatsby, who is revealed to be infatuated with Daisy. Nick arranges for them to meet, and they began to have an affair.  Tom, who is also having an affair with a married woman, confronts Daisy and Tom, and Daisy is forced to return to Tom. As Daisy and Gatsby drive off afterwards, they run over and kill Myrtle Wilson, Tom's mistress. Tom lies to Myrtle's husband, and tells him that Gatsby was the driver, when in reality, Daisy was driving. Wilson shoots Gatsby at his home afterwards, and then commits suicide. Nick is disillusioned with the life he planned for in New York, and returns west to his home town.
    Nick reflects that just as Gatsby's dream of Daisy was corrupted by money and dishonesty, the American dream of happiness and individualism has disintegrated into the mere pursuit of wealth. Though Gatsby's power to transform his dreams into reality is what makes him “great,” Nick reflects that the era of dreaming—both Gatsby's dream and the American dream—is over.
  • A Trinity Of National Summits
    Jagdish Pandey
    80 72

    Item Code: #KGP-9038

    Availability: In stock

    Malviyana is a worshipful homage to the father—angel and architect of the pilgrims of knowledge to the temple—shrine called Banaras Hindu University. Banaras, because it is a Kashi of culture; Hindu, because it flows like the Mother Ganges of cosmopolitanism; and University, because it is a universal city of congregating diversity.
    Homage to Radhakrishnan is homage to the majesty and stature of lndia’s philosopher king, to the teacher and liaison luminary of the East and the West, to one whose voice reverberated across the seas as the voice of India with the ageless wisdom of its sages and seers. It is a homage in soul’s indebtedness to all gurus through a sublime symbol of him.
    Compliments to Kalam should be read as the heart's low bow to the ace patriot and Mother India’s ideal son today. It is homage to eyes lit with a vision of India’s march ahead and glory tomorrow, to a sense of belongingness above all barriers and cramping cabin of spirit, and finally to one for whom knowledge is a ceaseless quest, dynamic as life itself and inspired like love that embraces all.
    My prostrations to each as the symbol and synonym of the son of modern India.
    Please listen with compassionate affection to the lispings of this child. Bless him where he is child-like. Forgive him where he is childish.
  • Science Ki Karamaat
    Maitreyi Pushpa
    100 90

    Item Code: #KGP-9204

    Availability: In stock

    यह युग विज्ञान का युग है अर्थात् साइंस की करामात का युग। विज्ञान की नवीनतम उपलब्धियों से सारा संसार चकित है और साथ ही चिंतित भी; क्योंकि आज का विज्ञान कल्याणकारी भी है और विनाशकारी भी। विश्व-भर में वैज्ञानिक अनुसंधानों-आविष्कारों की होड़ लगी हुई है। विज्ञान की इस प्रतिस्पद्र्धा ने मानव-कल्याण के बहुत-से आयाम प्रस्तुत किए हैं, लेकिन साथ ही संपूर्ण मानव जाति को विनाश के कगार पर भी ला खड़ा किया है। विनाशकारी अणु बमों, उद्जन बमों, प्रक्षेपास्त्रों, ध्वंसक राॅकेटों तथा समुद्री पनडुब्बियों का निर्माण वैज्ञानिकों की खोज का ही परिणाम है।
    इस पुस्तक में इन सभी की प्रारंभ से लेकर अब तक की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है तथा विज्ञान-क्षेत्र में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान और उपलब्धियों पर सरल एवं रोचक शैली में प्रकाश डाला गया है। अंतरिक्ष के बारे में जिज्ञासु पाठकों के लिए यह पुस्तक निःसंदेह उपयोगी सिद्ध होगी।
  • Samkalin Sahitya Samachar July, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #July, 2017

    Availability: In stock

  • Hindi Natya-Kavya : Punarmoolyankan
    Hukum Chand Rajpal
    95 86

    Item Code: #KGP-856

    Availability: In stock

    हिन्दी नाट्य-काव्य: पुनर्मूल्यांकन
    प्रस्तुत आलोचना-ग्रंथ में लेखक ने ‘अंधायुग’, ‘संशय की एक रात’, ‘एक कण्ठ विषपायी’ तथा ‘एक प्रश्न मृत्यु’ सरीखी कृतियों के रूपाकार-विधा की चर्चा सविस्तार की है। ऐसी रचनाओं को एक साथ प्रबंध-काव्य, नाटक, गीति नाट्य, पद्य नाटक, काव्य नाटक तथा नाट्य-काव्य आदि नामों से विवेचित-विश्लेषित करना विचित्र प्रतीत होता है। लेखक ने नाट्य-काव्य विधा की सैद्धान्तिक चर्चा करते हुए कविता और नाटक दोनों विधाओं के सुमेल पर आधारित इस नवीन एवं सार्थक विधा की प्रतिष्ठा करने का प्रयास किया है। उनका मानना है कि ऐसी रचनाएँ कोई स्थापित कवि ही कर सकता है, जिसे नाटकीय विधान की सही समझ हो। इसमें दोनों साहित्य-विधाओं की सम्यक् एवं सहज प्रस्तुति अपेक्षित है। यही कारण है कि धर्मवीर भारती को इस विशिष्ट विधा का प्रथम सफल रचनाकार स्वीकार किया गया है। लेखक की स्पष्ट धारणा है कि ऐसी कृतियाँ एक विशिष्ट मानसिकता पर आधारित होती हैं—इनकी रचना-प्रक्रिया के अनेक सोपान एवं पड़ाव होते हैं—काव्यात्मकता इसका मूलाधार है तथा नाटकीयता इसका बाह्य विधान। ये इसे अधिक ग्राह्य एवं प्रभावोत्पादक बनाते हैं। इस ग्रंथ में पहली बार नाट्य-काव्य, संश्लिष्ट नाट्य-काव्य (लम्बी कविता) और रंग-काव्य सरीखी रचनाओं के अन्तर्सम्बन्धों को सोदाहरण रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। अपनी धारणाओं-स्थापनाओं को प्रामाणिक-तार्किक आधार प्रदान करने हेतु शोध-प्रविधि के नियमों की सटीक प्रस्तुति के साथ ही इस विधा के सभी विद्वानों की चर्चा यथास्थान की गई है। लेखक की विशिष्टता इस बात में है कि वे स्थापित समीक्षकों के साथ ही नवोदित रचनाधर्मियों का उल्लेख एवं उन्हें महत्त्व प्रदान करने में उदार रहे हैं। हमें पूर्ण विश्वास है कि इस ग्रंथ से इस विवादास्पद विधा को सही धरातल पर समझने का मार्ग प्रशस्त होगा। 
  • Shringaar Shatak
    Basant Kumar Mahapatra
    40 36

    Item Code: #KGP-9104

    Availability: In stock

    'श्रृंगार शतक' नाटक का एक संक्षिप्त अंश
    नयना : लेकिन ऐसा क्यों हुआ महाराज !!! यह युग हठात इस तरह को बदल गया ?
    सूर्यभानु : हर चीज हमेशा एक-सी नहीं रहती सुनयना! बीस साल पहले मैने तुझे जिस रूप में देखा था-क्या तुम आज वैसी ही हो ? ठीक उसी तरह समय के साथ-साथ न जाने कितना कुछ बदल जाता है । राजा सूर्यभानु आज भिखारी है और मेरा गुमाश्ता सनातन राजा । वह देखो, मेरे घर के आगे सिर उठाए खडी है उसकी तिमंजिली कोठी। बिजली की रोशनी से किस कदर झिलमिला रही है वह कोठी । जानती हो, आज उसके लड़के की शादी है । इसीलिए उसके दरवाजे पर इतनी गाड़ियां खडी है । कितनी भीड़ है । सारे ऑफिसर और मंत्री आज़ उसके यहीं आए है । पूरी रात वे जश्न मनाएँगे । आज जैसे दिन में यदि मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहूँ-सना मेरा गुमाश्ता था-मेरे गोदाम से धान चोरी करते समय पकडे जाने पर वह बर्खास्त हुआ था–मेरी बात पर कौन विश्वास करेगा ? दिन बदल गए हैं सुनयना, सब कुछ उलट-पलट गया है ।
    नयना : किंतु ऐसा कब तक चलेगा महाराज ?
    सूर्यभानु : राजा है जुल्म किया, इसलिए प्रजा ने राजतंत्र तोड़कर गणतंत्र की स्थापना की । गणतंत्र में जुल्म हुआ तो लोग फिर इसके विरुद्ध विद्रोह करेंगे । उस विद्रोह में पैदा होगी–और किसी तरह की नवीन शासन पद्धति । खैर, छोडो–यह सब सोचकर कोई लाभ नहीं । जब तक कोई परिवर्तन आएगा हम लोग नहीं होंगे ।

  • Bhartiya Sahitya Par Mahabharat Ka Prabhav
    Dr. Chandrakant Bandiwadekar
    275 248

    Item Code: #KGP-811

    Availability: In stock

    भारतीय साहित्य पर महाभारत का प्रभाव
    ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ भारतीय सभ्यता और संस्कृति के मूलाधार हैं। जीवन के आदर्श और यथार्थ का इतना व्यापक और विश्वसनीय अनुभव विश्व में अन्यत्र असंभव है। इनमें जहाँ पूर्ववर्ती गतिशील मनीषा का अक्षय कोष है, वहीं पर परवर्ती चिंतन-सरणियों को प्रेरित और प्रभावित करने की विलक्षण क्षमता है। 
    ‘महाभारत’ के संबंध में कहा जाता है--"जो महाभारत में नहीं है, वह भारत में भी नहीं है।" अर्थात् भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक आदि विशेषताओं का सर्वस्व ‘महाभारत’ में विद्यमान है। लोककथाओं से लेकर शिष्ट साहित्य की विविध विधाओं तक ‘महाभारत’ के जीवंत प्रतिबिंब को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। 
    ‘गीता’ के आध्यात्मिक चिंतन से लेकर विभिन्न सामाजिक घटनाओं और पात्रों से सभी भारतीय भाषाओं के साहित्य ने अपना उपजीव्य ग्रहण किया है। मिथकीय संभावनाओं की व्यापकता के कारण भारतीय साहित्य की विभिन्न विधाओं में युगबोधी संवेदना को अभिव्यक्त करने के लिए प्रभूत लेखन किया गया है।
    ‘महाभारत’ पर आधारित विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य को जाँचने-परखने पर यह रोचक तथ्य सामने आता है कि इस विपुल लेखन में भौगोलिक अंतराल और भाषा-भेद के होने पर भी हमारी चिंतन धारा में अद्भुत समता है। यह हमारी सांस्कृतिक एकता और भावात्मक अखंडता का प्रमाण है।
  • Bhasha, Sahitya Aur Jaatiyata
    Ram Vilas Sharma
    640 576

    Item Code: #KGP-884

    Availability: In stock

    भाषा, साहित्य और जातीयता
    डॉ. रामविलास शर्मा की जन्मशताब्दी के अवसर पर उनके लेखों और समीक्षाओं का यह संग्रह पाठकों के लिए प्रस्तुत है। डॉ.शर्मा द्वारा संपादित पत्रिका ‘समालोचक’ में प्रकाशित यह सामग्री पहली बार पुस्तक के रूप में आ रही है। सामग्री का प्रस्तुतिकरण तथा संपादन किया है डॉ. शर्मा के सुपुत्र विजय मोहन शर्मा ने।
    ज्ञात हो कि ‘समालोचक’ केवल दो वर्ष--फरवरी, 1958 से जनवरी, 1960 तक निकल पाया। कुल चैबीस अंकों में से दो विशेषांक थे--‘सौंदर्यशास्त्र विशेषांक’ और ‘यथार्थवाद विशेषांक’। जिनका उस समय बड़ा स्वागत हुआ और हिंदी साहित्य-जगत् के अनेक ‘सितारों’ ने उनकी सराहना की। ये विशेषांक साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए आज भी महत्त्व रखते हैं।
    ‘समालोचक’ में पुराने लेखकों के अलावा नए लेखक भी लिखते थे। इन लेखकों में हिंदी प्रदेश से बाहर के लेखक भी थे। इसका संपादकीय क्षितिज उदार था। संपादक डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, ”हमारा ध्येय हिंदी आलोचना के विकास में योग देना है, उसमें आमूल परिवर्तन करना अथवा युगांतर उपस्थित करना नहीं। हम विभिन्न विचारधाराओं और मतों के लेखकों की रचनाएं प्रकाशित करके परस्पर विचार-विनिमय द्वारा आलोचना-साहित्य के उत्तरोत्तर विकास का प्रयत्न करेंगे।“
    बीसवीं शताब्दी के हिंदी के सर्वमान्य महान् आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा की साहित्यिक समझ और प्रतिबद्धता का विस्तार इस ग्रंथ की संकलित सामग्री में आद्यंत दिखाई पड़ते हैं। शोध और समीक्षा के प्रतिमान स्थापित करता यह ग्रंथ प्रत्येक बुकशेल्फ की अनिवार्यता है।
  • Antim Pankti Mein
    Nilesh Raghuvanshi
    140 126

    Item Code: #KGP-1900

    Availability: In stock

    नीलेश रघुवंशी की ये कविताएँ गवाह हैं कि इधर वे कविता की प्रगीतात्मक संरचना से आगे बढ़कर उसके आख्यानात्मक शिल्प की ओर आई हैं । इस प्रक्रिया में दोनों तरह की संरचनाओं के द्वंद्व और सहकार, उनकी अंत:क्रिया से ऐसा शिल्प विकसित करने में वे कामयाब हुई हैं, जो दोनों की प्रमुख विशेषताओं का सारभूत और संशिलष्ट रूप है । कविता के ढाँचे में लगातार चलती तोड़-फोड़, कुछ नया सिरज सकने की उनकी बेचैनी, प्रयोगधर्मिता के साहस और शिल्प को लेकर उनके जेहन में जारी बहस का समेकित नतीजा है ! बहुत-से कवियों की लगता है कि जीवन में जोखिम उठाना पर्याप्त है और कविता बिना जोखिम के लिखी जा अकती है। मगर नीलेश से हम कला की दुनिया का यह अनिवार्य सबक सीख सकते हैं कि जीवन से भी ज्यादा जोखिम है कला में । इसलिए वे आत्म-तत्त्व की कीमत पर साज-सज्जा में नहीं जाना चाहतीं। वह तो सच का अन्यथाकरण और अवमूल्यन है ! मानो वे स्वयं कहती हैं-जो होते इतने गहने और सिंगार तो काहे को अरी दुपहरी में हम अपना तन जलाते।
    विगत वर्षों में कुछ युवा कवियों के आख्यान की बनावट चेतना और प्रतिबद्धता के विस्तार के रूप में आकृष्ट करती रही है ! दरअसल या शिल्प कविता को चीजों का महज़ भावुक, एकांगी और सरल पाठ बन जाने से रोकता है और उसे भरसक वस्तुनिष्ठ, बहुआयामी और जटिल यथार्थ में ले जाता है ।  कवियों को 'पूरा वाक्य' लिखने की त्रिलोचन को सलाह पर अमल तो यहाँ है ही, कार्य-कारण-संबंध का विवेक भी और एक किस्म के गद्य की प्रचुरता वास्तविकता के काफी हद तक शुष्क और दारुण होने की साक्ष्य है! इसलिए रोजमर्रा की बातचीत की लय, व्याख्या और किस्सागोई का अंदाज और अनुभव का विषम धरातल-ये तत्व मिलकर इस कविता का निर्माण करते हैँ। यहाँ किसी अप्रत्याशित  सौंदर्य-लोक, कल्पना के नायाब उत्कर्ष या संवेदना की सजल पृष्ठभूमि की उम्मीद करना बेमानी है; क्योंकि इस शिल्प के चुनाव में ही कविता की पारंपरिक भूमि और भूमिका से एक प्रस्थान निहित है ! यह भी नहीं कि वह स्वप्नशील नहीं है! नीलेश रघुवंशी इस बदरंग और ऊबड़-खाबड़ दुनिया को एक खेत में बदलने और उसमें मनुष्यता को रोपने का सपना देखती हैं, मगर उसी समय यथार्थ की जटिल समस्या उन्हें घेर लेती है-एक स्वप्न है जाती हूँ जिसमें बार-बार/लौटती हूँ हर बार/मकडी के  जाले-सी बुनी इस दुनिया के भीतर !
    सच्चाई से सचेत और उसके प्रति ईमानदार होने की बुनियादी प्रतिश्रुति की बदौलत कविता किसी स्वप्निल, कोमल, वायवीय संसार में नहीं भटकती, बल्कि इच्छा और परिस्थिति के विकट द्वंद्व को साकार करती है ! नीलेश की नजर में अपने लिए किसी स्वप्न क्रो स्वायत्त करना और उसकी वैयक्तिक साधना करना गुनाह है ! उनके यहाँ सामान्य जन-जीवन ही स्वप्न की कसौटी है ! यही इस कविता का साम्यवाद है, जिसके चलते वे अपनी ही उत्साहित वस्तु से श्रमिक-वर्ग की चेतना के अलगाव और अपरिचय की विडंबना को पहचान पाती हैं-वे जो घर बनाते हैं उसके स्वप्न भी नहीं आते उन्हें !
    सवाल है कि प्रेमचंद के जिस होरी को किसान से भूमिहीन मजदुर बनने को विवश होना पड़ा और जिसकी एक दिन लू लगने से अकाल मृत्यु हुई, वह आज कहाँ है ? यह जानना हो तो नीलेश की अत्यंत मार्मिक और सांद्र कविता किसान पढ़नी चाहिए, जिसके किसी एक अंशा को उद्धृत करना कविता से अन्याय होगा ? फिर भी सारे ब्यौरे की प्रामाणिक लहजे में इस निष्कर्ष तक ले आते हैं-ये हमारे समय का किसान है न कि किसान का समय है ये । कोई पूछ सकता है कि किसान का समय था ही कब, पर कहने की जरूरत नहीं कि यह समय उसके लिए ज्यादा क्रूर और कठिन है । नीलेश साधारण जन-समाज से आवयविक रिश्ता कायम करती हैं, क्योंकि वे काव्य-वस्तु के लिए ही नहीं, भाषा और भाव के लिए भी उसके पास जाती हैं। सच है कि जो लोग सबसे अरक्षित और साधनहीन हैं, वे ही हँसते-हँसते मृत्यु की कामना कर सकते हैं । कबीर ने जिसे आकाश से अमृत निचोड़ना कहा था, उस तरह ये मृत्यु के हाथों से जिन्दगी छीन  लेते हैं । लेकिन जो मौत से डरते हैं, वे अपना सब कुछ बचाने की फिराक में जिन्दगी से ही कतराकर निकल जाते हैं । नीलेश की कविता प्रश्न करती है-क्यों खुटने से डरते हो ? हम तो रोज़ खुटते हैं ।
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda
    Vinod Verma
    500 450

    Item Code: #KGP-9149

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Aakash Ke Deeye
    Sharan
    30 27

    Item Code: #KGP-9148

    Availability: In stock

    हिंदी में ज्ञान-विज्ञान का विविध साहित्य उपलब्ध कराने के लिए केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा एवं संस्कृति मंत्रालय पुस्तक प्रस्थान की अनेक योजनाओं पर कार्य कर रहा है । इनमें से एक योजना प्रकाशकों के सहयोग से हिंदी से लोकप्रिय पुस्तको के प्रकाशन की है । सन् 1961 से कार्यान्वित की जा रही इस योजना का मुख्य उद्देश्य जनसाधारण में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार करना और साथ ही हिंदीतर भाषाओ के भी साहित्य की लोकप्रिय पुस्तकों को हिंदी में सुलभ कराना है ताकि ज्ञान-विज्ञान की जानकारी पाठकों को सुबोध शैली में मिल सके । इस योजना के अधीन प्रकाशित पुस्तकों में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार द्वारा निर्मित शब्दावली का प्रयोग किया जाता है ताकि हिंदी के विकास में ऐसी पुस्तकें उपयोगी सिद्ध हो सके । इन पुस्तकों में व्यक्त विचार लेखक के अपने होते है ।
  • Saarth (Paperback)
    Bhairppa
    200

    Item Code: #KGP-7042

    Availability: In stock

    सार्थ
    सार्थ अर्थात् व्यापारियों का काफिला । नागभट्ट नामक एक वैदिक अपने राजा द्वारा एक सार्थ के साथ उच्च अध्ययन के लिए भेजा जाता है । कथा के वाचक नागभट्ट द्वारा आठवीं शती के भारत का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । उस समय वैदिक धर्म पतनोन्मुख था, भले ही शकरचार्य, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, भारती देवी आदि जैसी विभूतियां उसके प्रचार-प्रसार में लगी थीं। दूसरी ओर बौद्ध धर्म अपने उत्कर्ष पर था । उसके आचार्य धर्म-प्रचार के लिए स्तूपों, चैत्यों और विहारों के निर्माण में जुटे थे । साथ ही, योग साधना और तंत्र साधना में भी आकर्षण बना हुआ था । भारत के पूर्वी भाग में इस्लाम धर्म तलवार की नोक से अपने धर्म और संस्कृति की लकीर खींच रहा था। डॉ. भैरप्पा ने तत्कालीन समाज और धर्म का सजीव चित्रण अपनी पैनी लेखनी से अपनी विशिष्ट शैली में इस उपन्यास में किया है । संभवत: साधारण जन उस समय भी ऊहापोह की उसी स्थिति में था, जिसमें आज अपने को पा रहा है । इसी कारण पाठक इस उपन्यास को एक बार प्रारंभ करके छोड़ नहीं पाएगा, जब तक कि इसे समाप्त न कर ले ।
    डॉ. भैरप्पा की यह विशिष्ट ऐतिहासिक कृति 'सार्थ' अब आपके सन्मुख प्रस्तुत है ।

  • Hamare Jeevan Moolya-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1157

    Availability: In stock


  • Keshavraav Baliram Hedgewar : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    100

    Item Code: #KGP-488

    Availability: In stock

    निडर और साहस के धनी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भारत की उन महान् विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के पथ पर चलते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। अपनी जीवनशैली में सदैव अनुशासन और राष्ट्रप्रेम को अधिक महत्त्व देने वाले डॉ. केशवराव ने बाल्यावस्था में ही अपने अंग्रेजविरोधी तेवर दिखाने आरंभ कर दिए थे।
    डॉ. केशवराव उन विलक्षण व्यक्तियों में से थे, जो युवाओं की मानसिकता को भलीभांति जानते थे और उनकी क्षमताओं को विकसित करने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
    देश की युवा पीढ़ी को भारत की सनातन संस्कृति और आदर्शों से जोड़े रखने के लिए 28 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पर्व पर ‘संघ’ नामक नए राष्ट्रीय हिंदूवादी संगठन की स्थापना की गई। साहस और अनुशासन पर आधारित इस संगठन को खड़ा करने का पूरा श्रेय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार को जाता है। इस स्थापना-समूह के अन्य सदस्यों में डॉ. वी. एस. मुंजे, बापूजी सोनी तथा डॉ. परांजपे आदि वरिष्ठ नेता शामिल थे।
  • Sanchit Bhukh (Paperback)
    Narendra Kohli
    35

