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  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Maheshwar
    Maheshwar
    120 108

    Item Code: #KGP-2083

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार माहेश्वर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सम्राट', 'ठिठुरन', 'अजनबी सुख', 'भूख', 'मृत्युदंड', 'अजगर', 'साहब, बीबी, गुलाम', 'सबूत', 'राजा और चिड़िया' तथा 'बंद"।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार माहेश्वर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Godhooli
    Bhairppa
    300 270

    Item Code: #KGP-669

    Availability: In stock

    कन्नड़ उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
  • Surakshit Pankhon Ki Uraan
    Alka Sinha
    100 90

    Item Code: #KGP-9294

    Availability: In stock

    बारूदी गंध और धुएं से स्याह आज के आकाश पर हवाई आतंक के मनहूस बादल निरंतर मंडरा रहे हैं। हर पिछली भयावह घटना को छोअी बनाती अगली घटना अपने को बड़ा सिद्ध कर रही है। 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय ससंद पर हुए आतंकवादी हमले से देश की संप्रभुता को तो आघात पहुंचा ही है, सुरक्षा का मनोविज्ञान भी घायल हुआ है। आतंवाद की भयावहता शांति और सुरक्षा के प्रति राष्ट्र को आशंकित कर रही है, तो 11 सितंबर, 2001 को न्यूयार्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ हवाई हमला आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दे रहा है और हवाई आतंक के प्रति समूची धरती और आकाश के माथे पर चिंता और विषाद की लकीरें गहरा गई हैं। आज का समय बच्चे-बच्चे से सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की मांग करता है दरवाजे खुले छोड़कर सोने का समय बहुत पीछे छूट गया। अब तो बंद दरवाजों में भी व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस करता है। सुबह घर से निकला आदमी शाम को सकुशल लौट भी आएगा, कह पाना कठिन है। फिर भी जिंदगी चलती रहती है और चलते रहते हैं जिंदगी के कामकाज। सर्दी-खांदी की तरह भय और आतंक भी जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। ऐसी सूरत में कहानी का उद्देश्य किस्सागोई अथवा मनोरंजन कतई नहीं है। वे जमाने लद गए जब दादी-नानी के पेट से सटकर राजा-रानी की कहानियां सुनते-सुनते नींद आ जाती थी और सपनों में उड़ने वाला घोड़ा लेकर उतर आता था कोई राजकुमार।
    —अलका सिन्हा 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Saadat Hasan Manto
    Saadat Hasan Manto
    350 315

    Item Code: #KGP-823

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार सआदत हसन मंटो ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'स्वराज्य के लिए', 'हतक', 'मेरा नाम राधा है', 'बाबू गोपीनाथ', 'मम्मी', 'मम्मद भाई', 'जानकी', "मोजेल', 'सियाह हाशिए' तथा 'टोबा टेकसिंह'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक सआदत हसन मंटो की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rang Basanti
    Pratap Sehgal
    150 135

    Item Code: #KGP-1913

    Availability: In stock

    रंग बसंत
    आजादी के आंदोलन के संभवत: ऐसे दो ही क्रांतिकारी महानायक है, जो सैक्टेरियन सोच से परे जाकर व्यापक स्तर पर सामाजिक एवं राजनीतिक विकास का स्वरूप सामने रखते है । किसी भी भारतीय से पूछिए, वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस और भगतसिंह का नाम लेगा । प्रताप सहगल का ‘रंग बसंती' नाटक भगतसिंह के जीवन का आख्यान मात्र नहीं, बल्कि उसके समय को भी पूरी शक्ति एवं जीवंतता के साथ हमारे सामने रखता है । भगतसिंह अपने जीवनकाल में ही लीजेंड बन गया था । उसके क्रांतिकारी कृत्यों को तो बार-बार सामने लाया गया, लेकिन उसके समाजवादी चिंतन को हमेशा नेपथ्य में ही रखा गया । भगतसिंह न सिर्फ अपने एक्शन में, बल्कि अपनी सोच में भी एक रैडिकल व्यक्तिव के रूप में सामने आता है । प्रस्तुत नाटक भगतसिंह के इसी रूप को हमारे सामने रखता है ।
    नाटक का ढाँचा दृश्यों में बाँधा गया है, जो इसे बेहद लचीला बना देता है । मुक्ताकाशी रंगमंच हो या प्रेक्षागृह का मंच, शैली यथार्थवादी से या प्रतीकवादी- हर तरह से नाटक को खेलने की संभावनाएँ इसमें मौजूद हैं । बई बार मंचित होकर तथा साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाट्यालेख के रूप में समादृत हो चुका 'रंग बसंती' नए रंग में पाठकों के हाथ में देते हुए सार्थकता का ही अनुभव किया जा सकता है । वस्तुत: गंभीर रंग-कर्म करने वालों के लिए यह एक उपहार है ।
  • Premchand : Jeevan, Kala Aur Krittwa
    Hansraj Rehbar
    400 360

    Item Code: #KGP-9288

    Availability: In stock

    प्रेमचंद का सारा जीवन संघर्षो में व्यतीत हुआ। वे डाकखाने के एक मामूली क्लर्क के बेटे थे। अर्थाभाव के कारण मैट्रिक बड़ी मुश्किल से पास किया। इसके उपरांत उन्हें जीविकोपार्जन में जुट जाना पड़ा। लेकिन उनमें विकास और उन्नति की जो एक भावना थी, ओ बढ़ने की जो एक उत्कृट अभिलाषा थी, उसने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया। वे जीवन-पर्यन्त परिस्थितियों से लड़ते और उनसे ऊपर उइने का सतत् प्रयत्न करते रहे। उन्हें आर्थिक और भौतिक सुख भोगना भले ही नसीब न हुआ, लेकिन अपने इस प्रयत्न से वे महान् लेखक बन गए। उन्होंने जनता के दुःख दर्द को स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी और बारीकी से उसका वर्णन किया। 
    निस्संदेह प्रेमचंद आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी साहित्यकार है, जिनकी प्रतयेक रचना भारतीय जन-जीवन का आइना है तथा हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है।
    —इसी पुस्तक से...
  • Dharmkshetre Kurukshetre
    Shanker Shesh
    70 63

    Item Code: #KGP-2014

    Availability: In stock

    धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे 
    धृतराष्ट्र का विवाह! अंधे को चतुर्भुज बनाना ! कोण देगा अनंत अँधेरे को अपनी कन्या ? कौन करेगा अपंग जीवन का वरण ? प्रश्न टेढा था । सत्यवती दबाव डाल रही यी। लगातार पडी थी  मेरे पीछे ।
    माँ को तो एक बार समझा भी लो, दादी को समझाना कठिन होता है । पौत्र चाहे लूला हो, लँगडा हो, अपाहिज हो, लेकिन उसका ब्याह होना बहुत जरूरी है । आज़ तक समझ में नहीं आया, मौका पाते ही एक स्त्री दूसरी स्त्री पर अत्याचार क्यों करने लगती है । सत्यवती क्यों नहीं सोचती ।  अंधे से ब्याह करने वाली लड़की को आजन्म कारावास भोगना पडेगा । सारी जिदगी अंधे की पत्नी कहाना होया । राजघराने का आदमी हुआ तो क्या हुआ, अंधा तो अंधा है,  रहेगा । लेकिन सत्यवती को समझाता कौन ! मेरा पिता तो उसे समझा नहीं सका, फिर मैं किस खेत की मूली था !
    इच्छा  हुई अपना उदाहरण सामने क्यों न रखूँ। आखिर मैं भी पूरे जीवन बिना स्वी के रह सका या नहीं । सशक्त ददेवपुत्र-सा दिखाई देन वाला में । तो यह 'अंधा क्यों नहीं रह सकता । मेरे मामले में  सत्यवती इतनी कठोर क्यों हो गई थी और अब पौत्र  के मामले में। (इसी उपन्यास से)
  • Aagaami Ateet (Paperback)
    Kamleshwar
    70

    Item Code: #KGP-7068

    Availability: In stock


  • Gujrat : Sahakarita, Samaj Seva
    Neelam Kulshreshtha
    420 357

    Item Code: #KGP-599

    Availability: In stock

    गुजरात गांधी जी, सरदार पटेल, विक्रम साराभाई परिवार, अमूल डेरी, अपनी सहकारिता व औद्योगिक प्रगति के कारण जाना जाता है लेकिन ये बड़े-बड़े नाम हैं । समाज के उत्थान के लिए अनेक लोग अपनी आत्मा में नन्हे-नन्हे दीप संजोए बैठे हैं, गांधी जी के व साहित्यिक मूल्यों को अपने जीवन में जीते हुए । यदि अन्य प्रदेश प्रगति करना चाहते हैं तो इस समृद्धतम प्रदेश गुजरात से संबंधित निम्न बिंदुओं का विश्लेषण करें जिनसे समाज के भौतिक ही नहीं ,मानवता के विकास के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
    ० वडोदरा के महाराजा सयाजीराव तृतीय के शासनकाल की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की जा सकती है। उनकी दी हुई परंपरा के कारण ये शहर 'कलाकारों का मक्का' कहलाता है। लेखिका इसे 'सिटी ऑफ इंटरनेशनल 'सोल्स' कहती हैं ।
    ० गांधी जी की प्रेरणा से भारत  द्वितीय महिला संगठन  'ज्योति संग' की स्थापना हुई व सन् 1920 में एक स्त्री अनुसूइया साराभाई ने टेक्सटाइल मिल की भारत की सर्वप्रथम सबसे वृहद ट्रेड यूनियन संगठित की ।
    ० विश्व भर में लोकप्रिय होती जा रही लोक अदालत को  श्री हरिवल्लभ पारिख ने रंगपुर (क्वांट) स्थित आनंद  निकेतन आश्रम में जन्म दिया  ।
    ० मैग्सेसे पुरस्कार विजेता इला भट्ट की 'सेवा' संस्था सेल्फ एम्प्लॉयड वीमन एसोसिएशन आज़ भी अपनी तरह की विश्व की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है । 
    ० विश्व में संभवतः एकमात्र उदाहरण है यहाँ के शहरों व गांवों में फैला पुस्तकालयों के नेटवर्क का संगठन 'गुजरात पुस्तकालय सहायक सहकारी मंडल' ।
    ० एशिया में सहकारी बैंक अन्योन्य बैंक, महिला सहकारी बैंक व उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा करने वाली जागृत ग्राहक संस्था सर्वप्रथम यहीं संगठित हुई ।
    ० डॉ. जी. एम. ओझा ने भारत ही नहीं, एशिया में भी पर्यावरण संरक्षण की संस्था 'इनसोना' सन् 1975 में यहीं स्थापित की ।
    ० श्री सूर्यकांत पटेल का चालीस एकड़ जमीन में बनाया विश्वविख्यात फार्महाउस वडोदरा में है। 
    ० भारत में महाराष्ट्र में दो, सिर्फ गुजरात में ही तीन स्टॉक एक्सचेंज हैं जहाँ सभी राज्यों से अधिक पैसे का निवेश होता है ।
    ० विकलांगों द्वारा संस्था बनाकर विकलांगों की सहायता के उदाहरण अन्य प्रदेशों में दुर्लभ हैं । 
    ०  'गुजराती नी गजी नो तडियो भा तो नथी' इस कहावत का अर्थ जानिए इस पुस्तक से ।
    ० अस्मिता : गुजरात से एक साहित्यिक आंदोलन' इस पुस्तक से जानिए क्यों 'एक्सेल गुप्त इंडस्ट्रीज' में  प्रबंधन व मज़दूरों का कभी झगड़ा नहीं हुआ ।
    ० विश्यविख्वात आर्कीटेक्ट कर्ण ग्रोवर, जिनके हैदराबाद में बनाए सोहराबजी ग्रीन बिजनेस सेंटर को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ग्रीन बिल्डिंग घोषित किया गया है, व उनके साथियों द्वारा स्थापित हेरिटेज ट्रस्ट के प्रयासों से चांपानेर को वर्ल्ड हेरिटेज साइट घोषित किया गया है । ग्रोवर जी की नई उपलब्धि है कि उनकी बनाई बी एन एमरो बैंक को भी विश्व की पर्यावरण सुरक्षा की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ इमारत घोषित किया गया है । 
    ० यदि किसी शहर का उत्थान करना है तो वडोदरा की स्वयंसेवी  संस्थाओं ‘बड़ौदा सिटिजंस काउंसिल' व 'यूनाइटेड वे ऑफ बड़ौदा' को समझना होगा ।
  • Nahin Koi Ant
    Pratap Sehgal
    80 72

    Item Code: #KGP-1300

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Savyam Prakash
    Swayam Prakash
    200 180

    Item Code: #KGP-56

    Availability: In stock

    भारतीय श्रमिक तथा वंचित वर्ग के कथा-नायकों को जो सत्कार तथा पक्षधरता स्वयं प्रकाश की कहानियों में मिली है, वैसे उजले उदाहरण समकालीन हिंदी कहानी में गिने-चुने ही हैं । इन वंचित वर्गों के स्वपनों को दुःस्वप्नों में बदलने वाली कुव्यवस्था को यह कथाकार केवल चिन्हीत ही नहीं करता, बल्कि इसके मूल में बसे कुकारणों को पारदर्शी बनाकर दिखाता है तथा उस जाग्रति को भी रेखांकित करता है जो कि अंतत: लोक-चेतना का अनिवार्य तत्त्व है । और खास बात यह है कि इस सबके उदघाटन-प्रकाशन में यहाँ लेखक जीवन के हर स्पंदन और उसके आयामों पर कहानी लिखने को उद्यत दिखाई पाता है । अर्थात् सम्यक् लोकचेतना की 'साक्षरता' इन कहानियों में वर्णित जीवन में यथोचित पिरोई गई है ।
    कहानी की कला की गुणग्राहकता से लबरेज ये कहानियां विचारधारा के प्रचार और सदेश के 'उपलक्ष्य' को मिटाकर व्यवहार के धरातल तक पाठक को सहज ही ले जाती है । पात्रों की आपबीती को जगबीती बनाने का संकल्प यहाँ प्रामाणिक रूप में उपस्थित हुआ है।
    स्वयं प्रकाश द्वारा स्वयं चुनी गई 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' हैं-'नीलकांत का सफर', 'सूरज कब निकलेगा', 'पार्टीशन', 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा ?', 'नैनसी का धूड़ा', 'बलि', 'संहारकर्ता', 'अगले जनम', 'गौरी का गुस्सा' तथा 'संधान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Path Prajya (Paperback)
    Veena Sinha
    60

    Item Code: #KGP-7062

    Availability: In stock


  • Yug Nirmata Swami Dayanand
    Jagat Ram Arya
    140 126

    Item Code: #KGP-1005

    Availability: In stock

    युग-निर्माता स्वामी दयानन्द
    यह सचमुच बड़े दुःख और ग्लानि का विषय है कि जिस महान् ऋषि ने अपना जीवन आर्यों की एकता और आर्यावर्त के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया अपनी आवाज की सारी बुलंदी क्रांति घोष करने में लगा दी अपनी समस्त भावनाओं और कल्पनाओं को क्रांति-बीणा के सुर में मिला दिया, उन्हें ही काज लोग धमं-प्रचारक और समाज-सुधारक का दर्जा दिए हुए हैं । इससे यही सिद्ध होता है कि आने वाली आर्य-पीढी को उनकी क्रांतिकारी भावनाओं से परिचित नहीं कराया गया, राष्ट्र-निर्माता के रूप में उनके स्वरुप को उभारा नहीं गया । जबकि सच्चाई यह है कि अगर भारतवासी उनके बताए मार्ग पर चलते तो इसमें संदेह नहीं कि भारत को सी वर्ष पूर्व ही गुलामी से मुक्ति मिल जाती ।

  • Ukaav
    Kshitij Sharma
    250 225

    Item Code: #KGP-765

    Availability: In stock

    उकाव
    'उकाव' पहाडी जिंदगी की गाथा है। एक मायने में उपन्यास की कथा पुरुष-नियंत्रण समाज द्वारा नारी पर थोपे गए उत्पीडक नियमों की भर्त्सना है । नैतिकता के इकहरे मानदंडों के कारण किन्हीं कमजोर क्षणों में हुई एक तथाकथित 'गलती' के प्रतिकार में श्यामा किस तरह सारा जीवन होम कर देती है, लेखक ने इस संघर्ष को इतने मार्मिक और प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया है कि यह पहाडी औरत की जिंदगी का ही दस्तावेज बन गया है । कुमाऊँ के पहाडों का ग्रामीण जीवन जितनी अंतरंगता  और विविधता में इस उपन्यास में चित्रित हुआ है, यह बरबस रेणु और शैलेश मटियानी की याद दिला देता है । संभवत: किसी रचना का आंचलिक बनना इस बात पर निर्भर है कि वह किसी स्थान विशेष के लोगों का चित्रण करते हुए यहीं की भौगोलिक ही नहीं वक्ति सांस्कृतिक और मूल्यगत विशिष्टताओं को कितनी उत्कटता व सघनता से अभिव्यक्त करती है । इस संदर्भ में देखें तो 'उकाव' निश्चित ही एक आंचलिक रचना है, पर तब दुनिया की कौन-प्ती ऐसी रचना है जो इस बात से न पहचानी जाती हो कि उसमें कितनी गहराई और मजबूती से अपने समय और स्थान की पहचान छिपी है ?
    सही मायनों में देखा जाए तो प्रेम, प्रतिकार, बलिदान और संघर्ष की यह गाथा अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई पहाडी औरत के ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय नारी के बहुआयामी व विराट, स्वरूप का दर्शन कराती है । और यही लेखक की सृजनात्मकता की कसौटी है ।
    यह इत्तफाक नहीं है कि क्षितिज शर्मा लेखन की उस परंपरा के अधिक निकट पड़ते है जिसका स्रोत शैलेश मटियानी है । मटियानी जी की रचनाओं में पहाडी जीवन की झाँकी सबसे ज्यादा वास्तविक और प्रामाणिक ढंग से नजर जाती है । क्षितिज शर्मा उस परंपरा को आगे बताते हुए पहाडी गाँवों के संघर्षमय जीवन को जिस तरह से चित्रित करते है, वह मुझ जैसे तथाकथित पहाडियों के लिए भी एक 'रिबिलेशना से कम नहीं है ।
    -पंकज बिष्ट
  • Su-Raaj
    Himanshu Joshi
    80 72

    Item Code: #KGP-2105

    Availability: In stock

    सु-राज
    तीन अलग-अलग उपन्यासिकाएँ होने के बावजूद, कहीं ये एक ही तसवीर में समाई तीन अलग-अलग तसवीरें हैं। रूप, रंग, भावभूमि और निरूपण, सब अलग- अलग हैं। अलग-अलग हैं इनकी पृष्ठभूमियाँ । हिमालय का कुमाऊँनी क्षेत्र है, तराई की अभिशप्त धरा और पश्चिमी नेपाल का अत्यंत पिछड़ा अंचल । अनेक अंतर्विरोध हैं, परन्तु इन भिन्नताओं के बावजूद भी कहीं घोर अभिन्नता । यों अभाव, अन्याय से उपजा मानव-मात्र का संत्रास सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र समान है । यंत्रणाएँ समान हैं ! रूप और आकार में अंतर हो सकता है, परन्तु मनुष्य, सर्वत्र मनुष्य ही है, उसकी वेदना भी सर्वत्र उसी की वेदना है । उसे देश, काल, रूप, रंग, धर्म, भाषा से विभाजित नहीं किया जा सकता ।
    संघर्षरत 'सु-राज' के गांगि 'का हों, या अन्याय की आग में धधकता 'अंधेरा और' का परसिया या 'काँछा' उपन्यासिका का नायक सुदूर नेपाल का अनाथ श्रमिक शिशु काँछा, अपने अस्तित्व के लिए जूझते ये पात्र, मात्र पात्र ही नहीं, तिल-तिल मरकर कहीं अपने समय के 'काल-पात्र' भी हैं ।
    साहित्य में हिमांशु जोशी ने नए-नए प्रयोग किए हैं, उनका एक उदाहरण है यह कृति, जो अतिशय द्रावक ही नहीं, दाहक भी है।
  • Aagaami Ateet
    Kamleshwar
    150 135

    Item Code: #KGP-210

    Availability: In stock


  • Paani Ka Svaad
    Nilesh Raghuvanshi
    125 113

    Item Code: #KGP-9089

    Availability: In stock


  • Gulloo Aur Ek Satrangi : 1 (Paperback)
    Shrinivas Vats
    115

    Item Code: #KGP-7059

    Availability: In stock

    गुल्लू कर्णपुर गांव के किसान विजयपाल का बेटा है। उसका असली नाम गुलशन है, पर सब उसे प्यार से ‘गुल्लू’ ही कहते हैं। उसकी उम्र है लगभग बारह साल। उसकी एक छोटी बहन है राधा। उसकी उम्र आठ साल है। परंतु वह स्कूल नहीं जाती। कारण, उनके गांव में कोई स्कूल नहीं है। उनकी मां को मरे आठ साल हो गए। राधा को जन्म देने के बाद मां चल बसी थी।
    गुल्लू की मां की मृत्यु के बाद उनके पिता ने पास के गांव की सविता नामक एक महिला से पुनः विवाह कर लिया। सौतेली मां घर में आई तो गुल्लू खुश था। उसे भरोसा था कि उसे और उसकी छोटी बहन को मां का प्यार मिल जाएगा। पर सौतेली मां बहुत कठोर स्वभाव की थी। शुरू में कुछ दिन तो ठीक रहा, पर बाद में उसने बच्चों को पीटना शुरू कर दिया। बात-बात में भला-बुरा कहती। यद्यपि किसान के सामने वह लाड़-प्यार का नाटक करती, पर उसके खेत में जाते ही वह बच्चों को डांटना शुरू कर देती।

    -इसी पुस्तक से
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhu Kankaria (Paperback)
    Madhu Kankria
    180

    Item Code: #KGP-414

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : मधु कांकरिया
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार मधु कांकरिया ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'बस…दो चम्मच औरत', 'नंदीग्राम के चूहे', 'चिड़िया ऐसे मरती है', 'अठारह साल का लड़का', 'काला चश्मा', 'चिडिया ऐसे जीती है', 'पोलिथिन में पृथ्वी' तथा 'अन्वेषण'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक मधु कांकरिया की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Neend Se Pahale
    Soma Bharti
    195 176

    Item Code: #KGP-373

    Availability: In stock

    नींद से पहले
    सोमा भारती की कहानियां हमें उस जानी-पहचानी निम्न- मध्यमवर्गीय दुनिया में ले चलती हैं, जिनसे हम जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जिन्हें हम देखकर भी अनदेखा किए रहते हैं।
    इनके पात्र, चाहे वह ‘जस्सो मासी मर गई’ की जस्सो मासी हों या ‘नींद से पहले’ के रमापति, ‘किराये के मकान’ की पेइंग गेस्ट हो या कोई अन्य, मोमबत्तियों की तरह हवाओं में जूझते, जलते-गलते रहते हैं। वे आपसे दया की भीख नहीं मांगते, लेकिन समय, संयोग और नियति ने उन्हें जिस मुकाम पर ला खड़ा किया है, उसका दीदार जरूर कराती हैं कि देखो, यह मैं हूं, यह तुम भी हो सकते थे।
    सोमा ने अभिनय और एंकरिंग आदि अभिव्यक्ति के जिन मंचों पर काम किया है, उसका लाभ उनकी भाषा-भंगिमा, भाव और बोध को मिला है। कहानियों के रचाव-रसाव के लिए सोमा को किसी सायासता की जरूरत नहीं पड़ती, भाषा-शिल्प के दरवाजे नहीं खटखटाने पड़ते, न ही चैंकाने वाले चमत्कारों के टोने-टोटके टटोलने की आवश्यकता होती है। कहानियों की सहज संवेदना ही उनकी शक्ति है, जिनकी तासीर खुद-ब-खुद आपको पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है।
    सोमा की कहानियां फास्ट ट्रैक की कहानियां नहीं हैं। जिंदगी की पहेलियां और अनिर्णय की धुंध, ठहरी- ठहरी-सी गति, ऊंघते-ऊंघते-से कस्बाई परिवेश और रिसते-रिसते-से यथार्थ! सोमा ने दूसरी कहानियां न भी लिखी होतीं, उनकी अकेली कहानी ‘जस्सो मासी मर गई’ ही उन्हें अमर बना सकती है।
    --संजीव
  • Saphalata Ka Rahasya
    Jagat Ram Arya
    125 113

    Item Code: #KGP-99

    Availability: In stock

    सफलता का रहस्य
    जीवन में सफलता की चाहना सब रखते हैं, लेकिन सफल हो नहीं पाते। ऐसा न होने पर कोई भाग्य को कोसता है, कोई हालात को। जबकि सफलता हमारे अपने व्यवहार पर ज्यादा निर्भर है, न कि किन्हीं और बाह्य कारणों पर।
    सफलता के आधारभूत सूत्र हैं-शुद्ध व्यवहार, सीखने की प्रवृत्ति, आत्मनिर्भरता, संतोष तथा और भी बहुत कुछ।
    आर्य जी ने अपनी इस पुस्तक में सफलता के रहस्यों की सरल-सुबोध भाषा में व्याख्या की है। पुस्तक पठनीय तो है ही, जीवन से लिए गए सच्चे उदाहरणों के चलते संग्रहणीय भी बन पड़ी है।
  • Vishwa Ki 51 Chuninda Kahaniyan (Paperback)
    Surendra Tiwari
    450

    Item Code: #KGP-391

    Availability: In stock


  • NATOHAM
    Meenakshi Swamy
    500 450

    Item Code: #KGP-1555

    Availability: In stock

    लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का बहुचर्चित उपन्यास 'नतोअहं ' भारतभूमि के वैभवशाली अतीत और वर्तमान गौरव के सम्मुख विश्व के नतमस्तक होने का साक्षी है। यह भारतीय संस्कृति की बाह्म जगत् से आंतरिक जगत् की विस्मयकारी यात्रा करवाने की सामर्थ्य के अनावरण का अद्भुत परिणाम है।
    भारतीय संस्कृति के विराटू वैभव का दर्शन होता है—संस्कृतिक नगरी उज्जयिनी में बारह वर्षों में होने वाले सिंहस्थ के विश्वस्तरीय आयोजन में। उज्जयिनी का केंद्र शिप्रा है। इसके किनारे होने वाले सिंहस्थ में देश भर के आध्यात्मिक रहस्य और सिद्धियां एकजुट हो जाती हैं। इन्हें देखने, जानने को विश्व भर के जिज्ञासु अपना दृष्टिकोण लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। तब इस पवित्र धरती पर मन-प्राण में उपजने वाले सूक्ष्मतम भावों की सशक्त  अभिव्यक्ति है यह उपन्यास ।
    इसमें मंत्रमुग्ध करने वाली भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म के सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक चिंतन  है, भारतीय अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं को खरेपन के साथ उकेरा गया है।
    उज्जयिनी अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह की साही है। यह केवल धर्म नहीं, समूची संस्कृति है, जिसमें कलाएं हैं, साहित्य है, ज्ञान है, विज्ञान है, आस्था है,  परंपरा है और भी बहुत कुछ है। यात्रा वृत्तांत शैली के इस उपन्यास में उज्जयिनी के बहाने भारतीय दर्शन, परंपराओं और संस्कृति की खोज है जो सुदूर विदेशियों को भी आकर्षित करती है। उज्जयिनी के लोक जीवन को झांकी के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का सतत आख्यान है जो पुरा मनीषियों की मेधा का महकता प्रतीक है।
    उपन्यास के विलक्षण कथा संसार को कुशल लेखिका ने अपनी लेखनी के संस्पर्श से अनन्य बना दिया है। नायक एल्विस के साथ पाठक शिप्रा के प्रवाह में प्रवाहित होता है, डुबकी लगाता है।
    'भूभल' जैसे सशक्त उपन्यास से कीर्ति पाने के बाद बहुचर्चित रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का नवीनतम उपन्यास 'नतोअहं ' तथाकथित आधुनिकता से आक्रांत भारतीय जनमानस की अपनी जडों की ओर आकृष्ट करता है। भारतीय संस्कृति व अध्यात्म की खोज में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अप्रतिम उपहार है।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ramesh Bakshi
    Ramesh Bakshi
    200 180

