Qasaaibaaraa

Ajeet Kaur

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  • Year: 2013

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9788170165330

कसाईबाड़ा
नोनी बुझ-सा गया । निढाल-सा हो गया । मरी हुई आवाज़ में कहने लगा, “न्यूरमबर्ग में क्या रखा है जी ! कुछ भी तो देखने लायक नहीं है । वह भी शहरों में से एक शहर है । बस, एक पुराना जेलखाना है । बैरकों जैसा। जहाँ नाजियों पर मुकदमे चले थे । जब लडाई ख़त्म हुई तो जुल्म करने वाले नाजियों को उन्होंने धर दबोचा।  हिटलर ने तो आत्महत्या करके मुक्ति पा ली।  बाद में जिनके पास धन-दौलत थी, वे सोने से लदी गाडियों देकर  भाग-भूग गए । सुना है, अभी तक कई नाजी अमेरिका में और दूसरे मुल्कों में नाम बदलकर रह रहे है । लेकिन जो पकडे गए, उनको उन्होंने न्यूरमबर्ग की जेल में कैद कर दिया।  उसे फाँसी पर लटकाया गया । बस, यहीं है न्यूरमबर्ग ।  जेलखाने, और फाँसी देने वाला शहर ।"
“पर नोनी, साठ लाख यहूदियों को जिन्होंने वहशी दरिंदों की तरह ख़त्म  कर दिया था, उन्हें फाँसी तो होनी ही थी।"
"बडे दरिंदे हमेशा बच जाते है छोटे ही फँसते है ।"
"ठीक कहते हो।"
"पर लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने वाले नाजियों के लिए जो जेलें बनी थीं, उनमें आजकल उन्होंने मासूम मेमने रखे हुए है ।"
"कौन से मेमने ?”
“बस, गंदुमी रंग के मेमने । उनके बीच कभी-कभी कोई गोरा या पीला मेमना भी आ फँसता है । . . वह देखिए, वह सामने जो जेल-सी बिल्डिंग नज़र आ रही है । "
अजीब इमारत थी, जिसकी एकमात्र लंबी मोटी दीवार जमीन से उठी हुई थी । ऊ …पर तक ।  पुराने किले की तरह ।
लेकिन किलों में कोई धोखा  नहीं होता । वे दूर से ही एलान कर देते है कि हम किले है ।  पुराने वक्तों के । अपनी फौजों को, अपने आपको, अपनी रानियों को, अफसरों. दरबारियों, कर्मचारियों को, और राज्य का अन्न-भंडार सुरक्षित रखने के लिए तथा आक्रमणों से बचने के लिए राजे-महाराजे किलों का निर्माण करवाते थे ।  अब इनके भीतर केवल पुरानी हवाएँ बाल खोले घूमती है । चमगादड़ बसेरा करते हैं, घोंसले बनाते है क्योंकि उन्हें अभी भी इन दीवारों में हुए छेद सुरक्षित नजर आते है । [इसी संग्रह से]

Ajeet Kaur

अजीत कौर पंजाबी की वरिष्ठ कथाकार हैं और दो खंडों में प्रकाशित उनकी आत्मकथा बेजोड़ है जो न तो नॉस्टैल्जिया है, न रोमांटिक क्षणों के जुगनू पकड़ने को लालसा। यह बीते समय की चिर-फाड़ है जो आखिर में निजी अंधेरों की ओर पीठ कर लेती है और वर्तमान से रूबरू होती हैं। उनकी आत्मकथा गुज़रे वक़्त की राख में से जलते पंखों वाले पक्षी की तरह उठती है और नई दिशाओं की खीज में उड़ान भरती है। अनेक कहानी-संग्रह तथा उपन्यास प्रकाशित। उल्लेखनीय : 'गुलबानो', 'महिक दी मौत', 'बुतशिकन', 'फालतू औरत', 'सावियां चिड़ियां', 'मौत अली बाबे दी', 'काले कुएं', 'ना मारो', 'नवंबर चौरासी', 'नहीं सानू कोई तकलीफ नहीं', 'कसाईबाड़ा' (कहानी-संग्रह), 'धुप्प वाला शहर', 'पोस्टमार्टम', 'गौरी' (उपन्यास), 'तकिये दा पीर' (रेखाचित्र), 'कच्चे रंगां दा शहर : लंदन', (यात्रावृत्त), 'खानाबदोश', 'कूड़ा-कबाड़ा' (आत्मकथा) । उनकों कृतियों के अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चूके हैं और उनकी रचनाओं की कई अंतर्राष्ट्रीय संकलनों में शामिल किया गया है। 1986 का साहित्य अकादमी पुरस्कार अजीत कौर को उनकी आत्मकथा 'खानाबदोश' के लिए दिया गया और 2006 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया । पूरी दुनिया से जब एक हजार प्रतिबद्ध महिलाओं को अमन के लिए जिदगी समर्पित कर देन के उपलक्ष्य में, दो साल की खोजबीन के बाद, नोबेल शांति पुरस्कार के लिए इकट्ठा किया गया तो अजीत कौर भी उनमें शामिल थीं। अजीत कौर कहती हैं : मैं तो 'मैड ड्रीमर' हूँ। पागल, सपने-साज़ । सिर्फ नासमझी के काम किए हैं, सिवाय इसके कि विलक्षण प्रतिभासंपन्न बेटी अर्पणा कौर को जन्म देकर, उसे बड़ी मुहब्बत से तराशा है। उसका नाम लेकर वह गर्व से कहती हैं : हां, मैं अर्पणा की माँ हूं । एक विशिष्ट कथाकार, जुझारू महिला और अद्धभुत इंसान का नाम है अजीत कौर।

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