    Item Code: #KGP-7097

    Availability: In stock


  • Ek Qatara Khoon (Paperback)
    Ismat Chugatai
    250

    Item Code: #KGP-97

    Availability: In stock


  • Buddha Ka Chakravarti Saamrajya
    Rajesh Chandra
    240 216

    Item Code: #KGP-9114

    Availability: In stock


  • Basant Bayar
    Nisha Bhargva
    200 180

    Item Code: #KGP-1807

    Availability: In stock

    कहानी साहित्य की एक सशक्त विधा है। नवरसों को संजोए ये कहानियां पाठक के मन को हलराती-दुलराती, हंसाती, रुलाती, गुदगुदाती और स्पंदित करती हैं । आसपास की विसंगतियों को रेखांकित करती, दलदल में भी जीवन के पद और सूत्र ढ़ूंढ लेती है । विभिन्न जीवन दशाओं के उकेरती, जीने की सही दिशा देती हैं । कहानी कहना भी एक कला है ।
    हंसाना एक कला है । जो हंसा सकता है, उसमें रुलाने की भी भरपूर ताकत होती है। आँसू, भावनाओं का सिंचन करते है । रचना के लिए भावों का सिंचन आवश्यक है । इसलिए तो मनुष्य जीवन में हंसने-हंसाने के साथ रोने-रुलाने का भी महत्व है।
    निशा भार्गव को कहानियां, मानो हंसाते-हंसाते रुला देती हैं । जीवन की विसंगतियों पर हंसाती, जीवन का सत्य बखान कर जाती हैं । 'बसंत बयार' संग्रह की कहानियां निशा भार्गव के दादी बनने को उम्र में भले ही प्रकाशित हो रही हैं, लेखिका की उम्र के विभिन्न पड़ावों पर उसे ही उद्वेलित, रोमांचित और सुखाश्चर्य से भरती रहीं हैं । आसपास में बिखरे, टूटते-बिखरते-जुड़ते पारिवारिक ताने-बानों की ये कहानियां हैं। संग्रह को यही विशेषता है।
    एक-एक कुटुम्ब (परिवार) को दुरुस्त करके ही पुन: "वसुधैव-कुंटुम्बकम्" का भारतीय सनातन आदर्श सार्थक होया।  ये कहानियां कुछ ऐसा ही प्रयास करती दिखती हैं। निशा भार्गव की उनकी अर्थवान कहानियां और लेखकीय ईमानदार प्रयास के लिए बधाइयाँ । पाठकों से अपेक्षा है कि वे पढे, गुने और पन्नों पर बिखरे जीवन जोड़ने वाले तत्वों को सहेज लें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavi Ne Kaha : Leela Dhar Jaguri
    Leeladhar Jaguri
    150 135

    Item Code: #KGP-1871

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: लीलाधर जगूड़ी
    अपनी कविताओं का चुनना आज़ादी है और आज़ादी का पहला लक्षण है चुनाव की स्वतंत्रता जो कि लिखने की स्वतंत्रता से कतई कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कोई अपने लिए क्या और क्यों चुनता है, इसके सामाजिक और व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन अपने में से अपने को चुनने के लिए ज्ञानात्मक समीक्षा दृष्टि और संयम आवश्यक है जिसका अभाव इस मौके पर भी मुझे काफी परेशान किए रहा। क्या अपनी ये चुनी हुई कविताएँ ही मेरा सम्यक् अभीष्ट हैं? शायद हाँ, शायद नहीं। क्योंकि इस चयन को इस चयन में से अभी पाठकों द्वारा भी चुना जाना है। चुने हुए में से चुनना और बढ़िया विचारपरक हो सकेगा। निर्दोष चयन तो काफी कठिन काम है फिर भी चुनने के स्वार्जित अधिकार से पैदा हुई व्याख्या का अपना स्थान है। वह स्थान तभी दिख सकता है और समझ में आ सकता है जब विवेचन दोष रहित दूषण सहित हो। इन कविताओं में कितना पैनापन है, कितनी प्रखरता है यह तभी समझा जा सकेगा जब सुकोमल और सुंदर पक्षों को उन पात्रों की घटनाओं के माध्यम से चिद्दित किया जा सके। यह अनुभव की महिमा और अनुभूति के विन्यास को खुद अपने अस्तित्व के अनुरूप कारणों से चुनवा सकेगा।
  • Kavi Ne Kaha : Ibbar Rabbi (Paperback)
    Ibaar Rabbi
    90

    Item Code: #KGP-1406

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : इब्बार रब्बी
    बचपन में महाभारत और प्रेमचंद होने का भ्रम, किशोर अवस्था में छंदों की कुंज गली में भटकने का भ्रम, फिर व्यक्तिवाद की दलदल में डुबकियां । लगातार भ्रमों और कल्पना-लोक में जीने का स्वभाव । क्या आज भी किसी स्वप्न-लोक के नए मायालोक में ही खड़ा हूं? यह मेरा नया भ्रम है या विचार और रचनात्मकता की विकास-यात्रा? क्या  पता । कितनी बार बदलूं।
    नया सपना है शमशेर और नागार्जुन दोनों  महाकवियों का महामिलन । इनकी काव्यदृष्टि और रचनात्मकता एक ही जगह संभव कर पाऊं । जटिल और सरल का समन्वय, कला और इतिवृत्तात्पकता एक साथ । ध्वनि का अभिधा के साथ पाणिग्रहण ।  नीम की छांह में उगे पीले गुलाबों की खुशबू से नाए रसायन, नए रंग और नई गंध जन्म लें । गुलाबों की शफ्फाक नभ-सी क्यारी में बीजों-सी दबी निबोलियां । इस नई मिट्टी और खाद से उगने वाले फूल, लताएं और वनस्पतियां बनें मेरी कविता ।
  • Saphalata Ka Rahasya
    Jagat Ram Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-99

    Availability: In stock

    सफलता का रहस्य
    जीवन में सफलता की चाहना सब रखते हैं, लेकिन सफल हो नहीं पाते। ऐसा न होने पर कोई भाग्य को कोसता है, कोई हालात को। जबकि सफलता हमारे अपने व्यवहार पर ज्यादा निर्भर है, न कि किन्हीं और बाह्य कारणों पर।
    सफलता के आधारभूत सूत्र हैं-शुद्ध व्यवहार, सीखने की प्रवृत्ति, आत्मनिर्भरता, संतोष तथा और भी बहुत कुछ।
    आर्य जी ने अपनी इस पुस्तक में सफलता के रहस्यों की सरल-सुबोध भाषा में व्याख्या की है। पुस्तक पठनीय तो है ही, जीवन से लिए गए सच्चे उदाहरणों के चलते संग्रहणीय भी बन पड़ी है।
  • Yoon Banee Mahabharat (Paperback)
    Pratap Sehgal
    60

    Item Code: #KGP-1417

    Availability: In stock

    प्रताप सहगल
    कवि, नाटककार, कथाकार, आलोचक
    जन्म : 10 मई, 1945, झंग, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान में)
    प्रकाशित रचनाएँ 
    कविता-संग्रह : 'सवाल अब भी मौजूद है', 'आदिम आग', 'अँधेरे में देखना', 'इस तरह से', 'नचिकेतास ओडिसी', 'छवियाँ और छवियाँ' 
    नाटक : 'अन्वेषक',  'चार रूपांत',  'रंग बसंती', 'मौत क्यों रात- भर नहीं आती', 'नौ लघु नाटक', 'नहीं कोई अंत', 'अपनी-अपनी भूमिका', 'पाँच रंग नाटक', 
    तथा 'छू मंतर' और 'दस बाल नाटक'
    उपन्यास : 'अनहद नाद', 'प्रियकांत' 
    कहानी-संग्रह : 'अब तक', 'मछली-मछली  कितना पानी'
    आलोचना : 'रंग चिंतन', 'समय के निशान', 'समय के सवाल', 
    विविध : 'अंशतः' (चुनिंदा रचनाओं का संग्रह)
    सम्मान एवं पुरस्कार : ० मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार ० 'रंग बसंती' पर साहित्य कला परिषद द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख पुरस्कार ० 'अपनी-अपनी भूमिका' शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत  ० 'आदिम आग' व 'अनहद नाद' हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत ० सौहार्द सम्मान, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ० राजभाषा सम्मान, भारत सरकार ० साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली और अन्य पुरस्कार । 
    संपर्क : एफ- 101, राजौरी गार्डन, नई दिल्ली- 110027
    फोन : 25100565, मो० : 9910638563
    ई-मेल : partapsehgal@gmail.com 

  • Chetana
    Madan Lal Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-1812

    Availability: In stock


  • Ushakaal
    Hari Narayan Aapte
    150 135

    Item Code: #KGP-2000

    Availability: In stock

    उषाकाल
    जिस वस्तु को प्राप्त करने की अभिलाषा मन से है वह मिले नहीं, बल्कि उसका महत्त्व दिन-प्रतिदिन और अधिक बढ़ता नजर आए तो ऐसी स्थिति में उस वस्तु को प्राप्त करने की कितनी उत्सुक्ता बढ़ जाती है, इसका अनुभव हर मनुष्य को है ही । राजा की भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी । उसके मन में स्वामी रामदास के दर्शनों की उत्कट इच्छा थी । इधर बीजापुर से कोई समाचार न आया देखकर राजा का मन काफी उद्विग्न था । यह देखकर एक बार समर्थ के यहाँ परली जाने की चर्चा छेडी । राजा को स्वामी की बात पसंद आई और वे दोनों परली के पर्वतों की और चल पड़े ।
    चलते-चलते स्वामी जी ने अपना अनेक वर्षों का अनुभव राजा को बताया । दोनों एक गाँव के पास पहुंचे । गर्मी के दिन थे। धूप काफी थी, इसलिए दोनों ने मालदेव जी के मंदिर में अपना डेरा डाला । पिछली रात राजा को ज्वर काफी था । अत: डेरा डालते ही वे आराम करने लगे । मंदिर के पास ही एक नदी थी और उसके पार भी एक मंदिर था । राजा की वृष्टि उस मंदिर और उस नदी के तट की ओर गई। उन्हें एक विचित्र दृश्य देखने को मिला । यह देखते ही राजा के  क्रोध की सीमा न रही। वे एकदम अपनी जगह से उठे, मानो उनको इस बात का ज्ञान ही नहीं रहा कि पिछली रात को उन्हें ज्वर आया था । अपने कपडे उतारे और अपनी तलवार मुँह से पकड़कर पानी में कूद पड़े । [इसी उपन्यास से]

  • Dushyant Kumar Rachanavali (Paperback)
    Vijay Bahadur Singh
    1250

    Item Code: #KGP-77

    Availability: In stock


  • Aadhunik Bhartiya Nayee Kavita
    Krishna Dutt Paliwal
    490 441

    Item Code: #KGP-9006

    Availability: In stock

    हिंदी आलोचना में ऐसे स्मरणीय नाम अत्यल्प हैं जिन्होंने अपनी पहचान निर्मित करते हुए संदर्भित विधा को भी नई चमक प्रदान की हो। जिन्हें परंपरा में पैठना आता हो और जिनकी दृष्टि आधुनिकता के चाक-चिक्य में सार्थक आलोक को खोज लेती हो। प्रोफेसर कृष्णदत्त पालीवाल एक ऐसे ही धीर-गंभीर अध्येता रहे, जिन्होंने वैचारिक उखाड़- पछाड़ के बीच अपनी सैद्धांतिक दृढ़ता को बनाए रखा। प्रायः लोकप्रियता और छवि-निर्माण के लिए कुछ लोग जिन निराधर फार्मूलों पर भरोसा करते हैं, प्रो. पालीवाल ने उनकी ओर कभी देखा तक नहीं। पूरी निष्ठा के साथ भारतीय रचनाकारों पर आलोचनात्मक चिंतन उनकी लेखकीय प्रतिबद्धता का एक प्रबल प्रमाण है।
    प्रस्तुत पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ में प्रो. पालीवाल के आलोचक ने एक नयी छलांग लगाई है। उन्होंने अपने विशाल अध्ययन, गहन अन्वेषण और सुदीर्घ आलोचनात्मक अनुभव का निदर्शन करते हुए इस पुस्तक के आलेख लिखे हैं। इन्हें पढ़ने और बूझने के लिए सर्वप्रथम ‘भारतीयता’ की प्रशस्त अवधरणा को हृदयंगम करना आवश्यक है। अपने समस्त लेखकीय कर्म में प्रो. पालीवाल ने राष्ट्र, राष्ट्रीयता, अस्मिता, सभ्यता, संस्कृति, भारतीयता आदि पर भांति-भांति से विचार किया है। विशेषता यह है कि वे किसी भी विचार, व्यक्ति या अवधरणा से न आतंकित होते हैं, न ग्रस्त! भारतीय या अभारतीय लेखक चिंतक कितना ही नामचीन क्यों न हो, यदि उसकी तर्कपद्धति दूषित है तो पालीवाल उसे खंडित करने में क्षण भर भी देर नहीं लगाते। वे भारतीयता की सर्वमान्य विशेषताएं विश्लेषित करने के साथ-साथ उन लक्षणों का भी उल्लेख करते हैं जिन्होंने इस महादेश की मानसिकता को मनुष्यता के लिए सर्वाधिक अनुकूल बना रखा है।
    प्रो. पालीवाल जब ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ पर विचार करते हैं तो वे ‘भारतीय मनीषा के प्राण तत्त्वों का अन्वेषण’ अपना लक्ष्य बनाते हैं। उनके शब्दों में, "मूलतः भारतीय सृजन का अर्थ है--भारत के रचनाशील मानस की सामूहिक चेतना...जिसका निर्माण हजारों वर्षों से संचित अनुभूतियों और विचारों की गहन संश्लिष्टता से हुआ है। एक विशेष प्रकार की सौंदर्याभिरुचियां इस सृजन के भाव एवं रूप तत्त्व में विद्यमान हैं। बाहरी प्रभावों की अनुगूंज सुनाई पड़ने पर भी यह सृजन हमारे चिंतन की मौलिकता, सत्य के रूढ़ि-मुक्त रूप की झलक और मानव गरिमा को स्वीकृति का दस्तावेज कहा जा सकता है।"
    पुस्तक दो खंडों में संयोजित है। खंड एक में आधुनिकता के प्रथम उन्मेष से ‘आधुनिक भारतीय नयी कविता’ की प्रयोगशील व प्रतिक्रियात्मक प्रवृत्ति तक का सटीक विश्लेषण है। खंड दो भारतीय भाषाओं के शिखर रचनाकारों पर केंद्रित है। माइकेल मधुसूदन दत्त, सुब्रह्मण्य भारती, वल्लतोल, काजी नजरुल इस्लाम, मैथिलीशरण गुप्त, अज्ञेय व कुमार आशान की रचनाओं का इतना प्रमाण पुष्ट पाठ अन्यत्रा दुर्लभ है।
    समग्रतः इस कृति से गुजरते हुए एक महत्त्वपूर्ण आलोचक प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल की व्यापक आलोचना-दृष्टि का दर्शन होता है। अपने विषय पर एक विप्लव विशिष्ट ग्रंथ। पठनीय और संग्रहणीय।
  • Rang-Saakshatkaar
    Jai Dev Taneja
    650 585

    Item Code: #KGP-817

    Availability: In stock


  • Sabha Parv
    Badiuzamma
    300 270

    Item Code: #KGP-2040

    Availability: In stock

    सभापर्व 
    जो कहानी महाभारत के 'सभापर्व' से शुरू हुई वह आज भी पूरी नहीं हुई । छोटे-से शहर गया के एक मोहल्ले से शुरू होकर ये उपन्यास इतिहास का सैकडों साल का सफर तय करता है-वह इतिहास जो न चाहते हुए भी हममें जिदा है और हमारे दिले-दिमाग पर हावी है ; वह इतिहास जो बजाहिर तो बदलता है लेकिन दरअसल सिर्फ अपने-आप को दोहराता है । सतह के नीचे सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा कि था । धर्म बदले, सिद्धान्त बदले, सत्ता के लिए जद्दोजहद के तरीके बदले लेकिन सत्ता का बुनियादी स्वरूप नही बदला । बनी हाशिम-बनी उमय्या; शीया-सुन्नी, हिन्दू-मुस्लिम, बौद्धधर्म-ब्राह्यणवाद…संघर्ष के मुखोटे बदलते रहते हैं, इंसानी प्रवृत्ति नहीं बदलती । सैकडों साल के सफ़र के दौरान ये उपन्यास समाज के विभिन्न वर्गों का एक जायजा लेता है । घर, कबीले और मुल्क के नक़्शे, और इंसानी ताल्लुकात का बनना- बिगडना न बदलने वाली मानसिकता की पहचान है । यह ऐसी मानसिकता है जिससे हजार साल की नफ़रत, लगाव, तजूर्बात परत-दर-परत जिन्दा हैं ।  इसमें श्रीकृष्ण के कालिय दमन, महात्मा बुद्ध की धर्म विजय और सूफियों के चमत्कार-सब की याद बाकी है । 'सभापर्व' इसी मानसिकता की खोज और पहचान है ।
  • Gharaunda (Paperback)
    Shanker Shesh
    20

    Item Code: #KGP-7096

    Availability: In stock


  • Debt-Free-Forever (Paperback)
    Gail Vax-Oxlade
    245

    Item Code: #KGP-344

    Availability: In stock

    Imagine waking up in the morning and knowing that no matter what happens today, you can cope. Imagine that you’ve got enough money to take care of the expenses that need to be paid regularly and to have some fun too. Imagine the sense of peace that comes from knowing you’re in control of your life.
    If you’ve been frantically trying to cover your butt because there just never seems to be enough money, I can help you. If you’re up to your eyeballs in debt and can’t even imagine being debt-free, I can help you. If you’re at your wits’ end because you’ve made a huge mess and don’t have a clue how to fix it, I can help you.
    —from the book
    FIGURE OUT WHERE YOU STAND MAKE A PLAN CHANGE YOUR HABITS PREPARE FOR THE FUTURE STAY THE COURSE
  • Sanetary Pad
    Sayed Javed Hasan
    250 225

    Item Code: #KGP-1885

    Availability: In stock

    बस्ती का खुदा उठा । मैदान की ओर देखकर मुस्कुराया और धीरे-धीरे चबूतरे की सीढी चढ़ने लगा ।
    दो चढ़ता रहा । तालियां बजनी रहीं।
    अचानक तालियां रुक गई ।
    लोगों ने बस्ती के खुदा को एकाएक बीच सीढी पर रुकते हुए देखा । '
    सबकी धडकने तेज हो गई । उसे अपने इस खुदा पर पूरा  विश्वास था । ताली बजाने वालों में अब मैदान के एक- आध हिस्से को छोडकर बाकी लोग भी शामिल हो गए थे । वे पहले के तीन खुदाओं की छवि से बुरी तरह निराश थे और चाहते थे कि कम से कम इस खुदा की छवि दुरुस्त रहे ।  बस्ती का यह खुदा औरों के मुकाबले अधिक सौम्य, संजींदा और भरोसेमंद था ।
    बस्ती के खुदा ने बस्ती के लोगों को मुड़ के देखा । मुस्कुराया । हाथ हिलाया और फिर सीढी चढने लगा ।
    तालियां फिर बजनी शुरू हुई ।
    तालियां बजती रहीं . . . . बजती रहीं ।
    और फिर . . . . पूरे मैदान में मरघट-सा सन्नाटा छा गया ।
    आईने के सामने बस्ती का खुदा खडा था और उसमें मुखौटों का अक्स उभर आया था ।
    बस्ती के लोग पागलों की तरह अपना सिर धुन रहे थे । उसे अपने जिस खुदा पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वो  बहरूपिया बना उनके सामने खड़ा था ।
    - इसी पुस्तक से
  • Tatvadarshi (Translation Of 'The Prophet)
    Khalil Jibran
    125

    Item Code: #KGP-153

    Availability: In stock

    तत्वदर्शी
    'The Prophet' के अनुवाद के पीछे मेरी मूल भावना इतनी ही थी कि इसे पढते हुए जो अनुभव और आनंद मैंने पाया, उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाऊँ । 
    यह सच है कि कोई भी व्यक्ति विश्व के किसी कोने का हो या किसी धर्म को मानने वाला हो, अपनी आध्यात्मिक यात्रा में उन्हें सत्यों का उदघाटन करता दीखता है जिन्हें पहले भी कहा जा चुका हैं और आगे भी कहने की कोशिश होगी । प्रकाश का स्वभाव तो एक ही रहता है,  चाहे वह दीये में हो या सूर्य में। हाँ, सत्य तो शाश्वत है, लेकिन उसकी अनुभूति की व्याख्याएँ अलग-अलग शैली अख्तियार करती हैं। और खलील जिब्रान जो एक कवि और चित्रकार भी थे, शायद इसलिए ही  शब्दों में शहद की मधुरता भी थी और तितलियों के परों के रंग भी । उनके शब्द स्थिर नहीं थे, वे उड़ते हुए एक तथ्य से दूसरे तथ्य पर बैठते और उसका सत्य संगृहीत करते जाते ।
    प्रेम में असफलता ने उनके हृदय को इतना खोखला किया कि वह एक कुआँ बन गया और फिर इसमें करुणा भर गई-पूरी मानव जाति नहीं, पूरी सृष्टि के लिए । तभी तो उनके शब्द इतने चमत्कारी और समर्थ लगते हैं, जैसे वे शब्द नहीं, एक-एक आत्मा हों और हमारी ओर निहार रहे हो । इतने प्राणवान शब्द कि हर शब्द अपने अंदर एक ब्रह्मांड समेटे हो जैसे । और वह, जिसकी आत्मा पूर्णत: निष्कलुष एवं निष्पाप हो जाती है, वही समर्थ हो जाता है शरीर के सौंदर्य का देख पाने में, और तब उसके लिए शरीर में छिपाने जैसा न कुछ रह जाता  है, न ही कुछ दिखाने जैसा । मानव शरीर भी उसके लिए सृष्टि के अन्य जीवों के  शरीर की तरह ही हो जाता है- अपने स्वरूप में सुंदर, पवित्र !
    –विजयलक्ष्मी  शर्मा
  • Janhit Tatha Anya Kavitayen
    Hiralal Bachhotia
    85 77