    Item Code: #KGP-66

    Availability: In stock

    हिंदी के विवादास्पद एवं विख्यात कथाकार रमेश बक्षी की दस प्रतिनिधि कहानियों का यह संचयन कथाकार की उस दुनिया का साक्ष्य भी है, जिससे पैठकर वह असंभव कथ्यों को पाठक वर्ग के समक्ष उदघाटित एवं प्रकाशित करता है । आत्मबोध से उपजी इन कहानियों से लेखक का जो आत्मज्ञान झसता है, वह समकालीन स्त्री-पुरुष संबंधों के संसार को नई परिभाषा, व्याख्या और नैतिकता में रूपायित करने का समुन्नत कथा-उपक्रम है, जिसे सम्यक अर्थों में हम प्रगतिशील कथाक्रम के वर्ग से रख सकते हैं ।
    ये कहानियाँ किसी विरक्त, त्यागी या सन्यासी व्यक्तित्व के विषयमुक्त होने के कथा-चित्र, नहीं है, बल्कि संबंधों के बीच पनपते उपद्रवों का सामना करते चरित्रों की सच्चाइयां है । समकालीन समाज ने अपने जीने के लिए जिस परिवेश की सृष्टि कर ली है, उसमें क्या ठोस है, क्या खोखला तथा क्या मान्य और क्या त्याज्य है-इन विषयों पर बेधक संकेत और संदेश इन कहानियों के मूल में समाहित और प्रवाहित हैं ।
    रमेश बक्षी की सजग कथाकार-दृष्टि को समेटे जिन दस कहानियों को यहीं प्रस्तुत किया जा रहा है, वे हैं- 'मेज़ पर टिकी हुई कुहनियाँ', 'जिनके स्थान ढहते हैं....', 'एक अमूर्त तकसीफ', 'राख', 'खाली', 'आम-नीम-बरगद', 'पैरोडी', 'थर्मस  में कैद कुनकुना पानी', 'अगले मुहर्रम की तैयारी' और 'उतर' । संकलन के प्रस्तोता डॉ. बलदेव वंशी ने अपने इस समकालीन लेखक की कहानियों पर विस्तृत एवं आत्मीय टिप्पणी भी प्रस्तुत की है ।
    आशा है हिंदी कथा-जगत का संवेदनशील पाठक-समाज अपने समय के इस महत्त्वपूर्ण कथाकार को किताबघर प्रकाशन की महत्त्वाकांक्षी  कथा-श्रृंखला 'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' की एक कड़ी के रूप में पाकर निश्चय ही संतुष्ट होगा ।
  • Baal Vigyan Kathayen : Science In Twentieth Century : An Encyclopedia-4
    Shuk Deo Prasad
    600 540

    Item Code: #KGP-608

    Availability: In stock

    विज्ञान कथाओं के अधिष्ठाता वर्न जब अवसान की ओर अग्रसर थे, तभी विज्ञान कथाकाश में एक ब्रितानी नक्षत्र एच. जी. वेल्स उभरा, जिसने इस विधा को त्वरा तो दी ही, वर्न की परंपरा का नैरंतर्य भी भंग न होने दिया । वस्तुतः आधुनिक काल में वर्न  और वेल्स ने  विज्ञान कथाओं की आधारभूमि के लिए जो विचार-सरणियाँ निर्मित कीं, फलस्वरूप दुनिया की तमाम भाषाओं में विज्ञान कथाएं लिखी जाने लगीं। 
    निस्संदेह विज्ञान-गल्प-लेखन एक ऐसी सरस और रोचक विधा है, जो बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करने के साथ-साथ ज्ञान के नए-नए गवाक्ष खोलने में सक्षम है बशर्त वैज्ञानिक तथ्यों का अतिरेक न हो । विज्ञानं गल्पकारों का दायित्व रंजन-मनोरंजन के साथ अंधकार कारा का निवारण भी है । 
  • Chor Darvaazaa
    Jiten Thakur
    225 203

    Item Code: #KGP-292

    Availability: In stock

    जितेन ठाकुर की कहानियां यह स्थापित करती हैं कि कहानी एक निरंतर बदलने वाली विधा है जो किसी परंपरा की मोहताज नहीं होती क्योंकि कहानी अपने समय को यदि रूपायित नहीं करती और अपने काल की त्रसदी को नहीं पहचानती, तो उस समय और उस दौर का पाठक भी कहानी को पहचानने से इनकार कर देता है।
    जितेन ठाकुर ने परंपरापूरक यथार्थवाद को नकार कर अपने अंदर और बाहर के यथार्थ को समेटा है। वे पाठक को उसी तरह परेशान करते हैं जैसे उसका समय उसे त्रस्त करता है और उसी तरह निष्कर्षवाद को नकारते हुए जितेन की कहानियां उस अन्विति पर पहुंचती हैं, जिन्हें पाठक महसूस तो करता है पर शब्द नहीं दे पाता। शायद इसीलिए ये कहानियां एक लेखक की कहानियां न होकर अपने समय के जीवंत और अपने समय को विश्लेषित करने वाले समय के मित्र रचनाकार की कहानियां हैं।
    लेखकों की, लेखकों द्वारा, लेखकों के लिए लिखी गई ये झूठे साहित्यिक प्रजातंत्र की कहानियां न होकर, उस मानसतंत्र की कहानियां हैं जो आज के भयावह यथार्थ को केवल उजागर ही नहीं करतीं बल्कि पाठकविहीन एकरसतावादी कहानियों की जड़ता को तोड़ते हुए यह साबित करती हैं कि कहानी अपने समय के मनुष्य की तमाम बेचैनियों और भयावहता को वहन करते हुए उसी मनुष्य को अपने समय को समझने और उसके संत्रस्त अस्तित्व को एक नई दृष्टि देने की भूमिका अदा करती हैं।
    क्या इतना बहुत नहीं है कि अपने समय के इस मित्र रचनाकार ने कहानी की विगलित और परंपरापूरक अपेक्षाओं से हटकर, अपने समय के मनुष्य का साथ दिया है?
  • Chintan Karen Chintan Mukt Rahen
    Swed Marten
    150 128

    Item Code: #KGP-279

    Availability: In stock

    चिंता और चिंतन एक ही माँ की दो संतानें हैं । चिंताग्रस्त व्यक्ति चिंतित रहते हैं और सफल नहीं होते, क्योंकि उन्हें चिंता हर समय असफलता की ओर धकेलती रहती है । परंतु जो व्यक्ति चिंता को भूलकर चिंतन करते  हैं, वे संसार में सफलता प्राप्त करते हैं और अपना नाम अमर कर जाते हैं ।
  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 2 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    270

    Item Code: #KGP-304

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (2)
    (आजादी के नीतिकार)
    आँखों देखे ये वृत्तांत स्मृतियों के जीवत कालखंड भी है । इनमें राजनीतिक हलचलें हैं तो आत्मीयता यानी अपनेपन में पगी अविस्मरणीय, दुर्लभ घटनाएँ भी ।
    सूमित्रा जी साक्षी रहीं उस परिवर्तन के दौर की, इसलिए उनकी दृष्टि व्यापक एवं विस्तृत रही । उन्होंने सीमित दायरे के बावजूद असीमित परिधि को छुआ है । इसलिए गांधी जी को समझने में यह कृति हर अर्थ में सहायक सिद्ध होगी ।
    उस दौर में विश्व में क्या-क्या हुआ, उसका सहज आकलन भी इनमें दीखता है । 'जलियाँवाला बाग़' नरसंहार के दिल को दहला देने वाले दृश्य ! डेढ़ हजार से अधिक निर्दोष लोग भून दिए गए । जनरल डायर की इस दानवीय लीला ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया था ।
    'साबरमती आश्रम' गांधीवादी विचारों की प्रयोगशाला बना । चंद्रभागा और साबरमती नदी के बीच, बबूल की कँटीली झाडियों कै पार्श्व में एक नए संसार की साधना हुई-खुले आसमान के नीचे ।
    यह आश्रम कब तीर्थ बना, पता ही नहीं चला । 
    'चंपारण', 'खेड़ा सत्याग्रह', 'साइमन कमीशन’, 'नोआखली', 'बिहार को कौमी आग' अनेक प्रसंग हैं, जो अनेक अर्थों से उल्लेखनीय है ।
    सुमित्रा जी ने गांधी जी के उन पक्षों पर भी प्रकाश डाला, जो महत्त्वपूर्ण है, जिनके बारे में लोग अधिक नहीं जानते । क्योंकि उन्होंने यह सब स्वयं घटित होते देखा है, इसलिए प्रामाणिक भी कम नहीं ।
    हैदराबाद रियासत का भारत में विलय-प्रसंग भी कम रोचक नहीं । कासिम रिजवी का दिल्ली के लाल किले पर अपना झंडा फहराने का सपना सपना ही रह गया । हैदराबाद मुक्ति के पश्चात सरदार पटेल ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर दिल्ली बुलाया । लाल किले पर तो कासिम अपनी ध्वजा नहीं फहरा पाए, हाँ, लाल किले के तहखाने में कैद कर उसे अवश्य रखा गया । उन पर मुकदमा चला और आजीवन कैद की सजा मिली ।
    ऐसे अनेक प्रसंग, विचारोत्तेजक ।
    --हिमाशु जोशी
    15 अगस्त, 2009
  • Toro Kara Toro-1 (Nirman)
    Narendra Kohli
    500 425

    Item Code: #KGP-1574

    Availability: In stock


  • Dainik Jeevan Mein Ayurveda
    Vinod Verma
    500 450

    Item Code: #KGP-9149

    Availability: In stock

    दुर्भाग्य की बात है कि आयुर्वेद का असीमित ज्ञान इस देश की संचालन-व्यवस्था में समुचित प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आयुर्वेद के विकास तथा प्रचार-प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। हमारी शासन-व्यवस्था भी इस ओर उदासीन रही। आयुर्वेद को ‘देशी’ कहकर उपेक्षित कर दिया गया। किंतु आज जिस नए युग का प्रारंभ हो रहा है उसमें हमारा पुनर्जागरण सुनिचित है जिसमें हमें आभास होगा कि जिसे हमारे देशवासियों ने ‘देशी’ कहकर त्याग दिया था उसी को विदेशी लोग अच्छे आवरण में डालकर हमें बेच रहे हैं। ‘दादी मां’ की परंपरा अर्थात् आयुर्वेद का सामान्य ज्ञान, जो हमारे जीवन से दूर होता जा रहा है, उसे हमारी शिक्षा-प्रणाली में सम्मिलित किया जाय। इस दृष्टि से स्कूलों तथा मेडिकल काॅलेजों के पाठ्यक्रमों में आयुर्वेद के कुछ महत्वपूर्ण अंश पढ़ाए तथा सिखाए जाने चाहिए। आयुर्वेद के जिज्ञासुओं और अनुसंधित्सुओं के लिए उपयोगी जानकारी देने और तत्संबंधी अज्ञान को दूर करने में सहायक प्रस्तुत ग्रंथ इस विषय की विदुषी सुश्री विनोद वर्मा की अनूठी कृति है।
  • Mere Saakshatkaar : Vishnu Prabhakar
    Vishnu Prabhakar
    300 270

    Item Code: #KGP-2038

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : विष्णु प्रभाकर
    गांधीवादी चिंतक, विचारक, लेखक विष्णु प्रभाकर ने जितना साहित्य रचा है, उससे कम बोला भी नहीं कहा जा सकता ।
    सन् '52 में विष्णु जी का पहला साक्षात्कार पदूमसिंह शर्मा 'कमलेश' ने लिया था । उसके बाद अब तक न जाने कितने वार्ताकारों ने विष्णु जी को अपने समय, समाज और यादों के पिटारे को आने पर बाध्य किया है ।
    वार्ताकार अपनी और से कुछ नया, कुछ महत्वपूर्ण जानने ही किसी विशिष्ट जन के पास जाता है, पर क्या हर बार ऐसा हो पाता है कि विशिष्ट जन कुछ अनकहा कह पाया हो ? प्रस्तुत पुस्तक में विष्णु जी के कई ऐसे साक्षात्कार है जिनके जवाबों ने तो पाठकों को चौंकाया ही, जिनके सवालों ने स्वयं विष्णुजी को भी कम हैरत में नहीं डाला । पुस्तक की भूमिका में उन वार्ताकारों का, उनके सवालों का और उनके सरोकारों का उल्लेख करना ही इस बात का पुख्ता  प्रमाण है कि वार्ताकार ने वार्तादाता को कितना मथा ।
    विष्णु प्रभाकर न सिर्फ गांधीवादी लेखक-चिंतक है, वे बांग्ला उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवनीकार, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, मसिजीवी, यायावर, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध और साठित्य की विविध विधाओं के सर्जक हैं । स्वाभाविक है, विष्णु जी की वार्ताओं में न केवल हमारा निकट अतीत, विकट वर्तमान और संकटग्रस्त भविष्य उजागर हुआ है, साहित्य के सरोकार, एक लेखक का संधर्ष और साहित्य की धरोहर भी उजागर हुई है ।
    संकलित साक्षात्कार पाठक तक उतना कुछ थोंड़े में पहुंचाने में समर्थ हैं, जितना कुछ कई योगियों में दर्ज करने पर भी न पहुँच पाया होगा ।
  • Urgent Meeting (Paperback)
    Jaivardhan
    50

    Item Code: #KGP-7092

    Availability: In stock

    नाटक कैसा हो ? हमेशा चर्चा का विषय रहा है । आगे  भी इस पर चर्चा होगी । नाटक ऐसा हो, वैसा हो। कथानक ऐसा हो । ताना-बाना ऐसा हो । भाषा ऐसी हो। चरित्रों का विकास ऐसा हो। कभी-कभी सरे मापदंड, सारे व्याकरण फेल  हैं, जब किसी लंबी कविता, कहानी को मंच पर प्रदर्शित कर दिया जाता है अथवा किसी कथानक को एकल-नाटक के रूप में प्रस्तुत कर दिया  जाता है । 
    इस नाटक की पृष्ठभूमि दिल्ली की है । अधिकांश चरित्र भी दिल्ली के हैं । 
  • Million Dollar Not Tatha Anya Kahaniyan (Paperback)
    Malti Joshi
    60

    Item Code: #KGP-1419

    Availability: In stock

    मिलियन डॉलर नोट तथा अन्य कहानियां
    अम्मा ने जैसे ही पाउच आगे बढाया, मीनू ने एक झटके से हाथ हटा लिया, जैसे उसे बिजली का करंट लग गया हो, "नहीं अम्मा । अब मैं यह हार नहीं लूंगी ।"
    "क्यों? मेरी चीज है । मैं दे रही हूँ।"
    "हाँ, पर इस हार को लेकर तुम पता नहीं क्या-क्या सोच गई थीं। तुमने तो भाभी को भी कठघरे में खडा कर दिया था । कल को भाभी भी ऐसा कर सकती है । भाभी तो यही सोचेगी कि यह चीज तीन साल पाले ही तुमने मुझे दे दी होगी और किसी को बताया तक नहीं । वह तो सोचेंगी कि इस तरह तुमने और भी बहुत कुछ दिया होगा, जिसका उसे पता नहीं है । मैं तो शर्म के मारे भैया के सामने खडी भी न हो सकूंगी।  "
    "इसमें शर्म की क्या बात है ! क्या मुझे इतना भी हक नहीं है ?”
    "अम्मा, तुम्हारे हक से भी महत्त्वपूर्ण है भैया-भाभी का विश्वास, जो मैं तोड़ना नहीं चाहती । रिश्ते नाजुक होते हैं अम्मा, दर्पण की तरह । एक बार दरक गए तो किसी मतलब के नहीं रहते । और मैं इन रिश्तों को सहेजना चाहती हूँ। मैं चाहती हूं कि तुम्हारे जाने के बाद भी इस घर में मेरा दाना-पानी बना रहे । मैं जब-जब भारत आऊं, इस घर के दरवाजे मुझे खुले मिले ताकि मैं तुम्हारी यादों को फिर से जी सकूं । कल को मेरे बच्चों की शादियां हों तो मैं हक के साथ भात मांगने आ सकूं । ये मेरे पीहर की देहरी है अम्मा । मेरे लिए किसी भी हार से ज्यादा कीमती है । प्लीज, इसे मुझसे मत छीनो ।" और यह बात कहते- कहते मीनू का गला भर आया । आंखें छलछला आईं ।
    अम्मा ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया और उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोली, "अरे वाह, मेरी लाडो तो मुझसे भी ज्यादा समझदार हो गई है ।" और यह कहते हुए उनकी भी आवाज भीग गई थी। 
    -(इसी संग्रह की कहानी 'चंद्रहार' से)
  • Kavi Ne Kaha : Neelesh Raghuvanshi
    Nilesh Raghuvanshi
    240 216

    Item Code: #KGP-7816

    Availability: In stock

    किसी कवि का कथन है कि कविता हमारे चारों ओर चीज़ों, घटनाओं, गतियों, स्थितियों, ध्वनियों, आहटों और अंतरालों में हर समय मौजूद होती है, वह हमारे आसपास तैरती रहती है और एक समर्थ कवि उसे पहचानकर एक परिचित शक्ल दे देता है। नीलेश रघुवंशी अपने दौर के पुरुष और महिला कवियों से इस रूप में अलग हैं कि उनके लिए कविता हमारे सामान्य निम्नमध्यवर्गीय जीवन से अलग, विभिन्न या उससे उच्चतर काम नहीं है बल्कि वह उसी जीवन के भीतर घटित होती है। उनकी कविता अपने समय के भौतिक और मानसिक द्वंद्वों को अनदेखा करके अभिव्यक्ति का कोई अपरिचित लोक नहीं रचती। वह जीवन को जारी रखने वाले कामों का निषेध नहीं करती बल्कि उन्हीं कामों में से अपने को उत्पन्न करती रहती है।
    --मंगलेश डबराल

    जीने की उष्मा और ललक से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में नीलेश की नई पहचान को रेखांकित करती हैं। ‘पहली रुलाई तक की डायरी’ जैविक स्त्री-बोध का क्रमिक दस्तावेज है, जो शायद हिंदी में पहली बार इतनी प्रामाणिकता के साथ दर्ज हुआ है। इस काव्यात्मक डायरी को जो बात सबसे अधिक  विश्वसनीय बनाती है, वह अजन्मे शिशु के साथ माँ की वह चुहल है, जो प्रायः इसके हर टुकड़े में मिल जाएगी। ‘जन्म देना एक यातना से गुजरना है’--इस पंक्ति को लिखने वाली यह कवयित्री ही यह क्रीड़ाभरी पंक्ति भी लिख सकती है--‘मैं लिख रही हूँ डायरी और तुम बंदर बने हुए हो--तुमने तो मेरे पेट को खेल का मैदान बना रखा है।’ जन्म देने के सर्जनात्मक उल्लास से भरी ये कविताएँ समकालीन कविता में कुछ नया जोड़ती हैं।    
    --केदारनाथ सिंह


  • Mere Saakshatkaar : Ramdarash Mishra
    Ramdarash Mishra
    275 248

    Item Code: #KGP-217

    Availability: In stock


  • Nayi Kahani Ki Sanrachana
    Hemlata
    600 540

    Item Code: #KGP-876

    Availability: In stock

    नई कहानी की संरचना
    इतिहास के वे क्षण अति महत्त्वपूर्ण होते है जो संकट और परिवर्तनों के क्षण होते है । ऐसे समय में ही पुरानी व्यवस्था को पीछे ढकेलकर नई व्यवस्था आगे आती है और परंपरागत अनेक रूढ तथा गतिहीन तत्त्व पीछे छुट जाते हैं और उनके स्थान पर नए यथार्थ से उदूभूत नए तत्त्व परंपरा का जीवंत अंश वन जाते हैं । इनसे मानव संबंधों के लिए नई भूमिका बनती है, नए मानव का जन्म होता है । इस संधिकाल में वहीं साहित्यकार सफल होता है जो तत्कालीन जीवन यथार्थ को अपने साहित्य के माध्यम से व्यक्त करता है ।
    साहित्य में निहित 'समय सत्य' को पहचानना और उदघाटित करना आलोचक का धर्म है । आलोचक यदि कृति मेँ निहित जीवन सत्य की उपेक्षा करके अपने दृष्टिकोण के संदर्भ में कृति का विश्लेषण करता है तो कृति के साथ न्याय नहीं कर पाता ।
    स्वातंत्र्योत्तर युग से जिस समय यथार्थ का दर्शन तत्कालीन कथा साहित्य में हुआ, वह रचनाकार ने स्वयं  होता था और यहीं कारण है कि उसकी अभिव्यक्ति भी उससे प्रभावित हुई । तत्कालीन साहित्यकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति की भिन्नता का विश्लेषण भी प्राचीन मानद्रडों के आधार पर संभव नहीं था, विशेष रूप से कथा साहित्य का, जिसे 'नई कहानी' नाम से जाना गया ।
    'नई कहानी' के माध्यम से व्यक्त भावबोध ने उसकी अभिव्यक्ति शैली को प्रभावित किया । भाव और शैली ने सम्मानित रूप से समय यथार्थ का चित्रण किया । यहीं कारण है कि कहानी विश्लेषण के परंपरागत मानदंड इन कहानियों के विश्लेषण के लिए सक्षम नहीं थे । 'नई कहानी' के विश्लेषण के भिन्न मानदंडों का आश्रय लिया गया जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए थे । इस पुस्तक में उन्हें मानदंडों को खोज करने का प्यास है जो उन कहानियों में से ही निसृत हुए हैं और 'नई कहानी की संरचना' से जिनका विशेष महत्त्व रहा है ।

  • Jangal Ke Jeev-Jantu
    Ramesh Bedi
    450 405

    Item Code: #KGP-820

    Availability: In stock

    अधिकांश जीवो की जानकारी देते हुए लेखक ने वन्य-जीवन के अपने अनुभवों का ही सहारा लिया है। पुस्तक को पढ़ते समय जंगल के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। जंगल के रहस्य-रोमांच का ऐसा जीवंत वर्णन इस पुस्तक में किया गया है कि जंगल की दुनिया का चित्र आंखों के सामने साकार हो जाता है। 
    जंगली जीवांे के बारे में लोक-मानस में प्रचलित कई अंधविश्वासों और धारणाओं का उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर खंडन कर सही तस्वीकर पाठकों के सामने रखी है। जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरते जन्तुओं के जीवन पर आधारित यह पुस्तक पाठक को आद्योपांत अपनी विषय-वस्तु में रमाए रखती है। यह हमं वनों, वन्य-जीवों और पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करने की प्रेरणा देती है।
  • Pyar Botsavana Kee Baarish Jaisa Hey (African Stories)
    Urmila Jain
    350 315

    Item Code: #KGP-9028

    Availability: In stock

    ‘प्यार बोत्सवाना की बारिश जैसा है’ अत्यंत संवेदनशील अफ्रीकी कहानियों का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद और संपादन उर्मिला जैन ने किया है। वे देशी और विदेशी साहित्य की मर्मज्ञ हैं। पाठक के रूप में जिन रचनाओं ने उनके हृदय को छुआ उन्हें व्यापक पाठक वर्ग के लिए वे इस संकलन में प्रस्तुत कर रही हैं। अनूदित रचनाओं की लोकप्रियता के बावजूद हिंदी में अफ्रीकी कहानियां बहुत कम उपलब्ध हैं। विश्व का यह भाग अपनी संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए रेखांकित किया जाता है। केन्या, गांबिया, गिनी, नाइज़ीरिया, सेनेगल, बोत्सवाना आदि की रचनाशीलता से उर्मिला जैन ने बारह कहानियां चुनी हैं।
    ये कहानियां बताती हैं कि भाषा, देश, पहनावा, आचार, परंपरा आदि की भिन्नताओं के बाद भी मूलभूत समस्याएं और संवेदनाएं तो एक जैसी हैं। अभाव, उपेक्षा, गुलामी, अपमान, निराशा से हर जगह मनुष्य जूझ रहा है। व्यक्ति के भीतर छिपे पाखंड भी हर स्थान पर लगभग समान हैं। संकलन की शीर्षक कहानी के वाक्य हैं, ‘मैंने अपनी पोशाक सावधानी से चुनी थी। अपने भय को सम्मानित रूप में ढका था।’ अनुवाद करते समय उर्मिला जैन ने मूल भाषा के प्रवाह और आशय को भली-भांति संप्रेषित किया है। ‘काली लड़की’ कहानी की डिऔआना का संताप इन पंक्तियों में प्रकट हुआ है, ‘उस रात उसने अपना सूटकेस खोला। उसके अंदर की चीजों को देखा और रोई। किसी ने परवाह नहीं की। फिर भी वह उसी प्रवाह में बहती रही और दूसरों से वैसे ही दूर रही जैसे उसके गांव कासामांस में समुद्र किनारे घोंघे पड़े रहते हैं।’
    अपनी प्रखर कथाभूमि और मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण ये कहानियां पाठकों को खूब अच्छी लगेंगी। ऐसा लगेगा जैसे वे अपने ही समाज या देश का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। ये रचनाएं विचार और संवेदना के वैश्विक सूत्र प्रदान करती हैं।
  • Mahaan Sant Raidas
    Hari Krishna Devsare
    150 135

    Item Code: #KGP-208

    Availability: In stock


  • Tal-Ghar
    Deepak Sharma
    175 158

    Item Code: #KGP-1835

    Availability: In stock


  • The Great Horizon (Biography)
    Debabrata Dasgupta
    225 203

    Item Code: #KGP-342

    Availability: In stock

    The Great Horizon is a biographical novel on Sir Alexander Fleming, a Scottish biologist and pharmacologist. His best-known discoveries are the discovery of the enzyme lysozyme and the antibiotic substance penicillin from the mold Penicillium notatum, for which he shared the Nobel Prize in Physiology or Medicine in 1945 with Howard Florey and Ernst Chain.
    Discovery of penicillin has come naturally as a life-giver to mankind. Disease-torn distressed humans have got a means of longevity through this life-saver. It has contributed in no less measure, to the average human longevity crossing the figure of seventies. The bright rays of the antibiotics have dispersed the dark clouds of sickness and diseases, which overcast the sky of human destiny. All this has been made possible due to the physician named Alexander Fleming who discovered it in 1928 and unfolded a new horizon.
  • Sarak Durghatnon Se Kaise Bachen
    E.W. Saxbi
    40

    Item Code: #KGP-920

    Availability: In stock


  • Zalzala
    Gulshan Rai Monga
    60 54

    Item Code: #KGP-2057

    Availability: In stock

    एक अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए आदमी को जिन चीजों की तवक्को रहती है मसलन महानगर में अपना निजी फ्लैट, गाड़ी, चलता हुआ व्यवसाय, वह सब उसे हासिल था । संतुष्टि के लिए पर्याप्त प्राप्य। 
    भीतर यह जो आत्मा है इतने पर संतोष कर ले यह आवश्यक नहीं है । उसकी अपनी इच्छाएं, वृत्तियां, संस्कार और जरूरतें हैं जिन्हें 'सप्रैस' करने में कोई औचित्य नहीं है । ऐसा प्रयास किसी ओर से भी किया जाए तो आत्मा विद्रोह कर देती है और इस विद्रोह की परिणति होती है एक गहरी सोच में । इस जीव-जगत में अपने होने की अर्थवत्ता अर्थात इस संसार में  के मकसद की तलाश। 
    इस दिशा में गजानन की सफलता-असफलता का लेख-जोखा करने की जुर्रत की गयी है । यह चरित्र अपनी तमाम कमियों, कमजोरियों  और कुछ अच्छाइयों के साथ आपके (पाठकों के) निर्णय का मोहताज है जिसे उसके आंतरिक और बाह्य परिवेश में रखते हुए उसके साथ सहानुभूति, नफरत अथवा प्यार करना आप पर निर्भर करता है । 
  • Kavi Ne Kaha : Vinod Kumar Shukla
    Vinod Kumar Shukla
    190 171

