Antim Padaav

Hari Yash Rai

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  • Year: 2012

  • Binding: Hardback

  • Publisher: Kitabghar Prakashan

  • ISBN No: 9789380146010

अंतिम पड़ाव
आज हम समय के जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें दुनिया की बढ़ती समृद्धि और वैभव की सर्वभक्षी आकांक्षा सुकून देने के बजाय बेहद डराने वाली है। इस दौर में मनुष्यता का विघटन और क्षरण इतनी तेज़ी से हो रहा है कि सारा वैभव-प्रसार, पुरानी प्रतीकात्मक मिथकीय भाषा में कहूँ तो आसुरी लगता है। यह मात्र संयोग नहीं है, बल्कि योजनाबद्ध है कि ‘ताकतवर’ होते मध्यवर्ग की निगाह को पूँजी की ताकतों ने उन सवालों की ओर से फेर देने में लगभग ‘सफलता’ हासिल कर ली है, जो कभी मनुष्यता की तरफदारी में हर गली-चैराहे को अपनी आवाज़ से गुँजाते थे। गनीमत है कि ऐसे क्रूर दौर में भी कुछ लोग हैं जो साहित्य, संस्कृति, कला और राजनीति में एक ज़िद के साथ मनुष्यता, नैतिकता और न्याय के सरोकारों के पास से न हटने का हठ ठाने हुए हैं। कथाकारों की ऐसी पाँत में हरियश राय का नाम तेज़ी से उभर रहा है, जो कहानी- कला की बारीकियों की ज़्यादा परवाह न करके मनुष्यता के पक्ष में जी-जान से खड़ा है। 
हरियश अपनी कहानियों के लिए कथा-सामग्री का चयन रोज़मर्रा की उस उपेक्षित-तिरस्कृत दुनिया के अनुभवों के बीच से करते हैं, जो अब सामान्यतया अघाए लोगों के लिए सोच-विचार तक की चीज भी नहीं रह गई है। वे लगातार कोशिश करते रहे हैं कि अपने मध्यवर्गीय जीवन की सँकरी-सिकुड़ी चैहद्दियों को छोड़कर उन किसानों की ज़िंदगी के विस्तृत मैदान में जाएँ, जहाँ आज भी सबसे बड़ा सहारा धरती, सूरज, चाँद और वर्षा का है। दुनिया के बदल जाने और एक विश्वग्राम बन जाने के कनफोड़ू शोर में कितना ठहराव है, यह उनकी कहानियाँ पढ़कर जाना जा सकता है। यह ठहराव एक वर्ग और जगह का नहीं है। यह जगह-जगह है। यह तेज़ गति से दौड़ते राजधानी-नगरों के आसपास मौजूद है। इसे वृंदावन जैसे उन तीर्थ-नगरों के भजनाश्रमों में अनुभव किया जा सकता है, जहाँ जिजीविषाओं और शवों में बहुत दूरी नहीं रह गई है। ज़रूरत है इसे देखने, जानने, शिद्दत से महसूस करने और बदलने की कोशिश में लग जाने की। कदाचित् ये कहानियाँ ऐसा कुछ कर जाने की आकांक्षा में जन्मी और बड़ी हुई हैं।    

Hari Yash Rai

हरियश राय
जन्म : अप्रैल, 1954
प्रकाशित साहित्य -
कहानी-संग्रह : ‘बर्फ होती नदी’, ‘उधर भी सहरा’, ‘पहाड़ पर धूप’, ‘अंतिम पड़ाव’
उपन्यास : नागफनी के जंगल में
व्यंग्य-संग्रह : बबुआ की क्रांति
आलोचना : भारत-विभाजन और हिंदी उपन्यास
विविध : सूचना तकनीक बाज़ार एवं बैंकिंग

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