    Item Code: #KGP-1856

    Availability: In stock

    जनहित तथा अन्य कविताएँ
    हीरालाल बाछोतिया की कविताओं में आज के मनुष्य की जिजीविषा, करुणा एवं मनस्ताप अभिव्यक्त हुआ है । कविताओं में एक ताजगी है, अन्य समकालीनों से अलगाव, जिसे है कवि का एक आवश्यक गुण मानता है । अपने परिवेश, अपनी धरती और अपनी आंतरिक अन्विति इन कविताओं में सजीव रूप में ध्वनित हुई है ।
    इस संग्रह की कविताएँ चार खंडों में विभाजित हैं । इन चारों खंडों में वैविध्य भी है और एक आंतरिक सामंजस्य भी । जो विशेष बात इन तमाम कविताओं में दिखाई दी, वह है मनुष्य के संताप को दूर करने के लिए कविता के द्वारा अक्रिय प्रयास । इसे मैं मानव-मुक्ति को कविता कह सकता हूँ ।
    इस संग्रह में कहीं-कहीं प्रकृति के अछूते बिंब है और ऐसा लगता है कि महानगर के विषाक्त वातावरण में रहकर भी कवि अपने अतीत को और अपने आत्मीय क्षणों को भूल नहीं पाया है । किंतु यह अतीतजीवी होना नहीं, नित नवीन की और अग्रसर होते हुए अपनी स्मृतियों को भी सहेजकर रखने जैसा है ।
    हिंदी पाठकों को ये कविताएँ आकृष्ट भी करेंगी और एक नई काव्य-संवेदना से भी उनका साक्षात्कार होगा ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-766

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामदरश मिश्र ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सीमा', 'सड़क', 'एक औरत एक जिदगी', 'खँडहर की आवाज', 'मां, सन्नाटा और बजता हुआ रेडियो’, 'निर्णयों के बीच एक निर्णय', 'मुर्दा मैदान', 'अकेला मकान', 'शेष यात्रा' तथा 'दिन के साथ' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Ghalib : Sangeet Ke Saanche Mein Dhali Gazalen_300
    T.N. Raj
    300 270

    Item Code: #KGP-84

    Availability: In stock


  • Himalaya Gaatha-1 (Dev Parampara)
    Sudarshan Vashishath
    450 405

    Item Code: #KGP-166

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-1 (देव परंपरा)
    महापंडित राहुल सांकृत्यायन के बाद संस्कृति पर लेखन और यात्रा-वृत्तांत जैसे साहित्य की धीरे-धीरे कमी होती गई । बहुत ही कम ऐसे साहित्यकार रहे, जिन्होंने आसपास की संस्कृति पर कलम चलाई । ऐसे बिरले साहित्यकारों में सुदर्शन वशिष्ठ एक ऐसा नाम है, जिसने सशक्त कथाकार और कवि होने के साथ-साथ संस्कृति-लेखन में भी बराबर पैठ बनाए रखी। आठवें दशक के आरंभ से लेकर इनके सांस्कृतिक लेख सामने आते रहे । 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'कादम्बिनी', 'संस्कृति', 'योजना' जैसी पत्रिकाओं तथा सभी समाचार-पत्रों के सांस्कृतिक पृष्ठों में ये बराबर लिखते रहे। कुल्लू के मलाणा गणतंत्र को यही सबसे पहले सामने लाए । 'धर्मयुग' के फागुन अंक में 'फागुन में मलाणा' लेख छपा ।
    ‘आँखिन देखी' और उसका कथात्मक शैली में वर्णन वशिष्ठ के संस्कृति-लेखन की विशिष्टता रही है । पढ़ते हुए ऐसा लगता है, आप यह उत्सव स्वयं देख रहे हैं । सरल और स्पष्ट भाषा से रोचकता के साथ संस्कृति के गंभीर पहलुओं का विश्लेषण, उनकी वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।  संस्कृति का कोई ऐसा पहलू अछूता नहीं रहा है, जिस पर वशिष्ठ ने लेखनी न चलाई हो। इतिहास और परंपरा, धर्म और संस्कृति, मंदिर और पुरातत्त्व, मेले और उत्सव, लोक-परंपरा और लोक-वार्ता कोई पक्ष ऐसा नहीं है, जो अछूता रहा हो । लेखक की यायावर प्रवृत्ति ने हिमाचल के दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राएँ की ।
    यदि इनके अभी तक प्रकाशित हजारों लेखों और दर्जनों पुस्तकों को देखा जाए तो इन्हें दूसरा राहुल कहा जा सकता है । राहुल जी ने बहुत जगह पूरे के पूरे गजेटियर उतार डाले । वशिष्ठ ने ऐसा नहीं किया । इन्होंने संस्कृति को बहुत करीब से देखा । जो देखा, वह लिखा । संस्कृति को निष्पक्ष नजरिए से देखा, परखा, समझा है और फिर लेखनीबद्ध किया है । आशा है, यह संस्कृति श्रृंखला पाठकों, शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी ।
  • Ek Nirvasit Maharaja (Paperback)
    Navtej Sarna
    200 180

    Item Code: #KGP-311

    Availability: In stock

    एक निर्वासित महाराजा
    हिंदुस्तान के महानतम शासकों में से एक, पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह का सन् 1839 में देहांत हो गया और उनका विस्तृत साम्राज्य अराजकता में डूब गया । अभी एक दशक भी नहीं हुआ था कि गृहकलहपूर्ण प्रतिद्वन्द्विता और षड़यंत्रों के चलते पंजाब अंग्रेजों के प्रतीक्षारत हाथों में चला गया । जिस शासक ने साम्राज्य के अधिग्रहण की शर्तों पर दस्तखत किए और मशहूर कोहिनूर हीरे सहित लाहौर का तोशकखाना अंग्रेजी को सौंपा, यह एक ग्यारह साल का बच्चा था, महाराजा रंजीत सिंह का सबसे छोटा पुत्र, दलीप सिंह ।
    इस सटीक और मर्मस्पर्शी उपन्यास में, जो सच्ची घटनाओं पर आधारित है, नवतेज सरना पंजाब के आखिरी महाराजा की असाधारण कहानी बखानते हैं । साम्राज्य के अधिग्रहण के साथ ही दलीप को उनकी माँ और प्रजा से अलग-थलग कर दिया जाता है । ब्रिटिश सरकार उन्हें अपने संरक्षण में  लेकर, उनका धर्मांतरण का उन्हें ईसाई बना देती है । सोलह साल की उम्र में उन्हें एक देशीय दरबारी का जीवन जीने के लिए इंग्लैड भेज दिया जाता है । यह एक ऐसा निर्वासन था, जिसके लिए उन्हें अभ्यस्त कराया गया था कि वे खुद इसकी मांग करें; लेकिन अपने साथ होने वाले व्यवहार के कारण जब उनका मोहभंग  हुआ और देर से ही सही, जब उन्हें अपनी सोई हुई विरासत का अहसास हुआ, तब वे विद्रोही वन गए । वे फिर से सिख बन गए और हिंदुस्तान वापस लौटने और अपने लोगों का नेतृत्व करने के लिए मचल उठे, लेकिन उनके इस प्रयास ने उन्हें उन्नीसवीं सदी के यूरोप की गंदी राजनीति से फँसा दिया, जिसने उन्हें रिक्त कर दिया । वे धोखे और उपहास क पात्र बन गए । अंतत: पेरिस के एक सस्ते होटल में वे एक अकेले और हारे हुए आदमी के रूप से मृत्यु को प्राप्त हुए ।
    दलीप सिंह के अपने ही स्वर में और उनकें पाँच समकालीनों की आवाज में कहा गया यह उपन्यास न सिर्फ सिख-इतिहास, वरन् पुरे हिंदुस्तान के इतिहास के एक वेहद कारुणिक व्यक्तित्व की रोचक और भीतर तक हिला देने वाली तस्वीर पेश करता से । साथ ही यह ब्रिटिशा साम्राज्यवाद छोर उसको बढावा देने वाले भारतीय राजा-महाराजाओं के लालच और अदूरदर्शिता की भी बेबाक पाताल है ।
  • Jhoothe Aakash
    Rajesh Jain
    50 45

    Item Code: #KGP-9063

    Availability: In stock


  • Sachitra Yogasan
    Om Prakash Sharma
    495 446

    Item Code: #KGP-615

    Availability: In stock

    भारत सदा से ऋषि-मुनियों, योगियों और दार्शनिकों का देश रहा है। यहां के निवासी सदा ही ज्ञान की खोज में लगे रहे हैं। आज नाना प्रकार की नई-नई सुविधएं मौजूद हैं, फिर भी व्यक्ति अधूरा, अतृप्त और अशांत है। उसका मन आज भी दुविधा में पड़ा है। नई पीढ़ी दिशाहीन हो गई लगती है। आत्महत्या करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अनेक भारतीय असफल रहकर पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति को अपनाते जा रहे हैं। वे भूल चुके हैं कि हम उन ऋषियों की संतान हैं, जिनके ज्ञान का डंका कभी पूरे विश्व में बजता था।
    इस ऋषि-परंपरा में महर्षि पतंजलि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनके द्वारा प्रतिपादित योग-दर्शन के परिणामों को देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी स्तब्ध रह गए हैं।
    महर्षि पतंजलि ने विश्व-भर के प्राणियों के जीवनकाल का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात् चैरासी लाख योगासनों का चुनाव किया और विकारों से बचकर सुखी एवं त्यागमयी जीवन जीने की विधि खोज निकाली।
    योगासन के धीरे-धीरे अभ्यास से आप गंभीर बीमारियों से भी बच सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं।
    प्रस्तुत पुस्तक महर्षि पतंजलि द्वारा निरूपित सिद्धांतों को नए रूप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।
  • Vidrohini Shabri
    Hiralal Bachhotia
    100 90

    Item Code: #KGP-1854

    Availability: In stock

    विद्रोहिणी शबरी 
    जन्मजात विद्रोहिणी शबरी का विद्रोह जड़-परंपराओं और रूढियों के खिलाफ था । शबरी ने एक तरह से अतीत को या उस अतीत को जो हिंसा पर टिका था, को ललकारा था । वह आतंक के रावण के खिलाफ संकल्प के साथ आगे बढ़ रही थी । शबरी ने नारी के रक्षिता माने जाने पर भी उँगली उठाई तो तरुणी शबरी पर भी जिसने देखा उसी ने उँगली उठाई थी । लेकिन शबरी अपने रास्ते चलती रही और जा पहुंची पंपा सरोवर क्षेत्र में । कठोर यथार्थ की रगड़ से उत्पन्न आदर्श ही शबरी का प्राप्तव्य बना और यह आदर्श शस्य श्यामल राम के रूप में परिकल्पित हुआ। मुग्धमना शबरी उसी राम के लिए प्रतीक्षारत रही । राम उद्धारक नहीं, शबरी के लिए मीत बनकर प्रकट हुए थे। केवट, निषाद के साथ राम के व्यवहार ने शबरी को ऐसा ही आश्वासन दिया था । राम का सबके प्रति समता भाव ही शबरी के लिए वरेण्य था । शबरी की वृष्टि में राम ने मानव-गरिमा की प्रतिष्ठा कर एक नई पहल की धी। शबरी अपनी इसी आस्था पर आरूढ राम के लिए प्रतीक्षारत रही । प्रतीक्षा के क्षणों को काटने के लिए शबरी बेर के पेडों का रोपण और फलो का संचयन करती रही । शबरी अरण्य संस्कृति की प्रतिरूप प्रकृति के संरक्षण में संलग्न रही। शबरी ने शूर्पणखा प्रकरण में अमर्यादित नारी को वरेण्य नहीं माना । इसीलिए राम ने हाथ उठाकर कहा था-शबरी प्रतिरूप है नवधा भक्ति का । इसीलिए शबरी सामान्य से असामान्य या असाधारण बन गई और राम के हृदय में मूर्ति के समान विराजित रही । यही शबरी की आस्था की विजय थी । शबरी ने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर राम को जनकनंदिनी को खोजने के संकेत दिए थे । इसमें सुग्रीव-हनुमान मिलन के पूर्व संकेत भी शामिल थे । भावी आपदाओं की ज्वालाओं को शांत करने हेतु सांत्वना नीर उड़ेलते रहना ही शबरी का प्राप्तव्य बना रहा ।
  • Aalaap-Vilaap
    Rajendra Laharia
    150 135

    Item Code: #KGP-298

    Availability: In stock

    आलाप-विलाप
    कथाकार राजेन्द्र लहरिया के उपन्यास अपने समय से मुठभेड़ करते कथ्य के साथ ही मर्म को छुने वाले होते हैं और उनका शिल्प भी नव्यता से भरा और पाठकीय जिज्ञासा को उकसाने वाला होता है । वे अपने उपन्यासों को 'कहानी' की तरह साधते हैं, जहाँ कुछ भी फालतू होने  (लिखने) की गुंजाइश नहीं होती । 'आलाप-विलाप' भी इसका अपवाद नहीं है । बकौल लेखक, 'सकेतों की 'भाषा मनुष्य हमेशा से समझता आया है । कोई कहानी या उपन्यास लिखते वक्त मेरा ध्यान इस बात पर हमेशा बना रहता है कि मेरा काम यदि एक शब्द लिखने से चलता है तो अनावश्यक दस शब्द क्यों लिखूं! शब्दों की फिजूलख़र्ची तो कई तरह के नुकसान करती है... 
    'आलाप-विलाप' के बारे में एक सुधी पाठक की राय द्रष्टव्य है : 'कथाकार राजेन्द्र लहरिया का लपन्यास 'आलाप-विलाप' मार्मिकता से भरा व मूलत: राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक छदमों को उदूघाटित करता है। जीवन की भयावह स्थितियों इस उपन्यास को जीवंत कथ्य देती है । छोटे-छोटे उपकथानकों में परिवेश की  पीड़ाओं के झकझोरने वाले वर्णन इसके प्रभाव को सघन करते हैं। हमारे समय की एक प्रमुख समस्या नक्सलवाद के उभार और उसकी वजहों को भी इस उपन्यास में देखा-पहचाना और समझा जा सकता है । प्रशासनिक और सांस्कृतिक-साहित्यिक छदमों और पाखंडों की लीलाएँ गरीब, कमजोर और संवेदनशील व्यक्तियों तथा तबकों को क्या-क्या नचाती हैं, इसका-दिलचस्प और बेधक दिग्दर्शन इस उपन्यास में है। और खास बात यह है कि  अँधेरे समय और स्याह चरित्रों के बीच भी उम्मीद की  कौंध से भरे कुछ ऐसे उजले चरित्र यह उपन्यास हमें देता  है, जो लड़ाई को बेहद कठिन समझते हुए भी अविचल  रूप से संघर्ष करते है, और इसलिए उनकी हार भी हमें  निराशावाद की ओर नहीं ले जाती । वह इस छोटे से उपन्यास  की बड़ी खुबी है... 
    कहा जा सकता है कि 'आलाप-विलाप' आकार से लघु, मगर सरोकार में बडा उपन्यास है ।
  • Kavi Ne Kaha : Uday Prakash
    Uday Prakash
    240 216

    Item Code: #KGP-1954

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : उदय प्रकाश
    सादगी उदय प्रकाश की कविताओं की जान है जो हर उस आदमी से तुरंत रिश्ता कायम कर लेती है जो सामाजिक अन्याय और शोषण की मार उन लोगों के बीच बैठा सह रहा है, जिनके पास आंदोलन और नारे नहीं हैं, सिर्फ खाली अकेले न होने का अहसास भर है। ये कविताएँ पाठक की संवेदना में बहुत कुछ ऐसा तोड़फोड़ कर जाती हैं, जिनके सहारे वह फिर कुछ नया रचने की ज़रूरत महसूस करने लगता है । किसी भी यातना को कवि बिना उस यातना से मानसिक रुप से गुज़रे हुए प्रेषित नहीं कर सकता । उदय प्रकाश की कविताएँ काफी कुछ इसकी दुर्लभ मिसाल है । -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 
    कविताओं में उदय प्रकाश की एक और कलात्मक विशेषता गौरतलब है । वे एक ओर वर्तमान के अलग-अलग संदर्भों और  स्थितियों को लेते हैं, पृथक और विच्छिन्न दुनियाओं को साथ-साथ रख देते हैं, ये पिघलकर एक इकाई बन जाते हैं । इनके 'फ्यूजन' से एक समग्र समय बनता है हम इन पृथक और विभिन्न दिखते संदर्भों और स्थितियों के भीतर की तारतम्यता तक पहुंचते हैं। यहीं कविता का अभीष्ट है। कुछ कविताओं में उदय प्रकाश ने बीज से वृक्ष बनने तक की पूरी प्रक्रिया को उलट दिया है । जैसे कोई विपरीत दिशा में चलती फ़िल्म हो । यह एक रचनाकार का नियति के क्रम में हस्तक्षेप है । -विजय कुमार 
    क्यों ऐसा नहीं हुआ कि उदय प्रकाश की कविताओं में छिपे उनके कथाकार और उनकी कहानियों में छिपी कविता पर सतर्क पाठको का ध्यान जाता और मूल्यांकन की कोई और नई समावेशी पद्धति जन्म लेती ! जिस जादुई यथार्थवाद के लिए …. उदय प्रकाश की कहानियों अनेकार्थी जान पड़ती हैं और एक से अधिक पाठ के लिए पाठकों को उत्युक बनाती हैं उससे मिलती-जुलती अपरिचयीकरण (डिफेमिलियराइजेशन) सरीखी काव्ययुक्ति का इस्तेमाल करके ही उनकी कविताएँ अधिक सार्थक बन सकी हैं । -परमानंद श्रीवास्तव
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai
    Ubaid Siddqi
    300 270

    Item Code: #KGP-547

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
  • Postmortem (Paperback)
    Ajeet Kaur
    100

    Item Code: #KGP-1310

    Availability: In stock


  • Sant Kabir
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-135

    Availability: In stock

    कबीरदास की वाणी वह लता है, जो योग के क्षेत्र में भक्ति का बीज पडने से अंकुरित हुई थी । उन दिनों उत्तर के हठयोगियों और दक्षिण के भक्तों में मौलिक अंतर था । एक टूट जाता था, पर झुकता न था; दूसरा झुक जाता, पर टूटता न था । एक के लिए समाज की ऊँच- नीच की भावना मजाक और आक्रमण का विषय थी, दूसरे के लिए मर्यादा और स्फूर्ति की । और फिर भी विरोधाभास यह कि एक जहाँ सामाजिक विषमताओं को अध्याय समझकर भी व्यक्ति को सबके ऊपर रखता था, वहाँ दूसरा सामाजिक उच्चता का अधिकारी होकर भी अपने को तृण से भी गया-गुजरा समझता था । ...एक के लिए पिंड ही ब्रह्माण्ड था तो  दूसरे के लिए समस्त ब्रह्माण्ड भी पिंड । एक का भरोसा अपने पर था, दूसरे का राम पर; एक प्रेम को दुर्बल समझता था, दूसरा ज्ञान को कठोर—एक योगी था, दूसरा भक्त ।
    -आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
  • Mere Saakshatkaar : Chandrakant Deotale
    Chanderkant Deotale
    350 315

    Item Code: #KGP-713

    Availability: In stock


  • Mahaan Ganitagya Aryabhat
    Vishv Nath Gupta
    90 81

    Item Code: #KGP-1879

    Availability: In stock


  • Hindu Sanskars
    M.L. Ahuja
    395 356

    Item Code: #KGP-768

    Availability: In stock

    The SANSKARAS are rites of passage finding varied acceptance among religious adherents of Hinduism, Jainism and some schools of thought in Buddhism. Hinduism prescribes norms to groom youngsters with values. The values as reflected in sanskaras facilitate the process of adaptation of the behaviour patterns of our children and the process of their socialization. These sanskaras should inculcate in our children the norms to purify, refine and adorn their inner conscience.
    The book, Hindu Sanskaras Sacraments and Rituals in Life’s Journey, is an exposition of the principles enunciated in the Hindu scriptures. This profusely illustrated book provides guidelines for young boys and girls on the threshold of conjugal life. It provides them lucid explanation of sanskaras and human life, Hindu beliefs and rituals, essence of Hindu sanskaras, the Vedic and astrological concepts of garbadharan or conception of a child, naming of the baby, baby's first tonsure, importance of sacred thread ceremony, the process of conducting puja or veneration, the significance of idol worship, The underlying purpose of using bindi or tilak, the ritual of observing Karva Chaauth by married women  to pray for the longevity of their husbands, funeral rites and the system of ancestral worship yet form an essential ingredient of the book. The book also provides explanation of rituals like parikarma, ringing of bell, hovering of hands on lighted lamp after concluding prayer, the importance of 108 and breaking of coconut. 
    It is a useful book for all those wishing to know Indian culture, traditions and mythology. It needs to be read by parents for inculcating values among their children, and young boys and girls to carve an ideal approach in life.
  • Parineeta (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    80

    Item Code: #KGP-1353

    Availability: In stock

    इस पुस्तक में शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दो उपन्यास हैं, एक है परिणीता और दूसरा है मझली दीदी।
  • Arya, Rigved Aur Bhartiya Sabhyata
    Dr. Kripa Shanker Singh
    1100 990

    Item Code: #KGP-673

    Availability: In stock

    ऋग्वेद भारतीय संस्कृति, धर्म और सभ्यता, प्रकारान्तर से कहें तो हिन्दू संस्कृति, धर्म और दर्शन की पीठिका है। भारत आर्यों की मूलभूमि है, इस सत्य को झुठलाने की बहुत कोशिशें होती रही हैं। ‘आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता’ में ऋग्वेद के हर अंग की विस्तृत मीमांसा की गई है। ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है। प्राचीनतम होते हुए भी इसकी सर्वांगीण पूर्णता और हर दृष्टि से सर्वोत्तमता को देखते हुए ऋग्वेद को अपौरुषेय भी माना जाता रहा है। अपौरुषेय मानने के पीछे धार्मिक कारण भी रहा हो सकता है। जो भी हो पर इसे मानवी मेधा की ही रचना कहना ठीक होगा।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऋग्वेदिक संस्कृति और सभ्यता के नैरन्तर्य को दिखाया गया है। भारतीय समाज के ताने-बाने का जो ढाँचा आज है, वह ऋग्वेद से लेकर सिन्धु-सरस्वती सभ्यता से होता हुआ वर्तमान काल तक आया है। चाहे वह पारिवारिक और सामाजिक जीवन को दर्शाने वाला रूप हो या धार्मिक आस्था और विश्वास की मान्यता हो, या दार्शनिक चिन्तन-मनन की परम्परा हो, उन सभी के मूल में ऋग्वेद ही है।
    ऋग्वेद आर्यों के महान् और विलक्षण सांस्कृतिक ऋक्थ का प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। वह न केवल हिन्दू दर्शन, धर्म और पारिवारिक, सामाजिक तथा शासकीय व्यवस्था को दर्शाने वाला आदि ग्रन्थ है बल्कि विश्व के प्राचीनतम और उत्कृष्टतम काव्य का गान भी है।
  • Dwidhaa
    Bhairppa
    575 460