    Item Code: #KGP-385

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : विनोद कुमार शुक्ल
    यद्यपि कविताओं का चयन मैंने किया है, पर इसका आधार स्पष्ट नहीं है कि इन चुनी हुई कविताओं को बाकी कविताओं में मिला दूं और इन्हें फिर से पूरा चुन लूं । दुबारा चुनते समय कुछ कविताएं जरूर बदल जाएंगी । कूल सत्तावन, इतनी कविताएं हैं । कोई कविता वैसे पूरी नहीं होती पर उसके लिखने का अंत है । कुछ लिखना बचा हुआ प्रत्येक कविता के अंत के साथ रहता है । लिखने के इस छूटे रहने के साथ कविता पूरी होती है । प्रत्येक कविता का लिखना बचा हुआ, अभिव्यक्ति का बचा हुआ भी होता है जो पाठक की समझ से पूरा होता है । एक रचना की पूर्ति अलग-अलग पाठकों में अलग-अलग होती है । मैं दूसरों की कविता पढ़ने के बाद अपने लिए इसी तरह उसमें जगह पाता हूं। इस जगह मैं भटकता हूं। जहाँ पहुंचना था वहां पहुंच गए ऐसा कभी नहीं होता, परंतु भटकने की जगह जानी-पहचानी जरूर हो जाती है । भटकने की जगह का जाना-पहनाना हो जाना अच्छा लगता है, इसलिए भटकना भी । कविता मेरे लिए दुनियादारी है, और लिखना भी ।
  • Samkalin Sahitya Samachar January, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #January, 2017

    Availability: In stock

  • Himalaya Gaatha (2) Parv-Utsav
    Sudarshan Vashishath
    300 270

    Item Code: #KGP-167

    Availability: In stock


  • Hamse Hai Paryavaran
    Anku Shree
    140 126

    Item Code: #KGP-495

    Availability: In stock

    पर्यावरण के अनेक घटकों में मनुष्य भी एक है। मनुष्यरूपी बुद्धिमान प्राणी द्वारा पर्यावरण की अन्य इकाइयों का उपयोग किया जाता है। यह उपयोग ही पर्यावरण का संचालन है। इससे पर्यावरण प्रभावित होता है। यह प्रभाव कुप्रभाव भी हो सकता है। इसी कुप्रभाव को हम पर्यावरण का प्रदूषण कहते हैं।
    प्रदूषण नहीं होना और उसके प्रभाव से पर्यावरण को बचाना मनुष्य का कर्तव्य है। आज का बालक की कल का मनुष्य है। इसलिए बालकों और युवाओं को इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
    प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है। हालांकि यह सभी वर्ग के पाठकों के लिए समान रूप से रुचिकर और उपयोगी लगेगी।
    पुस्तक को बाईस शीर्षकों में बांटा गया है। प्रतयेक शीर्षक अलग-अलग आलेख हैं। फिर भी कुछ बातें प्रसंगवश एक से अधिक आलेखों में आ गई हैं किंतु सारे तथ्य प्रसंगवश रहने के कारण आलेख की रोचकता में कमी नहीं आने पाई है।
    —अंकुश्री
  • Jeet Ki Raah
    Swed Marten
    200 180

    Item Code: #KGP-857

    Availability: In stock

    पुस्तक में स्वेट मार्डन जैसे महान् व्यक्तित्व के आधुनिक विचारों के साथ भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से प्रेरित विचारों का मिला-जुला संगम है, ठीक गंगा-यमुना की भाँति पावन व पवित्र । एक जोर से विद्धान् स्वेट मार्डेन की विचाररूपी गंगा एवं दूसरी ओर से भारतीय विचारों की सरिता यमुना का जल आकर मिल गया है इस 'जीत की राह' में।
    इस पुस्तक का वास्तविक शीर्षक है 'जीत की राह', परंतु इससे
    अधिक आकर्षक है 'स्वेट मार्डन : सूक्तियाँ व प्रेरक विचार'।  इस पुस्तक
    में स्वेट मार्डन की तीन पुस्तकों क्रमश 'The Conquest of Worry', 'He can who think he can', 'To succeed in Life' में से उनकी
    सूक्तियाँ व प्रेरक विचार संगृहीत किए गए हैं।
  • The Hanuman Factor (Paperback)
    Anand Krishna
    195

    Item Code: #KGP-336

    Availability: In stock

    “Chaaron Jug Parataapa Tumhaaraa, Hai Parasidha Jagata Ujiyaaraa.”
    “Your glory is sung far and wide, and in all four ages; and, your radiance known to illumine the whole universe.”
    Shree Hanuman Chalisa (The Forty Verses of Hanuman) written towards the end of Tulasidas’s life is, perhaps, one of his last works. By this work, the great poet-cum- saint takes the reader back to a time where Truth is still pure, undiluted, free, and its movements not restricted by human logic and facts of the physical world.
    Shree Hanuman Chalisa brings us closer to the mysteries and myths of life. It is the acceptance of life as it is. Here, doubts are no longer entertained. There is no attempt to demystify life, for the mysterious can never ever be demystified.
    In this life-changing book, Lord Hanuman is extolled as the most successful spiritual Chief Executive Officer (CEO) of all times. One may ask, what is so mysterious about that? There is no dearth of successful CEOs in the world. And, spiritual beings are not scarce either. So, what is so special about Hanuman?
    Let us explore together…..
  • Samjhauton Ka Desh (Paperback)
    Alka Pathak
    30

    Item Code: #KGP-1538

    Availability: In stock


  • Phir Palash Dahke Hain
    Kanhiya Lal Vajpayee
    150 135

    Item Code: #KGP-164

    Availability: In stock

    फिर पलाश दहके हैं
    गीतकार कन्हैया लाल वाजपेयी आपको गली, नगर, क़स्बा, चौबारों, किसी नदी के पास अथवा सूखे तट पर, कहीं भी सहज और सामान्य रूप से गाता-गुनगुनाता घूमता मिल सकता है । मिलने को तो बाजार में भी मिल जाएगा, लेकिन बाजार में बेच सकने के लिए इसके पास कुछ है नहीं-
    हम खाली जेबों में 
    बाजार लिए घूमे... । 
    का यह गायक बाजार में मिल जाने पर भी-
    नयनों की चितवन 
    अधरों की लाली
    फूलों की मुस्कानों' का गाहक हूँ । 
    जैसे ग्राहक के ही रूप में अपना परिचय देता महसूस होगा ।
    इन कन्हैया लाल वाजपेयी ने अपनी अब तक की भिन्न-भिन्न 'मूड' (मानसिकताओं) को गीत-  यात्राओं में अपने जो चरण-चिह्न छोडे हैं वे राजमहल से लेकर गलियों, चौबारों, घाटियों और नदी तटों तक बिलकुल साफ, गहरे और स्पष्ट हैं ।

  • Patra-Samvad : Ageya Aur Rameshchandra Shah
    Krishna Dutt Paliwal
    240 216

    Item Code: #KGP-698

    Availability: In stock


  • Sahachar Hai Samay
    Ramdarash Mishra
    800 640

    Item Code: #KGP-124

    Availability: In stock

    सहचर है समय
    रामदरश मिश्र का समय को सहचर मानना प्रकारांतर से 'स्व' और 'समय' के संबंधों की द्वंद्वात्मकता और सामंजस्य की ओर संकेत करता है । इस आत्मवृत्त से एक ओर कछार के अंचल में बीते बचपन से लेकर वाराणसी में उच्च शिक्षा, जीविका-संघर्ष, गुजरात-प्रवास, दिल्ली- आगमन, बहुआयामी रचनाशीलता और दिल्ली के साहित्यिक परिवेश से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का जुलूस उमड़ पड़ा है, दूसरी ओर इसी के समानांतर स्वतंत्रता-पूर्व का ग्रामीण परिवेश, स्वतंत्रता और जनतांत्रिक आकांक्षाएँ, व्यवस्था के अंतर्विरोध, अध्यापन-जगत की राजनीति, भारत-पाक युद्ध, आपातकाल, इंदिरा गाँधी का निधन, सिख-विरोधी हिंसा यानी कि पचास वर्षों का जीवंत इतिहास अपनी अनेक विशेषताओं और कुरूपताओं के साथ उभरा है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाकारों और कलाकारों ने आत्मकथाएँ लिखी हैं। अधिकतर चर्चित आत्मकथाओं में काम-संबंधों की सनसनी परोसने या स्वयं को 'अतिविशिष्ट' सिद्ध करने की जो प्रवृत्ति मुखर है, 'सहचर है समय' से उसका अभाव है । अत: यह आकस्मिक नहीं कि रामदरश मिश्र का प्रस्तुत आत्मवृत्त अमृता प्रीतम, हंसा वाडेकर, दुर्गा छोटे, कमला दास और पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि की आत्मकथाओं से अलग किस्म का बन पडा है ।
    'सहचर है समय' का प्रस्थान बिंदु जीवन के प्रति गहरी आस्था है । मिश्र जी ने अपने जन्म लेते ही कीड़े-मकोडों के चलते मौत के मुँह में चले जाने और पडोस की एक बुआ के हाथों बनाए जाने का उल्लेख क्रिया है। इस घटना को अर्थविस्तार देते हुए उन्होंने लिखा है :
    'मेरी जीवन-यात्रा से कीड़े-मकोड़े भी खूब मिले, लेकिन मुझे उनसे बचाने वाली शक्तियां भी मिलती ही गईं । कीड़े-मकोड़े तो सभी को मिलते हैं, किसी-किसी को तो साफ ही कर जाते हैं, उनकी जिजीविषा, उनके जीवन- मूल्य सभी को चट कर जाते हैं, लेकिन मुझे जिजीविषा मिली है । जीवन के प्रति अगाध विश्वास, निष्ठा और मूल्य मिला है इसीलिए कि कीड़े-मकोडों के बावजूद जीवनदायक कोई न कोई शक्ति, रस मुझे देर-सबेर मिलता ही रहा है ।'
    प्रारंभ से ही स्वप्नदर्शिता का जिक्र भी हैं :
    'तब कुत्ता पाला था, अब सपने पालता हूँ अपने लिए, समाज के लिए, देश के लिए । वे छीन लिए जाते हैं, छीनकर किसी और को दे दिए जाते है, या तोड़ दिए जाते हैं—अपनों द्वारा भी और दूसरों द्वारा भी। ...लेकिन न जाने क्या है कि मैं टूटा नहीं, बिखरा नहीं, मिट-मिटकर बनता हूँ। गिर-गिरकर उठता गया हूँ, भटक-भटककर रास्ते पर आ गया हूँ।'
    सपने पालना, सपनों का टूटना-बिखरना, स्वयं के टूटने की स्थिति, लेकिन जीवनदायक शक्तियों और दृढ़ आस्था के फलस्वरूप आखिरकार सँभल जाना-यही मिश्र जी की अब तक की जीवन-यात्रा है। आज के स्वार्थ-संकुल परिवेश में टूटना-बिखरना किसी संवेदनशील बुद्धिजीवी की अनिवार्य नियति है । लेकिन बिना कुंठित  और निराश हुए अंतत: परिवार के भरेपूरेपन का संतोष महसूसना सबका सौभाग्य नहीं होता ।
    मिश्र जी ने अपने आत्मवृत्त का समापन करते हुए लिखा है : 'अनेक सांसारिक अनुपलब्धियों के बावजूद परिवार का यह भरापूरापन हमें मिला है, उससे हम बहुत प्यार करते हैं । जिस किसी शक्ति के कारण हमें यह वरदान मिला है, उसके प्रति हम गहरा आभार व्यक्त करते हैं...।'
  • Ek Yug Ke Baad
    Pushpa Rahi
    40 36

    Item Code: #KGP-1891

    Availability: In stock

    एक युग के बाद
    पुष्पा राही के गीतों में सुख-दुःख, आशा-निराशा, अन्धकार-प्रकाश, संयोग-वियोग, व्यथा-वेदना, मिथ्या मोह, दम्भ, पाखंड सबका वर्णन मिलता है । कुछ गीत इतने मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं कि उन्हें पढते समय जीवन के अनेक तथ्य नेत्रों के सामने उदघाटित होने लगते है ।
    इन गीतो की एक विशेषता है नूतन बिम्बों का निर्माण । दर्द के मोती, रेशमी सुख, शोर की कालिख, उलझनों का झाड, नींद की कमजोर आँखे, विषमताएं रोग-सी, अंधेरे दर्द के साए, मीठी-मीठी इच्छा आदि प्रयोग गीत को संवेदन के स्तर पर बहुत मार्मिक बना देते हैं । कवयित्री अपनी अनुभूतियों और परिवेश की हलचल को ही लिखना चाहती है । दूसरों से उधार लेकर कुछ भी कहने में उसकी रुचि नहीं है ।
    एक युग के बाद में संकलित गीत उच्चस्तरीय होने के साथ काव्य की भावभूमि पर अपनी छाप छोड़ते है । कोहरेभरे प्रभात से निकालकर चन्दन वन की शीतल छाया में हमें भ्रमण का अवसर देते हैं । प्यार के वृत्त में घुमते हुए हम सन्नाटे के पार पहुँच जाते है ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Malti Joshi
    Malti Joshi
    160 144

    Item Code: #KGP-55

    Availability: In stock


  • Poorvi Uttar Pradesh Ka Sahityik Paridrishya (Paperback) (Two Volumes)
    Jagdish Narayan Shrivastva
    600

    Item Code: #KGP-912

    Availability: In stock

    पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य (2 खंड)
    वरिष्ठ कवि व आलोचक जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश का साहित्यिक परिदृश्य’ नाम से जो महाग्रंथ लिखा है, वह इतिहास से अधिक अनुसंधान है। एक विस्तृत देशकाल में अपने परिचित अंचल का इतिहास लिखना और साहित्य-संस्कृति को संश्लिष्ट करके देखना—जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने इसे जिस तरह से संभव किया है, वह पूरे साहित्य-संसार को स्वागतयोग्य लगेगा। इतिहास-लेखकों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, नंददुलारे वाजपेयी और बच्चन सिंह जैसे लोग रहे हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’ लिखी, नामवर सिंह ने ‘दूसरी परंपरा की खोज’ जैसी कृति लिखी। इनसे अलग जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने उस पूर्वांचल का इतिहास लिखा, जिसे वे ‘पूर्वी उत्तर प्रदेश : विचारों के सूर्योदय की धरती’ जैसा बहुलार्थी नाम देते हैं।...
    कहना न होगा कि जगदीश नारायण श्रीवास्तव का यह महाग्रंथ एक ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। इसके पीछे एक दशक से अधिक की खोज, श्रमसाध्य वृत्त-संकलन, साक्षात्कार, पत्र-पत्रिकाओं से संकलित ऐतिहासिक जानकारियाँ संयोजित हैं। ऐसे कार्य प्रायः अकेले संभव नहीं होते। जगदीश नारायण श्रीवास्तव ने अकेले यह श्रमसाध्य कार्य संपन्न करने का जोखिम उठाया है। इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। आशा है, पाठक इस ग्रंथ को तत्काल प्रकाशित देखना चाहेंगे और अपने पुस्तकालय में अग्रणी स्थान देंगे।
    —परमानंद श्रीवास्तव (भूमिका से)
  • Pagdangi Chhip Gayi Thee : Chhattisgarh Par Ekagra Kavitayen
    Sanjay Alung
    200 180

    Item Code: #KGP-512

    Availability: In stock

    संजय अलंग की कविताएँ छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर एकाग्र हैं। इस दृष्टि से ये अपने होने को अलग से देखने की सहज माँग करती हैं। पहले-पहल पाठ से गुजरते हुए ये कविताएँ छत्तीसगढ़ की आबरू को कई कोणों से उद्घाटित करती हैं। इनमें प्रकृति और मनुष्य के बीच का राग-विराग है, जिसे आधुनिक संदर्भ में देखा गया है। सांस्कृतिकबोध और जीवन की दुश्वारियों को समझती इन कविताओं में गहरी स्थानीयता के यथार्थ बिंब व चित्र हैं। वस्तु वर्णन की जगह भाव चित्रण की उपस्थिति आश्वस्त करती है। इसलिए मनुष्य के दुःख-सुख, आशा-हताशा और जय-पराजय को कविता में अनुभव किया जा सकता है। कविताओं में जिन शब्दों की सहज आवाजाही हुई है, उनमें लोकल और आब्जेक्ट का विरल संस्पर्श है। ये शब्द काव्यभाषा में अतिरिक्त इजाफा करते हैं। उदाहरण के लिए काँदो, गेंडी, गँवर, सरई, लुरकी, फुल्ली आदि। इसके अलावा कई अनूठे शब्द हैं, जो छत्तीसगढ़ की माटी के रंग में डूबे हैं और कविता को विश्वसनीय बनाते हैं। 
    संजय अलंग की कविताओं में सामाजिक, मानवीय सोच और दृष्टि की उजास का परिचय मिलता है। इसी रास्ते वे जनसामान्य की कठिनाइयों और कठोर सच्चाइयों को प्रत्यक्ष करते हैं, जिससे संघर्ष के रास्ते खुलते हैं। जीवन के सच को समय से जोड़ देने की कला भी इन कविताओं में सहज उपस्थित है बिना किसी अतिरिक्त शोर के। कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में संघर्षरत अस्मिताओं का विमर्श कविताओं की तहों में बावस्ता है जिसे धैर्य से पढ़ना अपेक्षित है। 
    संजय अलंग की कविताओं में भरोसे के स्वर विन्यस्त हैं। उनका अगला संग्रह इस जमीन के राग से अधिक परिपक्व होगा, ऐसी उम्मीद है।
  • Jo Nahin Hai
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-1899

    Availability: In stock

    जो नहीं है
    यह मृत्यु और अनुपस्थिति की एक अद्वितीय पुस्तक है । राग और विराग का पारंपरिक द्वैत यहाँ समाप्त है । अवसाद और आसक्ति पडोसी है । यह जीवन से विरक्ति की नहीं, अनुरक्ति की पोथी है ।  मृत्यु मनुष्य का एक चिरन्तन सरोकार है और चूँकि कविता मनुष्य के बुनियादी सरोकारों को हर समय में खोज़ती-सहेजतो है, वह आदिकाल से एक स्थायी कवियमय भी है ।   विचार- शीलता और गहरी ऐन्द्रियता के साथ अशोक वाजपेयी ने  अपनी कविता में वह एकान्त खोजा-रचा है जिसमें मनुष्य का यह चरम प्रश्न हमारे समय के अनुरूप सघन मार्मिकता और बेचैनी के साथ विन्यस्त हुआ है
    यहाँ मृत्यु या अनुपस्थिति कोई दार्शनिक प्रत्यय न होकर उपस्थिति है । वह नश्वरता की ठोस सचाई का अधिग्रहण करते हुए अनश्वरता का सपना देखने वाली कविता है-अपने गहरे अवसाद के बावजूद वह जीने से विरत नहीं करती । बल्कि उस पर मँडराती नश्वरता की छाया जीने की प्रक्रिया को अधिक समुत्सुक और उत्कट करती चलती है
    दैनन्दिन जीवन से लेकर भारतीय मिथ के अनेक बिम्बो और छवियों को अशोक वाजपेयी ने मृत्यु को समझने-सहने  की युक्तियों के रूप में इस्तेमाल किया है । उनकी गीति-सम्वेदना यहाँ महाकाव्यात्मक आकाश को चरितार्थ करती है और उन्हें फिर एक रूढ हो गये द्वैत से अलग एक संग्रथित और परिपक्व कवि सिद्ध करती है
    यहीं किसी तरह की बेझिलता और दुर्बोधता नहीं, पारदर्शी लेकिन ऐंद्रिक चिंतन है, कविता सोचती-विचारती है पर अपनी ही ऐंद्रिक प्रक्रिया से । 
  • Halahal
    Dhirendra Aasthana
    180 162

    Item Code: #KGP-1952

    Availability: In stock

    हलाहल
    धीरेन्द्र अस्थाना ने अपने साथी रचनाकारों की तुलना से कम लिखा है; लेकिन जो भी लिखा है, उसका हिंदी के व्यापक पाठक समाज में बेहद ममता और ललक के साथ स्वागत हुआ है । गहरी, मर्मस्पर्शी और अनेक आयामी भाषा के कुशल शिल्पी धीरेन्द्र अस्थाना का नाम उन रचनाकारों से लिया जाता है, जो लेखन को बेहद गंभीरता से लेते हैं और किसी प्रकार की जल्दबाजी में नहीं रहते । यही कारण है कि उनका लेखन उत्पादन नहीं, सृजन की श्रेणी में खडा मिलता है । लिखे जाने के क्रम में 'हलाहल' उनका दूसरा उपन्यास है । पहली बार सन् 1988 में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पढ़ना रचनात्मकता की उस ताकत से हमारा साक्षात्कार कराता है, जिसे मुहावरे की भाषा में 'पुनर्नवा' कहते है । स्त्री-पुरुष संबंधों की एक बेहद पेचीदी स्थिति में उलझ गए इस उपन्यास के नायक की त्रासदी और वेदना इसका सतही सत्य है । अपने गोरे अर्थों में यह उपन्यास उन प्रतिकूलताओं को उजागर करता हैं, जिनमें फैलकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति 'नारसिसस' हो जाने के अभिशाप की तरफ फिसल जाता है, क्योंकि उसे सहेजने-संवारने के लिए एक तिनका तक प्रकट नहीं हो पाता । हिंदी के अत्यंत चर्चित और बहुपठित लेखक उदय प्रकाश ने कभी लिखा था 'धीरेन्द्र अस्थाना एक तटस्थ निर्ममता और निर्वेग संयम के साथ अपने भीतरी संसार के समूचे अंतर्द्वद्वों  के बखान के लिए बाहरी दुनिया में उसका समरूप प्रति संसार तलाशते हैं । ऐसे 'कोरिलेटिव' को अजित करना समकालीन लेखन में रचनात्मक उपलब्धि मानी जानी चाहिए ।'
  • Shankhnaad
    Raj Budhiraja
    140 126

    Item Code: #KGP-118

    Availability: In stock

    शंखनाद
    "गांधी जी अगर राष्ट्र के पिता थे तो महर्षि दयानंद सरस्वती राष्ट्र के पितामह थे । महर्षि जी हमारी राष्ट्रीय  प्रवृत्ति और स्वाधीनता आंदोलन के आद्य-प्रवर्तक थे। गांधी जी उन्हीं के पदचिन्हों  पर चले । यदि महर्षि हमें मार्ग न दिखाते तो अंग्रेजी शासन में उस समय सारा पंजाब मुसलमान हो जाता और सारा बंगाल ईसाई हो जाता।" —अनंतशायनम् आयंगर
    "महर्षि दयानंद भारतमाता के उन प्रसिद्ध और उच्च आत्माओं में से थे, जिनका नाम संसार के इतिहास से सदैव चमकते हुए सितारों की तरह प्रकाशित रहेगा । वे भारतमाता के उन सपूतों में से हैं, जिनके व्यक्तित्व पर जितना भी अभिमान किया जाए थोड़ा है ।  नेपोलियन और सिकंदर जैसे अनेक सम्राट एवं विजेता संसार में हो चूके है, परंतु स्वामी जी उन सबसे बढ़कर थे ।" —खदीजा बेगम
    “बहुत-से लोग महर्षि दयानंद को सामाजिक और धार्मिक सुधारक कहते हैं, परंतु मेरी दृष्टि में तो वे सच्चे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने सारे देश में एक भाषा, खादी, स्वदेश प्रचार, पंचायतों की स्थापना, दलितोद्धार, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, उत्कट देशाभिमान और स्वराज्य की घोषणा—यह सब बहुत पहले से देश को दिया है ।" —विट्ठलभाई पटेल
  • Do Naatak (Paperback)
    Jaivardhan
    100

    Item Code: #KGP-1323

    Availability: In stock

    जयवर्धन
    जयवर्धन उपनाम। पूरा नाम जयप्रकाश सिंह (जे.पी. सिंह)। प्रतापगढ़ (उ० प्र०) ज़िले के मीरपुर गाँव में वर्ष 1960 में जन्म। अवध विश्वविद्यालय से स्नातक। 1984 में लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि-स्नातक। लखनऊ दूरदर्शन में दो वर्षों तक आकस्मिक प्रस्तुति सहायक के रूप में कार्य। श्रीराम सेंटर, दिल्ली में एक वर्ष मंच प्रभारी। वर्ष 1988-94 तक साहित्य कला परिषद, दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी। भारतीय नाट्य संघ, नीपा एवं अन्य कई संस्थाओं के सदस्य व सांस्कृतिक सलाहकार।
    रंगमंच में विशेष रुचि। अभिनव नाट्य मंडल, बहराइच (उ० प्र०) और रंगभूमि, दिल्ली के संस्थापक। कभी दर्पण, दिल्ली के सक्रिय सदस्य। लगभग 40 नाटकों में अभिनय। 20 नाटकों का निर्देशन तथा 70 नाटकों की प्रकाश परिकल्पना।
    कविता, गीत, एकांकी, नाटक, आलेख, समीक्षा, नुक्कड़ नाटक एवं सीरियल आदि का लेखन।
    प्रमुख पूर्णकालिक नाटक: ‘मस्तमौला’, ‘हाय! हैंडसम’, ‘अर्जेंट मीटिंग’, ‘मायाराम की माया’, ‘मध्यांतर’, ‘अंततः’, ‘कविता का अंत’, ‘झाँसी की रानी’, ‘कर्मेव धर्मः’ (नौटंकी)।
    बाल नाटक: ‘जंगल में मंगल’, ‘घोंघा बसंत’, ‘चंगू-मंगू’, ‘हम बड़े काम की चीज़’।
    संप्रति: साहित्य कला परिषद, दिल्ली में सहायक सचिव (नाटक) के पद पर कार्यरत। 
  • Mohabbat Ka Per
    Priya Anand
    100 90

    Item Code: #KGP-1841

    Availability: In stock

    मोहब्बत का पेड़
    वैसे तो संग्रह की सभी कहानियां प्रेम-कथाएँ ही है, मगर 'मोहब्बत का पेड़' कहानी कई प्रेम-कथाओँ को जीवित कर देती है । इस कहानी में स्त्री का विद्रोही स्वर है, जो मोहब्बत की वकालत करता है और सामंती व्यवस्था को कटघरे में खडा करने की कोशिश करता है । यहाँ गौर करने वाली बात सिर्फ यह है कि जहाँ इस कहानी का अंत होता है, वहीं से एक नई कहानी की शुरुआत होती है । नारी के संघर्ष और यातना की कहानी । यह कहानी प्रिया आनंद की कहानियों का प्रस्थान बिंदु हो सकती है ।...
  • Mere Saakshatkaar : Devendra Satyarthi
    Davendra Satyarthi
    200 180

    Item Code: #KGP-548

    Availability: In stock


  • Chandragiri Ke Kinare
    Sara Aboobkar
    75 68

    Item Code: #KGP-1958

    Availability: In stock


  • Prourh Shiksharthion Ki Shiksha-Prapti Ke Vaataavaran Ke Ghatak Tatva
    Naseem Ahmed
    140 126

    Item Code: #KGP-9129

    Availability: In stock

    यह पुस्तक ‘दिल्ली में एक शहरी स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण को निर्धारित करने वाले तत्त्वों के अध्ययन’ विषय पर लेख के पी-एच.डी. के सोध-प्रबंध का परिणाम है। इस प्रयास पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने डाॅक्टर आॅफ फिलाॅसफी (पी-एच.डी.) की उपाधि प्रदान की है।
    पुस्तक ‘प्रौढ़ शिक्षार्थियों’ की ‘शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण’ तथा विशिष्टताओं की अवधारणा को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित करती है। भारत के संदर्भ में शहरी स्लम बस्तियों में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की शिक्षा-प्राप्ति के वातावरण की रूपरेखा को पुस्तक में दर्शाया गया है। एक स्लम बस्ती की परिस्थिति में प्रौढ़ शिक्षार्थियों की विशिष्टताआं तथा शिक्षा-प्राप्ति के आसपास के वातावरण के संदर्भ में उन्हें विस्तार से समझने के लिए पुस्तक उपयोगी है। इस प्रकार की समझ प्रौढ़ों में साक्षरता को बढ़ावा देने के प्रयासों का सफल बनाने तथा उसे बनाए रखने के लिए बढ़ी हुई संभावनाओं को उत्पन्न करने में सहायक होगी।
    साथ ही शहरी क्षेत्रों में सामान्य रूप से तथा शहरी स्लम बस्तियों के वातावरण में विशेष रूप से साक्षरता तथा प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों की योजना बनाने और उसका प्रबंध करने की प्रक्रिया के लिए यह उपयोगी सूचनाओं की एक स्रोत-पुस्तिका भी हो सकती है।
  • The Growing Years (Novel)
    Ann Delorme
    395 356

    Item Code: #KGP-339

    Availability: In stock

    The Growing Years is a novel that deals with the life of a mother living in the shadow of death and, also the painful, exploratory years of adolescent children. It delves with a touch of humour into the complex psychology of children and adults as they age towards maturity and death, unwilling participants.
    The novel also traverses the depths of an Anglo Indian culture left behind by the colonials who quit India. A culture that has been nurtured and blossoms in the gardens of a hybrid race that still closet themselves in the bungalows of their minds.

  • Vish Vansh
    Rajesh Jain
    40 36

    Item Code: #KGP-1916

    Availability: In stock

    विष वंश
    कोई भी सफल नाटक अपने समय वा महाज्योति होता है, जिसके आलोक में राजसत्ता, जनसत्ता और मनुष्य की सामाजिक स्तरीयता आदि दीप्त होते हैं । नाटकों की रंग-परंपरा में राजा और राज्याश्रित कथा-परंपरा का सार्वकालिक योगदान संभवत: इसीलिए रहा है, क्योंकि राजा और प्रजा की कहानी इस धरनी से न कभी समाप्त होती है और न ही पुरानी पड़ती है । राजा- प्रजा की कहानी में मनुष्य के साथ जुडे तमाम आयाम- भेद-अभेद, नर-मादा, नेकी-बदी, योगी-भोगी, शिखर-घाटी अर्थात् सम्यक कथा-तत्त्वों एवं नाटकीय आरोह-अवरोहों का अवलोकन-परीक्षण। संभव हो पाता है ।
    हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार राजेश जैन के इस प्रस्तुत नाटक 'विष वंश' में राजा की यह कथा हमारे आसपास के भ्रष्टाचार के जिस गहन सचिंतन से नंगा करती है, उसमें प्रतिपक्ष के लिए कोई अवकाश नहीं है । राजा अटपटसिंह और महामंत्री चंटप्रताप सिंह के माध्यम से तंत्र के भ्रष्टीकरण को, आज की नारी की अस्मिता क्या राजनीति में पनप राही वंशवाद को प्रवृति के साथ जोड़कर नाटककार ने इस नाट्यकथा को समकालीन समय का एक टकसाली पाठ बना दिया है । प्रजातंत्र ये प्रजा ही सर्वाधिक शक्तिशाली और सत्ताधीश हो-अत्यंत रोचक ढंग का यह सत्यान्वेषण इस नाटक के सुलझी हुई पहेली है ।
    छठे 'आर्य स्मृति साहित्य समान' के निर्णायक मंडल- राम गोपाल बजाज, कन्हैयालाल नंदन तथा असग़र वजाहत जैसे नाट्यविदों के मूल्यांकन के आधार पर सम्मानित इस नाट्यकृति का प्रकाशन, नाटकों की दुनिया में एक सदाबहार खुशबू का आह्वान है, ऐसा विश्वास है ।

  • Charitraheen (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    280

    Item Code: #KGP-727

    Availability: In stock


  • Wuthering Heights (Paperback)
    Emily Bronte
    125

    Item Code: #KGP-348

    Availability: In stock

    A snowstorm evening. A moorland farmhouse. A visitor from south England on a recuperation trip. And a nightmare featuring the ghost of the earlier occupant of the farmhouse—trying to get in.
    Wuthering Heights and its chambers have stood the test of time and temperaments of the illustrious Earnshaws and the dark-skinned orphan Heathcliff. Through this classic romance, Emily Bronte takes us to the rebellious young Catherine Earnshaw, who with time, grows into an opinionated, treacherous woman in love with two men. And to Heathcliff, adoration and hatred for Catherine is the stuff classics are made of. All this while two illustrious families fall prey to the perfect scheming of the dark-skinned lunatic orphan! Will her love win or will it be his hatred?
    With love, betrayal, rivalry, and revenge at its heart, this saga of the moorland farmhouse has everything that awakens the base humane emotions. Realistically real with its vivid imagery, Wuthering Heights—166 years later too lives on, because love still drives the world, and revenge still destroys it.
  • Gareeb Mahilayen Udhar Evam Rozgaar
    Indira Mishra
    250 225

    Item Code: #KGP-37

    Availability: In stock

    भारत में गरीबी की समस्या प्रबल है और गरीबी की मार महिलाओं पर अधिक सीधी और तीखी होती है, क्योंकि महिलाएं परिवार के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार ठहराई जाती हैं। वे मातृत्व का भार वहन करते हुए शरीर से दुर्बल होती हैं, यद्यपि उनमें भावनात्मक इच्छाशक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। गरीबी को दूर करने के लिए केंद्रीय तथा प्रदेश सरकारें, स्वायत्त संस्थाएं तथा अन्य कई प्रकार की एजेंसियां कटिबद्ध हैं, किंतु यह समस्या अभी तक कारगर ढंग से सुलझाई नहीं जा सकी। गरीब तथा ग्रामीण महिलाएं अक्सर अचल संपत्ति-विहीन और शिक्षा के लाभ से वंचित होती हैं। फिर भी उनके अंदर रचनात्मकता तो होती ही है तथा अपनी मदद स्वयं करने के लिए भी वे सतत उत्सुक होती हैं।
    ऐसी महिलाओं की, जो स्वयं की छोटी सी दूकान खोलना या कोई अन्य छोटा-मोटा रोजगार करना चाहती हैं, कर्जे की आवश्यकता बहुत ज्यादा नहीं होती। दूसरी आजमाई हुई बात यह है कि महिला उतना ही ऋण लेना पसंद करती है जितने को किस्तों में लौटा भी सके। किंतु इस सबके बावजूद कोई भी वित्तीय संस्था एकाएक उसे कोई ऋण देने की स्थिति में नहीं होती।
    प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे विषय सामान्य नागरिकों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा बैंककर्मियों आदि के समक्ष स्पष्ट किए गए हैं।
  • Sansaar Ki Pracheen Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    180

    Item Code: #KGP-7055

    Availability: In stock

    रांगेय राघव रचित  प्राचीन सांस्कृतिक कहानियों के छह बृहत संग्रह 
    प्राचीन यूनानी कहानियाँ
    यूनानी संस्कृति का दिग्दर्शन कराने वाली ऐसी कहानियों का संग्रह, जो वहाँ के अतीत जीवन की अत्यंत रोचक झाँकी प्रस्तुत करती हैं ।
    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।
    प्राचीन प्रेम और नीति की कहानियाँ
    रामायण, महाभारत तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के लोकप्रिय आख्यानों पर आधारित प्रेम एवं नीति विषयक कहानियों का बृहत् संग्रह ।
    प्राचीन ट्यूटन कहानियाँ
    अभी तक इतिहास के आधार पर जिन कहानियों का सृजन हुआ हैं, उनमें कहीं भी ऐसी सहज प्रेषणीयता नहीं मिलती, जितनी इस पुस्तक की अलौकिक चमत्कारों से भरी कहानियाँ पढ़कर मिलती है ।
    संसार की प्राचीन कहानियाँ
    विश्व के विभिन्न देशों के प्राचीनतम रीति-रिवाजों तथा  आचार-व्यवहार आदि का चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानियों का संग्रह ।
    अंतर्मिलन की कहानियाँ
    ऐसी उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह, जिनमें भारतीय साहित्य के उन अमर पात्रों के चित्र उतारे गए हैं जिन्होंने सदियों से भारतीय आत्मा क्रो 'जियो और जीने दो' की प्रेरणा दी ।

  • Thank You Idi Amin (Paperback)
    Mohezin Tejani
    395

    Item Code: #KGP-324

    Availability: In stock

    Through adversity, a new life emerges
    Bouncing back from one of the horrific episodes of world history—Idi Amin’s expulsion of 80,000 Asians from Uganda— Mohezin Tejani presents a collection of true stories about being a global Muslim refugee.
    Liberated from the confines of his own culture by political realities, Tejani sets out to learn how to be rooted in the absence of a place to call home. His writing is a hypnotic bhangra dance through time and space where he deftly explores both geographical and psychological displacement. Yet it is precisely through such disorientation and a host of intercultural encounters that he eventually finds solace in being a ‘global village on two legs.’
    Thank You, Idi Amin portrays the intersecting points of congruence among humans that are neither from the East nor the West, nor the North or South, but are all part of a global compass navigating the new world of tomorrow.
  • Kavi Ne Kaha : Viren Dangwal
    Viren Dangwal
    190 171

    Item Code: #KGP-387

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : वीरेन डंगवाल
    वैश्वीकरण भाषाओं, संस्कृतियों और कविता का शत्रु है। उसका स्वप्न एक ऐसी मनुष्यता है जो उसी गांव में बसती है, उसी तरह रहती-सोचती- पहनती, हाव-भाव रचती और खाती-पीती है । एक रासायनिक संस्कृति-बोध से लैस इस वैश्विक  मनुष्यता का आदर्श भी अंतर्राष्ट्रीयवाद है मगर अपने मूल मानवीय अर्थ के बिलकुल उलटे अर्थ में। यह वैश्विक मनुष्य तो पारंपरिक संस्कृतियों और ज्ञान को नष्ट करने वाला और अधिनायकवादी है जो केवल बाजार और उपभोग को मान्यता देता है । यह बहुत पूंजी के प्रचंड विचार का वाहक और यथास्थिति का घनघोर पोषक है । जीवन की अनुकृति बनने वाली कविता उसे रास नहीं आती। वह तो सारे जीवन को अपनी अनुकृति बना देना चाहता है । कविता अगर हमारे समय में पाठकों का रोना रो रही है तो उसकी एक बडी वजह भी बाजार और उपभोग का सारथी वही वैश्विक मनुष्य है ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Chandrakanta (Paperback)
    Chandrakanta
    150

    Item Code: #KGP-408

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : चन्द्रकान्ता
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार चन्द्रकान्ता ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'पोशनूल की वापसी', 'आवाज़', 'चुप्पी की धुन', 'पत्थरों के राग', "अलग-अलग इंतजार', 'भीतरी सफाई', 'आत्मबोधग', 'सिद्धि का कटरा' , 'लगातार युद्ध' तथा 'रात में सागर'।
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक चन्द्रकान्ता की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Jansampark : Avadharana Evam Badalata Svaroop
    Kri. Shi. Mehta
    250 225

    Item Code: #KGP-297

    Availability: In stock

    जनसंपर्क, जनसंचार का एक ऐसा घटक है जो एक ओर तो जनसंचार को जीवंत रखता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्रभाव अथवा परिणाम के संबंध में विषय विशेषज्ञ भी कोई निश्चित दावा नहीं कर सकते। उसके इस अनिश्चित चरित्र का प्रमुख कारण जनसंपर्क के भागीदार त्रिमूर्ति के बीच विचित्र संगम, समन्वय एवं संप्रेक्षण के अभाव में निहित है। जनसंपर्क वह सूत्र है जो इस त्रिमूर्ति-यानी संदेश, माध्यम तथा हितग्राही को सक्रिय करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता है। आज तक किसी ऐसे नियम या मंत्र की खोज नहीं हो पाई है जो जनसंपर्क के प्रभाव ओर उसके परिणाम की सफलता अथवा असफलता का पूर्वानुमान लगा सके।
    जनसंपर्क निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी प्रक्रिया है, जिस पर उस देश की भौगोलिक संरचना, ऐतिहासिक परंपरा, संस्कृति, स्थानीय बोलियां एवं भाषा, सामाजिक एवं धार्मिक आचार-विचार, स्थानीय मान्यताओं इत्यादि अनेक बातों तथा घटनाओं का प्रभाव उस परिवेश की त्रिमूर्ति पर निरंतर प्रतिबिंबित होता रहता है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से यह जनसंपर्क के अनिश्चित चरित्र के कारण हो सकते हैं।
    आज एक ओर मीडिया के आधुनिक उपकरणों ने अनायास ही जनसंपर्क के सर्वथा नए द्वार खोल दिए हैं और भविष्य में भी ऐसे अनेक द्वार खुलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, वहीं दूसरी ओर भारत की तेजी से बढ़ती हुई आर्थिक एवं औद्योगिक प्रगति के साथ शैक्षणिक विकास ने हितग्राहियों की रुचि, सामाजिक जीवन एवं संस्कृति के क्षेत्र में उथल-पुथल मचा रखी है।
  • Hansi Oth Per Aankhen Nam Hain
    Ramdarash Mishra
    75 68

    Item Code: #KGP-9039

    Availability: In stock

    मेरी समग्र ग़ज़लें यहाँ रचना-तिथि के क्रम से दी जा रही है । शुरू की ग़ज़लों पर मैंने रचना-तिथि नहीं लिखी थी अत: यहाँ अनुमान से उनके रचना-वर्ष का उल्लेख कर दिया गया है । कुछ पूर्व प्रकाशित ग़ज़लों को रूप की दृष्टि से फिर तराशा है ।
    ये ग़ज़लें शास्त्रीय दृष्टि से कैसी है यह तो ग़ज़ल-शास्त्री ही जाने किन्तु मुझे विश्वास है कि कविता के पाठकों को इनमें कविता जरूर मिलेगी । मुझे इनके द्वारा अपने अनुभवों को व्यक्त करने में एक अलग तरह की तृप्ति मिली है । मेरी तृप्ति यदि पाठकों क्रो तृप्ति बन सकेगी तो अधिक सार्थक होगी ।
  • Mahadevi Ki Kavita Ka Nepathya
    Vijay Bahadur Singh
    125 113

    Item Code: #KGP-9115

    Availability: In stock

    महादेवी की कविता का नेपथ्य
    मुझे लगता है, समकालीन स्त्री-जीवन के भीतर रचे-बसे आदिम राग का सबसे सघन, तीव्र और सूक्ष्म प्रतिबिंबन इस कविता में बतौर एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में उपलब्ध है। स्त्री अपने आसपास को किन आँखों से देखती है, उसके प्रति कैसी ऐंद्रिक प्रतिक्रियाएँ करती है और सृजन की भूमि पर उतरकर किस असाधारण खूबसूरती से उसकी पुनर्सृष्टि करती है, वह समूची प्रक्रिया यहाँ परखी और महसूस की जा सकती है।
    महादेवी के गीत आदिम स्त्री-मन के भी गीत हैं और उस ऐतिहासिक-सांस्कृतिक मन के भी, जो सभ्यताओं के कई-कई वार झेलकर भी अविकृत रह सका है। स्त्री का यह मन कितना तरल, मृदुल, कितना विनयी, समर्पण- शील किंतु कितना आत्मचेतस और आत्मविश्वासी है, इसे महादेवी के शब्द-शब्द में अनुभव किया जा सकता है। निसर्ग और जीवन, उसकी सारी गतियाँ और भंगिमाएँ कुछ भी तो उसकी पहुँच से बाहर नहीं है। आधुनिक पुरुष की भाँति वह इस जीवन को केवल उपभोग का साधन मानने को तैयार नहीं। महादेवी की कविता उसमें एक रागपूर्ण कृतज्ञता का अनुभव कराती है और उस राग सम्मोहन का भी, जिसके बगैर कविता ही नहीं, जीवन भी बेमानी है। महादेवी की कविता इसी विराट् राग की सबसे सम्मोहक अनुगूँज है।
    वह जीवन के स्थूल व्यापारों से उन सूक्ष्म गतिविधियों तक व्यापी हुई है, जहाँ लोक और लोकोत्तर एक होकर रहस्यमय हो उठे हैं, किंतु यह रहस्यमयता जीवन का निषेध नहीं, उसकी उन उदात्त ऊँचाइयों की ओर इशारे करती है, जहाँ कविता मनुष्यता की परिभाषा ही नहीं, उसकी जीवंत पहचान भी बन जाती है।
  • Urgent Meeting
    Jaivardhan
    100 90

    Item Code: #KGP-1822

    Availability: In stock


  • Aalochna Ka Samay
    Dr. Jyotish Joshi
    320 288

    Item Code: #KGP-687

    Availability: In stock

    आलोचना का समय ग्यारह महत्त्वपूर्ण लेखकों के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करने का प्रयत्न है जिसमें उनके ‘रचना समय’ के साथ ‘आज के समय’ को देखने की कोशिश की गई है। आलोचना महज रचना के बोध और अर्थ को समझने वाली विध ही नहीं होती, वह अपने समय की रचनाशीलता को अपने वर्तमान की चुनौतियों में देखती है और इस तरह एक विमर्श को भी जन्म देती है। पुस्तक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, नेमिचन्द्र जैन, केदारनाथ सिंह, भुवनेश्वर, सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मैनेजर पांडेय तथा उदय प्रकाश जैसे लेखकों के अवदान को रेखांकित करते हुए उनके उन पक्षों को विशेष रूप से विवेचन का आधर बनाया गया है जिनके कारण उनकी महती उपादेयता है। विवेच्य लेखकों में मूल रूप से रचनाकार और आलोचक दोनों हैं जो अपने लेखन में ‘समय’ को देखते हैं तथा समय की अपेक्षाओं के अनुरूप अपने लेखकीय दायित्व का निर्वाह करते हैं।
    अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप आलोचक डॉ. ज्योतिष जोशी ने बहुत मनोयोग से पुस्तक में कृती लेखकों के योगदान को विवेचित किया है। इसमें उनकी भाषा, विवेचन की पद्धति तथा अपने समय की चुनौतियों से टकराने की दृष्टि आपको बहुत प्रभावित करेगी। कहना न होगा कि यह कृति पठनीय ही नहीं वरन् संग्रहणीय भी है।
  • Mannu Bhandari Ka Rachnatmak Avdaan
    Sudha Arora
    400 360

    Item Code: #KGP-909

    Availability: In stock

    मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान
    मन्नू भंडारी हिंदी की एक जानी-मानी, सुविख्यात, बहुपठित, पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में एक से आदर- सम्मान के साथ पढ़ी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें तो भी उनका जीवन एक अदम्य जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नू जी के स्वभाव में है। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते हैं और सरलता, सहजता तथा स्नेह से सराबोर होकर लौटते हैं। हिंदी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में हैं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व हैं जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेती हैं।
    मन्नू भंडारी ने परिमाण में बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर जो लिखा, उसमें जिंदगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह हर 
    पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।
    मन्नू जी के दो उपन्यास--‘आपका बंटी’ और ‘महाभोज’ हिंदी साहित्य में दो मील के पत्थर हैं--जो अपने समय से आगे की कहानी कहते हैं और हर समय का सच होने के कारण कालातीत भी हैं। 
    ‘आपका बंटी’ जहाँ भारतीय परिवार के एक औरत के द्वंद्व और एक बच्चे की त्रासदी की कथा है, ‘महाभोज’ उससे बिलकुल अलग हटकर राजनीतिक हथकंडों में पिसते और मोहरा बनते दलित वर्ग और भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी है।
  • Vah Chhathavan Tattva
    Om Bharti
    125 113

    Item Code: #KGP-1861

    Availability: In stock

    वह छठवाँ तत्त्व 
    जिसे मेरी कविताएँ पसंद नहीं
    उसकी भी कोई कविता
    पसंद है ज़रूर मुझे—
    ओम भारती के नए संग्रह की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ विनम्रता नहीं, उसकी रचनात्मक सचाई की सूचक हैं। इन कविताओं से गुज़रने के बाद मुझे लगा कि यह एक ऐसे वयस्क कवि का संग्रह है, जिसमें चीज़ों को निकट से जानने, चुनने और अपनी संवेदना का हिस्सा बनाने की एक उत्कट इच्छा है और अपने आज़माए हुए नुस्ख़ों और औज़ारों को फिर से जाँचने-परखने की एक सच्ची ललक भी। यही बात संग्रह की कविताओं को पठनीय बनाती है। इस कवि के अनुसार– कविता वह होती है, जिसमें भेद छुपे हेते हैं, जो भेद खोल देते हैं। इसका सबसे विश्वसनीय उदाहरण है इस संग्रह की वह कविता, जिसका शीर्षक है ‘इस संशय के समय में’। विक्रम सेठ के ‘सुटेबुल ब्वाय’ की तरह यह बहन के लिए एक अच्छे वर की तलाश की कविता है—
    अच्छे लड़के नहीं हैं कहीं भी
    हों भी तो शायद खुद उन्होंने
    असंभव कर रखा है ढूँढ़ लिया जाना अपना।
    और फिर कविता के उत्तरार्द्ध में निष्कर्षतः यह कि—
    इस संशय के समय में
    क्या अच्छाई खो चुकी तमाम आकर्षण?
    इस कविता का अंत दिलचस्प है और थोड़ा विडंबनापूर्ण भी, क्योंकि कवि को लगता है—‘अच्छे लड़के नहीं हैं अथवा हैं तो वे इस कवि से कहेंगे—बेवकूफ़, हमसे तो मिला होता लिखने से पहले।’ यह एक गंभीर विषय को हलके-फुलके ढंग से कहने का अंदाज़ है, जो कविता को एक नया तेवर देता है।
    इस संग्रह की अनेक कविताओं में एक चुभता हुआ व्यंग्य है और कवि के पास उसे व्यक्त करने का चुहलभरा कौशल भी। इस दृष्टि से कई और कविताओं के साथ-साथ ‘निरापद’ कविता ख़ास तौर से पठनीय है, जो इस प्रगतिकामी कवि की लगभग एक आत्मव्यंग्य जैसी कविता है। कवि की यह खेल जैसी शैली एक तरह से इस पूरे संग्रह के चरित्र-लक्षण को निर्धारित करती है। ‘इस तरह भोपाल’ कविता इसका एक प्रतिनिधि नमूना है, जिसकी शुरू की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं—
    जहाँ भोपाल—
    वहाँ अब संख्या और किलोमीटर नहीं हैं
    मगर वहाँ भी एक तीर की नोक से,
    आगे है भोपाल
    उस जगह न कोई खंभा,
    न कोई तख़्ती और न ही संकेत
    कि यह है, क़सम हुज़ूर, यही तो है—
    भोपाल!
    मध्यप्रदेश की कहन-शैली के रंग में ढली हुई ये कतिवाएँ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करेंगी और बेशक काव्य-मर्मज्ञों का भी।
  • Roshni Mein Chhipe Andhere
    Gurudeep Khurana
    250 225

    Item Code: #KGP-485

    Availability: In stock

    शुभ्रा उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, "नहीं दीप, ऐसी बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगती। अगर हालात ऐसे बने हैं तो इसमें शहर का क्या दोष। ऐसे दया भाई तो कहीं भी हो सकते हैं। कब, कहां ऐसा जहर भर दें, कुछ नहीं कह सकते। बहुत दिन नहीं ठहरेगा यह जहर। देखना, जल्दी सब नार्मल हो जाएगा।"
    "मुझे तो लगता है इस दौरान नफरत के जो बीज बो दिए गए हैं उनका असर पुश्तों तक चलेगा।"
    "यह तो है। नफरत फैलाने में घड़ियां लगती हैं और मिटाने में सदियां।"
    "बिलकुल ठीक।"
    "वैसे मैं एक बात और भी कहना चाहती हूं...कह दूं?"
    "जरूर!"
    "देखो दीप, घृणा केवल वही नहीं जो दया भाई जैसे लोग फैला रहे हैं...घृणा वो भी है जो तुम्हारे मन में पल रही है दया भाई के प्रति।"
    "कहना क्या चाह रही हो?"
    "यही कि वह घृणा भी कम घातक नहीं। मैं तो सोचती हूं...उन लोगों के बारे में भी घृणा से नहीं, प्यार से भरकर सोचो। आखिर वे कोई अपराधी तत्त्व नहीं। अपनी तरफ से वे जो भी कर रहे हैं राष्ट्रहित में कर रहे हैं। बस, दिशा भटक गए हैं। बहके हुए लोग हैं वे।..."
    —इसी पुस्तक से

  • Gyarah Laghu Naatak
    Pratap Sehgal
    300 270

    Item Code: #KGP-9322

    Availability: In stock

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर विश्व साहित्य में एक विशिष्ट पहचान रखने वाले कालजयी रचनाकार हैं। अभिव्यक्ति की अनेक विधओं में उन्होंने नवीन प्रस्थान निर्मित किए। भाषा, शैली, विचार और दर्शन को मानवता के विराट प्रांगण में अभिमंत्रित आमंत्रित किया। प्रस्तुत पुस्तक ग्यारह लघु नाटक में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की अपूर्व प्रतिभा का प्रकाश एक नए शिल्प में देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध नाट्य लेखक और रंगमनीषी प्रताप सहगल ने ठाकुर की ग्यारह कहानियों को चुनकर उन्हें नाट्य रूप प्रदान किया है। उनके शब्दों में, ‘‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियों में 1940 से पहले के बंगाल का जीवन धडकता है। ...जब इन ग्यारह कहानियों को मैंने चुना तो स्पष्ट रूप से यह बात मन में काम कर रही थी कि मैं इन्हें नाट्य रूप में ऐसे प्रस्तुत करूं कि इनका मूल भाव एवं मूल परिवेश क्षरित हुए बिना ये हमारे समय में भी प्रासंगिक बनी रहें।’’
    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ये सभी कहानियां बहुत प्रसिद्ध  हैं। कहना तो यह भी उचित होगा कि अनेक रचनाकारों ने इनके छाया-अर्थ से स्वयं को समृद्ध किया है। एक रात, काबुलीवाला, पोस्टमास्टर, क्षुधित पाषाण और समाप्ति आदि कहानियों के नाट्य रूपांतर से पाठकों और रंगकर्मियों को कुछ सार्थक विकल्प मिलेंगे। प्रताप सहगल ने कहानियों में निहित नाट्य स्थितियों और रंग- संभावनाओं को समझते हुए रूपांतर को समृद्ध किया है।
    पाठकों के लिए तो इन रूपांतरित रचनाओं से गुज़रना एक विलक्षण अनुभव है ही, उन लोगों को भी आनंद की अनुभूति होगी जो मंचन के लिए सुरुचिपूर्ण नाट्यालेखों की खोज में रहते हैं। एक तरह से प्रताप सहगल ने सार्थक नाट्यालेखों की संख्या में वृद्धि की है। यह करते समय उन्होंने मूल संवेदना को अक्षत रखा है। ‘ग्यारह लघु नाटक’ एक संग्रहणीय पुस्तक है।
  • Samkalin Sahitya Samachar February, 2017
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #February, 2017

    Availability: In stock

  • Bahadur Bachche : Romanchak Ghatnayen
    Sanjiv Gupta
    90 81

    Item Code: #KGP-9292

    Availability: In stock

    पत्रकारिता के पेशे में रहते हुए बहुत बार ऐसे विषयों पर भी काम करने का अवसर मिलता है, जो व्यक्तिगत स्तर पर भी मन को छू जाते हैं। हर साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर ‘राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित होने वाले बच्चों का विषय भी कुछ ऐसा ही था। जब इस विषय पर मैंने कई साल काम किया, बहादुर बच्चों से मिलने और उनसे बात करने का मौका मिला तो उनका सरल व्यक्तित्व, उनके बहादुरी भरे प्रेरक कारनामे मन को गहरे तक छू गए। मन में आया कि अगर हर बच्चा ऐसा ही सरल, सच्चा और बहादुर हो तो शायद हमें आने वाले कल की चिंता ही नहीं रह जाएगी।
    —संजीव गुप्ता
  • Vaigyanikon Ki Batein
    Shuk Deo Prasad
    100