    Item Code: #KGP-646

    Availability: In stock

    कन्नड़ भाषा के यशस्वी उपन्यासकार भैरप्पा की रचनाएं पाठकों के मन में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं। उनके उपन्यास कथानक की दृष्टि से उल्लेखनीय होते हैं। वे सामाजिक संदर्भों से प्रेरित हों अथवा प्राचीन प्रसंगों को पुनः परिभाषित करते हों—अपने पाठकों को भाव व विचार की एक नई दुनिया में ले जाते हैं। भैरप्पा का नया उपन्यास ‘द्विधा’ को पढ़कर कुछ इसी प्रकार की अनुभूति होती है।
    प्रस्तुत उपन्यास स्त्री-पुरुष के मध्य मौजूद प्रश्नों व प्रसंगों से उद्वेलित है। देह, प्रेम, सहवास, गर्भ, गर्भपात, अधिकार, पत्नी, प्रेमिका, रखैल आदि जाने कितने ऐसे प्रश्न जिनको अनेक बार भिन्न-भिन्न तरीकों से कथा-साहित्य में प्रस्तुत किया जा चुका है। ...किंतु जिस सामाजिक धरातल पर भैरप्पा ने इन्हें ‘द्विधा’ में विस्तार दिया है वह अनूठा है। शारीरिक संपर्क और स्त्री-पुरुष प्रेम के विषय में उपन्यास का एक पात्र कहता है, 
    ‘...जिन्होंने शारीरिक संबंध की मृदुता का अनुभव किया हो, वे शारीरिक संबंध को तजकर, केवल मानसिक रूप से स्नेह-संबंध बनाए रखने का प्रयत्न करेंगे, तब भी स्नेह शुष्क हो जाता है।’ उपन्यास में ऐसे उन्मुक्त विवरण एक नई बहस छेड़ते हैं।
    यह उपन्यास ‘स्त्री मुक्ति’ की जटिल व सूक्ष्म व्याख्याओं में भी ले जाता है। क्या ‘स्त्री मुक्ति’ के आधार पर प्राप्त अधिकारों का दुरुपयोग नहीं होता, क्या इससे परिवार नाम की संस्था को कोई खतरा नहीं प्रतीत होता; ऐसे बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं जिनको भैरप्पा ने उपन्यास में शामिल किया है। मानवीय दुर्बलताओं और उनसे उत्पन्न संकटों/विसंगतियों/दुष्परिणामों को भलीभांति चित्रित किया है। कथानक विस्तृत है। लेखक ने विभिन्न चरित्रों के द्वारा समकालीन समाज की प्रवृत्तियों को रेखांकित किया है। समग्रतः एक ऐसा उपन्यास जो हमारे समय की सच्चाइयों व समस्याओं का आईना है।
  • Jinavar
    Chitra Mudgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1998

    Availability: In stock


  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Maitreyi Pushpa : Rachna Sanchayan
    Sushil Sidharth
    950 855

    Item Code: #KGP-1580

    Availability: In stock


  • The Kindling Touch (Paperback)
    Debabrata Dasgupta
    195

    Item Code: #KGP-330

    Availability: In stock

    t is not all to describe Madame Curie simply as a devoted scientist; she is a radiant milestone in the realm of modern science. Her whole life carries a divine message. The life that nurtured her, gave her feed for the mind and body, was not at all strewn with flowers. Rather, feelings of want, insecurity and doubts tried to strangle her like the tentacles of an octopus. In the dark, deep jungle of uncertainties that was her early life, where there were chances of slippage at every step, she had ventured forward with resolution and courage and finally reached her glorious destination.
  • Vaigyanik Pura Kathayen
    Dr. Rajiv Ranjan Upadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-236

    Availability: In stock

    वैज्ञानिक पुरा कथाएँ
    भारत में विज्ञान के विकास के इस युग में पुराकालीन विज्ञान कथाओं पर विज्ञानसम्मत दृष्टि से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि अनेक कथाओं में भविष्यद्रष्टा ऋषियों की दृष्टि में रचा-बसा विज्ञान प्रत्यक्ष दिखाई देता है। इस संग्रह की विमान संबंधित त्रिपुर: अंतरिक्ष में तीन नगर, मनचालित विमान: सौभ, हिरण्यनगर नामक कथाएँ इनके पुराकालीन अस्तित्व की साक्षी हैं।
    भारत का आयुर्विज्ञान कितना विकसित था, सर्जरी कितनी विकसित थी, इसके प्रभाव चरक संहिता और सुश्रुत संहिता तथा आयुर्वेद संबंधित अन्य ग्रंथों में उपलब्ध हैं। संजीवनी, महर्षि भृगु का चमत्कार, महर्षि च्यवन, विशल्या, अश्विद्वय, गणेश, महर्षि दध्यङ तथा उपमन्यु नामक कथाएँ हमारे पुराकालीन आयुर्वेदीय ज्ञान की परिचायक हैं।
    बुढ़ापा एवं मृत्यु का भय मनुष्य को सदैव से सताता रहा है। दीर्घ और अमर जीवन तथा सदैव यौवनयुक्त रहने की मानव की अनादिकाल से कामना रही है। इसी प्रभाव का प्रतिबिंब समुद्र-मंथन और राजा ययाति नामक कथाओं में विद्यमान है। 
    लिंग-परिवर्तन की घटनाएँ पुराकाल में भी होती रही होंगी, इस तथ्य की ओर इंगित करती कथाएँ हैं शिखंडी तथा इला।
    द्रोणाचार्य, कौरवों तथा बेन से उत्पन्न पुत्र की कथा प्राचीन आख्यानों में सुरक्षित है, जो उस युग में भी मौजूद कृत्रिम गर्भाधान विधि की ओर संकेत करती है।
    पुरुष-शरीर में निहित स्तन-वृद्धि नियंत्राक और यौन-कार्य संपादन में प्रभावी जैव रसायनों के स्रोव में परिवर्तन हो जाने के फलस्वरूप, आधुनिक विज्ञान में उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पुरुष में स्तन-वृद्धि ही नहीं होती वरन् उसके स्तनों से दुग्ध- स्रोव भी हो सकता है–राजा मांधाता की कथा इसी तथ्य को प्रदर्शित करती है।
    वैदिककाल के भारतीय गणितज्ञों में श्रेष्ठ महर्षि गृत्समद ने शून्य तथा संख्याओं का आविष्कार किया। गणित में निहित वैज्ञानिक तर्कशील पद्धति के उपयोग को प्रदर्शित करती कथाएँ हैं–धु्रव, राजा ककुघ्न, राजा त्रिशंकु और असुर-त्रित की ऋग्वेदिक कथा।                      
    यह निर्विवाद तथ्य है कि क्लोनिंग, विशेषकर मानवीय संदर्भ में, पुराकाल के चिंतकों, वैज्ञानिकों को अज्ञात थी, परंतु उनके उर्वर मस्तिष्क में संभवतः इस विधा के भविष्य में विकसित हो जाने के बिंब थे, जिसके कारण उन्होंने नृसिंह के रूप की कल्पना की थी। यह कथा एक प्रभावी, भविष्योन्मुखी विज्ञान कथा है।
    भारतीय ऋषियों के रसायन ज्ञान का दर्शन कराती कथा है महर्षि आरुणि उद्दालक की। बहुवर्णित मृत्यु के पूर्व अथवा मृत्यु के अवसर पर मानव-शरीर के रहस्य को तंत्रिका वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है। आधुनिक विज्ञान की संदेशवाहक बहुश्रुत कथा है सत्यवान की।
    एक वस्तु को अनेक स्वरूप प्रदान करना शिल्प है। वज्र के निर्माण में निहित शिल्प का प्रयोग वृत्रसुर-विनाश, सुदर्शन चक्र तथा महर्षि दधीचि की कथाओं में हुआ है।
    भारतीय ऋषि भूगर्भीय परिवर्तन, उनके परिणाम एवं प्रभाव से अछूते नहीं थे। उन्होंने पृथ्वी पर उभरते और पुनः धरा में लोप होते पर्वतों को देखा था। विंध्यगिरि, श्वेत वराह, खंड-प्रलय एवं और्व-अग्नि नामक कथाएँ भूगर्भ के विविध पक्षों को चित्रित करती हैं।
    नारद के ब्रह्मांड-भ्रमण में पदार्थ-पारण तथा परमाणु- विस्फोट का आश्चर्यजनक वर्णन, जो हमारे पुराणों, रामायण एवं महाभारत में उपलब्ध है, वह आँखों द्वारा देखा हुआ प्रतीत होता है। क्या यह ऋषियों की कल्पना-शक्ति का प्रतिबिंब है अथवा इस प्रकार के लघु परमाणु-विस्फोट करने की (ब्रह्मास्त्र के माध्यम से) विधि ज्ञात थी ? परीक्षित के जन्म की कथा इसी प्रकार के प्रभाव से संबद्ध है।
    वामन अवतार की कथा सूर्य के प्रकाशपुंज विवर्तन के प्रभाव से जुड़ी है। वास्तव में आलंकारिक वैदिक भाषा में उर्वशी-उषा का प्रतीक है, इस पक्ष में अहल्या, सरमा की कथाओं से कम लोग परिचित हैं। इनसे संबंधित भ्रांतियों के निराकरण तथा इनकी कथाओं में निहित तथ्यों के स्पष्टीकरण को ध्यान में रखकर ये कथाएँ संगृहीत की गई हैं।
    इस संग्रह की कथाओं का अनुशीलन करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि ऋग्वेद में वर्णित असुर-त्रित की गणित संबंधी कथा प्राचीनतम विज्ञान कथा है जो निर्विवाद रूप से प्रमाणित करती है कि विज्ञान कथाओं का उद्गम-स्थल भारत है, न कि योरोप।
  • Hanste Nirjhar Dahakti Bhatthi
    Vishnu Prabhakar
    190 171

    Item Code: #KGP-697

    Availability: In stock

    हँसते निर्झर, दहकती भट्ठी
    देश-विदेश में, नगरों में और प्रकृति के प्रांगण में जब-जब भी और जहाँ-जहाँ भी मुझे की यात्रा करने का अवसर मिला है, उस सबकी चर्चा मैंने प्रस्तुत पुस्तक में की है । इसमें जानकारी देने का प्रयत्न इतना नहीं है, जितना अनुभूति  का वह चित्र प्रस्तुत करने का है, जो मेरे मन पर अंकित हो गया है । इन अर्थों में ये सब चित्र मेरे अपने है । कहीं मैं कवि हो उठा लगता हूँ, कहीं दार्शनिक, कहीं आलोचक, कहीं मात्र एक दर्शक । मैं जानता हूँ कि हुआ मैं कुछ नहीं हूँ ।  मुझे मात्र दर्शक रहना चाहिए था, लेकिन मन की दुर्बलता कभी-कभी इतनी भारी हो उठती है कि उससे मुक्त होना असंभव हो जाता है । शायद यही किसी लेखक की असफलता है । मेरी भी है । लेकिन एक बात निश्चय ही कही जा सकती है कि इस पुस्तक में विविधता की कमी पाठकों को नहीं मिलेगी । कहीं विहँसते निर्झर, मुस्कराते उद्यान उनका स्वागत करेंगे तो कहीं विगत के खंडहर उनकी ज्ञानपिपासा को शांत करेंगे, कहीं उन्हें भीड के अंतर में झाँकने की दृष्टि मिलेगी तो कहीं नई सभ्यता का संगीत भी वे सुनेंगे। वे पाएंगे कि कहीं वे मेरे साथ कंटकाकीर्ण दुर्गम पथों पर चलते-चलते सुरम्य उद्यानों से पहुँच गए हैं, कहीं विस्तृत जलराशि पर नावों में तैर रहे हैं, कहीं पृथ्वी के नीचे तीव्रगामी रेलों से दौड रहे हैं तो कहीं वायु के पंखों पर सवार होकर विद्युत् और मेघों द्धारा निर्मित तूफान को झेल रहे है । मुझे विश्वास है कि इससे जो अनुभूति उन्हें प्राप्त होगी, वह निरी निराशाजनक ही न होगी ।

    —विष्णु प्रभाकर
  • 20-Best Stories From Africa
    Prashant Kaushik
    345 311

    Item Code: #KGP-9315

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. African short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Two Skin Woman, Slave Girl, South Winds, Apprentice, Allah’s Will, Green Leaves, this book is a compilation of 20 famous African short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from Africa.
  • Vipradas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-1404

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheep Singh (Paperback)
    Mahip Singh
    80

    Item Code: #KGP-7016

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : महीप सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार महीप सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'उलझन', 'पानी और पुल', 'कील', ‘सीधी रेखाओं का वृत्त', 'शोर', 'सन्नाटा', 'सहमे हुए', 'धूप के अंगुलियों के निशान', 'दिल्ली कहाँ है?' तथा 'शोक'। 
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार महीप सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Is Bar Sapne Mein Tatha Anya Kavitayen
    Parmanand Shrivastva
    175 158

    Item Code: #KGP-1898

    Availability: In stock

    इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ परमानंद श्रीवास्तव की काव्ययात्रा से एक ऐसा चयन है, जिसे अपने दर्पण-समय का साक्ष्य कहा जा सके। ‘उजली हँसी के छोर पर’, ‘अगली शताब्दी के बारे में’, ‘चौथा शब्द’ और ‘एक अ-नायक का वृत्तांत’ से मुख्यतः चुनी कविताएँ अनामिका के संपादन में एक समय-संवाद बनाती हैं। प्रेम भी प्रतिरोध के विमर्श में शामिल है। ‘चित्र में स्त्रियाँ’, ‘छिपने की जगह’ जैसी कविताएँ एक नया मुहावरा हासिल करती हैं। परमानंद श्रीवास्तव के लिए कविता एक अकेली दुनिया का हालचाल, जिसे बताना मुश्किल है, तो छिपाना लगभग असंभव। ‘आसिया बानो’, ‘भानु मजूमदार’ जैसे नाम काल्पनिक भी हों तो आत्मा की भीतरी सृष्टि हैं। 
    ‘इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ’ स्त्री-उत्पीड़न और साम्प्रदायिक बर्बरता का आख्यान हैं, जिसे कविता अनोखे संवाद-शिल्प में अंकित करती हैं। कविता जैसे एक पटकथा हो, एक लैंडस्केप, एक विस्थापित की डायरी, एक समय-गाथा। ‘एलिना के लिए’ जैसी कविताएँ गहरे भेद खोलने वाली कविताएँ हैं। यहाँ भीतर का त्रासद तनाव प्रकट है तो कोमल मूक अन्तर्ध्वनि भी।
    विस्थापन इन कविताओं का केन्द्रीय सच है। निर्वासन में कवि का आत्मनिर्वासन भी शामिल है।
  • Naamdev Rachanavali (Paperback)
    Govind Rajnish
    90

    Item Code: #KGP-1493

    Availability: In stock

    नामदेव रचनावली
    नामदेव ऐसे समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार थे, जिन्होंने मराठी और हिंदी में समान रूप से रचनाएँ कीं। वे 54 वर्षों तक उत्तर भारत में रहे और हिंदी-संत-काव्य के लिए प्रेरक सिद्ध हुए। उनकी पद-शैली, भाव-बोध, दार्शनिक विचारों, बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों का प्रभाव हिंदी के निर्मुणपंथी कवियों पर पडा ।
    स्वानुमूतिजन्य सत्यान्वेषण, सदगुरु के महत्त्व का प्रतिपादन, परम तत्त्व की सर्वव्यापकता, तन्मयमूलक भक्ति, नाम-स्मरण, कर्मकांड और पाखंडों का निषेध, आंतरिक शुचिता पर बल, बाह्याडंबरों की व्यर्थता और विषमता-विरोध ऐसे तत्त्व हैं, जो परवर्ती संत कवियों के काव्य में समान रूप से पाए जाते हैँ। इसीलिए समकालीन एवं परवर्ती संत कवियों ने उनका स्मरण श्रद्धा के साथ किया है।
  • Shatabdi Ki Kaaljayi Kahaniyan (Vol.-1)
    Kamleshwar
    625 563

    Item Code: #KGP-1576

    Availability: In stock


  • Comprehensive English-Hindi Dictionary_495
    Bholanath Tiwari
    495 446

    Item Code: #KGP-32

    Availability: In stock

    COMPREHENSIVE ENGLISH-HINDI DICTIONARY

     The present comprehensive English-Hindi Dictionary stands as the crowning work of the four decade long effort of the well known Hindi linguist-cuin-lexicographer Dr. Bhola Nath Tiwari and Dr. Amar Nath Kapoor, a distinguished scholar of English language studies.

     The main merit of the present dictionary is its practical and explanatory character. The editors have illustrated the proper and contextual usage of each and every word, phrase, idiom and expression through sentences and this goes to make the lexicon a work of tremendous relevance for the entire gamut of bilingual activity being undertaken in the country at almost all levels of our social system, educational institutions and government departments.

     Basically meant for the average Indian reader who goes to a dictionary to find correct spelling, correct usage and the most common present meaning of all the live words of English usage, the chief function of die present dictionary is to present not only comprehensiveness, accuracy and simplicity but also to record usage as pan of a perfect language.

     Simple form and the most pragmatic approach as far as the spelling and pronunciation of words is concerned has been adopted wit‘: 2 view to make the average educated Indian use English—both written and spoken word—in such a way that the listener or the reader is able to under- stand and appreciate what is being said in its correct parlance.

  • Man Mirza Tan Sahiban
    Amrita Pritam
    90 81

    Item Code: #KGP-1967

    Availability: In stock


  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220 198

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • Atharvaved : Yuvaon Ke Liye
    Dr. Pravesh Saxena
    425 383

    Item Code: #KGP-248

    Availability: In stock

    अथर्ववेद: युवाओं के लिए
    ‘वेद: युवाओं के लिए’ ग्रन्थमाला की अन्तिम कड़ी ‘अथर्ववेद: युवाओं के लिए’ प्रस्तुत है। इसमें अथर्ववेद के 120 मन्त्रों को दस शीर्षकों के अन्तर्गत समाहित किया गया है। अथर्ववेद की विषयवस्तु अत्यन्त रोचक तथा विविधता लिए हुए है। यही नहीं--ज्ञान, शिक्षा तथा गुरु-शिष्य के सम्बन्धों पर भी यहाँ प्रकाश डाला गया है। परिवार में अतिथि की महत्ता का उल्लेख हुआ है तो अन्य पारिवारिक सम्बन्धों की समरसता का महत्त्व बताया गया है। शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य दोनों ही जीवन में रहते हैं। अथर्ववेद का यथार्थवाद दोनों का वर्णन भी करता है तथा अशुभ से, पाप से मुक्ति की राह बताता है, प्रायश्चित्त का विधान भी करता है।
    यद्यपि व्यक्तिगत सौख्य के लिए यहाँ शत्रुनाशविषयक मन्त्र भी हैं तथा कुछ जादू-टोने जैसी क्रियाएँ भी वर्णित हैं परन्तु तब भी समष्टिगत कल्याण की उपेक्षा नहीं हुई है। आयुर्वेद का मूल ग्रन्थ होने के नाते यहाँ रोगों के नाम, लक्षण तथा उपचार विधियाँ वर्णित हैं। इन विधियों की विविधता व्यक्त करती है कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिए अथर्ववेद के ऋषि कितना सजग थे। वनस्पतियों, औषधियों के नाम, उनके गुण तथा रोग-विशेष में उनके उपचारात्मक प्रयोग भी बहुधा वर्णित हुए हैं।
    राजनीति पर यहाँ विशिष्ट सामग्री उपलब्ध है। राजा, उसकी सेना, अस्त्र-शस्त्र, युद्धनीति और शत्रुनाशपरक प्रार्थनाओं का अपना महत्त्व है। विभिन्न वृक्ष, लताओं, वनादि के वर्णन तथा जल, वायु को सम्बोधित सूक्तों से पर्यावरण- विषयक चिन्तन झलकता है। ‘भूमिसूक्त’ में प्रथम बार ‘धरती माँ’ का उल्लेख है--‘माता भूमिः पुत्रोअह पृथिव्याः’--‘भूमि माता है मैं पृथिवी का पुत्र हूँ।’ यह माता-पुत्र के गहन सम्बन्ध धरती का पर्यावरण संरक्षण करता है तथा राष्ट्र की रक्षा के लिए सन्नद्ध भी करता है। सबके भीतर दिव्यता है, सब प्रेमभाव से जुड़े हैं, जुड़े रहें। विश्व संरक्षण, विश्व कल्याण के तत्त्व सत्य, ऋत, दीक्षा, ज्ञान, तप, यज्ञादि हैं। आतंक हिंसा से जूझते विश्व में अभयता का साम्राज्य हो--यही कामना व्यक्त हुई है।
    यह पुस्तक उन सभी के लिए है जो ‘मन से युवा’ हैं तथा प्राचीन सभ्यता व संस्कृति को आधुनिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।
  • Baal Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-4
    Shuk Deo Prasad
    600 540

    Item Code: #KGP-608

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं के अधिष्ठाता वर्न जब अवसान की ओर अग्रसर थे, तभी विज्ञान कथाकाश में एक ब्रितानी नक्षत्र एच. जी. वेल्स उभरा, जिसने इस विधा को त्वरा तो दी ही, वर्न की परंपरा का नैरंतर्य भी भंग न होने दिया । वस्तुतः आधुनिक काल में वर्न  और वेल्स ने  विज्ञान कथाओं की आधारभूमि के लिए जो विचार-सरणियाँ निर्मित कीं, फलस्वरूप दुनिया की तमाम भाषाओं में विज्ञान कथाएं लिखी जाने लगीं। 
    निस्संदेह विज्ञान-गल्प-लेखन एक ऐसी सरस और रोचक विधा है, जो बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ-साथ ज्ञान के नए-नए गवाक्ष खोलने में सक्षम है बशर्त वैज्ञानिक तथ्यों का अतिरेक न हो । विज्ञानं गल्पकारों का दायित्व रंजन-मनोरंजन के साथ अंधकार कारा का निवारण भी है । 
  • Pracheen Prem Aur Neeti Ki Kahaniyan
    Rangey Raghav
    350 315

    Item Code: #KGP-01

    Availability: In stock

    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
  • The Luck Of The Jews (Novel)
    Michael Benanav
    595 536

    Item Code: #KGP-893

    Availability: In stock

    Over the course of ten years, writer and photographer Michael Benanav, investigated the extraordinary circumstances that enabled his father’s parents to survive the horrors of the Holocaust in Eastern Europe while most of their family and neighbors perished around them. From their story, he’s crafted an accomplished piece of literature, history, and thought, exploring both the events his grandparents lived through and his own struggles to find meaning in them. It’s a work of devastating emotional intensity that traces his own roots back to the terrible tragedy and incredible good fortune that together are THE LUCK OF THE JEWS.
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Amrita Pritam
    Amrita Pritam
    140 126