    Item Code: #KGP-921

    Availability: In stock

    सामान्य जन-मानस में वैज्ञानिकों के प्रति एक आम धारणा यह है की उसका जीवन एकदम नीरस एकांतिक और अलग-थलग किस्म का होता है । पर पुस्तक के ये प्रसंग इस तस्वीर का दूसरा पहलू पेश करते हैं । वास्तव में वैज्ञानिकों का जीवन भी सामाजिकता और हास - परिहास से एकदम परिपूर्ण होता है और अवसाद-विषाद भरा भी, हमारी-आपकी ही तरह। उनके भी सामाजिक सरोकार और उत्तरदायित्व  होते हैं । उन्हीं के साथ वे भी जीते और मरते हैं । पुस्तक में समाहित प्रसंग वैज्ञानिकों के बारे में व्याप्त भ्रांत धारणाओं को निर्मूल करते हैं । उनकी भी जिंदगी रोमांच से लबरेज है और हर्ष-विषाद से सराबोर भी, ठीक हमारी ही तरह। 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Ram Kumar
    Shuk Deo Prasad
    125 113

    Item Code: #kgp-2074

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।

    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार रामकुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कहानी जो कभी लिखी न गई', 'रेवा', 'एक चेहरा', 'सेलर', 'दीमक', 'चिंटू', ‘सर्दियों का आकाश', 'जाड़ों की पहली बर्फ', 'शिलालेख" तथा 'रेलवे फाटक'।

    हमें  विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक रामकुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।

  • Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : 1 (Paperback)
    Sumitra Gandhi Kulkarni
    195

    Item Code: #KGP-295

    Availability: In stock

    महात्मा गांधी : मेरे पितामह (1)
    (व्यक्तित्व और परिवार)
    एक नहीं अनेक गांधी हैं--गांधी के  अकेले एक व्यक्तित्व से समाए हुए ।
    गत पूरी एक शताब्दी गांधी की शताब्दी थी । इतना महान् व्यक्तित्व संभवत: विश्व में कोई दूसरा नहीँ था । उनके अवसान के पश्चात उनका विशाल स्वरूप धुँधलाया नहीं, बल्कि और प्रखर, और अधिक प्रासंगिक होकर उभरा । अतीत के गांधी की अपेक्षा आज का गांधी अधिक व्यापक एव विराट, है ।  हिंसा की आग में झुलसते, आज के इस भयाक्रांत वानावरण में गांधी की आवश्यकता अधिक गहराई से अनुभव की जा रही है ।
    यों तो अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है गांधी जी पर, उनके जीवन-दर्शन पर, परंतु बहन सुमित्रा जी ने अपने पितामह का जिस रूप में रेखांकित किया है, वह उन सबसे भिन्न है । बापू के जीवन की पारदर्शिता उसमें झलके बिना नहीं रहती । सुपित्रा जी ने नि:स्पृह एवं निष्पक्ष भाव स सारी स्थितियों का गहन विवेचन किया है । अपने पितामह को भी क्षमा नहीं किया ।
    इस संपूर्ण कृति में हरिलाल भाई वाला प्रसंग सबसे करुण एवं दारुण है--दिल की दहला देने वाला । तब बापू मात्र बापू न रहकर एक संवेदनशून्य पिता की भूमिका में दीखते हैं । हरिलाल भाई सारा गरल चुपचाप पी जाते हैं, पर किसी से कोई शिकायत नहीं । इतना प्रखर, मेधावी, आज्ञाकारी सुपुत्र पिता की उपेक्षा का शिकार बनकर अपनी आहुति दे टेना है । तब गांधी से बडा गांधी लगता है वह--एक निपट मानव के रूप में । अपनी परदादी माँ 'पुतली माँ' पर भी सुपित्रा जी न विस्तार स लिखकर 'गांधी-परिवार' की इस पुण्य-गाथा को एक युग-गाथा का नया आयाम प्रदान किया है । संयुक्त परिवार में पद्म-पत्रवत् रहने की उनकी तपश्चर्या कितनी प्रेरक थी ! इस कृति में ऐसा बहुत कुछ  जो गंभीरता के साथ सोचने के लिए विवश करता है ।  सुमित्रा जी की यह रचना इसलिए अनेक अर्थों में अद्वितीय बन गई है ।
    --हिमाशु जोशी
    13 अगस्त, 2009
  • Viklangta : Samsyain V Samadhan
    Vinod Kumar Mishra
    400 360

    Item Code: #KGP-7846

    Availability: In stock

    विकलांगता : समस्याएं व समाधान 
    विकलांगता एक विश्वव्यापी समस्या है, पर विकसित देशों में इस समस्या के हल के लिए काफी उपाय किए गए हैं । दूसरी ओर विकासशील देशों में अभी बहुत कुछ करना बाकि है । पुस्तक में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तैयार किये गए दिशा-निर्देश, संयुक्त राज्य अमेरिका में लंबी अवधि में किये गए प्रयास, बनाए गए कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया और इसमें सफलता तथा भारत में 1995 में पारित किये गए कानून और इस कानून को देखते हुए विकलांगों की वर्तमान स्थिति का तुलनात्मक वर्णन किया गया है, जो साफ़ दर्शाता है कि सरकार की इच्छाशक्ति, विकलांगों और उनके लिए कार्य करने वाले संस्थाओं की सजगता विकलांगता की समस्या को काफी हद तक हल कर सकती है और विकलांगों को इस लायक बना सकती है कि वे सामान्य लोगों के समान ही समाज को अपना योगदान दे सकते हैं । 
  • Mere Saakshatkaar : Ashok Vajpeyi
    Ashok Vajpayee
    125 113

    Item Code: #KGP-2037

    Availability: In stock

    मेरे साक्षात्कार : अशोक वाजपेयी
    देश के सर्वाधिक विवादास्पद संस्कृतिकर्मी, कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी गत तीन दशकों से हिन्दी साहित्य और संस्कृति के परिदृश्य पर छाए हुए हैं। कविता और आलोचना के साथ-साथ समय साहित्य और कलाओं के प्रति बहुलतावाद के पक्षधर श्री वाजपेयी पर अब तक जितने वैचारिक हमले हुए हैं, वे यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि उनको भूलकर स्वातंत्र्योत्तर साहित्य की बहस अधुरी रहेगी ।
    'मेरे साक्षात्कार' श्रृंखला की यह पुस्तक उन तमाम आरोपों और बहसों का एक दस्तावेज है जो गत तीस वर्षों में होती रहीं है । इनमें अशोक वाजपेयी ने बहुत सफाई से अपने पर लगाए जाते रहे आरोपों का खंडन किया है और साहित्य की सार्थक भूमिका को रेखांक्ति किया है । बातचीत में शामिल मुद्दे वहीं है जो वर्षो से साहित्यिक परिदृश्य पर उठते रहे है । इन मुद्दों में कला और साहित्य की स्वायत्तता तथा उसकी प्रजातांत्रिकता, कलादृष्टियों की लोकतांत्रिकता का सम्मान, साहित्य की समाज-सापेक्षता, कलावाद की जरूरत, कविता और विचार का द्वंद्व , उत्तर-आधुनिकता की उपादेयता और जीवन में साहित्य के सरोकार जैसे मुद्दे इस पुस्तक में बसी मुस्तैदी से उठाये गए है जिनका सटीक, सार्थक और दोटूक ज़वाब देते हुए अशोक वाजपेयी ने अपनी संघर्ष-यात्रा की सार्थकता प्रमाणित की है । पशिचमी अवधारणओं पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने वाले कथित आलोचकों को भी वे करारा झटका देते है जब कहते है कि 'उत्तर- आधुनिकता भरत में प्राक आधुनिकता है ।'
    अशोक बाजपेयी हिन्दी ही नहीं देश के दो-तीन ऐसे आलोचकों- भावकों में हैं जिनके लिए कलाओं का भी उतना ही मूल्य है जितना कि साहित्य का । पुस्तक में कई स्थलों पर संगीत, नृत्य, रूपंकर आदि कलाओँ पर बात करते हुए श्री वाजपेयी ने कलाओं की पारस्परिक्ता और मित्रता के कई ऐसे सूत्रों का भी खुलासा किया है जिनकी चर्चा हाल में अधिक मुखर हुई है । कहना चाहिए कि यह पुस्तक अपनी बेबाकी और उपादेयता के कारण उन सबको पसंद आएगी जो साहित्य को महज़ हथियार नहीं, संख्या भी मानते हैं ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Shrilal Shukla (Paperback)
    Shree Lal Shukla
    120

    Item Code: #KGP-44

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : श्रीलाल शुक्ल
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार श्रीलाल शुक्ल ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'इस उम्र में', ‘सुखांत', "सँपोला', 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल', 'शिष्टाचार', 'दंगा', 'सुरक्षा', 'छुट्टियाँ', 'यह घर मेरा नहीं' तथा 'अपनी पहचान' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक श्रीलाल शुक्ल की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Haitrik (Paperback)
    Rajesh Ahuja
    140

    Item Code: #KGP-1471

    Availability: In stock

    हर रात सोने से पहले कहानी सुनना ‘तारक’ का नियम था। सच कहूं तो कहानी सुनाए बिना मुझे भी चैन नहीं पड़ता था। कहानी सुनते हुए जितना मजा उसे आता था, उसके चेहरे के हाव-भाव और कौतूहल-भरी आंखें देखकर उससे भी अधिक सुख मुझे मिलता था। उस दिन कोई नई कहानी याद नहीं आ रही थी, सो मैंने उससे कहा, ‘कोई पुरानी कहानी सुना दूं?’ मैं कभी-कीाी ऐसी कहानियां सुनाकर उसे बहला दिया करता था, जो मैं उसे पहले कभी सुना चुका था। अकसर वह सुनी हुई कहानी दोबारा सुनने के लिए राजी हो जाता था; पर उस दिन वह नहीं माना। ‘एक ही कहानी को बार-बार सुनने में कोई मजा आता है?’ वह मुंह सुजाकर बैठ गया। मैंने बहुतसमझाया पर वह जिद पर अड़ा रहा। मेरा बड़ा बेटा ‘आकाश’ भी वहां बैठा था। उसने कहा, ‘आप इसे वही कहानी सुना दो न, जो आपने एक बार मुझे सुनाई थी ‘क्रिकेट वाली’।’
    इस कहानी अर्थात् उपन्यास में एक स्थान पर मैंने लिखा है, ‘कोई भी नया काम शुरू करते हुए मन में आशा, डर, संकोच आदि भाव एक साथ जागृत होते हैं।’ उपन्यास को लिखते समय यही स्थिति मेरी भी थी, किंतु उपन्यास के आगे बढ़ने के साथ-साथ, आशा का भाव आगे बढ़ता गया तथा डर और संकोच के भाव पीछे छूट गए।
    -लेखक
  • Nayee Samiksha Ke Pratimaan
    Nirmla Jain
    400 360

    Item Code: #KGP-654

    Availability: In stock

    "1930–1960 तक से समय को जॉन हॉलावे ने ‘साहित्यिक आलोचना में क्रांति’ का युग कहा है। कहना न होगा कि इस समय की सबसे महत्त्वपूर्ण और समृद्ध आलोचनात्मक प्रवृत्ति नयी समीक्षा है। प्रवृत्ति विशेष के लिए यह नाम 1941 में प्रकाशित जॉन क्रो रैंसम की इसी शीर्षक की रचना से रूढ़ हुआ।" प्रस्तुत पुस्तक ‘नयी समीक्षा के प्रतिमान’ की संपादक सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन ने भूमिका के इन शब्दों में उस समीक्षा पद्धति का उल्लेख किया जिसने विश्व-साहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। रचना और आलोचना के अंतःकरण को संशोध्ति / परिवर्तित करने में ‘नयी समीक्षा’ के सूत्रों व समीकरणों ने ऐतिहासिक कार्य किया। दोनों विश्वयुद्धों के बीच का समय नयी समीक्षा के प्रारंभ, विकास और सिमटाव का भी समय है।
    नयी समीक्षा के अंतर्गत स्वच्छंदतावादी प्रवृत्ति समूह और विक्टोरियन साहित्य की नैतिकता के प्रति विरोध दर्ज हुआ। इससे जुड़े समीक्षक कविता के अध्कि शुद्ध मूल्यांकन के लिए उसको ऐतिहासिक सामाजिक विवरणों व रचनाकार की निजता से काट देना उचित समझते थे। इससे विश्लेषण का क्षेत्र रूपात्मक विलक्षणताओं तक सीमिति हो गया।
    हर आरोह का एक अवरोह होता है। ‘नयी समीक्षा’ की सीमाएं 1950 के आसपास उभरने लगीं। निर्मला जैन के शब्दों में, फ्नयी समीक्षा की सभी महत्त्वपूर्ण कृतियां पहले ही प्रकाशित हो चुकी थीं और आलोचक जैसे अपने ऐतिहासिक दायित्व को पूरा कर विराम की मुद्रा में थे। आलोचना का एक प्रमुख दौर, एक विशेष युग मानो समाप्त हो गया था।
    प्रस्तुत पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण आलोचना युग की उल्लेखनीय विशेषताओं को मूल रचनाओं के अनुवाद द्वारा उपलब्ध कराती है। रेने वेलेक, क्लींथ बु्रक्स, आइवर विन्टर्स, टी. एस. इलियट, आई. ए. रिचड्र्स, ऐलन टेट और डब्ल्यू. के. विमसाट के लेखों का अनुवाद अजितकुमार, निर्मला जैन व चंचल चैहान ने किया है। अपने ढब की अकेली पुस्तक, जिसमें जाने कितनी बहसों के प्रस्थान अंतर्निहित हैं। पाठकों की सुविध के लिए दो परिशिष्टों में हिंदी-अंग्रेजी और अंग्रेजी-हिंदी शब्दावली भी दी गई है।
  • Bhartiya Loktantra Aur Hamare Raastrapati
    Janak Raj Jai
    495 446

    Item Code: #KGP-141

    Availability: In stock

    भारतीय लोकतंत्र और हमारे राष्ट्रपति
    भारत के गणतंत्र-राष्ट्र बनने पर 26 जनवरी, 1950 को डॉ० राजेन्द्रप्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, जो लगभग बारह वर्ष तक इस पद पर रहे…और अब 25 जुलाई, 2007 को श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने प्रथम महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की।
    हमारे सभी राष्ट्रपति प्रबुद्ध, देशभक्त तथा विद्वान थे, जो विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण पदों पर रहे । सभी ने अत्यंत प्रतिबद्धता, गौरव तथा निष्ठा से अपना कार्यकाल पूरा  किया। जनहित के कुछ मुद्दों पर कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के बीच मतभेद भी हुए । कभी-कभी किन्हीं राष्ट्रपति ने अपने पद की गरिमा निभाते हुए अपने निर्णय स्पष्ट रूप से जाहिर किए । महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने तो साफ कह दिया है कि वे सभी कार्य व निर्णय संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत करेंगी ।
    भारत का सविधान आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रपति को भारतीय नागरिकों के उत्थान एवं संविधान की रक्षा हेतु पूर्ण अधिकार देता है ।
    इस पुस्तक में हिंदू कोड बिल, पोस्टल बिल, अध्यादेश, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स प्रकरण, शाहबानू प्रकरण, संसद और विधानसभाओं को भंग करना, हंग संसद, संविधान के अंतर्गत बाहर रहकर समर्थन देना और प्रधानमंत्री की नियुक्ति जैसे प्रमुख मुदूदों पर भी चर्चा की गई है ।
    राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच अनकहे घात-प्रतिघातों की रोचक घटनाओँ का विवरण भी इस पुस्तक में पढ़ने को मिलेगा ।
    यह पुस्तक वास्तव में सुधी नागरिको और पाठकों के लिए जीवंत दस्तावेज सिद्ध होगी । देश के प्रति प्रेम रखने वालों तथा स्वातंत्र्य-प्रेमी पाठकों को यह पुस्तक अवश्य रुचिकर लगेगी ।
  • Keral Ka Krantikari
    Vishnu Prabhakar
    120 108

    Item Code: #KGP-1195

    Availability: In stock


  • Mere Saakshatkaar : Bhishm Sahni
    Bhishm Sahni
    250 225

    Item Code: #KGP-861

    Availability: In stock


  • Shesh Prashna (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    125

    Item Code: #KGP-156

    Availability: In stock


  • Antim Padaav
    Hari Yash Rai
    180 162

    Item Code: #KGP-1825

    Availability: In stock

    अंतिम पड़ाव
    आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
    हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    
  • Suno Shefali (Paperback)
    Kusum Kumar
    40

    Item Code: #KGP-7083

    Availability: In stock


  • Samkalin Sahitya Samachar December, 2016
    Sushil Sidharth
    0

    Item Code: #December,2016

    Availability: In stock

  • Mera Hamdam Mera Dost
    Kamleshwar
    75 68

    Item Code: #KGP-1878

    Availability: In stock

    मेरा हमदम मेरा दोस्त
    "मेरा हमदम मेरा दोस्त' में बारह भारतीय रचनाकारों के जीवन के बेहद निजी शब्द-चित्र प्रस्तुत किये गये है । अपने समय की उत्कृष्ट स्तंभ-श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित इन चर्चित साहित्यकारों के जीवन और कर्म का मार्मिक तथा यथार्थ चित्रण, पाठक इन संस्मरणों में पायेंगे ।
    प्रस्तुत: रचनाकार पाठकों की अदालत के कठघरे में अनवरत खड़े रहने वाला एक अभिशप्त जीव है । उसके अंतरतम जीवन और प्रकाशित लेखनादर्शो का आमना-सामना भी प्राय: कराया जाता रहा है । पाठक अपेक्षा रखते है कि जीवन में उदात्तता को भर देने वाले चरित्रों का यह जनक भी नितांत मैल-गर्द मुक्त हो । जबकि क्रूर सत्य यह है कि लेखक अंतत: मनुष्य है बल्कि कहें कि आदमी के समक्ष वहीं ज्यादा आम आदमी है जो दूसरों की व्यथा को अपनी (जीवन) कथा में जोड़ने और भोगने को विवश है । अपने श्रम से वह दूसरों का स्वेद बहाता है और अपनी आँख में, वंचित के नेत्र-मल को मणि की तरह संरक्षित करना चाहता है । इस दोहरे संघर्ष और जीवन की नियमित अनिवार्यताओ को पूरा कर पाने की महातड़प में लेखक के व्यक्तित्व में प्राय: फाड़ आ जाती है और स्वभावत: वह 'सामान्य' व्यक्ति नहीं रह पाता । यह एक लेखक की जिंदगी का 'कुदृश्य' है जो वर्षों तक स्फटिक बनकर साहित्य के शीर्ष पर कौंधा करता है । यह किताब  रचनाकार के ऐसे ही जीवन-संसार का प्रत्पक्ष अवलोकन है । और सबसे सर्जनात्मक तथ्य यह कि इन शब्द-चित्त्रों ने लेखक तथा मूल विषय (हमदम, दोस्त) के बीच की तिरछी चितवन भी है, टकटकी, त्योरी, आँखमारी भी है और साथ ही है परिदर्शन, निगहबानी और कई स्थलों पर अनवलोकन अर्थात् नज़रअंदाजी भी । वास्तव में ये लेख साहित्यिक मित्रता के साहस, दुस्साहस, धैर्य, मनोबल, अभय तथा खुलेपन के अनुपम उदाहरण है ।
    मित्रता के स्तर पर साहित्यिक दुनिया के समकालीन 'सांप्रदायिक' माहौल में यह किताब एक ऐसी तूलिका की भूमिका निभा सकती है जो किसी रचनाधर्मी के पोर्ट्रेट, लैंडस्केप, फोक पेटिंग, कार्टून-सभी कुछ के दक्षता के साथ एक ही कैनवस पर उतार सकती है । ऐसी साहित्यिक मित्रताओं को शायद ही कहीं कोई अन्य वर्णमाला मिली हो । इस दृष्टि से यह किताब योगदान नहीं, वरदान है ।
  • Patra-Samvad : Ageya Aur Nand Kishore Aacharya
    Krishna Dutt Paliwal
    175 158

    Item Code: #KGP-1242

    Availability: In stock


  • Rangey Raghav Teen Charchit Upanyas
    Rangey Raghav
    550 495

    Item Code: #KGP-2005

    Availability: In stock

    रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट कथाकारों में हैं जिनकी रचनाएं अपने समय को लांघकर भी जीवित रहती हैं। रांगेय राघव के तीन उपन्यासों—‘आग की प्यास’, ‘छोटी सी बात’ और ‘दायरे’ को पाठकों की सुविधा के लिए यहां एक ही जिल्द में प्रस्तुत किया जा रहा है—
    ‘आग की प्यास’ रांगेय राघव का एक बहुचर्चित उपन्यास है, जिसकी कथावस्तु के केंद्र में ग्रामीण जीवन है—वहां की राजनीति, अर्थव्यवस्था और बदलता हुआ सामाजिक-धर्मिक परिवेश। लेकिन मुख्य कथावस्तु अर्थकेंद्रित है। समाज के कुछ इने-गिने लोगों की धन की प्यास कैसे वृहत्तर समुदाय का जीवन नारकीय बनाती जा रही है, यह इस उपन्यास में प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुआ है।
    ‘छोटी सी बात’ रांगेय राघव का अत्यंत लोकप्रिय एवं पठनीय उपन्यास है। कलेवर में भले ही यह लघु है परंतु अपने कथ्य में अत्यंत विराट है। कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जीवंत दस्तावेज है।
    ‘दायरे’ उपन्यास का केंद्र एक अवैध (?) बच्चे और उसकी मां की यातना है, लेकिन उसके माध्यम से लेखक ने स्त्री-पुरुष के संबंधों से लगाकर धर्म-संस्कृति तक को अपने दायरे में ले लिया है। एक तीव्र संवेदनात्मक तथा वैचारिक द्वंद्व उपन्यास में शुरू से आखिर तक चलता रहता है। रांगेय राघव ने हिंदी कथा साहित्य को रोजा, सत्यदेव, फादर तोलियाती के रूप में तीन अमर पात्र इस उपन्यास में दिए हैं...
  • Rajani Din Nitya Chala Hi Kiya
    Hazari Prasad Dwivedi
    160 144

    Item Code: #KGP-1908

    Availability: In stock

    रजनी-दिन नित्य चला ही किया
    गुरुवर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अनेक विधाओं में रचना की है। उनका कवि रूप अपेक्षाकृत अल्पज्ञात है ।  उनकी कविताओं में, उनके निबंधों की ही भाँति, सर्वत्र एक विनोद-भाव मिलता है। गंभीर चिंतन और व्यापक अध्ययन को सहज तौर पर हलके-फुलके ढंग से पाठक श्रोता पर बोझ डाले बिना प्रकट करना उनके व्यक्तित्व और लेखक की विशेषता और क्षमता है । द्विवेदी जी लोकवादी विशेषण को पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वे लौकवाद का संस्कृत में क्या अर्थ होता है, समझते थे । लेकिन वे महत्व सबसे अधिक लोक को देते थे । वे बोलियों, लोक-साहित्य, लोक-धुनों और जन-प्रचलित लोक-साहित्य रूपों पर अतीव गंभीरता से विचार करते थे । द्विवेदी जी ने संस्कृत और अपभ्रंश में भी कविता की है । उनकी काव्य-दृष्टि मनुष्य की उच्चता और नीचता दोनों को देखती है, इसीलिए उनकी कविताओं में संवेदना और समझ का संयोग है ।
  • Plot Ka Morcha
    Shamsher Bahadur Singh
    450 405

    Item Code: #KGP-588

    Availability: In stock


  • 20-Best Stories From China (Paperback)
    Prashant Kaushik
    99

    Item Code: #KGP-7199

    Availability: In stock

    What is an anthology, if not an amalgamation of words?

    In this 20-BEST series, we bring to you short stories, folktales and classics from a land that is as enigmatic as they are intriguing. Chinese short stories are world famous for their story-telling flow—natural, simple, and veracious. A 360-degree contrast from the tales of our country, from the social makeup 
    of our society, our beliefs, customs and legends, these stories open up a new world on each page.

    With stories like Taoist Novice, Chang And Cheng, Supernatural Wife, Taoist Priest, Man Thrown In A Well, Rat Wife, this book is a compilation of 20 famous Chinese short stories. Each story is beautiful in its own style, holding the readers spellbound.

    Time to indulge in some old-world charm all the way from China.
  • In Dinon
    Vinita Gupta
    60

    Item Code: #KGP-1909

    Availability: In stock

    इन दिनों
    ग़ज़लों में छन्द का अनुशासन काकी दूर तक दिखाई देता है । इसके साथ-साथ ग़ज़ल के मुहावरे, व्याकरण, अंदाज़े-बयां, भाषा और विभिन्न बहरों को भी अपने जीवनानुभव तथा अभ्यास से उपलब्ध करने की सफ़ल कोशिश है । ग़ज़लों में एक ओर व्यक्तिगत अनुभूतियों तथा राग-विराग की स्थितियों के प्रस्तुति है तो दूसरी ओर समष्टिगत वेदनाएं, व्यथाएँ भी अंकित हुई हैं। विनीता के पास हिन्दी मुहावरे और शब्दावली का भण्डार तो है ही, उर्दू का रंग भी देखने को मिलता है । हिंदी, उर्दू के सहीं अनुपात ने इन ग़ज़लों को और भी निखार दिया है ।
  • Das Pratinidhi Kahaniyan : Shailesh Matyani (Paperback)
    Shailesh Matiyani
    120

    Item Code: #KGP-7213

    Availability: In stock

    अब वह सड़क पर था और उसकी आंखें रामचन्दर हलवाई के कारीगर के जलेबी बनाते हाथ के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थीं और भूख इतनी तीखी हो चुकी थी कि वह बदहवासी अनुभव कर रहा था। अपनी इस तरह की बदहवासी से रामखिलावन को डर लगता है। ऐसे में अक्सर उसे-चोरी सूझती है और इसी में वह कई बार बुरी तरह पिट भी चुका है।
    इस बार खाट पकड़ लेने से पहले तक उसकी मां कई घरों में बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने की नौकरी करती रही थी। कभी-कभार उसे भी साथ ले जाती वह। मौका ताड़कर घर के बच्चों की रंगीन किताबें पलटने लगता और अपनी पूर्व-स्मृति से काम लेता, जोर से पढ़ता-लौ-औ-ट-पौ-औ-ट-तो वह कैसे चोंककर देखती थी? खिलावन का यह अक्षरज्ञान उसमें एक आलोक उत्पन्न करता मालूम पड़ता था।
    फटे-पुराने कपड़ों के अलावा, बचा-खुचा खाना और त्योहारों पर कभी पूरी-मिठाई। लगभग डेढ़ महीने से मां काम पर नहीं जा पाई, ए.जी. आफिस वाले शुक्ला साहब के यहां। अकेले गया था वह। किसी बड़ीह चीज के लिए गुंजाइश नहीं रहती। दरवाजे से बाहर निकलते वक्त शुक्लाइन उसके पूरे जिस्म पर अपनी भैंगों आंखों को उंगलियों की तरह फिराती रहती हैं। बरतन धोते में सिर्फ दो छोअी चम्मचें उसने जांघिये की जेब में डाल ली थीं, हालांकि खुद उसके दिमाग में ही कुछ तय नहीं था कि उनका वह क्या उपयोग कर पाएगा। जाने की उतावली में वह ‘बहूजी, हम जाइत हैं’, की आवाज लगाने के साथ-साथ, तेजी से दरवाजे तक पहुंच गया था। तभी शुक्लाइन का चटख लाल चूड़ियों से भरा पंजा उसके जांघिये की जेब पर पड़ा था और बदहवासी में उसके मुंह से चीख निकल गई थी।
    -इस पुस्तक की ‘चील’ कहानी से
  • Hamare Aadarsh Mahapurush
    Nirankar Dev Sewak
    40

    Item Code: #KGP-948

    Availability: In stock


  • Aavaran
    Bhairppa
    495 446

    Item Code: #KGP-873

    Availability: In stock


  • Rigved, Harappa-Sabhyata Aur Sanskritik Nirantarta
    Dr. Kripa Shanker Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-162

    Availability: In stock

    आज यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऋग्वेदिक संस्कृति हड़प्पा-सभ्यता के पूर्व की संस्कृति है । कितने वर्ष पूर्व की, यह कहना कठिन है; पर ऋग्वेद के वर्ण्य विषय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पा-सभ्यता (3000 ई.पू.) से कम से कम डेढ़ सहस्त्र वर्ष पहले से यह अवश्य ही विद्यमान थी । हड़प्पा-सरस्वती-सभ्यता से संबंधित स्थलों की खुदाइयों में इस तरह के प्रभूत प्रमाण मिले हैं, जिन्हें ऋग्वेदिक समाज की मान्यताओं और विश्वासों के पुनर्कथन के रूप में देखा जा सकता है और वही सांस्कृतिक ऋक्थ वर्तमान हिन्दू समाज का भी मूल स्वर है । उस ऋक्थ को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरुरत है । 
    ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम साहित्यिक कृति भी है । उसमें अधिकाधिक ऐसा ऋचाएँ हैं, जो सर्वोत्कृष्ट काव्य के रूप में रखी जा रही जा सकती हैं । ऐसा ऋचाएँ भी हैं, जो शुद्ध रूप से भावनात्मक दृष्टि से कही गयी हैं और बहुत बड़ी संख्या में ऐसी ऋचाएँ भी हैं, जो प्रकृति के रहस्यमय दृश्यों के ऐन्द्रजालिक लोक में ले जाती हैं । 
  • Nai Chetana Ki Disha
    Rajeshwar Prasad Kaushik
    90 81

    Item Code: #KGP-9133

    Availability: In stock

    ध्यान, मनन, चिंतन
    ध्यान करने का उद्देश्य है ध्याता को खोजना । ध्याता (वह सत्ता जो ईश्वर, सत्य या निर्वाण का दर्शन करना चाहती है) को खोजे बिना ध्यान केवल भ्रम का एक यंत्र बनता है । ध्याता को खोजना उसकी परिसमाप्ति है । वह सत्य, जो यह कहे कि मुझे ईश्वर को या सत्य को खोजना है, पाना है, वह उसे कमी भी नहीं पा सकता । बुद्धि स्वयं सीमित है, वह उस असीम या शाश्वत की कभी अनुभूति नहीं कर सकती । बुद्धि की सर्वोच्च अनुभूति केवल यह हो सकती है कि वह सीमित तथा प्रतिबद्ध है और इसलिए वह सत्य का दर्शन पाने में असमर्थ है।  इस विवेक का उदय होने पर बुद्धि शांत हो जाती है । बुद्धि के पूर्ण शांत होने का अर्थ है-ध्याता की समाप्ति और ध्यान की भी समाप्ति । ध्यान की ही समाप्ति में से ही प्रेम प्रस्फुटित होता है ।
    यदि कोई व्यक्ति भावुक और गम्भीर है तो इसी क्षण इस प्रस्फुटन के अनुभूति हो सकती है । अन्यथा मनुष्य को ध्यान के अनेक भिन्न-भिन्न  उपायों और पद्धतियों के बीच से होकर गुजरना होता है और उनकी सीमाएँ देखनी होगी । ये उपाय और पद्धतियां बुद्धि की उपज है, इसलिए वे अधिक सूक्ष्म रूपों में 'मैं' और 'मेरा' को जीवित बनाये रखती है । इन पद्धतियों के द्वारा सत्य की खोज की व्यर्थता की जब अनुभूति होती है तब विवेक का आरम्भ होता है ।
  • Dohra Abhishaap
    Kaushlya Baisntari
    220 198

    Item Code: #KGP-2011

    Availability: In stock

    दोहरा अभिशाप
    दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाने हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है ।
    आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओँ में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने को होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से लेने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलिन साहित्य में यह प्राय: देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीडा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी
    जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर  परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण का लेता है । आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते है जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस पीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं—बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता हैं । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन को स्थितियां कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।
    कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वागपूर्ण चित्र  प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम, विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है । छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते है यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
  • Sahitya Vimarsh
    Jayanti Prasad Nautiyal
    195 176

    Item Code: #KGP-9098

    Availability: In stock


  • Lauh Kapaat Ke Pichhe
    Shravan Kumar Goswami
    60 54

    Item Code: #KGP-1971

    Availability: In stock

    हर जेल के आगे एक अभेद्य लौहकपाट होता है । इसके पीछे एक दुनिया होती है, जो हमारी अपनी ही दुनिया का हिस्सा होते हुए भी, इस दुनिया से बिलकुल स्वतन्त्र एक अलग ही दुनिया होती है । इसके अपने कायदे-कानून होते हैं । यहां जो कुछ भी होता है, उसकी खबर किसी को भी नहीं मिलनी । इसकी चिंता न तो खोजी पत्रकारों को सताती है और न हमारी सरकारों को । इसकी सुधि न तो विरोधी दल के लोग लेते हैं और न न्यायाधीश । 'लौहकपाट के पीछे" वास्तव में जो होता है, उसकी सही जानकारी इसके भीतर रहने वाले बंदियों को भी नहीं मिल पाती है ।
    इस पुस्तक के लेखक ने किसी की हत्या नहीं की थी, उसने किसी के साथ बलात्कार भी नहीं किया था, उसने कोई डकैती भी नहीं की थी और न उसने किसी सरकार का तख्ता पलटने का षड़यन्त्र ही किया था, फिर भी बिहार सरकार ने श्रवणकुमार गोस्वामी को अपने विश्वप्रसिद्ध हजारीबाग के केंद्रीय कारागृह में कुछ समय के लिए कैद रखा था । अपने कारावास के दौरान लेखक ने जेल-जीवन को अत्यन्त समीप से केवल देखा ही नहीं, बल्कि उसे भोगा भी है । अपने इन्हीं अनुभवों का जो विवरण लेखक ने इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है, वह केवल चौकानेवाला ही नहीं, अपितु सभ्य संसार के मुँह पर एक करारा तमाचा भी है ।
    मनोविज्ञान, अपराधशास्त्र, समाजशास्त्र तथा संस्मरण के चौराहे पर खडी यह पुस्तक एक ऐसी विरल कृति है, जो लेखक के उपन्यासों के समान ही अत्यन्त प्रवाहपूर्ण एवं रोचक है ।
    'लौहकपाट के पीछे' उन सभी व्यक्तियों की आंखें खोलने वाली एक अत्यन्त उत्तेजक, उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक है, जो 'मनुष्य और समाज' के बारे में निरन्तर सोचते हैं और मनुष्य के'कल्याणमय भविष्य' के लिए चिन्तित भी रहते हैं। 
  • Kavi Ne Kaha : Chandrakant Deotale (Paperback)
    Chanderkant Deotale
    90

    Item Code: #KGP-1492

    Availability: In stock

    कवि ने कहा: चन्द्रकांत देवताले
    जिस तरह मैं मनुष्य हूं उसी तरह कवि, मनुष्य होना मेरा पेशा नहीं है वैसे ही कविताई भी। जहां भी होता हूं कवि और मनुष्य एक साथ होने के कारण सबके बीच होने का अहसास होता है। असाधारण-विशेष होने के बदले मुझे हमेशा लगता रहा है कि कवि अपनी भाषा की धरती और अपने जनपद के जीवन में आदिवासी की तरह रहता है। आधुनिकता, वैज्ञानिक तथा सूचना-क्रांति की बाढ़ में भी नए परिप्रेक्ष्य में उसकी चिंताएं आदिवासी के सरोकारों जैसी ही होती हैं। देशीयता-स्थानीकता-जश्मीन और अपनी भाषा को बचाने की चिंता। मुट्ठी-भर लोगों की जन्नत बने इस लोकतंत्र में लोक की ही फजीहत हो रही है। गरीबी और अमीरी के बढ़ते भयावह फासले के बीच विस्थापन और बाज़ारवाद हड़कंप मचा रहा है। झुलसती हुई उम्मीद के बीच विकास के इस रौद्र रूप को हम देख ही रहे हैं।

    वैसे तो कवि...जन्मजात अन्याय-विरोधी और विद्रोही होता है। याद कर सकते हैं आदिकवि और क्रौंच-वध का प्रसंग। सृजन सदियों पहले भी संग्राम-भूमि था। संत तुकाराम के अभंग की पंक्तियां---‘‘दिन-रात हम शामिल एक युद्ध में, जो दुनिया और मन में बाहर-भीतर हो रहा।’’ आज तब से अधिक भयावह समय। ऐसे में कवि किसलिए-क्या कर रहे? यह सवाल मेरा नहीं दुनिया के बड़े कवियों का है, जिनकी आवाज़ बुलंद थी और अवाम को स्पंदित करती थी।

    मेरा कहना है--‘‘इस वक्त कविता नहीं लिख-सुन सकते वो जो सोचते हैं खाए हुए पेट से। यह वक्त, वक्त नहीं एक मुकदमा है, या तो गवाही दो या गूंगे हो जाओ हमेशा के वास्ते।’’
    -चन्द्रकांत देवताले
  • Mere Saakshaatkaar : Vidya Sagar Nautiyal
    Vidya Sagar Nautiyal
    250 225

    Item Code: #KGP-635

    Availability: In stock


  • Shyama Prasad Mukharjee : Jeevan Darshan
    Mukesh Parmar
    150 135

    Item Code: #KGP-479

    Availability: In stock

    डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का नाम स्वतंत्र भारत के विस्तृत नवनिर्माण में एक महत्त्वपूर्ण आधारस्तंभ के रूप में उल्लेखनीय है। जिस प्रकार हैदराबाद को भारत में विलय के लिए पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है, उसी प्रकार बंगाल, पंजाब और कश्मीर के अधिकतर भागों को भारत का अभिन्न अंग सुरक्षित करा पाने के दृष्टिकोण से डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के उल्लेखनीय प्रयास हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। उन्होंने किसी दल या सर्वोच्च नेतृत्वकर्ताओं के दबाव में आकर राष्ट्रहित को नजरअंदाज करते हुए कोई समझौता नहीं किया, न ही किसी दल की सीमा में बंधकर रहे। उनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि था।
    उन्होंने जो भी निर्णय लिए राष्ट्रहित और हिंदुत्व की सुरक्षा की दृष्टि से लिए। यहां तक कि अपनी इसी विचारधारा के चलते अपना बलिदान तक दे दिया।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Nanak Singh (Paperback)
    Nanak Singh
    80

    Item Code: #KGP-7003

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : नानक सिंह
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार नानक सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कुचले हुए पुष्प', 'लक्ष्मी-पूजा', 'अंतर्ज्ञान', ‘अछूते आम', 'चक्षुहीन संत', 'जर्जर खपरैल की एक स्लेट', 'स्नोफॉल', 'इनसान-हैवान', 'लंबा सफ़र' तथा 'जब हम में 'इनसान' प्रकट होता है' । 
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक नानक सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Kashi Nath Singh
    Kashi Nath Singh
    300 255

    Item Code: #KGP-553

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार काशीनाथ सिंह  ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'कविता की नई तारीख', 'अपना रास्ता लो बाबा', 'जंगलजातकम', 'माननिय होम मनिस्टर के नाम', 'वे तीन घर', 'मुसइ चा', 'सदी का सबसे का आदमी', 'लाल किले के बाज', 'सुधीर घोषाल' तथा 'कहानी सरायमोहन की'।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक काशीनाथ सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Vaksh Shila
    Sunil Gangopadhyaya
    90 81

    Item Code: #KGP-2008

    Availability: In stock

    वक्ष-शिला
    'वक्ष-शिला' पढ़ने का अर्थ है एक पुरे इतिहास से गुजरना । सातवें दशक  में पश्चिम बंगाल, बिहार आदि राज्यों में नक्सलवाद की जो तीव्र आंधी, चली थी, उसमें जिस तरह हजारों युवकों को बलि चढी थी, उसका साक्षी इतिहास है और उस इतिहास का एक अंश है यह उपन्यास । प्रसिद्ध बांग्ला क्याकार सुनील गंगोपाध्याय ने उस समय को, उस काल की स्थितियों को, युवा मन की भावनाओं को, राजनीति को लेकर इस उपन्यास का जो रोचक ताना-बाना बुना है, वह अदभुत है । यह उपन्यास प्रमाणित करता है कि एक औपन्यासिक जाते के माध्यम से किसी विशेष कालखंड को कितनी गहनता से प्रस्तुत किया जा सकता है ।
    'नक्सलवाद' वैचारिक धरातल पर बहुत सारे प्रश्न छोड़ गया है, आज भी हम उन प्रश्नों के घेरे से बाहर नहीं निकले हैं, किंतु इस उपन्यास में अनेक प्रश्नों के उत्तर हमें मिल सबत्ते हैं जो उस आंदोलन को समझने में मदद करते हैं ।
    अनूठी शैली, रोचक भाषा और नये धरातल पर खडी कथा के कारण यह उपन्यास अपना एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ता है ।
  • Sant Kavi Dadu
    Baldev Vanshi
    220 198

    Item Code: #KGP-100

    Availability: In stock

    संत कवि दादू
    श्री दादूजी महाराज की वाणी काव्यमयी है । अतः  महाराज की वाणी काव्य है । श्री दादूजी महाराज और कबीर जी में प्रकृति भेद के कारण दोनों के व्यक्तित्व में स्वभावत: भेद आ गया है । वैसे उनके विचारों और सिद्धांतों में कोई भेद नहीं है । दोनों ही संत ज्ञानश्रयी  धारा के अग्रणी संत हैं । दोनों का मार्ग भक्तिमार्ग है । दोनों में ही जहाँ हिंदू और मुसलमानी मजहबों की आलोचना की है वहीं दोनों ने भारतीय दार्शनिकों और भक्तों के विचारों को स्वीकार किया है ।
    हम पहले ही कह चुके है कि यद्यपि श्री महाराज ने अपनी वाणी में बार-बार भक्तों और संतों के नामों का आदरपूर्वक संस्मरण किया है, उनकी वाणी में गोरखनाथ, नामदेव, कबीर, पीपा, रैदास आदि के नाम बार-बार आए हैं, किंतु उनकी श्रद्धा कबीर में अधिक है :
    साँचा शब्द कबीर का, मीठा लागे मोय । 
    दादू सुनताँ परम सुख, केता आनंद होय ।
  • Kavi Ne Kaha : Gyanendrapati (Paperback)
    Gyanendrapati
    90

    Item Code: #KGP-1409

    Availability: In stock

    कवि ने कहा : ज्ञानेन्द्रपति
    ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता की अप्रतिमता के कारकों में अवश्य ही यह तथ्य है कि उसकी जड़ें लोक की मन-माटी में गहरे धँसी हैं और उसकी दृष्टि विश्व-चेतस् है । जीवन-राग उनकी कविता में लयात्मकता में ढल जाता है ।  वे  कविता के नहीं, उस मुक्तछन्द के कवि हैं निराला ने जिसकी प्रस्तावना की थी । उनकी कविता आद्यन्त छान्दिक आवेग से ओतप्रोत है, बल्कि उसकी संरचना उसी से निर्धारित होती है । बेशक, यह हर बार एक नये छन्द का अन्वेषण हैं जो कविता के कथ्य के अनुसार जीवन-द्रव्य के साथ कवि-चित्त की एकात्मता से सम्भव होता है । हिन्दी की विशाल भाषिक सम्पदा का सार्थक संदोहन भी उनके यहां खूब बन पडा है । तदभव-सीमित रहना उनकी कविता की मजबूरी नहीं, उसके लिए न तो तत्सम अछूत है न देशज अस्मृश्य; अवसरानुकूल नये शब्दों के निर्माण की उसकी साहसिकता तो कुख्यात होने की हद तक विख्यात है ।
    ज्ञानेन्द्रपति की कविता एक और तो छोटी-से-छोटी सचाई को, हल्की-से-हल्की अनुभूति को, सहेजने का जतन करती है प्राणी-मात्र के हर्ष-विषाद को धारण करती है; दूसरी ओर जनमत भूमि पर दृढ़ता से पाँव रोपे सत्ता-चालित इतिहास के झूठे सच के मुकाबिल होती है । धार्मिक सत्ता हो या राजनीतिक सत्ता-वह किसी को नहीं बख्शती । उसकी दीठ प संतप्त भूगोल है । साम्राज्यबाद के नए पैंतरों का वह पहचानती है । अभय में पगी हूई करुणा उसे विरासत में मिली है । वह एक महान् परम्परा की परिणति है ।
    स्वयं ज्ञानेन्द्रपति द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताओं के इस संकलन में उनके तमाम प्रकाशित संग्रहों से तो हैं ही, आयामी संग्रेहों से भी कविताएँ शामिल है, बल्कि अनेक तो पहली बार यही प्रकाशित हो रही हैं । बिला शक अपने समाज-समय को कविता को आँख से देखना-समझना चाहने वालों के लिए एक अनिवार्य-किताब नहीं-सहचर! 

  • Path Pragya
    Veena Sinha
    240 216

    Item Code: #KGP-171

    Availability: In stock


  • Mere Jeevan Ka Prashasanik Kaal (Paperback)
    Indira Mishra
    180

    Item Code: #KGP-410

    Availability: In stock

    मेरे जीवन का प्रशासनिक काल
    श्रीमती इंदिरा मिश्र के प्रशासनिक जीवन की इन स्मृतियों में एक नई वैचारिक ऊर्जा का समावेश निहित है। इस कृति से तथाकथित बहुप्रचलित ‘स्त्री-विमर्श’ की अवधारणा को, फिकरेबाजी से अलग, एक नया आयाम हासिल होता है कि वह मात्रा दलित या शोषित स्त्री का दायरा नहीं है, वरन् समाज में स्थापित कुशाग्र, प्रबुद्ध एवं सक्रिय स्त्री के अंतर्द्वंद्वों का भी प्रतिबिंब बन सकता है।
    यूं डॉ. इंदिरा मिश्र रचनात्मक साहित्यिक लेखन में भी दखल रखती हैं, किंतु यहां अभिव्यक्ति के केंद्र में गहन मूल्यों की जगह प्रशासनिक तंत्र का ताना-बाना है--जो मुख्यतः सूचनात्मक एवं ज्ञानवर्धक है--पर कहीं-कहीं ऐसे मानवीय प्रसंग और आख्यान भी अनायास मुखर हुए हैं--जिनमें सशक्त कथा साहित्य के गुण मौजूद हैं। लगता है ऐसे ही अनेक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर लेखिका ने अपनी कहानियां गढ़ी होंगी, और जो शेष रह गए, उन्हें इस संस्मरण माला में यथावत् शामिल कर लिया।
    प्रस्तुत पुस्तक में सिविल सेवा में प्रशिक्षणार्थी से लेकर राज्य के अपर मुख्य सचिव तक के अपने प्रशासनिक जीवन के जो कालखंड लेखिका ने शब्दस्थ किए हैं, उन्हें सुरुचिपूर्ण ढंग से क्रमबद्ध किया गया है।
    विविध रुचि के समस्त पाठकों में यह कृति विशेषतः उन युवाओं (विशेषकर लड़कियों) के लिए ज्यादा सटीक है जो प्रशासनिक सेवा में अपना कैरियर बनाने का ध्येय रखते हैं।
    --राजेश जैन
  • Da Se Dalaal
    Barsane Lal Chaturvedi
    40 36

    Item Code: #KGP-9095

    Availability: In stock


  • Bharatratna Dr. A.P.J. Abdul Kalam : Jeevan Darshan
    M.A. Sameer
    200 180

    Item Code: #KGP-1570

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Madhukar Singh
    Madhukar Singh
    200 180

    Item Code: #KGP-14

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    'किताबघर प्रकाशन' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार मधुकर सिंह ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'तक्षक', 'अगनुकापड़', 'उसका सपना', 'हरिजन सेवक', 'दुश्मन', 'कवि भुनेसर मास्टर', 'भाई का जख्म', 'लहू पुकारे आदमी', 'सत्ताचारी' तथा 'माई' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार मधुकर सिंह की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Parineeta
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    150 135

    Item Code: #KGP-78

    Availability: In stock


  • Dekhana Ek Din
    Dinesh Pathak
    240 216

    Item Code: #KGP-491

    Availability: In stock

    साहित्य में प्रचलित नारों और विमर्शों के शोर-शराबे से अलग अपने एकांत में रचनारत दिनेश पाठक की अधिकांश कहानियां मानव संबंधों व विभिन्न कारणों से उनमें  बनते-बदलते सरोकारों की पड़ताल करती हैं।  
    ‘देखना एक दिन’ संग्रह की कहानियों का मूल स्वर भी इसी भावभूमि के इर्द-गिर्द हैं। इस संग्रह की अधिकतर कहानियां एक विशेष परिवेश से जुड़ी दिखने के बावजूद संपूर्ण भारतीय समाज के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत करती हैं। बहुआयामी धरातल की इन कहानियों में गांव व कस्बे का जीवन तो है ही, साथ ही उनका संघर्ष, उनका जुझारूपन, उनके सुख-दुःख, उनकी आशा-निराशा, उनके बनते- ध्वस्त होते सपने तथा मूल्य संक्रमण के कारण उत्पन्न मानसिक विचलन और इन सबसे इतर जीवन के प्रति उनकी गहन आस्था व गहरी जिजीविषा है। यही कारण है कि वे पराजित नहीं होते, पराजय के बीच से फिर-फिर उठ खड़े होते हैं। यहां ठेठ ग्रामीण जीवन से निकले पात्र भी हैं जिनके लिए जीवन सदा सोद्देश्य है, आधुनिक जीवनशैली व चकाचौंध के प्रति आसक्त चरित्र भी हैं, राजनीतिज्ञों के दुश्चक्र में फंसकर सामाजिक सरोकारों के योद्धा रूप में विकसित होते-होते अपनी संभावनाओं से भटक जाने वाले व्यक्ति भी हैं तो यहां अपनी अस्मिता को तलाशती और उसके लिए जूझती ऐसी स्त्रियां भी हैं जो अंततः विद्रोह की हद तक जा सकती हैं। 
    प्रस्तुत पुस्तक में कथाकार ने भाषा को किसी उलझाव में डाले बिना अत्यंत सहज-सरल भाषा-शैली में कथ्य को, परिवेश को, चरित्रों को और परिवेशगत बेचैनी व छटपटाहट को पूरी विश्वसनीयता, प्रामाणिकता तथा गहरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ये कहानियां आदि से अंत तक न केवल अपने पाठकों को बांधे चलती हैं बल्कि उन्हें झकझोरने से भी नहीं चूकतीं।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Manohar Shyam Joshi
    Manohar Shyam Joshi
    195 176

    Item Code: #KGP-2075

    Availability: In stock

    "दस प्रतिनिधि कहानियाँ" सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य के सर्वाधिक चर्चित लेखक मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन उनके जीवनकाल में न आ सका, इस बात का हमें गहरा अफसोस है । अपनी प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका में यह स्वयं क्या स्थापित-विस्थापित करते, यह अनुमान तक कर पाना असंभव है । मगर उन्होंने अपने कथा-साहित्य में सचमुच क्या कर दिखाया है-इसकी रंग-बिरंगी झलक दिखाई देगी पुस्तक में लिखी मर्मज्ञ आलोचक-आचार्य डॉ० कृष्णदत्त पालीवाल की भूमिका से ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार  मनोहर श्याम जोशी ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'सिल्वर वेडिंग', 'एक दुर्लभ व्यक्तित्व', 'शक्करपारे', 'जिंदगी के चौराहे पर', 'उसका बिस्तर', 'मैडिरा मैरून', 'धरती, बीज और फल', 'गुड़िया', 'धुआँ' तथा 'कैसे हो माटसाब आप?'
    हमेँ विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक  मनोहर श्याम जोशी की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kahani Samagra : Nasera Sharma(3Vols.)
    Nasera Sharma
    2100 1785

    Item Code: #KGP-375

    Availability: In stock

    प्रख्यात कथा-लेखिका नासिरा शर्मा की कहानियाँ  समकालीन स्त्री रचनाकारों की कहानियों से कई मायनों में अलग और सर्वथा नई परिभाषा गढ़ती हुई नजर आती हैं । उनके यहाँ इनसानी रिश्ते केवल खून से ही नहीं, संवेदनाओं के उन तंतुओं से निर्मित होते हैं, जो इनसानियत के वजूद को बचाए रखने के लिए जारी हैं ।
    पहले खंड की कहानियाँ परिवार, देश-समाज की सीमा को लाँघते हुए ईरान तक की यात्रा कराती हैं । ईरान के अपने प्रवास काल के दौरान लेखिका ने जिस शिद्दत से वहाँ की जीवनशैली, संस्कृति को आत्मसात् किया, उसको बहुत प्रभावी ढंग से उन्होंने इन कहानियों में अभिव्यक्त भी किया है ।  इस बहाने भारत और ईरान के प्राचीन रिश्तों की भी लेखिका शिनाख्त करती हैँ। इस खंड की कई कहानियों में लेखिका अपने अतीत के पन्ने उलटते हुए उन क्षणों को वर्तमान संदर्भों से पुन: जीवंत करने का प्रयत्न करती है, जिन पर समय की बेशुमार परतें चढ़ चुकी हैं । दरअसल इन कहानियों के जरिए लेखिका अपने अतीत में घटित उन सामाजिक-राजनीतिक घटनाओँ की पड़ताल बदले हुए समय में करती हैं, जिनका संबंध वर्तमान से विच्छेद नहीं हुआ है ।
    दूसरे खंड की कहानियाँ इनसान के भीतर मौजूद शैतान को बाहर खींच निकालती हैं। सत्तालोलुपता की हवस में इनसान के हैवान में रूपांतरण की ये कहानियाँ अनेक सवालों को उठाती हैं। धर्म-स्थापना के नाम पर किसी भी प्रकार के अधार्मिक और अमानवीय क्रियाकलापों को जायज़ ठहराने वाली बीमार मानसिकता को भी ये कहानियाँ अनावृत करती हैं। इन कहानियों में समाज के निचले तबके के उन लोगों के दारुण यथार्थ की तस्वीर भी मौजूद है, जो अपना सब कुछ न्योछावर करके किसी भी देश-समाज की सांस्कृतिक नींव तैयार करते हैं। बावजूद इसके शक्तिसंपन्न और सामंती मानसिकता के लोग उनका शोषण करना अपना अधिकार समझते हैं।
    तीसरे खंड में लेखिका द्वारा पिछले तीन दशक में लिखी गई कहानियाँ सम्मिलित हैं । इनमें कुछ लंबी और कुछ लघु कथाएँ भी हैं । कथानक और घटनाक्रम के आधार पर इस खंड की कहानियाँ पूर्ववर्ती दो खंडों की कहानियों से कूछ अलग नजर आती हैं । इसका कारण यह है कि इस खंड की कहानियों में लेखिका ने अपनी दृष्टि के  विस्तार को थोड़ा संघनित किया है । यही वजह है कि इनमें देश-समाज-राजनीति-इतिहास से जुड़ी कहानियों के स्थान पर इनसानी नस्ल की प्रवृतियों पर आधारित कहानियाँ पढ़ने को मिलती हैं । बहुत कम लेखक ऐसे होते हैं, जिनकी आँखें बारीक़ से बारीक रेशे को पकड़ती हैं, जिनके कान महीन से महीन आवाज को सुनते हैं और नाक हलकी से हलकी गंध ग्रहण करती है । ऐसे लेखकों को हम सहस्राक्षी लेखक भी कह सकते हैं । नासिरा शर्मा भी ऐसी ही लेखिका ।
    इनसानी मनोविज्ञान का गहन विश्लेषण करती ये कहानियाँ लेखिका के भाषा-प्रवाह और ट्रीटमेंट के प्रति सजगता को भी प्रमाणित करती हैं ।
  • Malik Muhammad JaaysI
    Chandrika Prasad Sharma
    150 135

    Item Code: #KGP-139

    Availability: In stock

    मलिक मुहम्मद जायसी एक कवि होने के साथ-साथ सिद्ध फकीर भी थे । उनकी काव्य-प्रतिभा अद्वितीय थी । उन्होंने आंचलिक भाषा अवधी में जितना सुंदर महाकाव्य रचा है, उतना हिंदी साहित्य के किसी दूसरे कवि ने नहीँ रचा । जायसी ने ठेठ अवधी की उच्चकोटि की शब्दावली का प्रयोग किया है ।
    अवध के रायबरेली जनपद के कस्बे 'जायस' का नाम उन्होंने अमर कर दिया । उनका महाकाव्य 'पदमावत' उच्च कक्षाओं के पाठयक्रम से पढाया जाता है । अनेक विद्वानों ने इस ग्रंथ पर शोध करके पी-एच०डी० और डी० लिट्० की उपाधियां प्राप्त की हैं ।
    देश के अतिरिक्त विदेशों के विभिन्न विश्वविद्यालयों में भी यह ग्रंथ पाठ्यपुस्तक के रूप में पढ़ाया जाता है । लोकभाषा का जितना मनोहारी रूप इस ग्रंथ में प्राप्त होता है, उतना अन्यत्र दुर्लभ है ।