    Item Code: #KGP-12

    Availability: In stock


  • Kagaar Ki Aag Tatha Anya Radio Naatak
    Himanshu Joshi
    100 90

    Item Code: #KGP-1888

    Availability: In stock

    कगार की आग तथा अन्य रेडियो नाटक
    लेखक का बहुचर्चित उपन्यास है- 'कगार की आग' । उस पर आधारित नाटक का कई बार मंचन हुआ । रेडियो रूपक भी उस पर बना । इसके अतिरिक्त तेरह कडियों का रेडियो धारावाहिक भी प्रसारित हुआ ।
    आस्ट्रेलिया को केनबरा यूनिवर्सिटी में वर्षों तक वह पाठ्यक्रम में पढाया जाता रहा है । पंजाबी, डोगरी, मराठी, कोंकणी, उडिया आदि के अतिरिक्त उसका अंग्रेजी, नार्वेजियन, चीनी, बर्मी, नेपाली तथा बांग्ला में (बांग्लादेश में) भी रूपांतर हुआ ।
    ‘कगार की आग’ के अलावा 'हरा सूरज' रेडियो धारावाहिक भी चर्चा का विषय रहा । इनके साथ-साथ ‘कांछा', 'सु-राज', 'तपस्या', 'अगला यथार्थ', ‘इस बार’, 'स्वभाव' आदि अनेक रचनाएँ इस श्रृंख़ला में शामिल है । 'तरपन', 'सूरज की ओर’ तथा 'सु-राज' पर फ़िल्में बनी । 'सु-राज’ को अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में भारत की ओर से भेजा गया । 'तुम्हरे  लिए' पर तेरह किस्तों का दूरदर्शन-धारावाहिंक तैयार हुआ ।
  • Kashmkash
    Manoj Singh
    520 468

    Item Code: #KGP-846

    Availability: In stock


  • Yathartha Se Samvad
    B.L. Gaur
    400 360

    Item Code: #KGP-449

    Availability: In stock

    बेख़ौफ अंगारे
    साहित्य को अब रास नहीं आता निरा रस 
    उससे भी ज़रूरी है कलमकार में साहस 
    ये काम अदब का है–अदब करना सिखाए 
    उनको जो बनाए हैं हरिक काम को सरकस
    दम घुट रहा अवाम का, फनकार बचा लो
    सब मूल्य तिरोहित हुए, दो-चार बचा लो
    सच्चे की शुबां पर हैं जहां शुल्म के ताले
    हर ओर लगा झूठ का दरबार, बचा लो
    संपादकीय ऐसे हैं ऐ दोस्त, तुम्हारे
    जैसे अंधेरी रात में दो-चार सितारे
    गुणगान में सत्ता के जहां रत हैं सुखनवर
    तुम ढाल रहे शब्द में बेख़ौफ अंगारे
    मैं ख़ुश हूं बड़े यत्न से धन, तुमने कमाया
    उससे भी अधिक ख़ुश हूं कि फन तुमने कमाया
    मेरी ये दुआ है कि सलामत रहो बरसों
    सदियों रहे ज़िंदा जो सृजन तुमने कमाया।
    —बालस्वरूप राही

  • Satta Ke Nagaare
    Alok Mehta
    595 536

    Item Code: #KGP-229

    Availability: In stock

    लोकतंत्र में राजनीति हर ताले की चाबी मानी जाती है। राजनीति का जितना ज्ञान महानगरों में रहने वाले विश्लेषकों, कंप्यूटर पर आंकड़ों की जोड़-तोड़कर चुनावी भविष्यवाणी करने वालों, अर्थशास्त्रियों, राजनयिकों या प्रकाड पत्रकारों को होता है, उससे अच्छी व्यावहारिक समझ सुदूर गांवों में रहने वाले गरीब पिछड़े-अर्द्धशिक्षित भलेमानुष की होती है। गांव की पंचायतों में राजनीति चैपड़ की पकड़ अधिक अच्छी होती है। उन्हें मालूम है कि सत्ता के नगाड़े कब और क्यों बजते हैं। सत्ता के अनंत विस्तार को मरुस्थल भी कहा जा सकता है और अथाह सागर भी। राम राज्य रहा हो या महाभारत काल, ब्रिटिश राज रहे या अमेरिका से अभिभूत रहने वाली सत्ता-व्यवस्था राजनीति का लावा कभी ठंडा नहीं होगा।
    पत्रकारिता का दायित्व यही है कि अपने पाठकों को हर समय राजनीति के अमृत और विषय का सही आकलन करके बाता रहे। पिछले वर्षो के दौरान इस कड़वे सच को पेश करते रहने से जहां पाठकों का अधिकाधिक स्नेह और समर्थन मिला, वहीं कई राजनीतिज्ञ नाराज भी होते रहे। लेकिन हमारा कर्तव्य समाज और सत्ता की पहरेदारी करना है। इसलिए किसी की खुशी या किसी की नाराजगी की चिंता नहीं कर सकते। सत्ता के नगाड़े इस तरह बजने चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक समाज जागता रहे और अच्छे पके हुए फल उसे मिलते रहें। इस संकलन में पिछले वर्षो के दोरान सत्ता के इर्द-गिर्द चलते रहे घटनाचक्रों पर लिखी गई टिप्पणियां शामिल हैं। एक तरह से यह इतिहास के कुछ पन्नों को संजोकर रखने का प्रयास मात्र है। आज ऐसी टिप्पणियों पर चाहे जैसी खट्ठी-मीठी प्रतिक्रियाएं हों, राजनीति के दूरगामी परिणाम समझाने वालों के लिए ये सदैव उपयोगी साबित हो सकती है। 
  • Puraskrit Bachchon Ki Gaurav Gathayen
    Sanjiv Gupta
    150 135

    Item Code: #KGP-319

    Availability: In stock

    जिस तरह हर इंसान के भीतर एक बच्चा छिपा होता है, उसी तरह हर बच्चे के अंदर भी एक जिम्मेदार नागरिक का भाव रहता है। परिस्थिति आने पर बच्चे की उम्र से परे यह भाव परिलक्षित भी हो उठता है। राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित बच्चों के भीतर भी यही जिम्मेदारी नजर आती है। बालपन में भी दूसरों के लिए अपनी जान तक की बाजी लगा देना इन बच्चों के भीतर छिपे जिम्मेदार नागरिक की पहचान ही तो है। 
    आज जबकि ‘बड़े’ अपनी जिम्मेदारियां भूलते जा रहे हैं या समय आने पर उनसे बच निकलने का प्रयास करते हैं, बच्चों में जिम्मेदारी का यह भाव न केवल सराहनीय बल्कि अनुकरणीय भी है। हमारा यह भी फर्ज बनता हे कि बच्चों के प्रयास को समाज के सामने लाएं। शायद यही वजह है कि अब तो मुझे ही साल जनवरी माह के तीसरे सप्ताह में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वाले बच्चों से मुलाकात का इंतजार रहने लगा है। 
    इस पुस्तक को तैयार करने में सक्रिय सहयोग देने के लिए मैं अपने साले साहब विनोद गुप्ता का विशेष आभार प्रकट करना चाहूंगा। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अपने स्थानांतरण के चलते उनके सहयोग कि बिना मेरे लिए यह पुस्तक तैयार कर पाना निस्संदेह मुश्किल था।
    —संजीव गुप्ता 
  • Aacharya Hazari Prasad Dwivedi : Kuchh Sansmaran
    Kamal Kishore Goyenka
    500 450

    Item Code: #KGP-1571

    Availability: In stock

    हजारीप्रसाद द्विवेदी वस्तुत: हिंदी भाषा और साहित्य के आचार्य थे। पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिंदी और बांग्ला आदि भाषाओँ के तलस्पर्शी ज्ञान ने उनके चिंतन व सृजन को विलक्षण आयाम प्रदान किए। शातिनिकेतन से शिवालिक के बीच विस्तृत आचार्य द्विवेदी को कीर्तिकथा हिंदी का गौरव है। आचार्य द्विवेदी के जीवन और कृतित्व पर प्रभूत मात्रा में लिखा गया है। उन्हें आकाज्ञाधर्मी गुरु और व्योमकेश दरवेश कहकर सखोंधित किया गया। 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी : कुछ संस्मरण' इस संदर्भ में एक स्थायी महत्व की पुस्तक है। आचार्य द्विवेदी पर विख्यात व्यक्तित्वों द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण संस्माणों की इस पुस्तक का संपादन सुप्रसिद्ध साहित्यकार कमलकिशोर गोयनका ने किया है। पुस्तक को भूमिका में वे लिखते हैं, 'आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की किसी लेखक द्वारा जीवनी लिखने या उनके जीवन को जानने को जिज्ञासा जब भी पाठकों के मन में उत्पन्न होगी तब-तब ये संस्मरण उसे आत्मीय-जीवत एवं सार्थक प्रतीत होने के साथ उनको स्मृति को अक्षुष्ण बनाने में सहायक सिद्ध होगे।'
    इस पुस्तक को विशेषता यह है कि द्विवेदी जी का संस्परणात्मक मूल्याकन प्राय: सभी पक्षों से किया गया है। इस अर्थ में इसे आलोचना की आंख से भी पढा जा सकता है। समग्रत: एक विराट व्यक्तित्व और उसके कालजयी कृतित्व का समवेत संस्मरणात्मक अनुशीलन। पठनीय व संग्रहणीय पुस्तक ।
  • Boo Toon Raaji
    Padma Sachdev
    150 135

    Item Code: #KGP-60

    Availability: In stock

    बू तूँ राजी
    मैं मूलत: कवयित्री हूँ । जो बात कविता से बहुत बडी हो जाती है, वह कहानी बनकर मेरे हाथों में छोटे बच्चे की तरह कुलबुलाने लगती है । कहानी की यह मेरी दूसरी किताब है । कभी-कभी लिखती हूँ कहानियाँ, वह भी उस वक्त, जब कहानियों के पात्र मेरे आँचल का कोना पकडे-पकडे मेरी गरदन तक आकर मुझे दाब लेते है । और ये पात्र जब मेरे जीवन का हिस्सा हो जाते हैं तब में लफ्जों के दोने में इन्हें फूलों की तरह सजाकर अपने पाठकों की झोली में डाल देती हूँ फिर वे इसका हार बनाएँ, फूलों को मंदिर के आगे सजाएँ या अपनी आँखों की पतली काजल की लकीर से पिरोकर अपने गले में डालें-ये उनकी खुशी है । मेरी कहानियों के पात्र मेरे घर के सदस्यों की तरह हो जाते हैं । मैं चाहती हूँ, आप भी इन्हें अपनी बैठक में बैठने का स्वान दें ।
  • Vanya Jeevon Ki Romanchak Kahaniyan
    Shivani Chaturvedi
    80

    Item Code: #KGP-1057

    Availability: In stock


  • Su-Raaj
    Himanshu Joshi
    80 72

    Item Code: #KGP-2105

    Availability: In stock

    सु-राज
    तीन अलग-अलग उपन्यासिकाएँ होने के बावजूद, कहीं ये एक ही तसवीर में समाई तीन अलग-अलग तसवीरें हैं। रूप, रंग, भावभूमि और निरूपण, सब अलग- अलग हैं। अलग-अलग हैं इनकी पृष्ठभूमियाँ । हिमालय का कुमाऊँनी क्षेत्र है, तराई की अभिशप्त धरा और पश्चिमी नेपाल का अत्यंत पिछड़ा अंचल । अनेक अंतर्विरोध हैं, परन्तु इन भिन्नताओं के बावजूद भी कहीं घोर अभिन्नता । यों अभाव, अन्याय से उपजा मानव-मात्र का संत्रास सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र समान है । यंत्रणाएँ समान हैं ! रूप और आकार में अंतर हो सकता है, परन्तु मनुष्य, सर्वत्र मनुष्य ही है, उसकी वेदना भी सर्वत्र उसी की वेदना है । उसे देश, काल, रूप, रंग, धर्म, भाषा से विभाजित नहीं किया जा सकता ।
    संघर्षरत 'सु-राज' के गांगि 'का हों, या अन्याय की आग में धधकता 'अंधेरा और' का परसिया या 'काँछा' उपन्यासिका का नायक सुदूर नेपाल का अनाथ श्रमिक शिशु काँछा, अपने अस्तित्व के लिए जूझते ये पात्र, मात्र पात्र ही नहीं, तिल-तिल मरकर कहीं अपने समय के 'काल-पात्र' भी हैं ।
    साहित्य में हिमांशु जोशी ने नए-नए प्रयोग किए हैं, उनका एक उदाहरण है यह कृति, जो अतिशय द्रावक ही नहीं, दाहक भी है।
  • Kirti Choudhary Ki Kahaniyan
    Kirti Chaudhary
    150 135

    Item Code: #KGP-9087

    Availability: In stock


  • Face Your Fears (Self-Help)
    David Tolin
    695 626

    Item Code: #KGP-355

    Availability: In stock

    Everyone experiences fear and anxiety, but when fear begins to dominate your life, it can be devastating. You don’t have to live that way. Whether you suffer from moderate anxiety or debilitating fear, a specific phobia, obsessive- compulsive disorder, panic disorder, social anxiety, posttraumatic stress disorder, generalized anxiety disorder, or any other form of anxiety, Face Your Fears will change the way you think about fear and what to do about it.
    This up-to-date, evidence-based, user-friendly self-help guide to beating phobias and over-coming anxieties walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear. In Face Your Fears, celebrated therapist Dr. David Tolin introduces a highly effective and scientifically proven treatment called exposure therapy, in which you gradually confront your fears. Drawing on moving stories from the hundreds of patients he has treated successfully, Dr. Tolin defines the six different types of anxiety and helps you determine which type you need to overcome. He guides you step by step through the gradual exposure process as you learn how to eliminate crutches and safety behaviors, address scary thoughts, and examine the evidence. You’ll learn how to track your progress and you’ll feel yourself taking back control of your life one exposure at a time.
    With Dr. Tolin’s gentle, confident guidance, you will learn to face and beat:
    • Fears of specific situations or objects (such as animals, heights, and blood)
    • Fears of body sensations (including panic attacks and health anxieties)
    • Social and performance fears (fears of social interaction, public speaking, and asserting yourself)
    • Obsessive fears (including fears of contamination and imperfection as well as scary thoughts)
    • Excessive worries (such as worrying about everything and intolerance of uncertainty)
    • Post-traumatic fears (fears of trauma-related situations and painful memories)
    Once you feel better, Dr. Tolin helps you maintain your newfound freedom for years to come. By understanding and preparing for circumstances that might cause your fear to return, you can take practical steps to prevent it from coming back and to overcome it quickly if it does.
    You know what it feels like to live in fear. Now it’s time to rediscover what life feels like without it. Face Your Fears delivers the no-nonsense, scientifically proven tools you need to take control of your life and your future. Dr. Tolin walks you step by step through the process of choosing courage and freedom over fear.
  • Huzoor Darbar
    Govind Mishra
    375 338

    Item Code: #KGP-315

    Availability: In stock


  • Manto Zinda Hai
    Narendra Mohan
    350 315

    Item Code: #KGP-805

    Availability: In stock

    मंटो जिन्दा है
    सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । फीनिक्स पक्षी की तरह वह उड़ानें भरता रहा, अपनी ही राख से पुनर्जीवित होता रहा, जिन्दगी और लेखन के मोर्चों पर जीता-मरता रहा और भारतीय उपमहाद्वीप की साइकी में उतर गया । जाहिर हैं, ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है ।
    'मंटो जिन्दा है' ऐसी जीवनकथा है जो वृतांत होते हुए भी, वृतांत को बाहर-भीतर से काटती-तोड़ती पाठकीय चेतना को झकझोरती जाती है । मंटो की जिन्दगी के कई केंद्रीय मोटिफ, प्रतीक और पेटॉफर पाठक को स्पन्दित करने लगते है और यह महसूस करता है जैसे वह मंटो को अपनी परिस्थिति, समय और साहित्य के साथ जीने लगा हो । लेखक ने जैसे मंटो को जिन्दा महसूस किया है, पाठक भी किताब पढ़ते हुए वैसी ही हरारत महसूस करने लगता है ।
    मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है ।
    वृतांत और प्रयोग के निराले संयोजन में बँधी यह मंटो- कथा मंटो को उसके विविध रंगों और छवियों के साथ उसके प्रशंसकों-पाठकों के रू-ब-रू खडा कर देती है ।
  • Patron Ke Aaeene Mein Swami Dayanand Saraswati
    Raj Budhiraja
    225 203

    Item Code: #KGP-121

    Availability: In stock

    पत्रों के आईने में : स्वामी दयानंद सरस्वती
    स्वामी दयानंद अपने व्यस्त जीवन में से कुछ पल निकालकर पत्र लिखा करते थे । वे एक साथ कई काम किया करते थे-विभिन्न धर्मों में फैली कुरीतियों का खंडन, गंभीर दार्शनिक ग्रंथों की रचना, शास्त्रार्थ की तैयारी । भ्रमण और यात्रा के दौरान नाना प्रकार की पीडाओं को झेलने के बाद वे पत्र लिखने बैठ जाया करते थे। पत्रों के आईने मेँ स्वामीजी के कई रूपों को देखा जा सकता है ।
    स्वामीजी ने देश के विभिन्न प्रांतों के अपने सहयोगियों से पत्र-व्यवहार किया है । उन्होंने लाहौर, रावलपिंडी, अमृतसर, दिल्ली, लखनऊ, सहारनपुर, मेरठ, जोधपुर, बरेली, पुष्कर, अजमेर, जयपुर, कानपुर, उदयपुर, लुधियाना से पत्र लिखे । उन पत्रों का उद्देश्य वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार करना था । उन दिनों स्वामीजी दो-तीन दिनों के अंतराल से पत्र लिखा करते थे । पत्र प्राप्त होने पर उनका उत्तर भी तत्काल दे दिया करते थे ।
    इस पुस्तक में उनका एक व्याख्यान सम्मिलित किया गया है, जो उन्होंने यज्ञ की संपूर्ण प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए दिया था । यज्ञ-वेदी, पात्र, साकल्य, घृत व अन्य द्रव्यों को प्रात:काल विशिष्ट प्रकार की समिधाग्नि में दहन करने से व्यक्ति स्वस्थ, दीर्घायु होता है। उन्होंने निर्देश दिया है कि व्यक्ति को प्रात: - सायं नित्यप्रत्ति यज्ञ करना चाहिए ।
    इस पुस्तक में उन स्थानो, तिथियों और व्यक्तियों का भी उल्लेख है, जिनसे स्वामीजी ने शास्त्रार्थ किया था । इसके अतिरिक्त उन छापेखानों, स्थानो का भी उल्लेख हैं, जहाँ से स्वामीजी का संपूर्ण वाङ्ग्मय प्रकाशित हुआ था ।
  • Toba Teksingh Tatha Anya Kahaniyan
    Saadat Hasan Manto
    180 162

    Item Code: #KGP-1941

    Availability: In stock


  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 2 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7060

    Availability: In stock


  • The Hanuman Factor (Self-Help)
    Anand Krishna
    345 311

    Item Code: #KGP-593

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
  • Kavi Ne Kaha : Kumar Ambuj
    Kumar Ambuj
    190 171

    Item Code: #KGP-383

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : कुमार अम्बुज 
    मैं आधा-अधूरा जैसा भी हुं, एक कवि हूँ और बीत रही इस सदी का एक गवाह हूँ। मेरे सामने हत्याएं की गई है । मेरे सामने ही एक आदमी भूख से तब मरा है, जबकि मैं भोजन कर रहा था । एक स्त्री मेरी आँखों के सामने बेइज्जत की गई । मेरे गर्म बिस्तर से सिर्फ पचास मीटर दूर फुटपाथ पर लोगों ने शीत-भरे जीवन की रातें बिताई हैं । मुआवजा न मिलने से बरबाद हो गए लोगों ने जब सड़क पर जुलूस निकाला, मैं मदिरा पीता पाया गया । मैं चश्मदीद गवाह हूँ। मुझे गवाही देनी होगी । अभी न दूँगा तो अपने अंत में देनी होगी । इस गवाही से बचा नहीं जा सकता। इसी मायने में किसी कवि के लिए और किसी समाज के लिए कविता का रकबा महत्वपूर्ण है । कविता में लिखे शब्द, एक साक्षी के बयान हैं । अपने को सजदे से लाकर, झुककर, लिखे गए बयान । इन बयानो से कवि के अंतमू का और अपने समय के हालात का दूर तक पता चलता है । समाज के पाप और अपराध, एक कवि के लिए पश्चाताप, क्रोध, संताप और वेदना के कारण है । वह एक यूटोपिया का निर्माण भी है, जिसकी संभावना को असंभव नहीं कहा जा सकता ।
  • Kavi Ne Kaha : Malay (Paperback)
    Malay
    90

    Item Code: #KGP-1245

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के एक गीत की आरंभिक पंक्तियाँ हैं: ‘लाइट, ओ, व्हेयर इज द लाइट? किंड्ल इट विद द बर्निंग पफायर ऑफ डिजयर।’ वहाँ जो इच्छा की प्रज्वलित अग्नि है, वहीं मलय की ‘इच्छा की दूब’ है। देखिए-
    हाय-हाय की हताशा को / लतियाकर / विपदा की उभरकर / पसरती चट्टान के सिर चढ़कर / हहराना चाहती है / इच्छा की दूब।
    ऊपर जिस संकीर्णता से उनके मुक्त होने की बात कही गई है, इसका प्रमाण निम्नलिखित पंक्तियाँ देती हैं-
    अपने भीतर की परिधि को / फैला पाने की / पहल में / दिनमय हो जाता हूँ / रात में भी।
    कहने की आवश्यकता नहीं कि इस उद्धरण में ‘दिनमय’ शब्द रात के अँधेरे में मणि की तरह चमकता है, यानी ‘मणिमय’ हो गया है। यह एक शब्द हमें कवि की शब्द-साधना का पता देता है।
    प्रगतिशीलता ने मलय को एक बहुत बड़ी चीज दी है-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसी ने उनकी कविता में दुर्दांत जिजीविषा, अदम्य मानववाद और इतिहास की शक्ति में अखंड विश्वास को संभव किया है। इससे उनकी अभिव्यक्ति में एक लिजलिजेपन और बासीपन की जगह एक औदात्य और ताजगी है। सिर्फ जिजीविषा के कुछ उदाहरण-
    टकराने में / उठती चिनगारियाँ / देख पाएँ तो / अँधेरे की दीवारों में / वे चमकते नक्षत्रों-सी / खिड़कियाँ हो जाती हैं।
    पुख्ता चट्टानों को चीरता / मौत के दाँत उखाड़ता / प्रवाह की पुख्ता जिम्मेदारी के तहत / हुलसता है पानी
    वह एक बूँद / जिसके लिए / कितने समुद्र / लाँघकर आया हूँ / इस गहरे / अँधेरे में / तारे-सी दिखती है
    लेकिन मलय केवल जिजीविषा के कवि नहीं हैं। वे अपनी संपूर्णता में आधुनिक विश्व के कवि हैं...।
  • Interview (Hindi Interviews)
    Majda Asad
    60 54