  • Himachal Pradesh Ka Lok Jeevan
    Kuldeep Singh
    290 261

    Item Code: #KGP-9113

    Availability: In stock

    हिमाचल प्रदेश का लोक-जीवन
    आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारी लोक-संस्कृति पिछड़ी तो नहीं है, परंतु आधुनिकता के लबादे ने इसको ढक अवश्य दिया है। एक तरफ पाश्चात्य संस्कृति की चकाचैंध से आम व्यक्ति प्रभावित हुआ है तो दूसरी तरफ आधुनिकता और परंपरा में सामंजस्य न बिठा पाने के कारण भी हमारी लोक-संस्कृति पतनोन्मुख हुई है। टी.वी. के विदेशी चैनलों ने आम व्यक्ति के पहनावे, खान-पान, रहन-सहन तथा दिनचर्या को प्रभावित ही नहीं किया, बल्कि परिवर्तित करके रख दिया है। फलतः मूल लोक-संस्कृति की जड़ें हिल गई हैं। आम व्यक्ति दोराहे पर आ गया है। न तो वह स्वयं को आधुनिकता के अनुरूप ढाल पा रहा है और न ही पूर्ण रूप से अपनी लोक-संस्कृति को व्यवहार में ला रहा है। 
    गत दो-तीन दशकों में हिमाचल प्रदेश की ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारत की लोक-संस्कृति में व्यापक उथल-पुथल देखने को मिली है। संस्कृति के ढाँचे में परिवर्तन भी हुए हैं। अनेक रीति-रिवाजों, परंपराओं, प्रथाओं का तथाकथित आधुनिकीकरण हुआ है, परंतु यह सब होने के बावजूद आधुनिकता और लोक-संस्कृति  का आपसी सामंजस्य नहीं बैठ पाया है।
    इस पुस्तक के माध्यम से भारत का जनमानस हिमाचल प्रदेश के जनजीवन की केवल झलक ही नहीं पा सकेगा, बल्कि उसे वास्तविक रूप में निहार भी सकेगा, उसका अनुभव भी कर सकेगा। साहित्यकार किस प्रकार किसी भी संस्कृति और जनजीवन को अंकित करता है, यह कृति उसका प्रमाण है।
  • Chetana
    Madan Lal Sharma
    125 113

    Item Code: #KGP-1812

    Availability: In stock


  • Kavi Ne Kaha : Kunwar Narain (Paperback)
    Kunwar Narayan
    90

    Item Code: #KGP-1217

    Availability: In stock

    शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण की कुछ कविताओं का यह संचयन उनके विस्तृत काव्य-बोध को समझने में सहायक होगा। पिछले पचास-साठ वर्षों में होने वाली महत्त्वपूर्ण गतिविधियों की सूक्ष्म एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति इन कविताओं में प्रतिबिंबित हुई है। इस संग्रह में किसी विभाजन के अंतर्गत कविताएँ नहीं चुनी गई हैं, कोशिश है कि ‘आत्मजयी’ एवं ‘वाजश्रवा के बहाने’ को छोड़कर बाकी सभी कविता-संग्रहों में से कुछ कविताएँ रहें।
    समय और स्थान की निरंतरता का बोध कराती उनकी कविताएँ दूर समयों, जगहों और लोगों के बीच हमें ले जाती हैं। कुँवर नारायण की कविताएँ लंबी और जटिल भारतीय अस्मिता को बहुत कुशलता से आधुनिकता के साथ जोड़कर दोनों को एक नई पहचान देती हैं। उनकी रचनाशीलता में हिंदी भाषा तथा विभिन्न विषय नई तरह सक्रिय दिखाई देते हैं। एक ओर जहाँ वह पारंपरिक भाषा में नई ऊर्जा डालते हैं वहीं बिलकुल आज की भाषा में एक बहुत बड़े विश्वबोध् को संप्रेषित करते हैं-कविता के लिए ज्यादा से ज्यादा जगह बनाते हुए। प्रस्तुत कविताओं का संकलन पाठकों को कई तरह से संतोष देगा।

  • Dharti Ki Satah Par
    Adam Gondvi
    250 225

    Item Code: #KGP-1904

    Availability: In stock

    आज से लगभग दो दशक पहले अदम गोंडवी की कुछ गजलें पढ़ने को मिली थीं । सियासत. लोकतंत्र और व्यवस्था पर चाबुक मारती अदम गोंडवी की गजलों में एक ऐसी खनक सुनाई देती थी, जैसी अस्सी के दौर में धूमिल की कविताओं और दुष्यंत कुमार की गजलों में । गोंडा के एक छोटे से गॉव से ऊपर उठकर अदम का यश भूमंडलव्यापी हो उठा था ।  उन्हें देख यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि खसरा खतौनी में रामनाथ सिंह के नाम से जाना जाने वाला यही शख्स गजल की चेतना में चिन्गारियाँ पैदा करने वाला अदम गोंडवी है । उनकी मकबूलियत का आलम यह कि सियासत से लेकर अदब से ताल्लुक रखने वालों तक की जबान पर उनके शेर विराजते रहे हैं । गजल की परंपरा ने दुष्यंत कुमार की गजले एक मोड मानी जाती हैं तो अदम कीं गजलें एक दूसरा मोड अख्तियार करती हैं जिसमें एक साथ वे स्थानीयता से लेकर बाजारवाद और भूमंडलीकरण तक से जिरह करते हैं । धरती की सतह पर' का परिवर्धित संस्करण गज़लों में उनकी अलहदा शख्सियत की गवाही देता है ।
    महज प्राइमरी तक की तालीम हासिल करने वाले अदम गोंडवी का बुनियादी काम यो तो खेती-किसानी रहा है किन्तु इस काश्तकार ने गजल की भी एक इन्कलाबी फसल बोई है, जिसके चाहने वाले पूरे देश में फैले हैं । दशकों पहले से उनकी गजल के इस इन्कलाबी मिसरे- 'काजू भुने हैं प्लेट में व्हिस्की गिलास में/ उतरा है रामराज विधायक निवास में'--ने अचानक उन्हें अदबी इलाके में चर्चा में ला दिया था । मंच पर आग उगलने वाली गजलों को सुन उसी लोग पूछते थे, यह किसानी लिबास वाला शख्स कौन है? चेहरे-मोहरे और पहनावे से लगभग धूमिल की याद दिलाने वाले अदम के चेहरे पर एक किसान की खुद्दारी दिखती थी ता गजलों में आज़ादी के बाद मुल्क का लुता-पिटा नक्शा साफ नजर आता था ।  अदम अभावों की धूसर दुनिया से बावस्ता ऐसे नागरिक थे जिन्हें देखकर आप यह मान ही नहीं सकते थे कि वे ही हमारे समय के अविस्मरणीय कवि अदम हैं ।
    -ओम निश्चल
  • Katha Kaho Kunti Mai
    Madhukar Singh
    100 90

    Item Code: #KGP-2021

    Availability: In stock

    कथा कहो कुंती माई
    "कितना खतरनाक होता है माई, मनुष्य के सपनों का मर जाना ?" सुमति ठाकुर ने सवाल की तरह पूछ लिया । "बहुत खतरनाक मेरे बेटे," छाती माई बोली, "सपने हैं तभी तो हमतुम जिंदा हैं, मनुष्य हैं। हम तभी तक जीवित है, जब तक सपने हैं । बेटे, हमारे सपने बहुत बड़े हैं, जो तुम बराबर कहते हो, या तो हम सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन । श्रमिक-किसानों का राज होगा । लडाई बहुत लंबी है सुमति, और चौतरफा भी । हमारे सपनों के हत्यारे हमारे संग-संग जिंदा हैं। इन्हें भी नहीं छोडना है ।"
    कुन्ती माई ऊपर की और दोनो बाँहें फैलाए दिखाती हैं, "अभी भी क्यों नहीं जागते तुम लोग ? पुश्तैनी पीपल-गाछ पर गाज गिरने वाली है ।" "क्या बात है माई ?" एक साथ कई पंख फस्कढाते है । "मेरे गाँव के लोग मुर्दा हैं । सभी मरे हुए हैं । बाप-दादे की पुश्तैनी गाछ को कटवाने के लिए मुदई लोग कलक्टर को बुलवाए हैं। इन्हें किस प्रकार ज़गाऊँ ?" माई का कंठ अवरुद्ध होने लगता है ।
    पीपल के निकट आते ही जेली-साथी नारे लगाते हैं, "कुन्ती माई को, लाल सलाम, लाल सलाम । इंकलाब जिदाबाद । जिदाबाद !" 
    कुन्ती माई अपनी दोनों बाँहें फैलाए उनकी ओर दौड़ पड़ती है, जैसे ममता के समुद्र में डुबो लेना चाहती है । यह डबडबाई आँखें पोंछती हुई कहने लगती हैं, "मेरे बाल-गोपालो । जुल्म बढ़ता है तो प्रतिरोध भी तेज होता है । पुलिस-प्रशासन आपका नहीं है, उन्हीं की रक्षा के लिए है । पन्द्रह मार्च को पटना गांधी मैदान को संकल्प के साथ दस लाख जनता चाहिए । मरने का संकल्प लो, तभी जिंदा रहोगे। मठ की जमीन पर हम फिर चढ़ेंगे । इस बार हम रहेंगे या मठ रहेगा ।"
    [इसी उपन्यास से]

  • Apni Dharti Apne Log (3 Volumes)
    Ram Vilas Sharma
    1200 1080

    Item Code: #KGP-1585

    Availability: In stock


  • Hindi Sahitya : Sarokaar Aur Saakshaatkaar
    Dr. Arsu
    300 240

    Item Code: #KGP-9031

    Availability: In stock

    हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार
    हिंदी मात्र हिंदीभाषी क्षेत्र की ही नहीं, बल्कि इस विशाल समूचे देश की भाषा बन चुकी है और उसे यह स्थान दिलाने में अनुवाद के आदान-प्रदान के साथ हिंदीतर क्षेत्र के साहित्यकारों द्वारा हिंदी को अपनाए जाने से संभव हुआ है। हिंदीतर क्षेत्र के अनेक साहित्यकार अपने क्षेत्र के भाषायी साहित्य के साथ हिंदी साहित्य और उसके सरोकारों से गंभीरतापूर्वक जुड़े हुए हैं। डॉ. आरसु हिंदीतर भाषी क्षेत्र के मूर्धन्य साहित्यकार है । वह कालिकट विश्वविद्यालय से हिंदी विभाग के प्राध्यापक है, साथ ही सृजनशील साहित्यकार तथा मर्मग्राही समीक्षक हैं।

    केरल के मलयालमभाषी डॉ० आरसु की यह पुस्तक 'हिंदी साहित्य : सरोकार और साक्षात्कार' इस तथ्य को भली भाँति प्रमाणित करती है कि हिंदी साहित्य की प्रवृतियों और प्रणेताओं पर उनकी निरीक्षण और विश्लेषणपरक वृष्टि कितनी गहरी है । आठवें दशक के हिंदी साहित्य की धाराओं के बारे में सृजन संवाद इस कृति की अनूठी विशेषता है । विदेशो से रहकर निष्ठापूर्वक हिंदी की श्रीवृद्धि करने वाले लेखकों व अनुवादकों के साथ डॉ० आरसु के आंतरिक संवाद, जो वैश्चिक स्तर पर हिंदी के विकास का द्योतक है, को भी इससे कुशालता के साथ रेखांकित किया गया है ।

  • Yajurveda : Yuvaon Ke Liye (Paperback)
    Dr. Pravesh Saxena
    160

    Item Code: #KGP-241

    Availability: In stock

    यजुर्वेद : युवाओं के लिए 
    'वेद : युवाओं के लिए' ग्रन्थमाला की तीसरी पुस्तक 'यजुर्वेद : युवाओं के लिए' प्रस्तुत है । इसमें यजुर्वेद के 112 मन्त्रों को ऋग्वेद की तरह दस शीर्षकों के अंतर्गत समाहित किया गया है । ज्ञान-शिक्षा, स्वास्थ्य-योग, मानसिक स्वास्थ्य, धर्म-नैतिकता, अर्थ-धनैश्वर्य, घर-परिवार, समाज, राष्ट्र, पर्यावरण तथा वैश्विकता जैसे विषयों पर इन मन्त्रों के माध्यम से चर्चा हुई है । यजुर्वेद मुख्यतः कर्म से सम्बद्ध है । यह 'कर्म' यज्ञ है, जिसे यहाँ श्रेष्ठतम बताया गया है । पारम्परिक दृष्टि से 'यज्ञ' का सीमित अर्थ होता है — अग्नि में आहुति देना । परन्तु 'यज्ञ' का व्यापक अर्थ भी है, जहाँ समर्पण भाव मुख्य रहता है । अतः समाजोपयोगी सभी कर्म यघ के अंतर्गत आ जाते हैं । 
    इन मन्त्रों ऐसा यघ, दीघार्यु व धन-सम्पति तथा सुरक्षादि पाने  प्रार्थनाएं हैं । क्रीड़ा, योगादि शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं । धर्म कर्तव्य तथा नैतिकता से जुड़ा है । यह लोभ प्रवृत्ति ही है, जिससे संसार में उपभोक्तावाद के बढ़ावा मिलता है । बल्ह के कारन एक ओर भय व आतंक पनपते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण प्रदुषण होता है । आधुनिक युग में यज्ञपरक जीवन परोपकार भावना से युक्त मानव-जनों की अपेक्षा है । शांति, विश्रांति और आनंद की चाह है सबको । वह कैसे मिले ? यही मंत्र निर्देश करते हैं । 'विश्व-शांति' के लिए किया जाने वाला 'शांतिपाठ' इसी वेद की देन है । 
    यह पुस्तक उन सभी के लिए भी है, जो 'मन के युवा हैं' तथा प्राचीन ज्ञान को आधुनिक सन्दर्भों में समझना चाहते हैं । 
  • Pahiye Ki Vikaas Katha
    Chetan Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-959

    Availability: In stock


  • Desh-Desh Mein, Gaon-Gaon Mein
    Urmila Jain
    180 162

    Item Code: #KGP-9185

    Availability: In stock

    ब्रिटेन, फ्रांस, लैटिन अमेरिकी तथा विश्व के अन्य अनेक देशों के भूगोल और इतिहास की खाक छानते हुए लेखिका ने अपनी जानकारियों, सूचनाओं के परिचय को तो यहां बढ़ाया ही है, साथ ही वह रवानगीपूर्ण भाषा-शैली में पाठक को भी उस स्थल विशेष की सैर करा पाने में सफल हुई है। विश्व के नक्शे पर चहलकदमी करने का जिस सहजता से मौका लेखिका निकाल लेती है-वह एक ओर तो विश्व-ग्राम की परिकल्पना को संभव बनाता प्रतीत होता है तथा दूसरी ओर ये वृत्तांत आम पाठक को वैसा ही करने को अधीर बनाते हें। किसी भी साहित्यिक रचना का यही सर्जनात्मक अवदान होता है, जो इस पुस्तक में पर्याप्त रूप से मयस्सर हुआ है। 
    डाॅ. उर्मिला जैन की इन यात्राओं में एक और बात उल्लेखनीय है कि वह नारी-मन के साथ, भारतीय मानसिकता की सांस्कृतिक-सामाजिक ऊंचाइयों को लेकर यात्रा करती हैं और इसीलिए पाठक को वह उन चुनिंदा पर्यटक-स्थलों या भूगोल के जाने-अनजाने कोने-अंतरों में ले जा पाई हैं, जहां आधुनिक विश्व के मनुष्य का (और खास तौर से नई नारी का) निर्माण हो रहा है। कृति में यात्रा के रोमांचक क्षण भी जहां-तहां आते हें और उनकी लोकमहर्षक प्रतिध्वनियां पाठक के मस्तिष्क में देर तक गूंजती रहती हैं।
    यह किताब उन यात्रापसंद पर्यटकों के लिए भी प्रेरणादायिनी सिद्ध होगी, जो किन्हीं संकोचवश अपने यात्रानुभवों को शब्दांकित करने से स्वयं को बाधित किए हुए हैं।
  • Kya, Kab, Kahan?
    Mahendra Raja Jain
    1100 990

    Item Code: #KGP-702

    Availability: In stock

    ‘क्या, कब, कहाँ?’ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ-ग्रन्थ है। यह राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित ‘हंस’ पत्रिका के समस्त अंकों (अगस्त 1986-अक्टूबर 2013) की विषय सूची है। लेखक, शीर्षक, विषयानुक्रमणिका के रूप में इसे तैयार किया है ‘सन्दर्भिका निर्माण’ के विशेषज्ञ महेन्द्र राजा जैन ने। उन्होंने सर्जनात्मक रुचि के साथ अत्यन्त परिश्रमपूर्वक ‘क्या, कब, कहाँ?’ को आकार दिया है। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के शब्दों में, ‘मैं सचमुच महेन्द्र राजा जैन को हृदय से धन्यवाद देना चाहूँगा—एक पाठक के नाते, एक लेखक के नाते कि वे अपनी भाषा और साहित्य के लिए इतना महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं।’
    कई वर्षों के अथक परिश्रम से ‘हंस’ के इन अंकों की विषय सूची तैयार की गई है। लेखक, शीर्षक और विषयों के अकारादि क्रम से संयोजित इस सूची से तत्काल पता चलेगा कि ‘हंस’ में—
    ० किसी लेखक की, किसी शीर्षक की कोई रचना छपी या नहीं या कब छपी?
    ० किसी विषय की कौन-कौन सी रचनाएँ छपीं या वे किसकी लिखी हुई हैं?
    ० किसी पुस्तक की समीक्षा छपी या नहीं या कब छपी या वह किसकी लिखी हुई है?
    ० ‘हंस’ में छपी किसी रचना पर किसकी क्या प्रतिक्रिया कब छपी?
    ० ‘मेरी-तेरी उसकी बात’ में कब किस विषय पर चर्चा की गई है या किसी विषय पर कुछ लिखा गया है या नहीं?
    ० ‘काँटे की बात’ में कब किस-किस विषय पर लिखा गया है?
    ० ‘हंस’ में किसी महत्त्वपूर्ण गोष्ठी, सेमिनार आदि की रिपोर्ट छपी या नहीं या कब छपी?
    ० ‘बात बोलेगी’ और ‘समकालीन सृजन-सन्दर्भ’ में कब किस विषय पर लिखा गया है?
    इसके साथ और भी बहुत कुछ जानने योग्य।
    राजेन्द्र यादव की कीर्ति के स्थायी स्मारक ‘हंस’ के प्रत्येक पृष्ठ का अवगाहन करता यह ग्रन्थ समस्त हिन्दी प्रेमियों, पाठकों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और बौद्धिकों के लिए पठनीय व संग्रहणीय है।
  • Beeswin Sadi Ki Laghu Kathayen-3
    Balram
    350 315

    Item Code: #KGP-829

    Availability: In stock


  • Maharishi Dayanand Saraswati Aur Stree-Vimarsh
    Dr. Meena Sharma
    165 149

    Item Code: #KGP-1243

    Availability: In stock

    महर्षि दयानंद सरस्वती और स्त्री-विमर्श
    महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श में वैचारिकता से अधिक रचनात्मकता है। अपनी रचनात्मकता के कारण उसकी मूल्यवत्ता एवं सार्थकता है। मूल्य और सार्थकता की तलाश हर युग में होती है। आज के स्त्री-विमर्श की दिशाहीनता की स्थिति एवं चुनौतियों के आलोक में दिशा-निर्देशक के रूप में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श, बल्कि यूँ कहें कि स्त्री के दयानंदीय विमर्श की आवश्यकता कल से अधिक आज है। इतिहास में महर्षि दयानंद के स्त्री-विमर्श की जो भूमिका थी, वर्तमान में स्त्री-विमर्श की उस भूमिका को इतिहास-बोध के साथ युगानुरूप विस्तार दिया जा सकता है।
  • Khanabadosh
    Ajeet Kaur
    250 225

    Item Code: #KGP-81

    Availability: In stock

    दर्द ही जिंदगी का आखिरी सच है । दर्द और अकेलापन । और आप न दर्द साझा कर सकने हैं, न अकेलापन । अपना-अपना दर्द और अपना-अपना  अकेलापन हमें अकेले ही भोगना होता है । फर्क सिर्फ इतना, कि अपनी सलीब जब अपने कंधों पर उठाकर हम जिंदगी की गलियों में से गुज़रे, तो हम रो रहे थे या मुस्करा रहे थे, कि हम अपने ज़ख्मी कंधों पर उठाए अपनी मौत के ऐलान के साथ, लोगों की भीडों से तरस माँग रहे थे, कि उस हालत में भी उन्हें एक शहंशाह की तरह मेहर और करम के तोहफे बाँट रहे थे । दर्द और अकेलापन अगर अकेले ही जाना होता है, तो फिर यह दास्तान आपको क्यों सुना रही हूँ ?
    मैं तो जख्मी बाज़ की तरह एक बहुत पुराने, नंगे दरख्त की सबसे ऊपर की टहनी पर बैठी थी—अपने जख्मों से शार्मसार, हमेशा  उन्हें छुपाने की कोशिश करती हुई। सुनसान अकेलेपन और भयानक खामोश से घबराकर यह दास्तान कब कहने लग पडी ?
    यसु मसीह तो नहीं हूँ दोस्तों, उनकी तरह आखिरी सफर में भी एक नज़र से लोगों की तकलीफों को पोंछकर सेहत का, रहम का दान नहीं दे सकनी 1 पर लगता है, अपनी दास्तान इस तरह कहना एक छोटा-सा मसीही करिश्मा है जरूर! नहीं ?
    पर अब जब इन लिखे हुए लफ्जों को फिर से पढ़ती हुँ तो लगता है, वीरान बेकिनार रेगिस्तान में मैंने जैसे जबरन लफ्जों को यह नागफनी बोई है । पर हर नागफनी के आसपास बेशुमार खुश्क रेत है तो तप रही है, बेलफ़्ज खामोश।
    -अजीत कौर 
  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Qurratulain Hyder
    Qurratulain Hyder
    260 234

    Item Code: #KGP-833

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार कुर्रतुलऐन हैदर ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो', 'फोटोग्राफ़र', 'कारमिन', 'पतझड़ की आवाज़', 'जुगनुओं की दुनिया', 'कलंदर', 'कोहरे के पीछे', 'कुलीन', 'डालनवाला' तथा 'यह दाग-दाग उजाला' ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक कुर्रतुलऐन हैदर की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Maitreyi Pushpa : Stri Hone Ki Katha
    Vijay Bahadur Singh
    495 446

    Item Code: #KGP-9041

    Availability: In stock


  • Sanetary Pad
    Sayed Javed Hasan
    250 225

    Item Code: #KGP-1885

    Availability: In stock

    बस्ती का खुदा उठा । मैदान की ओर देखकर मुस्कुराया और धीरे-धीरे चबूतरे की सीढी चढ़ने लगा ।
    दो चढ़ता रहा । तालियां बजनी रहीं।
    अचानक तालियां रुक गई ।
    लोगों ने बस्ती के खुदा को एकाएक बीच सीढी पर रुकते हुए देखा । '
    सबकी धडकने तेज हो गई । उसे अपने इस खुदा पर पूरा  विश्वास था । ताली बजाने वालों में अब मैदान के एक- आध हिस्से को छोडकर बाकी लोग भी शामिल हो गए थे । वे पहले के तीन खुदाओं की छवि से बुरी तरह निराश थे और चाहते थे कि कम से कम इस खुदा की छवि दुरुस्त रहे ।  बस्ती का यह खुदा औरों के मुकाबले अधिक सौम्य, संजींदा और भरोसेमंद था ।
    बस्ती के खुदा ने बस्ती के लोगों को मुड़ के देखा । मुस्कुराया । हाथ हिलाया और फिर सीढी चढने लगा ।
    तालियां फिर बजनी शुरू हुई ।
    तालियां बजती रहीं . . . . बजती रहीं ।
    और फिर . . . . पूरे मैदान में मरघट-सा सन्नाटा छा गया ।
    आईने के सामने बस्ती का खुदा खडा था और उसमें मुखौटों का अक्स उभर आया था ।
    बस्ती के लोग पागलों की तरह अपना सिर धुन रहे थे । उसे अपने जिस खुदा पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वो  बहरूपिया बना उनके सामने खड़ा था ।
    - इसी पुस्तक से
  • Vipradas (Paperback)
    Sharat Chandra Chattopadhyaya
    90

    Item Code: #KGP-1404

    Availability: In stock


  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Aabid Surti
    Aabid Surti
    200 180

    Item Code: #KGP-49

    Availability: In stock

    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ 'किताबघर' की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है । इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है । 'किताबघर' गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए अग्रज कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार आबिद सुरती ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'आतंकित', 'तीसरी आँख', 'सांताक्लोज़ के तीन क्लोज़अप', 'बिज्जू', 'सतह', 'अंधा', 'रहस्य एक बालक के जन्म पूर्व हुए अपहरण का', 'भैंसोंवाली गली', 'कैनाल' तथा 'अनाड़ी नंबर वन'। हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात कथाकार आबिद सुरती की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Rang Hawa Mein Phail Raha Hai (Paperback)
    Ubaid Siddqi
    200

    Item Code: #KGP-200

    Availability: In stock

    हक़ीक़त चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस ख़ुशफ़हमी में मुबतिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं। उबैद सिद्दीक़ी की शाइरी का एक बड़ा हिस्सा इसी ख़ुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है:
    जाने किस दर्द से तकलीफ़ में हैं
    रात दिन शोर मचाने वाले
    ये सब हादसे तो यहां आम हैं
    ज़माने को सर पर उठाता है क्या
    आधुनिकता के जोश में हमारी शाइरी, ख़ास तौर पर ग़ज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उबैद ने अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का एक सराहनीय प्रयास किया है:
    धूल में रंगे-शफ़क़ तक खो गया है
    आस्मां तू कितना मैला हो गया है
    बहुत मकरूह लगती है ये दुनिया
    अगर नज़दीक जाकर देखते हैं
    सदाए-गिर्या जिसे एक मैं ही सुनता हूं
    हुजूमे-शहर  तेरे दरम्यां से आती है
    अपने विषयवस्तु और कथ्य से इतर उबैद की शाइरी अपनी मर्दाना शैली और अन्याय के खि़लाफ़ आत्मविश्वास से परिपूर्ण प्रतिरोध की भी एक उम्दा मिसाल है:
    शिकायत से अंधेरा कम न होगा
    ये सोचो रौशनी बीमार क्यों है
    मैं फ़र्दे-जुर्म तेरी तैयार कर रहा हूं
    ए आस्मान सुन ले हुशयार कर रहा हूं
    इस संग्रह के प्रकाशन से मैं बहुत ख़ुश हूं और उम्मीद करता हूं कि उबैद की शाइरी के रसास्वादन के बाद आप ख़ुद को भी इस ख़ुशी में मेरा शरीक पाएंगे।
    दशहरयार 
  • Keshavraav Baliram Hedgewar : Jeevan Darshan (Paperback)
    M.A. Sameer
    100

    Item Code: #KGP-488

    Availability: In stock

    निडर और साहस के धनी डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भारत की उन महान् विभूतियों में से एक हैं, जिन्होंने राष्ट्रसेवा के पथ पर चलते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। अपनी जीवनशैली में सदैव अनुशासन और राष्ट्रप्रेम को अधिक महत्त्व देने वाले डॉ. केशवराव ने बाल्यावस्था में ही अपने अंग्रेजविरोधी तेवर दिखाने आरंभ कर दिए थे।
    डॉ. केशवराव उन विलक्षण व्यक्तियों में से थे, जो युवाओं की मानसिकता को भलीभांति जानते थे और उनकी क्षमताओं को विकसित करने के नए-नए तरीके खोजते रहते थे।
    देश की युवा पीढ़ी को भारत की सनातन संस्कृति और आदर्शों से जोड़े रखने के लिए 28 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के पर्व पर ‘संघ’ नामक नए राष्ट्रीय हिंदूवादी संगठन की स्थापना की गई। साहस और अनुशासन पर आधारित इस संगठन को खड़ा करने का पूरा श्रेय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार को जाता है। इस स्थापना-समूह के अन्य सदस्यों में डॉ. वी. एस. मुंजे, बापूजी सोनी तथा डॉ. परांजपे आदि वरिष्ठ नेता शामिल थे।
  • Vishaad Math
    Rangey Raghav
    300 270