    Item Code: #KGP-2022

    Availability: In stock

    इंटरव्यू
    इस किताब में इंटरव्यू विधा, उसके विकास और विभिन्न व्यक्तियों से वार्तालाप को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है ।
    लेखिका ने बातचीत के माध्यम से विभिन्न वर्गों के विशिष्ट व्यक्तियों से साक्षात्कार कराया है । प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ-साथ समाज-सेवा से लगे सामान्य व्यक्तियों की विशेषताओं का निरूपण किया गया है । राजनीति, साहित्य, कला और समाज-सेवा से संबंधित व्यक्तियों के इंटरव्यू लिये गये हैं । उपराष्ट्रपति, केन्दीय मंत्री, साहित्यकार, संगीताचार्य, गाइड और रसोइया एक साथ नजर आते हैं । इन सबसे बडे आत्मीय ढंग से बातचीत कर इनके व्यक्तित्व को बहुत सहज ढंग से उजागर किया गया है । यह भी स्पष्ट रूप से बताया है कि अपनी-अपनी जगह पर हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और समाज में अपना विशेष स्थान रखता है । यह पुस्तक दो हिस्सों में विभाजित है । पहले खंड में व्यक्तिगत इंटरव्यू है । दूसरे में विषयगत, जिसके अन्तर्गत किसी एक विषय पर अनेक व्यक्तियों से बातचीत कर उनके विचार प्रस्तुत किये गये हैं । सन् 1971 से लेकर 1991 तक लिये गये इंटरव्यू यहाँ संकलित है । इनमें से अधिकांश समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं । बातचीत के दौरान व्यक्तित्व तो उभरा ही, साथ ही बहुत-से रोचक प्रसंग भी उभरकर सामने आये हैं जो पाठको के लिए उपयोगी और प्रेरणादायक सिद्ध होंगे ।  यह पुस्तक अपने ढंग का अनूठा प्रयास है । इंटरव्यू विधा में अपना विशेष स्थान रखती है । पाठको द्वारा इसका स्वागत होगा ।
  • Helen Keller
    Vinod Kumar Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-240

    Availability: In stock


  • Khaamoshi Se Pahale
    Amrita Pritam
    120 108

    Item Code: #KGP-1848

    Availability: In stock

    अज़ल का वह वीर आया था 
    और मुझे—
    एक किरण का तावीज़ दे गया 
    वह तावीज़ पहन लेती हूँ 
    तो सारे आसमान पर 
    उसकी दरगाह देखती हूँ 
    और इश्क़ की शीरनी लेकर 
    दरगाह पर जाती हूँ.... 
  • Geeton Ke Indradhanush
    Sher Jung Garg
    50

    Item Code: #KGP-1210

    Availability: In stock


  • Saundarya-Meemansa
    V.K. Gokak
    90 81

    Item Code: #KGP-9126

    Availability: In stock

    "सौंदर्य-मीमांसा" कन्नड़ के प्रतिष्ठित लेखक डॉ० वी० के० गोकाक की कन्नड़ कृति 'काव्य-मीमांसे' का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में सौंदर्यशास्त्र पर यह अपने ढंग की पुस्तक होगी ओर निश्चय ही मोंदृवंशद्रस्व के अध्येताओं को इस पुस्तक से काफी सहायता मिलेगी । गोकाक ने विशेष भाषण-माला के अन्तर्गत सौंदर्यशास्त्र पर भाषण दिए थे । 'कला-स्वरूप', 'ध्वनि तथा प्रतिध्वनि', 'रस या जीवन-दृष्टि'–इन लेखों में लेखक ने भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना त्तत्वों के आधार पर विचार करके अपने मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है । डॉ. गोकाक स्वयं कन्नड़ और अंग्रेजी के कवि, उपन्यासकार और श्रेष्ठ आलोचक हैं। गोकाक के पास जीवन का व्यापक अनुभव और अंग्रेजी साहित्य का अपार पांडित्य है । दार्शनिक मनोवृति से वस्तु को तटस्थ दृष्टि से देखकर उसके सत्य को परखने की जिज्ञासा उनमें है । इन लेखों में उन्होंने साहित्या, कला, धर्म के  तत्यों के आराधक होकर सौंदर्य के तत्तवों का साक्षात्कार किया है। नि:संदेह यह कृति भारतीय काव्यशास्त्र को लेखक की अमूल्य देन है। इस अनुवाद में यदि त्रुटियाँ मिल जाएँ तो समझिए यह मेरी कमजोरी है ।
    डॉ. टी. आर० भट्ट

  • Avinashi
    Dr. Vishv Narayan Shastri
    150 135

    Item Code: #KGP-2046

    Availability: In stock

    अविनाशी
    संस्कृत वाड्मय में यद्यपि कथा-साहित्य का प्रचार है, किंतु आधुनिक रीती से लिखित उपन्यास की न्यूनता परिलक्षित होनी है । 'अविनाशी' संस्कृत-साहित्य का सर्वप्रथम ऐतिहासिक उपन्यास है, ऐसा कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । सप्तम शताब्दी के प्राग्ज्योनिष- पुर अर्थात असम राज्य के राजा कुमार भास्कर वर्मा के साथ कनौजाधिपति हर्षवर्धन की मित्रता तथा दोनों का परस्पर मिलकर गौड़ राज्य पर आक्रमण करना मुख्यतया इस उपन्यास का वर्ण्य विश्व है । उक्त ऐतिहासिक आधार पर औपन्यासिक कल्पना करने एवं चरित्र-चित्रण  युक्त सामाजिक, सांस्कृतिक विषयों पर प्रकाश डालने से उपन्यास का कलेवर परिपुष्ट हुआ है । मूल उपन्यास सन 1984 में संस्कृत भाषा में प्रकाशित हुआ था, तत्पश्चात् साहित्य अकादेमी आदि विभिन्न संस्थान- प्रतिष्ठानों ने पुरस्कृत भी किया था । इतिहास एवं कल्पना-संभूत होने पर भी इसका चारित्रिक चित्रण हृदयावर्जक एवं सामाजिकता से ओतप्रोत है । मानवोचित पारस्परिक प्रेम, ईष्यों, द्वेषादि गुणों, अवगुणों का भी सम्यक प्रकाशन हुआ है ।
    इस उपन्यास को सर्वसुलभ और बोधगम्य बनाने के लिए असमिया, बाँग्ला प्रभृति प्रादेशिक भाषाओं में भी इसका अनुवाद हुआ है और प्रकाशित भी किया जा रहा है । यह हिंदी संस्करण हिंदी-प्रेमी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए प्रकाशित किया जा रहा है ।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Amar Ho Gaya Magar
    Ramesh Bedi
    50

    Item Code: #KGP-1197

    Availability: In stock


  • Mera Jamak Vapas Do (Paperback)
    Vidya Sagar Nautiyal
    150

    Item Code: #KGP-7073

    Availability: In stock


  • Tinke-Tinke
    Nisha Bhargva
    165 149

    Item Code: #KGP-1806

    Availability: In stock

    निशा भार्गव के लघु कथा संग्रह, 'तिनके-तिनके' में परिवर्तित जीवन मूल्यों के छोटे-छोटे सच हैं, स्त्री प्रश्न, परिवारिक-सामाजिक वैषम्य और संबंधों की आइरनी दर्शाती छोटी-छोटी घटनायें हैं, जिन्हें अर्थकेंद्रित जीवन की आपाधापी में रोज़मर्रा की बाते समझकर, 'यह सब तो होता ही रहता है', वाले खाने में डालकर अदेखा किया जाता है ।
    हमारी आसपास की दुनिया में आए दिन काफी कुछ घटता रहता है। चौतरफ हेर फेर, अनाचार, स्कैम्स, आतंकी हमलों से लेकर, स्त्रियों से दुराचार, वृद्धों की अवमानना एवं आत्महत्याओं से टीवी और समाचार पत्र भरे रहते है । ऐसे में देखने सुनते में साधारण और औसत, पर चीन्हने में अर्थगर्भित ये बातें महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि गुट्ठिल होते जीवन में हमारा दिलोदिमाग, जो अशुभ और अनाचार सुनने का आदी हो गया है उसे हुन रोज़मर्रा के सुख-दु:ख, राग-विराग, प्रेम, ईषर्या और ईमानदारी की छोटी-छोटी घटनाओं से रू-ब-रू करा कर, उसकी संवेदनशीलता को टहोका जाय । शायद नज़र अंदाज होती ये छोटी-छोटी घटनाएं उन्हें अपने भीतर झांकने को प्रेरित करें । इनमें उन्हें खुशहाल जिन्दगी के कुछ छोटे-बड़े नुस्खे मिल जाये, जिनसे आए दिन के तनावों और घरेलू कलहों से कुछ तो मुक्ति मिले ।
    निशा नाउम्मीदी में भी संस्कारशील व्यक्ति और स्वस्थ समाज की उम्मीद नहीं छोड़ती । उसे अच्छाई पर भरोसा है यह भरोसा वह अपने पाठकों को सौंपना चाहती है । सीधी-सादी बोलचाल की भाषा में निशा बडे प्रश्न उठाती है । कैंसर की मरीज चारु, मौत के  इंतजार में सजना-संवरना क्यों छोडे? पचपन की उम्र में अकेली पडी शशि का पुनर्विवाह उसका गुनाह क्यों साबित किया जाय ? इस छोटे से जीवन को बयों भरपूर न जिया जाय ?
    बिना किसी भाषायी करिश्मे और दावे के निशा इस तिनके-तिनके  संग्रह में, स्मृतियों में अटके , यादों-स्थितियों के कुछ तिनके संजोकर बतकहियों और किस्सों के माध्यम से पाठकों से संवाद करती है, देखे जिए क्षणों को, छोटे-छोटे अनुभवों को सहज संवेदना से रेखांकित कर संधि पाठक तक पहुंचती है । इनकी सादगी ही इनकी खूबी हैं ।
  • Toro Kara Toro-2 (Sadhna)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-763

    Availability: In stock


  • Ek Qatara Khoon
    Ismat Chugatai
    400 360

    Item Code: #KGP-694

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Bhawani Prasad Mishra
    Bhawani Prasad Mishra
    280 252

    Item Code: #KGP-413

    Availability: In stock


  • Dharti Hai Balidaan Ki
    Shanta Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9139

    Availability: In stock

    भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेता तथा केंद्रीय मंत्री शान्ता कुमार जी राजनीति के क्षेत्र में जितने सक्रिय रहे हैं, साहित्य-लेखन के क्षेत्र में भी उससे कम सक्रिय नहीं रहे हैं।
    राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की गतिविधियों का उन्होंने बारीकी से अध्ययन किया है और इस संघर्ष में भारतमाता के जिन वीर सपूतों ने अपना बलिदान दिया है उनकी यशोगाथा को उन्होंने इस पुस्तक में बड़ी सूझबूझ से प्रस्तुत भी किया है।
    उनकी भाषा सहज और विवरण प्रेरणाप्रद हैं। कई ऐसे अछूते प्रसंग भी शान्ता कुमार जी ने इस पुस्तक में तटस्थ भाव से लेखनीबद्ध किए हैं जिनकी सामान्य भारतवासियां को बहुत कम जानकारी है।
  • The Change Maker (Paperback)
    Subhash Chandra Agrawal
    325

    Item Code: #KGP-327

    Availability: In stock

    A New Smart Democratic Venture
    To Mahatma Gandhi goes the credit of starting Non-Violent political movements; to Justice Bhagwati goes the credit of starting Public Interest Litigation, and now comes Subhash Agrawal who brings about changes by writing letters—a very unusual method which has resulted in significant successes in various areas, apart from winning him awards.
    Here is a method which can be followed and used by others, and perhaps a regular movement can be organized for better results. We present the first ever study of this new smart democratic venture.

    A Few of positive responses on Subhash's RTI Petitions:
    Wealth-declaration by judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Foreign trips of Judges: Restrictions now imposed by Union Government.
    - Immunity against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Cases against retired judges: CBI and Income Tax authorities initiate enquiries.
    - Conduct-code for judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Disciplinary Authority for Judges: Bill in Parliament to be introduced.
    - Twisting RTI Act by rules framed by Delhi High Court: RTI rules at Delhi High Court get revised.
    - File-notings: Accepted by DoPT being under purview of RTI Act.
    - Wealth-declaration by Union Ministers: Disclosed by Rajya Sabha Secretariat.
    - Padma panel ignoring Olympics heroes: Authorities accept big lapse.
    - Not following deadline for Padma-awards nominations: 20th November now being strictly followed.
    - Flouting norms for issuing commemorative postal stamps: No violation reported after RTI petition.
    - Fees structure at private universities: UGC to regulate fees-structure at private universities.
    - RTI fees in various names: DoPT issues circular for uniform payee-name “Accounts Officer”- Merger of public sector oil-companies: Aspect gets momentum.
  • Daastan Ek Jangali Raat Ki
    Subhash Chandra Agrawal
    225 203

    Item Code: #KGP-803

    Availability: In stock

    दास्तान एक जंगली रात की
    सूरज जाने कितनी देर से अपने घर नहीं लौटा था, और अँधेरे की कालिख़ में पागल आवारा घूमती ठंड के कारण आम के सभी दरख़्तों का बौर झर गया था।
    अँधेरे काले पानी वाले दरिया के किनारों पर बेशुमार किश्तियाँ औंधी पड़ी हुई थीं, क्योंकि रात के अँधेरे में किश्तियाँ पानी पर नहीं तैरा करतीं। 
    अभी तो काली अँधेरी रात थी। गिद्ध के फैले हुए डैनों की तरह अपना स्याह चोले जैसा काला कुर्ता हिलाती, फहराती, अँधेरे के कीचड़ में आड़ा-तिरछा चलती। भयानक और हौलनाक !
    तभी शेर की दहाड़ से काली रात का जंगल काँप उठा।
    थरथराते हुए ख़रगोश के दोनों बच्चे अपनी माँ से चिपक गए।
    शेर की दहाड़ की प्रतिगूँज बहुत देर तक दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे, चारों दिशाओं से, यहाँ तक कि धरती के पेट में से भी सुनाई देती रही।
    काफी समय बीत गया।
    एक छोटे ख़रगोश ने काँपते-काँपते माँ से पूछा, "माँ, ये शेर इस काली-स्याह रात में कैसे घूमता-फिरता है ?"
    माँ ने बहुत धीमी आवाज़ में अपने बच्चों को समझाया, "मेरे बच्चो, काली-स्याह रात शेर और चीतों की आँखों में ख़ून के रंग की सुखऱ् मशालें जला देती है। उसकी रोशनी में वे ख़ून और गोश्त की तलाश में घूमते रहते हैं। चुपचाप बैठो मेरे बच्चो, नहीं तो...," और उसका गला भर आया। वह चुप हो गई।
    [इसी संग्रह से]
  • Andhere Ke Deep
    Shanta Kumar
    450 405

    Item Code: #KGP-661

    Availability: In stock

    अंधेरे के दीप प्रखर राष्ट्रवादी सोच के धनी राजनेता व लेखक शान्ता कुमार के लेखों का संग्रह है। इन लेखों के केंद्र में वर्ष 2008 से अक्टूबर 2014 के मध्य की वे घटनाएं/सक्रियताएं हैं जिन्होंने लेखक को उद्वेलित किया। लेखक ने अपनी हार्दिकता व बौद्धिकता के आलोक में इस उद्वेलन को विश्लेषित किया है। ये लेख आठ खंडों में संयोजित हैं--भ्रष्टाचार और राजनीति, गरीब और सामाजिक न्याय, आर्थिक परिदृश्य, न्यायपालिका, व्यक्ति-विशेष, संस्कृति, विविध एवं विदेशी निवेश। इनमें भी ‘भ्रष्टाचार और राजनीति’ पर सर्वाधिक लेख हैं। यह बात समझी जा सकती है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की घटनाएं देख-सुनकर कोई भी संवेदनशील मन व्यथित हो जाएगा। लेखक ने सक्रिय राजनीति में रहकर व्यवस्था, प्रशासन और सामान्यजन को बखूबी जाना-समझा है। यही अनुभव अब लेखों में व्यक्त हो रहा है। शान्ता कुमार कोई एक ज्वलंत घटना उदाहरणार्थ चुन लेते हैं और उसके बहाने स्वतंत्रता, समता, मानवाधिकार, सामाजिक मूल्य, मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता, विकास आदि पर सार्थक बहस छेड़ देते हैं। जैसे लोकतंत्र में बढ़ते परिवारतंत्र पर वे टिप्पणी करते हैं, ‘सत्ता की महत्त्वाकांक्षा और व्यक्तिगत स्वार्थ इतने बढ़ गए हैं कि परिवारवाद की इस प्रवृत्ति से अधिकांश कार्यकर्ता अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं, परंतु बोलते नहीं। राजनीति में आंतरिक लोकतंत्र किसी कारण समाप्त होता जा रहा है। ऐसा लगता है कि अधिकतर जगह धृतराष्ट्र का दरबार बन गया है जहां शुचिता और पवित्राता की द्रोपदी का चीरहरण हो रहा है...।’
    शान्ता कुमार की दृष्टि देश की अर्थव्यवस्था, न्याय-व्यवस्था, संस्कृति, पर्यावरण, ग्रामीण संरचना आदि पर भी गई है। अटल बिहारी वाजपेयी, स्वामी विवेकानंद, नरेन्द्र मोदी और वीर सावरकर पर लिखते हुए लेखक ने उन कारणों की तलाश की है जिन्होंने इनमें नेतृत्व की क्षमता विकसित की। सारे लेख सक्रिय आत्मीयता से भरे हैं। देशहित की चिंता ही इन लेखों का प्रेरक बिंदु है। इनको पढ़ते हुए पाठक अपने देश-परिवेश से रूबरू होता है। प्रामाणिकता व तार्किकता इन लेखों की विशेष शक्ति है। भाषा पारदर्शी है और शैली भावानुकूल।
  • Media Aur Hindi Sahitya
    Raj Kishore
    250 225

    Item Code: #KGP-303

    Availability: In stock

    मीडिया और हिंदी साहित्य
    मीडिया और साहित्य का रिश्ता बिगड़ चुका है। इसमें संदेह नहीं कि आदर्श या लक्ष्य की दृष्टि से दोनों की मूल संवेदना एक है। दोनों का लक्ष्य मनुष्य को शिक्षित करना और सभ्यता के स्तर को ऊँचा उठाना है। दोनों भाषा में ही काम करते हैं, जो एक सामाजिक घटना है। इसके बावजूद आज मीडिया और साहित्य के बीच गहरी होती हुई खाई दिखाई देती है। यह खाई चिंताजनक इसलिए है कि मीडिया की पैठ और लोकप्रियता अधिक होने के कारण जनसाधारण के संस्कारों और रुचियों का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। दूसरी तरफ, साहित्य की दुनिया संकुचित होती जाती है और उसकी संवेदना का सामाजिक विस्तार नहीं हो पाता। इस तरह, संस्कृति की दुहरी क्षति होती है।...
    जहाँ तक साहित्य और मीडिया के रिश्ते का सवाल है, हिंदी का मामला न केवल कुछ ज्यादा निराशाजनक है, बल्कि ज्यादा पेचीदा भी है। साधारण जनता से सीधे जुडे़ होने के कारण हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की सामाजिक जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। संस्कृति की दृष्टि से हिंदी का संसार एक विकासमान संसार है। हिंदी प्रदेशों में साक्षरता का स्तर हाल ही में बढ़ा है और पढ़ने तथा जानने की भूख जगी है। मीडिया का काम इस भूख को सुरुचि-संपन्नता के साथ तृप्त करना है और व्यक्ति के सामाजिक तथा सांस्कृतिक सरोकारों को मजबूत करना है। कुछ समय पहले तक स्थिति जैसी भी थी, बहुत अधिक असंतोषजनक नहीं थी। मीडिया में लेखकों का मान था और साहित्य के लिए कुछ सम्मानजनक स्थान हमेशा सुरक्षित रहता था, लेकिन आज नौबत यह है कि दोनों के बीच अलंघ्य दूरी पैदा हो चुकी है। ऐसे में सामाजिक दबाव का रास्ता ही असरदार हो सकता है। 
  • Mera Jamak Vapas Do
    Vidya Sagar Nautiyal
    350 315

    Item Code: #KGP-393

    Availability: In stock


  • 1857 : Samar Gatha
    Sudrashan Kumar Chetan
    100 90

    Item Code: #KGP-9010

    Availability: In stock

    1857 समर गाथा
    विद्रोह सुधार माँगता है, क्रांति परिवर्तन।  सन् 1857 का जन-आंदोलन विद्रोह नहीँ था । वह तो गत सौ वर्षों (1757-1857) के विदेशी शासन के विरुद्ध जनता की शिकायतों का परिणति था । इस जनक्रांति को सैनिकों ने प्रारंभ किया और जनता के विभिन्न वर्गों ने उसमें सहयोग दिया। इस क्रांति में हिंदू और मुसलमानों ने कंधे से कंधा मिलाकर भागीदारी की । यह दूसरी बात है कि आंदोलन विफल हो गया और अंग्रेजों ने पूरी शक्ति से उसे कुचल दिया ।
    सफलता से बडी कोई उपलब्धि नहीं और विफलता से बड़ा कोई अपराध नहीं । यदि 1857 का यह सैनिक- आंदोलन सफल हो जाता तो समस्त विश्व स्वतंत्रता- आंदोलन के नाम से उसे ससम्मान पुकारता किन्तु उसके विफल हो जाने के कारण ही इतिहासकारों ने उसे विभिन्न नामों से संबोधित किया, यथा किसी ने इसे देशी राज्यों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का असफल प्रयास बताया तो किसी ने उसे सैनिक-विद्रोह का नाम दिया । किसी ने गदर की संज्ञा दी तो अन्यों ने स्वतंत्रता- आन्दोलन के नाम से अभिहित किया ।
    स्वतंत्रता-आंदोलन का यह प्रथम प्रयास असफल हो गया, उसे कुचल दिया गया और देश से ऊपरी सतह पर शांति भी स्थापित हो गई, किन्तु क्रांति के बीज मरे नहीं । देशवासी यह मानने को कदापि तैयार नहीं थे कि अंग्रेज़ अजेय हैं । तभी तो समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भीतर ही भीतर सशस्त्र विद्रोह की तैयारी में जुट गया । परिणामत: देश के विभिन्न भागों में समय-समय पर अंग्रेजो की विरोधिता जारी रही । सच तो यह है कि 1857 की क्रांति के बाद से अगस्त, 1947 तक भारत से अंग्रेजी सरकार एक क्षण के लिए भी चैन से शासन नहीं का पाई ।
  • Kavi Ne Kaha : Jitendra Shrivastva (Paperback)
    Jitendra Shrivastva
    140

    Item Code: #KGP-7018

    Availability: In stock

    पिछली सदी के आखिरी दशक में एक धमक की तरह काव्य-परिदृश्य पर उपस्थित हुए कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव आज नयी सदी की कविता के सर्वाधिक प्रशंसित और अनिवार्य कवि हैं। बाजारू प्रलोभनों से बचाकर हिंदी कविता को विश्वसनीय बनाए रखने के प्रति सर्जनात्मक सजगता जितेन्द्र को अपने समकालीनों में अलग पहचान दिलाती है। हमेशा करुणा, प्रेम और उम्मीद का पक्ष लेती हुई जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने आसपास पसरी हुई त्रासदी, अन्याय और दुःख के राजनीतिक तात्पर्यों का साहसिक उद्घाटन भी करती चलती है। जैसा कि होना चाहिए--गहन रूप से राजनीतिक होकर भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अपने स्वभाव में मानवीय, मार्मिक और भावनात्मक रूप से आर्द्र बनी रहती है।
    जितेन्द्र के लिए, कविता मनुष्य की नैसर्गिक संवेदनाओं को परिमार्जित करने का माध्यम है। मानवीय जिजीविषा के बहुविधि संस्तरों से साक्षात्कार के क्रम में उनकी कविता को कलात्मक मेयार की कठिनतर ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए देखा जा सकता है। नयी सदी की कविता के भाषिक और संवेदनात्मक आचरण को उदाहरणीय बनाने में जिन थोड़े कवियों का योगदान है, उनमें जितेन्द्र श्रीवास्तव अलग से ध्यान खींचते हैं।
    स्त्री, दलित, उत्पीड़ित और मार्जिनलाइज्ड समाज के तमाम अंतरंग जीवन-प्रसंगों से निर्मित जितेन्द्र की कविता का वितान बहुआयामी तो है ही, इसकी हदें इतिहास से लेकर भविष्य के अनिश्चय भरे अँधेरों तक व्याप्त हैं। जहाँ तक विमर्शों का प्रश्न है कविता में कला का सौंदर्य बचाते हुए जितेन्द्र को पूरे काव्यात्मक संतुलन के साथ, विमर्शों में कारगर हस्तक्षेप करते हुए देखा जा सकता है।
    कविता के प्रति पाठकों की घटती हुई अभिरुचि के प्रतिकूल माहौल में भी जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता अनेक तरह के सांस्कृतिक समूहों और आर्थिक-राजनीतिक रुझानों के पाठकों में समान प्रशंसा और प्रतिष्ठापूर्वक पढ़ी जाती है। उम्मीद की जाती है कि उनकी कविताओं का यह चयन पाठकों की संवेदना को स्पंदित करने में सफल रहेगा।
  • Lauh Kapaat Ke Pichhe
    Shravan Kumar Goswami
    60 54

    Item Code: #KGP-1971

    Availability: In stock

    हर जेल के आगे एक अभेद्य लौहकपाट होता है । इसके पीछे एक दुनिया होती है, जो हमारी अपनी ही दुनिया का हिस्सा होते हुए भी, इस दुनिया से बिलकुल स्वतन्त्र एक अलग ही दुनिया होती है । इसके अपने कायदे-कानून होते हैं । यहां जो कुछ भी होता है, उसकी खबर किसी को भी नहीं मिलनी । इसकी चिंता न तो खोजी पत्रकारों को सताती है और न हमारी सरकारों को । इसकी सुधि न तो विरोधी दल के लोग लेते हैं और न न्यायाधीश । 'लौहकपाट के पीछे" वास्तव में जो होता है, उसकी सही जानकारी इसके भीतर रहने वाले बंदियों को भी नहीं मिल पाती है ।
    इस पुस्तक के लेखक ने किसी की हत्या नहीं की थी, उसने किसी के साथ बलात्कार भी नहीं किया था, उसने कोई डकैती भी नहीं की थी और न उसने किसी सरकार का तख्ता पलटने का षड़यन्त्र ही किया था, फिर भी बिहार सरकार ने श्रवणकुमार गोस्वामी को अपने विश्वप्रसिद्ध हजारीबाग के केंद्रीय कारागृह में कुछ समय के लिए कैद रखा था । अपने कारावास के दौरान लेखक ने जेल-जीवन को अत्यन्त समीप से केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है । अपने इन्हीं अनुभवों का जो विवरण लेखक ने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है, वह केवल चौकानेवाला ही नहीं, अपितु सभ्य संसार के मुँह पर एक करारा तमाचा भी है ।
    मनोविज्ञान, अपराधशास्त्र, समाजशास्त्र तथा संस्मरण के चौराहे पर खडी यह पुस्तक एक ऐसी विरल कृति है, जो लेखक के उपन्यासों के समान ही अत्यन्त प्रवाहपूर्ण एवं रोचक है ।
    'लौहकपाट के पीछे' उन सभी व्यक्तियों की आंखें खोलने वाली एक अत्यन्त उत्तेजक, उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक है, जो 'मनुष्य और समाज' के बारे में निरन्तर सोचते हैं और मनुष्य के'कल्याणमय भविष्य' के लिए चिन्तित भी रहते हैं। 
  • Malyalam Ke Mahaan Kathakaar : Srijan-Samvaad
    Dr. Arsu
    200 180

    Item Code: #KGP-902

    Availability: In stock

    मलयालम के महान कथाकार : सृजन-संवाद
    अन्तर्सबंधों की मजबूती से ही संस्कृति टिकाऊ बनेगी । कला और संस्कृति के माध्यम से ही यह प्रक्रिया संभव  होगी । भाषायी अजनबीपन के कोहरे को मिटाने पर ही मानवीय सोच-संस्कार का क्षितिज विशाल बनेगा ।
    बहरहाल भाषायी कठमुल्लेपन को हटाकर हम हिंदी को सर्वभारतीयता का प्रतीक बनाना चाहते हैं । उसके लिए भाषायी भाईचारा पहले मज़बूत बने । उत्तर-दक्षिण का खुला संवाद इसका एक रास्ता है ।
    यह कृति मलयालमभाषी हिंदी लेखक डॉ० आरसु की साहित्यिक तीर्थयात्रा का परिणाम है । इसके पीछे एक विराट लक्ष्य है । यह भाषायी समन्वय का कार्यक्षेत्र है । सुदूर दक्षिण के प्रांत केरल में रहकर कई साहित्यकारों ने अमर कृतियाँ लिखी हैं । उनकी कृतियां भी राष्ट्र भारती की संपदा हैं ।
    तकषी शिवशंकर पिल्लै, एस०के० पोटटेक्काटट और एम०टी० वासुदेवन नायर को इस भाषा में कृतियां लिखकर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था । उनके समानधर्मी और भी कई कथाकार हैं ।
    सृजन-क्षण की ऊर्जा, उन्मेष और उलझन पर उनके विचारों से अवगत होने के लिए अब हिंदी पाठकों को एक अवसर मिल रहा है । दक्षिण भारत की एक भाषा के साहित्यकारों के साक्षात्कार पहली बार एक अलग पुस्तक के रूप में हिंदी पाठकों को अब मिल रहे हैं ।
    मलयालम के बीस कथाकारों के हृदय की नक्षत्रद्युति यहाँ हिंदी पाठकों को मिलेगी । कुछ विचारबिंदु वे अवश्य आत्मसात् भी कर सकेंगे। हिंदी भेंटवार्ता के शताब्दी प्रसंग में प्रकाशित यह कृति एक कीर्तिमान है । इस कृति के माध्यम से मलयालम और हिंदी हाथ मिलाती हैं । दक्षिण के हृदय को उत्तर समझ रहा है । यह सांस्कृतिक साहित्यिक समन्वय की एक फुलझड़ी है ।
  • Bhartiya Sant Parampara
    Baldev Vanshi
    500 450

    Item Code: #KGP-750

    Availability: In stock

    भारतीय संत परंपरा
    भावी विश्व का सच्चा विकास आर्थिक भूमंडलीकरण के साथ-साथ नैतिक-आध्यात्मिक चेतना को समाहित कर पूर्ण व संतुलित बनाया जा सकता है। आज भारत तथा समूचे विश्व को केवल संत ही बचा सकते हैं, क्योंकि वे केवल मनुष्य की नैतिक-आध्यात्मिक चेतना के प्रति बद्ध हैं, किन्हीं धर्मग्रंथों, संप्रदायों से नहीं।
    महात्मा बुद्ध ने जो उपदेश दिए वे आधुनिक मानवता के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं, बल्कि वे उत्तरोत्तर अधिक प्रासंगिक होते जा रहे हैं। लोभ, मोह, घृणा की आग में व्यक्ति, समूह और देश जल-झुलस रहे हैं। सभी जगह जड़वाद, भौतिकवाद के परिणामस्वरूप भोगवाद, तृष्णा, लिप्सा, संग्रह की असीम लालसा के वशीभूत जगत् जलता हुआ जंगल बन चुका है। इनसे बचने के उपदेश तथागत ने दिए थे। बौद्ध संस्कृति का यह सार्वभौम आधार सब देशों-समाजों को ग्राह्य, प्रीतिकर एवं स्पृहणीय लगेगा। फ्रांस के दार्शनिक बर्गसां, जर्मनी के दार्शनिक कांट ने इसे तात्त्विक दृष्टि से उपयोगी बताया है तो चेतनाद्वैतवादी ब्रेडले ने बुद्ध के तर्कवाद-विज्ञानवाद को युग-व्याधियों का उपयुक्त निदान माना है। 
    महात्मा बुद्ध के मूल उपदेशों में प्रज्ञा, शील, ध्यान पातंजलि के ध्यान-योग के अति निकट हैं तो मध्ययुगीन संतों की वाणी में इन्हीं का विस्तार है। अतः ‘भारतीय संत परंपरा’ वर्तमान विश्व मानव के लिए अमृततुल्य है।
  • Grameen Samaj
    Baldev Vanshi
    340 306

    Item Code: #KGP-717

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Khushwant Singh
    Khushwant Singh
    215 194

    Item Code: #KGP-538

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Vijay Dan Detha (Paperback)
    Vijaydan Detha
    90

    Item Code: #KGP-7012

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : विजयदान देथा
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार विजयदान देथा ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'लजवन्ती', 'दूजौ कबीर', 'फितरती चोर', 'बडा कौन', 'दूरि, 'सिकन्दर और कौआ', 'राजीनामा', रैनादे का रूसना', 'अनेकों हिटलर' तथा 'हाथी-कांड' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक विजयदान देथा की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Svadeshi Chikitsa Paddhati
    Om Prakash Sharma
    350 298

    Item Code: #KGP-531

    Availability: In stock

    स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति
    मनुष्य को परमेश्वर की सर्वश्रेष्ट रचना माना गया है । किसी समय वह भी पूर्ण स्वस्थ और सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण रहा होगा, लेकिन आज स्थिति सर्वथा विपरीत है । आज पूरे विश्व में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलेगा, जिसे कोई कष्ट न हो तथा जो शोक, सन्ताप और चिन्ता से मुक्त हो अथवा निराश न हो । इसका एकमात्र कारण है- प्रकृति की उपेक्षा ।  प्रकृति कभी अन्याय का पक्ष नहीं लेती । जो भी उसके नियमों को भंग करता है, वह उसे दपिडत करती है ।
    मनुष्य को हर प्रकार की व्याधि और रोग से मुक्त रहने का अधिकार प्राप्त है; लेकिन इसके लिए उसे प्रकृति के स्वभाव को समझना चाहिए । उसे अपने शरीर के स्वभाव के अनुकूल अपनी दिनचर्या का पालन करना चाहिए । बुहिमान् व्यक्ति वही होता है, जो किसी विपति में फंसने से पहले ही अपना बचाव कर ले । यदि फिर भी असावधानीवश अथवा किसी अन्य कारणवश वह बीमार हो जाये, तो प्रकृति-प्रदत्त पदार्थों के उपयोग से पुन : स्वस्थ व समान्य हो सकता है ।
    प्रकृति ने हमारे देश पर ऐसी कृपा की  है कि यहां अनेक प्रकार की उपयोगी ज़डी-बूटियां ( औषधियां) पैदा होती हैं, जो घर-घर में विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लायी जाती हैं ।
    आज साधारण व्यक्ति डॉक्टरों की ऊंची फीस व महंगी दवाओ का प्रयोग करने में असमर्थता अनुभव कर रहा है तथा अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव से ग्रसित है। तब स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति की उपयोगिता से कौन इनकार कर सकता है ? स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति के सहारे आप दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुओ से नाना प्रकार के जटिल रोगों की अचूक चिकित्सा कर सकते हैं।
    'स्वदेशी चिकित्सा-पद्धति' पुस्तक में प्रत्येक रोग के लिए अनेक अचूक इलाज बताये गये हैं, जिनकी सहायता से साधारण व्यक्ति भी कठिन से कठिन रोगों की चिकित्सा स्वय कर सकता है ।
    पुस्तक में रोगों के निदान और चिकित्सा के साथ ही उपयोगी योगासनों व प्राणायाम का भी समावेश किया गया है ।
  • Meethi Neem
    Om Prakash Sharma
    550 495

    Item Code: #KGP-720

    Availability: In stock


  • Premchand : Jeevan, Kala Aur Krittwa
    Hansraj Rehbar
    400 360

    Item Code: #KGP-9288

    Availability: In stock

    प्रेमचंद का सारा जीवन संघर्षो में व्यतीत हुआ। वे डाकखाने के एक मामूली क्लर्क के बेटे थे। अर्थाभाव के कारण मैट्रिक बड़ी मुश्किल से पास किया। इसके उपरांत उन्हें जीविकोपार्जन में जुट जाना पड़ा। लेकिन उनमें विकास और उन्नति की जो एक भावना थी, ओ बढ़ने की जो एक उत्कृट अभिलाषा थी, उसने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया। वे जीवन-पर्यन्त परिस्थितियों से लड़ते और उनसे ऊपर उइने का सतत् प्रयत्न करते रहे। उन्हें आर्थिक और भौतिक सुख भोगना भले ही नसीब न हुआ, लेकिन अपने इस प्रयत्न से वे महान् लेखक बन गए। उन्होंने जनता के दुःख दर्द को स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी और बारीकी से उसका वर्णन किया। 
    निस्संदेह प्रेमचंद आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी साहित्यकार है, जिनकी प्रतयेक रचना भारतीय जन-जीवन का आइना है तथा हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।
    —इसी पुस्तक से...
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kamleshwar
    Kamleshwar
    200 180

    Item Code: #KGP-736

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कमलेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : "कोहरा', 'राजा निरबंसिया', 'चप्पल', 'गर्मियों के दिन', 'खोई हुई दिशाएँ', 'नीली झील', 'इंतजार', 'दिल्ली में एक मौत' , 'मांस का दरिया' तथा 'बयान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कमलेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Mere Saakshatkaar : Ramesh Chandra Shah
    Ramesh Chandra Shah
    175 158

    Item Code: #KGP-2034

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : रमेशचन्द्र शाह
    साक्षात्कार (इंटरव्यू या 'हाई टॉक") एक नई विधा है । नई विधा किसी ज़रूरत, किसी अनिवार्य माँग या चुनौती के दबाव से उत्पन्न होती है । इसीलिए उसमें नई संभावनाएँ भी देखी जा सकती हैं । किसी जमाने में रचना-प्रक्रिया को लेकर बली कौतूहल उपजा करता था : यह दौर भी बीत गया और उसकी जगह खुद रचनाकार को उसकी रचना से बाहर टोहने- पकड़ने तथा आमने-सामने की सीधी बातचीत के ज़रिए उसकी रचना-प्रक्रिया को ही नहीं, उसके व्यक्तित्व-निर्माण और सामाजिक-सांत्कृतिक-आध्यात्मिक अंत:क्रियाओं के भीतर झाँकने की प्रेरणा ने ले ली : उसके भीतर चल रहे अतिरिक एकालाप को भी एक जीवंत संवाद की तात्कालिक उत्तेज़नाओं के भीतर से प्रत्यक्ष करने की उत्सुकता ने । यह उत्युकता सहज-स्वाभाविक है : उसका अपना औचित्य, अपना आकर्षण और अपनी उपयोगिता भी है : उनके लिए विशेष रूप से, जिन्होंने 'साक्षात्कृत' लेखक की रचनाओं को सचमुच पढा है ।  किंतु जिन्होंने नहीं पढा है या बहुत कम पढा है, उन्हें भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सके-वैसी उत्सुकता लेखक के रचना-संसार के प्रति ये साक्षात्कार जगा सकें तो यह इस उपक्रम का अतिरिक्त लाभ होगा-दुहरी सार्थकता ।
    श्री शाह की बहुविध और बहुवचनी [किताबघर प्रकाशन' से ही प्रकाशित उनकी अनेक विधाओं की चुनी हुई रचनाओं के संकलन 'बहुवचन' का आधार लें तो] सृजनात्मकता की सम्यक् रीझ-बूझ को उकसाने में ये 'साक्षात्कार' सहायक और उपयोगी होंगे, ऐसी आशा-इन्हें पढ़ते हुए-सहज ही मन में  जगती है । इसलिए भी, कि लेखक से 'इंटरव्यू' लेने वालों में कई तरह की रुचियों और प्रवृत्तियों वाले सहृदय सामाजिक शामिल हैं : समानशील लेखक भी, पत्रकार और समाज-रचना के कार्यों से जुड़े हुए अन्य लोग भी।
  • Chhota-Sa Break (Paperback)
    Vishnu Nagar
    140

    Item Code: #KGP-306

    Availability: In stock

    छोटा-सा ब्रेक
    विष्णु नागर अपनी कविताओं के लिए जितने जाने जाते हैं, अपने व्यंग्यों के लिए भी कम नहीं जाने जाते। ‘छोटा-सा ब्रेक’ में समसामयिक घटनाओं पर छोटे-छोटे व्यंग्य संकलित हैं, जो उन्होंने (दैनिक) ‘नई दुनिया’ में प्रतिदिन ‘गरमागरम’ स्तंभ के अंतर्गत लिखे थे और जिन्हें पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया गया था। अधिकतर पाठक तो अखबार खोलकर पहले ‘गरमागरम’ स्तंभ ही पढ़ते थे। जैसा कि आप देखेंगे, ये व्यंग्य-आलेख भले ही समसामयिक घटनाओं- चरित्रों पर हों, मगर इनमें समय की सीमा में रहकर भी उस सीमा के पार जाया गया है। एक सच्चा रचनाकार यही करता है, इसलिए ये व्यंग्य हमारा खयाल है कि कभी पुराने नहीं पड़ेंगे। इसके अलावा ये व्यंग्य उस समय-विशेष का राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दस्तावेज भी हैं, एक ऐसा दस्तावेज, जो सत्ताधीशों की तरफ से नहीं, बल्कि साधारण जनता की तरफ से लिखा गया है, जिसमें उसके तमाम दुःख-तकलीफ दर्ज हैं, उसका व्यंग्य-विनोद भाव अंकित है। ये व्यंग्य परसाई और शरद जोशी दोनों की परंपरा में हैं। उस परंपरा में हैं और अपनी एक अलग परंपरा भी ये बनाते हैं। इनमें शैलियों का अद्भुत वैविध्य है, भाषा की अनोखी सहजता और प्रवाह है। इन्हें पढ़कर नहीं लगता कि व्यंग्य करने के नाम पर शाब्दिक खिलवाड़ की गई है। ये असली चिंता से उपजे व्यंग्य-आलेख हैं। इन्हें पढ़कर समाज को देखने-परखने की एक नई—ऊर्जस्वित दृष्टि भी मिलती है, मात्रा हलका-फुलका मनोरंजन नहीं होता, जैसा कि सामान्यतः व्यंग्य आजकल करते पाए जाते हैं। कैसे गंभीर से गंभीर बात को, जटिल से जटिल विषय को, सहजता-सरलता और व्यंग्यात्मकता से उठाया जाए, इस बात का उदाहरण बनते हैं ये व्यंग्य। इन्हें पढ़कर लगेगा कि व्यंग्य की मौजूदा स्थिति से निराश होने की नहीं, फिर से उत्साहित होने की जरूरत है।
  • Dr. Ambedkar : Jeevan-Marma
    Rajendra Mohan Bhatnagar
    280 252

    Item Code: #KGP-1880

    Availability: In stock


  • Aadhunik Hindi Kavita_225
    Dr. Hardyal
    225 203

    Item Code: #KGP-888

    Availability: In stock

    आधुनिक हिंदी कविता अनेक दृष्टियों से विशिष्ट कविता है। उसकी विशिष्टता इस बात में है कि उसमें अनुभूति और अभिव्यक्ति से संबंधित इतनी विविधता है जितनी आधुनिक काल से पहले की किसी भी काल की कविता में नहीं रही। उसकी इस विविधता में अंतःसलिला के रूप में ऐसी एकरूपता भी है जो उसे एक स्वतंत्र इकाई बनाती है। उसकी विभिन्न प्रवृत्तियों को विशिष्टता और उसकी समग्र एकरूपता को पकड़ने और रेखांकित करने के अनेक प्रयत्न विभिन्न विद्वानों ने किए हैं। उन्हीं प्रयत्नों की शृंखला में एक प्रयत्न यह पुस्तक है। ‘इस पुस्तक की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें भारतेन्दु-युग से लेकर नवें दशक तक की हिंदी कविता की सभी प्रमुख प्रवृत्तियों की क्रमिक चर्चा है। इस कारण कोई चाहे तो इसे आधुनिक हिंदी कविता का प्रवृत्यात्मक इतिहास भी कह सकता है।’ पाठकों को इस पुस्तक में हिंदी के सुख्यात आलोचक डाॅ. हरदयाल की स्पष्ट और निभ्र्रान्त शैली में आधुनिक हिंदी कविता का तटस्थ विवेचन और निष्पक्ष मूल्यांकन मिलेगा। हमारा विश्वास है कि यह पुस्तक पाठकों की बहुत-सी जिज्ञासाओं को शांत करेगी और उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के संबंध में नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित करेगी।
  • Baatchit : Vishwanath Prasad Tiwari
    Vishwanath Prasad Tiwari
    350 315

    Item Code: #KGP-666

    Availability: In stock


  • Aisa Satyavrat Ne Nahin Chacha Tha
    Raj Kumar Gautam
    60 54

    Item Code: #KGP-2100

    Availability: In stock

    ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था
    सदी के इस कठिन और जटिल समय में हिन्दी के जिन युवा लेखकों ने उपन्यास लिखे हैं उनके बीच राजकुमार गौतम की 'उपस्थिति' महत्वपूर्ण और 'निजी' ढंग से हुई है । अपनी सादगी, संवेदनशीलता और आयासहीन शिल्प के लिए चर्चित राजकुमार गौतम का कहानीकार 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में एक प्रौढ़, अनुभवी लेकिन जोखिम उठने वाले मछुआरे की तरह उतरा है । प्रतिकूलताओं और असभ्य जीवन स्थितियों के उछाल मारते, सिर पटकते पागल समुद्र की अतल गहराई में दुबली आस्था और संघर्ष की जो 'मछली' राजकुमार ने पकड़ी है और अपने नायक सत्यव्रत को सौंपी है उसके लिए इस उपन्यास को बहुत देर तक और दूर तक एक चमत्कार की तरह याद किया जाएगा ।
    नामहीन-व्यक्तित्वहीन केंद्रीय चरित्रों के मौजूदा ममय में इस उपन्यास का 'सत्यव्रत’ वापसी है उस नामधारी व्यक्तित्व की जिसका लोप छठे दशक के उत्तरार्द्ध से आरंभ हुआ था । 'ऐसा सत्यव्रत ने नहीं चाहा था' में राजकुमार ने यथार्थ के स्तर-दर-स्तर उदघाटित करने के लिए जो अनेक आयामों वाली तीखी भाषा 'खोजी' है और प्रतिकुलताओं से लडते- भिड़ते लहूलुहान आदमी की गहरी त्रासदी, उदासी, करुणा और अंतर्द्वन्द्व को 'उभारने' के लिए जिस 'अंडरकरेंट' की तरह बहते 'सटायर' को चुना है वह मौजूदा समय में लिखी जा रही इकहरी और एकायामी रचनाओं के 'भब्भड़' में एक गहरा रचनात्मक सुख प्रदान करता है । भाषा के स्तर पर एक घटना के रूप में रेखांकित किया जा सकने वाला यह उपन्यास कथ्य के स्तर पर आज के आदमी की तकलीफदेह साँसो की गवाही तो है ही, यह गवाही है उसके टूटकर भी न टूटने की जिद और आकांक्षा की भी ।
  • Kosh Vigyan (Paperback)
    Bholanath Tiwari
    150