    Item Code: #KGP-54

    Availability: In stock


  • Us Raat Ki Baat
    Amrendra Mishra
    50 45

    Item Code: #KGP-9062

    Availability: In stock


  • Maitreyi Pushpa : Rachna Sanchayan
    Sushil Sidharth
    950 855

    Item Code: #KGP-1580

    Availability: In stock


  • Premchand Ki Amar Kahaniyan
    Kamlesh Pandey
    220 198

    Item Code: #KGP-1838

    Availability: In stock

    साहित्य की सभी विधाओं में सर्वाधिक सशक्त एवं आकर्षक विधा के रूप में 'कथा' को स्वीकृति प्राप्त हैं । लघु कलेवर होने के कारण कहानी समय-साध्य तो है ही, उसने जीवन के आभिजात्य से भी संबंध स्थापित किया है ।
    प्रस्तुत पुस्तक कथाकार प्रेमचंद की कुछ महत्वपूर्ण कहानियों का संकलन है । इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिक अंत:स्पर्श, मानसिक अंतर्द्वद्व  की तीक्ष्ण एवं आकुल अभिव्यक्ति, भाषा की कथानुरूप प्रस्तुति, शिल्प की प्रांजल चेतना विद्यमान है । प्रेमचंद की कहानियाँ जीवन के मानसिक एवं सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज है । उन्होंने अपनी रचनाओं में जहाँ एक ओर समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं विषमताओं पर करारा प्रहार किया वहीं दूसरी ओर भारतीय जनजीवन की अस्मिता की खोज भी की है तथा समाज के विभिन्न वर्गों की अनेक ज्वलंत समस्याओं को लेकर प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है ।
    प्रेमचंद साहित्य को मानव-संसार का एक सशक्त माध्यम मानते थे। उनकी साहित्यिक दृष्टि अन्य कथाकारों से सर्वथा भिन्न थी । उन्होंने मानव-जीवन के दुःख - दर्द का स्वयं अनुभव किया और पूरी ईमानदारी से उसका वर्णन किया ।
  • Pracheen Brahman Kahaniyan (Paperback)
    Rangey Raghav
    150

    Item Code: #KGP-499

    Availability: In stock

    प्राचीन ब्राह्मण कहानियाँ
    आर्य संस्कृति के आदि संस्थापकों की जीवन-झाँकियाँ प्रस्तुत करने वाली ये कहानियाँ रोचक तो हैं ही, ज्ञानवर्धक भी हैं ।

  • Dus Pratinidhi Kahaniyan : Jainendra Kumar (Paperback)
    Jainendra Kumar
    150

    Item Code: #KGP-501

    Availability: In stock

    दस प्रतिनिधि कहानियाँ : जैनेन्द्र कुमार
    'दस प्रतिनिधि कहानियाँ' सीरीज़ किताबघर प्रकाशन की एक महत्त्वाकांक्षी कथा-योजना है, जिसमें हिन्दी कथा-जगत् के सभी शीर्षस्थ कथाकारों को प्रस्तुत किया जा रहा है ।
    इस सीरीज़ में सम्मिलित कहानीकारों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अपने संपूर्ण कथा-दौर से उन दस कहानियों का चयन करें, जो पाठको, समीक्षकों तथा संपादकों के लिए मील का पत्थर रही हों तथा ये ऐसी कहानियाँ भी हों, जिनकी वजह से उन्हें स्वयं को भी कहानीकार होने का अहसास बना रहा हो। भूमिका-स्वरूप कथाकार का एक वक्तव्य भी इस सीरीज़ के लिए आमंत्रित किया गया है, जिसमें प्रस्तुत कहानियों को प्रतिनिधित्व सौंपने की बात पर चर्चा करना अपेक्षित रहा है ।
    किताबघर प्रकाशन गौरवान्वित है कि इस सीरीज़ के लिए सभी कथाकारों का उसे सहज सहयोग मिला है। इस सीरीज़ के महत्त्वपूर्ण कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी जिन दस कहानियों को प्रस्तुत किया है, वे हैं : 'फांसी', 'पाजेब, 'फोटोग्राफी', 'मास्टर जी', 'अपना- अपना भाग्य', 'जाह्नवी', 'एक रात', 'साधु की हठ', 'नीलम देश की राजकन्या' तथा 'चलित-चित'  ।
    हमें विश्वास है कि इस सीरीज़ के माध्यम से पाठक सुविख्यात लेखक जैनेन्द्र कुमार की प्रतिनिधि कहानियों को एक ही जिल्द में पाकर सुखद पाठकीय संतोष का अनुभव करेंगें ।
  • Kavya Shatabdi
    Anamika
    350 315

    Item Code: #KGP-789

    Availability: In stock

    काव्य शताब्दी
    हिंदी समाज जिन चार बड़े कवियों की जन्मशती व्यापक स्तर पर और गहरे लगाव के साथ मना रहा है, उन्हें एक जगह और एक जिल्द में देखना जितना रोमाचंक है उतना ही सार्थक भी । छायावादोत्तर कविता के प्रतिनिधि शमशेर बहादुर सिंह, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन अपनी संवेदना, सरोकार और शिल्प के स्तर पर एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं, लेकिन उनके रचनात्मक विवेक से कई समानताएं हैं और वे बड़े संक्रमणों, व्यक्ति और समाज के मुक्ति-प्रयासों से उद्वेलित एक युग के काव्य-द्रष्टा हैं । इन कवियों के विपुल रचना-संसार में से पंद्रह ऐसी कविताओं का चयन करना जो उनके समग्र व्यक्तित्व को रेखांकित कर सके, निश्चय ही एक कठिन काम था, जिसे दोनों संपादकों ने सूझबूझ के साथ संभव किया है । इनमें से नागार्जुन को छोड़कर बाकी तीनों कवियों की रचनावलियां उनके जन्मशती वर्ष में प्रकाशित नहीं हो पाई हैं और नागार्जुन की संपूर्ण रचनाएं भी उनके निधन के बाद ही प्रकाश में आ पाईं । इस विडंबना-भरी स्थिति में यह चयन और भी महत्वपूर्ण  हो उठता है ।
    'काव्य शताब्दी' में चारों कवियों की वे रचनाएं तो शामिल हैं ही, जिन्हें श्रेष्ठ या प्रतिनिधि कविताएं माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही उनके काव्यात्मक विकास के वर्णक्रम को भी इनमें हम दख सकते हैं । इस तरह हर कवि के विभिन्न संवेदनात्मक पड़ावों और विकास प्रक्रियाओं की तस्वीर उजागर होती चलती है । शमशेर 'प्रेम' शीर्षक कविता से लेकर "काल तुझसे होड़ है मेरी' तक अपनी समूची शमशेरियत के साथ झलक उठते हैं हैं तो अज्ञेय की प्रयोगशीलता 'कलगी बाजरे की' से लेकर 'नाच' और 'घर' तक चली जाती है । नागार्जुन हमारे ग्राम समाज, उसकी नैसर्गिकता के साथ-साथ अपने गरजते- गूंजते राजनीतिक प्रतिरोध जारी रखते हुए दिखते हैं तो केदारनाथ अग्रवाल केन नदी के पानी और साधारण जन के भीतर बजते हुए लोहे के साथ उपस्थित हैं । इस चयन का एक और आकर्षण वे आलेख हैं, जिनसे समीक्षा की प्रचलित रूढियों से अलग इन कवियों की एक नए ढंग से पढ़ने की गंभीर कोशिश दिखाई देती है ।
  • Manav Adhikar Aur Ham (Paperback)
    Urmila Jain
    140

    Item Code: #KGP-285

    Availability: In stock

    मानव अधिकार और हम
    हिंदी में प्रति वर्ष एक हज़ार से अधिक पुस्तकें छपती  हैं, पर अभी तक कोई ऐसी पुस्तक मेरे देखने में नहीं  आई है जिससे जन-सामान्य को सहज-सरल भाषा में मानव अधिकार संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके। हिंदी की इस कमी का ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक में मानव अधिकार की धारणा सहित अन्य विषयों के संबंध में भी चर्चा की गई है । 
    मानव अधिकार का उल्लंघन कब, कैसे और क्यों  होता है और हो सकना है—इसके कुछ उदाहरण देते हुए यह भी बतलाया गया है कि अधिकांश देश किस प्रकार सैद्धांतिक रूप से तो मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा का समर्थन करते हैं और इसी के आधार पर उन्होंने अपने-अपने देश में तरह-तरह के कानून भी बनाए हैं, पर जहाँ नक उन पर अमल  करने की बात है-इस संबंध में अधिकांश, देशों का रिकॉर्ड बहून ही निराशाजनक है ।
    प्रस्तूत पुस्तक में बाल अधिकार उल्लंघन और बालकों के यौन शोषण का उल्लेख करते हुए बतलाया गया है कि किस प्रकार अपराधियों का दोष सिद्ध होने के बावजूद उनके विरुद्ध कोई ऐसी कार्यवाई नहीं की जाती, उन्हें ऐसा दंड नहीं दिया जाता कि इस प्रकार के अपराधों पर रोक लगे ।
    -उर्मिला जैन

  • Kavi Ne Kaha : Hemant Kukreti (Paperback)
    Hemant Kukreti
    140

    Item Code: #KGP-7019

    Availability: In stock

    अपनी पीढ़ी के शायद सबसे कलात्मक और उतने ही आसान कवि हेमन्त कुकरेती बीसवीं सदी के लॉन्ग नाइंटीज में उभरी कवि-पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं।
    बिना किसी शोरशराबे के अपनी भूमिका निभाने वाले मुक्तिबोध हों या त्रिलोचन--देर से आलोचकों की तवज्जो पाते हैं। ऐसे कुछ कवि हर दौर में होते हैं। हेमन्त कुकरेती भी ऐसे कवियों में हैं। उन्हें हिंदी पाठकों का जितना स्नेह मिला है; आलोचकों की कृपादृष्टि से वे उतना ही वंचित रहे हैं। शायद इसका कारण यह भी है कि हेमन्त कुकरेती कुपढ़ और कूढ़मगज़ आलोचकों के बने-बनाए खाँचों में फिट होना तो दूर; उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा करते रहे हैं। हेमन्त कुकरेती ‘लोक के कवि’, ‘नगर के कवि’, ‘पहाड़ के कवि’, ‘पठार के कवि’, ‘समुद्र के कवि’ हों या प्रगतिशील कवि, जनकवि, भारतीय कवि--इन सब खानाब( कोष्ठकों से अलग और बेकै़द रहे हैं। झमेले उनके साथ ये रहे कि उन्होंने न बिहार में जन्म लिया, न बनारस में! यहाँ तक कि पठार या पहाड़ भी उन्हें जन्म लेने लायक नहीं लगे! दिल्ली में जन्म लेकर उन्होंने हिंदी कविता के पूर्वी घराना, भोपाल घराना, आई. टी. ओ. घराना, पहाड़ी घराना--किसी से भी गंडा-तावीज नहीं बँधवाया। ऐसे में उनके साथ और क्या सलूक किया जाता! फिर भी हिंदी कविता के आस्वादकों को हेमन्त कुकरेती की उपस्थिति आश्वस्ति से भरती है।
    सघन ऐंद्रिकता और सरल विन्यास को साधने वाले हेमन्त कुकरेती विचारों को बिंब में बदलने वाले हुनर में माहिर उन कवियों में हैं; जिन्हें अपने शब्दों पर भरोसा है इसलिए उनके शब्दों की अर्थव्याप्ति चकित करने में जाया नहीं होती बल्कि कविता के जादू और पहुँच को और गहराती है।
  • Gulaha- E- Parishaan
    A.M. Nayar
    395 356

    Item Code: #KGP-76

    Availability: In stock

    गुलहा-ए-परीशाँ 
    एक जमाने में हर पढ़ा-लिखा काव्य-प्रेमी अच्छे-अच्छे और पसंदीदा अशआर को एक बयाज (संग्रह) रखता था, जिसमें दर्ज शेर जिंदगी की कशमकश, प्रतिकूल परिस्थितियों, सुख और दु:ख  क्षणों में उसे याद आते थे और उनको दोहराकर वह अपना दु:ख घटाता या सुख में वृद्धि कर लेता था ।  आज का जीवन व्यस्ततर है और हर व्यक्ति अस्तित्व के संघर्ष में ऐसा गूँथा हुआ है कि जिंदगी की लताफ़त अब उसे आकर्षित नहीं कर पाती । ऐसे में यदि काव्य-सागर के मंथन से निकले कुछ काव्य-रत्न उसे दिए जाएं तो वह अपनी जिंदगी को कटुता और वेदना में कुछ कमी महसूस कर सकता है । इसी विचार से प्रस्तुत संकलन में तीन सौ से अधिक विषयों पर कहे गए शेर एकत्रित किए गए हैं, जिनके साथ हमारे जीवन के अनेकानेक अनुभव जुड़े हुए हैं और यह कोशिश की गई है कि तवज्जो शाइर के नाम पर नहीं, उसके द्वारा किसी विषय विशेष पर रचे हुए शेर पर ही दी गयी है ।  शेर के चयन में रदीफ-क्राफिया, कल्पना-शक्ति, उपमा-अलंकार पर इतना बल नहीं दिया गया है, जितना शाइर की आत्मा की व्याकुलता या उसकी मनोदशा की तीव्रता को मद्देनजर रखा गया है।
    उर्दू के सभी या अधिकतर शाइरों के प्रतिनिधि शेरों का यह संकलन अपने में एक अनूठा प्रयास है, जिसका हिंदी जगत् में निश्चय ही स्वागत किया जाएगा ।
  • Kahani Ka Abhaav (Paperback)
    Narendra Kohli
    60

    Item Code: #KGP-7095

    Availability: In stock


  • Utho Annapoorna Saath Chalen
    Usha Mahajan
    100 90

    Item Code: #KGP-9127

    Availability: In stock

    दांपत्य दो समान व्यक्तियों एकीकरण का नाम है। दंपति का संधिविच्छेद करें तो बनता है दम् (घर) $ पति। अर्थात् दोनों ही घर के बराबर के पति हैं। लेकिन कितनी समानता है हमारे समाज में आज भी पति और पत्नी के स्तर में? किस प्रवृत्ति का प्रतीक है सत्तर के दशक से दहेज-हत्याएं कही जाने वाली शादीशुदा औरतों की अप्राकृतिक मौतों का दौर? क्या कारण हैं हिंदू समाज में दांपत्य-संबंधों में बढ़ती दरारों के? जिस समाज मंे स्त्री के लिए पति परमेश्वर के समान माना जाता है, वहीं दिल्ली-मद्रास जैसे महानगरों में डेढ़ से दो हजार कुंवारी लड़कियां हर माह डाॅक्टरों से गर्भपात करवाती हैं, सगे पिता अपनी मासूम बेटियों का यौन-शोषण करते हैं। सेक्स विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों से मिलंे, तो वे बताते हैं कि पहले पुरुषों के ही अवैध संबंध हुआ करते थे, पर अब औरतें भी उनके मुकाबले में विवाहेत्तर और विवाह-पूर्व संबंध रख रही हैं। अदालतों में जाकर देखें तो अनगिनत दंपति एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते, गाली-गलौज करते और यहां तक कि जूते-चप्पल चलाते भी आपको मिल जाएंगे।
  • Vishva Ke Mahaan Aavishkaarak Aur Unke Aavishkaar
    Laxman Prasad
    595 536

    Item Code: #KGP-726

    Availability: In stock

    आज संसार का जो स्वरूप है, उसे बनाने में हजारों-लाखों आविष्कारकों ने अपना जीवन लगाया है। इनमें से कुछ का योगदान इतना ज्यादा है कि उनहें महान् कहा जाता है। इन आविष्कारकों ने कृषि, उद्योग, यातायात (जल, थल, नभ, अंतरिक्ष), दूरसंचार (टेलीफोन, टेलीग्राफ, रेडियो, टी.वी.), उपयोगी उपकरण (कम्प्यूटर, कैमरा), चिकित्सा, युद्धक सामग्री, परमाणु ऊजा, विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक सिद्धांतों आदि को इस कदर विकसित किया कि संसार नए युग में प्रवेश कर गया। प्रस्तुत पुस्तक में पिछले ढाई हजार सालों के ऐसे 40-45 महान् आविष्कारकों का व्यक्तित्व व कृतित्व समाहित है।
  • Bharatvanshi : Bhasha Evam Sanskriti
    Pushpita Awasthi
    450 405

    Item Code: #KGP-708

    Availability: In stock

    डॉ.. पुष्पिता अवस्थी की किताब ‘भारतवंशी: भाषा एवं संस्कृति’ प्रत्यक्ष अनुभव के आलोक में रची ऐसी कृति है जिसमें रचनाकार की संवेदना का परिसर व्यापक है। भारतवंशियों के इतिहास का अध्ययन यहां धर्म, दर्शन, भाषा, संस्कृति और कलाओं के परिप्रेक्ष्य में है। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों, यथा--सूरीनाम, गयाना, ट्रिनिडाड, मॉरीशस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अपनी-अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे। 
    डॉ. अवस्थी ने इन्हीं पर दशकों तक काम किया। यह काम से अधिक राग है, प्रतिबद्ध समर्पण है। इसमें प्रवासी भारतीयों के इलाकों की भी छवियां हैं। मूलतः यह कृति उन भारतवंशियों के अंधेरों को रोशनी में लाती है जो बहुत हद तक अलक्षित रहा। 
    भारतवंशियों की वैश्विक भारतीयता को सच्ची पहचान दिलाने में एक ऐतिहासिक पहल की तरह यह किताब अपनी मुकम्मल जगह बनाती है। संस्कृति और भाषा का यह गहन-गंभीर अध्ययन कदाचित् पहली बार वैज्ञानिक दृष्टि से सामने आ रहा है। इसमें सृजनशील लेखक और इतिहासविद् की अनूठी जुगलबंदी है। 
    डॉ. अवस्थी ने भारतवंशियों की अलग-अलग धर्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पहचानों में हिंदुस्तानियत की शिनाख्त करते हुए उन तत्त्वों का अन्वेषण किया है जो उन्हें भारतवंशी होने के सांस्कृतिक स्वाभिमान में एकसूत्र करते हैं। यह एकसूत्रता संस्कृति और भाषा की अंतर्तहों में किस तरह अंतर्भुक्त है, इसे अकेले दम पर लेखक ने घूम-घूमकर चिन्हित किया है। वे भारतीय आर्यों और पारसीक आर्यों के सांस्कृतिक और भाषायी इतिहास के रास्तों से वैचारिक यात्रा करती हैं और मोटे तौर पर 19वीं से 20वीं सदी के बीच बनी संस्कृति और भाषा की जड़ों को टटोलकर अपनी स्थापनाओं के लिए रास्ता निर्मित करती हैं। इस प्रक्रिया में वे यूरोपीय उपनिवेशों में भारतवंशियों के तत्कालीन दारुण इतिहास, यातनाओं, यंत्राणाओं के वास्तविक चित्रों को क्रमशः सजीव करती हैं। 
    डॉ. अवस्थी ने संस्कृति और भाषा को उस संजीवनी के रूप में खोजा है जिनके कारण ही भारतवंशियों का जीवन है। ये दोनों उनके प्राण तत्त्व बने हुए हैं। इन्हीं दो तत्त्वों से विश्व में उनकी भारतीय अस्मिता का स्थापन हुआ। यह अस्मिता उन भारतीयों से अलग है जो पिछले 30-40 सालों में प्रवास पर पहुंचे। प्रवासी और अप्रवासी के भेद को, भ्रम को अनावृत्त करती यह किताब एक उपलब्धिकी तरह सामने है।
    भूमंडलीकरण के भयावह आक्रमण के दौर में जबकि संस्कृतियों और भाषाओं, बोलियों और लिपियों को बचाना कठिन होता जा रहा है तब यह एक किताब भाषा एवं संस्कृति को बचाने का मेटाफर रचती है। यही इसका मानीख़ेज हासिल है।
  • Bhagn Seemayen
    Balshauri Reddy
    120 108

    Item Code: #KGP-2047

    Availability: In stock

    भग्न सीमाएँ
    "मेरे देवता, आप प्रेम के अवतार हैं । आप मेरे जीवन में प्रेम के देवता बनकर आए । इस प्रेम-मूर्ति की मैं सदा आराधना करती रहूंगी ।
    मैँ जानती हूँ कि आप मुझे अपनी शरण में लेने को तैयार हैँ। कहावत है न, भगवान् भले ही वर दे, लेकिन पुजारी वर नहीं देता । आपके चतुर्दिक जो पुजारी बने हुए हैं, वे चाहते हैं कि मैं आपसे दूर रहूँ। वे यह नहीं चाहते कि मैं आपकी उपासना करूं । मैं उनकी दृष्टि में अस्पृश्य हूँ अयोग्य हूँ। पर आपकी करुणा और कृपा सब पर समान होती है ।
    मैं अपना प्यार रूपी दीपक जला, स्नेह रूपी बत्ती जगा अपने हृदय को आलोकित करना चाहती थी, लेकिन क्या करूँ । परिस्थिति रूपी प्रभंजन का वेग अधिक हो चला है, शायद मैं निकट रहूँ तो वह बुझ जाए । मैं दूर से ही निरंतर अलख जगाए रखना चाहती हूँ।
    आपसे दूर होने के पहले मैंने अपने गत जीवन का एक बार सिंहावलोकन दिया । आपके जीवन में मैंने एक रोगी के रूप में प्रवेश क्रिया । आपने मेरे शरीर को स्वास्थ्य प्रदान किया, जीवन के प्रति आशा और विश्वास पैदा किया, प्रेम दिया आज मैं उसके पुरस्कारस्वरूप आपके हृदय को अस्वस्थ बनाकर जा रही हूँ, मलिन और दुखी बनाकर जा रही हूँ ।
    -[इसी पुस्तक से]
  • Mahan Vibhutiyon Ka Adhura Bachpan
    Vinod Kumar Mishra
    200 180

    Item Code: #KGP-247

    Availability: In stock

    महान् विभूतियों का अधूरा बचपन
    विश्व की अनेक महान् विभूतियाँ बचपन में ही गंभीर विकलांगता का शिकार हो गई थीं। विकलांगता अपने साथ शारीरिक कष्ट के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक व सामाजिक दुःख भी लाती है। इन विभूतियों ने विकलांगता का सामना एक सामान्य चुनौती की भाँति किया और समस्त संसार उनकी उपलब्धियों व योगदानों के समक्ष नतमस्तक हो गया।
    दूसरी ओर एक आम अच्छा-भला व्यक्ति मामूली समस्याओं से झुँझला जाता है और लक्ष्य पूरा न हो पाने  के लिए परिस्थितियों को अधिक दोष देने का प्रयास करता है।
    प्रस्तुत पुस्तक न केवल इन महान् व्यक्तियों का उदाहरण देते हुए आम बच्चों को चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित करती है वरन् यह भी बताती है कि किस प्रकार आम बच्चों व विकलांग बच्चों के बीच सम्मानजनक समन्वय होना चाहिए।
    वास्तव में विकलांगता बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करती है और यदि परिस्थितियाँ अनुकूल बना दी जाएँ तो विकलांगता का प्रभाव न्यूनतम हो जाता है। अतः यह आवश्यक है कि भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था को भी अनुकूल बनाया जाए ताकि विकलांगजनों व शेष समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो और उनकी अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • Himalaya Gaatha-3 (Janjati Sanskriti)
    Sudarshan Vashishath
    550 495

    Item Code: #KGP-639

    Availability: In stock

    हिमालय गाथा-3 (जनजाति संस्कृति)
    न जाने कब फहराने लगीं धर्म पताकाएँ हिमप्रदेश के बीहडों में । कब बौद्ध मंत्र भोटी में गूँजने लगे । तथागत कब महाविरोचन, अक्षोभ्य, अमिताभ, अमोधसिद्धि बने । कब आए पदूमसम्भव, रत्नभद्र । इस अभियान में कौन भिक्षु त्यागी हुए । और बौद्ध  वाड़मय से पहले गुफाओं मेँ कौन लोग वास करते थे । क्या कहते हैं, हजारों वर्ष से भी पुराने ताबो मठ के पास चट्टानों पर खुदे गुफा चित्र । ये बाते अभी पूर्णतया स्पष्ट नहीं है । इतिहास ग्लेशियर में छिपी नदी की तरह है ।
    तथापि ए० एच० फ्रेंके तथा दुची जैसे यूरोपीय विद्वानो ने खोले हैं । आज तक इन्हीं का अनुसरण करते जाए शोधकर्ता । हिमालय की संस्कृति पर गंभीरता से मौलिक कार्य नहीं हुआ । कथाकार सुदर्शन वशिष्ठ ने इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगाई है । 'आँखिन देखी’ के आधार पर संस्मरण, यात्रा और कथात्मक शैली में वर्णन इन का गुण है । सरल, सुरुचिपूर्ण और स्पष्ट भाषा में रोचकता के साथ गंभीर पहलुओं का विवेचन, वैज्ञानिक व्याख्या, पुरातन को आधुनिकता के साथ जोड़ना इनकी लेखनी की विशेषता रही है ।
    संस्कृति पर लिखने वाले ऐसे बिरले साहित्यकारों में है वशिष्ठ । जो अपनी यायावर प्रवृति के कारण दूसरे राहुल कहे जाते है । संस्कृति को बहुत करीब से देखा, परखा, समझा और फिर लिखा है । किन्नौर के अंतिम गांव छितकुल और नसज्ञा से लेकर चम्बा के साच दर्रे से होकर सुदूर पांगी तक पैदल यात्राओं के बाद यहाँ की अनूठी संस्कृति पर लेखनी चलाई है ।
    'हिमालय गाथा' के प्रस्तुत तीसरे खंड में हिमाचल के किन्नौर, लाहौल स्थिति और पांगी-भरमौर जैसे दुर्गम और दूरस्थ क्षेत्रों की संस्कृति पर अछूती सामग्री दी जा रही है ।
  • Idhar Ki Hindi Kavita
    Ajit Kumar
    100 90

    Item Code: #KGP-9130

    Availability: In stock

    ‘कविता का जीवित संसार’ (1972) के बाद ‘इधर की हिंदी कविता’ (1999) अजित कुमार के लेखों का दूसरा संग्रह है। कविता की अपनी व्याख्या को उन्होंने पहले संग्रह में ‘स्नेहमयी व्याख्या’ नाम दिया था, जिसका मतलब कुछ लोगों ने यह निकाला कि कविता उनके लिए एक घरेलू मामला है।
    अब यदि वे ‘इधर की हिंदी कविता’ प्रकाशित कर रहे हैं तो पहला प्रश्न यही उठेगा कि ‘इधर’ की व्याप्ति किधर तक है? इसका एक उत्तर यह होगा कि ‘इधर’ वहां तक है, जहां से ‘उधर’ शुरू होता है। उत्तर और भी हो सकते हैं, वैसे ही जैसे कि प्रश्न अनेक होंगे।
    उनमें से किन्हीं को समझने और अपने तईं सुलझाने की कोशिश इन लेखों में हुई है। संभव है, वह आधी-अधूरी कोशिश हो, जिसका कुछ कारण इस स्थिति में देखा जा सकता है कि अजित कुमार अपने को समीक्षकों के बीच कवि और कवियों के बीच समीक्षक पाते रहे हैं। संभव तो यह भी है कि इसी नाते उन्हें निराला प्रिय हों, जिनका खयाल था-
    ‘बाहर मैं कर दिया गया हूं।
    भीतर, पर, भी दिया गया हूं।’
    कौन जाने, अपठनीयता की मारा-मारी में पठनीयता का यह हस्तक्षेप दमघोंटू माहौल में ताजी हवा के एक झोंके-सा मालूम हो।