    Item Code: #KGP-7076

    Availability: In stock


  • Hanzaad
    Manohar Shyam Joshi
    75 68

    Item Code: #KGP-9045

    Availability: In stock


  • Muhafiz
    VIJAY
    290 261

    Item Code: #KGP-245

    Availability: In stock


  • Ullanghan
    Bhairppa
    390 351

    Item Code: #KGP-810

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Chhoo Mantar
    Pratap Sehgal
    100

    Item Code: #KGP-958

    Availability: In stock


  • Mere Saakshaatkaar : Mridula Sinha
    Mridula Sinha
    300 270

    Item Code: #KGP-9346

    Availability: In stock

    रचनाकार का मन स्वयं में एक रहस्य है। मन में निहित भावनाएं, संकल्पनाएं, स्वीकृतियां, असहमतियां, प्रार्थनाएं आदि किस विध में या किस शिल्प में व्यक्त होंगी यह एक अबूझ तथ्य है। विद्वानों का ऐसा कहना है कि जब कोई रचनाकार को अपने प्रश्नों से उकसाता है तब मन को प्रकट होने का एक भिन्न प्रयोजन मिल जाता है। ‘किताबघर प्रकाशन’ की बहुचर्चित और पाठकप्रिय पुस्तक  शृंखला ‘मेरे साक्षात्कार’ के इस संकलन में सुप्रसिद्ध  रचनाकार मृदुला सिन्हा ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पक्षों पर बात की है। उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत, अनुभव व्यापक और चिंतन बहुमुखी है, इसलिए उनके उत्तर जीवन व समय की गहराइयों में प्रवेश कर जाते हैं।
    एक प्रश्न के उत्तर में मृदुला सिन्हा कहती हैं, ‘साधारण से साधारण नारी बहुत कुछ दे जाती है और उसका यह देना ही मुझे आंदोलित करता है और मेरे साहित्य के लिए प्रेरणादायी प्रसंग बनता है। सामाजिक समस्याओं को सूचीबद्ध कर देना ही साहित्यकार का काम नहीं है। उसी समस्याग्रस्त समाज व्यवहार से समस्याओं का निदान ढूंढ़कर भी प्रस्तुत करना साहित्य का उद्देश्य है।’ स्पष्ट है कि वे वितर्कों या कुतर्कों की उलझनों से दूर रहकर समाज के सकारात्मक विश्लेषण में रुचि रखती हैं। उनको तुलसीदास के इस कथन पर भरोसा है—‘छूटहि मल कि मलहि के धेये, घृत कि पाव कोउ बारि बिलोये।’
    मृदुला सिन्हा के व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं। केवल लेखक के रूप में नहीं सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक चिंतक, महिला हित संरक्षक आदि के रूप में भी उन्होंने अपनी प्रखर पहचान बनाई है। कहानी, उपन्यास, कविता और ललित निबंध को वे जितना साहित्य में रचती हैं, उससे अधिक जीवन में जीती हैं। इसीलिए पाठक उनकी रचनाओं और बातों में अद्भुत प्रवाह महसूस करता है।
    ‘मेरे साक्षात्कार’ के अंतर्गत मृदुला सिन्हा ने जिन तमाम मुद्दों पर अपनी बात रखी है, उनका संबंध व्यापक भारतीय समाज से है। इस अर्थ में ये साक्षात्कार ज्ञानप्रद और प्रेरक हैं।
  • Samanya Gyan-Vigyan Kosh (Paperback)
    Shravan Kumar
    240

    Item Code: #KGP-136

    Availability: In stock


  • Ratana Aur Chetana
    Amrita Pritam
    160 144

    Item Code: #KGP-9051

    Availability: In stock


  • Sarak Durghatnon Se Kaise Bachen
    E.W. Saxbi
    40

    Item Code: #KGP-920

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Kedarnath Agrawal
    Kedar Nath Agrawal
    200 180

    Item Code: #KGP-544

    Availability: In stock


  • Shishu Seekhen Achchhi Baaten-2
    Dhram Pal Shastri
    50

    Item Code: #KGP-1106

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramdhari Singh Diwakar (Paperback)
    Ramdhari Singh Diwakar
    125

    Item Code: #KGP-7007

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियां : रामधारी सिंह दिवाकर
    रामधारी सिंह दिवाकर की इन कहानियों में गांव का जटिल यथार्थ आद्यन्त उपलब्ध है ।  गाँवों की सम्यक तस्वीर का आधुनिक रूप जो विकास और पिल्लेपन के संयुक्त द्वंद्वों से उत्यन्न अपना है, वही यहाँ चित्रित हुआ है । आर्थिक आधार के मूल में रक्त-संबंधों के बीच गहरे दबावों का वैसा प्रभावपूर्ण चित्रण भा दिवाकर के समकालीन अन्य कहानीकारों में प्राय: नहीं मिलता है । कहा जा सकता है कि ये कहानियां उन हजारों-हज़ार गाँवों की पदचाप और ध्वनियों की खरी रचनाएँ हैं, जो किसी पाठयक्रम के चयन की प्रत्याशी नहीं, बल्कि  आधुनिक ग्राम और ग्रामवासी की आत्मा का अनुपम अंकन  हैं ।
    हिंदी कहानी के वृत्त और प्रयोजन की परिधि को निश्चित ही विस्तार देती इन कहानियों में जहाँ एक और मनुष्य की जिजीविषा का गाढा रंग है तो वहीं दूसरी ओर हमारे तथाकथित 'विकास' पर विशाल प्रश्नचिह्न भी हैं। सामाजिक परिवर्तनों के विकास पर इस कहानीकार की समर्थ पकड़ है तथा कहानियों की कारीगरी इतनी सहज-सरल और मर्मस्पर्शी कि लेखक की कहन चुपचाप पाठक के सुपुर्द हो जाती है । यही चिरपरिचित अंदाज दिवाकर के कहानीकार ने बखूबी अर्जित किया है, जो उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाता है ।
    रामधारी सिंह दिवाकर द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ हैं—'सरहद के पार','खोई हुई ज़मीन', 'सदियों का पड़ाव', 'शोक-पर्व', 'माटी-पानो', 'मखान पोखर', 'सूखी नदी का पल'. 'गाँठ', 'इस पार के लोग' तथा 'काले दिन' ।
    किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की जा रही "दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ में सम्मिलित इस प्रतिनिधि कथा-संग्रह को प्रस्तुत करते हुए हम आशान्वित हैं कि इन कहानियों को लंबे समय तक पाठकों के मन में कभी भी तलाशा जा सकेगा ।
  • Tiger Tantra (Novel)
    Ganga Prasad Vimal
    425 383

    Item Code: #KGP-872

    Availability: In stock

    A first ever Novel on an Untouched Subject
    The Tantra, its cults and practices have always attracted attention worldwide due to its strange disciplines and various hidden secrets. Chiefly because of its use of esoteric practices— in acquiring siddhis (supernatural powers), spiritual perfection and other material gains—Tantra came to be regarded as anti-social and unethical, forcing it to go underground.
    The present novel explores an unusual aspect of the tantric discipline, which makes it quite interesting. The author has taken up a subject inherent to the sub-culture of the Himalayan regions to which he belongs, and tried to weave it into a quite probable story, realistic as well as readable.
    ‘Tiger Tantra’ or the Tantra which changes the practitioner into a tiger or Bokshu and makes him immortal, lies buried under the ruins of a temple in the village of Jaled, the centre of an isolated Tantric Peeth in the Himalayan region.
    A scholar in search of the Tiger Tantra visits the village, to uncover the secret and to find the hidden mantra, finds a swami engaged in some strange practices . . . and the story unfolds in its fantastic dimensions . . . till the virgin offers herself to the scholar to corrupt the swami’s sadhana.
  • Bhartiya Naitik Shiksha : 3
    Dr. Prem Bharti
    95 86

    Item Code: #KGP-265

    Availability: In stock

    पिछले कुछ वर्षों से शैक्षिक पाठ्यचर्या में नैतिक शिक्षा की आवश्यकता को अनुभव करते हुए कुछ शासकीय/अशासकीय संस्थाओं में इसके शिक्षण हेतु प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु इसके प्रभावी परिणाम सामने नहीं आ पा रहे हैँ। देश तथा विश्व के महान् शिक्षकों-अरस्तू विवेकानन्द, अरविन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर , महात्मा गांधी आदि ने शिक्षा के इस पक्ष को व्यावहारिक आचरण के रूप से प्रस्तुत करने पर बल दिया है क्योकि किसी पर थोपे गए आचरण अथवा इस विषय की लिखित परीक्षा में पाए गए अधिकतम अड्डों से नैतिकता तथा आध्यात्मिकता का पाठ नहीं पढाया जा सकता।
    अत: शिक्षक को ही शिक्षा की धुरी होने के नाते अपने शिक्षण विषय के साथ-साथ इस विषय को उपदेशात्मक शैली में न पढाकर व्यावहारिक रूप से प्रस्तुत करना चाहिए ताकि बालकों को जीवन के विभिन्न सन्दभों में उपस्थित समस्याओं को हल करने में यह प्रभावी सिद्ध हो सके। शिक्षकगण यह भी ध्यान रखें कि आज के युवक में समस्याओं का क्षेत्र उतना ही व्यापक होता जा रहा है, जितना जीवन का मापदण्ड। 
    प्राचीन भारतीय साहित्य में नैतिकता तथा आध्यात्मिकता सम्बन्धित ज्ञान का भण्डार भरा पडा है । यदि हम बालकों के उस साहित्य को पढने के प्रति रुचि भी उत्पन्न कर दें, तो उन्हें इतनी समझ आ जाएगी कि अनैतिक एवं असंयमी व्यवहार करके हम मानवता को सुख और शान्ति का संदेश नहीं दे सकते।
    प्रस्तुत पुस्तक इसी दृष्टि से तैयार की गई है । आशा है, नैतिक शिक्षा के विभिन्न पहलुओं क्रो विविध संदभों में समझकर बालकों में निश्चित परिवर्तन होगा।
  • Mere Saakshatkaar : Manager Pandey
    Manager Pandey
    125 113

    Item Code: #KGP-541

    Availability: In stock


  • Zindagi Aur Jugaar
    Manohar Puri
    250 225

    Item Code: #KGP-9025

    Availability: In stock

    जिन्दगी और जुगाड़
    आपाधापी के इस युग में व्यक्ति को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जुगाड़ का सहारा लेना ही पड़ रहा है। व्यक्तिगत, पारिवारिक अथवा सामाजिक जीवन में कोई भी गतिविधि बिना जुगाड़ के संपन्न करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। आर्थिक, राजनीतिक और यहां तक कि शैक्षणिक जीवन भी जुगाड़ पर निर्भर होकर रह गया है। हर एक व्यक्ति दिन-भर किसी न किसी प्रकार से जुगाड़ करके अपने जीवन की गाड़ी को धकेलने का प्रयास कर रहा है। उसके चौबीसों घंटे किसी न किसी प्रकार का जुगाड़ करने में ही व्यतीत होते हैं। देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और अन्य सभी गतिविधियां जुगाड़ के बिना निरर्थक हैं। जिन्दगी का कोई पक्ष जुगाड़ से अछूता नहीं रहा, इसका अनुभव प्रायः हर व्यक्ति को प्रत्येक कदम पर होता है।
    इस उपन्यास में जीवन के कुछ ही पक्षों को छूना संभव हो पाया है। रोजमर्रा का पारिवारिक जीवन, हमारे परस्पर संबंध, राजनीति, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन, समाज में निरंतर फैलता भ्रष्टाचार, नशे की दुनिया में डूबती हमारी नई पीढ़ी, धन की अंधाधुंध दौड़ के मोहजाल में फंसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी से जल्दी वह सब प्राप्त कर लेना चाहती है, जो उसे वर्षों के परिश्रम के बाद भी ईमानदारी से मिलना संभव नहीं दिखाई देता। इसके लिए शॉर्टकट जरूरी है और यही शॉर्टकट जुगाड़ का मकड़जाल है। एक बार इसमें फंसा व्यक्ति लाख सिर पटक ले, इससे बाहर नहीं निकल पाता।
    इस उपन्यास में विश्वविद्यालयों में पनपते माफिया गिरोह और देह-व्यापार, अस्पतालों से होती मानव-अंगों की व्यापक स्तर पर तस्करी और राजनीति में लगातार पनप रहे भ्रष्ट गठजोड़ सरीखे कुछ पक्षों को ही मात्र छुआ जा सका है। ये समाज में फलने-फूलने वाले कैंसर की एक बानगी मात्र हैं। आप स्वयं इससे कहीं अधिक जानते हैं और प्रतिदिन उसे भोगने को अभिशप्त हैं। समाज के किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग ने इस उपन्यास से प्रेरणा लेकर विरोध का एक स्वर भी उछाला तो मैं अपने प्रयास को सार्थक समझूंगा। हां, इतना निश्चित है, जितना इसमें लिखा गया है, हालत उससे कहीं अधिक गंभीर है। समय रहते जाग जाना बहुत जरूरी है। जागो, कहीं बहुत देर न हो जाए।    
  • Premchand Ki Amar Kahaniyan (Paperback)
    Kamlesh Pandey
    120

    Item Code: #KGP-7215

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Dekho Samjho Karo
    Jagat Ram Arya
    160 144

    Item Code: #KGP-105

    Availability: In stock

    बालकों, अपने चारों ओर की दुनिया को देखो। इसमें भगवान ने हजारों वस्तुएं बनाई हैं-हवा, पानी, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि आदि। इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों शक्तियां भरी पड़ी हैं जिनमें से कुछ एक को हम-तुम जानते हैं। कइयों को हम बिलकुल नहीं जानते। कुछेक को हम थोड़ा-बहुत जानते हैं। अपनी दुनिया के बारे में यह हमारा अधूरा ज्ञान है। इसीलिए हम उन शक्तियों से लाभ नहीं उठा पाते। जैसे किसी निर्धन की खाट के नीचे धरती में सोने-चांदी का खजाना दबा हो, किंतु जिसका उसे पता न हो और वह भूखा नंगा रहकर दिन-रात दुख सहता हो। काश, वह उस छिपे खजाने को जान पाता और उसका प्रयोग करके सुखी बन जाता। इसी प्रकार अपने आसपास की वस्तुओं के बारे में भी हम बहुत कम जानते हें। ओर उसका कम लाभ उठाते हें। उनका पूरा लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब उनहें अच्छी तरह जान लें। इस प्रकार वस्तुओं के ‘विशेष ज्ञान’ को ही विद्या कहते हैं।
    आज हम मोटर, हवाई जहाज, राकेट आदि के अजब अनोखे आविष्कार देखते हैं, जो विज्ञान के सहारे ही बनाए गए। बड़े-बड़े आविष्कार करने वाले वैज्ञानिक भी हमारे-तुम्हारे जैसे दो हाथ, दो पांव वाले मनुष्य होते हैं। उनमें केवल तीन विशेष गुण होते हैं। वे हर वस्तु को ध्यान से देखते हैं, गहराई से समझते हैं और हाथ से करके देखते हैं। यदि हम भी विज्ञान पढ़ना चाहते हैं तो हमें भी इनहीं तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए-
    1. हम अपने प्रयोग की वस्तुओं को ध्यान से देखें।
    2. हम वस्तुओं में छिपी शक्तियों और गुणों को समझें।
    3. हम उन वस्तुओं के नित्य नए प्रयोग करना सीखें।
    इस पुस्तक में वैज्ञानिकों की सच्ची और रोचक घटनाओं के आधार पर विज्ञान के इन्हीं तीन अंगों पर बल दिया गया है। इनका प्रयोग हर बालक अपने घर और विद्यालय में कर सकता है। 
    —लेखक
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Aabid Surti
    Aabid Surti
    200 180

    Item Code: #KGP-49

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है । इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है । 'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार आबिद सुरती ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आतंकित', 'तीसरी आँख', 'सांताक्लोज़ के तीन क्लोज़अप', 'बिज्जू', 'सतह', 'अंधा', 'रहस्य एक बालक के जन्म पूर्व हुए अपहरण का', 'भैंसोंवाली गली', 'कैनाल' तथा 'अनाड़ी नंबर वन'। हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार आबिद सुरती की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Samkalin Sahitya Samachar March, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #March, 2017

    Availability: In stock

  • Path Pragya
    Veena Sinha
    240 216

    Item Code: #KGP-171

    Availability: In stock


  • Raahi Ko Samjhaye Kaun
    Bal Swaroop Raahi
    130 117

    Item Code: #KGP-523

    Availability: In stock

    बालस्वरूप राही हिंदी ग़ज़ल और गीत के एक ऐसे पुख्ताकलम रचनाकार हैं जिन्होंने गत पचास वर्षों में अपनी रचनाओं द्वारा जहाँ एक ओर हिंदी ग़ज़ल और गीत को स्तर, प्रतिष्ठा और एतबार बख्शा है, वहीं दूसरी ओर इन्होंने हिंदी के छंद-काव्य को ऐसे समय में समृद्ध करने का कार्य किया है जब वह विभिन्न काव्यांदोलनों के चलते अपनी साख खोने लगा था। स्पष्ट है कि ये दोनों कार्य अपना विशेष महत्व रखते हैं ।
    राही ने पीर, नजीर, गालिब और इकबाल का कलाम पढा है और इन शायरों के बेशुमार अशआर उन्हें कंठस्थ हैं, जिनका प्रयोग वह उचित मौकों पर करते हैं । लेकिन यदि हम राही की शायरी पर इनमें से किसी का प्रभाव तलाश करने का प्रयास करें तो सफलता मिलनी मुमकिन नहीं।  यही कारण है कि राही की गज़लें उनकी अपनी भाषा, शैली और सोच की मज़हर हैं ।
    उसकी ग़ज़लें उर्दू ग़ज़ल की परंपरा से अलग एक नई परंपरा की स्थापना करती नजर जाती हैं । निसंस्देह यह एक नई परंपरा है ।
    राही की गज़लें हिंदी साहित्य में एक खुशगवार इजाफे की हैसियत और विशेष महत्व रखती हैं ।

  • Svasthya Evam Chikitsa (Paperback)
    Dr. Rakesh Singh
    160

    Item Code: #KGP-369

    Availability: In stock

    स्वास्थ्य एवं चिकित्सा 
    पुस्तक में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न विषयों पर लगभग 41 लेख संकलित हैं। जो लोग यह कहते हैं कि चिकित्सा विज्ञान या इंजीनियरिंग आदि को केवल अंग्रेजी माध्यम से ही पकाया जा सकता है, उनके लिए ये लेख चुनौती हैं और सिद्ध करते हैं कि दुराग्रह से मुक्त होकर यदि राष्ट्रभाषा को उनका माध्यम बनाने का प्रयास किया जाए तो इन विषयों को हिंदी माध्यम से पढाया जा सकता है।
    स्वास्थ्य-लाभ के लिए दवाओं के उपयोग से अधिक स्वास्थ्य-रक्षा के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है। इन लेखों में अधिकांशत: इस बात की ध्यान में रखा गया है। आजकल आम प्रवृति यह हो गई है कि लोग कुछ दवाओं का नाम याद कर लेते हैं और अपने आप उनका प्रयोग आरंभ कर देते हैं। उससे कितनी जानि हो सकती है, यह 'दवाओं के उपयोग में सावधानियाँ शीर्षक से स्पष्ट है। इसी प्रकार टॉनिक के अंधाधुंध प्रयोग की निस्सारता से भी सामान्य पाठकों को परिचित कराया गया है। 'हदय-रोग और आहार' शीर्षक लेख हृदय-रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है। इसमें अधुनातन चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधानों को भी समाविष्ट किया गया है।
    पुस्तक की भाषा सरल, सुबोध एवं बोधगम्य है। अभिव्यक्ति आदि से अंत तक प्रसाद गुण-संपन्न है। कहीं भी उलझाने का उपक्रम दृष्टिगत नहीं होता, यह लेखक के भाषा-सामर्थ्व एवं उनके सफ़ल अभिव्यक्ति-कौशल का प्रतीक है।
  • Vipradas
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    300 270

    Item Code: #KGP-852

    Availability: In stock


  • Karmveer Pt. Sunderlal : Kuch Sansmaran
    Sudhir Vidyarthi
    125 113

    Item Code: #KGP-1964

    Availability: In stock


  • Asia Ke Durgam Bhukhandon Mein
    Rahul Sankrityayan
    300 270

    Item Code: #KGP-1924

    Availability: In stock

    एशिया के दुर्गम भूखंडों में
    'एशिया के दुर्गम भूखंडों में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की महत्त्वपूर्ण यात्रा-पुस्तक है, जिसमें  लेखक ने मध्य एशिया के कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, अक्षुनदी की उपत्यका तथा अफगानिस्तान का भ्रमण-वृत्तान्त दिया है । अपनी कठिन यात्राओं एवं इन यात्राओं की उपलब्धियों के बारे में भी राहुल जी ने सविस्तार वर्णन किया है ।
    राहुल जी के यात्रा-साहित्यकी विशेषता है उनकी वर्णन-शैली, जो इतनी आकर्षक है कि पाठक पुस्तक पढते समय यही अनुभव करता है कि वह भी लेखक के साथ-साथ भ्रमण कर रहा है । लेखक की दूसरी विशेषता है उनकी सूक्ष्म पर्यवेक्षकीय दृष्टि, जिससे पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है ।
    'एशिया दुर्गम भूखंडों में' की अपनी ऐतिहासिक विशेषता भी है, क्योंकि राहुल जी के देखे हुए कई देशों का इतिहास अब बदल चुका है, इसलिए भी इस पुस्तक का दस्तावेज महत्व बढ़ जाता है। राहुल-साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह एक अनिवार्य कृति है ।
    --कमला सांकृत्यायन
  • Ye Galion Ke Bachche
    Rekha Rajvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9119

    Availability: In stock

    इस किताब में गलियों के बच्चों की कहानियां, कहानियां नहीं बल्कि एक कड़वा सच है । बेतरतीब बिखरे पन्नों को समेटकर इन बच्चों के जीवन की वास्तविकता को सबके समक्ष लेन का इसमें प्रयास किया गया है । छह अध्यायों के माध्यम से इन बच्चों की जीवनगाथा को सुधी पाठकजनों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है । 
    यह अध्याय गलियों के बच्चों की समस्याओं को उजागर करने के लिए किया गया छोटा-सा प्रयास है ।